(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुढापे की लाठी…“।)
अभी अभी # ९४७ ⇒ आलेख – बुढापे की लाठी श्री प्रदीप शर्मा
(Walking stick)
गिरधर कविराय ने लाठी में जितने गुण बताए हैं, उसमें उन्होंने न तो बुढ़ापे का जिक्र किया है और न ही किसी दृष्टिहीन व्यक्ति का।
यानी कविवर शायद लठैत किस्म के व्यक्ति रहे हों, अधिकतर प्रवास पर रहे हों और उन्हें कुत्तों से अधिक डर लगता हो। बैलगाड़ी के जमाने में कवियों की दृष्टि भी नदी नालों के आगे नहीं जा पाती थी। लाठी उनके लिए कभी एक हथियार था तो कभी मात्र एक सहारा।
भले ही युग बदल जाए, लेकिन इंसान कुत्ते के पीछे लठ लेकर दौड़ना नहीं छोड़ेगा।
आजकल लाठी का नहीं, छड़ी का युग है। बुढापे की लाठी का उपयोग अब उम्र के हर पड़ाव पर होने लग गया है। लाठी को अगर सहारा कहें तो मन को अधिक सुकून मिलता है। बूढ़े आजकल सीनियर सिटीजन कहलाते हैं और अंधे को तो आप दृष्टिहीन भी नहीं कह सकते, क्योंकि आजकल वे भी दिव्यांग परिवार के सदस्य हो गए हैं। अब इस दुनिया में कोई असहाय, वृद्ध, अपाहिज, मूक बधिर, अथवा सूरदास नहीं।।
कोई व्यक्ति नहीं चाहता, उसे कभी लाठी का सहारा लेना पड़े। पहले घर परिवार ही इतने बड़े होते थे कि बच्चे ही बुढ़ापे की लाठी हुआ करते थे। यह एक ब्रह्म सत्य है, जब बच्चे छोटे होते हैं, तो बड़े ही उनका सहारा होते हैं। बड़ों की उंगली पकड़कर ही तो पहले चलना सीखते हैं और बाद में अपने पांवों पर खड़े हो जाते हैं।
जिस तरह बचपन के बाद जवानी आती है, जवानी के बाद तो बुढ़ापा ही आना है। उंगली वही रहती है, लेकिन कंधे और कमर अब वैसी नहीं रहती। अगर किसी इंसान का सहारा नहीं, तो छड़ी मुबारक। हमें तो लाठी उठाए बरसों बीत गए।
राजनीति में कल जिसके पास सिर्फ लाठी थी, उसने आज भैंस भी पाल ली है।।
जिस तरह दिन और हालात बदलते हैं, उसी तरह बुढ़ापे और लाठी की परिभाषा भी बदल चुकी है। आखिर लाठी क्या है, आलंबन, विकल्प अथवा सहारा ही न! और बुढ़ापा क्या है, बाल सफेद होना, दांत गिरना, कमर झुकना और आंखों – कानों से कम दिखाई देना। मुझे कम दिखाई देता है तो मैं लाठी नहीं ढूंढता, अपना चश्मा ढूंढता हूं। मेरा चश्मा ही मेरे लिए लाठी है।
बस इसी तरह सफ़ेद बाल की मुझे चिंता नहीं, रोज डाय करता हूं, बत्तीसी बाहर हुई नहीं कि, डेंचर मौजूद है। पेंशन क्या किसी लाठी से कम है। ये सब ही तो मेरे बुढ़ापे की असली लाठी हैं। जिसका पांव नहीं, वहां जयपुर फुट ही बुढ़ापे की लाठी का काम करता है। नाच मयूरी।।
लेकिन इतना सब होने के बावजूद मेरी असली बुढ़ापे की लाठी तो आज भी मेरी धर्मपत्नी ही है। वह कभी मेरा सहारा है तो कभी मैं उसका आलंबन।
कहीं कोई बेटा अपनी मां की लाठी है तो कहीं कोई पोता अपने दादा जी की लाठी।
जीवन के किस मोड़ पर हमें किस लाठी की आवश्यकता पड़ जाए, कुछ कहा नहीं जाता। सहारा लें, तो किसी को सहारा दें भी। लाठी में कर्ता भाव नहीं होता सिर्फ सेवा भाव होता है। लाठी ही सहारा है, सहारा ही ईश्वर है। एक सहारा तेरा।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अशोक अर्जुन…“।)
अभी अभी # ९४६ ⇒ आलेख – अशोक अर्जुन श्री प्रदीप शर्मा
आज हम करन अर्जुन की नहीं, अशोक और अर्जुन की बात करेंगे। हमारे अशोक भी कोई साधारण पुरुष नहीं, मौर्य वंश के सम्राट अशोक हैं। कर्ण और अर्जुन तो समकालीन थे, दोनों कुन्ती पुत्र और भाई भाई थे, लेकिन कर्ण सूत पुत्र कहलाया।
कर्ण और अर्जुन की कथा में बहुत अगर मगर हैं। अगर कर्ण और अर्जुन दोनों भाई एक हो जाते, तो शायद महाभारत ही नहीं होती। कर्ण श्रीकृष्ण की शरण में नहीं गया, उसने दुर्योधन की मित्रता में अपना सम्मान ढूंढा। अपमान और उपेक्षा अवसाद को जन्म देता है।
भले ही नियति ने कर्ण के साथ न्याय नहीं किया हो, उसके बल, पराक्रम और दानशीलता का लोहा सबने माना और वही कर्ण शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युञ्जय का मुख्य पात्र बना।।
भाई भाई तो खैर रावण और विभीषण भी थे। विभीषण भी जब अपने भाई से अपमानित हुए तो उनमें विषाद जागा, और वे प्रभु राम की शरण में गए।
होइहि वही जो राम रचि राखा। अतः यहां ज्यादा अगर मगर नहीं चलता।
लेकिन विभीषण के चरित्र पर कोई उपन्यास नहीं, और आचार्य चतुर सेन ने रावण के चरित्र पर वयं रक्षाम: लिख मारा। इतिहास जितना महत्व नायक को देता है, उतना खलनायकों को भी देता है।
श्रीकृष्ण की शरण में अर्जुन पूरी तरह तब गया जब कुरुक्षेत्र में उसका विषाद दूर हुआ और उसने लड़ने के लिए शस्त्र उठा लिए। अवसाद और विषाद में यही तो अंतर है। अवसाद और उपेक्षा कर्ण को दुर्योधन की ओर खींच ले जाता है, जब कि विषाद विरक्ति, वैराग्य उत्पन्न करता है तथा जो विभीषण को शरणागति की अवस्था में ले आता है।।
आइए अब हम अर्जुन से सम्राट अशोक की ओर रुख करें। दोनों ओर युद्ध है। अर्जुन के विषाद योग से ही श्री भगवद्गीता आरंभ होती है। श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के पश्चात् ही अर्जुन का मोहभंग होता है और वह धर्म की रक्षा के लिए कुरुक्षेत्र में शस्त्र उठा लेता है और धर्म की विजय होती है।
उधर कलिंग विजय के पश्चात् विजयोन्माद की जगह विजयी सम्राट अशोक को युद्ध की हिंसा और खून खराबे के कारण वही विरक्ति और विषाद उत्पन्न होता है जो अर्जुन को शस्त्र त्यागने के पश्चात् हुआ था, और विजयी अशोक बुद्ध की शरण में चला जाता है। एक जगह श्रीकृष्ण: शरणम् मम: है तो एक जगह बुद्धं शरणं गच्छामि।।
अर्जुन और अशोक के साथ अगर एक और शरणागति विभीषण को और ले लिया जाए तो द्वापर, त्रेता और तीनों कालों का निचोड़ हमारे सामने मौजूद है। राम, कृष्ण, बुद्ध, और महावीर से चलकर हम गांधी तक पहुंच ही जाते हैं। गांधी के बाद जब हमें शून्य नजर आता है तो हम फिर सनातन की ओर लौट चलते हैं। आज हम पंचशील और अहिंसा का गुणगान नहीं करते, शास्त्र और शस्त्र दोनों की बात करते हैं।
एक मजबूत लोकतंत्र के आधार पर ही आज हम पुनः रामराज्य का सपना देख सकते हैं। आज हमारे पास कई चाणक्य मौजूद हैं, बस भीष्म पितामह और महात्मा विदुर की कमी है।
सकारात्मक सोच और सार्थक संवाद दशा और दिशा दोनों प्रशस्त करे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆
आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।
मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था , संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।
अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो शेरों की मूर्तियां नजर आती हैं।
ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।
शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।
लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।
यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मंदबुद्धि…“।)
अभी अभी # ९४५ ⇒ आलेख – मंदबुद्धि श्री प्रदीप शर्मा
मैं मंदबुद्धि हूं! जिनकी बुद्धि मंद होती है, उन्हें मंदबुद्धि कहते हैं। अक्ल और बुद्धि एक ही होती है, बस इसी भ्रम में लोग मुझे भी अक्लमंद समझ लेते हैं। मुझे अपने बारे में कोई भ्रम नहीं। मैं बचपन से ही ऐसा हूं।
बूढ़ा होने से बुद्धि नहीं आ जाती! जो लोग अपने सफेद बाल डाई करके काले करते हैं, वे भी मौका आने पर, यह कहने से नहीं चूकते, कि हमने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये। वैसे भी कम पोषण से भी आजकल कम उम्र में बाल सफेद होना शुरू हो जाते हैं। जिनके सर में बाल ही नहीं हैं, उन्हें ऐसे जुमलों से बचना चाहिए।।
पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। रही सही कसर, जन्म पत्री पूरी कर देती है। हर बच्चे की कुंडली में बल, बुद्धि और यश लबालब भरा रहता है। जब बड़ा होने पर मेरे सितारे गर्दिश में आए, और उपलब्ध जन्म कुंडली ज्योतिषी को दिखाई तो उन्हें मुझमें साढ़े साती का योग नजर आया। शनिदेव मुझ पर मेहरबान थे।
मुझे अच्छी तरह याद है, तब हर शनिवार को नगर पालिका द्वारा सड़कों की धुलाई होती थी। एक पाड़ा गाड़ी में, पानी की टंकी रखी रहती थी, जिससे एक सफाई कर्मी पहले चमड़े के मशक में पानी भरता था और बाद में उससे सड़कों की धुलाई सफाई होती थी। सड़क से लगे फुटपाथ के पास एक छोटे से स्थान में शनि महाराज विराजमान हो जाते थे। हर शनिवार को लोग शनि को तेल चढ़ाते थे। मैने कभी नहीं चढ़ाया, इसलिए शनि महाराज मुझसे नाराज़ थे।।
सुना है बादाम खाने से याददाश्त अच्छी होती है, बुद्धि तेज होती है। तब बादाम मूंगफली के भाव बिकती थी। लेकिन तब भी हम चने और मूंगफली ही खाते थे। आज तो मूंगफली भी बादाम के भाव मिल रही है। भला हो सेहत के ठेकेदारों का, जो उन्होंने हमें मीठे तेल से सोयाबीन पर ला दिया। तेल से कॉलोस्ट्रोल बढ़ता है, बादाम खाओ, याददाश्त बढ़ाओ।
वैसे मंदबुद्धि होने से मुझे कोई खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा! I never stood second in my class. (जाहिर है, थर्ड ही आया हूंगा। ) मां के अनुसार मेरी आंख पर एक चोट के कारण मेरी आंखों और दिमाग पर गहरा असर पड़ा। फिर भी सूरदास और अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन मुझे प्रेरणा देते रहे। वैसे भी मुझे कहां स्वर्ग की आस थी।।
आज जब डिजिटल युग में भी 4-G का नेटवर्क स्लो चल रहा है, जिंदगी की गाड़ी भी बिना पटरी के चल रही है, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी बनते चले जा रहे हैं, इंसान का शातिर दिमाग जैविक हथियारों की खोज करने में लगा है, तो मैं क्यों न राम भजन करूं। इतने भक्त तो भक्ति काल में भी नहीं हुए, जितने आज नजर आ रहे हैं। वैसे भी कपास ओटना अपने बस की बात नहीं।
जीवन में यह मलाल जरूर रहेगा कि कभी गांधीजी का चरखा नहीं चलाया और न ही कबीर की तरह कभी ताने बाने पर ध्यान दिया। हां! पांव सदा चादर में रखे और हमेशा चादर सर्फ से धोता रहा। वैसे भी इड़ा और पिंगला नाड़ियां जब सुषुम्ना में प्रवेश करती हैं तो कोई बुद्धि का प्रमाण पत्र नहीं मांगती। सुना है, स्लेट खाली हो, तो सुषुम्ना में प्रवेश जल्दी मिल जाता है।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७० ☆ देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆
गर्मी का सीज़न इस बार भी निर्धारित समय से पूर्व ही आ गया है। दूसरी और पश्चिम एशिया का युद्ध भीषणतम हो कर गर्मी बढ़ाने में वैसा ही कर रहा है, जैसे कि जलती आग में घी करता है।
हमारे घर में विगत कुछ वर्षों से तथाकथित “शीतल पेय” का सेवन व्हाट्स ऐप महाविद्यालय से मिले ज्ञान से बंद हो चुका है। खाना बनाने वाली गैस की कमी के चलते घर में चाय के सेवन पर प्रतिबंध की चर्चा परवान चढ़ चुकी है। इसी क्रम में शीतल पेय की यादें ताज़ा हो गई हैं।
साठ के दश्क में कोका कोला, ऑरेंज (फेंटा नहीं) और सोडा कांच की बोतलों में उपलब्ध रहता था। सोडा दो आने और अन्य चार आने में बिक्री होती थी। दुकानदार कांच की बोतल के नाम से सिक्योरिटी डिपोजिट जमा करवा लेता था। बोतल की सही सलामती पर उस राशि की वापसी संभव हुआ करती थी। बोतल के ढक्कन हटाने पर ज़रा सा भी कांच टूटने से राशि काट कर बोतल ग्राहक को थमा दी जाती थी। कुछ अमीर विवाह आदि कार्यक्रमों से खाली बोतल घर ले आते थे। जब कभी बाजार से शीतल पेय खरीदते तो घर रखी खाली बोतल घर से साथ ही ले जाते थे, और सिक्योरिटी जमा करने से बच जाते थे। इन कांच की बोतलों को खोलने वाले छोटे से यंत्र को ओपनर कहा जाता था। हमारे जैसे किशोर तो मुंह में लगे हुए दांतों की दाढ़ के सहारे ही बोतल खोल लेते थे। पड़ोस के लोग भी हमारी सेवाएं ले कर उसकी एवज में थोड़ा सा पेय दे दिया करते थे।
मोहल्ले के परिचित दुकानदार भी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी देने पर सिक्योरिटी जमा करने की झंझट से मुक्त रहते थे।
अब तो प्लास्टिक युग में शीतल पेय भी विगत कुछ दशकों से प्लास्टिक की बोतलों में विक्रय किया जाता है, हालांकि बोतल खोलते ही इनकी गैस निकल जाती है, वो मज़ा नहीं आता है, जो कांच की बोतलों में हुआ करता था।
इस लेख के माध्यम से अपने मित्रों को संदेश देना चाहता हूं, कि हम जब भी उनके घर पर आएं, तो वो खाने वाली गैस की कमी के नाम पर चाय के स्थान पर शीतल पेय परोस सकते हैं। हमें कोई गुरेज नहीं है।
“शिक्षा का कोई अन्त नहीं होता। ऐसा नहीं है कि आपने कोई पुस्तक पढ़ ली, परीक्षा पास कर ली और शिक्षा समाप्त हो गई। जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन ही सीखने की प्रक्रिया है।”
— जे. कृष्णमूर्ति
जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब मन अपने आप कृतज्ञता से भर उठता है। यह केवल इसलिए नहीं कि किसी ने सफलता प्राप्त की है, बल्कि इसलिए कि वह सफलता विनम्रता, परिपक्वता और सौम्यता के साथ आई है। ऐसे क्षण हमें आश्वस्त करते हैं कि जिन मूल्यों को हम अपने जीवन में संजोकर रखते आए हैं, वे आज भी अगली पीढ़ी तक पहुँच रहे हैं।
हर माता-पिता की यही कामना होती है कि उनके बच्चे सुखी हों, आगे बढ़ें और जीवन में सफल हों। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे केवल परीक्षाओं में ही नहीं, बल्कि जीवन की कसौटियों पर भी खरे उतरें। परन्तु आज के समय में अपने बच्चों के लिए सही शिक्षा और सही दिशा चुनना कभी-कभी एक चुनौती भी बन जाता है।
वास्तव में, सच्ची शिक्षा केवल पुस्तकों और अंकों तक सीमित नहीं होती। एक श्रेष्ठ शिक्षण संस्था का उद्देश्य केवल अपने विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल बनाना नहीं होता, बल्कि उन्हें संवेदनशील, जिम्मेदार और समाज के उपयोगी नागरिक के रूप में विकसित करना भी होता है।
👷🏻♂️जब शिक्षा मन और हृदय
दोनों को सँवारती है👷🏻♂️
आजकल शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विचार सामने आया है, जिसे “पॉज़िटिव एजुकेशन” (Positive Education) कहा जाता है। इसका अर्थ है—पारम्परिक शिक्षा को सुख, संतोष और जीवन-कल्याण के अध्ययन के साथ जोड़ना।
पॉज़िटिव एजुकेशन विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखाती है—
सुदृढ़ सम्बन्ध बनाना, सकारात्मक भावनाएँ विकसित करना, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, सजगता (माइंडफुलनेस) का अभ्यास करना और स्वस्थ जीवन शैली अपनाना।
प्रख्यात मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन का कहना है—
“युवा पीढ़ी को कार्यक्षेत्र के कौशल तो सीखने ही चाहिए, जिन पर पिछले दो सौ वर्षों से शिक्षा प्रणाली केन्द्रित रही है। परन्तु अब हम उन्हें जीवन-कल्याण के कौशल भी सिखा सकते हैं—जैसे अधिक सकारात्मक भावनाएँ, जीवन में अर्थ, बेहतर सम्बन्ध और सार्थक उपलब्धियाँ।”
इसी प्रकार प्रसिद्ध शोधकर्ता एंजेला डकवर्थ शिक्षा के मूल लक्ष्य को बहुत सरल शब्दों में परिभाषित करती हैं—
“बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र — यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है।”
उनके अनुसार चरित्र का निर्माण तीन प्रकार की शक्तियों से होता है—
हृदय की शक्तियाँ — दूसरों को देना और उनसे प्रेम प्राप्त करना;
मस्तिष्क की शक्तियाँ — सोचना, कल्पना करना और सृजन करना;
इच्छाशक्ति की शक्तियाँ — आत्मसंयम, दृढ़ता और संकल्प।
जब ये तीनों गुण एक साथ विकसित होते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में जीवन को आलोकित करने वाली शक्ति बनती है।
👷🏻♂️एक ऐसा क्षण जिसने मन को गहरे संतोष से भर दिया👷🏻♂️
हम जैसे बुज़ुर्ग लोग कभी-कभी यह सोचकर चिन्तित हो उठते हैं कि आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में हमारी युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। परन्तु समय-समय पर जीवन ऐसे सुखद संकेत भी देता है जो मन को आश्वस्त कर देते हैं।
ऐसा ही एक सुखद अनुभव मुझे उस समय हुआ जब मैंने अपने भतीजे लविश सिंह का यह पोस्ट पढ़ा। लविश ने वर्ष 2025 में IIITDM कर्नूल से कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में स्नातक करते हुए न केवल अपनी शाखा में बल्कि सभी बी.टेक. कार्यक्रमों में प्रथम स्थान प्राप्त किया और स्वर्ण पदक से सम्मानित हुए। वर्तमान में वे भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में कम्प्यूटेशनल और डेटा साइंस में एम.टेक. कर रहे हैं।
मुझे सबसे अधिक गर्व इस बात पर हुआ कि इस उपलब्धि के साथ उनके शब्दों में जो विनम्रता, कृतज्ञता और जीवन-दृष्टि झलकती है, वह किसी भी बड़े सम्मान से कम नहीं है।
मैं उनका पोस्ट ज्यों का त्यों आपके साथ साझा कर रहा हूँ—
👷🏻♂️Post of Lavish Singh:
“With profound humility and heartfelt gratitude, I share that I have been honoured with the Gold Medal as both the Branch Topper in Computer Science & Engineering and the Overall Topper of the graduating batch at IIITDM Kurnool 2021-2025.
“This achievement is not mine alone. It has been made possible by the incessant showers of blessings and grace from the great lineage of gurus whose wisdom continues to guide me, the unconditional love, sacrifice, and faith of my parents bestowed upon me as a privilege, the steadfast support of my family, who have been my anchor through every phase, the friendship, camaraderie, and shared aspirations of my friends, who made every moment meaningful and the contributions of every individual and well wishers who encouraged and supported me in countless ways.
“I have officially graduated with a B.Tech degree in Computer Science & Engineering, carrying not just academic laurels, but a deeper understanding of discipline, resilience, and community. This milestone is both a culmination and a beginning, a responsibility to contribute with purpose, to learn with humility, and to grow with compassion.
“As I move forward, I hold close the values instilled in me by all those who walked with me on this journey. I am immensely grateful.
“ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
(Om saha nāvavatu, saha nau bhunaktu, saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai, Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||)
“May the spirit of learning, mutual respect, and peace always guide us.”
👷🏻♂️नवपीढ़ी के प्रति विश्वास👷🏻♂️
इन शब्दों को पढ़ते हुए मन में एक गहरा विश्वास जागता है कि आने वाला समय सचमुच उज्ज्वल हाथों में है। शैक्षणिक उपलब्धियाँ निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, परन्तु जब उनके साथ विनम्रता, कृतज्ञता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी जुड़ जाती है, तब वे और भी अर्थपूर्ण हो जाती हैं।
लविश और उनके जैसे असंख्य युवा आज केवल ज्ञान अर्जित नहीं कर रहे, बल्कि चरित्र का निर्माण भी कर रहे हैं। वे हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि शिक्षा आज भी एक पवित्र यात्रा हो सकती है—ज्ञान की, सेवा की और आत्म-विकास की।
लविश के लिए एक बड़े का स्नेहिल आशीर्वाद—
तुम्हारी प्रतिभा निरन्तर उज्ज्वल होती रहे, जिज्ञासा सदैव जीवित रहे और विनम्रता तुम्हारे व्यक्तित्व की आधारशिला बनी रहे। भारतीय विज्ञान संस्थान में तुम्हारी यह नई यात्रा ज्ञान और सेवा के और भी विस्तृत क्षितिज खोले। और तुम अपने माता-पिता, गुरुओं, परिवार और सभी शुभचिन्तकों का नाम सदैव रोशन करते रहो।
साथ ही यह संदेश समूची युवा पीढ़ी के लिए है—
हमें तुम पर विश्वास है, तुम्हारी क्षमता पर भरोसा है, और हम उस उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसे तुम अपनी प्रतिभा और संवेदनशीलता से गढ़ोगे।
क्योंकि जैसा कि कृष्णमूर्ति ने कहा है—
सीखने की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।
वह जीवन की धारा की तरह निरन्तर बहती रहती है—गहराती हुई, फैलती हुई और अपने स्पर्श से जीवन को समृद्ध करती हुई।👷🏻♂️
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इशारों इशारों में…“।)
अभी अभी # ९४४ ⇒ आलेख – इशारों इशारों में श्री प्रदीप शर्मा
अजनबी तो बन के करो ना इशारा! कल एक होटल में जन्मदिन की पार्टी में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। शायद वह दुनिया की पहली महिला होगी, जो घोषित रूप से अपना 60वां जन्मदिन मना रही थी। गुब्बारों की ज़बर्दस्त सजावट से, बच्चों के जन्मदिन जैसा माहौल था।
जश्न आधुनिक था, डीजे की कमी आधुनिक (अ)लोकप्रिय गाने पूरी कर रहे थे, जिनकी तेज़ आवाज़, मनोजकुमार की फ़िल्म शोर का विज्ञापन करती नज़र आ रही थी। आप परिचितों से हाथ तो मिला सकते थे, लेकिन कुछ भी कहने के लिए, कान के पास मुँह ले जाना पड़ता था। यह आपातकालीन व्यवस्था भी पुरुषों तक ही सीमित रह पाती थी। किसी संभ्रांत महिला के कानों में कुछ कहने की कोशिश के पहले ही लोगों में कानाफूसी शुरू हो जाने का डर भी लगातार बना रहता था।।
सभी जानते हैं कि खुदा ने हमारे कान मोबाइल सुनने के लिए बनाए हैं। कुछ लोग तो इश्कजादे टीवी सीरियल के दाढ़ी वाले नायक की तरह एक कान से मोबाइल ऐसे चिपकाए रहते हैं, कि कभी कभी शक होता है, पोस्टबॉक्स के लाल डब्बे की तरह, उनका मोबाइल कान से चिपका हुआ है। लेकिन जन्मदिन के शोर से अधिक, फूहड़ फिल्मी गानों की आवाज़, इंसान को बहरा करने के लिए काफी होती है।
वहीं एक मूक-बधिर केंद्र के संचालक ने मुझे कुछ इशारों से समझाना चाहा। मैं समझ गया, वे मूक-बधिर भाषा का मुझ पर प्रयोग कर रहे थे। होगा समझदार को इशारा काफी, मैं मूक-बधिरों की उंगलियों के इशारों की भाषा नहीं समझता। अक्सर कानपुर वाले मुँह की भाषा ही समझते हैं, इशारों की नहीं।।
उनके इशारों की भाषा में फिर भी वे मुझे यह समझाने में सफल हो गए कि इस तरह के भीड़ भरे शोरगुल के माहौल में अगर मूक बधिरों की उँगलियों की मुद्राओं वाली भाषा, एक आम इंसान भी सीख ले तो क्या बुरा है। व्यर्थ शब्दों के प्रयोग अथवा दुरुपयोग से भी छुटकारा और आवाज़ के प्रदूषण के बिना सामने वाले के दिल तक आपकी बात भी पहुँच जाए और इंसान को तो क्या, दीवारों तक को कानोंकान खबर न हो।
और अनायास ही मुझे बिहारी याद आ गए ;
कहत नटत, रीझत खिछत,
मिलत खिलत लजियात।
भरे भौंन में करत हैं
नयनन हि सों बात।।
आजकल जब भी टीवी न्यूज़ पर धुरंधरों की धारावाहिक बहस चल रही होती है, मैं टीवी के म्यूट बटन का उपयोग कर लेता हूँ। उनके इशारों और हाव-भाव से महाभारत का आंखों देखा हाल मुझ तक आसानी से पहुँच जाता है।
कोई भी भाषा बुरी नहीं, चाहे फिर वह मूक बधिरों की भाषा ही क्यों न हो। इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से, गीत की प्रेरणा भी शायद गीतकार को इसी भाषा से आई हो।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२७ ☆ सार्थक…
जीवन मानो एक दौड़ है। जिस किसी से पूछो, कहता है; वह दौड़ना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। फिर बताता है कि अब तक जीवन में कितना आगे बढ़ चुका है। अलबत्ता कभी विचार किया कि आगे यानी किस ओर बढ़ रहे हैं? मनुष्य प्रतिप्रश्न दागता है कि यह कैसा निरर्थक विचार है? स्वाभाविक है कि जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि प्रश्न तो सार्थक ही था पर मनुष्य का उत्तर नादानी भरा है। जीवन की ओर नहीं बल्कि मनुष्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा होता है।
भयभीत या अशांत होने के बजाय शांत भाव से तार्किक विचार अवश्य करना चाहिए। मनुष्य चाहे न चाहे, कदम बढ़ाए, न बढ़ाए, पहुँचेगा तो मृत्यु के पास ही। मनुष्य के वश में यदि पीछे लौटना होता तो वह बार-बार लौटता, अनेक बार लौटता, मृत्यु तक जाता ही नहीं, फिर लौट आता, चिरंजीवी होने का प्रयास करता रहता।
स्मरण रखना, मृत्यु का कोई एक गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का हर चरण मृत्यु का स्थान हो सकता है, मृत्यु का अधिष्ठान हो सकता है। विधाता जानता है मनुष्य की वृत्ति, यही कारण है कि कितना ही कर ले जीव, पीछे लौट ही नहीं सकता। जिज्ञासा पूछती है कि लौट नहीं सकते तो विकल्प क्या है? विकल्प है, यात्रा को सार्थक करना।
सार्थक जीने का कोई समय विशेष नहीं होता। मनुष्य जब अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य होता है, फिर वह अवस्था का कोई भी पड़ाव हो, उसी समय से जीवन सार्थक होने लगता है।
एक बात और, यदि जीवन में कभी भी, किसी भी पड़ाव पर मृत्यु आ सकती है तो किसी भी पड़ाव पर जीवन आरंभ क्यों नहीं हो सकता? इसीलिए कहा है,
कदम उठे,
यात्रा बनी,
साँसें खर्च हुईं
अनुभव संचित हुआ,
कुछ दिया, कुछ पाया
अर्द्धचक्र पूर्ण हुआ,
भूमिकाएँ बदलीं-
शेष साँसों को
पाथेय कर सको
तो संचय सार्थक है
अन्यथा
श्वासोच्छवास व्यर्थ है..!
ध्यान रहे, जीवन में वर्ष तो हरेक जोड़ता है पर वर्षों में जीवन बिरला ही फूँकता है। आपका बिरलापन प्रस्फुटन के लिए प्रतीक्षारत है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न व नी त …“।)
अभी अभी # ९४३ ⇒ आलेख – न व नी त श्री प्रदीप शर्मा
*AMUL BUTTER*
भारत कभी सोने की चिड़िया था, और यहां घी दूध की नदियां बहती थी, यह सत्य सनातन है।
द्वापर में सबै भूमि गोपाल की थी, जिन्होंने बृज की गोपियों के साथ रास रचाया था, धेनु चराई थी, बांसुरी की धुन सुनाई थी और गोपियों के घर से माखन चुराया था। खुद ने ही नहीं खाया था, ग्वाल बालों को भी खिलाया था और दाऊ ने बरबस मुख लिपटाया था।
बचपन में मुझे नवनीत बहुत पसंद था। हमारे घर में कभी घी दूध की नदियां नहीं बहीं, हां असली, पंखों वाली चिड़ियां जरूर छायादार वृक्षों पर आकर बैठ जाती थी। रोज सुबह समय निकालकर सावरकर वाचनालय निकल जाता था, जहां सरिता, मुक्ता जैसी अन्य पत्रिकाओं के साथ, नवनीत डाइजेस्ट भी मेरी प्रिय पसंद थी।।
नवनीत मक्खन को भी कहते हैं। तब हमने अमूल बटर का नाम भी नहीं सुन रखा था। तिलक पथ पर भावे की डेरी थी, जहां दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर मिलता था। मक्खन की टिकिया मिलती थी, पन्नी में लिपटी हुई, नमक वाली और बिना नमक वाली। तब पॉलीथिन शब्द हमारे मुंह नहीं लगा था। कभी घर में दूध में मलाई जमने ही नहीं दी तो मक्खन कहां से निकलता। हम माखन चोर भले ही नहीं रहे, लेकिन मलाई हमने बहुत मारी। अपनी चोरी छुपाने के लिए हमने एक बिल्ली पाल रखी थी। मलाई हम खाते थे, और मार बिल्ली खाती थी। आज भी हम चाय मलाई मार के ही पीते हैं।
जिस तरह हाथी के दांत खाने के अलग, और दिखाने के अलग होते हैं, मक्खन भी दो तरह का होता है, खाने का, और लगाने का। कभी पोल्सन नाम का मक्खन भी आता था, जिसका हमने सिर्फ नाम ही सुना। ना कभी खाया और ना ही लगाया।।
वैसे मक्खन जैसी चिकनी चुपड़ी बातें भले ही हमसे करवा लो, हम किसी को मक्खन लगाने के सख्त खिलाफ हैं। हम संस्कारी लोग हैं। हमारे यहां हर काम रीति, रस्म और रिवाज से होता है। हल्दी जैसी गुणकारी वस्तु भी अगर हम खाते हैं तो लगाते भी हैं। बाकायदा हल्दी की रस्म होती है। गाजे बाजे के साथ, डंके की चोट हल्दी लगाई जाती है। हल्दी लगवाई है, कोई चोरी नहीं की।
होती है हमारे यहां तेल मालिश भी, मसाज भी, लेकिन तेल से, मक्खन से नहीं। तेल सरसों का भी चलेगा, खोपरे का भी चलेगा, अगर आप संपन्न हैं तो बादाम का तेल लगाओ, लेकिन कम से कम मक्खन को तो ब्रेड से अलग मत करो। जूते की पॉलिश भले ही क्रीम से होती हो, मक्खन से तो पॉलिश भी नहीं होती।।
जो लोग अधिक घी खाना चाहते हैं, उन्हें अधिक धन कमाना पड़ता है। पैसा सिर्फ मेहनत, भाग्य, पुरुषार्थ अथवा बेईमानी से ही नहीं कमाया जाता, चिकनी चुपड़ी, मीठी मीठी बातों से भी लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
मिश्री सी जबान ही मक्खन का काम भी कर देती है। प्रेम के दो शब्द से तो पत्थर भी पिघल जाता है, फिर इंसान क्या। आप भी बस मीठा बोलिए, वही असली मक्खन है।
अमूल मक्खन स्वदेशी भी और नमकीन भी ! दाल मखनी हो या फिर पाव भाजी, मक्खन तो उसमें तैरना ही चाहिए। आज की पीढ़ी पिज़्ज़ा और आइसक्रीम के नाम पर ढेरों चीज़ (cheeze) और क्रीम का सेवन कर रही है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मक्खन स्वादिष्ट है और पौष्टिक भी। निर्मल बाबा का कहा मानें। खुद भी खाएं और चार लोगों को भी खिलाएं, लेकिन किसी को लगाएं नहीं।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१३ ☆
☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆
‘संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। परंतु जब आप संवाद अर्थात् वार्तालाप करना बंद कर देते हैं, तो आप अपने अनमोल संबंध खो देते हैं।’ यह वाक्य गहन-गूढ़ अर्थ को परिलक्षित करता है। जैसे संवाद अथवा कथोपथन कहानी या नाटक को गति प्रदान करते हैं; वैसे ही संवाद हमारे जीवन को ऊर्जा व जीवंतता प्रदान करते हैं… हमारे अंतर्मन में जीने की उमंग जाग्रत करते हैं। जैसाकि सर्वविदित है– मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेला रहने में स्वयं को असमर्थ पाता है। इसलिए ही वह जन्म- जात संबंधों के रहते भी अन्य संबंध स्थापित करता है, क्योंकि वह अपने सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति किए बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। वह अपने हृदय के भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर सुक़ून पाता है तथा स्वयं को अकेला, असहाय व विवश अनुभव नहीं करता।
यदि आप वार्तालाप/ संवाद करना बंद कर देते हैं, तो अनमोल संबंधों को खो देते हैं। संवादहीनता मान-दशा तक तो वाज़िब है, परंतु उसके बाद यह सज़ा बनकर रह जाती है और एक अंतराल के पश्चात् मानव स्वयं को नितांत अकेला अनुभव करता है। प्रश्न उठता है– क्या संबंध बनाए रखने के लिए मानव को दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए अपने आत्म-सम्मान को दाँव पर लगा देना चाहिए? नहीं…यह तो चाटुकारिता कहलायेगी। यदि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहती है, तो मानव तनाव, चिंता व अवसाद से घिर जाता है और अंततः उस व्यूह को भेदना मानव के वश से बाहर हो जाता है। तनाव संबंधों की ताज़गी व पारस्परिक स्नेह-सौहार्द को लील जाता है और ऐसे व्यक्ति के साथ रहने से दूसरे पक्ष के लोग भी गुरेज़ करना प्रारंभ कर देते हैं। सो! उसे जीवन में अकेले विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
लंबे समय तक तनाव की यह स्थिति मानव को चिंता के अथाह सागर में धकेल देती है। चिंता चिता समान है, जो दीमक की भांति मानव के उत्साह, साहस, धैर्य आदि को लील कर, शरीर रूपी इमारत की चूलों को हिला कर खोखला कर देती है। चिंताग्रस्त मानव सदैव ख़ुद से बेखबर स्वनिर्मित लोक में विचरण करता रहता है। वह बेसिर-पैर की कल्पनाओं में खोया, अनगिनत शंकाओं में घिरा स्वयं को अपाहिज-सा अनुभव करता है। यदि ऐसा-वैसा हो गया, तो उसका क्या होगा? उसके परिवार की क्या दशा होगी? उन विषम परिस्थितियों से वे कैसे निज़ात पा सकेगे? चिंताग्रस्त मानव को चारों ओर अंधकार ही अंधकार नज़र आता है। जीवन में उसे आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती और न ही कोई उम्मीद की झलक दिखाई पड़ती है…उसे जीवन मरु-सम भासता है। उसकी दशा रेगिस्तान के उस हिरण-सी हो जाती है, जो प्यास से आकुल-व्याकुल सूर्य की किरणों को जल समझ उनके पीछे दौड़ा चला जाता है और अंत में अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। यही होती है अवसाद-ग्रस्त मानव की मन:स्थिति… जिसके जीवन में न कोई उमंग रहती है; न ही कोई तरंग; न प्रसन्नता; न ही उल्लास…वह तो नितांत अकेला, तन्हा-सा अपना जीवन बसर करता है अर्थात् ढोता है।
संवादहीनता मानव को उस कग़ार पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वह हरदम तन्हाई के दंश झेलता है; जो नासूर बन उसे आजीवन सालते हैं। संवादहीनता आजकल सभी रिश्ते-नातों में सेंध लगाकर जीवन के सुक़ून व सुखों पर डाका डाल रही है। सुक़ून मन की वह निर्विकार अवस्था है, जहां मानव राग-द्वेष व स्व-पर की निकृष्टतम वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है और अंतर्मन रूपी सागर के शांत जल में निरंतर अवगाहन करता रहता है और वहां पहुचने के पश्चात् सभी इच्छाओं का शमन हो जाता है। परंतु उस स्थिति तक पहुंचने में मानव को वर्षों तक साधना-तपस्या करनी पड़ती है।
आइए! हम संबंध-निर्वाह के विषय पर चर्चा कर लें। संबंध विश्वास के आधार पर स्थापित तो हो जाते हैं, परंतु उनका निबाह करने के लिए आवश्यकता होती है बर्दाश्त करने की…यदि हममें सहनशीलता का मादा है, तो संबंध स्थायी व स्थिर रह सकते हैं, अन्यथा वे पानी के बुलबुले की भांति पल-भर में विलीन हो जाते हैं। संबंध कभी भी दूसरों से जीतकर नहीं निभाए जा सकते; उन्हें बनाए रखने के लिए तो जीतकर भी हारना पड़ता है। उनकी भावनाओं को महत्व देते हुए, प्रियजनों की प्रसन्नता के लिए पराजय को स्वीकारना पड़ता है। इसके विपरीत यदि आप वार्तालाप बंद कर देते हैं, तो संबंध टूट जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं और उन विषम परिस्थितियों में आप अकेले रह जाते हैं और कोई पल-भर के लिए भी आपके साथ समय व्यतीत करना पसंद नहीं करता।
यदि हम संबंधों को चिरस्थाई व शाश्वत् रूप प्रदान करना चाहते हैं, तो हमारे लिए यथासमय झुकना व दूसरों को सहन करना कारग़र होगा। दूसरे शब्दों में हमें परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना होगा। झुकना, सहना व समझौता करने की एक ही मांग होती है…अहं का विसर्जन। यह ही एक ऐसा उपादान है; जिसके द्वारा आप दूसरों का हृदय परिवर्तित कर सकते हैं…अपने प्रति दूसरों के मन में विश्वास जाग्रत कर सकते हैं। वैसे भी जीवन केवल संघर्ष ही नहीं; समझौता है। संघर्ष की स्थिति हमारे अंतर्मन की आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करती है; प्रेरित करती है; हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचाती है। दूसरे शब्दों में समझौता हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन कर, संबंधों को शाश्वत रूप प्रदान कर हमें सुक़ून देता है; जीने की प्रेरणा देता है। सो! संबंधों को सार्थकता प्रदान करने हेतु जहां संवादों की दरक़ार है; वहीं समझौता भी वह संजीवनी है, जिसमें प्राणदायिनी शक्ति निहित है।
अंतत: हम कह सकते हैं कि जीवन में कभी संवादहीनता की स्थिति न पनपने दें, क्योंकि यह वह सुनामी है; जो संबंधों को लील जाता है और जीवन को शून्यता से भर देता है। यह स्थिति मानव के लिए अत्यंत घातक है, विस्फोटक है। सो! हम सबको अपने दायित्व का वहन करना चाहिए और समाज में स्नेह, सौहार्द, समन्वय, सामंजस्यता व समरसता की स्थिति बनाए रखने के लिए अपने अहम् का विसर्जन कर, संबंधों को सार्थक बनाने का भरसक प्रयास करना चाहिए …यही समय की मांग है और मानव-मात्र से अपेक्षित है।