हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मुखौटे… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मुखौटे… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

मुखौटों की

भीड़ से घिरा हूँ,

किसी चेहरे तक

पहुँचूँगा या नहीं,

प्रश्न बन खड़ा हूँ।

मित्रता के मुखौटे में

शत्रुता छिपाए,

नेह के आवरण में

विद्वेष से झल्लाए,

शब्दों के अमृत में

गरल की मात्रा दबाए,

आत्मीयता के छद्म में

ईर्ष्या से बौखलाए।

बार-बार सोचता हूँ

मनुष्य मुखौटे क्यों जड़ता है..?

भीतर-बाहर अंतर क्यों रखता है..?

मुखौटे रचने-जड़ने में

जितना समय बिताता है,

जीने के उतने ही पल

आदमी व्यर्थ गंवाता है,

श्वासोच्छवास में विष,

अस्तित्व को विषैला करता है,

गंगाजल-सा जीवन रखो मित्रो,

पाखंड में क्या धरा है..!

 ?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 11.52 बजे, 15.10.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३७ – सास-ससुर, माता-पिता… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सास-ससुर, माता-पिता…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३७ ☆

☆  सास-ससुर, माता-पिता… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

बहू अगर बेटी बने, सब रहते खुशहाल ।

दीवारें खिचतीं नहींे, हिलमिल गुजरें साल ।।

*

सास अगर माता बने, बढ़ जाता है मान ।

जीवन भर सुख शांति से, घर की बढ़ती शान ।।

*

सास बहू के प्रेम में, छिपा अनोखा का राज ।

रिद्धि सिद्धि समृद्धि का, रहता सिर पर  ताज ।।

*

खुले दिलों से सब मिलें, ना कोई खट्टास ।

वातायन जब खुला हो, सुख शान्ति का वास।।

*

रिश्तों का यह मेल ही, खुशियों की बरसात ।

दूर हटें संकट सभी, सुख की बिछे बिसात।।

*

सास-ससुर, माता-पिता, दोनों एक समान ।

कोई भी अन्तर नहीं, कहते वेद पुरान ।।8

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०३ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०३ ☆

☆ –  ठंडे ये ज्वालामुखी करो…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

आहत लोग

कैसे खुश हो सकते हैं

उड़ाकर शान्ति कपोत को?

काश!

हम दिये की जोत होते

कपोत होते

तब हम अपने होंठ सी लेते

जी लेते।

मगर

हम जोत या कपोत नहीं

आदमी हैं।

और आज

आम आदमी दुखी है

इसलिये वो आदमी नहीं

ज्वालामुखी है।

आदमी पिस रहा है

ऐसा न हो कि

ज्वालामुखी के लावे में

सब कुछ हो जावे गुम

न शेष रहें हम, न तुम।

सुनो,

सुख का सूरज उगाओ

आदमी को सूरजमुखी करो,

समय रहते

ठंडे ये ज्वालामुखी करो।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # ३०० – “खुला रखो दरवाजा सबको…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​  2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “खुला रखो दरवाजा सबको...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “खुला रखो दरवाजा सबको...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

 दिल से बहुत अमीर रहे थे

मगर गरीब पिता ।

विरलों को हो पाते ऐसे

कभी नसीब पिता ॥

 *

उनकी नजरों में सब शुभ था

कहीं अभाव नहीं ।

उनके घावों का हो पाता

किन्तु भराव नही ।

 *

महगाई भी उनका जीवन

छलनी करती थी ।

अगर सम्हल जाने के होते

कभी करीब पिता ॥

 *

लोगों से उनका जुड़ाव

जैसे कि अलौकिक था।

“खुला रखो दरवाजा सबको”

कहना मौखिक था ।

 *

लोग कहा करते वह कोई

महापुरुष जैसे ।

लोगों को जोड़े रहने की

रहे जरीब पिता  ॥

 *

अपनी तकलीफों को उनने

कष्ट  नहीं माना ।

लोगों का सहयोग सदा

करने का ही ठाना ।

 *

उनके इसी समर्पण की

करते सराहना सब ।

जो न समझते कहते थे

हैं बहुत अजीब पिता ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

04-09-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८२ ☆ # “शुभ अशुभ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “शुभ अशुभ…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८२ ☆

☆ # “शुभ अशुभ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

शुभ अशुभ के फेर में

फँसा हर इंसान है

दुविधा में उलझे हुए

उसके प्राण है

इस भ्रमजाल से

मुक्ति पाना मुश्किल है

जन्म से आज तक

वह कर रहा इसका गुणगान है

 

सामाजिक मान्यताओं में

वह जकड़ा हुआ है

सदियों की परंपराओं को

वह पकड़ा हुआ है

वह चाह कर भी

इससे छुटकारा नहीं पा सकता

वह चाह कर भी

भ्रमजाल से बाहर नहीं आ सकता

 

उसकी विद्वता

यहां पर निष्क्रिय हो जाती है

उसकी सोच

इस उधेड़बुन में खो जाती है

यह अंधविश्वास है

वह अच्छे से जानता है

फिर भी वह

इस परंपरा को ही मानता है

जब कार्य उसके अनुरूप होते हैं

वह शुभ है

जब कार्य उसके अनुरूप नहीं होते

वह अशुभ है

 

वह जब अपने

विवेक से सोचता है

सत्य को अपने

जीवन में खोजता है

तब उसे

एक महान विचारक का

कथन याद आता है –

कि

जब तक

सांस चल रही है

सब शुभ है

जो बीत गया

वह कल था

आने वाला कल

एक वरदान है

जब सांस रुक जाती है

तब सब अशुभ है

अपनों के लिए भी

और दुनिया के लिए भी /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६२ ☆ प्रेम का प्रतिदान ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्रेम का प्रतिदान” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६२ ☆

☆ प्रेम का प्रतिदान ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

तुम्हारी हँसी उजली धूप की तरह

फैल गई थी चारों ओर

तुम्हारा अहसास विखर गया था

मलयानिल की गंध की तरह

तुम्हारे पाँव की पदचाप सुनकर

जाग उठे थे सप्तराग

तुम्हारे लरजते हुए होंठों पर

थिरक उठा था सामवेद का संगीत

तुम्हारे रेशमी केशों में

उलझकर रह गया था पवन

तुम्हारी दृष्टि में

समा गया था सारा ब्रम्हाण्ड

तुम्हारी समूची देहयष्टि से

जगमगा उठा था मेरा घर-आँगन

मैं आज भी बैठा हूँ

उन यादों के ढूह पर निहारता

शायद फिर लौट आए कोई दिन

जो दे सके प्रेम का प्रतिदान

और मैं जी सकूँ भोगा हुआ यथार्थ।

****

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – धूप… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – धूप… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

एसी कमरे में

अंगुलियों के इशारे पर

नाचते तापमान में,

चेहरे पर लगा लो

कितने ही परतें,

पिघलने लगती है

सारी कृत्रिमता

चमकती धूप के साये में,

मैं सूरज की प्रतीक्षा करता हूँ,

जिससे भी मिलता हूँ,

चौखट के भीतर नहीं,

तेज़ धूप में मिलता हूँ..!

 ?

© संजय भारद्वाज   

(प्रात: 7:22 बजे, 25.01.2020)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६९ ☆ आप घर कह रहे जिसे मेरा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आप घर कह रहे जिसे मेरा…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६९ ☆

✍ आप घर कह रहे जिसे मेरा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

मैं हूँ आहू की तिश्नगी की तरह

ज़ीस्त सहारा की है नदी की तरह

*

आप घर कह रहे जिसे मेरा

जेल की है वो कोठरी की तरह

*

एक बच्चे को क़ीमती सबसे

है खिलौनों की टोकरी की तरह

*

दोनों तारीफ़ उसकी करते हैं

हम्द है मुझको आरती की तरह

*

तुमको तस्लीम आदमी कर लूँ

पेश तो आओ आदमी की तरह

*

धूप हो छाँव हो न भूलें हम

रोज़ खिलना है इक कली की तरह

*

शे‘र मफ़हूम से न होगा बड़ा

लफ्ज़ गर है न सादगी की तरह

*

दोस्त इस्लाह और कुछ भी नहीं

एक कपड़े पै इस्तरी की तरह

*

अय अरुण हिज़्र का असर देखो

जनवरी लग रही मई की तरह

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७३ – शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – शाश्वत सत्य…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७३ ☆

✍ शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

यहाँ कुछ भी रहता नहीं

अनंत काल तक।

 

जब उठेगी दृष्टि, पीछे की ओर

तो सम्मुख होगा शाश्वत सत्य

कि,

बीता हुआ कल,

उसके पहले का कल,

या अभी- अभी बीता पल

अलग था

उससे जो दिख रहा है आईने में अभी।

 

क्या अमीबा ने सोचा होगा कभी

कि, उसके एककोषीय दुर्बल शरीर से

जन्म लेंगे कभी

जिराफ, हाथी, मगरमच्छ, अजगर

और घड़ियाल।

 

जीवन की इसी अनवरत यात्रा में

आदम की जात भी आई

उसी

एककोषीय जीवन से,

सतत बदलते रहने की

उस पुरातन परंपरा से।

 

कुछ भी नहीं बचा

जो रह गया हो

जैसा का तैसा।

विराट पहाड़ भी

किसी भूगर्भीय हलचल की

संतान हैं।

 

फिर,

आज का बवंडर

या सामने खड़ा तूफ़ान,

किसी की दहाड़

या आँखों की तपिश

इनका भी क्या ठिकाना?

 

सृष्टि के विराट क्रम में

उथल-पुथल भी क्षणिक है

तो शांति भी।

 

तूफ़ान आते हैं,

गुज़रने के लिए;

क्यूंकि

समय बदलता है करवट,

पल-पल।

 

यही तो है

संसार का सबसे पुराना सत्य

कि

यहाँ कुछ भी

नही है सदा के लिए।

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६४ – बुन्देली कविता – ”बे महुआ-मूसर की दै रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆

☆  बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बे महुआ-मूसर की दै रय 

कइयो ने कै ऐंसी  कै रय  

* 

लै उधार भय नौ-दो ग्यारा 

इत्ते दिन तुम कहौ कितै रय 

 *

हैं दुख-दर्द हमाये संगी 

हम नईं इतै अकेले रै रय 

 *

जुन होरा  भूँजत छाती पै 

हर चुनाव में उन्हें जितै रय 

 *

हाल गरीबों के का पूँछत 

ओइ निचो रय, ओइ सुखै रय 

 *

बाप-मताइ कर्जा लै खें 

बिटिया खों ससरार पठै रय 

 *

पोल खोल हैं ओइ तुमाई 

‘भगवत’ जी खों जाँग दिखै रय

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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