☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।
आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।
अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।
बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।
नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।
अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।
आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।
रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कथा – “बर्फ में धूप ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९६ ☆
कथा – कहानी – बर्फ में धूप श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था, एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।
उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव ‘चमकपुर’ की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार, उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था, नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।
पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं, एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।
लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक ‘यूथ क्लब’ ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता “कनाडा में तो बहुत पैसा है न?”, “हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो। ” उस ‘अपनेपन’ की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।
एक दिन, स्थानीय ‘शब्द साधना साहित्य परिषद’ के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।
ओमप्रकाश ने कहा “डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक ‘राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान’ शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है। “
राजिंदर ने खुश होकर कहा, “ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?”
ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले “बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है… तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है। “
राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया। यह पहला झटका नहीं था। कई ‘संस्थाओं’ के फोन आ चुके थे। उनके ‘विदेशी’ होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक ‘लेन-देन’ में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।
और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।
अनजान आवाज़, “नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं ‘काव्य भारती’ से बोल रहा हूँ। आपको ‘वैश्विक पंजाबी रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च…”
राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक ‘विभक्ति’ उनके भीतर घर कर गई।
कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। “प्रारब्ध, ” उन्होंने धीरे से कहा, “यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है। “
उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर… उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है। उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।
और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, ‘डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद’ नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।
डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी, वे वसीयत कर चुके थे।
☆ मेहनत की रोटी – भाग – २ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
श्री सचिन वसंत पाटील
‘हमें आप जैसे पढ़े लिखे उम्दा व्यक्ति की ही आवश्यकता थी। हम आपको खुशी-खुशी नौकरी पर रख लेते। लेकिन हमने अभी-अभी दो नए लोगों को नियुक्त किया है। देखते हैं, आगे चलकर जैसे ही हमें आप जैसे व्यक्ति की जरुरत महसूस होगी तो हम आपको तुरन्त सूचित कर देंगे’…… ऐसे ही कई मीठे शहद में घुले चिकने-चुपडे जवाब सुनकर विनायक बौखला गया। कितनों के नकारते शब्दों को पचना लिखा था किस्मत में कौन जाने!
उसके बचपन के लँगोटी-यार और कॉलेज के ज़माने के शहर एवं दूसरे गांवों के दोस्त, सब उससे कब के दूर हो गए थे। मुश्किल समय में और जरुरत के वक्त कोई उसे अपने पास खड़ा तक नहीं करता था। उसके जिन दोस्तों विश्वास था कि अंगूर का बाग लगाने के बाद विनायक को बहुत धन मिलेगा और वे उसे स्वार्थवश खाना खिलाते रहते थे, अब वे भी उससे कतराने लगे थे और दूरी बनाए रखने लगे थे। एक दिन विनायक की घरवाली ने उससे कहा,
“यह सब यूँ ही कितने दिन चलेगा?”
“मैं भी क्या करूँ, देख तो रहा हूँ।”
“ऐसा महज देखने से नहीं चलेगा। बच्चों की परीक्षाएं सर पर हैं| उनकी फीस भरनी है। रसोई का नमक मिर्च मसाला सब कुछ खत्म हो गया है …”
“जैसे मुझे यह सब मालूम ही नहीं!…..”
“पड़ोस के राजमिस्त्री चचा कहा रहे थे, ‘मेरे साथ, मिस्त्री के हाथ के नीचे काम करने को तैयार हो तो बता! तीन सौ रुपये रोजनदारी मिलेगी’।
“बड़ी सयानी बन गई हो! बी.कॉम. किया है मैंने…… राजमिस्त्री के हाथ के नीचे काम करूँ, यह कह रही हो?”
“तो फिर क्या करना ऐसे आड़े वक्त पर? आए वक्त के मुताबिक अपना ब्योहार नहीं बदलोगे क्या? जैसी जैसी हवा बहे, वैसे वैसे अपना रुख पलटते आना चाहिए……”
“अरी भागवान! मेरी शिक्षा तो देख! कहाँ तक पढ़ा हूँ!”
“आग लगे ऐसी शिक्षा को, क्या करूँ उसका? क्या मेरा चूल्हा जल पाएगा उस डिगरी के कागज से? पैसे के आगे आपकी शिक्षा की क्या खाक कीमत है?”
विनायक के पास इस सटीक सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसे राजमिस्त्री के अधीन काम करना अपनी बेइज्जती लगती, और फिर खुद की शिक्षा देखते हुए यह काम बड़ा ही शर्मनाक लगता! कभी-कभी वह ताव में आकर कहता रहता, “शेर भूख से मर जाता है, लेकिन क्या कभी घास को मुंह लगाता है?”
विनायक की घरवाली रोज़मर्रा की पैसों की तंगी से बेहद क्लांत हो चुकी थी। उसने आजतक किसी तरह हर विपदा झेलते हुए यहाँ तक गृहस्थी धक्का मार मार कर खींचने का यथाशक्ति प्रयास किया है! लेकिन अब यहाँ से आगे घसीटना असंभव लग रहा है। उसका मानना है कि अब घर परिवार के वास्ते उसके पति को जो भी काम मिले, उसे कर लेना चाहिए।
नौकरी की तलाश में विनायक कई कारखानों, फाउंड्री (ढलाईघर), शोरूम, गोदाम एवं पुराने यारों के घरों के चक्कर लगाते लगाते थका हारा सांझ को घर लौटता था। हर शाम, उसकी पत्नी और बच्चे उदास चेहरों के साथ दरवाजे के चौखट से टिककर उसका इंतजार करते थे। आज की शाम हमारे जीवन में आशा की किरण लेकर आएगी। बाबा ने कहीं से पैसे लाए होंगे, हमारे लिए कुछ खाने की चीजें लाए होंगे, इसी उम्मीद से बच्चे उसकी बाट जोहते रहते। लेकिन हताशा में डूबकर पैरों को घसीटते आते विनायक गली के छोर पर देखकर पत्नी और बच्चे समझ जाते कि उसके पास अभी भी उनका पेट पालने के लिए कोई नौकरी नहीं है। पैसों का भी कोई ठिकाना नहीं है। पर उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकलता था। जो भी छोटा बड़ा निवाला रसोई में होता उसे मिल बांट कर पानी के साथ पेट में धकेलते।
इस विपन्नावस्था में विनायक को एक भयानक लत लग गई। वह हर सुबह-शाम टपरी पर जाने लगा। उसने टपरीवाले मालिक से दोस्ती करते हुए उसके साथ मटका जुआ खेलना शुरू कर दिया। उसकी सोच अब पक्की हो चुकी थी कि झटपट पैसा कमाने का यही एकमात्र तरीका था। खेती और नौकरी से तो यह कई गुना बेहतर था। आज की महंगाई के दौर में, एक रुपये के बदले साठ रुपये मटके के सिवाय ऐसे झटपट मिलने वाले और कोई सौदेबाज हैं ही नहीं। और तिसपर इसमें जोखिम भी कम है। अगर मैं दस रुपये दांव पर लगाऊँ, तो उसमें से छह तो निश्चित रूप से वापस मिल ही जाएंगे। अब तो विनायक का दृढ़ मत हो गया कि, मटका जुए के आलावा उसके पास अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालने का कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन विनायक को इस बात का रत्ती भर भी एहसास नहीं हुआ कि, यह तो अमीर बनने की उम्मीद में धीरे-धीरे गरीब होने का एक खतरनाक और गलत रास्ता था। हताशा के घेरे से बाहर निकलने की आशा में वह आंकड़ों के जाल में उलझ कर दांव पर दांव लगाए जा रहा था, इस उम्मीद में कि उसे चार पैसे मिल जाएंगे।
पहले दिन जब उसने मटके के आंकड़ों पर पैसे लगाए तब उसे दस रुपये की लागत पर सवा सौ रुपये मिले। यह देखकर उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। आई हुई सारी धनराशि उसने फिर आंकड़ों पर लगा दी। अब तो दिन रात वह आंकड़ों के बारे में ही सोचता रहता। उसके दिलो-दिमाग में आंकड़े इस कदर धूम मचाने लगे कि उनके आलावा उसे कुछ और नजर ही नहीं आता। सुबह सुबह उठते ही एक ही विचार का भूत उसपर सवार रहता कि आज ओपन क्या आएगा? शाम के ढलते ही क्लोज क्या आया यह देखकर ही वह निद्राधीन होता। उसकी जिंदगी अब इस ‘ओपन’ और ‘क्लोज’ के छोटेसे दायरे में कैद हो कर रह गई थी।
आजकल वह घर पर कभी कभार ही आता था। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा था। बुरी संगत के चक्कर में आकर अब तो उसने शराब पीना भी शुरू कर दिया था। वह घर में कभी कभार ही किसी से बातचीत करता; जब पत्नी की किचकिच शुरू हो जाती तो चुपचाप टपरी की ओर भागता। जब आंकड़ों पर लगाने के लिए यहाँ -वहाँ से पैसे मिलना बंद हो जाते, तो वह घर की चीजें चुराकर बेच देता था। इस कारण घर का सामान हौले हौले कम होता चला गया। पत्नी को शक के घेरे ने जकड लिया। घर में भी बात-बात पर कहा-सुनी होने लगी। नतीजन उसने घर आना ही बंद कर दिया। बस, फटी जेब के पैसे खत्म हो जाते, तभी वह घर आने लगा, पत्नी से झगड़ते हुए पैसे मांगने लगा। बच्चे मुंह लटकाए हैरान होकर अपने बाप की यह घिनौनी बहादुरी देखने पर मजबूर हो जाते। उसकी पत्नी के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया। पड़ोसी भी देते-देते थक चुके थे। रोज के मरे पर कौन आंसू बहाए?
बालों का जंगल बिखरा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई! इस दयनीय अवस्था में विनायक गाँव में निरुद्देश भटकने लगा। उसके दिमाग में आंकड़ों के सिवा कोई अन्य विचार घुस नहीं पा रहा था। मानों वह बाढ़ के गहरे पानी में गोते लगा रहा था। वह एक ऐसे विकराल बवंडर में फँस गया था, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था। तेज तूफान उसके चारों ओर घूम रहा था। वह अपने होशोहवास पूरी तरह खो चुका था। आंकड़ों की मजबूत श्रृंखलाओं की भारी पकड़ में वह कैद हो गया था।
आंकड़ा निश्चित रूप से लगने के बारे में एकाध सही और अधिकतर गलत अनुमान लगाए जाते। सुबह उठते ही नाई का चेहरा देखना, या फिर किसी अखबार में छपे कार्टून की चौखट के अंदर एक गुप्त आंकड़ा दिखाई देना, जो अधिकांश रूप से सही बैठने का अंदेशा होता। बारम्बार हिसाब में आनेवाला एक ही आंकड़ा, सड़क पर दिखाई देनेवाले कारों के नम्बर, उन्हें जोड़कर आने वाला भाग्यशाली अंक, और ऐसे कितने ही आंकड़ा लगाने वालों के बेहिसाब तर्क-वितर्क लगते रहते।
विनायक का लगाया आंकड़ा कभी-कभी सही नहीं बैठता था। इस हार के ग़म को भुलाने हेतु वह खूब छककर शराब पीता था और कभी कभार नंबर लग जाने पर जश्न मनाने के लिए भी शराब ही पीता था। मतलब यह कि, शराब उसके हर मर्ज की दवा थी। अधिकतर मौकों पर उसका आंकड़ा ठीक बैठता नहीं था। फिर पिछले दिन की हार की भरपाई करने हेतु वह दोबारा ही नहीं बल्कि बारम्बार खेलता और उतनी ही बार हारता। आंकड़ों के मायाजाल ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया था।
घरवाली उसके व्यवहार से बेहद तंग आ चुकी थी। बच्चे बेचैन और व्याकुल थे। कौन जाने उनकी सुचारु रूप से चलती सुन्दर गृहस्थी को किस मनहूस की नजर लग गई थी। कुछ ही दिनों में, काम से गए हुए एक बेकार, व्यसनी शराबी के रूप में उसकी बदनामी पूरे गाँव में फैल गई। कोई भी उसे अपने जूतों के पास तक फटकने नहीं देता था।
बीच-बीच में कभी कभार जब उसे होश आता, तो वह काम ढूंढने लगता। लेकिन एक पक्के शराबी और जुआरी आदमी को कौन काम देगा? जिसकी फूटी कौड़ी की भी आमदनी न हो, और तो और, जिसके मटके का और दारू का खर्चा सर पर चढ़ा हो! आखिरकार, उसने अपना खुद का घर बेचने का फैसला किया। सोचा, रहेंगे किसी सस्ते किराये के घर में या फिर गांव के बाहर की झोपड़पट्टी में। परन्तु यहाँ भी उसकी किस्मत रूठी हुई थी। घर बेचने में कई दिक्कतें आने लगीं। उसके चचेरे चचा ने होशियारी दिखाते हुए खेत के साथ साथ उसका घर तक अपने नाम करवा लिया था।
एक दिन उसके चचेरे चचा ने उसे घर से भगा दिया। उसने विनायक को धमकाते हुए कहा, “यह घर मेरा है। फिर कभी इस घर में कदम रखने की हिम्मत की, तो टाँग तोड़ कर रख दूंगा”; ऐसा कहते हुए उसके टूटे फूटे बर्तन बाहर फेंक दिए। अब तो विनायक बीवी-बच्चों समेत सड़क पर आ गया। उसने इस पर विरोध जताने की कोशिश की, लेकिन उसकी ताकत काफी कम थी। अपने चचेरे चचा के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करना जरुरी था। लेकिन उसके पास पैसे थे ही नहीं। गांव का सरपंच भी चचा के पक्ष में हो गया था। ग्रामसेवक (‘ग्राम विकास अधिकारी’) भी उसकी बात तक सुनने को तैयार नहीं था। उसे गांव का कोई आदमी दरवाजे पर खड़े रहने नहीं दे रहा था। भला एक शराबी की बात कौन सुनता? कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने के लिए पैसा नहीं, ऊपर से अदालती मामले में बहुत समय लगना तय था। घर बेचकर पैसे जुटाने दूर रहे, उससे अधिक तो मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही थी। जितना सरदर्द बढ़ रहा था, उतनी शराब की लत भी बढ़ती जा रही थी।
घर हाथ से निकल गया, इसलिए बीवी-बच्चे बेघर हो गए। हताशा की पराकाष्ठा हो गई थी। उसकी पत्नी ने अपना सर फोड़ फोड़ कर लहू लुहान कर लिया। बच्चों ने रो रो कर बवाल मचाया। आखिर विनायक ने गांव के बाहर एक बड़ी ही गलिच्छ झुग्गी बस्ती में एक कमरा किराए पर लिया। पत्नी ने टूटे फूटे बर्तनों को जोड़कर किसी तरह अपनी गृहस्थी जोड़ी।
लेकिन इतनी बर्बादी होने पर भी विनायक का सिर अभी भी ठिकाने पर नहीं था। एक दिन वह अपनी पत्नी के गले का हार खींच कर ले गया। उसे सुनार को बेचने पर कुछ पैसे मिले। ‘आर या पार’ इस अंतिम विचार के साथ उसने वे सारे पैसे मटके में लगा दिए। उसे पूरा यकीन था कि आज मेरा आंकड़ा जरूर लगेगा। उसके एक ‘मटकेबाज’ दोस्त ने उसे यह ‘सलाह’ जो दी थी! अब वह नतीजे का इंतजार करने लगा।
दरअसल, आज वह बिलकुल ही नशे में नहीं था। उसकी बेचैनी चरमसीमा पर थी। उसने अपनी पत्नी के सुहाग का अंतिम गहना तक तुड़वा कर जुए में लगा दिया था। अगर आज आंकड़ा लगा तो लाखों रुपये मिलेंगे। अपनी सम्पूर्ण निर्धनता दूर हो जावेगी। बच्चों की परीक्षा की फीस, उनके कपड़े-लत्ते, घर का बाजार-हाट, घरवाली को साडी, और मैं भी टकाटक बनकर रहूँगा। ऐसा लिबास पहनूंगा कि, गांव वाले मुझे पहचान तक नहीं पाएंगे। कमीज पर नए फैशन का जैकेट, पैरों में चमकीले पॉलिश से दमकते चमड़े के भारी जूते…….. ऐसा बहुत कुछ तय कर रखा था विनायक ने! अब तो बस जेब गर्म होने की देरी थी! …..लेकिन ये तमाम सपने तब सच होंगे, जब आंकड़ा ठीक से बैठेगा…….. और अगर न लगा तो? उसका दिमाग ठंडा पड गया। उस डरावनी अवस्था के बारे में वह सोचना तक नहीं चाहता था…….. उसकी समूची दुनिया का विध्वंस हो जायेगा।
दूसरे दिन की सुबह का उजाला कुछ मटमैला ही लग रहा था……
वह पूरी रात करवटें बदलता रहा। सुबह होते ही बिना एक भी मिनट गंवाए सबसे पहले वह टपरी पर चला गया। बेक़रार दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं। मानों उनकी गिनती लगाते लगाते उसने ललचाई नज़रों से आंकड़े को देखा। वह पूरी तरह से सदमे से हिल गया, जैसे तेजी से बहते पानी के भंवर में उसकी जान फँस गई हो। उसे ऐसा लग रहा था मानों उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही है। उसने लागत का पैसा पूरी तरह खो दिया था। उसके सारे अनुमान बुरी तरह गलत साबित हो गए थे। एक एक पाई आंकड़े के चक्कर में डूब गई थी। उसका पूरा भरोसा आज के आंकडे पर टिका था, वहीं ध्वस्त हो गया। वह गलितगात्र होकर जमीन में धंसता जा रहा था। वह कुछ भी सोचने की स्थिति में नहीं था। उसका दिलोदिमाग सुन्न पड गया। कितने सुनहरे सपने देखे थे, वे सब चुटकी भर में चूर चूर हो गए थे… सोच सोच कर माथा घूमने लगा, अब घरवाली और बच्चों को कैसे मुंह दिखाऊं? उनका भरण-पोषण कैसे करूँ?
वह तंद्रा से जागा। नाक की सीध में दिखने वाली सड़क पर चलने लगा। उसे अपने गाँव से कहीं दूर भाग जाने की इच्छा थी। अनमनासा होकर वह काफी देर तक अकेला चलता रहा। नंगे पैर…
दोपहर बीत गई। शाम तक ढलने लगी। एक के बाद एक गाँव पीछे छूटते गए। लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। उसके पेट में खाने का एक दाना तक नहीं था। यूँ ही निरुद्देश चलते-चलते उसके हाथ-पैर थकावट के मारे चूर चूर हो गए थे। उससे एक भी कदम चला नहीं जा रहा था, सो वह सड़क के किनारे बैठ गया। दूर कहीं से ट्रेन की आवाज़ आ रही थी। अनायास ही उसके मन में बिजली की तरह एक विचार कौंधा! अभी, इसी वक्त रेल की पटरी पर अपने आप को झोंक दूँ और इस बदकिस्मत जीवन का अंत कर दूँ। आखिरकार ऐसे जीते जी मरने का क्या फायदा? रोज रोज तिल-तिल से मरने की बजाय एक ही बार मरना कहीं बेहतर है। हाय री मेरी फूटी किस्मत, जो मुझे ढंग से अपनी गृहस्थी चलानी नहीं आती, बच्चों की परीक्षा की फीस तक मैं भर नहीं पाता! और तो और बीवी के सामने अब यह मनहूस चेहरा लेकर कैसे जाऊँ? इससे तो बेहतर है कि इस व्यर्थ जीवन का अंत ही कर दूँ…….
उसके मन में छाया अँधेरा चहुँ ओर फैले अंधःकार को और भी गहराई प्रदान कर रहा था। दसों दिशाओं को आगोश में लेते अंधियारे में सर्प के समान सोयी रेल की पटरियों पर वह लेट गया। दिनभर सूरज की गर्मी और रेल गाड़ियों के आवागमन की तपिश को झेलती रेल की पटरियाँ अच्छी खासी गर्म हो गई थीं। उसे अपनी गर्दन पर उन पटरियों का गर्म स्पर्श महसूस हो रहा था। तभी एक विशालकाय रेलगाड़ी अपने विस्तीर्ण बाहु फैलाती उसीकी दिशा में बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। रेलगाड़ी की आवाज़ एकदम नज़दीक आती जा रही थी। उसकी छाती की धड़कन उसी रफ़्तार से बढ़ती जा रही थी। एक पल के लिए मानों समूचा विश्व स्तब्ध हो उठा। उसका सम्पूर्ण शरीर उसे एक खोखले कंकाल की भांति प्रतीत हो रहा था। ….. रेलगाड़ी का धड़धड़ करता कम्पन……… बस कुछ पल और…… मृत्युदूत के पाश उसकी गर्दन को जकड़ने ही वाले थे…… भयग्रस्त होकर उसने अपनी आँखें मूँद लीं और एक ही क्षण में, उसकी आँखों के सामने चीथड़ों में लिपटी तस्वीरें कौंध गईं…हमारा घर…मेरी सोने जैसी अनमोल गृहस्थी…घरवाली और मेरे दो नन्हे-नन्हे लाडले बच्चे… मेरे जाने के बाद लावारिस होकर रह जाएंगे। वे गली-गली भटकते भीख मांगने पर मजबूर हो जाएंगे।
अचानक घबराकर वह रेल की पटरियों से एक तरफ हट गया मानों बिजली का जोरदार झटका लगा हो! कुछ ही क्षणों में, उस विकराल रेलगाड़ी का ढाँचा कर्णकर्कश सीटी बजाकर खड़खड़ाता हुआ उसके नजदीक से गुज़र गया।
वह कुछ देर तक यूँ ही आंखें मूँदकर सर को हाथों में थामे बैठा रहा। ट्रेन की धड़धड़ाती गूँज तो धीरे धीरे धीमी हो कर थम गई, लेकिन उसकी दिल की तेज धड़कन अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी…….. अपने घुटनों के बीच गर्दन दबाकर वह काफी देर तक अंधियारे में ख़ामोशी से बैठा रहा… मन के कोने में आशा का दीपक जलाए वह कुछ दृढ़ निश्चय करते हुए उठ खड़ा हुआ। अब वह घर की ओर चल पड़ा……. उसकी चाल में आत्मविश्वास था… वह हर कदम के साथ अपने सुनहरे भविष्य की दशा और दिशा माप रहा था।
वह सुबह जल्दी उठ गया। उसने घर के छत पर रखी कुदाल ढूंढकर निकाली। नहाते समय ही उसने उसे पानी में सलीक़े से धोकर साफ किया। आज उसने जो रास्ता चुना था, वह मेहनत से भरपूर था, उसके हर कदम पर कांटे बिछे थे। लेकिन वह ऐसा रास्ता था जिसपर चलने से उसके पसीने की एक एक बून्द में मोती जैसा निखार आने वाला था। लोग उपहास करेंगे तो क्या? चार दिन हंसेंगे, लेकिन ईमानदारी से कष्ट झेलने वाले हाथों को किसका डर होगा भला?
विनायक अपनी कुदाल कंधे पर रखकर राजमिस्त्री चचा के घर की ओर चल पड़ा। अब वह अपनी मेहनत से कमाई रूखी सूखी रोटी का मीठा स्वाद चखना चाहता था। उसकी पत्नी उसमें आए इस बदलाव से मन ही मन आनंदित होकर दूर जाती हुई उसकी स्वाभिमान से तनी हुई सुघड़ आकृति को अपलक निहारते जा रही थी। उसे भी बड़ी बेसब्री से इंतजार था आज की सुहानी रंगभरी शाम का!
– समाप्त –
मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील
संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीनाश्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ
ये सीढ़ियाँ जादुई हैं पर खड़ी, सपाट, ऊँची, अनेक जगह ख़तरनाक ढंग से टूटी-फूटी। इन पर चढ़ना आसान नहीं है। कुल जमा सौ के लगभग हैं। सारी सीढ़ियों का तो पता नहीं पर प्राचीन ग्रंथों, साधना और अब तक के अनुसंधानों से पता चला है कि 11वीं से 20वीं सीढ़ी के बीच एक दरवाज़ा है। यह दरवाज़ा एक गलियारे में खुलता है जो धन-संपदा से भरा है। इसे ठेलकर भीतर जानेवाले की कई पीढ़ियाँ अकूत संपदा की स्वामी बनी रहती हैं।
20वीं से 35वीं सीढ़ी के बीच कोई दरवाज़ा है जो सत्ता के गलियारे में खुलता है। इसे खोलनेवाला सत्ता काबिज करता है और टिकाये रखता है।
साधना के परिणाम बताते हैं कि 35वीं से 50वीं सीढ़ी के बीच भी एक दरवाज़ा है जो मान- सम्मान के गलियारे में पहुँचाता है। यहाँ आने के लिए त्याग, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम अनिवार्य हैं। यदा-कदा कोई बिरला ही पहुँचा है यहाँ तक”…, नियति ने मनुष्यों से अपना संवाद समाप्त किया और सीढ़ियों की ओर बढ़ चली। मनुष्यों में सीढियाँ चढ़ने की होड़ लग गई।
आँकड़े बताते हैं कि 91प्रतिशत मनुष्य 11वीं से 20वीं सीढ़ी के बीच भटक रहे हैं। ज़्यादातर दम तोड़ चुके। अलबत्ता कुछ को दरवाज़ा मिल चुका, कुछ का भटकाव जारी है। कुबेर का दरवाज़ा उत्सव मना रहा है।
8 प्रतिशत अधिक महत्वाकांक्षी निकले। वे 20वीं से 35वीं सीढ़ी के बीच अपनी नियति तलाश रहे हैं। दरवाज़े की खोज में वे लोक-लाज, नीति सब तज चुके। सत्ता की दहलीज़ श्रृंगार कर रही है। शिकार के पहले सत्ता, श्रृंगार करती है।
1 प्रतिशत लोग 35 से 50 के बीच की सीढ़ियों पर आ पहुँचे हैं। वे उजले लोग हैं। उनके मन का एक हिस्सा उजला है, याने एक हिस्सा स्याह भी है। उजले के साथ इस अपूर्व ऊँचाई पर आकर स्याह गदगद है।
संख्या पूरी हो चुकी। 101वीं सीढ़ी पर सदियों से उपेक्षित पड़े मोक्षद्वार को इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी
इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम:
मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
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☆ मेहनत की रोटी – भाग – १ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
श्री सचिन वसंत पाटील
पिछले दो-तीन वर्षों की तरह इस साल भी अंगूर के बाग ने धोखा दिया। ऐन मौके पर उसपर डाउनी रोग (एक फफूंद जनित गंभीर बीमारी) की बुरी नजर पड़ी और उस कारण बाग का आधा हिस्सा पूरी तरह बर्बाद हो गया। सोचा था, किसी भी हालत में प्रकार कम से कम लग लागत का ही खर्चा वसूल होगा, पर वह भी होने से रहा। तीन हज़ार बक्से अंगूर बनने की आशा थी, लेकिन घटकर आधे से भी कम हाथ में आये, बस हज़ार बारह सौ! फसल कटाई के मौसम में घनघोर बारिश ने घेर लिया। वहीं बेमौसम बरसाती बादलों का जमावड़ा किसी बिन बुलाए मेहमान की भांति आ टपका। फिर फसल की कीमतें गिर गईं। सारा कारोबार मुसीबतों के कीचड़ में धंस गया। बस इसमें व्यापारियों की चांदी हो गई, और क्या कहें!
संपन्न पाटील घराने में पले बड़े विनायक ने चार साल पहले अंगूर का बाग लगाया था। पहला वर्ष तो बाग के सयानी होने में बीत गया। दूसरे साल कुछ खास ज्यादा विकास नहीं हो पाया। सोचा बेलें तो अभी छोटी ही हैं, उनकी जड़ें अभी जमीन में ठीक से जमी नहीं होंगी। तीसरे साल बेमौसम बरसात के चलते छंटाई पर कुठाराघात हो गया। मौसम का मिजाज गर्म हो गया। तिसपर किसी बीमारी ने वायरस के रूप में बेलों को जकड लिया। देखते ही देखते सारा बाग-बगीचा हाथ से निकल गया। ऊपर रोग के लिए इस्तेमाल की गई दवाइयों के पचास हज़ार रुपये का खर्चा सर पर सवार हो गया। विडम्बना यह है कि बगीचा लगाने के लिए उठाया बैंक का कर्ज वैसे का वैसा बना हुआ है……
लेकिन अब बैंकवालों ने भी तकाजा लगा रखा है। वे भी कब तक चुप रहेंगे? यह चौथा वर्ष है, बैंक का कर्ज गले तक पहुँच गया है। उम्मीद थी कि इस वर्ष कुछ तो हाथ में आएगा। लेकिन यह डाउनी रोग कराल काल का रूप लेकर आ धमका! आशा की किरणें निराशा के गहन अंधकार में लुप्त हो गईं। मेरी सारी उम्मीदों पर पर पानी फेर गईं। अग्नि चक्र के फेरे में जल रहा हूँ, हर साल यहीं विपदा झेलते हुए। बारम्बार उसी अग्निदाह का सामना करता हूँ, न तो मरता हूँ, न ही इस दुष्ट चक्र से छुटकारा पा रहा हूँ। बस झुलसना है। मेरा छोड़ दूँ, पर इस तपन में बिना कारण घरवाले झुलस रहे हैं। मेरे उन नन्हे नन्हे मासूम बच्चों क्या दोष है? क्या एक गरीब किसान के परिवार में पैदा होना उनकी गलती है?
अब तो बाग को निकाल बाहर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं नजर आ रहा है। लेकिन इस बाग को हटाकर क्या करूँगा? बैंक का ढाई-तीन लाख का कर्ज बाकी है, वे उसे ऐसे ही थोड़े न छोड़ेंगे! दूसरी फसल उगाऊं भी तो इतनी आमदनी आएगी नहीं, जो कर्ज से मुक्ति दिलाएगी| कर्ज तो चुकाना दूर रहा, पहले नयी फसल बोने के लिए मेरे पास पैसा कहाँ से आएगा? तिसपर पापी पेट का रोजमर्रा का सवाल भी तो है। काश ईश्वर ने हम गरीबों को यह पेट ही नहीं दिया होता, तो कितना ही अच्छा होता। इस पेट के कुँए में जितना भी डालो, दुष्ट की भूख ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती। हर सुबह भूख की बेचैनी के साथ ही उगती है। यह क्षुधा-शांति कैसे की जाय? और फिर इस पहाड़ जैसे चढ़े कर्ज का क्या? इस भीषण अग्निचक्र से छुटकारा पाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा, कोई उपाय ढूंढना ही होगा…
देखा जाए तो करीबन चार साल पहले विनायक की आर्थिक स्थिति ठीक ठाक थी। दो ढाई एकड़ सिंचित जमीन। हर वर्ष कारखाने तक जाती हुई एक-डेढ़ एकड़ गन्ने की उम्दा फसल और दो दुधारू जनावर। घरखर्चे के बाद भी हाथ में पर्याप्त धन बचता था। जिंदगी टकाटक चल रही थी। लेकिन न जाने उसके दिमाग में कहाँ से सनक पैदा हुई और उसने अंगूर का बाग लगाने का फैसला किया। उसने तासगांव मणेराजुरी का चक्कर लगाया और वहाँ एक अंगूर के बाग का मुआयना करके आया। वहाँ उगे अंगूरों की गुणवत्ता तो निर्यात करने योग्य थी और आने वाली आय भरपूर थी। उसके आंकड़े सुनते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सोचा बस एक साल ऐसी फसल पैदा हो, तो सारी विपदा मिट जावेगी। और पांच दस साल की आय में अगली पीढ़ी घर बैठे खा पी लेगी। इसी आस के रंगीन सपने को बुनने हुए उसने अंगूर की बाग़ लगाने का फैसला किया। घर की दुधारू गायें बेच दीं, और तो और बैंक से कर्ज लिया, यहाँ-वहाँ से थोड़े बहुत पैसे उधार लिए और विनायक अंगूर के बगीचे का मालिक बन बैठा!
पहले दो वर्षों तक, उसे कर्ज का मामला मामूली लगा। उसे उम्मीद थी कि अगर अंगूर की फसल एकाध साल भी अच्छे से पक गई, तो पूरा ऋण चुकता हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे, राई के पहाड़ की तरह, ब्याज दर बढ़ती गई और अब महीने दर महीने चक्रवृद्धि ब्याज को अपने अंदर समाहित करता कर्ज का आंकड़ा एक पहाड़ की भांति उसकी छाती पर जम कर बैठ गया। कर्ज़ जम कर बढ़ता रहा, परन्तु बाग-बगीचे का ताल-मेल बिलकुल भी नहीं जम रहा था। तीन साल बीत गए, पर एक भी फसल हाथ नहीं लगी। वह हाथ पर हाथ धरे ख़ामोशी से घर पर बैठा रहता| उसकी पत्नी उसे धीरज देते हुए समझाने की कोशिश करती रहती थी।
“कुछ न कुछ तो होगा, आप चिंता मत कीजिये।”
“चिंता न करूँ तो क्या करूँ? सब के बाग़ बगीचे देखो कैसे फल -फूल रहे हैं! हमारे ही गले में यह भारीभरकम पत्थर क्यों लटका है भला बताओ?”
“होता है ऐसा कभी कभी … हमारे ही भाग फूटे हैं तो हालात कैसे सुधरेंगे?”
इस प्रकार पति-पत्नी में बातचीत होती रहती थी।
लेकिन इस साल घर का पूरा सफाया हो गया। उसने बची खुची पाई पाई बगीचे में छिड़कने वाली कीटनाशक दवाइयों पर खर्च कर दी। लगा था कि ऐसा करने से कम से कम इस साल तो बगीचा अच्छा उगेगा और वह बैंक के कर्ज से मुक्त हो जाएगा। लेकिन इस साल भी अंगूर के बाग ने पूरी तरह धोखा दिया। बैंक वाले उसकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ज़ब्ती का नोटिस जारी कर दिया। इसके पहले भी दो-तीन बार उनको समझा बुझाकर उसने गाड़ी वापस भिजवा दी थी। लेकिन अब उसके सामने अंतिम विकल्प बचा था। विनायक ने बहुत सोचविचार कर चचेरे चचा को १२ वर्ष के लिए पट्टेदारी के नियमानुसार खेती करने के लिए देने का फैसला किया। अग्रिम भुगतान मिलने पर खेत में उगाए अनाज पर उसका कोई हक़ नहीं होगा, ऐसा समझौता हुआ। चचा से मिले पैसों से उसने बैंक का सारा कर्ज चुका दिया। तब कहीं जाकर कर्जे से मुक्ति मिली।
अस्थायी रूप से कर्ज़ का भुगतान तो हो गया था। लेकिन वक्त बेवक्त के लिए संजोयी जमा-पूंजी खत्म होती जा रही थी। मल्कियत की जमीन और जनावर अब नहीं रहे सो, एक पाई तक की आमदनी की गुंजाईश कहाँ थी? बारह साल बीत गए थे, जमीन से किसी भी प्रकार अब नाता टूट चूका था। दुधारू जानवरों को बेच अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी। अब आगे चलकर क्या किया जाए, यह एक ही प्रश्न विनायक के समक्ष राक्षस का रूप धारण किये मुंह फाड़ कर खड़ा था।
अगर दिहाड़ी (दैनिक) मजदूरी पर कुदाल-फावड़ा लेकर काम करूँ तो वह मुझे मुझसे बाप-जनम में असंभव है, और तिसपर लोग क्या कहेंगे? कल का अंगूरबाग का मालिक आज किसी और का गुलाम! विनायक के दिमाग में यह बात बैठ ही नहीं सकती थी। वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिस के कारण कोई उसपर उंगली उठाता और भरे चौराहे पर वह उपहास का विषय बनता। वह पहले से ही घोर निराशा की गर्त में डूबा हुआ था। और अब उसके मन को एक प्रश्न ही कुरेदता जा रहा था कि, अब आगे क्या करे। धीरे-धीरे घर में खाने-पीने की सारी चीजों का संचय खत्म होने लगा। बेचारी पत्नी किसी तरह कमसे कम खर्चे में गुजारा कर रही थी। लेकिन अगर एक पैसे की भी आमदनी न हो तो यह कंजूसी कितने दिनों तक गृहस्थी का बोझ उठा पायेगी? अगर किसी पानी की टंकी में हमने पानी इकठ्ठा कर रखा है, और उसमें बिना एक भी बून्द पानी जोड़े, उस संचयित पानी को पंप से रोज ही निकालते चले गए, तो वह एक न एक दिन खाली होकर रहेगी।
किसी ज़माने में स्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके विनायक ने सोचा, “अगर खेती नहीं चलती, तो चलो नौकरी में किस्मत आजमाकर देखूं। यानि, नौकरी बाग-बगीचे जैसी बिना भरोसे की नहीं। बारिश हुई, नहीं हुई, फसल को कीड़ा लगा, दाम गिरे बाजार में… ऐसी कोई तनावगस्त परिस्थिति उभरेगी नहीं। पहली तारीख हुई नहीं कि मैं मालिक से कहूंगा, “भैया, मेरी तनखा दे दो!” और काम हो जावेगा। भले ही आय थोड़ी कम होगी, परन्तु यह लेन १०० प्रतिशत गारंटीशुदा रहेगा। इसी सोचविचार के साथ विनायक ने नौकरी करने का फैसला किया।
फिर शुरू हुआ शहर के चक्कर काटने का सिलसिला। कहीं न कहीं से पुरानी पहचान के जरिये सिफारिश की वह भरसक कोशिश करता रहता। उसने कार्यालयों, ऋण संस्थानों, स्कूलों, आदि में क्लर्क (लिपिक) या चपरासी तक की नौकरी पाने के अथक प्रयास जारी रखे। परन्तु यहाँ भी उसका दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। हर जगह मानों पहले से ही तय की गई अस्वीकृति और अनावश्यक तथा अप्रिय अपमानजनक व्यवहार उसके झोले में अनायास ही गिरता।
क्रमशः…
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मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील
संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीनाश्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “असमंजस…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५० ☆
लघुकथा – असमंजस… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
अन्नपूर्णा जी ने अपनी फ्रेंड्स नताशा, सेवंती और श्वेता को चहक कर कॉन्फ्रेंस कॉल किया, “अरे भाई तुम लोगों की ओर से कोई खुशखबरी है?” तीनों ने कहा, “है तो थोड़ी थोड़ी।” “थोड़ी सी, क्या मतलब!” अन्नपूर्णा सहज भाव बोलीं।
तीनों फ्रेंड्स एक साथ ही बोलीं, “अरे तीन हजार ही तो मिले हैं, इनमें क्या हो जाएगा, इसलिए थोड़ी सी।” अन्नपूर्णा इठलाती सी बोलीं,”हाँ मेरी लाड़की बहना, तीन-तीन हजार ही तो हैं….. छोटी सी किटी पार्टी तो हो सकती है न।” “हाँ हाँ, क्यों नहींं ” तीनों महिलाएं। तो आ जाओ फिर। सब मिलकर ही डिसाइड करेंगे कि क्या करना है।” अन्नपूर्णा जी ने कहा।
नताशा, सेवंती और श्वेता अन्नपूर्णा जी के बंगले पर आ गईं। पहले तो इधर उधर की काफी गप शप लगाईं। फिर चारों जुट गईं कुछ न कुछ बनाने में। नताशा ने नूडल्स बनाए तो सेवंती और श्वेता ने प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, धनिया, अदरख काटा । अन्नपूर्णा जी ने चाय बनाई। खाते पीते रात के दस बज गए। अन्नपूर्णा जी के पति निरंजन जी आ गए तो तीनों अपने अपने बंगले के लिए चल दीं। निरंजन जी ने पूछा,” आज क्या बात है किस खुशी में पार्टी मनाई गई।” अन्नपूर्णा शरमाकर बोली,” वो आज लाडकी बहन के पैसे मिले इसलिए….” “अच्छा..!” कहते हुए निरंजन फ्रैश होने चले गए।
किचन में बर्तनों का ढेर लगा है। अन्नपूर्णा जी को सोने में विलंब होने के कारण देर से आंखें खुली। झाड़ू पोंछा सब कुछ बाकी है। कामवाली भी नहीं आई। अन्नपूर्णा जी अपने को डिप्रेस फील करने लगीं। निरंजन जी को चाय तो देदी पर नाश्ता और डिब्बा बना कर देना है। पौने नौ के करीब कामवाली आई। उसके चेहरे पर एक सुकून है। अन्नपूर्णा जी उसे देख कर असहज होती हैं। पूछती हैं कि आज इतनी देर से क्यों आईं? कामवाली हल्के से मुस्कुराकर बोली, ” क्या है मैडम, कल खाते में लाडकी बहना के तीन हजार रुपए आ गए तो बेटी की ड्रेस, बेटे के जूते और कुछ रसोई का सामान खरीदने में देर हो गई। तो देर से ही सो पाई। उठने में भी देर हो गई। बस बच्चों को टिफिन देकर भागी चली आ रही हूँ क्योंकि आप परेशान हो रही होंगी।” इसी बीच खंखारते हुए निरंजन बाहर निकले और कामवाली को खुश देख कर बोले,” क्या तुम्हें भी लाडकी बहना के पैसे मिल गए।” कामवाली सिर झुकाकर धीरे से बोली,” हाँ बाबू जी, सब आपकी मेहरबानी है।” अन्नपूर्णा की ओर देख कर बोले कि मैं आज बाहर ही ब्रेक फास्ट और डिनर कर लूंगा। अन्नपूर्णा जी असमंजस में थी कि क्या कहें, क्या करें।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – वसुधैव कुटुंबकम ।)
नेताजी अपने कार्यकर्ताओं के साथ गली मोहल्ले में घूम रहे थे घूमते- घूमते अचानक उनको एक बुढ़िया घर के बाहर बैठी दिखाई दी।
“अम्मा हमारे नेता जी को ही वोट देना। “
“चुनाव चिन्ह ध्यान से देख लो ?”
“अंगूठे का निशान इसी चिन्ह पर लगाना। ‘
नेता जी ने कहा -“माँ जी आपको कोई समस्या तो नहीं है?”
बुढ़िया (कमला) ने कहा -“बेटा मुझे कोई समस्या नहीं है अब इस उम्र में मैं खुद ही एक समस्या हूं। आजकल तो बहुत मजे हैं।”
“बेटा बहुत सारे नेता लोग आते हैं बहुत सारा सामान देकर जाते हैं, अनाज भी मिल जाता है पहले तो पेट भरने के लिए यहाँ -वहां भटकना पड़ता।”
“अब आराम से मेरी गुजर हो जाती है, मेरा आशीर्वाद है बेटा तुम जुग जुग जियो। “
“माता जी सब आप लोगों की दया दृष्टि है इस बार मेरा ध्यान रखना। अपने आसपास के भी सभी लोगों को कह देना। “
“ठीक है बेटा” बुढ़िया कमला ने कहा।
“बेटा थक गए होगे? थोड़ा आराम कर लो पानी पी लो चाय बना कर पिलाऊं बेटा?”
“ठीक है माँ पानी पिला दो। “
“बेटा आपने बहुत मान सम्मान दिया। मैं दिल से आशीर्वाद देती हूं। तुम ही जीतोगे पर एक बात ध्यान रखना कि जैसे हो सदा ऐसे ही रहना क्योंकि जीत के बाद बदल जाते हैं सब लोग। “
“मेरी क्या अपनी सगी माँ की भी सुध लेते……?”
“मेरे बेटे बहू भी शहर चले गए हैं मुझे यहाँ अकेले छोड़के यदि आपकी कृपा दृष्टि न होती बेटा तो कैसे चलता ?”
“बेटा मुझे अपना घर दिखा दो , आपकी माँ कैसी हैं उनसे मिलना चाहती हूँ। “
“बेटा मेरा बेटा भी बहुत बोलता था , हम सब उसे नेता जी कहते थे हमें ही धोखा दे दिया। “
कार्यकर्ता ने कहा- “अम्मा नेता जी बहुत बिजी हैं हम लोग एक दिन आपको जरूर लें चलेंगे। “
“वोट नेता जी को देना जीतने के बाद भोज में बुलाएंगे। “
“हमारे नेता जी वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास करते हैं पूरे प्रदेश के लोगों को अपना परिवार मानते हैं। “
“अच्छा बेटा देखते हैं?”
कार्यकर्ता जयकारा लगाने लगते हैं।
“राम प्रसाद भैया की जय।”
“हमारा नेता कैसा हो रामप्रसाद भैया जैसा हो।”
जोर- जोर से जयकारे लग रहे थे।
वृद्ध अम्मा सोच रही थी कि – क्या सच में कोई प्रदेश को अपना परिवार समझता है बिना स्वार्थ के…। “
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “क्रू मेंबर ट्रेनिंग”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५२ ☆
🌻लघुकथा🌻 ✈️ क्रू मेंबर ट्रेनिंग ✈️
विवाह का घर सैकड़ो काम और कुछ नहीं तो यहाँ से वहाँ भागना। गाँव का वातावरण भी अछूता नहीं रहा शहरों की हवा से और सोशल मीडिया की कृपा से।
ऐसे ही एक परिवार में शादी के दिन मेहंदी की रस्म निभाई जा रही है। सभी हँसते खिलखिलाते नाच गा रहे हैं। घर की सयानी वरिष्ठ महिलाएं जो कुछ अपने समय नहीं कर पाई वह भी शामिल थी, परंतु कुछ वरिष्टों को पसंद नहीं आ रहा था।
बहुत देर से एक सुंदर सी बिटिया पर निगाह टिकी थी दादी की। परंतु उसके हाव-भाव अच्छे नहीं लग रहे थे। पास जाकर पूछने लगी– किसकी बेटी हो?
केश लहराते डीजे की धुन पर नाचते वह बोली – – – दिल्ली में रहती हूँ।
फिर से पूछने लगी– क्या नौकरियाँ करती हो।
तपाक से उत्तर मिला क्रू मेंबर की ट्रेनिंग कर रही हूँ।
दादी को समझ नहीं आया। अपना सा मुँह लेकर बैठ गई, परंतु निगाह अभी भी वहीं पर जाकर टिकी थी।
शायद कुछ सोच रही थी। थोड़ी देर बाद उनका अपना पोता हँसते मुस्कुराते आया दादी को परेशान देख बोला – – कुछ चाहिए।
दादी ने बड़े भोलेपन से कहा– पहले बता गुरु मैदान। पोते ने कहा– अभी नहीं, थोड़ी देर में चलते हैं। अभी बैठो।
उसको लगा शायद बाहर जाने को कह रही है खुले मैदान में। एक किनारे ले जाकर हाथ पकड़ कर पोते से लड़की को दिखाते हुए बोली– गुरु मैदान क्या बहुत बड़ी नौकरियाँ होती है। पोते ने हँस कर कहा – – गुरु मैदान नहीं दादी क्रू मेंबर।
अरे हाँ वही दादी अम्मा ने कहा। दादी हवाई जहाज जो उड़ता है ना उस पर पानी, चाय, पेपर, दवाई, जरूरी सामान और सहायता करना। बस ये समझ लो तुम।
दादी ने कहा अब तू जा। अपनी जगह बैठ गई दादी फिर से चार लोगों से बता रही थी आजकल की बिटियाँ घर में गिलास नहीं उठाती, हवाई जहाज में चाय पानी नाश्ता देती है गुरु मैदान में। फैशन तो ऐसे करी है जाने कहूँ बड़ी नौकरी मिली है।
और उसके बाद जोरदार हँसी की आवाज। सभी पलट कर देखने लगे। जानते हो देती तो चाय पानी ही है। पोता सुन्न होकर दादी को देखता रहा क्रू मेंबर किसे कहते हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– दिल की खातिर…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — दिल की खातिर —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
चोर ने एक ऐसा आईना चुराया जो आंतरिक दुनिया दिखाता था। उसने आईने में अपना दिल देखा। बड़ा प्यारा दिल था, लेकिन वह चोर होने से उसका दिल रोता था। उसने अपने दिल की खातिर चोरी छोड़ दी। अब उसे अपने दिल का हाल जानने के लिए आईने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पर ऐसा भी था उसने अपना दिल देखने के लिए कहीं से आईना चुराया नहीं था। बस अपने दिल की खातिर एक कल्पना ने उसे बांध लिया था।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – लघुकथा – हरि की माँ
हरि को गोद में आए केवल दस महीने हुए थे, जब हरि का बाप उसे हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। हरि की माँ ने हिम्मत नहीं हारी। हरि की माँ हरि के लिए डटकर खड़ी रही। हरि की माँ को कई बार मरने के हालात से गुज़रना पड़ा पर हरि की माँ नहीं मरी।
हरि की माँ बीते बाईस बरस मर-मरकर ज़िंदा रही। हरि की माँ मर सकती ही नहीं थी, उसे हरि को बड़ा जो करना था।
हरि बड़ा हो गया। हरि ने शादी कर ली। हरि की घरवाली पैसेवाली थी। हरि उसके साथ, अपने ससुराल में रहने लगा। हरि की माँ फिर अकेली हो गई।
हरि की माँ की साँसें उस रोज़ अकस्मात ऊपर-नीचे होने लगीं। हरि की माँ की पड़ोसन अपनी बेटी की मदद से किसी तरह उसे सरकारी अस्पताल ले आई। हरि की माँ को जाँचकर डॉक्टर ने बताया, ज़िंदा है, साँस चल रही है।
हरि की माँ नीमबेहोशी में बुदबुदाई, ‘साँस चलना याने ज़िंदा रहना होता है क्या?’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी
इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम:
मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें
सरस्वती वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈