हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११२ – कहानीकार की अंतश्चेतना… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कहानीकार की अंतश्चेतना…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११२ — कहानीकार की अंतश्चेतना — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

कहानियाँ पढ़ने के अंतर्गत प्रायः ऐसा मान लिया जाता है उन कहानियों में कहानीकार के जीवन की छाप होती हो। इसी से मिलती जुलती एक छोटी सी कहानी मेरी ओर से। कहानीकार ने अपने कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखी। पर उसकी अंतश्चेतना खुशी से दीप्त न हो पायी। उसकी सोच में आ रहा था इस संग्रह की सारी कहानियाँ पाठकों के यहाँ दुख ले कर जाने वाली हैं। सचमुच, सभी कहानियों में निराशा थी, उत्पीड़न थे, आँसू थे। स्वयं लेखक ने जिस लड़की को चाह कर प्रेम से घर बसाया था उसने उसे भी दुख की कलम से कुरेदा था। उसने अपनी अंतश्चेतना में एक अजीब सा उद्वेलन महसूस किया और बैठ कर पत्नी से प्रेमपूर्वक बातें करने लगा। यह उसका एक प्रायश्चित था। थोड़ी देर पहले कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखने के लिए बैठते वक्त उसने अपनी पत्नी से लड़ कर उसे बहुत रुलाया था

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और, खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है – मुझे भी केक दिलवाओ। मुझे भी जन्मदिन मनाने है ।

मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६० – लघुकथा – अंधकार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६० ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ ताजपोशी ☆ डॉ. हंसा दीप ☆

डॉ. हंसा दीप

संक्षिप्त परिचय

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।

☆ कथा कहानी ☆ ताजपोशी ☆ डॉ. हंसा दीप ☆

वह दिन उर्मि के लिए बहुत ही खास था।

सम्मान का दिन। पुरस्कृत होने का दिन। ताजपोशी का दिन।

पुरस्कार उसकी अपनी मेहनत का। पुरस्कार कलमकारी का। पुरस्कार उन अनगिनत पलों का, जिनमें डूबकर, रच-बस कर उसने लिखा था। उसे उस मंच पर जाना था, तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। मंत्रियों और अफसरों के बीच। जीवन के सुंदरतम पलों को ले कर आएगा वह एक दिन और हमेशा के लिए माथे पर ताज की तरह सजा रहेगा। 

फोटो के लिए उचित परिधान का चयन, चेहरे की झुर्रियों को खींचने वाले फेशियल-ब्लीच, ऐसे तमाम सौंदर्य प्रसाधनों से गुजरते हुए, उन प्रतीक्षित पलों को जीना था।

उसके अपने जीवन की यह महत उपलब्धि थी। अपनी मेज से सार्वजनिक मंच तक की दूरी उसने तय कर ली थी। उन पंक्तियों के सहारे, जो एकांत में जन्मी थीं। मन और कलम दोनों का तालमेल बैठाते हुए, कई-कई बार वाक्यों को तोड़ा-मरोड़ा और फिर से जोड़ा था। कभी उनसे जी भर कर प्यार किया था, तो कभी उनसे संघर्ष किया था। वे सारी कचोटती अनुभूतियाँ, जिन्हें कागज पर उतारने के लिए उसे जीते जी मरना पड़ा था, और फिर उन्हीं में पुन: जीवित भी होना पड़ा था। फिर से जीना भी उन्हीं शब्दों की ताकत थी, जिनमें उसने अपना मन उकेर कर रख दिया था।

आज वही शब्द उसकी अपनी पहचान बन चुके थे। वाहवाही और गौरव के वाहक। उसके अपने रचे शब्दों का संसार, एक लंबा सफर तय करके जैसे अपनी मंजिल को पा गया था। साहित्य जगत का यह प्रतिष्ठाजनक सम्मान हर किसी को नहीं मिलता, उसे मिला। इस साहित्यिक  अलंकरण की ताजपोशी से उसका कद और भी ऊँचाइयों तक पहुँचेगा।

मगर, उर्मि सामान्य नहीं थी। भीतर की खुशी गायब थी। चेहरे पर तनाव-सा था। इसका सबसे बड़ा कारण था- उसका हमेशा से ही भीड़ से कतराना। लोगों से कन्नी काट लेना। किसी भी सभा में जाकर बोलना उसे अच्छा नहीं लगता था। अंतर्मुखी तो वह शुरू से थी ही, पर ज्यादा प्रशंसा उसे और भी नर्वस कर देती थी। समझ में नहीं आता कि इसका जवाब कैसे दिया जाए! इसीलिए वह इस सम्मान समारोह में जाने से भी बचना चाहती थी। इससे बचने का खयाल तो आया था, पूरे वेग से आया था। ठीक वैसे ही, जैसे स्वयं को ‘कमजोरों’ की प्रवक्ता मानने वाली नोबेल पुरस्कृत एल्फ़्रिड येलेनिक भी तो खुद पुरस्कार लेने नहीं गई थीं। इसलिए नहीं गई थीं  क्योंकि उन्हें भीड़भाड़ वाली जगहों से भय लगता था। उन्हें भीड़ का फ़ोबिया था। टीवी एवं मीडिया से भी दूर रहती थीं।

क्यों न, वह स्वयं भी ऐसा ही कुछ करे! खयाल अच्छा था। बहुत अच्छा था। दिल को सुकून देने वाला। घर वालों से इस बात का जिक्र किया, तो सबने उसके इस निराशात्मक रवैये के लिए जी भर कर लताड़ा। तंज पर तंज करते रहे- “दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा!”

“तुम्हारा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार नहीं है, न भी जाओगी तो किसी किताब में लिखा नहीं जाएगा।”

“बेहतर है कि जाकर ले लो। जिंदगी ऐसा मौका फिर न देगी।”

“बाद में पछताती रह जाओगी।”

“लोग तरसते हैं ऐसे पलों के लिए, और तुम भागना चाहती हो।”

जितनी तेजी से विचार आया था, उतनी ही तेजी से उसे बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सच तो कहा घर वालों ने- वह नोबेल था। लोग नोबेल विजेता को यूँ भी याद रखेंगे ही। कहाँ नोबेल और कहाँ उसका पुरस्कार! दोनों में जमीन आसमान का अंतर!

बेचारी उर्मि! मरती क्या न करती! जाने के अलावा कोई चारा न था।

वह रात कुछ ऐसी थी, जैसे कत्ल की रात हो। सारी तैयारियों के बावजूद करवटें बदलती रही। तनाव और घबराहट के कारण पेट में गुड़गुड़ाहट शुरू हो गई। सोचा, कुछ खा लिया जाए, तो शायद नींद आ जाए। देर से खाना और वह भी पेट भर कर खाना, उलटा पड़ गया। फैक्ट्री चालू हो गई, यानी लूज़ मोशन्स।

एक के बाद एक, लगातार दौरे, थमने का नाम ही नहीं लेते। वापस आकर लेटने की मोहलत भी नसीब नहीं होती और फिर वही वॉशरूम की ओर भागना। देखते-देखते रात ढलकर सुबह के चार बजा गई थी। पानी का एक घूँट भी जैसे शरीर ठुकरा देता। डायरिया, अपने चरम पर था। इस समय कहीं से भी, कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं थी।

अब उसके पास पानी पीना भी बंद कर देने के अलावा कोई उपाय नहीं था। फेशियल-मसाज से जो चेहरा खिला-खिला लग रहा था, अब वह पिचक गया था। लेकिन अब उसे इन सबकी चिंता नहीं थी। चिंता थी, तो सुबह दस बजे शुरू होने वाले कार्यक्रम में टिक कर बैठने की। ऐसा न हो कि बार-बार उठकर जाना पड़ जाए।  

अब पेट में न अन्न था, न पानी। सब कुछ निकल चुका था और शरीर पस्त हो चुका था। खड़े रहने की हिम्मत पुरस्कार की ताकत से मिल रही थी।

आखिर वे पल आ ही गए। उसकी मेहनत की ताजपोशी पूरे सम्मान के साथ हुई। मंच का कार्यक्रम खत्म हुआ। तालियों की गूँज के बीच, फूलों के गुलदस्ते, शील्ड और शॉल थामे वह जैसे ही मंच से उतरी, कैमरों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक रिपोर्टर उसे घेरते चले गए। साक्षात्कार पर साक्षात्कार। हर बार वही सवाल, वही जवाब। उसका गला बैठ चुका था, पर वहाँ सारे माइक आगे बढ़ाने वाले थे। पानी देने वाला कोई नहीं था।

कैमरों की चमक का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। हालाँकि, गौर से सोचें तो इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए था। फिर भी, बार-बार दोहराए जाते सवालों के वही जवाब, न जाने क्यों उसे भीतर से विचलित कर रहे थे।

अतीत में घटी हर बात कैमरे के सामने सहजता से याद नहीं आ रही थी। ऊपर से कैमरों की तीखी लाइटें और पसीने से बचाने के लिए लगे पंखों की तेज हवा। बाल इस कदर शैतान हो गए थे, जैसे उन पर फुर्री उड़ा दी गई हो। जरा सी हवा लगते ही बालों ने अनुशासनहीनता की सारी हदें पार कर दी थीं।

इसके बाद फोटोग्राफर की भीड़ ने उसे घेर लिया। अपने-अपने लिए गए फोटो थमाने के लिए। हर किसी का दावा था कि उसी के पास सबसे अच्छे फोटो हैं। बस, पैसे देने होंगे। वह आखिरी पल तक सबसे पीछा छुड़ाकर इस कदर भागी कि कोई उसे देख न पाए। तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि बड़े स्टार, राजनैतिक हस्तियों का पत्रकारों पर गुस्सा करना कितना जायज होता है। अचानक कई सिनेमाई हस्तियों के चेहरे उसके सामने उभर आए। वही चेहरे, जो पीछे आते कैमरों को फटकारते हुए जल्दी से भीतर घुस जाते थे। आम जनता को लगता कि ये सेलिब्रिटी कितने अकड़ते हैं। किन्तु सचमुच, उनके जीवन का एक दिन जीना भी कितना मुश्किलों से भरा था।

एक ही दिन की सेलिब्रिटी जिंदगी में उसका अपना चैन कहीं खो गया था। एक दिन की ताजपोशी बहुत थी, जीवन में भी, यादों में भी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी। दूर, बहुत दूर। इतनी दूर कि फिर कभी ये कैमरे उसके पीछे न आएँ, उसे कैद करने की कोशिश न करें। उसके अनचाहे गुस्से को, चिढ़ को, घबराहट को, निराशा को और न बढ़ाएँ, क्योंकि लगातार भूखे रहने से आई कमजोरी ने उसका हाल बेहाल कर दिया था।

खैर, वह दिन भी निकल गया। घर वापसी हो गई। घर लौटते ही परिवार वालों के सवाल शुरू हो गए– “बहुत खुश हो?”

“बेहद उत्साहित हो?”

“राहत महसूस कर रही हो?”

वह हर सवाल पर बस हल्के से मुस्कुराती, और शांत स्वर में हर सवाल का एक ही जवाब देती रही, “मैं इस समय कुछ भी महसूस नहीं कर रही, सिर्फ एक खालीपन है।”

वह जल्द से जल्द उन पलों से उबरना चाहती थी। अचानक आए इस भावनात्मक उतार-चढ़ाव का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। आने वाले कई दिन उसे एक अजीब-सी स्थिति में डाल गए। ऐसा लगता था जैसे समय आगे तो बढ़ रहा था, किन्तु भीतर कहीं कुछ ठहर-सा गया था। कई दिनों तक एक अजीब-सी रिक्तता छायी रही। ऐसी, जहाँ न शब्द थे, न भाव। वह खुद से ही कट-सी गई थी।

सबसे ज्यादा चोट उसे तब लगी, जब बरसों पुराने मित्र भी पहले की तरह बात नहीं कर रहे थे। जैसे अचानक ही इस सम्मान ने रिश्तों की डोर को ढीला कर दिया हो। उनकी आवाज में अब वह अपनापन नहीं रहा था। उनके शब्दों में घुली दूरियाँ कानों को असहनीय हो रही थी। जो हँसी, ठहाके, बेफिक्र होकर आपस में साझा होते थे, अब औपचारिक मुस्कानों तक सीमित हो गए थे। मानो इस एक उपलब्धि ने अनजाने ही मित्रों के बीच दीवार खड़ी कर दी हो।

हैरानी इस बात की थी कि अब वह कलम की ओर देखती तक नहीं थी। ऐसा लगने लगा कि बहुत हो गया लेखन।

दिमाग कह उठता- “अब क्यों?”

दिल भी साथ देता, “अब क्या लिखना, और क्यों लिखना!”

धीरे-धीरे, दिनों की खामोशी हफ्तों में, महीनों में बदल गई। लोग, कैमरे, तालियाँ सब कुछ कहीं दूर खोते गए। फिर भी, उसके भीतर का सन्नाटा अडिग था, वज्र-सा अटल। जड़वत वहीं जमा रहा। वह अपनी सामान्य जिंदगी में लौटने को व्याकुल थी, अपनी मेज, कलम, शब्द और अपनी दुनिया की ओर। लौटने का रास्ता मिलने के बजाय और भटकाव की ओर धकेल रहा था।  

बेचैनी भरी एक और रात किसी लंबे रतजगे-सी करवटों में कट गई। सुबह खिड़की से छनकर आती धूप चेहरे पर पड़ी, तो अनायास उठकर वह आईने के सामने जा खड़ी हुई। खुद को इतने गौर से देखा कि थका-हारा-सा प्रतिबिंब भी बोल उठे, राख में दबी धीमी चिंगारी की तरह। बगैर पलकें झपकाए, बेचैन आँखें कुछ खोज रही थीं, ऐसे जैसे उसे पाए बगैर उन्हें बंद होना मंजूर ही न हो।

खिड़की के बाहर फेंस के छोर पर, कचरे की सड़ी हुई परतों के बीच भी जीवन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी थी, प्रकृति, क्षय और पुनर्जन्म सब एक साथ उपस्थित थे। छोटे-छोटे नाजुक-से फूल काँपते हुए खिले थे, मानो सूरज की पहली छुअन के साथ ही अपनी पूरी उम्र जी लेना चाहते हों। एक बित्ता-सा हरा टमाटर पत्तों के बीच अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहा था। अभी वह बड़ा होगा, धीरे-धीरे लाल मुकुट पहनेगा, किसी की थाली में सजेगा, या फिर यहीं गिरकर दोबारा उगने की कोशिश करेगा। मिट्टी से उपजा, मिट्टी में बिखरा, ताकि समय फिर से गढ़ सके।   

प्रकृति के सम्मान में अनायास ही पलकें भारी होकर झुक गईं। न कोई शोर, न कोई पदचाप, शायद उसी क्षण वह अपने भीतर लौटने लगी। कलम लिखने को आतुर थी- हर ताजपोशी का एक अंत होता है।

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© डॉ. हंसा दीप

संपर्क – Dr. Hansa Deep, 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada

दूरभाष – 001 + 647 213 1817

hansadeep8@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆ कथा-कहानी – माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४० ☆

☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।

नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।

भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।

दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’

जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’

सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’

गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।

सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’

गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’

सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’

गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’

जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर# १११ – असंभव तुलना… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– असंभव तुलना …” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # १११ — असंभव तुलना — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वह समंदर पार भ्रमणार्थ एक सुन्दर देश गया। विद्वान एवं अध्ययनशील होने से यहाँ उसने अपने देश को मिला कर एक तुलनात्मक दृष्टि रख ली। यहाँ उसे घरों के दर्शन तो हुए। उसने ध्यान से मानो एक खास बात का अध्ययन कर लिया। यहाँ के तमाम घर प्रायः एक रंग के थे। उसने सोच बना ली यहाँ की संस्कृति के तहत ऐसा हो। पर उसे याद तो आया अपने देश में इस रंग को अपशकुन माना जाता है। स्वयं यह रंग देखने पर उसके मन में आता है यह तो अपशकुन है। पर उसने इस देश में सुबह से शुरु हुए शाम तक अपने इस तुलनात्मक अध्ययन का एक तरह से मन ही मन प्रायश्चित कर लिया। वास्तव में दुनिया की विचित्रता यही है। एक ही भगवान ने पूरी दुनिया बनायी है, लेकिन देशों के हिसाब से भगवान के प्रति मान्यता और आस्था एकदम अलग — अलग है। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

१० — ०७ — २०२६

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।

एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।

“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”

कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।

माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”

रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”

माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।

“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”

रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”

रवि के पास कोई उत्तर नहीं था।

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© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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