हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११६ – नामालूम कारागाह… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– नामालूम कारागाह…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११६ — नामालूम कारागाह — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर : मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(150 शब्द – सीमा’ के आधार पर ‘गद्य भँवर’ का लेखन मेरा एक श्रमसाध्य प्रयोग है। अभी जो रचना मैं लिख रहा हूँ यह उसी की अगली कड़ी है। हो सकता है इसे उलझा सा मान कर सन्देहास्पद कहा जाना शुरु हो जाए। पर मैं तो यह मानने में तटस्थ रहूँगा लिखा तो मैंने अर्थ के लिए ही है।)

विद्वान सिल्वानो को सूर्योदय के वक्त अनुभूति हुई संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। अपनी इस अनुभूति ने तो उसे बहुत उद्वेलित किया। न हुआ तो भी हुआ सा हुआ, उसे लोगों को चिट्ठियाँ लिख कर पूछना पड़ा क्या किसी को उस कारागाह का पता मालूम है? उसी दिन सूर्यास्त के वक्त सिल्वानो की अनुभूति हुई उसके पास दुनिया भर से चिट्ठियाँ आई हैं जिनमें लिखा हुआ है संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। क्या तुम्हें वह कारागाह मालूम है?

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११५ – लेन – देन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– लेन – देन …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११५  — लेन – देन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

एक ध्यातव्य ग्रामीण प्रसंग है। पड़ोसी देता था और लेने वाला पड़ोसी तो लौटाता ही नहीं था। देनदार पड़ोसी कशमकश अनुभव करता था किस चितवन से वापस मांगने का साहस कर पाए। उसकी पत्नी बड़ी गंभीरता से यह सब आँकती थी। इस मामले में अपने पति की अपेक्षा वह होशियार ही थी। उसने अपने पति से बात निकाल ली अपने घर से कुछ जाने का उसे दुख तो बहुत होता है। दुख की बात हुई तो उसने पति को सुख का नुस्खा सुझाया। तुम मांगने वाला फकीर बन जाओ। बाबा दो, लेकिन वापस पाने की आशा मत करना। पत्नी से सलाह पाने पर मांगने जैसे भाव से वह चेतन हो गया। पहली बार ही मांगे जाने पर उससे कहा गया, “मिंतर, तुमसे ली हुई कुल्हाड़ी मैं वापस कर दूँगा।” वह अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे तो याद ही न था अपनी कुल्हाड़ी कभी वहाँ गई थी। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

05  — 08 — 2026

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११४ – वरदानी कलंक… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

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आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वरदानी कलंक…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११४  — वरदानी कलंक — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

इतिहास साक्षी है राजा एवं ऋषि भगवान की तपस्या करने पर अमरता का वरदान प्राप्त करते थे। पर वरदानी राजा अथवा ऋषि तो नीच अधम निकलते थे। वे भगवान को भस्म करते और स्वयं भगवान हो जाते। इतिहास और भी साक्षी है वैसे तपस्वियों को अमरता का वरदान मिलने पर भी वे मृत्यु की न टूटने वाली नींद में समाये। तभी तो युग बीते, लेकिन आज तक वरदानी अमरता का कोई प्राणी दृष्टिगत होता नहीं है। एक ऋषि हुआ उसने तपस्या से भगवानी वरदान पाया और उलटे भगवान पर टूट पड़ा। पर वह विस्मयकारी ऋषि हुआ। वह भगवान को भस्म नहीं करता। वह भगवान को अपनी परिभाषा से ललकारता। उसने शेर के जबड़ों में हाथ डाल कर भगवान से कहा मेरी अमरता दागदार न हो। पर उसकी अमरता दागदार हुई। शेर ने उसे निगल लिया। भगवान को अच्छा लगा, इस वरदानी झट्टू को भी मरना तो था ही।

 

 © श्री रामदेव धुरंधर

२६ — ०७ — २०२६

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११३ – शहरी जंगल राज… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

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आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– शहरी जंगल राज…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११३  — शहरी जंगल राज — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(शब्द सीमा : 150)

ऐसे लोग संख्या में अपरिमित होते हैं जो मात्र अपनी जाति की बढ़ोत्तरी चाहते हैं। पर सवाल यह भी है क्या ये लोग अपने उद्देश्य में सफल हो पाते हैं? ये रौंद कर जाएँ, लेकिन वापसी के क्षण में देखें अपना रौंदा हुआ तो यथावत अपनी काया में वापसी कर चुका है। रौंदे जाने की इसी रौ के बीच से मैं एक भावभीनी छोटी सी कहानी लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। गाँव के चौराहे पर तंबू लगा कर बैठे हुए लोगों ने बालक का जाति परिवर्तन किया और उसे रोटी थमा दी। उसने रोटी लिये घर आने पर अपनी अपाहिज माँ के साथ बाँट कर खाया। अगली सुबह वह रोटी की चाह में वहाँ पहुँचा तो वे लोग न हो कर एक कुत्ता बैठा हुआ था। वह तो इस कुत्ते से बातें करता था। कुत्ते ने ही उसे बताया वे लोग कहीं और तंबू लगाने चले गये। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर# १११ – असंभव तुलना… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

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आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– असंभव तुलना …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # १११ — असंभव तुलना — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वह समंदर पार भ्रमणार्थ एक सुन्दर देश गया। विद्वान एवं अध्ययनशील होने से यहाँ उसने अपने देश को मिला कर एक तुलनात्मक दृष्टि रख ली। यहाँ उसे घरों के दर्शन तो हुए। उसने ध्यान से मानो एक खास बात का अध्ययन कर लिया। यहाँ के तमाम घर प्रायः एक रंग के थे। उसने सोच बना ली यहाँ की संस्कृति के तहत ऐसा हो। पर उसे याद तो आया अपने देश में इस रंग को अपशकुन माना जाता है। स्वयं यह रंग देखने पर उसके मन में आता है यह तो अपशकुन है। पर उसने इस देश में सुबह से शुरु हुए शाम तक अपने इस तुलनात्मक अध्ययन का एक तरह से मन ही मन प्रायश्चित कर लिया। वास्तव में दुनिया की विचित्रता यही है। एक ही भगवान ने पूरी दुनिया बनायी है, लेकिन देशों के हिसाब से भगवान के प्रति मान्यता और आस्था एकदम अलग — अलग है। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

१० — ०७ — २०२६

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