(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मौन।)
“माँ जल्दी करो अभी तक चाय नहीं बनाई है और न टिफिन दिया है कॉलेज जाने में देर हो रही है।”
रवि ने अपनी माँ कमला से कहा।
“बेटा आज बहुत ठंड है 8:00 बज गया अभी तक मेरा हाथ पैर सीधा नहीं हो रहा है?”
“कोई बात नहीं माँ मैं चाय बना ले रहा हूं और ब्रेड सेंक के तुम्हें देता हूं” मुस्कुराते हुए रवि ने कहा “माँ ब्रश कर लो।”
“माँ पता नहीं क्यों बाहर बहुत हल्ला हो रहा है?”
कमला जी ने कहा – “बेटा सड़क के किनारे घर हैं। आते जाते बहुत सारी आवाज़ सुनाई देती रहती है। “
रवि ने कहा – “मैं देखता हूँ क्यों बाहर भीड़ लगी है।”
“मां आप चिंता मत करो ऑनलाइन मैंने खाना ऑर्डर कर दिया है थोड़ी देर बाद आ जाएगा और मैं कॉलेज कैंटीन में खाना खा लूंगा।”
वह बाइक लेकर कॉलेज के लिए चला गया।
जब वह पहुंचा तो देखा कि एक वृद्ध ठंड के मारे कांप रहा था और एक फटा कंबल ओढ़ कर बैठा था,
लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे।
रवि ने एक चाय की दुकान से चाय और एक बिस्कुट का पैकेट लिया और उस बुजुर्ग आदमी को दिया।
तभी वहां पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे डांटा- “क्या हम इसे भगा रहे हैं जानते हो कौन है और तुम इसे चाय पिला रहे हो?”
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा -“अंकल जी कहिए तो आपको भी मैं चाय पिला दूं बेचारे ठंड से कांप रहे हैं पहले उनमे थोड़ा हिम्मत आये फिर हम पूछते हैं उन्हें कहाँ जाना है। “
वह वृद्ध आदमी बहुत खुश हुआ मुस्कुरा के उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया और बोला कि “मेरा सब कुछ कुछ महीने पहले ही बेटे-बहु सबने छीन लिया था बस यूं ही भटकता रहता हूं गली-गली, आज यहां आग तापते हुए सो गया और मेरी नींद लग गई थी तभी सुबह यह सब लोग मुझे परेशान करने लग गए और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ?”
“कोई बात नहीं अंकल जी आप यह बताइए मैं आपको कहां छोड़ दूं? “
“बेटा मुझे तो कुछ पता नहीं है” उसे वृद्ध ने कहा।
“मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल सर भी बुजुर्गों की सेवा करते हैं।”
रवि ने कहा- “बाबा आप बाइक में बैठो।”
वृद्ध की आंखों में एक चमक आ गई और उसके शरीर में अचानक एक ऊर्जा भर गई।
वह उसकी बाइक में तन कर बैठ गया।
प्रिंसिपल सर बोले “अरे यह किसको ले आए कॉलेज!”
“सर बाबा के रहने का इंतजाम करना है इनके बच्चों ने इन्हें घर से निकाल दिया है”
“ठीक है अपने कॉलेज के थोड़ा सा दूरी पर जो वृद्ध आश्रम है उसका नाम है ‘अपना घर’ इन्हें वहां छोड़ आओ।”
वृद्ध की ऑंखों से ऑंसू निकल रहे थे मौन होकर भी ऑंखे आभार व्यक्त कर रही थी।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आम के बीच राम”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ ☆
🌻लघुकथा🌻आम के बीच राम🌻
वार्षिकोत्सव कार्यक्रम चल रहा था। सभी अपनी-अपनी कार्य कुशलता मंच के मध्य रखना चाह रहे थे। चमचमाता मंच, सजावट, तिलक रोली चंदन वंदन अभिनंदन, मन आनंदित और उमंगों से भरा ।
सभी की निगाहें तो बस वहाँ क्या हो रहा? क्या होने वाला है? इसकी जानकारी लेते नजर आए।
किसी ने मन की बात, कोई व्यंग, कोई परियंत, कोई प्रियवर, कोई हँसी ठिठोली, कोई ज्ञान की बात, संत ध्यान की बात, न चाहते भी तालियाँ बजाते रहिए। कुल मिलाकर गीत संगीत भरपूर मनोरंजन।
अंग्रेजी परवरिश में पलते आज के बच्चों को ये सब नही भाता।अथर्व अपनी दादी के साथ आया था। बीच-बीच में तंग करने लगा – – घर चलो यहाँ तो आम लोग बैठे है।
दादी प्यार से सिर पर हाथ फेरते बच्चे से बोली — जहाँ आम लोग होते है। वहीं राम होते है। तुम्हें भी श्री राम बनना है न??
बच्चे ने धीरे से कहा — तो फिर ठीक है। थोड़ी देर बैठ जाता हूँ।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघु कथा “– मेला …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ — मेला —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
आठों पहर वहाँ एक स्थायी मेला बना रहता था। लोग अपनी व्यस्तता से थक जाएँ तो एक वही मेला होता था जहाँ जाने पर उनका मन बहलता था। धारणा इस तरह से बनी होती थी कि अपना कोई घर में खो जाए तो वहाँ मेले में ढूँढने पर उसे पा लेंगे। पर एक प्रेमी के साथ कुछ और हुआ। उसने खोने को तो अपनी प्रेमिका को इस मेले में ही खोया, लेकिन उसे पाया नहीं। बात होती थी सब का कहीं खोया मेले में मिल जाता है तो उसका क्यों नहीं मिलता? रही प्रेमी की बात, वर्षों प्रेमिका को ढूँढते थका – हारा हो जाने से वह खत्म हो गया। अब वह कब्रस्तान में होता। प्रेमिका वहीं थी।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
☆ कथा कहानी ☆ झुरमुटी गलियारे☆ डॉ. हंसा दीप ☆
एक के बाद एक, परिवारजनों के संदेशों की भरमार थी- “एक बार आ जाओ, दीदी से मिल लो। अब वे किसी को पहचानती नहीं। सब कुछ भूल गई हैं।”
उनके बच्चों के संदेश भी थे- “मम्मी शायद आपको पहचान लें, आप आ जाइए।”
मैं मान ही नहीं सकती, दीदी सब कुछ कैसे भूल सकती हैं! जो किसी की कही, छोटी से छोटी बात भी बरसों याद रखती थीं। न जाने कितने धार्मिक सूत्र और छंद उन्हें कंठस्थ थे। राजनीति के कितने ही पहलुओं को बिना किसी किताब के, एक के बाद एक, पूरे क्रम से सुना देती थीं। वे किसी को पहचानती नहीं, ये सब कुछ मेरे गले से नीचे नहीं उतर रहा था।
शायद इसलिए भी कि मैं उनके बेहद करीब थी। उनके जीवन के हर पहलू से परिचित। अपने जीवन भर की कठिनाइयों को उन्होंने न जाने कितनी बार उसी तरह दोहराया था। इतनी बार कि मुझे भी वे किस्से रट से गए थे। उनकी आपबीती जैसे मेरी अपनी यादों का हिस्सा बन चुकी थी। कितने बरस उनकी छत्रछाया में बिताए थे मैंने। क्या उन्हें वो एक पल भी याद नहीं आएगा! अतीत के सारे पन्ने खोलकर रख दूँगी, वे जरूर पढ़ लेंगी। एक नहीं, कई तरकीबें होंगी मेरे पास उन्हें याद दिलाने के लिए।
इन्हीं खयालों के साथ जब मैं उनसे मिलने जा रही थी, मन में बहुत उमंग थी। चेहरे पर छलकती खुशी, भीतर की भावनाओं-संभावनाओं को आकार दे रही थी। मन आश्वस्त था। इस गहन विश्वास के साथ कि वे मुझे पहचान ही लेंगी। भले ही किसी और को पहचानें, न पहचानें, मगर मुझे तो पहचान ही लेंगी। कैसे नहीं पहचानेंगी भला, आखिर मैं उनकी हंसु थी। वे सारी दुनिया को भुला सकती हैं, मगर मुझे नहीं। मेरे हाथों का स्पर्श ही पर्याप्त होगा, उन्हें उस झुरमुट से बाहर ले आने के लिए।
उनके कमरे में कदम रखते ही सारे मुगालते दूर हो गए। उन पर नजर पड़ते ही मन की सारी मुरादें मन में ही ठहर गयीं। मुझे देखकर भी अनदेखा करता उनका चेहरा, मुझे तोड़ गया। वे सामने की दीवार को घूरती रहीं, जैसे मैं वहाँ मौजूद न थी। मेरे बार-बार याद दिलाने पर भी उन पर कोई असर न पड़ा। चेहरा शांत रहा। निर्विकार।
मैं उनके सामने बैठी रही। वे मुस्कुराईं। वैसी मुस्कान जैसी किसी अजनबी के लिए होती है। ऐसी मुस्कान जिसमें अपनापन नहीं था, बस एक शिष्ट दूरी थी। वह मुस्कान किसी और के लिए थी, किसी अपने के लिए नहीं।
मैं स्तब्ध थी, मेरा कल, कल ही था, आज नहीं। कल बीत चुका था और आज दीदी की आँखें खाली थीं। सारे नाम, सारे चेहरे, यहाँ तक कि उनकी अपनी कहानियाँ भी कहीं पीछे छूट गई थीं। कभी जो बातें हँसी में गूँजती थीं, आज वे केवल हवा में खोए स्वर बनकर रह गई थीं।
मैंने बहुत कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द उन तक नहीं पहुँच रहे थे। मैंने बार-बार उनका हाथ छूने की कोशिश की, लेकिन मेरे स्पर्श की कोई गरमाहट भीतर की बर्फ को नहीं पिघला सकी। एक पल के लिए उनकी आँखें मुझसे मिलीं और फिर खो गईं। ठीक वैसे, जैसे कोई दरवाजा बंद हो गया हो और मैं बाहर ही खड़ी रह गई। उनके और मेरे बीच अनदेखी दीवार थी। कभी जो आँखें मेरी आँखों से बतियाती थीं, आज उनमें केवल प्रतिध्वनि ही थी। उनकी उपस्थिति यहाँ थी पर ध्यान कहीं और बहकता-उछलता चला जाता था।
और मैं बैठी रह गई, देखती रह गई। पिछला समय उनके और मेरे बीच की खाई में बह चुका था। उनके भीतर की दुनिया अब उनकी-मेरी नहीं रही, सिर्फ उनकी ही रह गई थी। हर याद एक धुँधली तस्वीर की तरह किनारे पर आकर फिसलती चली जा रही थी। हारकर मैं चुप हो गई। बैठ गई उनका हाथ थामकर। उनके भावशून्य चेहरे को ताकती रही। वे सामने बैठी तो थीं, लेकिन किसी अनजान की तरह। किसी अजनबी की तरह।
पचहत्तर साल की एक शिशु। खुली आँखें, उजला चेहरा और ऐसी मुस्कान जिसमें किसी स्मृति की परछाई तक नहीं थी। वही तो थीं, मेरी ही दीदी। सब आते, जाते। किसी के आने से उनके चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं सुनती रही सबका कहा- “वे अब न किसी को जानतीं, न किसी को पहचानतीं। न अपने बच्चों को, न अपने भाई-बहनों को। और न ही स्वयं को।” उनसे बात करते हुए मुझे अब मानना पड़ रहा था कि उन्हें अपना नाम तक याद नहीं। शायद अब नाम की कोई जरूरत ही नहीं रह गई थी। उन्होंने अपनी एक नई दुनिया रच ली थी। ऐसी दुनिया जहाँ नाम नहीं होते, पहचान नहीं होती, सिर्फ वहाँ होना होता है।
कुछ पल चुप रहकर वे बोलने लग जातीं। न जाने कहाँ-कहाँ की बातें। कभी किसी अदृश्य सभा को संबोधित करतीं, तो कभी किसी अनजाने अपराध पर डाँट लगा देतीं। अतीत से भटकते हुए कुछ शब्द जबान पर आ तो जाते, मगर बगैर किसी संदर्भ के। ऐसा लगता जैसे अभी कोई उनके गलियारे से झाँक कर वापस चला गया हो। बगैर चेहरे के। बगैर रिश्ते के। किसी बात को लेकर खिलखिलातीं तो हँसती ही जातीं। हम उनके अपने, उन्हें देखते ही रह जाते। समझने की कोशिश करते हुए कि ऐसा क्या याद आया कि उनकी हँसी थम ही नहीं रही। वे हँस रही होतीं, हम उस हँसी में साथ देने के बजाय उदास हो जाते। आँखों की कोरों को गीली होने तक उन्हें एकटक निहारते रहते, जब तक उनकी हँसी थम नहीं जाती।
न जाने क्यों, वे हमेशा प्रसन्न दिखाई देतीं। उनकी अपनी दुनिया में। खुश और निश्चिंत। उन्हें न तो खाने का ध्यान था, न कपड़ों का। किसी ने जबरन रोटी का टुकड़ा उनके मुँह में दे दिया तो नाराज हो जातीं। किसी ने प्यार से खिलाया तो खा लेतीं वरना भूखी ही बैठी रहतीं। जैसे भूख-प्यास जैसी तमाम सारी बातें अब उनकी दुनिया का हिस्सा ही न हों।
आज जब मैं उन्हें खिलाने बैठी तो शायद वे सारे निवाले याद आए जो उन्होंने बचपन में मेरे मुँह में दिए थे। मैं नहीं खाती तो वे डाँटती थीं। आज मैं भी ठीक उसी लहजे में उन्हें डाँट रही थी। वे खाते-खाते बोलने लगीं। मेरे मुँह से अनायास वही शब्द निकल पड़े, उन्हीं के शब्द- “खाते-खाते कैसे बोल सकते हैं। मुँह एक ही है, या तो बोलेगा या फिर खाएगा। पहले खा लो, फिर जो कहना है कह देना।”
वे रुक गईं। गहरी नजरों से मुझे देखा। एक हल्की-सी आशा मेरे चेहरे पर आई। शायद, उन्हें कुछ याद आया, लेकिन अगले ही पल निराशा ने घेर लिया। उन्होंने अच्छे बच्चे की तरह सिर हिलाया और मुँह का खाना चबाने लगीं। उनके शब्द मुझे याद थे, जिन्हें दोहराकर मैं उस पुराने ऋण को चुपचाप चुका रही थी। कर्ज की भरपाई का सुकून भीतर तक महसूस कर रही थी मैं। खाना खाने के बाद उनकी ऊर्जा दुगुने वेग से लौट आयी। आसपास से गुजरते हर इंसान को अपने पास बुलाने लगीं और अनवरत बातें करने लगीं। बातें बगैर किसी तारतम्य के। ऐसी बातें जिनका कोई क्रम नहीं था, कोई अर्थ नहीं था। मानो कह रही हों- “मैं बोल रही हूँ। समझ सको तो समझ लो।”
यह न अतीत था, न वर्तमान। शायद कोई तीसरी ही दुनिया थी। उनकी अपनी दुनिया, जहाँ वे पूरी तरह सुरक्षित और बेखौफ थीं। जैसे चाहें बैठें, जो चाहें बोलें। न लोकलाज का भय, न घर वालों की चिंता-फिक्र।
मुझे खुशी इस बात की थी कि उनकी सेहत अच्छी थी। चेहरे पर रौनक थी। ऐसा नहीं लगता था कि उन्हें किसी से भी, या खुद से भी कोई शिकायत हो। हम समझने में लगे थे कि उन्हें एक अलग अपनी दुनिया बनाने की जरूरत क्यों और कैसे पड़ी। हम सभी, उनके परिवार के पंद्रह सदस्य जिनमें डॉक्टर भी हैं, इसका उत्तर खोजने की भरपूर कोशिश करते-करते बेबस-से हो गए हैं। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ का उत्तर खोजते-खोजते एक बिंदु पर आकर रुक गए कि जो भी हुआ, वे यहाँ तो हैं। इलाज की कोई उम्मीद ही नहीं। बीमारियों को नाम भी देना नहीं चाहते, अलज़ाइमर या डिमेंशिया या कुछ और। उत्तर नहीं चाहिए, बस उनका होना चाहिए। थक-हार कर सबको एक ही बात का सुकून है- “वो किसी को नहीं पहचानतीं, लेकिन हम सब तो उन्हें पहचानते हैं।”
हम सब, उनके अपने, उनके और भी करीब आ गए हैं। मैं भी। आखिर वही तो हैं मेरी प्यारी दीदी, जिनके मुँह से हंसु सुनते ही कभी मेरी बाँछें खिल उठती थीं। अब फर्क बस इतना-सा था कि हर बार मैं ही उन्हें अपना परिचय उसी नाम से देती हूँ। धीरे से उनके पास जाकर कहती हूँ- “दी, मैं आपकी हंसु हूँ।”
ये शब्द उनके कानों तक पहुँचाकर मन को एक अजीब-सी राहत मिलती, जैसे यकीन हो गया हो कि मेरी दीदी अब भी मुझे सुन रही हैं।
उनसे मिलकर पहले दिन बहुत रोई थी मैं। अगले दिन पीड़ा कुछ कम हुई। और कुछ दिन उनके साथ बिताने के बाद मन ने चुपचाप स्वीकार कर लिया- “अब दीदी का ध्यान हमें ही रखना है।” झुरमुटी गलियारों में उनके साथ, उनकी उँगली पकड़कर चलना है। और इसी स्वीकार्य के साथ मेरी, हम सभी की पीड़ा धीरे-धीरे सेवा में बदल गई। हाथों की उँगलियाँ निवाला तैयार करती हैं, किसी बीते कल को जगाने के लिए नहीं, बल्कि आज को बचाने के लिए। बस खिलाने के लिए। मानों स्मृतियाँ थककर मौन हो गई हों, और प्रेम अकेला साथ निभा रहा हो।
☆ लघुकथा – मुंह पर थप्पड़☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, औरजब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि, “जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?”
“हां! है तो ।”
“क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?”
“नहीं।”
“मतलब असहमत हो?’
“नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”
“मतलब यह , कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।—-और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।”
“मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?”
“हां!ऐसा ही समझो।’
“और हमारे प्यार का क्या ?”
“वह तो हमने तब किया था, जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ”
“ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।”
और फुंफकारती हुई मानसी चली गई, और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी. की तैयारी करने में।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “दुखवा मैं कासे कहूँ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
घर के निरीह बूढ़े प्राणी की अंतिम सांसें चल रही थीं पर उसके प्राण कुछ कहने के लिए तड़प रहे थे। आंखों की पुतलियां बेचैनी में बार बार धरती को, आसमान को ताके जा रही थीं। होंठ थे कि कुछ कहने के लिए खुलते पर फिर कसमसा कर बंद हो जाते थे।
परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्य उनकी चारपाई के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए खड़े थे। आखिर उनके प्यारे पोते से उनकी हालत देखी न गयी, आंसुओं से बाबा के पांव को नम करने के बाद, माथा टिकाते कहा- कहिए न बाबा। आप जो कहना चाहते हैं ताकि आपकी आत्मा को मुक्ति मिले।
बाबा ने कोशिश करके मुंदी आंखें खोलीं, फिर परिवारजनों को निहारा और धीमे सुर में कहना शुरू किया -मेरे बच्चो। मेरा जन्म उस पंजाब में हुआ, जिसमें अमृतसर और लाहौर एक दूसरे की ओर पीठ करके नहीं बैठते थे बल्कि एक दूसरे के गले मिलते थे.. हाय.. फिर इनका बिछुड़ना भी इन आंखों ने देखा। कैसे कहूं?
– कहिए न बाबा..
– मेरे बच्चो। मेरी जवानी उस पंजाब के खेतों को हरा भरा करने में निकल गयी जिसे इंसानी लहू से सींचा क्या था? आह.. कैसे कहूं.. ? कैसा भयानक दौर आया। बंटवारे की धुंधली तस्वीर फिर सामने आ खड़ी हुई। और तुम मुझे पंजाब की अनजान धरती पर ले आए। अब..
– दुख कहो न बाबा..
– अब उस धरती पर अपने प्राण त्याग रहा हूं जहां मैंने न जन्म लिया, बचपन बिताया, न जवानी भोगी.. तुम लोगों ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया। हे भगवान्…. । कुछ और मंज़र दिखाने से पहले इस धरती से मुझे उठा ले.. उठा ले..
इतना कहते कहते बाबा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी.. एक प्रश्नचिन्ह बनाती हुई..
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – शुभम भवतु !
☆ लघुकथा ☆ शुभम भवतु!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
☆
सुबह-सुबह भक्त नहा-धोकर मंदिर पहुँचा। उसने दीप प्रज्वलित किया, दो अगरबत्ती जलाई, ग्यारह रुपए का प्रसाद और श्रीफल चढ़ाया, हाथ जोड़े, आँखें बंद की और आर्त्त स्वर में निवेदन किया- ‘प्रभु! प्लीज… प्लीज… कुछ कीजिए…!’
तभी भक्त को अपने कानों में प्रभु की मधुर स्वर सुनाई दिए- ‘भक्त क्या बात है…! बड़े उद्विग्न, भयाक्रांत और घबराए हुए लग रहे हो…! प्लीज़…के आगे भी कुछ कहोगे… या यूँ ही मेरे नाम की रट लगाए रहोगे।’
भक्त- ‘प्रभु! वो बात ऐसी है कि देश और दुनिया में घमासान मचा हुआ है। विभिन्न धर्मावलंबियों और देशों के मुखिया आपस में लड़-मरने पर आमादा हैं। उनके अहं की लड़ाई में अब तक कई निरीह और निर्दोष लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। दुनिया में त्राहिमाम मचा हुआ है।’
प्रभु ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा- ‘भक्त! यह जो कुछ तुम्हारे देश या दुनिया के दूसरे देशों में मारामरी, खूखराबा हो रहा है। इसके लिए न तो मैं दोषी हूँ, न ही ज़िम्मेदार। दरअसल तुम्हारी यह आदमजात क़ौम के नुमाइंदे हैं जो अपने और दूसरे देशों की अवाम पर अपना रुआब गाँठना और अपनी हुकूमत क़ायम करना चाहते हैं। दुनिया भर की सारी समस्याएँ इन्हीं अहंकारी और उजबकों द्वारा पैदा की हुई हैं, अतः समाधान भी उन्हीं आकाओं को मिल-बैठकर खोजना है। प्रभु ने अपने चक्षु बंद किए, भक्त को ‘शुभम भवतु’ का आशीर्वाद दिया और पलक झपकते अंतर्ध्यान हो गए…!
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘रुख बदलना होगा‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५९ ☆
☆ लघुकथा – रुख बदलना होगा☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
अलसुबह चाय की चुस्कियों के साथ रेवा की शादी की बातें चल रही थीं। सासु जी बोलीं- “अरे बहू! यह बताओ रेवा की शादी में भात कौन देगा? तुम्हारे भाई तो है नहीं, दो बहनें ही हो।”
“अम्माँ! शादी में भात की रस्म भाई ही करता है क्या? ”- साधिका ने बड़े ही शांत भाव से पूछा।
“हाँ बहू! लड़की की माँ मिठाई, कपड़े, फल लेकर मायके अपने भाई को भात न्योतने जाती है। शादी में लड़की का मामा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भात लेकर आता है, जिसमें बहन के परिवार के लिए कपड़े और लड़की के लिए साड़ी, गहने आदि होते हैं।”
“अम्माँ! तो मैं कल ही जाकर राधिका को भात न्योतकर आती हूँ। मेरी बेटी की शादी में उसकी मौसी भात लेकर आएगी।”
“बहू! अपने किसी ताऊ-चाचा के लड़के को कह दे भात देने को, मौसी को तो शादी में भात देते मैंने कभी नहीं देखा।”
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “सबहिं नचावत राम गोसाईं“.)
☆ कथा कहानी ☆ सबहिं नचावत राम गोसाईं—☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
अरे बिलुआ देख उस टेबल पर चाय का चार जूठा गिलास अभी तक पड़ा हुआ हैं, उन्हें धोने के लिए दे दे और देख टेबल पर ठीक से पोछा मार देना कि मक्खी न लगे . दयाराम ने अपने नौकर बिलुआ को कहा. एक कालेज के सामने दयाराम की एक छोटी सी चाय की दूकान या उसे रेस्टोरेंट भी कह लो, थी. बिलुआ उस रेस्टोरेंट का अकेला वेटर था. उस रेस्टोरेंट में कुछ टेबल, कुर्सी थे, शीशे के जार में कुछ बिस्किट व नमकीन रखे रहते थे, पकौड़ी, समोसा और टिकिया दयाराम खुद ही बनाता था. रेस्टोरेंट के पीछे ही एक टिनशेड में दयाराम का छोटा सा परिवार भी रहता था. कालेज के लड़के/ लड़कियां अक्सर इस दूकान पर खाली समय में बैठे रहते. दयाराम की अच्छी बिक्री हो जाया करती थी.
एक दिन की बात एक लड़का चाय पीने के बाद अपना बैग तो अपने साथ ले गया लेकिन हिन्दी की एक पुस्तक वहीं टेबल पर भूल गया . थोड़ी देर बाद वह अपनी पुस्तक लेने लौटा तो देखा कि बिलुआ उस पुस्तक को बड़े ध्यान से पढ़ रहा था. बिलुआ पढ़ने में इतना व्यस्त था कि वह लड़का आ कर उसके बगल में खड़ा हो गया लेकिन बिलुआ को पता ही नहीं लगा और वह किताब पढ़ता ही रहा. थोड़ी देर बाद उस लड़के ने बिलुआ से पूछा तुम कहाँ तक पढ़े हो? चौंक कर बिलुआ ने सामने देखा और खड़ा हो गया. लड़का सामने की कुर्सी पर बैठ गया और फिर वही प्रश्न दुहराया कि बिलुआ तुम कहाँ तक पढ़े हो? बिलुआ ने कहा साहब क्या करेंगे जान कर. लड़के ने कहा कुछ करना नहीं है फिर भी बताओ. बिलुआ ने कहा कक्षा सात तक हम पढ़े हैं. फिर आगे क्यों नहीं पढ़े? लड़के ने पूछा . पैसा नहीं था साहब और घर में एक दिन बाबू जी से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और, फिर बाबू जी ने बहुत मारा और घर से निकाल दिया . तो हम भाग कर यहाँ चले आयें, पेट पालने के लिए कोई नौकरी खोजने लगे. एक दिन मुझे यहाँ पर नौकरी मिल गया. यहाँ पर दोनों समय खाना मिल जाता है, और यहीं रहने का ठिकाना भी मिल गया, फिर मुझे और क्या चाहिए ! यहीं रह गए. पढ़ने की इच्छा है क्या? उस लड़के ने आगे पूछा. साहब इच्छा से क्या होता है! अब तो यही काम करते हुए जिन्दगी ऐसे ही काटनी है! बिलुआ ने कहा .
लड़का, जिसका नाम अखिल था और वह कक्षा ग्यारह में पढ़ता था, और वह उसी कालेज के प्रधानाचार्य का बेटा था. घर लौटने पर अखिल ने अपनी माँ से बिलुआ के बारे में बताया और माँ से पूछा कि मम्मी बिलुआ क्या आगे पढ़ सकता है? माँ ने कहा कि उसके पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वह स्कूल में पढ़ेगा तो चाय की दुकान पर नौकरी वह नहीं कर पायेगा, तो उसे पैसा कौन देगा? हमेशा तो कोई सहायता करेगा नहीं. अखिल ने कहा कि बात तो सही है . फिर अखिल की माँ ने आगे कहा कि बहुत हो सकता है तो हम उसे किताब व कापी दिला सकते हैं. दूसरी बात, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह यह कि उसकी स्वयं की पढ़ने की इच्छा है कि नहीं! जबरदस्ती किसी की सहायता करना नहीं. अखिल को माॅं की बात समझ में आ गयी और वह आगे कुछ नहीं बोला.
लगभग एक सप्ताह के बाद अखिल दयाराम की चाय के दूकान पर अपने दोस्तों के साथ पहुँचा. बिलुआ ने सामने पानी का गिलास रखा और पूछा कि साहब क्या खायेंगे? अखिल ने कहा कि पहले चार चाय ले आओ. जब बिलुआ चाय रख कर चला गया तो चाय पीने के बाद अखिल ने बिलुआ को बुलाया और पूछा कि बिलुआ एक बात बताओ कि क्या तुम पढ़ना चाहते हो . बिलुआ बोला साहब मैं पढ़ना तो चाहता हूँ, लेकिन कापी किताब के पैसे कहाँ हैं, दूसरे मैं यह नौकरी तो किसी हालत में नहीं छोड़ सकता. अखिल ने कहा कि तुम्हें नौकरी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है, मैं तुम्हें कक्षा आठ की पुरानी पुस्तकें दे दूंगा और कापी भी दे दूंगा और तुम्हें जब समय मिले, तुम पढ़ो. जब परीक्षा का समय आयेगा, तब तुम्हें मैं बताऊंगा कि आगे क्या करना है . मैं हर शनिवार को, शाम को दोस्तों के साथ यहाँ आऊंगा और तुम्हें जो समझ में न आये , तुम हम लोगों से पूछ लेना.
दूसरे दिन अखिल ने कक्षा आठ के कुछ विषयों के पुरानी किताबें और कुछ कापी बिलुआ को दिया. सामान्यतः दयाराम की दुकान शाम छ बजे के बाद बंद हो जाया करती थी, क्योंकि शाम पांच बजे के बाद कोई लड़का तो आता नहीं था. उस दिन से बिलुआ का स्वाध्याय शुरू हो गया. दयाराम रोज देखता कि बिलुआ कुछ पढ़ रहा है, लेकिन इस पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया. इधर अखिल ने अपने पिता से कह कर बिलुआ का नाम पास के ही जूनियर हाई स्कूल में कक्षा आठ में लिखवा दिया और बिलुआ से आवेदन दिलवा कर उसका फीस भी माफ़ करवा दिया. बीच – बीच में अखिल और उसके दोस्त आ कर बिलुआ को कुछ पढ़ा देते अथवा जो उसको पूछना होता, बिलुआ पूछता. यह पढ़ने- पढ़ाने का क्रम अबाध गति से चलता रहा. दयाराम समझ रहा था कि बिलुआ पढ़ रहा है, लेकिन वह सोचता कि पढ़ कर यह बेचारा क्या करेगा और इस प्रकार से कितने दिन पढ़ेगा! उसका सोचना भी अपनी जगह सही था. लेकिन भविष्य कौन जानता? यह सोच कर दयाराम चुप रहता. दयाराम की पत्नी रामदेई भी बिलुआ के पढ़ाई को रोज बड़े ध्यान से देखती थी. रामदेई को कोई संतान नहीं था, इसका उसे दुख रहता था. बहुत पूजा पाठ भी करवाई, सामर्थ्य भर डाक्टर से इलाज भी किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. एक दिन बैठे- बैठे उसके मन में विचार आया कि जब विधाता ने भाग्य में कोई संतान नहीं लिखा है तो क्यों न बिलुआ को ही संतान मान लें!
एक दिन रात में जब चाय की दुकान बंद करके दयाराम घर में आराम कर रहा था, रामदेई ने बिलुआ को संतान मानने की बात छेड़ी. दयाराम एकदम भड़क गया, बोला बिलुआ को बैठाकर खिलाऊं- पिलाऊं , फिर किसी और दूकानदार ने अधिक पैसा दिया और वह भाग गया तो! फिर जब बिलुआ को अपना संतान मान लेंगे तो दूसरा नौकर रखना पड़ेगा, तो क्या होगा! लगता था रामदेई इन सारे प्रश्नों के लिए पहले से तैयार थी . बोली देखो मैं ऐसा कुछ नहीं कह रही, लेकिन बिलुआ को पढ़ते देख मेरे मन में यह बात आयी कि आज मेरी कोई संतान होती तो क्या वह ऐसे पढ़ती! तो मैंने सोचा कि चलो बिलुआ मेरा कोई नहीं लगता, लेकिन उसे देख कर लगता है कि उसमें पढ़ने की बड़ी इच्छा है. तो क्यों न हम उसे थोड़ी पढ़ने की सुविधा दें. कल वह अगर छोड़ कर कहीं चला भी जायेगा तो कौन सा हमारा भाग्य ले जायेगा! दयाराम बोला देख रामदेई मेरे पास बहुत ज्यादा अक्ल है नहीं, इसलिए तूं सीधे – सीधे बात कर कि तुम्हारे मन में क्या है? घुमा फिरा कर बात करने की न तो मेरी आदत है और न ही मैं सुनना चाहता हूँ, सीधे अपने मन की बात कह दे.
रामदेई ने कहा कि देख मैं सीधे- सीधे बात कर रहीं हूँ. दूसरों के दिये गये पुराने किताबों और कापियों से कोई लड़का कितने दिन तक पढ़ाई करेगा, तूं ही बोल. तो उसे तूं नई किताब और कापियाँ दिला दे. बाकी वह जाने और उसका भाग्य! शायद इसी बहाने हमें कुछ पुण्य मिल जाये! दयाराम कुछ देर सोचा, फिर बोला चलो तुम्हारे कहने से इतना कर देंगे, बाकी बिलुआ का भाग्य! दूसरे दिन दयाराम बिलुआ को लेकर एक किताब की दुकान पर गया और बोला बिलुआ तुम्हें जो किताब कापी खरीदना हो ले लो. दुकानदार दयाराम और बिलुआ दोनों को पहचानता था. अचानक दयाराम का यह रुप देखकर और बिलुआ पढ़ भी सकता है, यह देखकर वह चौंक गया. खैर उसे तो किताब बेचने से मतलब था. बिलुआ ने कुछ किताबें और कापियाँ लिया. लेकिन बिलुआ मन ही मन अपने मालिक के व्यवहार में आये इस परिवर्तन को समझ नहीं पाया. दिन बीतता गया, बिलुआ का स्वाध्याय चलता रहा, अखिल और उसके दोस्तों का सहयोग बिलुआ को यथावत मिलता रहा. कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा में दयाराम ने बिलुआ को कुछ समय के लिए काम नहीं करने के लिए कह दिया. वार्षिक परीक्षा फल निकला और बिलुआ ने अच्छे नम्बर से कक्षा आठ की परिक्षा पास किया . अखिल और उसके दोस्त , और दयाराम और उसकी पत्नी रामदेई बहुत खुश हुए. बिलुआ को परिक्षा पास करने पर एक नये उत्साह का अनुभव हुआ. खैर अखिल ने उसका कक्षा नौ में प्रवेश दिला दिया और कुछ पुस्तकों और कापियों की व्यवस्था भी कर दिया और जो कुछ बाकी रह गया था, उसकी पूर्ति दयाराम ने कर दिया. बीच – बीच में दयाराम बिलुआ को स्कूल भी जाने देता कि जाओ कुछ कक्षा में भी पढ़ लो.
बिलुआ का पढ़ने का यह सिलसिला चलता रहा और दयाराम के दुकान पर उसका नौकर का काम भी यथावत चलता रहा, क्योंकि बिलुआ के लिए उसके अलावा तो कोई सहारा भी नहीं था. इधर उसको रामदेई का स्नेह भी कुछ अधिक ही मिलने लगा. बीच- बीच में कक्षा में बैठने से कक्षा के छात्र भी इसे पहचानने लगें और इसकी पढ़ने की लगन देख कर, उनमें बिलुआ के प्रति सम्मान का भाव भी उत्पन्न हो गया. कक्षा नौ भी बिलुआ ने अच्छे अंकों के साथ पास किया. जब कक्षा दस में बिलुआ ने प्रवेश लिया तो दयाराम ने कहा कि अगर चाहो तो कोई टियूशन कर लो . बिलुआ ने कहा नहीं काका मुझे टियूशन नहीं करना है, आप लोग मेरे लिए जितना कर रहे हैं, मेरे लिए वह ही बहुत अधिक है. यह तो अखिल भईया के कारण मैं पढ़ने लगा. हाईस्कूल की परिक्षा के समय दयाराम ने बिलुआ को कहा कि तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, मैं अकेले सम्भाल लूंगा. रामदेई ने भी कहा कि बिलुआ तुम दुकान की चिंता मत करो, मैं कुछ दिन दुकान देख लूंगी.
हाईस्कूल की परिक्षा में बिलुआ को अपने स्कूल में चौथा स्थान मिला. जब यह खबर स्कूल में फैली तब स्कूल के प्रबंधन ने बिलुआ को यह जानने के लिए बुलाया कि कौन लड़का है. जब स्कूल के प्रबंधन को बिलुआ के बारे में पूर्ण जानकारी मिली कि उसने किस अवस्था में पढ़ाई की है तो वे आश्चर्यचकित हो गये. प्रबंधन ने बिलुआ के इण्टर के पढ़ाई के लिए फीस माफ कर दिया और पांच सौ रुपये का मासिक स्कालरशिप भी दे दिया. इधर दयाराम बिलुआ के हाईस्कूल के परिणाम से इतना खुश हुआ कि उसने बिलुआ को कह दिया कि वह अपना पूरा ध्यान और समय आगे की पढ़ाई में लगाये और दयाराम ने दुकान के लिए एक अतिरिक्त नौकर रख लिया. लेकिन बिलुआ पढ़ाई के साथ- साथ पूरा समय निकाल कर दुकान पर पहले की तरह नौकर का काम भी करता रहा. दयाराम और रामदेई के कहने के बावजूद भी उसने नौकर का काम नहीं छोड़ा. लेकिन अब पहले की तुलना में बिलुआ स्कूल में पढ़ने में समय अधिक बिताता था. अध्यापक और साथ के छात्र उसके प्रति आदर का भाव रखते थे और वे उसका हर तरह से सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे. इण्टर की परिक्षा में बिलुआ ने जिला में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर पहला स्थान प्राप्त किया. इसके बाद फिर बिलुआ को कई संस्थानों से सहयोग व वजीफा मिलना शुरू हो गया और सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में बिलुआ का प्रवेश भी हो गया. दयाराम और रामदेई ने एक दिन बिलुआ से कहा कि आज से तुम हमारे बेटे की तरह हो और अब तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, बल्कि हमारे घर में एक सदस्य के रूप में रहोगे. बिलुआ यह सुनकर बहुत ही भावुक हो गया और बोला काका आप लोगों के अलावा मेरा इस दुनिया में है कौन ! एक अखिल भईया हैं और दूसरे आप लोग.
इस बीच अखिल ने भी एम टेक करके एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी कर लिया था, लेकिन बीच – बीच में वह बिलुआ से बात भी करता रहता था . बिलुआ ने भी समय पर बी टेक और एम टेक किया और आजकल बिलुआ रेलवे में इंजीनियर हो गया है.
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “आत्ममुग्ध… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆
लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है, क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।
सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए। न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।
ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे। उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।