हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है, उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है, उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।

 वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।

अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में, धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।

अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।

तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं .., आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४४ – कथा कहानी – एक चित्र ऐसा भी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!

 साभार – युग संवाद  (यूट्यूब)

मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।

एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।

चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।

सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।

आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।

उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # २३ – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “मोबाइल में खोया बचपन “.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २३ ?

? लघुकथा – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

 स्मरण आता है, वह स्वर्णिम बचपन… l घर में जब कोई डिब्बा खाली हो जाता था, उसे लेकर हमारे साथी, हमारे भाई-बहन एक कोने में खड़े हो जाते थे, दूसरा खाली डिब्बा लेकर दूसरे कोने में हम l दोनों खाली डिब्बों को एक धागा अथवा किसी डोर से बाँध लिया जाता था l

 उस कोने से हमारे साथी या हमारे भाई-बहन खाली डिब्बे में मुँह लगाकर बोलते थे, इधर हम सुनते थे….. कभी इधर से हम बोलते थे, उधर वो सुनते थे l

 खाली डिब्बे का स्थान अब मोबाइल ने ले लिया है l बात तब भी होती थी, बात अब भी होती है l….. लेकिन बीच की स्नेहिल डोर न जाने कहाँ ग़ायब हो गई है l

 “रिश्ते-नातों के प्रति उदासीन हो गए

मोबाइल आया और हम मशीन हो गए”

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४० – बाल कहानी — जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी बाल कहानी — जबान फिसली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४०

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप मुझे जानते हो ? मैं कौन हूं ?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ” आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो, ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ” जबान ने कहा, ” आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहींनहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा, ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया. उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

—–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – १ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – १ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

साढ़े आठ बजे नहीं कि, उसने जल्दी से पर्स में खाने का डिब्बा ठूँसा और पैरों को जैसे तैसे चप्पलों में घुसाते घुसाते घर से बाहर निकली। चाहे वह कितनी भी तेज़ चल पड़ती या बीच बीच में थोडीसी भागमभाग करती तो भी, लोकल के स्टेशन तक पहुँचने में कम से कम आधा घंटा तो लगना ही था। इसलिए नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ने के वास्ते उसके पास साढ़े आठ बजे घर से निकलने के अलावा कोई चारा था ही नहीं। और तो और लोकल ट्रेन में सीट मिलने की कोई गारंटी नहीं थी, क्योंकि इस मामले में एकमात्र नियम यही था, हाजिर सो वजीर! उसपर अक्सर उसे निकलने में ५-७ मिनट की देरी हो ही जाती।

दरअसल, वह सुबह ४ बजे ही जग जाती थी। दूसरों की नींद में खलल न पड़े, इस बात का ध्यान रखते हुए तेजी से खाना बनाने से निपटने हुए उसकी दम-साँस फूल जाती। ६ बजे तक उसके पति को छोड़ अन्य  प्राणी उठ जाते थे। ये ‘अन्य’ यानि उसकी दोनों बेटियां और उसके सास ससुर। उसकी दस और बारह वर्ष की उम्र की बेटियों को जोर जबरदस्ती से उठाना, उन्हें प्रथम पहर की गहरी गुलाबी नींद से जोर जबरदस्ती से जगाना उसकी जान पर आता था… बिलकुल भी नहीं भाता था।  लेकिन इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। किसी तरह उनका चाय-नाश्ता, नहाना-धोना आदि निपटने पर, उनके बालों को दो चोटियों में कसकर गूँथने के उपरांत वह अपने सास -ससुर की तरफ मुखातिब होती। दोनों ही बूढ़े हो गए थे। ससुर जी का एक पैर लकवाग्रस्त होते-होते बच गया था, परन्तु वह सहजतः कमजोर हो गया था। सुबह की तमाम गतिविधियाँ निपटने के लिए उन्हें निश्चित ही उसकी सहायता लेनी पड़ती थी। उसकी सास न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से बहुत ही शिथिल हो चुकी थी।

ऐसा लगता था मानों अपना खुद का संतुलन बरक़रार रखते हुए उन्हें सावधानीपूर्वक बाथरूम तक ले जाना, नहलाना-धुलाना, कपडे पहनाना, आदि करने के बाद उन्हें वापस पलंग पर सुलाना, सब कुछ खालिस उसीकी जिम्मेदारी थी। लेकिन उसके मुख से कभी भी इस बारे में शिकायत का एक शब्द भी नहीं निकला था। वह तो यहीं समझती रहती कि, यह उसका जन्मजात कर्तव्य है। फिर वह जल्दी से अस्तव्यस्त गिरे हुए सारे कपड़े धोकर सुखा देती, इधर उधर फैले बर्तन साफ ​​करती और फिर झाड़ू-पोंछा। सबको पहले से तैयार किया हुआ नाश्ता परोसती। तब तक उसका पति जाग जाता। फिर उसके मूड की लय सम्हालते हुए, वह किसी तरह तैयार होती और अपने और लड़कियों के खाने के डिब्बे भरती। उसकी निरंतर भागदौड़ को दीवार पर लगी समय साथ फीकी पड़ी हुई घड़ी, बड़ी तटस्थता से और बिना किसी झिझक के देखती रहती थी, मानों वह साढ़े आठ का घंटा बजने का बेसब्री से इंतजार कर रही हो, और जैसे ही वह बजता, वह बेटियों, पति और छूटे हुए आधे अधूरे काम से मुंह मोड़कर घर से निकल जाती।

आज भी, वह घर से बाहर निकलकर सीधे पाँव बढ़ाते हुए तेजी से स्टेशन की ओर अक्षरशः भागने लगी …उस पल, ऐसा लग रहा था मानो द्रुतगति से चलना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो… और आज, जैसे ही ट्रेन प्लैटफ़ॉर्म पर आकर रुकी, वह आश्चर्यजनक गति से अपने नियमित डिब्बे तक पहुँचने में सफल हो ही गई। जैसे ही उसने झटपट डिब्बे में अंदर चढ़ते-चढ़ते खिड़की के पास एक खाली सीट देखी तो, वह अतिशीघ्रता से उछलकर उसमें धंस गई। रोजमर्रा की तरह उसके मन में मजेदार ख्याल आ ही गया, “अरी रेल रानी, आपको घर में कोई काम धाम नहीं होते जो हर दिन नियत समय पर प्लेटफार्म पर आ धमकती हो?”… आज यह सवाल उसे कुछ अधिक प्रसन्न कर गया! वह मन ही मन बहुत खुश थी….. क्योंकि आज उसे बैठने की जगह जो मिल गई थी, वह भी खिड़की के पास। वह निश्चिन्त थी कि अब अगले एक-सवा घंटे तक उसे किसी प्रकार के धक्के का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि अब आखिरी स्टेशन तक वह इत्मीनान से एक ही जगह बैठकर सुकून पा सकेगी। आज का यह वक्त उसका था… सिर्फ उसका। रोज़मर्रा की ज़िंदगी के जाने-पहचाने चेहरों को देखकर मुस्कुराने का आदान-प्रदान होने के उपरांत उसने खिड़की के फ्रेम पर हाथ रखा और बेहद शांति से बाहर का दृश्य देखने में लग गई। उसे दिल से एहसास होने लगा कि, वह खिड़की निर्जीव नहीं, परन्तु उसकी सबसे नजदीकी सहेली का आश्वस्त करता कंधा है … और उसका मन किसी मोरपंख की तरह हल्का हो गया। फिर, उसे पता भी नहीं चला कि कब खिड़की से नजर आते पीछे दौड़ते पेड़ों के साथ-साथ उसका मन भी यादों को समेटने पीछे भागने लगा।

.. रत्नागिरी के पास स्थित ‘वारे’ गाँव में है उसका मायका… एक अत्यंत मनमोहक, खुशहाल, छोटा सा सुन्दर सपनों जैसा गाँव… एक तरफ निर्मल, गहरा नीला, शांत समुद्र… और दूसरी तरफ सफेद पीली रेत की चमकती चादर ओढ़े समुद्र तट…जहाँ भी देखो वहाँ, सुहावनी शीतल वायु के झूले पर नारियल और ताड़ (सुपारी) के पेड़ ख़ुशी में झूमते रहते हैं… बगल में घनी अमराई की छाँव में शांति से आराम फरमा रहे लाल खपरैलों द्वारा आच्छादित छतों से सजे हुए, ठिंगने लेकिन बेहद सुडौल घर, गोबर से लिपे पुते साफ़ सुथरे आंगन, नन्ही-नन्ही मनभावन सुंदर रंगोलियों से सजे हुए आँगन! चाहे छोटा हो या बड़ा, हर घर के आंगन में बने पवित्र तुलसी-वृन्दावन में मद्धम हवा के झोंकों के साथ डोलती हुई खिलखिलाती उज्ज्वलमुखी सांवली सलोनी तुलसी! आंगन में तरह तरह के रंगबिरंगे खुशबू बिखेरते फूलों की बहार! यहीं तो है उसका पसंदीदा नैहर का अलबेला गाँव, जिसे देखते ही कोई भी उस पर मोहित होकर रह जाये! उसी गाँव में बसा एक उसका घर था, जो निरंतर आनंद और संतोष से भरा रहता था… उसके माता-पिता, जो उससे अत्यधिक प्रेम करते थे… और उसके दो बड़े भाई। हालाँकि वे आर्थिक रूप से बहुत धनी नहीं थे, लेकिन वे लोग दिल से सर्वोपरि अमीर थे… …. उसे पता तक नहीं चला कि कब वह अपने घर के अंदर चली गई… इधर लोकल ट्रेन हर दिन की तरह नियत स्टेशनों पर रुक रही थी… ट्रेन में चढ़ने और उतरने वाले लोगों के चेहरे लगभग एक जैसे ही नजर आते थे। लेकिन ऐसा लग रहा था मानो वह उस पल वहाँ थी ही नहीं। अब तक वह रसोईघर के प्लेटफॉर्म के निकट खाना बनाने में जुटी अपनी मां को उसके पीछे जाकर अनायास ही कसकर लिपट चुकी थी….अपने पिता की गोद में आराम से लेट चुकी थी…..उसने अपने दोनों भाइयों के हाथ पकड़कर खुशी से गोल गोल घूमते हुए नाच किया था। फिर वह आंगन में हिरनी की भांति खूब उछल कूद कर भागती रही। उसने सभी पेड़ों से गुफ्तगू भी कर ली। और अब, अपनी माँ के हाथों से बने स्वादिष्ट गरमागरम थालीपीठ को चटकारे लेकर खाते खाते वह आंगन की सीढ़ियों पर बेहद शांति से बैठी पुरानी यादों की फुहारों में अंतर्बाह्य भीगने लगी।

… दसवीं कक्षा तक जिस स्कूल में वह पढ़ी थी, वह स्कूल, वहाँ की सभी अध्यापिकाएं, स्कूली सहपाठी… सब कुछ उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह कौंध रहा था। उसके दोनों बड़े भाई रत्नागिरी के एक महाविद्यालय में पढ़ रहे थे। जब उसने भी वहां पढ़ने की ज़िद की, तो उसके पिता ने उसे वहीं ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला दिला दिया था । उसे कभी इस बात का रत्तीभर का एहसास भी नहीं हुआ था कि, उसके पिता पर अपने तीनों बच्चों को कॉलेज में शिक्षा दिलवाने के कारण कितनी आर्थिक विपदाओं से जूझना पड़ रहा था। वैसे तो वह बहुत अधिक बुद्धिमति तो कही नहीं जा सकती थी। कड़ी मेहनत से मन लगाकर पढ़ाई करने के बावजूद, वह बारहवीं कक्षा में बमुश्किल से ५५% अंक तक पहुँच पाई थी। लेकिन संतोषजनक बात यह थी कि, अपनी माँ के मार्गदर्शन में वह गृहकृत्य में काफी हद तक कुशल हो गई थी। बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उसकी पढ़ाई छुड़वा दी गई थी। उसके पिता तो पहले ही उसके लिए योग्य वर ढूंढने लगे थे। हालाँकि उसका रहन-सहन और दर्शनीय रूप सादा था, फिर भी वह चतुर और चंचल थी। जल्द ही मुंबई से उसके लिए विवाह का प्रस्ताव आया। लड़का भी  बारहवीं कक्षा तक पढ़ा-लिखा था, लेकिन वह भी होशियार था एवं एक अच्छी कंपनी में स्टोर कीपर का काम करता था। उसके पास खुद का घरबार नहीं था, परन्तु इस बात का सबने सहज रूप से अंदाजा लगा लिया था कि, मुंबई में रहकर इतनी युवावस्था में इस बात की उम्मीद करना बहुत कठिन ही होगा।  लड़के की दोनों बड़ी बहनें अपने संपन्न ससुराल में खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहीं थीं। इसलिए, यह तय था कि, घर में मात्र लड़का और उसके माता-पिता ही होंगे। इसके अलावा, उस परिवार की सिफारिश जाने पहचाने लोगों के जरिये की गई थी…तो विवाह का निर्णय होने में ऐसी कितनी देरी लगती? उसे भी वह लड़का पसंद आया था। मुंबई जैसे बड़े शहर में जाकर बस जाने की खुशी की मात्रा कुछ अधिक ही रूमानी थी, क्यों कि उस मायानगरी के बारे में उसने ढेरों बातें सुन रखीं थीं। इन सबके चलते उस सुनहरे प्रस्ताव को नकारने का प्रश्न ही नहीं उठता था। गिनती के चार महीने बाद ही उसके पिता ने यथासंभव ठाठ बाठ से विवाह समारोह आयोजित किया। विवाह संपन्न होने पर नई-नवेली दुल्हन ने मुंबई में प्रवेश किया…

… डिब्बे में अचानक ही हलचल और शोरशराबा मच गया, और तब जाकर उसे होश आया। अंतिम स्टेशन आ चुका था। डिब्बे के दरवाजे पर उतरने के लिए लोगों की बेतहाशा भीड़ लगी हुई थी। लेकिन उसे आज उसी खिड़की के पास बैठे रहने की प्रबल इच्छा हो रही थी। पर यह संभव नहीं था। धीरे-धीरे उठते हुए, वह सबके उतरने के बाद डिब्बे से नीचे उतर गई। हालांकि, अब उसके कदमों ने हमेशा की तरह तेजतर्रार गति पकड़ ली, लेकिन उसका मन अभी भी पुरानी यादों की लहरों पर मचल रहा था।

वह अपने पति का हाथ और कई सपनों का साथ लिए बहुत ही उत्साहित होकर मुंबई आई। उनका घर एक चॉल की ऊपरी मंजिल पर था। लेकिन इतना सा? वन रूम किचन…यानि एक कमरा – रसोईघर – एक थोड़ी चौड़ी लेकिन अलग गैलरी… बस इतना ही? वह एक पल के लिए चौंककर स्तब्ध रह गई। न कोई आंगन… न फूलपत्ते … न ही तुलसी वृंदावन… लेकिन उसने तुरन्त खुद को सम्हालते हुए बड़ी आसानी से अपने आप को समझाया, “हो जाएगा आगे जाकर मेरा खुद का बड़ा सा घर।” इस समझदारी वाली सोच के बाद उसने दिल की गहराई से इसी घर से अपना नाता जोड़ लिया! उसे यह बहुत आश्चर्यजनक बात लगती कि उसकी सास ने तुरन्त ही बड़ी ही आसानी से इस घर को पूरी तरह उसे सौंप दिया था। यह अधिकार देते हुए भले ही उसके सास ने उसकी किसी भी बात पर पर्याप्त प्रशंसा नहीं की, फिर भी उसके लिए यह संतोषजनक बात थी कि उन्हें किसी बात पर शिकायत भी नहीं थी। फिर उसने अदम्य उल्लासपूर्वक उस छोटे से घर को खूब सलीक़े से सजाया था… घर के कामों की उसे आदत थी ही, इसलिए उन्हें तेजी से निपटने में कोई दिक्कत तो थी ही नहीं। उसका वैवाहिक जीवन एकदम सुचारू रूप से चल रहा था।

क्रमशः… २

♦ ♦ ♦ ♦

मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रेत की दीवार।)

☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शांति दास जी सोच रहे थे कि आसपास इतना सन्नाटा है।आजकल कोई सुबह की सैर को भी नहीं जाता?

सुबह हो गई अब चाय तो बना कर पी लेता हूँ, तभी आवाज आई कचरे वाली गाड़ी आई।

“चलो कचरा डालकर ही चाय पीता हूँ।”

कचरा उठाकर  बाहर डालने के लिए गए, तभी कचरे वाले  ने कहा – “बाबा आज बाहर बहुत ठंड है और आपने बस एक स्वेटर पहनना है, टोपी क्यों नहीं पहनी, आपको खांसी  आ रही है।”

शांति दास जी ने कहा- “बेटा बहू ऊपर की मंजिल में रहते हैं नीचे मुझे अकेला छोड़ दिया। पत्नी के गुजर जाने के बाद जिंदगी बोझ हो गई है। बुढ़ापे का  बोझ मुझसे अब सहन भी नहीं होता? ऐसा लगता है कि मरुस्थल के चारों ओर में गिरा हूँ। सब तरफ अंधेरा दिखाई दे रहा है।”

कचरे की गाड़ी वाले ने कहा- “बाबा आपकी बात तो मेरे सिर के ऊपर से जा रही है, ठीक है आपका जीवन आप जानो, मैं आगे के घर का कचरा लेता हूं।”

“बाबूजी आपने अपने आसपास रेत की दीवार क्यों खड़ी की है?”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ – भोले का अभिषेक ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ ☆

🌻 लघु कथा 🌻 भोले का अभिषेक 🌻

महाशिवरात्रि की धूम, भक्तों की टोली यत्र- तत्र, शिवालय, देवालय घर मंदिर, सजा सुंदर, चमकता जहाँ तक दृष्टि जाए हर- हर महादेव की गूंज।

दूध दही, गंगाजल निर्मल जल की धार, अभिषेक करने की होड़ सी मची है। शिव शंकर भक्तों की परीक्षा ले रहे हैं। सब उनका मायाजाल।

अरे जल्दी चलो नहीं जाना है क्या? मालती।

जल्दी चलो– शिव अभिषेक करने का समय हो चला है। पास के मंदिर में बहुत भीड़ होने लगी है।

सखी ने जोर से आवाज लगाई।

नहीं अभी नहीं जा रही हूँ। घर मंदिर में अभिषेक कर लूँ तत्पश्चाप जाऊंगी।

तू तो पगली है घर में बाद में करते रहना। पहले चल वहाँ हो आते हैं। बहुत अच्छा पुण्य मिलता है। नहीं तो  मंदिर में बहुत भीड़ हो जाएगी।

नहीं मेरे मंदिर में सभी देवगण बैठे इंतजार करते हैं। सभी को मेरे अभिषेक की आवश्यकता है।

सखी आँखें तरेर कर बोली– ऐसे कह रही है– जैसे भगवान इसके घर पर हैं।

मालती ने कहा सही कहा तुमने। चाय, दूध, नाश्ता, टिफिन, कपड़े की तैयारी, स्कूल की तैयारी, भोजन व्यवस्था, झाड़ू बुहार, साफ सफाई समय पर नहीं हुआ तो मेरे अभिषेक का क्या महत्व।

मेरे पतिदेव ने सारा कुछ मुझे सौप दिया है। अपनी जिम्मेदारी उठा परिवार को खुश रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं।

कहते-कहते वह भाव विभोर होने लगी। आज पतिदेव उठकर भोर एक लोटा जल सूर्य देव अर्पण करते कह रहे थे – – – प्रभु मेरी मालती को सदैव कुशल रखना। हे अर्धनारीश्वर बस यही मेरा अभिषेक है।

और वह सखी की ओर देखने लगी। सखी बोल पड़ी – – हो गया भोले का अभिषेक। 🙏😊

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९४ – रुके हुए आँसू… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रुके हुए आँसू …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९४ — रुके हुए आँसू — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

विधवा माँ एक विधुर से पुनर्विवाह करती। आदमी का संतान न होना एक संयोग ही था। पर बेटी ने माना नहीं। बाद में बेटी की शादी हो गयी। बीस साल बीते। बीमार माँ अस्पताल में थी। बेटी ने अस्पताल पहुँचने पर माँ के पास एक अनजान आदमी को देखा। माँ ने उसे बताया इसी के साथ उसका पुनर्विवाह होना था। केंसर पीड़ित माँ इतना बोलते रो दी। बेटी के भीतर आज बहुत कुछ टूट गया, बिखर गया।

© श्री रामदेव धुरंधर

14 – 02 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६७ – लघुकथा – क्या रखा है नाम में? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – लघुकथा – क्या रखा है नाम में?)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६७ ☆

☆ लघुकथा – क्या रखा है नाम में? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

नाम व्यक्ति की पहचान होता है। शिशु को नाम माता-पिता या अन्य पारिवारिक बड़े जन देते हैं। हम सब समाज में अपने नाम से ही जाने जाते हैं। एक ही नाम एक से अधिक व्यक्तियों के हो सकते हैं। पहचान सुनिश्चित करने के लिए पिता, पति या गाँव के नाम तथा कुलनाम भी जोड़ लिया जाता है। नेकनाम होना तथा नाम कमाना सबकी चाह होती है जबकि गुमनाम, बदनाम होना कोई नहीं चाहता।

मेरे कार्यालय में एक अधिकारी आए जिनका नाम था राम लाल शर्मा। संयोगवश दफ्तर में एक भृत्य का भी यही नाम था। अधिकारी के कक्ष के बाहर उनकी नाम पट्टिका लगाई गई तो उन्होंने उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि आर. एल. शर्मा आई.ए.एस. लिखवाओ।

एक बच्चे का नाम गरीब दास था। वह पढ़-लिखकर  नौकरी में लगा तो यह नाम चुभने लगा उसने शपथ पत्र देकर नाम बदल लिया। उसके रिश्तेदार आते तो उसे बचपन के नाम से पुकारते, यह उसे बहुत खराब लगता। माता-पिता से अक्सर बहस कर लेता और डाँट खाता।

कुछ लोग अपने पेशे को अपने व्यक्तित्व से अहमियत देते हैं, वे नाम के पहले डॉक्टर या प्रोफेसर लिखने लगते हैं। यह लत इतनी बढ़ जाती है कि केवल नाम लिखा या लिया जाने पर वे खुद को अपमानित या शर्मिंदा अनुभव करते हैं।

जब समाज में शिक्षा का प्रसार कम था तब नाम के साथ उपाधि बी.ए., एम.ए., विशारद, शास्त्री आदि लिखने का चलन था। मेरे एक पड़ोसी सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी हैं, वे नाम पट्टिका पर अपना पदनाम लिखने का मोह नहीं छोड़ पाए। एक सामाजिक कार्यकर्ता खुद का परिचय पत्नी के पद से से पार्षद पति कहकर देते हैं।

एक दिन मेरी बेटी ने मेरे पिता श्री पूछ लिया कि व्यक्ति की सही पहचान नाम, कुलनाम या पदनाम क्या होती है? पिता जी बोले- पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात, क्या धरा है नाम में? मनुष्य की सही पहचान उसके काम से होती है। दुनिया को काम ही प्यारा होता है, नाम या चाम नहीं।”

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९ – बाल कहानी — जादूई पेन – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी — जादूई पेन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९

बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था। 

‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था। 

‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’ 

‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा। 

मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी। 

कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’ 

‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा। 

तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’ 

‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया। 

‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’ 

‘‘जादूई पेन!’’ 

‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’ 

‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’ 

‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’ 

‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई। 

आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था। 

श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी। 

वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’ 

‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं। 

श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं। 

जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’ 

उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’ 

‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा। 

लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’ 

यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’ 

इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’ 

‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’ 

‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’ 

‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’ 

‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया। 

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दिनांक- 10.01.2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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