☆ पुस्तक चर्चा ☆ “मेरे अपने” – स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
☆ स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल की कृति – “मेरे अपने” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया। वे एक चर्चित रचनाकार थीं । गद्य और पद्य दोनों ही में उन्होंने प्रभावी और पठनीय सृजन किया। पूर्व में लिखी गई उनकी कृति मेरे अपने पर पुस्तक समीक्षा सादर स्मरण विनम्र श्रद्धांजली सहित अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।)
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साहित्यिक क्षेत्र में पिछले दिनों सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती प्रार्थना अर्गल जी की साहित्यिक रचनाओं की एक ऐसी कृति सामने आई है जिसमें गद्य और पद्य की उनकी उत्कृष्ट और सराहनीय रचनाओं का समावेश है। ऐसी कृतियों की एक विशेषता यह होती है कि गद्य और पद्य के प्रशंसक पाठकों को अपनी पसंद की रचनाएँ पढने की सुविधा रहती है।
सुपरिचित साहित्यकार डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी की यह साहित्यिक कृति 134 रचनाओं का एक खूबसूरत गुलदस्ता है जिसमें पठनीय कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथायें, संस्मरण और चिंतन आलेख शामिल हैं।
इस कृति की शुरुआत एक कविता से की गई है जो कि मेरे बाबूजी के शीर्षक से लिखी गई पिता को विनम्र श्रद्धांजलि है। अन्य रचनाएँ विभिन्न विधाओं पर आधारित हैं। इन कविताओं में मां नर्मदे को लेकर रक्षाबंधन, बसंती मौसम, अंजनि पुत्र, बगीचा , तिरंगा, प्रकृति, मोबाईल, नये वर्ष का स्वागत, प्यार का इज़हार, चांद, नारी, आशीर्वाद सुख दुःख, लेखनी, राजा रानी, मधुर स्मृतियाँ, माँ जैसे शीर्षक से अनेक प्रभावी और भावनात्मक कविताएँ सम्मिलित हैं।
इस महत्वपूर्ण पुस्तक में सामाजिक स्थितियों पर केन्द्रित अनेक लघु कथायें भी पाठकों को पढ़ने को मिल सकती हैं। अतिथि, क्या वो दिन थे, आशीर्वाद, जहर, पन्ना, दानवीर जैसी लघु कथायें भी पाठक वर्ग उत्सुकता और रोचकता के साथ पढ़ेगा। कृति में बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, शांति धाम, व्यवस्था जैसे शीर्षक के साथ अनेक चिंतन परक सारगर्भित लेख हैं जिसे पढ़ कर पाठक जरूर कुछ नया सोचने को बाध्य होगा।
कृति में नल जैसे विषय पर संस्मरण भी पठनीय है। अतिथि संतुष्ट हो जायेगा जैसे विषय पर लोगों को पढ़ने के लिए रोचक कहानी भी शामिल है।
आदरणीया प्रार्थना जी ने इस कृति में समाज और साहित्य के प्रेरक व्यक्तित्व को भी सस्नेह सम्मिलित किया है। गीत पराग की प्रधान संपादक डा गीता गीत पर केन्द्रित उनकी कविता भी सराहनीय है।
कृति के प्रारंभ में आदरणीया श्रीमती साधना उपाध्याय, श्रीमती अर्चना मलैया, श्रीमती निर्मला तिवारी, श्रीमती अलका मधुसूदन पटैल और श्री विजय नेमा अनुज जैसे उत्कृष्ट साहित्य साधकों ने अपनी मंगलकामनायें व्यक्त करते हुए प्रार्थना जी की कृति को साहित्यिक क्षेत्र की एक प्रभावी, पठनीय और प्रेरणा दायी कृति निरूपित किया है।
इस कृति के प्रारंभ में ही आदरणीया डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी ने कृति के शीर्षक मेरेे अपने के औचित्य और उसके सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए उनके सभी मेरे अपनों के प्रति आभार और आदर व्यक्त किया है जिन्होंने उन्हें इस कृति के प्रकाशन के लिए प्रोत्साहित और प्ररित किया है।
मुझे भी विश्वास है कि साहित्यिक क्षेत्र में भी यह कृति पठनीय और लोकप्रिय सिध्द होगी।
☆ “पार्थसूत्र” — लेखक : श्री वैभव केळकर आणि डॉ. मेघना दलाल ☆ परिचय – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆
पुस्तक : पार्थसूत्र
लेखक – वैभव केळकर
सहलेखिका – डॉ. मेघना दलाल
प्रकाशक- मधुर राजीव बर्वे.. दिलीप राज प्रकाशन.
मूल्य – रुपये ३००
“पार्थ सूत्र” अर्जुनाच्या जीवन यात्रेवरील एक प्रेरणादायी गाथा आहे महाभारत या महाकाव्याचा आधार घेत हे पुस्तक प्राचीन तत्त्वज्ञान आणि आधुनिक दृष्टिकोन यांची सांगड घालत लेखक द्वय वाचकांना अर्जुनाचे आयुष्य उलगडून दाखवतात.
साधारणपणे 200 पानांचे हे पुस्तक महाभारतातील माहित असलेल्या गोष्टी पार्थ म्हणजे अर्जुनाच्या दृष्टिकोनातून आपल्याला सांगते.
एकूण 23 कथनातून हे महाभारत आपल्यापुढे उभे केले आहे. ‘,
शून्य प्रहरी’ या सुरुवातीच्या लेखातच अर्जुन आपला नातू परीक्षित याला सांगतो की, “थांबण्याची वेळ ज्याची त्यालाच ओळखता आली पाहिजे.. “सर्व पांडव द्रौपदीसह वानप्रस्थाला निघाले आहेत आणि अर्जुनाचे मन भूतकाळाच्या विहिरीत डोकावले आहे, जिथे उमटते चित्र ते पांडवांचे! ज्यांची विटी विहिरीत पडली आहे आणि ती काढून देण्यासाठी त्यांना एका तेजःपुंज ऋषीची मदत मिळत आहे.. ते प्रत्यक्ष द्रोणाचार्य त्यांचे गुरु झाले! भीष्माचार्य हे पितामह! पांडवांना असे गुरु आणि पितामह मिळाले हे त्यांचे भाग्यच! त्यांनी कौरव- पांडवांना ज्या गोष्टी सांगितल्या, त्यातून अर्जुनाचे भावविश्व समृद्ध होत होते. त्यांच्यामध्ये शिस्त आणि प्रेम यांचा संगम तेव्हा राहिला होता..
अर्जुन एक विशिष्ट उद्देश घेऊन जगला. जे करायचं ते स्थिर बुद्धीने करत होता. जिथे शंका येईल तिथे श्रीकृष्णाची त्याला साथ होती. अर्जुन मूल्यांनी प्रेरित असा होता. या पुस्तकात अर्जुनाच्या वैयक्तिक संघर्षांचे आणि कठीण प्रसंगातील त्याच्या विचार प्रक्रियेचे उत्कृष्ट चित्रण केलेले आहे.
अर्जुनाचा काळ आणि सद्य परिस्थिती याची सांगड घालत लेखकांनी या पुस्तकातील लेखन केलेले आहे. अर्जुनाने केलेली प्रत्येक गोष्ट काल सुसंगत अशी होती की, त्यातून आत्ताही प्रत्येकाला काही शिकण्यासारखे आहे..
एकूण 23 लेखातून महाभारतात असणारे अर्जुनाचे स्थान, त्याचे विचार आणि त्या त्यावेळी अर्जुन कसा वागला, यासंबंधी लेखक द्वयीने विचारपूर्वक लेखन केले आहे. बालपण, द्रौपदी स्वयंवर, एकांत वास, वनवास, विराट युद्ध, कर्ण वध असे सर्व लेख आपल्याला अर्जुनाचे महाभारताशी असलेले नाते त्याच्या तोंडून व्यक्त करून दाखवतात.. अगदी वानप्रस्थाश्रमा पर्यंतचा अर्जुनाचा जीवन प्रवास यात आपल्याला उलगडून दाखवलेला आहे.
द्रोणाचार्य, भीष्म यांच्या बद्दल अर्जुनाला असलेला आदरही येथे व्यक्त झाला आहे. द्रौपदी आणि इतर सर्व भाऊ यांच्या बद्दलचे प्रेम, कर्तव्य ही अर्जुनाने आयुष्यात सांभाळले होते. हे एक वेगळ्या प्रकारचे असे पुस्तक मला वाटले..
महाभारतातील गोष्टी आपण लहानपणापासून वाचत आलो आहोत तसेच मोठेपणी ही महाभारत अधिक सखोल त्याने वाचले आहे पण अर्जुनाच्या दृष्टिकोनातून महाभारत आणि त्याचा आधुनिक काळाशी असलेला संबंध हे अशा पद्धतीने लिहिलेले पुस्तक मात्र मी प्रथमच वाचले.
प्रत्येक लेखात अर्जुन असा वागला होता आणि आताच्या काळात येणाऱ्या संघर्षात अर्जुन कसा वागला असता यासाठी होणारे वैचारिक मार्गदर्शन या पुस्तकात वाचायला मिळते. आपण प्रत्येक जण अर्जुनच असतो, की ज्याला वेगवेगळ्या प्रसंगांना तोंड द्यावे लागते.
अधून मधून प्रसंगाला अनुसरून काव्य लेखन ही या पुस्तकात केलेले आहे. दर्शन वृत्ती, जिज्ञासा वृत्ती, स्वामित्व वृत्ती, संघ वृत्ती, रचना वृत्ती, युद्ध प्रवृत्ती, पलायन वृत्ती अशा विविध गोष्टी जशा पितामहांनी सांगितल्या त्यातून पार्थला मिळालेले शिक्षण हे आजच्या काळातही उपयुक्त आहे. इंद्रप्रस्थ नगरी उभारली तेव्हा राज्य कसे असावे? प्रजेसाठी काय काय करावे? तसेच सर्वांना शांत सुखी व समृद्ध जीवन देण्यासाठी राज्यकर्त्यांनी कसे वागावे? अशा बऱ्याच गोष्टींचा अर्जुनाने कसा विचार केला असेल याचे मनोज्ञ दर्शन या लेखक द्वयीने केले आहे.
एकंदरच पुस्तक वाचनीय वाटले आणि महाभारतातील मुख्य नायक पार्थ म्हणजेच अर्जुन याच्या विचाराचा मागोवा घेऊन त्यातून आपल्याला आत्ताच्या काळातही उपयुक्त असे काही ज्ञान मिळते हे विशेष!
“पार्थसूत्र” या पुस्तकामध्ये मला जे आवडले ते मी येथे लिहिले आहे. एकंदरच महाभारताविषयी आपल्याला आपुलकी वाटते आणि मानवी आयुष्य आणि त्यात घडणाऱ्या घटना ह्या पुरातन काळापासून तशाच आहेत. म्हणूनच म्हंटले जाते की महाभारतात जे आहे ते सर्वत्र आहे! आणि ते कालातीत आहे..
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९८ ☆
☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – “व्यंग्य का मनोविज्ञान”
लेखक – डॉ संजीव कुमार
प्रकाशक – इंडिया नेटबुक्स, नोएडा
एक सर्वथा नए अनछुए विषय पर और विश्वसनीय कृति के रूप में डा संजीव कुमार की नई किताब “व्यंग्य का मनोविज्ञान”लिखी गई है। व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा न मानकर उसे मनुष्य और समाज के अंतर्मन से जोड़कर देखती यह पुस्तक व्यंग्य को हँसी का साधन नहीं बल्कि सामाजिक आत्मावलोकन और मनोवैज्ञानिक फीडबैक मैकेनिज्म के रूप में स्थापित करती है ।
पुस्तक की संरचना पहचानने योग्य अकादमिक अनुशासन के साथ रची गई है। भूमिका के बाद आरम्भिक अध्यायों में लेखक ने व्यंग्य का स्वरूप उसकी परिभाषा और उसके मूल तत्त्वों जैसे विडंबना अतिशयोक्ति प्रतीक न्यूनोक्ति उपहास और व्यंग्यात्मक भाषा का विस्तार से विवेचन किया है।
व्यंग्य को वह ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं जो किसी व्यक्ति विचार संस्था या समूचे समाज पर प्रहार करती हुई भी मूलतः सामाजिक सुधार की दिशा में उकसाने का काम करती है।
इस दृष्टि से व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना का सक्रिय माध्यम बन जाता है जो मनोरंजन के परदे के पीछे छिपे असुविधाजनक सत्य को पाठक के सामने लाता है।
ग्रंथ का दूसरा बड़ा आयाम व्यंग्यकार के मनोविश्लेषण से जुड़ा है। डॉ संजीव कुमार व्यंग्यकार की एक मानसिक संरचना की रूपरेखा खींचते हैं जिसमें समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता भीतर जमा असंतोष नैतिक आग्रह विद्रोही वृत्ति हास्यबुद्धि और न्याय बोध ये सभी तत्व सम्मिलित हैं। यही कारण है कि अपनी अनुभूति के अनुरूप हर व्यंग्यकार एक ही विषय पर अलग अलग तरह से व्यंग्य लिखता है।
व्यंग्यकार केवल चुटकुला रचयिता नहीं बल्कि एक सजग और विश्लेषक व्यक्तित्व है जो सत्ता संरचनाओं रूढ़ मान्यताओं और ढोंग के साथ स्वयं अपनी कमजोरियों तक को व्यंग्य के दायरे में रखता है।
व्यंग्यकार की इस आत्म समावेशी दृष्टि को लेखक व्यंग्य का एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक गुण मानते हैं जो उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाता है।
एक अलग खण्ड में संजीव जी व्यंग्य और पाठक के मनोविज्ञान के संबंध पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनके अनुसार व्यंग्य पाठक या दर्शक में एक साथ तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है पहली हँसी और मनोरंजन जो भावनात्मक तनाव को ढीला करते हैं दूसरी अपराध बोध और आत्म चिंतन जो व्यक्ति को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करते हैं और तीसरी परिवर्तन की आकांक्षा जो समाज के स्तर पर प्रतिरोध प्रश्नाकुलता और सुधार की इच्छा को जन्म देती है।
इस त्रिस्तरीय प्रभाव के कारण व्यंग्य उनकी दृष्टि में बड़ी ताकत से अपनी भूमिका निभाता है।
पुस्तक की एक विशेष शक्ति यह है कि व्यंग्य को वह अलग थलग साहित्यिक कोष्ठक में नहीं रखते बल्कि उसे सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं के बीच रखकर पढ़ते हैं। धर्म परम्परा जाति वर्ग आर्थिक असमानताएँ और पितृसत्ता इन सबके साथ व्यंग्य का जटिल संबंध लेखक की निगाह से छूटा नहीं है।वे दिखाते हैं कि कैसे संस्कार रीति रिवाज पारिवारिक ढाँचे लैंगिक भूमिकाएँ और भाषिक परिस्थितियाँ व्यंग्य की दिशा और लक्ष्य तय करती हैं और इसके उलट व्यंग्य इन संरचनाओं की कमजोर कड़ियों पर चोट करके नए प्रश्न और नई दृष्टि निर्मित करता है।
इस द्वंद्वात्मक पाठ के कारण पुस्तक केवल थ्योरी ऑफ सैटायर नहीं रह जाती बल्कि सोशल साइकोलॉजी ऑफ सैटायर का रूप ले लेती है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य में लेखक विशेष रूप से डिजिटल युग के व्यंग्य पर लिखते हैं। सोशल मीडिया मीम संस्कृति स्टैंड अप कॉमेडी और ऑनलाइन कार्टूनों की तेज़ी से बदलती दुनिया के बीच व्यंग्य का स्वर गति और पहुँच किस प्रकार बदल गई है यह पुस्तक का एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेखक मानते हैं कि इन माध्यमों ने व्यंग्य को जनतांत्रिक और त्वरित जरूर बनाया है लेकिन साथ साथ इसने सतहीपन ट्रोलिंग समूह घृणा और नैतिक असंवेदनशीलता जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ाई हैं।
वे जिम्मेदार व्यंग्य के पक्ष में खड़े होकर यह ज़रूरत रेखांकित करते हैं कि हास्य और आलोचना दोनों के प्रयोग में मानवीय गरिमा संवेदनशीलता और निष्पक्षता के मूल्यों को न छोड़ा जाए।
पुस्तक का एक पूरा खण्ड व्यंग्य और नैतिकता के बीच नाज़ुक संतुलन पर केंद्रित है। यहाँ लेखक व्यंग्यकार के नैतिक दायित्वों की सूची तैयार करते हुए उसे सत्यनिष्ठ संवेदनशील निष्पक्ष और सुधारोन्मुख रहने की सलाह देते हैं। व्यंग्य के प्रहार का लक्ष्य व्यक्ति की गरिमा नहीं उसके असंगत आचरण और शोषक भूमिका हो यह पुस्तक बार बार स्पष्ट करती है।व्यंग्यकार को वे आक्रामक मनोरंजनकर्ता नहीं बल्कि उत्तरदायी सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखने का आग्रह करते हैं जो हास्य का सहारा लेकर भी अंततः न्याय समानता और मानवीयता की तरफ खड़ा होता है।
लेखन शैली की दृष्टि से पुस्तक मानक हिन्दी में लिखी गई है जिसमें अकादमिक अनुशासन के साथ साथ उदाहरणों और उपमानों का संयमित प्रयोग है। भाषा प्रभावी और स्पष्ट है । यह ग्रंथ सामान्य मनोरंजक पाठ से अधिक शोधार्थियों अध्यापकों तथा गंभीर लेखकों पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। विषय सूची से लेकर अंतिम अध्याय तक एक क्रमबद्धता बनी रहती है पहले व्यंग्य की परिभाषा और स्वरूप फिर व्यंग्यकार की मानसिकता उसके बाद पाठक समाज पर प्रभाव और अंत में डिजिटल युग नैतिकता तथा भविष्य की चुनौतियाँ यह क्रमिक विन्यास अध्ययन को सुगठित बनाता है।
पुस्तक में कुछ संभावित सीमाएँ भी संकेतित की जा सकती हैं। विश्लेषण का जोर लगभग पूरा सैद्धांतिक विमर्श पर है यदि समकालीन हिन्दी व्यंग्य कृतियों के अधिक विशिष्ट और विस्तृत पाठ विश्लेषण उदाहरण और उद्धरण यहाँ जोड़े जाते तो यह पुस्तक पाठ्य स्तर पर और भी प्रभावी हो सकती थी।
इसी तरह लेखक मनोविज्ञान की अवधारणाओं का व्याख्यात्मक उपयोग करते हैं । प्रयोगात्मक या क्षेत्रीय अध्ययन पाठक सर्वे या केस स्टडी जैसी अनुसंधान विधियाँ जोड़ी जा सकती हैं । अभी यह मनोविज्ञान की व्याख्यात्मक शाखा पर ही अधिक आश्रित किताब बन गई है।
व्यंग्य का मनोविज्ञान हिन्दी व्यंग्य चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक ग्रंथ की तरह अपनी तरह की पहली किताब है। यह व्यंग्य को हँसी आलोचना मनोविज्ञान समाजशास्त्र और नैतिक दर्शन के संगम बिन्दु पर रखकर प्रस्तुत करती है ।
व्यंग्य लिखने वाले रचनाकारों के लिए यह पुस्तक अपने शिल्प और अपनी जिम्मेदारी को समझने का मार्गदर्शक बन सकती है आलोचकों और शोधार्थियों के लिए यह एक ठोस सैद्धांतिक आधार और गंभीर पाठकों के लिए व्यंग्य पठन के नए कोण खोलने वाला पाठ है।
यह कृति केवल व्यंग्य का मनोविज्ञान नहीं बल्कि व्यंग्य की समग्र मानसिक सामाजिक और नैतिक संरचना का सुविचारित मानचित्र प्रस्तुत करती है । हिन्दी साहित्य में दीर्घकालीन संदर्भ ग्रंथ बनने की क्षमता रखती है।
(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)
☆ पुस्तक चर्चा 👟शू डॉग 👟SHOE DOG ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
👟शू डॉग 👟SHOE DOG
जब व्यापार एक अर्थपूर्ण दौड़ बन जाता है 👟
कुछ आत्मकथाएँ हम प्रशंसा के भाव से पढ़ते हैं। कुछ जिज्ञासा से। और कुछ विरल पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें हम पढ़ते नहीं, जीते हैं — धड़कन दर धड़कन, संशय दर संशय।
मेरे लिए शू डॉग ऐसी ही पुस्तक रही।
मैं आत्मकथाएँ पढ़ना बहुत पसन्द करता हूँ। वे हमें किसी मनुष्य के भीतर बैठकर उसकी सफलताओं ही नहीं, उसकी शंकाओं और असफलताओं को भी सुनने का अवसर देती हैं। पर यह संस्मरण कुछ अलग है। यह किसी शिखर पर खड़े विजेता का चमकदार भाषण नहीं है; यह उस व्यक्ति की आत्मस्वीकृति है जिसने यात्रा के हर मोड़ पर भय, अव्यवस्था और असुरक्षा को महसूस किया।
इसीलिए यह पुस्तक स्मृति में बस जाती है।
बिना कवच की कहानी 👟
अक्सर उद्यमियों की कथाएँ पढ़ते समय लगता है मानो सफलता उनके लिए नियति थी। पर इस संस्मरण में Phil Knight उस मिथक को तोड़ देते हैं।
यह यात्रा सुघड़ और सुव्यवस्थित नहीं है। यह उलझनों से भरी है, जोखिमों से लदी हुई है। बार-बार धन की कमी, बैंक की चेतावनियाँ, माल की आपूर्ति में अड़चनें, प्रतिस्पर्धा का दबाव — सब कुछ जैसे एक साथ सिर पर टूट पड़ता है।
फिर भी, वर्णन में कहीं भी अहंकार नहीं है। कोई आत्मप्रशंसा नहीं।
इसके विपरीत, एक ईमानदार स्वीकार है — डर का, असुरक्षा का, असफलताओं का। वे बताते हैं कि कितनी बार लगा सब कुछ हाथ से निकल जाएगा। कितनी रातें ऐसी बीतीं जब वेतन देने का भी भरोसा नहीं था।
आज के समय में, जब लोग अपनी अजेय छवि गढ़ने में लगे रहते हैं, यह सादगी चकित करती है।
केवल जूते नहीं, रिश्ते भी 👟
यह पुस्तक Nike की स्थापना की कथा अवश्य है, पर उससे कहीं अधिक है। यह एक ऐसे ‘शू डॉग’ की कहानी है जिसे दौड़ से प्रेम था — खिलाड़ियों के पैरों की थाप से, उनके परिश्रम से, उनकी लगन से।
खेल उनके लिए केवल व्यवसाय नहीं था, एक साधना था।
पर उससे भी अधिक मार्मिक है परिवार और सहकर्मियों के प्रति उनका स्नेह।
प्रारम्भिक टीम किसी कम्पनी के कर्मचारी नहीं, बल्कि एक स्वप्न के सहयात्री लगते हैं। उनमें कमियाँ भी हैं, सनक भी है, पर एक गहरा विश्वास भी है।
पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि यह कहानी लाभ और हानि से अधिक, भरोसे और साथ की है।
धन नहीं, अर्थ की तलाश 👟
मुझे सबसे अधिक जिस बात ने छुआ, वह यह कि उनका स्वप्न धन अर्जित करना नहीं था।
वे लिखते हैं कि वे दुनिया पर कोई छाप छोड़ना चाहते थे। वे जीतना चाहते थे — या शायद केवल हारना नहीं चाहते थे। और जब वे दौड़ते थे, जब फेफड़े फैलते थे और पेड़ हरे धुँधले आकार में बदल जाते थे, तब उन्हें जीवन का स्वरूप दिखता था — खेलना।
“खेल” — यह शब्द इस पुस्तक की आत्मा है।
यह हमें याद दिलाता है कि जीवन का सर्वोत्तम रूप वही है जिसमें हम पूरी तन्मयता से लगे हों। जहाँ काम बोझ नहीं, गति हो। जहाँ संघर्ष भी जीवंतता का प्रमाण हो।
शायद यही एकमात्र सलाह 👟
1962 की एक सुबह उन्होंने स्वयं से कहा —
लोग तुम्हारे विचार को पागलपन कहें, कहने दो। बस चलते रहो। रुकना मत। यह भी मत सोचो कि ‘वहाँ’ कहाँ है। जो भी हो, चलते रहो।
मुझे लगता है, यही वह सलाह है जो हम सबको चाहिए।
हम अक्सर मंज़िल को लेकर इतने व्यस्त रहते हैं कि यात्रा भूल जाते हैं। हम ‘वहाँ’ की परिभाषा तय करने में ही थक जाते हैं। पर सच्ची परीक्षा तो निरन्तर चलते रहने में है — जब रास्ता धुँधला हो, जब संसाधन कम हों, जब लोग आशंका से भरी नज़रें डालें।
चलते रहो।
अहंकार से नहीं, धैर्य से।
अंधी जिद से नहीं, आस्था से।
एक-एक क़दम।
अन्ततः विजय क्या है? 👟
अन्तिम पृष्ठ पर पहुँचकर मुझे लगा कि मैंने किसी ब्राण्ड की सफलता नहीं पढ़ी, बल्कि एक युवा की जिद पढ़ी है — जो तब तक दौड़ता रहा जब तक उसकी साँस और संकल्प साथ रहे।
शायद जीवन भी यही है।
हमें सम्पूर्ण स्पष्टता नहीं चाहिए।
हमें सबकी स्वीकृति नहीं चाहिए।
हमें केवल अगला क़दम उठाने का साहस चाहिए।
फिर अगला।
फिर अगला।
इसी तरह एक ‘शू डॉग’ ने अपनी पहचान बनाई।
और शायद इसी तरह हम भी अपने जीवन की पगडंडी पर कोई अर्थपूर्ण निशान छोड़ सकते हैं। 👟
☆ पुस्तक चर्चा ☆ प्रेयसी (काव्य-संग्रह) – डा. विजेन्द्र उपाध्याय ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
☆ डा. विजेन्द्र उपाध्याय की काव्य कृति – “प्रेयसी” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
काव्य में श्रृंगार को रसराज कहा गया है। रसोद्रेक में श्रृंगार की सत्ता सर्वोपरि है और इसी श्रृंगार को लेकर हिन्दी के चर्चित कवि डा . विजेन्द्र उपाध्याय की काव्य कृति प्रेयसी ने पिछले दिनों पाठकों के बीच अपनी पठनीयता और लोकप्रियता दोनों ही सिद्ध की है ।काव्य संग्रह प्रेयसी मध्य राज्य विद्युत मंडल के विधि अधिकारी एवं जबलपुर के गुप्तेश्वर क्षेत्र के निवासी डॉ. विजेंद्र उपाध्याय का स्वयं के द्वारा अनुभूत एवं उनकी लेखनी से निसरित श्रंगारिक कविताओं का एक मनभावन काव्य गुलदस्ता है,जिसमें उन्होंने अपने जीवन में अनुभूत अनुरागात्मक पलों को काव्य में तब्दील करके सुंदर शब्द विन्यास प्रदान किया है और प्रेयसी के रूप में काव्य रसिकों के समक्ष परोसा है ।इसी रस का आश्रय लेकर डॉ. विजेंद्र उपाध्याय जी ने अपनी रागात्मक एवं प्रणयधर्मी अनुभूतियों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देकर संस्कारधानी जबलपुर के कवि समाज में सृजनात्मक संभावनाओं के साथ विश्वसनीय उपस्थिति दर्ज कराई है ।आपकी यह प्रथम गीत कृति प्रेयसी यद्यपि विविध वर्णी रचनाओं का संकलन है।जिसमें गीत, गजल, दोहे छणिकाऐं एवं मुक्त छंद की शैली में शिल्पित रचनाएं सम्मिलित है। कुछ रचनाओं को छोड़कर शेष सभी रचनाएं कवि ने अपनी प्रेयसी को संबोधित करते हुए लिखी है। जिसमें कवि की रागात्मकता स्वकीयक एवं परकीयक बोध से परे है ।यह सीमा रेखा स्वयं पर और पत्नी पर किए गए कटाक्ष परक हास्य गीत में ही दिखाई देती है।अन्यथा पूरी रचनाएं तमाम प्रियाओं को ही अभिप्रेय हैं ।
इस संकलन में प्राय: रचनाओं में कवि ने अंतर्मन की कोमल भावनाओं और अनुभूतियों को अत्यंत सहज निश्छल एवं रंजकत्व के साथ प्रगट किया है। कवि श्री विजेंद्र उपाध्याय ने अपनी प्रेयसी को सदैव स्नेह और करुणा की मूर्ति के रूप में देखा है। जिस प्रकार संसार के सभी सुखों की प्राप्ति का वे अनुभव करते हैं, वह सब एक प्रेयस को अपनी प्रेयसी के अक्ष में दिखता है।यथा–
स्नेहावरदा,नेहदा, स्नेहसिक्त, स्वस्नेहिल,
स्नेह करुणा की प्रमूर्ति,तुम मेरी एक मात्र मंजिल ।
मीन अक्षों से सुशोभित, मोदमय सौगात प्रेमिल,
तुमको पाकर दो जहां के, सर्व सुख सौभाग्य हासिल ।
अपनी प्रेयसी को पाने की तड़पन जब प्रयासों की पराकाष्ठा तक पहुंच जाती है और मिलने पर उसकी ओर से उपेक्षा भाव देखने मिलता है,तब कवि बरबस उपालंभ सहित कह उठता है–
मिले थे बाद महीना के आज रस्ते में,
फिर एक बार मुझे मुड़ के देख तो लेते।
हजार जख्म मेरे दिल के भर गए होते,
गर एक पल के लिए मुड़ के देख तो लेते ।
प्रिया के रूठने में भी एक सुखानुभूति होती है । कवि उन मान-मनौअल के मोहक क्षणों को भला कैसे भूल सकता है। पंच-सितारा संस्कृति के रसग्य उपभोक्ता भी तथाकथित प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाकर सनातन सत्य को नकारने का विभ्रम पाले हुए हैं किंतु जब तक मानव के हृदय में रागात्मकता जीवित है तब तक श्रृंगार प्रधान रचनाएं सृष्टि की प्रकृति प्रदत्त सुषमा का जय घोष करती रहेंगी।इस संग्रह की सभी रचनाओं का मूल स्वर प्रेम ही है।
किंतु खजुराहो की ऐतिहासिक पाषाण शिल्पों के परिपेक्ष में कवि की दार्शनिक सोच परिपक्वता के साथ मुखरित हुई है जिन्हें देखकर कवि के श्रेष्ठ साजन की संभावनाओं की आश्वस्ती मिलती है ।मैं कविवर श्री विजेंद्र उपाध्याय के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें इस कृति के लिए बधाई देता हूं एवं शुभकामनाएं प्रेषित करता ह।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ “सड़क पर (नवगीत संग्रह)” – रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत‘☆
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कृति : सड़क पर (नवगीत संग्रह)
रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
प्रकाशन: समन्वय प्रकाशन अभियान
प्रथम संस्करण: वर्ष २०१८
मूल्य: २५०/-
पृष्ठ: ९६
आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
☆ समीक्षा: आश्वस्त करता नवगीत संग्रह ‘सड़क पर‘ – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत‘ ☆
मुझे नवगीत के नाम से भय लगने लगा है। एक वर्ष पूर्व ५० नवगीत लिखे। नवगीतकार श्री मधुकर अष्ठाना जो हमें वर्षों से जानते हैं, ने कई महीनों तक रखने के पश्चात् ज्यों का त्यों हमें मूल रूप में लौटते हुए कहा कि गीत के हिसाब से सभी रचनाएँ ठीक हैं किंतु ‘नवगीत’ में तो कुछ न कुछ ‘नया’ होना ही चाहिए। हमने उनके डॉ. सुरेश और राजेंद्र वर्मा के नवगीत सुने हैं। अपने नवगीतों में जहाँ नवीनता का भाव आया, हमने प्रयोग भी किया जो अन्य सब के नवगीतों जैसा ही लगा लेकिन आज तक वह ‘आँव’ शब्द समझ न आया जो मधुकर जी चाहते थे। थक-हार कर हमने साफ़-साफ़ मधुकर जी की बात कह दी डॉ. सुरेश गीतकार से जिन्होंने कहा कि शांत जी! आप चिंता न करें, हमने नवगीत देखे हैं, बहुत सुंदर हैं लेकिन हम इधर कुछ अस्त-व्यस्त हैं, फिर भी शीघ्र ही आपको बुलाकर नवगीत संग्रह दे देंगे। आज ४ माह हो चुके हैं, अब हम बगैर उनकी प्रतिक्रिया लिए अपना संग्रह वापस ले लेंगे।
यह सब सोचकर ‘सड़क पर’ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में हाथ काँप रहा है। तारीफ में कुछ लिखा तो लोग कहेंगे ये ग़ज़ल, दोहे, मुक्तक, छंद और लोकगीत का कवि, नवगीत के विषय में क्या जाने? तारीफ पर तारीफ जबरदस्ती किए जा रहा है। यदि कहीं टिप्पणी या आलोचनात्मक बात कह दी तो यही नवगीत के तथाकथित आचार्य हमें यह कहकर चुप करा देंगे कि जो नवगीत प्रशंसा के सर्वथा योग्य था, उसी की यह आलोचना? आखिर है तो ग़ज़ल और लोकगीतवाला, नवगीत क्या समझेगा? हमें सिर्फ यह सोचकर बताया जाए कि कि नवगीत लिखनेवाले कवि क्या यह सोचकर नवगीत लिखते हैं कि इन्हें सिर्फ वही समझ सकता है जो ‘नवगीत’ का अर्थ समझता हो?
हम एक पाठक के नाते अपनी बात कहेंगे जरूर….
सर्वप्रथम सलिल जी प्रथम नवगीत संग्रह “काल है संक्रांति का” पर निकष के रूप में निम्न साहित्यकारों की निष्पक्ष टिप्पणी हेतु अभिवादन।
* श्री डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, जबलपुर का यह कथन वस्तुत: सत्य प्रतीत होता है –
१. कि मुचुकुन्द की तरह शताब्दियों से सोये हुए लोगों को जगाने के लिए शंखनाद की आवश्यकता होती है और
‘सलिल’ की कविता इसी शंखनाद की प्रतिध्वनि है।
बस एक ही कशिश, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने जो जबलपुर के एक भाषा शास्त्री, व्याख्याता हैं ने अपनी प्रतिक्रिया में “काल है संक्रांति का” सभी गीतों को सहज गीत के रूप में ही देखा है। ‘नवगीत’ का नाम लेना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।
* श्री (अब स्व.) चन्द्रसेन विराट जो विख्यात कवि एवं गज़लकार के रूप में साहित्य जगत में अच्छे-खासे चर्चित रहे हैं। इंदौर से सटीक टिप्पणी करते दिखाई देते हैं- ” श्री सलिल जी की यह पाँचवी कृति विशुद्ध ‘नवगीत’ संग्रह है। आचार्य संजीव ‘सलिल’ जी ने गीत रचना को हर बार ‘नएपन’ से मंडित करने की कोशिश की है। श्री विराट जी अपने कथन की पुष्टि आगे इस वाक्य के साथ पूरी करते हैं- ‘छंद व कहन’ का नयापन उन्हें सलिल जी के नवगीत संग्रह में स्पष्ट दिखाई देना बताता है कि यह टिप्पणी नवगीतकार की न होकर किसी मँजे हुए कवि एवं शायर की है – जो ‘सलिल’ के कर्तृत्व से अधिक विराट के व्यक्तित्व को मुखर करता है।
* श्री रामदेवलाल ‘विभोर’ न केवल ग़ज़ल और घनाक्षरी के आचार्य हैं बल्कि संपूर्ण हिंदुस्तान में उन्हें समीक्षक के रूप में जाना जाता है- ” कृति के गीतों में नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व परंपरा की दृष्टि से लक्षण-व्यंजना शब्द शक्तियों का वैभव भरा है। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि बहुत से गीत नए लहजे में नव्य-दृष्टि के पोषक हैं। यही उपलब्धि उपलब्धि आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ को नवगीतकारों की श्रेणी में खड़ा करने हेतु पर्याप्त है।
* डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई बड़ी साफगोई के साथ रेखांकित कर देते हैं कि भाई ‘सलिल’ के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है “काल है संक्रांति का” कृति। नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना ‘सलिल’ जी को नवगीतकार मानने हेतु विवश करती है। कृति के सभी नवगीत एक से एक बढ़कर सुंदर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। वे एक सुधी समीक्षक, श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ साहित्यकार हैं लेकिन गीत और नवगीतों दोनों का जिक्र वे करते हैं- पाठकों को सोचने पर विवश करता है।
* शेष समीक्षाकारों में लखनऊ के इंजी. संतोष कुमार माथुर, राजेंद्र वर्मा, डॉ. श्याम गुप्ता तथा इंजी. अमरनाथ जी ने ‘गीत-नवग़ीत, तथा गीत-अगीत-नवगीत संग्रह कहकर समस्त भ्रम तोड़ दिए।
* इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार समीक्षक जबलपुर ने अपनी कलम तोड़कर रख दी यह कहकर कि ‘सलिल’ जैसे नवगीतकार ही हैं जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के गीतों/नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है।
अंत में “सड़क पर”, आचार्य संजीव ‘सलिल’ की नवीनतम पुस्तक की समीक्षा उस साहित्यकार-समीक्षक के माध्यम से जिसने विगत दो दशकों तक नवगीत और तीन दशकों से मधुर लयबद्ध गीत सुने तथा विगत दस माह से नवगीत कहे जिन्हें लखनऊ के नवगीतकार नवगीत इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह पारम्परिक मधुरता, सहजता एवं सुरीले लय-ताल में निबद्ध हैं।
१. हम क्यों निज भाषा बोलें? / निज भाषा पशु को भाती / प्रकृति न भूले परिपाटी / संचय-सेक्स करे सीमित / खुद को करे नहीं बीमित / बदले नहीं कभी चोले / हम क्यों निज भाषा बोलें?
आचार्य संजीव ‘सलिल’ ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार कर लिया है कि ‘नव’ संज्ञा नहीं, विशेषण के रूप में ग्राह्य है। उनके अनुसार गीत का उद्गम कलकल-कलरव की लय (ध्वन्यात्मक उतार-चढ़ाव) है। तदनुसार ‘गीत’ का नामकरण कथ्य और विषय के अनुसार लोकगीत, ऋतुगीत, पर्वगीत, भक्तिगीत, जनगीत, आव्हानगीत, जागरणगीत, नवगीत, बालगीत, युवागीत, श्रृंगारगीत, प्रेमगीत, विरहगीत, सावनगीत, फागुनगीत, शोकगीत, बधाई गीत, विवाहगीत आदि हुआ।
परिवर्तन की ‘सड़क पर’ कदम बढ़ाता गीत-नवगीत, समय की चुनौतियों से आँख मिलाता हुआ लोकाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना है। नव भाव-भंगिमा में प्रस्तुत होनेवाला प्रत्येक गीत नवगीत है जो हमारे जीवन की उत्सवधर्मिता, उमंग, उत्साह, उल्लास, समन्वय तथा साहचर्य के तत्वों को अंगीकार कर एकात्म करता है। पृष्ठ ८६ से ९६ तक के गीतों की बोलिया बताएँगी कि उन्हें “सड़क पर” कदम बढ़ाते नवगीत क्यों न कहा जाए?
सड़क पर सतत ज़िंदगी चल रही है / जमूरे-मदारी रुआँसे सड़क पर / बसर ज़िंदगी हो रहे है सड़क पर / सड़क को बेजान मत समझो / रही सड़क पर अब तक चुप्पी, पर अब सच कहना ही होगा / सड़क पर जनम है, सड़क पर मरण है, सड़क खुद निराश्रित, सड़क ही शरण है / सड़क पर आ बस गयी है जिंदगी / सड़क पर, फिर भीड़ ने दंगे किये / दिन-दहाड़े, लुट रही इज्जत सड़क पर / जन्म पाया था, दिखा दे राह सबको, लक्ष्य तक पहुँचाए पर पहुँचा न पाई, देख कमसिन छवि, भटकते ट्रक न चूके छेड़ने से, हॉर्न सुनकर थरथराई पा अकेला, ट्रॉलियों ने चींथ डाला, बमुश्किल, चल रही हैं साँसें सड़क पर।
‘सड़क पर’ ऐसा नवगीत संग्रह है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो कवि हो, अकवि हो पर सहृदय हो।
☆
समीक्षा – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत’
६.१.२०१९
संपर्क: १०/३०/२ इंदिरा नगर, लखनऊ २२६०१६, चलभाष ९९३५२१७८४१
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
गौरी गाडेकर या एक प्रथितयश कथालेखिका आहेत. त्यांचा कथालेख संख्यात्मकदृष्ट्या जसा चढता वाढता आहे, तसाच तो गुणात्मकदृष्टयाही चढता वाढता आहे. मोजकंच परंतु दर्जेदार कथालेखन त्यांनी केलं आहे.
त्यांच्या कथा प्रामुख्याने घटनाप्रधान आहेत आणि बहुसंख्य कथा मध्यवर्गीय जीवनावर आधारलेल्या आहेत, पण
त्या साचेबंद नाहीत. एक वेगळं अनुभविश्व, वेगळा आशय आणि व्यक्तिरेखांचं वेगळेपण त्यांच्या कथांमधून आपल्याला दिसतं. त्यांच्या नातं या अगदी पहिल्या संग्रहापासून त्यांच्या कथांचं वेगळेपण आपल्या लक्षात येतं. त्यांच्या कथा आधी मासिकात प्रकाशित झाल्या आणि नंतर पुस्तक रूपाने वाचकांच्या भेटीला आल्या. नातं,
आऊटसायडर, सहज व इतर; तिसरं पुस्तक, हनिमून आजी आजोबांचा आणि यानंतर प्रसिद्ध झालेलं पुस्तक म्हणजे फिनिक्स. या शिवाय वादळातील दीपस्तंभ, मृत्यूवर मात, लिंकन ऑन लीडरशिपही ही त्यांची अनुवादित पुस्तके आहेत.
इथे मी विचार करणार आहे, तो ‘फिनिक्स’ या कथासंग्रहाचा. ‘फिनिक्स’ हे मिथक आहे. आपल्याच राखेतून ‘फिनिक्स’ पक्षी पुन्हा भरारी घेतो, असा लोकसमज आहे. इथे हे रूपकही आहे. जीवनातील निराशा, वैफल्य, औदासिन्य यांची राख बाजूला सारून पुन्हा उभारी घेणं, जीवनेच्छा बलवती होणं, आशा, उमेद वर्धिष्णू होणं, हेही ‘फिनिक्स’ पक्षाने राखेतून भरारी घेण्यासारखं आहे, नाही का? संग्रहातील काही कथांमध्ये असे दिसते.
संग्रहातील पहिलीच कथा ‘फिनिक्स’. त्यावरूनच संग्रहाचे नाव दिले गेले आहे,
‘फिनिक्स’. लेखिकेने, बर्याच दिवसांपूर्वी ‘फिनिक्स’ नावाची कविता लिहिली होती. नामसाम्यामुळे ती कविता, लेखिकेने सुरूवातीला दिली आहे. अतिशय सुरेख पण दुर्बोध अशी ही कविता आहे. विविध रगांच्या विविध स्वभावाच्या, विविध वर्तनाच्या व्यक्तिमत्वांनी त्यांचं कथाविश्व गजबजलेलं आहे.
यातील पहिलीच कथा ‘फिनिक्स ‘ अभय तिचा नायक. शाळेत यशस्वी नावाचा मुलगा त्याच्या वर्गात येतो आणि नाटकात अभयची राजा होण्याची संधी हुकते. टिपटॉप रहाणारा यशस्वी. अभ्यासात पुढे. परीक्षेत जास्त मार्क.
तो कधी मुद्दाम अभयला त्रास देत नाही. पण त्याच्या अस्तित्वाचं दडपण अभयवर येते. त्याचा आत्मविश्वास हरवतो. त्याच्यात न्यूनगंड निर्माण होतो. त्यात पुढे दोन वेळा त्याचं लग्नं मोडतं. इंद्राणीशी साखरपुडा होतो. ती तो मोडून चार दिवसात यशस्वीशी लग्न करते. मग अभय लग्नच करत नाही. बँकेत नोकरीला लागतो. बँकेत
कॉम्प्युटर येणार, कळल्यावर आपल्याला जमणार नाही, म्हणून व्ही. आर. एस. घेतो. त्याच्या चुलत बहिणीच्या सांगण्यावरून एका निवांत गावच्या एका रिझॉर्टमध्ये तो येतो. तिथलं शांत, निवांत वातावरण त्याला आवडतं. एकदा फिरून येताना तो तिथल्या एका वृद्धाश्रमाजवळ येतो. तिथे त्याला यशस्वी आणि त्याचा मुलगा भांडत
सलेले दिसतात. त्याची बायको नुकतीच पाच-सात दिवसांपूर्वी गेलेली असते. मुलगा त्याचं रहातं घर विकून टाकतो. त्याला वृद्धाश्रमात राहायचं नाहीये, पण मुलगा सक्ती करतोय. अभयच्या लक्षात येतं, ‘बायको गेली. मुलगा, सून, नात असूनही तो एकटा आहे. ना राहायला हक्काचे घर, ना स्वत:च्या आयुष्याचे निर्णय घेण्याचे स्वातंत्र्य. अभयला वाटतं, यशस्वी हरला, आपण जिंकलो. ही जाणीव त्याला आंतरिक उभारी देते. परतताना त्याला कॉम्प्युटर इंस्टिट्यूट लागते आणि त्याला वाटतं, आत जाऊन बघूयात तरी. ज्या कॉम्प्युटरच्या धास्तीने त्याने बँकेतील नोकरी सोडलेली असते, ती गोष्ट त्याला करून बघविशी वाटते. इथे त्याच्या मनाने उभारी घेतलेली असते, गेलेला आत्मविश्वास परत येतो, म्हणून कथेचं नाव ‘फिनिक्स’.
‘हक्काचे घर’ ही कथासुद्धा कथानायकाने प्रतिकूल परिस्थितीत घेतलेल्या भरारीने ‘फिनिक्स’च्या कल्पनेशी जवळीक जोडते. प्रमोद त्याचा दादा आणि वाहिनी चाळीतल्या एका खोलीत रहात असतात. फ्लॅटमध्ये राहायचे वाहिनीचे स्वप्न आहे. आर्थिक परिस्थितीमुळे ते काही शक्य नाही. तेव्हा वाहिनी ठरवते, जो फ्लॅट देईल,
त्याच्या मुलीशीच दिराचे लग्न करायचे. अर्थात प्रमोदला हे मान्य नाही. गावची मुलगी सांगून येते, तेव्हा, तो पळून जाऊन तिच्याशी लग्न करतो. तिथे सासरच्या घरी दोन खोल्या भाड्याने घेऊन रहातो. सासर्याच्या दुकानात काम करतो. गावच्या लोकांचा गरजेच्या वेगवेगळ्या वस्तू दुकानात ठेवतो. दुकानाची भरभराट त्याच्यामुळे होते. पुढे तो स्वत:चे स्वतंत्र दुकान काढतो. संधी मिळताच एक जुना बंगला विकत घेतो. त्याला थोडी डागडुजी, रंगारंगोटी करतो. बंगला नवा होतो. वास्तुशांतीला दादा- वहिनींना आणतो. सहा खोल्यांचा बंगला पाहून दोघेही खुश होतात. थाटात वास्तुशांत होते. दादा आजारी असतो. रात्री तो जातो. बंगल्यात राहण्याचे नाही, पण स्वत:च्या हक्काच्या घरात मरण्याचे त्याचे स्वप्न पुरे होते. प्रमोद म्हणतो, ‘डोक्यावर छप्पर मिळालं, पण नियतीने डोक्यावरचं छत्रच काढून घेतलं. ’
विविध प्रकारच्या आणि नमुन्याच्या व्यक्ती या संग्रहात आपल्याला भेटतात. सासूच्या (कुसुमच्या) कथा आपल्या नावावर देणारी सून (प्रिया) इथे आहे. (गुपीत) तुझा खोटेपणा मी जगासमोर आणीन, असं कुसुम म्हणताच ती उपहासाने म्हणते, ‘कोण विश्वास ठेवणार तुमच्यावर? मी सांगीन माझंच हस्तलिखित यांनी चोरलं. ’ मी आता कथा लिहिणारच नाही, असं कुसुम म्हणते, तेव्हा प्रिया उद्दामपणे म्हणते, जोपर्यंत तुम्ही माझ्या उपयोगाच्या असाल, तोपर्यंतच इथे मुलाजवळ, नातींजवळ राहू शकाल, नाही तर तुमची गावी रवानगी होईल. शेवटी कुसुमला नावापेक्षा, मुला-नातींचा सहवास महत्वाचा वाटतो आणि ती म्हणते, ‘हे गुपीत गुपीत ठेवण्यातच सगळ्यांचं हित आहे.’
कुणाच्या खांद्यावर’ मधील नायिका ज्योती आपल्या प्रियकराच्या मुलांचं सांभाळ करायचं ओझं आपल्या खांद्यावर घेते. त्यांची आई होऊन त्यांना वाढवते. मोठं करते. प्रकाश आणि ज्योती लग्न करणार असतात, पण त्याची अम्मी आत्महत्या करण्याची धमकी देऊन प्रकाशचं लग्न, गावातल्या चित्राशी करतात. पुढे त्यांना दोन मुले होतात. एका अपघातात प्रकाश आणि चित्रा दगावतात. मग प्रकाशची आई ज्योतीला बोलावते. तिच्यावर अन्याय झाला म्हणून तिची क्षमा मागते आणि प्रकाशच्या मुलांना सांभाळ म्हणून सांगते. अन्यथा आपल्याला या वयात ही जबाबदारी पेलणार नाही. मुलांना अनाथाश्रमात ठेवावं लागेल, असं म्हणते. आपल्या प्रकाशची मुले अनाथाश्रमात
वाढणार, हा विचार ज्योतीला सहन होत नाही आणि ती मुलांची आई होते. दीपिकाचे लग्न होते. नीरव प्रणालीशी लग्न ठरवतो. मग ती प्रणालीला सगळी हकिकत सांगते. प्रणालीही सासूसारखी जगावेगळीच. ती नीरवला सुचवते, ‘त्यांच्यावर असलेली तुमची जबाबदारी आता संपलीय, आता तरी त्यांना स्वत:चं आयुष्य जगू दे. आपण त्यांच्यासाठी योग्य जोडिदार शोधू या. ’
‘सेवाव्रती’ ही आल्हाद आणि प्रसाद या भावांची गोष्ट. प्रसाद आदिवासींसाठी कार्य करतोय. त्याला ‘सेवाव्रती’ पुरस्कार मिळालाय, पण खरा ‘सेवाव्रती’ आल्हाद्च कसा आहे, हे लेखिकेने कथेत रंगवलय. कथेच्या शेवटी आल्हादच्या सोडून गेलेल्या बायकोचा अपर्णाचा फोन येतो, ती म्हणते, ‘ प्रसादला पुरस्कार मिळाला… आनंद झाला. पण मला वाटतं, सेवाव्रती… खरे सेवाव्रती तुम्ही आहात. खूप चांगले आहात तुम्ही… सामान्य माणसांना पेलवणार नाही, एवढे चांगले… म्हणूनच मलाही… ’
लोळा-गोळा झालेल्या मुलाला त्याचे कपडे काढून, उन्हात-पावसात त्याला सार्वजनिक ठिकाणी झोपवून स्वत: निवांत सावलीत बसणारा, त्याच्या जिवावर पैसे गोळा करणारा स्वार्थी बाप इथे आहे. (गोळा). कडक शिस्तीची, कर्तव्य कठोर, तत्ववेत्ती प्राध्यापिका इथे आहे. एका क्षणी तिला जाणीव होते, ‘आपण ज्याला विजय समजत
होतो, ती प्रत्यक्षात शिक्षा होती एकांतवासाची. नातलगांपासून दूर, भाव-भावनांच्या, प्रेमस्नेहाच्या खिडक्या नसलेल्या एका अंधार कोठडीत कैद होतो आपण’ ही जाणीव तिला होते. आपल्या नातवाचंही भविष्य असं घडू नये, या विचाराने ती बदलते.
‘स्त्रीणाम् भाग्यम्’ मध्ये आरतीच्या दोन मैत्रिणींच्या कथा आहेत. दोघींचा जीवन प्रवास परस्पर विरुद्ध दिशेने होतो. दोघी तिच्या चौथीच्या वर्गातल्या मैत्रिणी.. तज्ज्ञा देखणी, हुशार,, टिपटॉप रहाणारी, श्रीमंत. तर सुभद्रा गरीब. बावळट, आजागळ. तज्ज्ञाला बारावीत मार्क कमी मिळतात. ती डॉक्टर होण्याचे वडलांचे स्वप्न भंग होते.
मग ती तिला सहानुभूती दाखवणार्या मुलाशी लग्न करते. तेव्हा गरिबी तिच्या गळ्यात माळ घालते. आरतीला ती अनेक वर्षांनी भेटते, तेव्हा ती अगदीच बावळट, आजागळ अशी दिसते. याउलट वर्गात बावळट, आजागळ दिसणारी सुभद्रा, संधी मिळताच फिनिक्सप्रमाणे भरारी घेते. आपलं व्यक्तिमत्व सुधारते. शिकते. पुढे चटपटीत
एअर होस्टेस होते. दोघींचा दोन दिशांना होणारा प्रवास लेखिकेने छान रंगवलाय.
पत्नी अपघातात गेल्यानांतर, तिच्या डायर्या वाचल्यावर आपण तिच्या मनाचा, इच्छांचा विचार केला नाही, तिला सतत गृहीत धरले, यामुळे पश्चत्तापदग्ध झालेला पती ‘तू बोललीच नाहीस’मधे भेटतो, तर ‘एकुलती’ मध्ये सतत स्वत:च्या मनाप्रमाणे वागणारी केतकी किरकोळ कारणावरून कार्तिकला घटस्फोट द्यायचं ठरवते, अन
वडलांच्या आजारपणात कार्तिकने केलेली धावपळ, त्यांची सेवा-सुश्रुषा यामुळे तिचं मतपरिवर्तन होतं.
– – अशा अनेक विविध रंगांच्या, स्वभावाच्या, विविध वर्तन करणार्या व्यक्ती यातील कथांमधून भेटतात.
कथासंग्रहातील कथांचं आणखी एक वैशिष्ट्य असं की यातील संवाद चटपटीत आहेत. हे संवाद आणि घटना-प्रसंगांचं यथार्थ वर्णन, यामुळे त्या त्या व्यक्ती आणि ते ते प्रसंग साक्षात डोळ्यापुढे उभे रहातात.
पुस्तक अतिशय वाचनीय आहे. सर्वांनी वाचून यातील कथांचा आनंद घ्यावा.
परिचय : सौ. उज्ज्वला केळकर
संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३ सेक्टर – ५, सी. बी. डी. – नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र
मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है श्री मनजीत भोला जी की पुस्तक उजाले हर तरफ़ होंगे पर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत भोला☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆
किताब – उजाले हर तरफ़ होंगे
कवि/शायर – मनजीत भोला
समीक्षाकर्ता- मनजीत सिंह
प्रकाशक – सत्यशोधक फाउंडेशन, कुरुक्षेत्र
कीमत –80 रूपये भारतीय
पृष्ठ संख्या –64
☆ समाज को आइना दिखाता ग़ज़ल संग्रह उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत सिंह ☆
मनजीत भोला की ग़ज़ल-कृति “उजाले हर तरफ़ होंगे” समकालीन समाज की उन दरारों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर रोशनी, आस्था और नैतिकता के नाम पर ढक दिया जाता है। किताब की पहली ग़ज़ल के अशआर यह स्पष्ट कर देते हैं कि कवि समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण वस्तुओं में नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिक मूल्यों के उस दुरुपयोग में देखता है, जिसे ताक़तवर वर्ग अपने स्वार्थ के लिए करता है। रोशनी स्वयं किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है, तो अँधेरा बना रहता है और सच ओझल हो जाता है।कवि उस आस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जो संवेदना और विवेक से कटकर मात्र पत्थर बन जाती है। ऐसी इबादत, जो इंसान को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि अपराध को पवित्र शब्दों में ढकने का माध्यम बन जाती है, समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मासूमों की हत्या को “शहादत” कहकर प्रस्तुत करना इसी नैतिक पतन का उदाहरण है, जहाँ भाषा का इस्तेमाल सच को छुपाने के लिए किया जाता है।किताब की अगली ग़ज़लों में कवि गरीब बस्तियों के यथार्थ को सामने लाता है। वहाँ दिन तो किसी तरह धूप के सहारे गुजर जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं। मज़दूर स्त्री का शरीर थकान से झुलसा हुआ है, फिर भी उसे काम पर जाना पड़ता है—आराम उसकी पहुँच से बाहर है। सरकार की घोषणाएँ रोटियों का विकल्प नहीं बन पातीं, बल्कि अक्सर वे गरीबों को ही बदनाम करने का कारण बन जाती हैं। लेबर चौक पर चाय पीता मज़दूर दूध के दाम नहीं जानता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में बुनियादी ज़रूरतें भी विलास बन चुकी हैं।शिक्षा को लेकर कवि का स्वर और तीखा हो जाता है। जिन बच्चों के लिए स्कूल के दरवाज़े ही बंद हैं, उनके लिए योजनाएँ बेमानी हैं। अगर समाज एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकता, तो झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिख देना केवल दिखावा है—विचारों के साथ एक क्रूर मज़ाक।पिछले समय की याद दिलाती ग़ज़ल में कवि बताता है कि यह सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। कभी सामाजिक जीवन में संयम था, धार्मिक सहिष्णुता थी और शिक्षा घर से शुरू होती थी। मंटो जैसी सच्ची आवाज़ें असहज करती थीं, लेकिन औरत की इज़्ज़त सुरक्षित थी। मक़तब और स्कूल सबके लिए खुले थे, ताकि कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे।कवि तथाकथित रहबरों पर भी सवाल उठाता है—वे जो रास्ता दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन डर पैदा करते हैं। तपती रेत पर बने कदमों के निशान की तरह उनकी साख भी मिट जाती है। हर गली में पैदा हुए “गिरधर” उस धार्मिक अराजकता का प्रतीक हैं, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को सत्य का ठेकेदार समझने लगता है।
अंतिम ग़ज़ल में कवि लोकतंत्र और राजनीति की विडंबना पर सीधा प्रहार करता है। खौफ़ की दुकानें चलाने वाले लोग फूलों की बात होते ही गायब हो जाते हैं। शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे असली मुद्दों के बजाय लहू से लिखे नारों की माँग की जाती है, क्योंकि आज वोट विकास से नहीं, डर और हिंसा से हासिल किए जाते हैं।
इस प्रकार “उजाले हर तरफ़ होंगे” केवल गजल-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का नैतिक दस्तावेज़ है—जो यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम सचमुच उजालों की ओर बढ़ रहे हैं, या अँधेरे की राजनीति को ही रोशनी मान बैठे हैं।मनजीत भोला की किताब उजाले हर तरफ़ होंगे के पहली ग़ज़ल के कुछ अशआर जो इस प्रकार से हैं
चरागों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है
अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है।
*
जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्थर है
इबादत से बड़ी गाफ़िल यहाँ पर शय नदामत है।
*
बहाना मत ज़रा आँसू समझ लेना मेरे बाबा
क़त्ल मेरा करेंगे वो बताएंगे शहादत है।
समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण चीज़ों में नहीं है, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिकता को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों में है। रोशनी अपने आप में किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है तो अँधेरा बना रहता है।
कवि कहता है कि लोग जिस आस्था को पूज रहे हैं, वह कई बार सिर्फ़ एक निर्जीव पत्थर बनकर रह जाती है, क्योंकि सच्ची इबादत—जो इंसान को बेहतर बनाए—उसकी जगह दिखावा और खोखली नदामत ले लेती है। यहाँ भावना है, समझ नहीं।मासूमों की हत्या को बड़े शब्दों और पवित्र नामों से ढक दिया जाता है। क़त्ल को “शहादत” कहकर पेश किया जाता है ताकि अपराधी अपने अपराध से बरी दिखें और समाज भ्रम में रहे।
इसके बाद कवि सत्ता की ओर उँगली उठाता है—वह कहता है कि हुकूमत का नशा इंसान को अंधा कर देता है। शासक जिस कुर्सी पर बैठा है, वह उसकी निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि जनता की अमानत है, जिसे वह भूल जाता है।अंत में कवि इस नैतिक विडंबना पर चीख़ उठता है कि जिनके हाथ खून से रंगे हैं, वही अगर दान और भलाई का ढोंग करें तो यह पूरे समाज के लिए क़यामत जैसी स्थिति है—जहाँ सही और ग़लत की पहचान ही मिट जाती ।
किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –
मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है
धूप को दिन रखा गया है बेचरागां शाम है
*
तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर
कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है
*
ये दिया है वो दिया है रोटियां पर हैं कहाँ
घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है
*
चाय जाकर वो पिए है रोज़ लेबर चौक पर
क्या पता मज़दूर को किस दूध का क्या दाम है
गरीब बस्तियों में अभाव और अँधेरा होना कोई नई बात नहीं है। वहाँ दिन को तो किसी तरह धूप के सहारे गुज़ार लिया जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं, यानी जीवन में रोशनी और सहारा नहीं है। एक मज़दूर स्त्री का शरीर थकान और धूप से झुलस चुका है, फिर भी वह काम पर जाने को मजबूर है। मन और तन दोनों आराम चाहते हैं, पर गरीबी में विश्राम एक सपना ही रहता है।
सरकार की तरफ़ से योजनाओं और सुविधाओं की घोषणाएँ तो बहुत होती हैं, पर ज़मीन पर लोगों के पास रोटियाँ तक नहीं हैं। ये खोखली घोषणाएँ उल्टा गरीबों को ही बदनाम करती हैं।मज़दूर रोज़ लेबर चौक पर चाय पीता है, पर उसे दूध के दाम तक का सही अंदाज़ा नहीं, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में मूलभूत चीज़ें भी उसकी पहुँच से बाहर हैं।जो बच्चे स्कूल के गेट के भीतर तक नहीं जा सकते, उनके लिए आपकी सारी योजनाएँ बेकार हैं, क्योंकि शिक्षा तक पहुँच ही नहीं है।अगर समाज और सरकार बच्चों को एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकते, तो फिर झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिखना केवल दिखावा है, विचारों का सम्मान नहीं।अब यह शहर मज़हब के नाम पर इतना हिंसक और पाखंडी हो गया है कि यहाँ रहना मुश्किल लगता है—जिसके मुँह में राम का नाम है, उसी के हाथ में दूसरों को चोट पहुँचाने की छुरी है।
किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –
पीते न थे वो हाफ़ अभी कल की बात है
आता नज़र था साफ अभी कल की बात है
*
शामिल सबा में थी यहाँ खुशबू अजान की
कोई न था खिलाफ अभी कल की बात है
*
बारह खड़ी के साथ में वालिद ज़नाब के
पढ़ते थे काफ गाफ अभी कल की बात है
*
मंटो की बू के साथ अदालत में जो गया
आपा तेरा लिहाफ़ अभी कल की बात है
यह सब बहुत पुराने ज़माने की बात नहीं है, बस कल तक ही ऐसा था। लोग खुलेआम शराब नहीं पीते थे और समाज में एक तरह की साफ़गोई और संकोच मौजूद था।
हवा में अज़ान की खुशबू घुली रहती थी और किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होती थी। धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान सामान्य बात थी।पिता अपने बच्चों के साथ बैठकर बारहखड़ी पढ़ाते थे, अक्षरों की पहचान कराते थे। शिक्षा घर और परिवार का हिस्सा हुआ करती थी।मंटो जैसे लेखक की सच्ची और कड़वी रचनाओं को लेकर अदालत तक जाया जाता था, लेकिन औरत की इज़्ज़त और मर्यादा सुरक्षित मानी जाती थी।रात में अगर किसी का कंधा तकिये की तरह इस्तेमाल हो भी जाए, तो उसमें कोई अश्लीलता या संदेह नहीं खोजा जाता था—नियत पर शक नहीं होता था।मक़तब और स्कूलों के दरवाज़े सबके लिए खुले थे और पढ़ाई की फीस भी माफ़ रहती थी, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
राह में हमको मिले रहबर कई
दिल से डर कई हो गए हैं दूर
*
हैं निशाँ कदमों के तपती रेत पर
गुम गए लेकिन यहाँ पे सर कई
*
आज मीरा बावली को क्या पता
हर गली पैदा हुए गिरधर कई
ज़िंदगी की राह में हमें कई ऐसे लोग मिले जो खुद को रहबर कहते थे, लेकिन उनसे दिल में डर पैदा होता था। ऐसे लोग अब दूर हो चुके हैं, पर उनका असर रह गया है।
तपती हुई रेत पर पैरों के निशान तो दिखाई देते हैं, लेकिन आगे चलकर वे मिट जाते हैं। यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके सिर तो हैं, पर दिशा और सोच खो चुकी है।
आज अगर मीरा को बावली कहा जाता है, तो उसे यह भी नहीं पता कि अब हर गली में अपने-अपने गिरधर पैदा हो गए हैं—हर कोई खुद को ईश्वर या सत्य का प्रतिनिधि मानने लगा है।राजधानी में एक ही महल को रोशनी चाहिए थी, लेकिन उसकी इस चाह में कई घर जलकर खाक हो गए—सत्ता की चमक आम लोगों की बर्बादी बन गई।अब स्वाभिमान और आत्मसम्मान सिर्फ़ शहरों में ही नहीं बिकता, बल्कि गाँवों में भी उसके दफ़्तर खुल गए हैं—यानी समझौते और सौदेबाज़ी हर जगह फैल चुकी है।
अंतिम ग़ज़ल के कुछ अशआर
दुकानें खौफ की बेशक यहाँ पर वो चलाते हैं
चले जो बात फूलों की कहीं पे खो से जाते हैं
*
हवा आ ही गई है तो भला मायूस क्यों करना
धरो तुम चाक पर माटी कोई दीपक बनाते हैं
*
यहाँ पर लोग रावण से बुरे भी हैं जलाने को
मगर हर साल पुतला हम बनाते हैं जलाते हैं
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पढ़ाई की, कमाई की, दवाई की न बातें हों
लिखो नारे लहू से तुम, लहू से वोट आते हैं
यहाँ कुछ लोग डर और भय का कारोबार खुलेआम करते हैं। वे समाज को खौफ़ में रखकर अपना स्वार्थ साधते हैं, लेकिन जैसे ही प्रेम, करुणा और फूलों जैसी कोमल बातों की चर्चा होती है, वे लोग चुपचाप गायब हो जाते हैं।
कवि कहता है कि जब बदलाव की हवा चल ही पड़ी है, तो निराश होने का कोई कारण नहीं। अगर इरादा और उम्मीद मौजूद हो, तो साधारण मिट्टी को भी चाक पर रखकर एक दीपक बनाया जा सकता है—यानी छोटे साधनों से भी रोशनी पैदा की जा सकती है।समाज में ऐसे लोग भी हैं जो रावण से भी अधिक क्रूर हैं और सच में जलाए जाने योग्य हैं, लेकिन विडंबना यह है कि हम हर साल केवल रावण का पुतला बनाकर जला देते हैं, जबकि असली बुराइयों को हाथ तक नहीं लगाते।
अंत में कवि राजनीति की क्रूर सच्चाई उजागर करता है—यहाँ शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे ज़रूरी मुद्दों पर बात नहीं की जाती। इसके बजाय खून से लिखे नारे गढ़े जाते हैं, क्योंकि आज वोट समझ और विकास से नहीं, बल्कि हिंसा, डर और लहू के सहारे जुटाए जाते हैं। अंत में मैं यही कहता हूं –
उजालों की नुमाइश में अँधेरा पल रहा है
हर इक चिराग़ बिकता है, अँधों का शहर रहा है
*
जो सच कहे वही अक्सर सलीबों पर चढ़े है
यहाँ झूठ के दरबार में इनाम ही बड़ा है
*
किताबों से जो डरते हैं वही तख़्तों पे बैठे
कलम का इक इशारा भी उन्हें खटका हुआ है
*
वो भूखे पेट से पूछे हैं क्या होता है वादा
क़लम से लिख दिया जिसने कभी देखा न खाया
*
मज़हब की ओट में नफ़रत की खेती हो रही है
भगवान के ही नाम पर इंसान कट रहा है
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समीक्षक : श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन जी द्वारा लिखित “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९७ ☆
☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” – संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति: व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)
संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन
प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य: ₹550/-
पृष्ठ संख्या: 212
ISBN: 978-93-49362-25-3
चर्चा: विवेक रंजन श्रीवास्तव
साहित्य जब समाज का जीवंत दस्तावेज बनता है, तो वह केवल शब्दों का संचयन नहीं रह जाता, बल्कि कालखंड की पदचाप बन जाता है। ‘व्यंग्य के रंग ‘ के पन्नों से गुजरते हुए ऐसा ही महसूस होता है। यह संकलन उन बिखरे हुए वैचारिक व्यंग्य के मोतियों की माला है, जो आज के संक्रमणकालीन भारत की तस्वीर को पूरी नग्नता और आत्मीयता के साथ उकेरते हैं।
संपादन की मेज पर परवेश जी ने जिस धैर्य और दृष्टि का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। उनके ‘संपादकीय कथन’ में स्पष्ट झलकता है कि यह संकलन केवल रचनाओं का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से इस संग्रह की प्रकाशन यात्रा साझा की है।
इस संग्रह की शक्ति इसकी विविधता है। राजनीति के गलियारों से लेकर सामाजिक सरोकारों की गलियों तक, यहाँ हर मोड़ पर एक नई दृष्टि मिलती है। राजनीति केंद्रित व्यंग्य लेखों में ‘लोकतंत्र ‘ पर किए गए कटाक्ष पठनीय हैं। विभिन्न लेखकों की अपनी शैली में केंद्रीय चिंता एक विसंगति है। शुचिता की कामना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सत्ता के खेल में खोते जा रहे नैतिक मूल्यों पर कड़ा प्रहार करती रचनाएं हैं। लेखों के माध्यम से व्यवस्था के दोहरेपन को बेनकाब कर व्यंग्यकारों ने उनके हिस्से के लेखकीय दायित्व निभाने का यत्न किया है।
इस संकलन में मेरी (विवेक रंजन श्रीवास्तव) की भी कुछ वैचारिक भागीदारी रही है। मेरा व्यंग्य लेख ‘ लाइक, शेयर, सब्सक्राइब प्लीज! शामिल किया गया है।
विकास की बलि चढ़ते सरोकार से खिन्न लेख, व्यंग्यकारों की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है। आखिर हम कंक्रीट के जंगल उगाकर किस हरियाली की तलाश कर रहे हैं? तकनीकी विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच का जो असंतुलन है, उसे लेखकों ने अपनी तार्किकता और साहित्य की तरलता के साथ पिरोने का प्रयास किया है।
संग्रह में शामिल कुल 88 रचनाओं में हरएक के अपने अनुभव, अलग अलग रचना समय, स्मृति, जड़ों की ओर वापसी जैसे मूल सिद्धांत पाठक के मानस पटल पर गहरी छाप छोड़ती हैं।
सामूहिक संकलनों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘डेमोक्रेसी’ होती है, जहाँ भिन्न विषय पर अलग-अलग लेखकों के भिन्न दृष्टिकोण पाठक को सोचने के लिए एक व्यापक धरातल प्रदान करते हैं। वरिष्ठ कलमकारों का अनुभव और नए लेखकों का उत्साह, इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।
पुस्तक की साज-सज्जा और इसके आवरण (Cover) पर चर्चा किए बिना यह समीक्षा अधूरी होगी। आवरण का डिजाइन प्रतीकात्मकता से भरा है।
गांधी जी की मेज पर उपस्थित तीन बंदरों का प्रतीकात्मक संदेश न्यू आर्ट फॉर्म में, ब्लैक एंड व्हाइट चित्र से प्रदर्शित किया गया है। जो द्वंद्व कवर पर चित्रित किया गया है, वह पुस्तक के शीर्षक के साथ पूरा न्याय करता है।
पुस्तक क्या ग्रंथ कहा जाना चाहिए में, अकारादी क्रम में लेखक शामिल हैं। राजू श्रीवास्तव, डॉ. अजय अनुरागी, डॉ. अजय जोशी, अखतर अली, अलंकार रस्तोगी, अलका अग्रवाल सिगतया, आलोक पुरानीक, अनीता यादव, अनूप शुक्ल, डॉ. कुमारी अर्पणा, अर्चना चतुवदी, अरुण अर्नव खरे, अरिवंद तिवारी, आशीष दशोतर, आत्माराम भाटी, डॉ. अतुल चतुर्वदी, बी.एल. आचछा, बिंदु जैन, ब्रजेश कानूनगो, बुलाकी शमा, धर्मपाल महेंद्र जैन, दिलीप कुमार, दिलीप तेतरवे, डॉ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, फ़ारूक़ आफ़रीदी, गिरीश पंकज, ज्ञान चतुर्वेदी, हनुमान मुण्ड, हरशंकर राढ़ी, डॉ. हरीश कुमार सिंह, डा हरीश नवल, इंद्रजीत कौर
, इंद्रजीत कौशिक, इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’, जय प्रकाश पाण्डेय, जीतेंद्र जितांशु, डॉ. के.के. अस्थाना, कैलाश मण्डलेकर, डॉ. किशोर अग्रवाल, डॉ. कुलवंत सिंह शेहरी, डॉ. लालित्य ललित, मलय जैन, मीरा जैन, मुकेश राठौर, मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ा
नीरज दइया, पंकज सून, डॉ. पंकज साहा, परवेश जैन, पवन कुमार जैन, डॉ. पिलक अरोरा, शारदेन्दु शुक्ला ‘शरद’, शिशिर सिंह, श्रीकांत आप्टे, डॉ. स्नेहलता पाठक, सुभाष चंदर, सुभाष काबरा, सुधीर कवलिया, सुनील जैन ‘राही’, सुनील सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतुप्त’, सूर्यबाला, विजय आनंद दुबे, विजय शंकर मिश्र, विशाल चर्चित, विवेक रंजन श्रीवास्तव, यशवंत कोठारी, पूरन सरमा, प्रभाशंकर उपाध्याय, प्रभात गोस्वामी एवं पृथ्वीराज चौहान, डॉ प्रेम जनमेजय, डॉ. राजेश कुमार, राज नागर ‘निरंतर’, राजेश वर्मा, आचार्य राजेश कुमार, राकेश सोहम, राम भोले शर्मा, रामस्वरूप दीक्षित, रामविलास जांगिड़, डॉ. रामवृक्ष सिंह, रमाकांत ताम्रकार, रमेश सैनी, रणविजय राव, रश्मि चौधरी, डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी, सीमा राय ‘मधुरिमा’ एवं सेवाराम त्रिपाठी जैसे सभी स्वनाम धन्य सुप्रसिद्ध व्यंग्य कारों को एक जिल्द में पढ़ सकते हैं।
लगभग 350 पृष्ठ की किताब का गेटअप, रंगों का चयन और शीर्षक का संयोजन पहली नजर में ही पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है और विषय-वस्तु की गंभीरता का संकेत दे देता है। अद्विक पब्लिकेशन ने मुद्रण और कागज की गुणवत्ता में भी उच्च मानक स्थापित किए हैं।
अंततः, यह संकलन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सहेजने के लिए है। यह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी आत्मा की धड़कनें आज भी शाश्वत सत्य के मूल्यों के बीच कहीं अटकी हुई हैं।
किताब खरीदिए, पढ़िए और अपनी सम्मति से व्यंग्य जगत के इस ” जोर लगा कर हैय्या” वाले समवेत स्वर को बधाई दीजिए।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ पानी राखिए – श्री अभिमन्यु जैन ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्री अभिमन्यु जैन जी को जन्मदिवस पर अशेष शुभकामनाएं)
☆ जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित – प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री अभिमन्यु जैन और उनकी कृति “पानी राखिए” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
व्यंग्य कर्मियों की लम्बी होती जा रही कतार में शामिल होने के लिए अब यह आवश्यक होता जा रहा है कि नयी कलम में विसंगतियों के नव्य संप्रेषण का साहस हो। यह भी जरुरी है कि व्यंग्यकार में अपनी विशिष्ट पहचान को रेखांकित करने योग्य कुछ नया और अलग हो। अभिमन्यु जैन ने व्यंग्य के इलाके में जानबूझकर चहलकदमी की है और अपने व्यंग्यों के लिए कथ्य और शिल्प की नव्यता तलाशी है। नये आलम्बनों से जूझते हुए उनके व्यंग्य अपने छोटे आकार में भी अनुभव के विस्तार का संकेत देते हैं। परिवेश की विद्रूपताओं को बेधने में व्यस्त अभिमन्यु जैन ने नये सिरे से चक्रव्यूह को तोड़ने का यत्न किया है, यही कम नहीं।
ये विश्लेषण है सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. डा. बालेन्दु शेखर तिवारी का जिसने प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री अभिमन्यु जैन की व्यंग्य कृति पानी राखिए की व्यंग्य रचनाओं की सटीकता और पठनीयता को प्रमाणित किया है।
श्री अभिमन्यु जैन
श्री अभिमन्यु जैन के व्यंग्य संग्रह पानी राखिए में प्रकाशित श्री बालेन्दु शेखर तिवारी के इस सटीक विश्लेषण पर जब हम गंभीरता से विचार करते हैं तो तो हमें अभिमन्यु जी की व्यंग्य रचनाओं पर उनकी ये सोच वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में सामयिक और आवश्यक लगती है। आज की अव्यवस्थाओं और विषमताओं पर उनका व्यंग्य ऐसी चोट करता नजर आता है कि पाठक भी ऐसी व्यंग्य रचनाओं पर नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य हो जाता है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में अभिमन्यु जी के इस व्यंग्य संग्रह की पठनीयता को विभिन्न प्रबुद्ध जनों ने भी सहर्ष स्वीकार किया है। इस संबंध में जानकीरमण कालेज के प्राचार्य डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का मानना है कि हिन्दी साहित्यिक संसार में उनकी यह पुस्तक पानी राखिए अपना विशिष्ट स्थान बनाकर रहेगी, ऐसा ध्रुव विश्वास है। पुस्तक में त्रिपाठी जी ने भी व्यंग्य रचनाओं की रोचकता और उसके प्रभावी पन से सहमति जताते हुए लिखा है कि, इस संग्रह में जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई, फूफाजी जैसे यथार्थवादी चित्रण उनकी रोचक लेखन शैली के उदाहरण हैं जो पाठकों को आद्योपांत बांधे रखते हैं और बार बार पढ़ने को प्रेरित करते हैं यही नहीं यत्र तत्र चर्चा का विषय बनाने के लिए उत्साहित भी करते हैं। एक सफल लेखन की यह सबसे प्रबल विशेषता कहीं जायेगी। देखा जाए तो एक व्यंग्यकार अपने आसपास जो देखता है और महसूस करता है वह कलम के माध्यम से कागज पर उतार देता है और चूंकि व्यंग्यकार की नजर अत्यंत पैनी होती है इसलिए उसके तीखे कटाक्ष के साथ उसका सृजन पाठकों को पठनीय भी लगता है। चूंकि अभिमन्यु जी एक प्रशासनिक अधिकारी भी रहे हैं इसलिए कार्यालयीन अव्यवस्थाओं को उन्होंने काफी नजदीक से देखा समझा है इसलिए उन्होंने सफलता पूर्वक इस कड़वे सच को भी अपनी व्यंग्य रचनाओं में व्यक्त किया है। इस व्यंग्य संग्रह की रचनाओं में हमें अभिमन्यु जी की गहरी और व्यापक सोच के दर्शन होते हैं। अभिमन्यु जी की इस पुस्तक में राजनीतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों से संबंधित विभिन्न व्यंग्य रचनाएं संग्रहीत हैं इसलिए पाठक वर्ग को इन सभी रचनाओं से गहरे अपनेपन का अहसास होता है। इस कृति में कुछ ऐसी रचनाएं हैं जो कि अपनी रोचकता के कारण पाठकों को बेहद प्रभावित करती हैं जैसे चुनाव और मुफ्तखोरी, फिसलन, फुटपाथ, हड़ताल, अभिनंदन, बेईमान भर्ती केन्द्र, निधन से नेतागिरी, दीपावली: राष्ट्रीयकरण हो, दादाजी की याद में, महिला राजनीति, मुफ्त का चंदन, पानी राखिए, अच्छे पड़ोसी, फागुनी प्रेम, सरकारी जीप, पुतला तंत्र इत्यादि ऐसी ही व्यंग्य रचनाओं हैं जो प्रत्येक वर्ग को अपने अपने आसपास की रचऩायें प्रतीत होती हैं। संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित पानी राखिए व्यंग्य संग्रह में अभिमन्यु जी की 46 पठनीय और संग्रहणीय रचनायें शामिल हैं। आज़ जन्म दिवस के शुभ अवसर पर मंगल भाव सहित हम तो बस इतना ही कहेंगे कि आदरणीय श्री अभिमन्यु जैन जी की व्यंग्य रचनाएं जितनी प्रेरक और प्रभावी हैं उतना ही प्रभावी और प्रणम्य उनका व्यक्तित्व भी है।