श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘अविकारी…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३८ ☆
कविता – अविकारी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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कंटीले बबूल को सौंप दी, बगिया की पहरेदारी,
फिर कभी खिल ना सकी, कोई फूलों की क्यारी…
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रेत पर बने नक्शे कदम पर चलने की तैयारी,
और सौंप दी समुद्र को संरक्षण की जिम्मेदारी…
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कहां निभाऊं, कहां खर्च करूं, अपनी उर्जा सारी,
पौधों को सहला रहे, हाथ में रखकर आरी…
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इठलाती, बलखाती, दीवानी ने खो दी मिठास सारी…
अब ढूंढ रही है “एक कतरा अस्तित्व” नदी बिचारी…
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वादा किया है होठों पर, मुस्कान रहेगी तारी…
शर्त यह है कि आंखों से, अश्रु की धार रहे जारी…
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कोशिश थी कि दीप जलाकर, दूर करें अंधियारी,
साथ बवंडर लिए फिरते हैं, कैसे हो उजियारी…
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सभी स्वार्थ में डूब गए हैं, कैसे निभे यहां यारी,
मधुर वचन की आस लिए हम, उनके मुंह दो धारी…
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सब कुछ आजमा लिया..!! देख रहा है “अविकारी”
हाथ जोड़कर समक्ष उसके, सौंप दी सारी जिम्मेदारी…
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





