हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५९ ☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए – शांतिलाल जैन 

विक्रम सम्वत् 2103, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी, दिनांक 18 अगस्त, 2047, रविवार. इंद्रलोक में आज साप्ताहिक अवकाश है. सभा में अप्सराएँ नृत्य करने नहीं आएँगी. देव छोटे छोटे समूह बनाकर अनौपचारिक विमर्श में लीन थे. एक छोटे से समूह में देव अपने पूर्वलोक में सर्वत्र बिखरे विकास का आलोक निहार रहे हैं.

विकसित जंबूद्वीप. जितना दृश्य उनके नेत्रों में समा पाता है सड़कें ही सड़कें दिखाई पड़तीं हैं. नश्वर संसार में अविनाशी राजमार्गों का चमचमाता विशाल जाल देखकर मन पुलकित हो उठा है. नीली छतरी के पार से जिस तरफ दृष्टि जितनी दूर तक जा पाती है पिछड़ेपन की कोई निशानी दिखाई नहीं पड़ती, न वन और न वन्य जीव, न चौपाए, न पक्षी, न खेत, न नदी, न तालाब, न झरने, न पहाड़, न हरे-भरे खेत, न लहराती फ़सलें, न हरीतिमा के विस्तार, न छोटे गाँव, न मिट्टी के घर. इन सब को एक संग्रहालय में समेट दिया गया जिसे आप वर्किग-डे में 11 से 5 के बीच टिकट खरीदकर देख सकते हैं. बहरहाल, देव देख पा रहे हैं तो बस तेज़ रफ्तार मोटरें, हैचबैक,  सेडान,  प्रीमियम सेडान, टेस्ला, बीवाईडी,  लिमोजिन,  फ्लाईओवर, टोल प्लाज़ा, लेन-ही-लेन, सड़कें-ही-सड़कें. कहीं कहीं खुली जगह के टापू जो दीख रहे हैं उन पर भी धड़ल्ले से सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है. खुली जगह एक इंच बचेगी नहीं. लेन के दोनों ओर चमचमाते रिसोर्ट, ढ़ाबे और रिट्रीट दृष्टिगोचर हो रहे हैं. हर लेन में वाहनों की लम्बी कतारें, कतारों में दौड़ता विकास, तेज़ी से घूमते टायरों से घरघराती आवाज़ निकालता विकास, ओजोन परत में छेद करता विकास, कार्बन से धरती को तप्त करता विकास. कुछेक वर्ष पूर्व तक कितना पिछड़ा हुआ था उनका अपना पूर्वलोक!! युगों युगों से जम्बूद्वीप की राजसत्ता पर्यावरण बचाने के फेर में विकास की उपेक्षा करती रही, अब सब ठीक हो गया लगता है.

एक अन्य देव ने कहा – ‘वह पर्वत भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जिसकी कंदराओं में बैठकर हमने घोर तपश्चर्या की थी.’

‘हाँ देव, वह उस ओर था. अब उसे समतल कर सड़क बना दी गई है. राष्ट्रीय राजमार्ग. एनएच-92947. राजमार्गों ने शतकों का शतक पूरा कर लिया है. राजमार्ग भी कितने चौड़े, बाप-रे-बाप!! उस ओर दृष्टि डालिए देव, आपके नेत्र खुले-के-खुले रह जाएँगे. दिल्ली मुंबई राजमार्ग. चार सौ बत्तीस लेन का. दो सौ सोलह लेन पर जानेवाली गाड़ियाँ, दो सौ सोलह लेन पर आनेवाली गाड़ियाँ. इसे कहते हैं विकास!’

‘वह आश्रम भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जहाँ इंद्र हमारी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के हेतु से ऋषि कन्याएँ डेपुट किया करते थे. वह अरण्य भी दिखाई नहीं दे रहा जहाँ हम वानप्रस्थ के लिए निकले थे और नश्वर देह का विसर्जन किया था.’

‘हाँ देव, पहले वहाँ रिसोर्ट बना, अब एक चमचमाता मॉल बन गया है. जंबूद्वीप इतना विकसित तब हो गया होता तो हम वानप्रस्थ में जाते ही क्यों. फ़ाईवस्टार ओल्ड एज होम में जीवन का अंतिम समय गुजार लेते.’

विमर्श के दौरान देवों को अपने पूर्वलोक में चौड़ी होती जाती सड़क की निरंतर बहती धाराओं को अवलोकित कर गर्व की अनुभूति हो रही थी. मगर तभी, एक देव का कमल सदृश मुख मुरझाने लगा. वे बोले – ‘सब कुछ अच्छा है मगर पर्यावरण लील लिए जाने का दुःख लग रहा है!!’

‘आपका भाग्य अच्छा है देव, आप यहाँ बैठकर पर्यावरण पर रंज प्रकट कर रहे हैं. जंबूद्वीप में करते तो टूलकिट उपयोग करने के आरोप में कारागार में डाल दिए जाते. बरसों नागरिकों ने चार फुटिया सड़क का अभिशाप झेला है, अब वे चार सौ बत्तीस लेन की सड़क आनंद उठा रहे हैं, और आप हैं कि पर्यावरण का रोना लेकर बैठ गए हैं.’

‘तो क्या देव जंबूद्वीप के सभी नागरिकों ने ऐसा ही राष्ट्र चाहा था ?’

‘नहीं देव. एक्टिविस्ट का छोटा सा समूह था वहाँ, अर्बन नक्सली कहाता था. वो उन दीन-हीन मनुष्यों की पक्षधरता में खड़ा रहता जिनका जल, जंगल, जमीन सब छिनता चला जा रहा था. वो कभी जैव-विविधता की बात करता, कभी अल-नीनो की. विकास उसे सुहाता नहीं था. आंदोलनजीवी कहाता. वो घर और भूमि से बेदख़ल किए जाने वाले नागरिकों के लिए आंदोलन करता. धरती बचाने की पहल करते करते राजसत्ता से भिड़ जाता. लेकिन राज्य व्यवस्था के कर्ण पर कभी जूँ नाम का प्राणी रेंगा भी नहीं. विकास थमा नहीं देव, और थमेगा भी नहीं. चार हज़ार बत्तीस लेन की सड़क की डीपीआर रेडी है. जनसामान्य का मानस बना दिया गया है कि वे सड़क-निर्माण को ही विकास का पर्याय मान लें. जंबूद्वीप में वे ही नागरिक बचे रह पाएँगे जो विकास के संग-संग दौड़ लगा पाने के सक्षम हों, शेष तो बस…..’

अर्बन नक्सली टाईप के देव को छोड़कर शेष सभी ने जंबूद्वीप के अतिविकसित हो जाने पर गहरा संतोष व्यक्त किया और विमर्श को विराम देते हुए अपने अपने वैमनिकों में प्रस्थान कर गए.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२४ ☆ व्यंग्य – होनी को टालने के टोटके ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘होनी को टालने के टोटके‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ होनी को टालने के टोटके डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

कुछ समय पहले एक अखबार में मजे़दार खबर पढ़ी थी कि राजस्थान में हर साल करीब 200 नेता, अफसर, बिल्डर जेल का खाना खाते हैं। कारण यह बताया गया कि ज्योतिषी ने उनकी कुंडली में ‘कारागार योग’ या ‘जेल योग’ बताया था और कहा था कि जेल का खाना खाने से ‘जेल योग’ का संकट टल सकता है। यानी अगर वे जेल का खाना खा लेंगे तो ऊपर वाले के रिकॉर्ड में आगे संभावित सज़ा से बच जाएंगे। हमारे यहां इसे ‘अलफ़’ टालना कहते हैं। एक ज्योतिषी जी ने संवाददाता को बताया कि जेल का खाना खाने का टोटका 50% तक काम करता है।

एक विधायक प्रत्याशी ने अखबार  के संवाददाता को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन किये हैं, इसलिए उन्हें भय है कि उन्हें किसी भी मामले में फंसा कर जेल में डाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे जेल से बाहर रहकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, इसलिए ‘जेल योग’ टालने के लिए जेल का खाना खाते हैं।

कुछ लोग लोकलाज के कारण जेल में ही खाने के बजाय खाने को बंधवाकर घर ले जाते हैं। यह भी पढ़ने को मिला कि कुछ आईएएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिल रही थी तो उनके ज्योतिषी ने उन्हें घर का खाना मंगाने के बजाय जेल का खाना खाने की सलाह दी थी। पता नहीं इस टोटके का कुछ असर हुआ या नहीं।

मुझे अपने छात्र जीवन की याद आती है जब एक बार हम चार पांच छात्र किसी मरीज़ को देखने अस्पताल गये थे। हम में से एक वहां की एक ‘बेड’ पर लंबा हो गया। पूछने पर भाई ने बताया कि वह अपनी ‘अलफ़’ टाल रहा था, यानी यदि उसकी किस्मत में ‘अस्पताल योग’ हो तो वह अभी खारिज हो जाए। आदमी अब इतना होशियार हो गया है कि उसने होनी को भी टालने के जुगाड़ ढूंढ़ लिये हैं।

गांव में जब हमें किसी ‘अशुभ’ दिन पर बाहर निकलने की ज़रूरत होती थी तो एक दिन पहले अपने किसी सामान को आगे वाले पड़ोसी के घर में रखा दिया जाता था। माना जाता था कि ‘प्रस्थान’ एक दिन पहले हो गया और अब यात्रा दूसरे दिन निर्विघ्न की जा सकती है।

मृत्यु के बाद के कर्मकांड में भी अब ‘शॉर्टकट’ ढूंढ़े जा रहे हैं। आज के आदमी को कर्मकांडों के हिसाब से चलने की फुरसत नहीं है। उसके लिए अपना काम और अपनी कमाई सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसलिए अब तेरहीं और ‘बरसी’ एक दिन के अंतर से निपटने लगी है, जब कि ‘बरसी’ एक बरस बाद होनी चाहिए। यह भी देखा कि मृतक की संतानें अग्निसंस्कार के बाद पंडित जी को बता देती हैं कि तेरहीं के लिए उनका आना संभव नहीं है, इसलिए जो कुछ भी करना है, तत्काल करा दीजिए। बेचारे पंडित जी भी अपनी जान बचाते हुए सुरक्षित रास्ता खोजते रहते हैं।

आज का आदमी नये और पुराने के बीच में झूलने के लिए अभिशप्त है। पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाता, इसलिए उन्हें यथासंभव तोड़- मरोड़कर ज़िंदगी की गाड़ी को आगे ठेल रहा है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा ☆ श्री हिमांशु राय ☆

श्री हिमांशु राय 

(ई-अभिव्यक्ति  के पाठकों के साथ समय समय अपने अनुभव और साहित्य को साझा करने के लिए  संस्कारधानी  जबलपुर के वरिष्ठ  नाट्यकर्मी एवं साहित्यकार श्री हिमांशु राय जी   का हृदय से आभार। आप  इप्टवार्ता के संपादक एवं  विवेचना थियेटर ग्रुप के सचिव भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा)

✍  व्यंग्य – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा – श्री हिमांशु राय ✍

डोरीलाल से एक व्यक्ति मिला। वो बहुत प्रसन्न था। उसने बताया कि अभी अभी उसकी जेब कट गई है। इसलिए बहुत खुश है। उसने बताया कि उसकी रोज जेब कटती है। आज सुबह से नहीं कटी थी तो वह बहुत चिन्तित था मगर दोपहर तक कट गई तो अब उसने चैन की सांस ली है। उसने बताया कि पिछले कई वर्षों से उसे जेब कटवाने की आदत पड़ गई है और जिस दिन जेब नहीं कटती वो बैचेन हो उठता है। उसके अच्छे स्वास्थ्य और खुश रहने का राज है रोज जेब कटवाना। उसकी जेबकतरे से लगन लग गई है।

डोरीलाल को भरोसा नहीं हुआ। मैंने पूछा कि ये क्या बात हुई ? ऐसा कैसे हो सकता है। जिस बात पर तुम्हें गुस्सा आना चाहिए, उस पर तुम खुश हो रहे हो ? उसने कहा शास्त्रों में कहा गया है कि क्रोध पाप का मूल है और पाप मूल अभिमान। तो मुझे किसी बात पर गुस्सा नहीं आता। अब वैसे भी मेरी चिन्ता जीवन जीना नहीं है। जीवन से पीछा छुड़ाना है। मुझे मोक्ष चाहिए। मुझे मुक्ति चाहिए। मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूं जहां कोई जेबकतरा न हो।

मैंने कहा कि तुमने अपने रोग की पहचान में गलती की है। तुम अपने को दोषी मान रहे हो जबकि तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार तो जेबकतरा है। तुम जेबकतरे की गर्दन नापने के बजाए अपनी गर्दन नापने की सोच रहे हो। ये ठीक नहीं है। क्या तुम जेबकतरे को पहचानते हो ?

उसने कहा – बिल्कुल पहचानता हूं। मैं ही क्या हर कोई उसे पहचानता है। वो खुद भी अपनी पहचान बताने में कभी संकोच नहीं करता। उसकी फोटो हर जरूरी और गैर जरूरी जगह पर लगी है। उसने खुद लगवाई है। उसे बड़ा शौक है। अपनी फोटो लगवाने का।

मैं समझ गया कि यह आदमी भगवान से खार खाये बैठा है। इसलिए सर्वशक्तिमान परम पिता परमेश्वर की बात इस तरह से कर रहा है। मैंने कहा देखो भाई ईश्वर के मामले में इस तरह की बातें उचित नहीं हैं। धार्मिक मामला अलग है। भगवान की फोटो श्रद्धावश लोग जहां तहां लगा देते हैं। जेबकटी के मामले में भगवान को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। आज देश में कई लोग जेब कतरने जैसे छोटे छोटे उद्योग व्यवसाय में लगे हैं। वे प्रभावशाली हैं। उनमें से कोई तुम्हारी भी जेब काट रहा है। तुम्हारी शिकायत वाजिब है। मगर डोरीलाल को ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होगा कि तुम इस छिछोरे जेबकतरे की बराबरी ईश्वर से करो।

अब उसे गुस्सा आया। उसने कहा मि. डोरीलाल मैं भी यही कह रहा हूं कि भगवान और उस जेबकतरे को एक न समझो। वो कोई भगवान नहीं है। वो छिछोरा जेबकतरा ही है। मैं भी जानता हूं और मेरे जैसे सारे लोग जानते हैं। जैसे नशेबाज को नशे में कोई बुराई नहीं दिखती। जैसे शराबी को शराब में कोई बुराई नहीं दिखती वैसे ही रोज हमारी जेबकटती है मगर हमें जेबकतरे में कोई बुराई नहीं दिखती। हम जेब कतरे के भक्त हो गए हैं। अब बात काफी आगे बढ़ गई है। अब तो हमें जेब कटवाने में तरह तरह के फायदे दिखाई देने लगे हैं।

जेब कटवाना अब एक सामाजिक राजनैतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बड़े बड़े वकील, जज, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, अधिकारी, व्यापारी सब कूद कूद कर जेब कटवाते हैं। जो खुद दूसरों की जेब काटते हैं वो भी उस जेबकतरे से जेब कटवाते हैं। जिसकी नहीं कटती वो अपने को कमतर समझने लगता है। उसे लगता है कि कल तक वो निपट जाएगा। वो दौड़कर जेबकतरे के पास जाकर गिड़गिड़ाता है मेरी जेब काट लो। जब तक कट नहीं जाती पैरों से लिपटा रहता है।

जेबकतरा परेशान है। आज देश में हर कोई जेब कटवाने के लिए तैयार खड़ा है। जेब न कटे तो लड़ाईयां हो जाती हैं। कटवाने की ऐसी होड़ लगी है कोई छूटना नहीं चाहता। सब चाहते हैं जेब कट जाए। इसीलिए गांव गांव शहर शहर महानगर चंहुओर विराट सामूहिक जेबकट सम्मेलन आयोजित होते हैं। उसमें हजारों लाखों लोग जाकर अपनी जेब कटवाते हैं। गांव गांव में पुड़ी भाजी के पैकेट के साथ मुफ्त बसों में भरकर जेब कटवाने वालों को सम्मेलन में लाया जाता है। जेब कटने के बाद सब लोग खुशी खुशी फोटो वाला झोला लेकर अपने अपने घरों को जाते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखकर देवगण ऊपर से ईर्ष्या के फूल बरसाते हैं। उन्होंने जिस सृष्टि का सृजन किया उसमें जेबकतरे के प्रति अगाध श्रद्धा देखकर देवगण जलभुनकर राख हो जाते हैं। बहुत सारे छुटभैइये जेबकतरे गुरूपूर्णिमा के अवसर पर अपने आराध्य जेबकतरे का पूजन करते हैं और अपनी ’मेहनत’ की कमाई का अंश उन्हें गुरू दक्षिणा के रूप में श्रद्धापूर्वक चढ़ाते हैं।

डोरीलाल ने पूछा कि जेबकतरे को पहचान लेने के बाद भी जेब कटवाते रहते हो, रोज कटवाते हो, तुम आदमी हो या कीट पतंगा ? तुम्हारी मेहनत की कमाई कोई लूट रहा है और तुम मजे कर रहे हो ? तुम विरोध क्यों नहीं करते ? इंकार कर दो हम नहीं कटवायेंगे जेब। कोई जबरदस्ती है ?

डोरीलाल जी, हम लोग छोटे लोग हैं। हम क्या विरोध करेंगे। जेबकतरे के पास पुलिस, अदालत, वकील, जज, बड़े बड़े अधिकारी व्यापारी हैं। हमारे लिए बोलने वाला कौन है ? जो लोग बोल सकते हैं वो खुद लपक लपक कर जेब कटवा रहे हैं। हम इसी लायक हैं कि ठगे जाएं। जेब कटवाना ही हमारा भाग्य है। कम से कम हमें इस लायक तो समझा गया है कि हमारी जेब काटी जाए। उल्टे हमें तो डर लगा रहता है कि जेबकतरा कहीं गुस्सा होकर हमारी जेब काटना बंद न कर दे। हम तो कहीं के न रहेंगे।

हमारे पास कोई काम नहीं है। बचा है तो केवल एक काम – जेब कटवाना।

डोरीलाल ’जेबकतरा प्रेमी’

© श्री हिमांशु राय

जबलपुर, मध्यप्रदेश

14 02 2026

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य  – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के पास वाले उस ढाबे पर, जहाँ चाय कम और धूल ज़्यादा मिलती है, मेरी भेंट एक ‘डिजिटल स्वामी’ से हो गई। स्वामी जी ऐसे थे कि अगर उन्हें किसी मल्टीनेशनल कंपनी के बोर्डरूम में बैठा दिया जाए, तो वे वहाँ भी ‘परमपिता की कृपा’ का प्रेजेंटेशन पावर-प्वाइंट पर दे दें। बदन पर मलमल का कुर्ता, गले में रुद्राक्ष की ऐसी माला जिसे देखकर किसी भी जौहरी का ईमान डोल जाए, और बगल में एक आईपैड, जिस पर वे निरंतर ‘स्टॉक मार्केट’ और ‘अध्यात्म’ का संतुलन बिठा रहे थे।

मैंने पूछा, “स्वामी जी, यह झोला और लैपटॉप लेकर किस महाकुंभ की ओर प्रस्थान हो रहा है?”

स्वामी जी ने एक ऐसी रहस्यमयी मुस्कान फेंकी, जो केवल उन लोगों के पास होती है जिनके पास स्विस बैंक का खाता और मोक्ष का नक्शा, दोनों साथ होते हैं। बोले, “बच्चा, हम ‘स्मार्ट विलेज’ का शिलान्यास करने जा रहे हैं। गाँव की मिट्टी को सिलिकॉन वैली बनाना है।”

मैंने चाय का घूँट भरा—जिसमें चीनी इतनी थी कि मधुमेह को भी शर्म आ जाए। पूछा, “महाराज, गाँव में तो बिजली आठ घंटे रहती है और सड़कें ऐसी हैं कि आदमी चलते-चलते ही योग की कठिन मुद्राएं सीख जाए। वहाँ आप स्मार्टनेस का कौन सा इत्र छिड़केंगे?”

स्वामी जी ने आईपैड पर एक ग्राफ दिखाया। “यही तो तुम्हारी अज्ञानता है। हम गाँव वालों को यह नहीं सिखाएंगे कि खेती कैसे करें, हम उन्हें यह सिखाएंगे कि ‘खेती को इवेंट’ कैसे बनाएं। हम वहाँ एक ऐसा आश्रम बना रहे हैं जहाँ शहर के अमीर लोग आकर ‘गरीबी का अनुभव’ करेंगे। वे देखेंगे कि गोबर कैसे थापा जाता है और फिर उसकी सेल्फी लेकर इंस्टाग्राम पर ‘मिट्टी की सौंधी खुशबू’ लिखेंगे। इसे ही हम ‘ग्रामीण पुनरुद्धार’ कहते हैं।”

मैंने कहा, “पर महाराज, गाँव का असली किसान तो कर्ज में दबा है, उसे तो खाद और बीज चाहिए।”

स्वामी जी हँसे, जैसे किसी ने उनसे कह दिया हो कि कद्दू के पेड़ पर आम लगते हैं। बोले, “बच्चा, किसान को खाद मिल गई तो वह आत्मनिर्भर हो जाएगा, फिर हमारे प्रवचनों में भीड़ कौन लगाएगा? हमें उसे ‘संतोष’ सिखाना है। हम उसे समझाते हैं कि ‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए’। जब उसके पास कम होगा, तभी तो वह चमत्कार की उम्मीद में हमारे पास आएगा। और रही बात खाद की, तो हमने योजना बनाई है कि गाँव के पास एक बड़ा गोल्फ कोर्स बनाएंगे। वहाँ की घास को ‘पवित्र घास’ घोषित कर देंगे, जिसे उगाने के लिए किसान मुफ्त में श्रम करेगा। इसे हम ‘श्रमदान’ का नाम देंगे।”

मैंने कहा, “वाह! यानी ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’। पर स्वामी जी, आप तो खुद गाँव में रुकेंगे नहीं, आपकी काया तो एसी की आदी लगती है?”

स्वामी जी ने एक डकार ली, जो सीधे देसी घी के पराठों की गवाही दे रही थी। “बच्चा, शरीर तो नश्वर है, पर इसे ठंडा रखना आत्मा का कर्तव्य है। हम शहर में रहकर गाँव का ‘विजन’ तैयार करते हैं। देखो, विकास का सबसे बड़ा नियम यह है कि वह कभी ज़मीन पर नहीं दिखना चाहिए। अगर विकास दिख गया, तो वह खत्म हो गया। उसे हमेशा ‘पाइपलाइन’ में रहना चाहिए। जैसे हमारे यहाँ की सरकारी फाइलें—चलती रहती हैं, पहुँचती कभी नहीं।”

मैंने पूछा, “और इन सबमें धर्म का क्या योगदान होगा?”

स्वामी जी की आँखें चमक उठीं। “धर्म ही तो वह गोंद है, बच्चा, जो टूटे हुए विकास को चिपका कर रखता है। जब सड़क पर गड्ढा हो, तो वहाँ एक पत्थर रखकर उसे ‘स्वयंभू महादेव’ घोषित कर दो। फिर जनता सड़क की शिकायत नहीं करेगी, बल्कि वहाँ मत्था टेकेगी। जब पानी न आए, तो ‘वरुण देव’ की उपेक्षा पर प्रवचन दो। राजनीति और धर्म का यही तो गठबंधन है—एक हाथ से स्वर्ग दिखाओ, दूसरे हाथ से जेब साफ करो।”

मैंने अंतिम सवाल किया, “स्वामी जी, क्या इस ‘स्मार्ट विलेज’ में आम आदमी के लिए भी कुछ है?”

स्वामी जी ने अपना बैग उठाया और खड़े होते हुए बोले, “आम आदमी के लिए ‘उम्मीद’ है, बच्चा! और उम्मीद ही वह चीज़ है जो आदमी को तब भी जीवित रखती है जब उसकी थाली खाली हो। हम उसे सपने बेचते हैं और वह हमें श्रद्धा देता है। सौदा खरा है।”

इतने में उनकी लग्जरी गाड़ी धूल उड़ाती हुई आ गई। स्वामी जी उसमें ऐसे ओझल हुए जैसे चुनावी वादे चुनाव के बाद होते हैं। मैं वहीं बैठा रहा, और ढाबे वाले से कहा, “भाई, एक चाय और दे, ज़रा चीनी कम रखना, क्योंकि कड़वा सच सुनने के बाद मीठा अब झेला नहीं जाता।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२३ ☆ व्यंग्य – तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं

देश में विपक्षी नेता और मुख्यमंत्री बड़ी सांसत में हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। बड़ी मुश्किल में हूं कि मैं किधर जाऊं।’ वजह यह है कि धर्म का अश्व सरपट  दौड़ रहा है और अपने धर्मनिरपेक्ष होने का दम भरने वाले नेता उसके पीछे घिसट रहे हैं।

पूरे राजनीतिक वातावरण में हड़कंप है। सत्ता पक्ष ने भव्य राम मंदिर बनवाकर उसका उद्घाटन किया, फिर  प्राण-प्रतिष्ठा हुई, और अंत में मंदिर पर धर्म-ध्वजा फहरायी गई। यानी भक्तों को तीन तीन बार आनंदित होने का और भक्ति रस में डूबने का मौका मिला। विरोधी दल सत्ता पक्ष की यह तुरुप चाल देखकर बेबस बिलबिलाते रहे। दर्शन करने नहीं गये तो राम-विरोधी होने का ठप्पा लगा। जनता के आक्रोश से बचने और ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए बड़े नेताओं ने छुटभइयों को भेज दिया।

इसके पहले महाकुंभ में अपनी सारी शक्ति झोंक कर सत्ता पक्ष साबित कर चुका था कि उसकी राजनीति के लिए धर्म का कितना महत्व है। उस समय भी कुंभ में न नहाने पर विपक्षियों की लानत-मलामत हुई थी।  

सत्तापक्ष को धर्म के बल पर मैदान मारते देखकर विपक्षी अकबकाये हैं। भारत धर्मप्रधान देश है, इसलिए धर्म के दांव की काट ढूंढ़ पाना मुश्किल है। ‘उगलत निगलत पीर घनेरी’ वाली स्थिति है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों की ज़बान फिलहाल लड़खड़ा रही है। सब यह साबित करने में लगे हैं कि  वे नास्तिक नहीं हैं, वे भी दूसरों के बराबर रामभक्त हैं, लेकिन वे रामभक्ति का दिखावा नहीं करते। इसी चक्कर में राहुल गांधी को मंदिर मंदिर जाना और अपना जनेऊ दिखाना पड़ रहा है।

अपनी ज़मीन ख़तरे में देखकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने गृह नगर सैफ़ई में 50 फुट की भगवान कृष्ण की मूर्ति बनवायी है। यानी रघुवंशी राम के मुकाबले यदुवंशी कृष्ण को खड़ा किया है। उम्मीद है कि भगवान कृष्ण की कृपा से कम से कम यादवों का वोट पुख़्ता रहेगा।

उधर अभी तक आत्मविश्वास से भरीं, सत्ता को चुनौती देने वालीं ममता दीदी का आत्मविश्वास अब दरकने लगा है। कुछ दिनों पहले उन्होंने अपनी धार्मिकता दिखाने के लिए मंच पर चंडी  की सतुति की थी। अभी पढ़ा कि दीदी ने सिलीगुड़ी के एक कस्बे में महाकाल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का शिलान्यास किया। लगता है जैसे सभी नेता एक सुर में गा रहे हैं— ‘शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन।’ धर्म की राजनीतिक उर्वरता देखकर बंगाल में बाबरी मस्जिद के जिन्न को बोतल से बाहर निकाला गया है, जिसके जवाब में तत्काल गीता पाठ का कार्यक्रम हुआ।

यह भी पढ़ा कि राजस्थान के नाथद्वारा  के करीब गोवर्धन पर्वत पर हनुमान जी की 111 फुट ऊंची, उत्तर भारत की सबसे ऊंची मूर्ति बन रही है, जिसे 10 किलोमीटर दूर से देखा जा सकेगा। उधर बिहार के चंपारण में दुनिया के सबसे बड़े 33 फुट ऊंचे शिवलिंग की स्थापना की गयी है। इस शिवलिंग का निर्माण तमिलनाडु में हुआ, जिसमें 10 साल लगे।

सभी विपक्षी दल अपनी खोयी हुई ज़मीन हासिल करने की जद्दोजहद में लगे हैं और सत्तादल उन पर व्यंग्य करने का कोई मौका नहीं चूक रहा है। गड़बड़ यह हो रही है कि अपने को धार्मिक साबित करने की होड़ में ज़रुरी मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, हवा-पानी, शिक्षा- स्वास्थ्य, पेपर लीकेज के मुद्दों पर से नज़र हट रही है। सब धर्म की गंगा में डुबकी लगाने को ही अक्लमंदी मान रहे हैं। स्थिति  को देखकर शायर साक़िब लखनवी का शेर याद आता है— ‘बाग़बां ने आग दी जब आशियाने को मिरे, जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।’

देश का युवक पूरी तरह भ्रमित और परेशान है। अयोध्या में एक युवक का वक्तव्य सुना कि युवाओं को नौकरी के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है,अयोध्या में ही भक्तों को चंदन लगाकर दो चार सौ रुपये रोज़ पैदा किये जा सकते हैं। प्रयाग के माघ मेले में एक बाबा, जो नौवीं पास बताये जाते हैं, साढ़े तीन और चार करोड़ की कारों में घूम रहे हैं। एक और बाबा पांच करोड़ के सोने के ज़ेवर शरीर पर लटकाये घूम रहे हैं। उनकी शिक्षा भी कार वाले बाबा की पढ़ाई के आसपास बतायी जाती है। उधर अपराधी जेल से लोगों के पास दस करोड़ की वसूली के नोटिस भेज रहे हैं। हत्या और बलात्कार के मामलों में सज़ा काट रहे सिरसा  वाले संत जी को 8 साल 4 महीने में 15 बार पैरोल मिली है, जिसका सदुपयोग वे भक्तों को प्रवचन देने में करते हैं। जब भी जेल से निकलते हैं, शान से काफिले में चलते है। अब वे दिन लद गये जब पाप करने वाला मुंह छिपाता फिरता था। अब पाप करने वाला तन कर, मूंछों पर ताव देता चलता है। देश के बैंकों से हज़ारों करोड़ लेकर भागे चतुर लोग विदेश में ऐश कर रहे हैं और अपनी पार्टियों की फोटो डालकर यहां की जनता को मुंह चिढ़ा रहे हैं।

ऐसे मैं देश का पढ़ा-लिखा युवा चक्कर में है कि वह किसकी तरफ देखे और किस से कोई उम्मीद करे। प्रसंगवश बता दूं कि एक बाबा छात्रों को बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बता चुके हैं। सिद्ध हुआ कि देश के युवा को रोज़गार का कोई अन्य विकल्प भले ही न मिले, बाबा बनने का शानदार विकल्प तो खुला ही है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य  – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

ज्ञापन संख्या: इश्क/001 – राजकीय प्रेम एवं अनुशासनिक कार्रवाई 

महोदया, उपर्युक्त विषयांतर्गत सादर निवेदन है कि जब से आपने इस कार्यालय के धूल-धूसरित गलियारों में अपनी सैंडलों की ‘टिक-टिक’ के साथ आमद दी है, यहाँ का प्रशासनिक ढांचा किसी ढीले पड़े तंबू की तरह डगमगा गया है। नियमानुसार एक कनिष्ठ कर्मचारी की दृष्टि केवल सरकारी पंजियों के मलबे में दबी होनी चाहिए, किंतु आपकी आँखों का ‘रडार’ पिछले कई पखवाड़ों से लगातार मेरी ‘स्थापना प्रभारी’ वाली कुर्सी की ओर ही लक्षित पाया गया है। आपकी आँखों का यह अनधिकृत संचरण उस गुप्तचर की भांति है जो सीमा पार की गतिविधियों पर नजर रखता है, जबकि मेरा हृदय कोई प्रतिबंधित क्षेत्र नहीं है। आपके इस निरंतर ‘दृष्टि-आक्रमण’ ने मेरे भीतर के अनुशासन को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया है, जैसे कोई आवारा सांड लहलहाती फसल को तहस-नहस कर देता है। आपके इस कृत्य से मेरे कार्य-निष्पादन की क्षमता में गिरावट आई है और मेरी गंभीरता किसी फटे हुए ढोल की तरह बजने लगी है।

आपके टाइपिंग करने की शैली भी किसी सामान्य लिपिक जैसी नहीं, बल्कि किसी युद्धघोष जैसी प्रतीत होती है। जब आप की-बोर्ड पर उंगलियाँ चलाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे हृदय के किसी कोने में कोई ‘नोटशीट’ टाइप हो रही हो। टाइपिंग से अधिक समय आप मेरी भाव-भंगिमाओं के ‘निरीक्षण’ और ‘समीक्षा’ में व्यतीत कर रही हैं, जो सीधे तौर पर राजकीय समय का दुरुपयोग है। वरिष्ठ अधिकारी के चेहरे को इतनी गहराई से पढ़ना, जितना कि आप पढ़ रही हैं, केवल ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ का काम है, किसी कनिष्ठ सहायक का नहीं। आपकी इस खोजी दृष्टि ने मुझे इस कदर विचलित कर दिया है कि कल मैंने आकस्मिक अवकाश की अर्जी पर हस्ताक्षर करने के बजाय गलती से ‘आई लव यू’ लिखकर डिस्पैच कर दिया। यह स्थिति किसी भी लोक सेवक के लिए वैसी ही लज्जास्पद है जैसे किसी पटवारी का रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाना।

अब बात करते हैं उस ‘मुस्कराहट’ की, जो आपकी लबों पर किसी सरकारी वादे की तरह अधूरी और रहस्यमयी बनी रहती है। यह मुस्कराहट न तो पूर्णतः ‘साधारण शिष्टाचार’ की श्रेणी में आती है और न ही इसे ‘विभागीय सौजन्य’ माना जा सकता है। यह तो उस सूक्ष्म भ्रष्टाचार की तरह है जो फाइल के साथ नत्थी होकर आता है और हृदय की तिजोरी में सेंध लगा देता है। आपके इस अधर-प्रदर्शन से मेरे रक्तचाप में वह ‘उछाल’ दर्ज किया गया है, जो शेयर बाजार के सेंसेक्स में भी विरल ही देखा जाता है। दफ्तर में हंसी-मजाक की एक सीमा होती है, किंतु आपकी मुस्कराहट तो उस ‘परमिट’ की तरह है जो बिना किसी जांच के सीधे दिल के रास्ते को ग्रीन सिग्नल दे देती है। यदि यही स्थिति रही, तो मुझे आशंका है कि हमारे विभाग का बजट घाटा कम हो न हो, मेरे हृदय का सुकून जरूर दिवालिया घोषित हो जाएगा।

अतः आपको इस ‘कारण बताओ नोटिस’ के माध्यम से निर्देशित किया जाता है कि आप आगामी तीन कार्यदिवसों के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। आपकी इस मुस्कराहट को ‘शिष्टाचार’ के बस्ते में डालकर रद्दी में फेंक दिया जाए या इसे ‘शुद्ध प्रेम’ की श्रेणी में वर्गीकृत कर एक नया रजिस्टर खोल दिया जाए? प्रशासन में अनिश्चितता किसी महामारी से कम नहीं होती, इसलिए वस्तुस्थिति का स्पष्टीकरण अनिवार्य है। यदि यह प्रेम है, तो इसे मौखिक या लिखित रूप से ‘सबमिट’ करने में इतनी देरी क्यों? क्या आप भी किसी सरकारी टेंडर की तरह ‘लोएस्ट बिडर’ (न्यूनतम बोली लगाने वाले) का इंतजार कर रही हैं? याद रखिए, प्रेम का आवेदन यदि समय पर नहीं मिला, तो मैं इसे ‘लैप्स’ (व्यपगत) मान लूंगा और फिर आपको अपील करने के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने पड़ेंगे, जहाँ का बाबू मुझसे भी बड़ा सनकी है।

गजानन बाबू की कलम यहाँ और भी पैनी हो गई जब उन्होंने लिखा कि प्रेम की इस फाइल पर धूल जमने से पहले ही इस पर कोई ‘एक्शन’ लिया जाना चाहिए। आप कनिष्ठ सहायक हैं, इसका अर्थ यह कतई नहीं कि आप वरिष्ठों के हृदय के साथ ‘ऑडिट’ खेलें। प्रशासन की फाइलें तो सालों-साल चलती हैं, मगर भावनाएं कोई ‘पेंशन योजना’ नहीं हैं जो मरने के बाद भी मिलती रहें। यदि आपकी नियत में खोट नहीं है और आँखों का यह रडार किसी गंभीर ‘प्रोजेक्ट’ का हिस्सा है, तो कृपया अपनी भावनाओं का ‘एफिडेविट’ (शपथ-पत्र) बनवाकर पेश करें। दफ्तर में प्रेम का अंकुर फूटते ही ईर्ष्या की लपटें उठने लगती हैं, और मैं नहीं चाहता कि हमारे इस ‘गुपचुप गठबंधन’ की खबर किसी चपरासी के माध्यम से कैंटीन तक पहुंचे। इसलिए जो भी कहना है, उसे ‘अर्जेंट’ मार्क करके सीधे मेरी मेज पर पटक दें।

आपके जवाब के आधार पर ही भविष्य की ‘कार्य-योजना’ तैयार की जाएगी। यदि उत्तर सकारात्मक रहा, तो हम लंच ब्रेक के समय को ‘विशेष चर्चा सत्र’ में बदल देंगे और शाम की चाय को ‘साझा निवेश’ के रूप में देखेंगे। यदि यह नकारात्मक रहा, तो मुझे अपनी कुर्सी की दिशा बदलनी पड़ेगी ताकि आपकी आँखों की ‘लेजर किरणों’ से मेरा बचाव हो सके। दफ्तर की राजनीति में वैसे ही बहुत झमेले हैं, अब यह प्रेम का नया ‘सर्कुलर’ मुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। मैं एक जिम्मेदार पद पर हूँ, और मेरा दिल कोई ‘धर्मशाला’ नहीं है जहाँ कोई भी आकर बिना अनुमति के मुस्कुरा दे। अपनी स्पष्टवादिता का परिचय दें, क्योंकि शासन में पारदर्शिता ही सफलता की कुंजी है। यदि आपने चुप्पी साधे रखी, तो इसे आपकी ‘मौन स्वीकृति’ मानकर मैं स्वयं ही इस प्रेम-विवाह का ‘गैजेट नोटिफिकेशन’ जारी कर दूंगा।

लेकिन यहाँ एक बड़ा सस्पेंस है जिसे पढ़कर आपके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी। असल में, गजानन बाबू जिस मुस्कराहट को प्रेम समझ रहे थे, उसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी। चपला दरअसल गजानन बाबू के चेहरे के उस बड़े से ‘मस्से’ को देख रही थी, जिस पर सुबह से एक मक्खी बार-बार आकर बैठ रही थी और गजानन बाबू उसे फाइल से उड़ाने के चक्कर में खुद को किसी रोमन सम्राट जैसा महसूस कर रहे थे। चपला की मुस्कराहट प्रेम का आमंत्रण नहीं, बल्कि उस मक्खी और गजानन बाबू के बीच चल रहे ‘कुश्ती’ के मुकाबले का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी। वह तो बस यह सोचकर हंस रही थी कि कैसे एक ‘स्थापना प्रभारी’ एक छोटी सी मक्खी के सामने अपनी सारी सत्ता और गरिमा हार चुका है। यह खुलासा होने के बाद गजानन बाबू का सारा प्रशासनिक ईगो किसी फटे हुए टायर की तरह फुस्स होने ही वाला था।

जब चपला ने इस ज्ञापन का जवाब दिया, तो वह सस्पेंस और भी गहरा गया। चपला ने लिखा कि “महोदय, मेरा रडार आपकी कुर्सी पर नहीं, बल्कि आपकी कुर्सी के ठीक पीछे वाली दीवार पर टंगे उस ‘सरकारी कैलेंडर’ पर था, जिसमें छुट्टियों की सूची दी गई है। रही बात मुस्कराहट की, तो वह आपकी उस ‘खुली हुई जिप’ को देखकर थी, जिसे आप अपनी ‘वरिष्ठता’ के अहंकार में बंद करना भूल गए थे।” गजानन बाबू ने जैसे ही यह पढ़ा, उनके चेहरे का रंग किसी कच्ची ईंट जैसा पीला पड़ गया। उन्होंने तुरंत अपनी फाइलों का ढेर सामने कर लिया और उस दिन के बाद से कभी किसी कनिष्ठ सहायक की मुस्कराहट का ‘वर्गीकरण’ करने की जुर्रत नहीं की। सस्पेंस तो यह है कि अब गजानन बाबू खुद चश्मा पहनकर केवल फाइलों के पन्ने पलटते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं अगली बार उनकी ‘कार्य-योजना’ का कोई नया छेद सार्वजनिक न हो जाए।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२२ ☆ व्यंग्य – ये इश्क़ नहीं आसां ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘ये इश्क़ नहीं आसां‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ये इश्क़ नहीं आसां

कुछ समय पहले मैंने महाराष्ट्र के एक स्कूल के प्राचार्य के बारे में लिखा था, जिन्होंने छात्राओं को शपथ दिलायी थी कि वे प्रेम-विवाह नहीं करेंगीं। अभी टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के एक गांव में गांववालों ने लड़कियों के भाग कर शादी कर लेने से त्रस्त होकर ऐसे लड़कों-लड़कियों और उनके परिवार वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

गांव के एक प्रवक्ता ने घोषणा की है कि भाग कर शादी करने वाले लड़के लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। उनके परिवार को कोई मज़दूरी नहीं देगा, दूध और किराने का सामान, पंडित-नाई उन्हें मुहैया नहीं होंगे। इसके अलावा कोई ऐसे परिवारों की ज़मीन को लीज़ पर नहीं लेगा। गनीमत है कि प्रेमियों को सबक सिखाने के लिए गांव वालों ने कोई और बड़ा नुस्खा नहीं निकाला। गांव के एक पिताजी ने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई छुड़ा कर उन्हें घर में बैठा लिया है ताकि वे प्रेम के प्रदूषण से बची रहें। सुनकर बेगम अख़्तर की ग़ज़ल याद आ गयी— ‘अय मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया।’

चचा ‘ग़ालिब’ ने नाहक ही लिखा— ‘इश्क पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाये न लगे और बुझाये न बने।’ अब इंतज़ाम हो रहा है कि यह मनहूस आग लग ही न पाये और अगर लग ही जाए तो तुरन्त ‘फ़ायर एक्सटिंग्विशर’ का इस्तेमाल किया जाए। कबीर भी फालतू ही लिख गये कि ‘जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान; जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।’ उधर मरहूम मेंहदी हसन व्यर्थ  की टेर लगाये हैं— ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं।’ बुल्ले शाह भी अरण्य रॊदन कर रहे हैं— ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो।’

हमारे देश के कानून के हिसाब से लड़का लड़की 18 की उम्र पर पहुंचने पर ख़ुद मुख़्तार हो जाते हैं, यानी वे खुद निर्णय लेने और अपने निर्णय की जवाबदारी लेने में सक्षम हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में युवा अपनी शादी होने पर अपना अलग घर बसा लेते हैं। वे अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेते हैं। लेकिन हमारे यहां नाक का सवाल ज़िन्दगी भर बना रहता है। लड़का-लड़की को वही काम करना पड़ता है जिसमें ख़ानदान की नाक सलामत रहे। नाक की रक्षा में ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं होती रहती हैं। परिवार के साथ-साथ समाज की नाक का भी ख़याल रखना पड़ता है। इसीलिए कई प्रेमी शादी के बाद अपनी जान बचाते फिरते हैं।

मुश्किल यह है कि प्रकृति ने सिर्फ नर- मादा पैदा किये, परिवार और विवाह संस्थाएं आदमी ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनायीं। अब संस्थाएं आदमी के ऊपर हावी हैं। प्रकृति का संदेश स्पष्ट है कि नर-मादा मिलें और अपनी प्रजाति को जीवित रखें। इसीलिए प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच में आकर्षण पैदा किया है।

हम लैला-मजनूं, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट के प्रेम की गाथाओं पर झूमने वाले लोग हैं। राजस्थान में श्रीगंगानगर के पास लैला मजनूं के मज़ार हैं जहां हर साल जून में मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर मन्नत मानते हैं। लेकिन जब अपने घर में कोई लैला,शीरीं या सोहनी पैदा हो जाती है तो संकट खड़ा हो जाता है।

प्रेम आदमी को कैसा मजबूर और बेबस करता है इसके संबंध में मुझे दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित ‘महाराजा’ पुस्तक का एक प्रसंग याद आता है। पंजाब की एक रियासत की राजकुमारी अपने राज्य के एक अधिकारी के प्रेम में पड़ गयी थी। राजकुमारी के महल के पीछे की चारदीवारी से सटा एक कुआं था। राजकुमारी के प्रेमी ने दीवार में एक सूराख बना लिया था जिसके द्वारा वह कुएं में उतरता था और फिर दूसरी ओर से राजकुमारी की परिचारिकाएं उसे ऊपर खींच लेती थींं। यह प्रेम प्रसंग बहुत दिनों तक चला, फिर प्रेमी के एक शत्रु ने भांडा फोड़ दिया और प्रेमियों की पकड़-धकड़ की कार्यवाही होने लगी। राजकुमारी प्रेमी के साथ कुएं में उतरकर महल से बाहर निकल गयी और वे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गये। अंत में इन प्रेमियों की ज़िन्दगी बहुत अभावों और कष्टों में गुज़री।

इन प्रेमियों की कथा पढ़कर सोहनी- महिवाल की कथा याद आती है। फ़र्क यही है कि राजकुमारी की कथा में प्रेमी कुएं में उतरता था जबकि सोहनी अपने प्रेमी से मिलने के लिए घड़े के सहारे चिनाब नदी पार करती थी। मशहूर शायर ‘जिगर’ ने इश्क़ के बारे में लिखा, ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इन दोनों  कथाओं में आग की जगह पानी ने ले ली है।

इसी सिलसिले में इंग्लैंड के सम्राट एडवर्ड अष्टम याद आते हैं जिन्होंने अपनी तलाकशुदा प्रेमिका वालिस सिंपसन से शादी करने के लिए इंग्लैंड की गद्दी छोड़ दी थी।

प्रेमियों से हमदर्दी रखने वाले भी बहुत से लोग होते हैं। मेरे एक मित्र शादी से पहले अपनी पत्नी के बॉयफ्रेंड हुआ करते थे। पत्नी तब एक स्कूल में अध्यापिका थीं और प्रेमी जी रोज़ सड़क के किनारे धूप में खड़े होकर उनका इंतज़ार करते थे। जिस मकान के सामने वे खड़े रहते थे उसके मालिक ने द्रवित होकर एक दिन उनके लिए कुर्सी भेज दी थी।

परसाई जी ने ‘सुशीला’ उस लड़की को कहा था जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पी.एफ. का पैसा उनके  बुढ़ापे के लिए बचा लेती है। लेकिन ज़ाहिर है बहुत से बापों को परसाई जी यह परिभाषा रास नहीं आती। अभी तो लगता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति बनेगी जहां बिना वालदैन के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के शादी मुकम्मल नहीं मानी जाएगी। शादी कराने वाले पंडित जी को भी दोनों पक्ष के मां-बाप की सहमति के बिना शादी कराने की मुमानियत होगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८० – व्यंग्य – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८० – व्यंग्य  – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

नमस्कार, मैं हूँ आपका होस्ट। आज ‘डिस्कवरी: डार्क साइड’ के कैमरे उस अंधेरी गली में मुड़ रहे हैं जहाँ मौत भी यू-टर्न लेने पर मजबूर हो जाती है। मिलिए नत्थू लाल से—चिकित्सा जगत का वह ‘ग्लिच’ जिसे विज्ञान नहीं समझा सका और यमराज ने अब तक इग्नोर किया है। नत्थू लाल का क्लिनिक किसी अस्पताल जैसा नहीं, बल्कि किसी ‘कबाड़खाने’ जैसा दिखता है, जहाँ टूटी हुई सांसों की वेल्डिंग की जाती है। नत्थू लाल ने मेडिकल की पढ़ाई नहीं की, उन्होंने बस मौत को करीब से ‘घूरा’ है। इनका दावा है कि इनका इलाज यमराज की भैंस को भी पीछे मुड़ने पर मजबूर कर देता है।

नत्थू लाल का आत्मविश्वास किसी पहाड़ जैसा है। इनके पास ‘मरा हुआ’ आदमी लाना वैसा ही है जैसे किसी पुराने फोन को री-बूट कराना। ये नब्ज नहीं देखते, ये सीधे रूह को आवाज देते हैं—”अबे ओ! उठ, उधार बाकी है तेरा!” और ताज्जुब देखिए, मुर्दा उठ खड़ा होता है। नत्थू लाल का तर्क बड़ा सीधा है: “इंसान मरता नहीं है, बस वो इस दुनिया की बढ़ती महंगाई और बीवी के क्लेश से डरकर थोड़ी देर के लिए ‘लॉग-आउट’ हो जाता है, मैं बस उसे दोबारा ‘लॉग-इन’ करा देता हूँ।” यह चिकित्सा नहीं, यह तो ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ‘हैकिंग’ ऑपरेशन है।

मेरा तो यह मानना है कि नत्थू लाल जैसे टैलेंट को मोहल्ले में बर्बाद नहीं करना चाहिए। इन्हें सीधे ‘नेशनल स्टॉक एक्सचेंज’ के पास बिठाना चाहिए, ताकि जब मार्केट गिरे, तो ये उसे भी संजीवनी दे सकें। सरकार को चाहिए कि इन्हें ‘परलोक वापसी मंत्रालय’ का प्रभार सौंप दे। आखिर जो बंदा बिना किसी लैब के, सिर्फ एक पुड़िया और दो गालियों से मुर्दे में जान फूंक दे, वह किसी नोबेल प्राइज से कम नहीं। नत्थू लाल के पास आने वाले मरीज की फाइल में ‘बिमारी’ नहीं, ‘उम्मीद’ लिखी होती है। इनका ‘सक्सेस रेट’ यमराज के ‘बीपी’ को बढ़ा रहा है।

लेकिन, इस महानता के पीछे एक ऐसा राज छुपा है जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा। पिछले हफ्ते नत्थू लाल के पास एक ‘बॉडी’ लाई गई। आदमी पूरी तरह ठंडा, सांसे गायब, घरवाले विलाप कर रहे थे। नत्थू लाल ने हमेशा की तरह अपनी ‘स्पेशल घुट्टी’ मुर्दे के कान में डाली। अचानक मुर्दा उठा, नत्थू लाल को जोर का धक्का दिया और खिड़की से कूदकर भाग गया। भीड़ दंग थी—चमत्कार! साक्षात चमत्कार! लोगों ने नत्थू लाल को कंधे पर उठा लिया। पर सस्पेंस ये नहीं था कि मुर्दा जिंदा हुआ। सस्पेंस ये था कि वह आदमी मरा ही नहीं था।

वह असल में ‘इनकम टैक्स’ का इंस्पेक्टर था जो नत्थू लाल के काले धन का पता लगाने ‘मुर्दा’ बनकर आया था। जैसे ही नत्थू लाल ने उसके कान में कहा—”उठ जा भाई, वरना तेरी जेब से पांच सौ का नोट निकाल लूँगा,” इंस्पेक्टर की ईमानदारी जाग गई और वह अपनी जान और इज्जत बचाकर भाग निकला। नत्थू लाल आज भी इसे अपनी चिकित्सा की जीत बताते हैं। उनका कहना है—”देखा? मेरी दवा में इतनी शक्ति है कि भ्रष्ट आदमी भी ड्यूटी पर वापस लौट जाता है।”

नत्थू लाल बेस्ट हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस देश में आदमी मौत से नहीं, ‘नुकसान’ से डरता है। वे इलाज नहीं करते, वे बस आपको याद दिलाते हैं कि अभी आपके बिजली के बिल बाकी हैं। नत्थू लाल का ‘पुनर्जीवन उद्योग’ अब ग्लोबल होने वाला है। सुना है यमराज ने भी अब नत्थू लाल के डर से ‘वीआरएस’ के लिए अप्लाई कर दिया है। तो अगली बार जब आप मरें, तो टेंशन मत लीजिएगा, बस नत्थू लाल का पता अपनी हथेली पर लिखवा लीजिएगा।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, https://hi.wikipedia.org/s/1ptf ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कहानी – साहब की घड़ी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है।

एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है।

साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?”

साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”

शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था।

साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है?

तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”

साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”

साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं।

हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था।

साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।”

साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ शर्म को भी शर्म आने लगी है… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ शर्म को भी शर्म आने लगी है… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कितने ही लोग आजकल शर्म का पता ढूंढने में लगे हैं। युद्ध स्तर पर खोज जारी है। इतनी शिद्दत से तो लोग रूठी हुई महबूबा का पता भी नहीं ढूंढते। वैसे तो हिंदुस्तानी हर दिन किसी न किसी गड़े मुर्दे का पता ढूंढ लाते हैं। महारत है उन्हें इस खोज में।

सदियों पहले जो अपने वजूद पर इतराती थी, नारियों का गहना कहलाती थी, या किसी गुनहगार की आत्मा जागने पर उसे पछतावा होता तो उसकी आँखें शर्म से झुका देती थीं, अब न जाने कहाँ गायब हो गई। इतनी तेजी से तो गधे के सिर से सींग भी गायब नहीं होते। थक हार कर गूगल की शरणागति स्वीकार की पर उसने भी हाथ खड़े कर दिए।

दिमाग पर कुछ और जोर डाला तो याद आया कि टी वी पर पैनल डिस्कशन में कुछ पैनलिस्ट अक्सर शर्म शर्म कहते हुए पाए गए थे। सिलसिला जारी है। लगा कि शायद ये जानते होंगे पर मायूसी ही हाथ लगी।

इधर न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटी और उधर शर्म बहरी हो गई। सालों पहले शर्म से मुलाकात हुई थी। मैंने पूछा था-कैसी हो तुम ? उसका जवाब था वैसी ही हूँ जैसे रहना चाहिए। मैंने कहा– तुम्हें जहाँ होना चाहिए वहाँ क्यों नहीं रहती हो? नाहक भटकती हो बंजारों की तरह? क्या तुम्हें अपना देश प्यारा नहीं? तुम में जरा सी भी देशभक्ति नहीं है? अन्यथा तुम ऐसा तो न करतीं। वो बोली मुझे तुमसे देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। मुझे पानीदार आँखें पसंद हैं। सूखी आँखों में मेरा गुजारा नहीं होता। मुझे उसकी बातें सही लगीं।

शर्म किसी जहाँपनाह की बांदी तो है नहीं। उसका अपना अस्तित्व है। वह भी आजाद मुल्क की रहिवासी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसके पास भी है। संगोल युग में उसका मन नहीं है संसद में रहने का, तो उसकी मर्जी। हम कौन होते हैं उसे विवश करने वाले? शर्म उन आँखों की तलाश में हलाकान हो गई है, जहाँ वह पूरी इज्जत से रह सके। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, खेल, पुलिस, न्याय, राजनीति, फिल्म, बैंक, पोस्ट वह हर विभाग का चक्कर लगा आई पर कहीं भी उसे आशियाना न मिला। कहीं कहीं तो लोगों ने शर्म शब्द ही नहीं सुना है। किसी ने तो ये पूछा—ये किस चिड़िया का नाम है ? शर्म शब्द के मानी क्या हैं?

पुरुष मुक्ति आंदोलन की मुखिया एक स्त्री को देखा जो व्यभिचारी के हक में रैली निकाल रही थी तो उसके पाँवों तले ज़मीन खिसक गई। उसे बड़ी उम्मीद थी महिलाओं से पर वो भी ध्वस्त हो गई।

मीडिया की आंखें तो कुबेरों के यहां गिरवी पड़ी हैं। शर्म को लग रहा है कि वह रेतीली आंखों से घिर गई है। वह अतीत की यादों में बिसूरने लगी– जाने कहाँ गए वो दिन— जब शर्म गहना हुआ करती थी। मनोचकित्सक इसे आत्मविश्वास की कमी कहते हैं कहते रहें पर वे उसकी महिमा को नहीं जानते। कवि रहीम कहते हैं —“रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै मोती मानुस चून।। “

अब उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। मुल्क के हालात देख कर शर्म को भी शर्म आने लगी है।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares