डॉ भावना शुक्ल
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – साधना।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३३७ – साहित्य निकुंज ☆
☆ भावना के दोहे – साधना ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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मन के द्वारे तू बसा, लगा रही आवाज़।
घड़ी मिलन की आ गई, आ जाओ तुम आज।।
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समय आज है साथ में, नहीं करो कल बात।
अभी मिलन का योग है, बीत न जाए रात।।
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मन सुरभित होने लगा, छाया है मधुमास।
लगी टकटकी द्वार पर, बस तेरी है आस।।
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मेरी ऐसी साधना, मिलता नहीं विराम।
आतुर मेरे चक्षु हैं, कब? आए आराम।।
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© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक… प्राची
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