हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०८ ☆ आलेख – ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – ‘‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०८ ☆

☆ आलेख ☆ ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी)

मनुष्य को सब जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। गोसाईं जी कह गये हैं— ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुरलभ सदग्रंथन गावा।’ यानी मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है और मनुष्य की योनि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

वानर की प्रजाति में जन्म लेकर मनुष्य ने अभूतपूर्व प्रगति की। हाथों को चलने की क्रिया से मुक्त किया, पत्थर और लोहे के औज़ार बनाये, परिवार बनाया, खेती-किसानी सीखी। मनुष्य की प्रतिभा और उसके श्रम ने दुनिया की सूरत बदल दी। मनुष्य के लिए नैतिकता के मानदंड बने, नियम बने, कानून बने। नतीजतन मनुष्य को सभी जीवों में सबसे बुद्धिमान,सबसे ताकतवर, सबसे सभ्य और  नैतिकता का अनुसरण करने वाला माना जाने लगा। सभी देशों को परस्पर जोड़ने और उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्तर पर संस्थान स्थापित हुए।

लेकिन कुल मिलाकर समझ में आया कि मनुष्य की झगड़ालू प्रवृत्ति  यथावत है। हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में आदमी आदमी से जूझता रहता है। आदमी ने ऐसे घातक उपकरण विकसित कर लिये हैं कि मिनटों में लाखों जीवन को समाप्त किया जा सकता है। हिरोशिमा और नागासाकी उदाहरण हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण दो विश्वयुद्ध हुए और लाखों जानें गयीं। नेपोलियन ने 1812 में रूस पर आक्रमण किया। उसके छः लाख सैनिक इस अभियान में गये, सिर्फ एक लाख ही वापस लौट पाये। पांच लाख रूस की मिट्टी में दफ़न हो गये। इसका विशद वर्णन टाल्सटाय के महान उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ में मिलता है। इतने जीवन नष्ट होने के बाद भी हिटलर जैसे राष्ट्राध्यक्षों के दिमाग़ से युद्ध का भूत नहीं उतरा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया। युद्ध में दोनों पक्षों के करीब अस्सी लाख सैनिक और नागरिक मारे गये।

फिलहाल फिलिस्तीन की ज़मीन पर इज़रायल और हमास का युद्ध चल रहा है जिसमें 68000 निर्दोष लोग बलि चढ़ चुके हैं, जिनमें से 20- 25 हज़ार बच्चे थे जो दुनिया को आंख भर देखे बिना ही विदा हो गये। बड़ी-बड़ी इमारतें  मलबे में बदल गयीं, पूरी बस्ती श्मशान में तब्दील हो गयी, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। भोजन के लिए बर्तन लेकर लाइन में लगे भूखे बच्चों पर गोलियां चलीं। परिवार के परिवार साफ हो गये। इन मौतों पर रोने वाला कोई नहीं। उधर रूस और यूक्रेन के युद्ध में भी लोग रोज़ मर रहे हैं। दोनों तरफ तर्क दिया जाता है कि भविष्य में उनके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, इसलिए मारना जायज़ है।इन प्रकरणों में दुनिया का चौधरी, संयुक्त राष्ट्र संघ, लाचार बना बैठा है।

शेर को प्रकृति ने मांसाहारी बनाया है, हम उसे हिंसक कहते हैं। लेकिन वह दूसरे जीवों की हत्या तभी करता है जब उसे क्षुधा सताती है। पेट भरा होने पर वह अन्य जीवों की तरफ देखता भी नहीं। लेकिन आदमी की हिंसा की भूख के लिए कोई कारण ढूंढ़ पाना मुश्किल है। कई बार आदमी को मनोरंजन के लिए भी मार दिया जाता है। पुराने ज़माने में कुछ देशों में अपराधियों को शेर का सामना करने के लिए छोड़ दिया जाता था। इससे दंड की प्रक्रिया भी पूरी होती थी और तमाशबीनों का पर्याप्त मनोरंजन भी होता था।

आदमी ने अपनी हरकतों से सिद्ध किया है कि वह सभ्य, सुशिक्षित, संवेदनशील होने का कितना भी ढिंढोरा पीट ले, भीतर से वह वही है जो  वह लाखों साल पहले था, जब रक्त-प्रवाह देखकर वह आनंदित होता था।

ऐसा लगता है कि त्रिदेव में से शिव की संहारक वाली भूमिका को मनुष्य अपने हाथ में लेने के लिए आतुर है। ज्ञानी कहते हैं कि जो जान नहीं देता उसे जान लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन मनुष्य की नज़र में ये बातें निरर्थक हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०८ – ताला ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०८ ☆ ताला… ?

दीपावली संपन्न हो चुकी है। त्योहार का ख़ुमार उतर रहा है। जीवन रोज़ के ढर्रे पर लौट रहा है।

लगभग पाँच दिन बाद आज संध्या भ्रमण के लिए निकला हूँ। बहुधा मैं लिफ्ट का प्रयोग नहीं करता। अपने फ्लैट से सीढ़ियों द्वारा नीचे की मंज़िलें उतरते हुए देखता हूँ कि अधिकांश फ्लैटों के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है। कामकाजी दिनों में सुबह से शाम तक ताला दिखता है। आज शाम को दिख रहा है। संभव है कि लोग अपने परिजनों या परिचितों से दीपावली मिलने गए हों। यह भी हो सकता है कि पिछले चार-पाँच रोज़ से घर में होने से उकताकर आज आउटिंग या बाहर भोजन के लिए चले गए हों। अलबत्ता घरों के दरवाज़े पर ताला अब ‘न्यू नॉर्मल’ है।

स्मरण हो आता है कि माँ ने हमेशा प्रयास किया कि घर पर ताला न लगे। घर वही जो सदा खुला रहे, अपनों के लिए और अतिथियों के लिए भी।

उनकी पीढ़ी ने वह समय देखा था जब दरवाज़े भोर के समय खुलते और रात को ही बंद होते। पथिक, पंछी, पशु सबके लिए घर में भोजन बनता। चींटियों को आटा डाला जाता। बिल्ली को प्रसव पर हलवा बनाकर खिलाया जाता। कुत्तों के लिए रोटी बनती। पंछियों को दाना चुगाया जाता। गौ-ग्रास तो सदैव प्रथम स्थान पर था ही।

सामूहिक परिवार, समय के साथ एकल हुए। गाँव के बड़े, खुले, हवादार मकान छूटे। आदमी फ्लैटों के दड़बे में घुसा। बदली हुई परिस्थितियों और घटते मानव संसाधन के बीच ताला घर के दरवाज़े पर अपना स्थान मजबूती से बनाता चला गया।

निर्विवाद सत्य है कि वर्तमान जीवन शैली में दरवाज़े पर ताला अपरिहार्य है। दरवाज़े पर लटका स्थूल ताला सामान्यत: भीतर कुछ आने नहीं देता। स्थूल का सूक्ष्म विश्लेषण करें कि ताला कहीं जड़ता की ओर तो नहीं ले जा रहा? हमारी सोच और मन पर जो ताला जड़ता जा रहा है, उससे बाहर कैसे आया जाए? इसे भावुक चिंतन कहकर खारिज़ किया जा सकता है। तथापि मनुष्य चिंतन नहीं करेगा तो कौन करेगा? इसी चिंतन के चलते आदमी ने आदिम से आधुनिक की यात्रा की है। फिर कोई किसी क्षेत्र में कितना ही अग्रगण्य हो जाए, परिष्कार और परिमार्जन की संभावना सदा बनी रहती है।

चिंतन का निष्कर्ष है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन भी अब ‘न्यू नॉर्मल’ की सूची में शामिल हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए आज कौंसिलर के पास जाना पड़ता है। सहज संवाद छूट चला है, केवल एकालाप ही बचा है। मानसिक विरेचन के लिए आवश्यक रिश्तों पर ताला लगा है।

इन तालों पर ‘बंदीगृह’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो,

कारागार अप्रासंगिक हो चुके।

मजबूत फाटकों पर टंगे विशाल ताले

जड़े जा चुके हैं मनुष्य के मन पर,

हथकड़ियॉं, हाथों में बेमानी लगती हैं,

वे, उग, जम, और कस, रही हैं नसों में,

पैरों की बेड़ियॉं गर्भस्थ शिशु के साथ ही

जन्मती और बढ़ती हैं, क्षण-प्रतिक्षण

…..बस बुढ़ाती नहीं।

विसंगतियों के फंदे

फॉंसी बनकर कसते जा रहे हैं,

यहॉं-वहॉं टहलते जानवर

रुपये के खूँटे से बंधे

आदमी पर तरस खा रहे हैं।

भूमंडलीकरण के दायरे में

सारा विश्व बड़े से बंदीगृह में

तब्दील हो चुका, इसलिए कहता हूँ-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो

कारागार अप्रासंगिक हो चुका।

मन पर जड़ते इन तालों को हथौड़े से तोड़ने की नहीं अपितु स्नेह, सामंजस्य और विश्वास की चाबी से खोलने की आवश्यकता है। माना कि एक आलेख भर से ताला टूटेगा नहीं, पर बीच-बीच में कुछ समय के लिए ही क्यों ना सही, दरवाज़ा खुला रखने का भाव भी जाग जाए तो चिंतन और लेखन सार्थक है।

इस वर्ष हम अपने-अपने, मन पर जड़े ताले खोलने की दिशा कुछ कदम भी आगे में बढ़ सकें तो चिरंजीव प्रकाश-उत्सव की आभा कई गुना बढ़ जाएगी।

शुभं अस्तु।

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 5:34 बजे, 25 अक्टूबर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१४ ⇒ सुर की गति मैं क्या जानूं ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुर की गति मैं क्या जानूं ।)

?अभी अभी # ८१४ ⇒ आलेख – सुर की गति मैं क्या जानूं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक दुनिया गीत, संगीत की होती है, जहां सुर, ताल और लय की बात होती है, कभी कानों में शहनाई गूंजती है तो कभी बांसुरी की धुन।

धुन एक मन की दशा भी है, कुछ लोग धुन के पक्के होते हैं तो कुछ रियाज के।

हमारे कान हमेशा कुछ अच्छा सुनने के लिए लालायित रहते हैं। दूर कोई गाए, धुन ये सुनाए। हमारे आसपास इतनी आवाजें होती हैं, लेकिन हमारे कान उधर ही लगे रहते हैं, जहां हमारा ध्यान होता है। धुन और ध्यान के बिना कोई भी साधना संभव नहीं।

हर व्यक्ति सुर का जानकार नहीं होता, लेकिन कर्णप्रिय शब्द क्या है और कर्कश स्वर क्या है, यह वह अच्छी तरह जानता है। कानों को भी मीठे बोल ही सुहाते हैं, कड़वे वचन तो सिर्फ आचार्य तरुण सागर जी के ही भाते हैं। सुन साइबा सुन, प्यार की धुन।।

मुकेश का एक प्यारे गीत का मुखड़ा, आज के अभी अभी का शीर्षक है, सुर की गति मैं क्या जानूं, बस एक भजन करना जानूं। बस, बिल्कुल यही हाल मेरा भी है, मुझे सुर का पता नहीं, सरगम मुझे नहीं आती, अच्छा सुन लेता हूं, लेकिन गा नहीं पता, टेबल पर थाप देता रहता हूं, तबला बजाना मुझे नहीं आता, लेकिन जब यह पता चला कि मुकेश का यह प्रिय भजन राग हमीर पर आधारित है, तो अचानक मुझे फिल्म कोहिनूर का वह गीत याद आ गया, गिरधर की मुरलिया बाजे रे, मधुबन में राधिका नाचे रे। संगीत के रसिक और जानकार राग हमीर पर आधारित ऐसे कई गीत जानते होंगे, लेकिन मेरी स्थिति तो बस यही है, सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं। फिर भी बस इतना जरूर मुझे पता है कि सुर के बिना जीवन सुना है।

ईश्वर को पाने के कई साधन हैं, कई रास्ते हैं, लेकिन सभी रास्ते प्रेम के मार्ग से ही होकर जाते हैं। जहां प्रेम है, वहां गीत है, संगीत है, सुर है, कहीं लता है तो कहीं जगजीत है। आने से उसके आए बहार, जाने से उसके जाए बहार। कहीं कोयल की कूक है, तो कहीं पपीहे की पीहू पीहू। जब शोर वाले किशोर गा उठते हैं, पायल वाली देखना, यहीं तो कहीं दिल है, पग तले आए ना, तो दांतों तले उंगली दबाने का मन करता है।।

मन्ना डे और किशोर कुमार का जबर्दस्त संघर्ष हमें एक चतुर नार में देखने को मिलता है। बेचारे मास्टर जी सुर ढूंढते ही रह जाते हैं और भोला बिंदु को ले उड़ता है। मनोरंजन से भरपूर, एक हास्य गीत होते हुए भी मन्ना डे, किशोर कुमार और पंचम अपना कमाल बता ही जाते हैं।

तुम नाचो, रस बरसे। बस यही सुर है, यही साधना है। मन मोर हुआ मतवाला, ये किसने जादू डाला। संगीत कान खोलकर और आंख मूंदकर सुनने की चीज है। मतवाली नार, ठुमक ठुमक चली जाए। रोक सको तो, रोक लो अपनी पायल की झंकार। साज हो तुम, आवाज हूं मैं। सुर सधे तो गाएं, साज बजे, तो बजाएं, बाकी हमारे साथ प्रेम की बांसुरी बजाएं, ईश्वरीय संगीत में खो जाएं। मेरे संग गा, गुनगुना। कोई गीत सुहाना, मेरे संग गा।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – “पूज्य एवं प्रेरणास्रोत साहित्य साधक – डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  पूज्य एवं प्रेरणास्रोत साहित्य साधक – डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ? श्री यशोवर्धन पाठक

 

मरण,

आया शरण।

मैंने कहा-

जा अमर हो।

उपरोक्त काव्य पंक्तियों के रचयिता श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करते हुए साहित्यिक क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था।

आज जब मैं अपने अजातशत्रु अग्रज सुमित्र जी को शब्दों के माध्यम से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं तो मेरे मानस पटल पर मेरी पांच दशक की साहित्यिक यात्रा की वे सारी मधुर स्मृतियां जीवंत हो उठीं हैं जो मेरे स्मृति कोष में अमूल्य धरोहर बन गई हैं। इस सुदीर्घ यात्रा में वे हमेशा मेरा संबल बने रहे। संरक्षक, दिशा दर्शक और मार्ग दर्शक के ‌रूप में मुझे हमेशा अपने सिर पर उनका वरदहस्त होने का अहसास होता रहा। उन्होंने मुझे न तो कभी थकने दिया और रुकने दिया, निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं नहीं है कि मैं अपनी पांच दशक की साहित्यिक यात्रा में आज जिस मुकाम पर पहुंच सका हूं, सुमित्रजी के आशीर्वाद के बिना मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था। मेरे स्मृति कोष की किताब के हर पृष्ठ पर सुमित्रजी के अमिट हस्ताक्षर हैं।

सुमित्रजी मेरे पूज्य पिताजी स्व. पं.भगवती प्रसाद पाठक के बहुत बड़े प्रशंसक थे। पिताजी के साथ शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्रों में पिताजी के योगदान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था। कालांतर में स्थानीय नवीन दुनिया समाचार पत्र में साहित्य संपादक के रूप में सुमित्रजी ने मेरे अग्रज हर्षवर्धन, सर्वदमन और प्रियदर्शन जी के मार्गदर्शक सहयोगी की भूमिका का निर्वाह किया। इसी अवधि में मेरे जीवन में वह दुर्लभ क्षण आया जब मुझे उन्होंने जीवन भर के लिए अपने मोहपाश में जकड़ लिया। 1977 में अपने अनुजवत् मित्र राजेश पाठक प्रवीण के साथ मिलकर जब मैंने। उदित लेखक संघ संस्था की नींव रखी तो सुमित्रजी जी ही मुख्य परामर्शदाता और मार्गदर्शक थे। इस संस्था का प्रथम आयोजन स्थानीय जानकीरमण महाविद्यालय के सभागार में हुआ था जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में हम लोगों ने स्व हरिकृष्ण त्रिपाठी और सुमित्रजी को आमंत्रित किया था। उस अविस्मरणीय ऐतिहासिक आयोजन से ही राजेश पाठक प्रवीण ने कार्यक्रम संचालन के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा और आज एक कुशल संचालक के रूप में उनकी ख्याति इस महादेश की सीमाओं को भी पार कर चुकी है। राजेश पाठक का कुशल मंच संचालन आज हर साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजन की सफलता की गारंटी बन चुका है। मेरे समान ही राजेश पाठक प्रवीण भी यह मानते हैं कि आज वे जिस मुकाम पर हैं वहां तक पहुंचने में सुमित्रजी का प्रोत्साहन और मार्गदर्शन हमेशा उनका संबल बना है।

सुमित्रजी तपस्वी, मनस्वी, यशस्वी साहित्यकार थे। उन्होंने चालीस से अधिक कालजयी कृतियों का सृजन किया। उन्हें उनकी सुदीर्घ साहित्य साधना के लिए देश विदेश में अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित किया गया। संस्कारधानी के बहुसंख्य साहित्यकारों की कृतियों के लिए आशीर्वचन और भूमिकाएं लिखकर सुमित्रजी ने उन्हें गौरवान्वित किया। किसी भी पुस्तक के लिए सुमित्रजी की कलम से लिखी गई भूमिका उस पुस्तक पर सुमित्रजी की मुहर मानी जाती थी। सुमित्रजी की मुहर मतलब उस पुस्तक की सफलता की गारंटी। लगभग दो दशक पूर्व प्रकाशित मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह ‘ जांच पड़ताल ‘ की सफलता भी सुमित्रजी की मुहर ने पहले ही सुनिश्चित कर दी थी। सुमित्रजी लंबे समय तक हिंदी पत्रकारिता से जुड़े रहे। संस्कारधानी से प्रकाशित सांध्य दैनिक जयलोक के संपादक के रूप में सुमित्रजी ने हिंदी पत्रकारिता को नयी दिशा प्रदान की। जबलपुर जिला पत्रकार संघ में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का हुए कुशलता पूर्वक निर्वहन किया। वास्तविक अर्थों में सुमित्रजी अपने आप में एक संपूर्ण संस्था थे जिसके अंदर संवेदनशील कवि, विद्वान लेखक, सजग पत्रकार, शिक्षाविद, प्रखर वक्ता आदि सब एक साथ समाए हुए थे।

सुमित्रजी सैकड़ों साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण और मार्गदर्शक और नयी पीढ़ी के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत थे। संस्कारधानी में कला साहित्य की अनूठी संस्था पाथेय कला अकादमी के संस्थापक थे। सुमित्रजी साहित्य जगत का वट वृक्ष थे जिसकी शाखाएं दूर दूर तक फैली हुई थीं। उनका अपना एक युग था। सुमित्रजी के देहावसान ने उस युग का अवसान कर दिया है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि सुमित्रजी साहित्य जगत में एक ऐसा शून्य छोड़कर गए हैं जिसे सुमित्रजी ही पुनर्जन्म लेकर भर सकते हैं।

जयंती पर शत शत नमन🙏

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – “सुमित्र जी की समावेशी साहित्यिक दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

?  आलेख – सुमित्र जी की समावेशी साहित्यिक दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

जबलपुर के साहित्यिक परिदृश्य में  डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ एक ऐसे सृजनधर्मी साहित्यकार के रूप में उभरे जिनकी उदार साहित्य दृष्टि ने न केवल साहित्य जगत बल्कि समस्त सांस्कृतिक परिवेश को गहराई तक प्रभावित किया। छह दशकों से अधिक समय तक फैले उनके साहित्यिक जीवन ने हिंदी साहित्य को चालीस से अधिक कृतियाँ प्रदान कीं, जिनमें कविता, निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना और समालोचना जैसी विविध विधाओं में उनकी रचनात्मकता की छाप अंकित है। उनकी लेखनी पर सवार यात्रा में निरंतर विकास और प्रयोगशीलता देखने को मिलती है, जहाँ 1960 के दशक में ही उनकी कविताओं ने प्रतीक, भावबोध, बिम्ब विधान और शब्दावली के स्तर पर परिपक्वता का परिचय दिया था।

डॉ सुमित्र की साहित्यिक दृष्टि की सबसे विशिष्ट बात थी नवोदित रचनाकारों के प्रति उनका उदार और प्रोत्साहनपूर्ण रवैया। वे दूसरों के सृजन को अपने सृजन से ज्यादा महत्व देते थे, इसी भावना के तहत उन्होंने ‘पाथेय प्रकाशन’ की स्थापना की जिसके माध्यम से अनेक युवा रचनाकारों की कृतियाँ प्रकाश में आईं। डॉ शिव कुमार सिंह ठाकुर के शब्दों में, “उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना, समालोचना आदि के विविध क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास भी किया है।” हेमन्त बावनकर को 42 वर्ष पूर्व लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था – “तुम्हारा लेखन पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि तुम नौसिखिये हो… सबसे बड़ी बात यह है कि संवेदना की शक्ति और जीवन की दृष्टि तुम्हारे पास है।” यह पत्र उनकी उदार समावेशी साहित्यिक दृष्टि का परिचायक उदाहरण है।

उनकी साहित्य दृष्टि की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी साहित्य को समाज से जोड़ने का प्रयास। डॉ सुमित्र ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम समझा। उनकी रचनाओं में समाज के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया। उनके लेखन में भावदीप्त यथार्थ की अभिव्यक्ति मिलती है, जो पाठकों के मन में गहरी अनुभूति जगाती है।

डॉ सुमित्र की प्रमुख कृतियों में ‘संभावना की फसल’, ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द’, ‘आदमी तोता नहीं’, ‘यादों के नागपाश’, ‘खूंटे से बंधी गाय-गाय से बंधी स्त्री’ और बुंदेली काव्य ‘बढ़त जात उजियारो’ हैं।

साहित्य सृजन के साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाई। वे जबलपुर की साहित्य सांस्कृतिक संस्था ‘मित्रसंघ’ के संस्थापक सदस्य रहे। इसके अलावा वे ‘पाथेय साहित्य कला अकादमी’ के संस्थापक भी रहे, जिसके माध्यम से उन्होंने अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय और कोयला व खान मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समितियों में भी सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने हिंदी भाषा के विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण सुझाव दिये।

27 फरवरी 2024 को उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य जगत ने एक ऐसे साहित्य स्तंभ को खो दिया जिसने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। किन्तु उनकी साहित्यिक दृष्टि और रचनात्मक विरासत आने वाली पीढ़ियों को साहित्य साधना के लिए प्रेरित करती रहेगी। डॉ सुमित्र का मानना था कि “लेखन ही जीवन का धर्म कर्म और अध्यात्म है”, और इसी आस्था को उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। उनकी उदार साहित्य दृष्टि ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई चेतना का संचार किया और नव रचनाकारों को मंच व प्रोत्साहन देकर साहित्यिक लोक का समावेशी विस्तार किया है। उनकी साहित्यिक साधना, संगठन और संपादन हर कसौटी पर नवोन्मेषी और प्रेरणादायक बनी रहेगी।

उनकी पुण्य स्मृति को नमन🙏

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१३ ⇒ जूता पुराण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जूता पुराण।)

?अभी अभी # ८१३  ⇒ आलेख – जूता पुराण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यूं तो फिलहाल त्योहारों और जीएसटी में भारी छूट का मौसम चल रहा है, बूंद बूंद की बचत से घड़ा भर रहा है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में हर तरफ जूता छाया हुआ है। यह जूता कोई साधारण जूता नहीं है, यह एक ऐतिहासिक कृत्य को अंजाम देने वाला सुप्रीम कोर्ट रिटर्न जूता है।

वैसे देखा जाए, तो जूते बहुत चलते हैं, क्योंकि आजकल लोग कम ही पैदल चलते हैं। मैं सिर्फ पैसे वसूल करने के लिए अधिक से अधिक पैदल चलता हूं, इसलिए मेरे जूते कम चलते हैं। मेरा जूता बहुत चल गया है, उसे शर्म आ गई, लेकिन मुझे अभी तक शर्म नहीं आई।।

थक हारकर एक महंगा जूता (चार अंकों वाला) खरीद ही लिया। जब एक विवाह समारोह में उसका उद्घाटन किया, तो उसने मेरा पांव ही काट लिया।

यह तो मेरी बिल्ली, मुझसे ही म्याऊं वाली बात हो गई। मैने अपना गुस्सा जूते पर निकाला और उसे ठंडे डब्बे में बंद कर दिया। जब कोई इंसान एक बार निगाह से उतर जाता है, तो फिर उसे मुंह नहीं लगाया जाता, फिर इस जूते की क्या औकात, जो मैं इसे सिर पर बिठाऊं।

हम भारतीय, वस्तुओं का मूल्य भी जानते हैं और उसकी उपयोगिता भी। घूरे से सोना बनाना कोई हमसे सीखे। हमारे लिए कोई वस्तु अनुपयोगी नहीं होती। यहां तक कि सड़े टमाटर और अंडों का सदुपयोग भी हम कवि सम्मेलन और नेताओं के भाषण के वक्त कर लिया करते हैं। राजनीतिक गोष्ठियों में जूता चलना तो आम बात है। इसके लिए जूतम पैजार जैसे शब्द का आविष्कार यूँ ही नहीं हो गया।।

वैसे तो राग दरबारी में जुतियाने पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, लेकिन आप शायद नहीं जानते, कोल्हापुरी चप्पल का आविष्कार भी सिर्फ मजनुओं को पीटने के लिए ही हुआ है। गांवों में कभी चमरौधा जूता चलता था, जो चमड़े का होता था, और उस पर पॉलिश नहीं होती थी, अपितु उसे सरसों का तेल पिलाया जाता था।

चलते समय वह चर्र चर्र की आवाज करता था, लेकिन जब किसी को पड़ता था, तो उसकी तबीयत हरी हो जाती थी।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है, जिसका उपयोग संसद से सड़क तक आसानी से किया जा सकता है। हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपना फटा पुराना जूता फेंककर नया खरीद ले, लेकिन किसी की जूते से पूजा करना यह किसी भी धर्म पद्धति में नहीं लिखा है। सम्मान में हार और अपमान में जूतों का हार, यह कहां की तहजीब है, कानून कायदा है।।

होते हैं कुछ कायर लोग, जिनमें शालीन तरीके से विरोध करने की ना तो तमीज होती है और ना ही हिम्मत। ऐसे लोग दूर से ही जूता फेंककर मारते हैं।

आम आदमी अदालत की अगर तौहीन करता है, तो यह अदालत की मानहानि कहलाती है। क्या न्याय के मंदिर में जूता चलाना, और मंदिर में जूते पहनकर जाना एक ही बात है। मंदिर और पुजारी को इसमें आपत्ति हो सकती है, लेकिन भगवान को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक विशुद्ध आस्था का मामला है।

ईश्वर में विश्वास और न्याय के मंदिर पर अविश्वास और अश्रद्धा होने पर ही ऐसे कुकृत्यों को अंजाम दिया जा सकता है।।

जितना ईश्वर दयालु है उतने ही दयालु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी निकले।

उन्होंने इस घटना का संज्ञान ही नहीं लिया। यक्ष प्रश्न, फिर आखिर वह जूता किसके सर पर पड़ा।

हमारी कहावत तो यही कहती है, जिसका जूता, उसी का सर। फिर भी दिल बहलाने को यह खयाल अच्छा है, कि कानून अंधा, गूंगा और बहरा हो सकता है, लेकिन सनातन प्रेमियों के रहते हमारे विष्णु भगवान असहाय, लाचार नहीं, सर्वशक्तिशाली, सर्व व्यापक, घट घट व्यापक, जगत नियंता, परम पिता परमेश्वर हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९७ ☆ शिकायतें नहीं वाज़िब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिकायतें नहीं वाज़िब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९७ ☆

☆ शिकायतें नहीं वाज़िब… ☆

न जाने कौन सी शिकायतों का हम शिकार हो गये/ जितना दिल साफ रखा, उतने हम गुनहगार हो गये–गुलज़ार की यह पंक्तियाँ हमें जीवन के कटु सत्य से अवगत कराती हैं। मानव जितना छल-कपट, राग-द्वेष व स्व-पर से दूर रहेगा, लोग उसे मूर्ख समझेंगे; अकारण दोषारोपण करेंगे और उसका उपहास करेंगे–जिसका मूल कारण है आत्मकेंद्रिता का भाव अर्थात् स्व में स्थित रहना और बाह्याडंबरों में लीन न होना तथा अपने से इतर व्यर्थ की बातों का चिंतन-मनन न करना। ऐसा इंसान दुनियादारी से दूर रहता है, मानव निर्मित कायदे-कानूनों की परवाह नहीं करता तथा प्रचलित परंपराओं, मान्यताओं व अंधविश्वासों में लिप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति से लोगों को बहुत-सी शिकायतें रहती हैं, जिससे उसका दूर का नाता भी नहीं होता।

वैसे भी आजकल लोग शुक्रिया कम, शिकायतें अधिक करते हैं। वैसे तो यही दुनिया का दस्तूर है। शिकायत करने से अहम् का पोषण होता है और शुक्रिया करते हुए अहम् का विगलन व विसर्जन होता है और दूसरे को महत्ता देने का भाव रहता है, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं होता। शिकायतें न करने से दोनों पक्षों का हित होता है।

शिकायत व निंदा का निकट का संबंध है। शिकायतें आप व्यक्ति के मुख पर करते हैं और निंदा उसके पीछे करते हैं। यदि हम दोनों में भेद करना चाहें, तो शिकायतें निंदा से बेहतर हैं और उनका समाधान भी लभ्य होता है। शायद! इसलिए ही कबीर ने निंदक को अपने समीप  रखने का संदेश दिया है, क्योंकि वह आपको आपकी कमियों, दोषों व सीमाओं से अवगत कराता है तथा स्वयं से अधिक अहमियत देता है; अपना अमूल्य समय आपके हित नष्ट करता है। है ना वह आपका सबसे बड़ा हितैषी? चलिए, उसके द्वारा निर्दिष्ट सुझावों पर ध्यान दें।

शिकायतें यदि स्वार्थ हित की जाती है तो उन पर ध्यान ना देना उचित है। यदि वे वाज़िब हैं, तो उसे दूर करने का प्रयास करें। इससे आत्मविश्वास ही नहीं, परहित भी होगा। परंतु यह तभी संभव है, जब आपके हृदय में किसी के प्रति मलिनता का भाव ना हो। उसके लिए आवश्यक है, अपने हृदय को गंगा जल की भांति पावन व निर्मल रखने की। जैसे गंगाजल बरसों तक पवित्र रहता है, उसमें कोई दोष उत्पन्न नहीं होता, हमें भी स्वयं को माया-मोह के बंधनों से मुक्त रखना चाहिए। ‘ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या’ को स्वीकारते हुए मानव शरीर को पानी के बुलबुले की भांति नश्वर, क्षणिक व अस्तित्वहीन स्वीकारना चाहिए और संसार को दो दिन का मेला, जहां मानव को दिव्य खुशी पाने के लिए एकांत में रहना अपेक्षित है, क्योंकि मौन हमें ऊर्जस्वित करता है।

समय नदी की भांति निरंतर गतिशील है तथा प्रकृति पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी आते- जाते रहते हैं। इस संसार में जो भी मिला है, प्रभु का कृपा प्रसाद समझ कर स्वीकारें, क्योंकि सब यहीं छूट जाना है। ‘यह किराए का मकाँ है/  कौन तब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जायेगा।’  वैसे शिकायत अपनों से होती है, गैरों से नहीं, क्योंकि शिकायत का सीधा संबंध निजी स्वार्थ से होता है; दूसरों के हृदय में आपके प्रति ईर्ष्या भाव नहीं होता– क्योंकि उनका आपके साथ गहन संबंध नहीं होता। अपनों की भीड़ में अपनों को तलाशना दुनिया का सबसे कठिनतम कार्य है। अक्सर अपने ही आप पर पीछे से वार करते हैं। इसलिए मानव को यह सीख दी गई है कि ‘पीठ हमेशा पीछे से मज़बूत रखें, क्योंकि शाबाशी और धोखा दोनों पीछे से मिलते हैं।’ जो इंसान दूसरों पर अधिक विश्वास करता है, सबसे अधिक धोखे खाता है।

बहुत कमियाँ निकालते हैं हम, दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात हम उस आईने से भी कर लें’ अर्थात् दूसरों से शिकायतें व दोषारोपण करने से पूर्व आत्मावलोकन करना अत्यंत आवश्यक है। आईना हमें हक़ीक़त से परिचित कराता है, अपने पराये का भेद बताता है/  ज़िंदगी कहाँ रुलाती है हमें/ रुलाते तो वे लोग हैं/  जिन्हें हम अपनी/ ज़िंदगी समझ बैठते हैं। वैसे भी सुक़ून बाहर से नहीं मिलता, इंसान के अंतर्मन में बसता है। बाहर ढूंढने पर तो उलझनें ही मिलेंगी। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/  बेवजह न किसी से ग़िला कीजिए।’ जी हाँ! मेरे गीत की पंक्तियाँ इसी कटु यथार्थ से परिचित कराती हैं कि जीवन में उलझनें बहुत है। परंतु हमें उनका समाधान अपने अंतर्मन में ढूँढना चाहिए, क्योंकि जब समस्या हमारे मन में है तो समाधान दूसरों के पास कैसे संभव है?

हम अपने मन के मालिक हैं और उस पर अंकुश लगा दिशा परिवर्तन कर सकते हैं। परंतु है तो यह अत्यंत कठिन, क्योंकि वह तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। ‘मन को मंदिर हो जाने दो/ देह को चंदन हो जाने दो/ मन में उठ रहे संशय को/ उमड़-घुमड़ कर बरस जाने दो’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ इसी भाव को प्रकट करती हैं। यदि मन मंदिर होगा, तो देह चंदन की भांति पावन रहेगी और मन प्रभु चरणों में समर्पित होगा। ऐसी स्थिति में संदेह, संशय व शंका के बादल बरस जाएंगे और मन उस दिशा  की ओर चल निकलेगा। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ यदि आपका हृदय पवित्र है, तो आपको गंगा स्नान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसमें दुष्भावनाओं का वास नहीं होना चाहिए। परंतु 21वीं सदी इसका अपवाद है। आजकल वही व्यक्ति दोषी ठहराया जाता है, जिसका हृदय निर्मल, निश्छल व पवित्र होता है तथा उसमें कलुषता नहीं होती। ‘शक्तिशाली विजय भव’ आज का नारा है। निर्बल पर प्रहार किए जाते हैं। वैसे तो यह युगों-युगों की परंपरा है। आइए! स्वयं को इस जंजाल से मुक्त रखें। सरल, सहज व सामान्य जीवन जीएँ। अपेक्षा व उपेक्षा से दूर रहें, क्योंकि यह संसार दु:खालय है। जीवन अनमोल है और हर पल को अंतिम जानकर जीएँ। पता नहीं, यह हंसा तब उड़ जाएगा। खाली हाथ तू आया है/ खाली हाथ तू जाएगा। ‘जितना दिल साफ रखा/ उतना हम गुनहगार हो गए।’ परंतु हमें यही सोचना है कि जीवन यात्रा बहुत छोटी है। हमें तेरी-मेरी अर्थात् निंदा-स्तुति के जाल में नहीं फँसना है ।भले ही हम पर कितने ही इल्ज़ाम लगाए जाएं। झूठ के पाँव नहीं होते और सत्य सात परर्दों के पीछे से भी उजागर हो जाता है। संघर्ष अखरता ज़रूर है, लेकिन बाहर से सुंदर व भीतर से मज़बूत बनाता है।

समय और समझ दोनों को दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलते हैं, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल चुका होता है। सो! दस्तूर-ए- दुनिया को समझिए, पर अपने मन को मालिन मत होने दें। ‘ज़िंदगी में समझ में आ गई तो अकेले में मेला/ समझ में नहीं आई तो मेले में अकेला।’ सो! चिंतन-मनन कीजिए और प्रसन्नता के भाव से ज़िंदगी बसर कीजिए। शिकायतें तज, शुक्रिया करें और जो मिला है, उसी में संतोष से रहें। यह जीवन व समय बहुत अनमोल है, लौट कर आने वाला नहीं। हर लम्हे को अंतिम साँस तक खुशी से जी लें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१२ ⇒ प्रशंसक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रशंसक।)

?अभी अभी # ८१२  ⇒ आलेख – प्रशंसक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुण के गाहक सहस नर !

यह मनुष्य का स्वभाव है कि उसे जो चीज पसंद आती है, वह उसका प्रशंसक बन जाता है। हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना ! यह हकीकत भी हो सकती है और अतिशयोक्ति भी, लेकिन इसमें भी प्रशंसा का भाव ही निहित है। गुणगान भी प्रशंसा ही है, और तो और किसी चीज का विज्ञापन भी प्रशंसा ही। भले ही प्रशंसा आजकल पेशा बन गया हो, लेकिन सच तो यह है कि प्रशंसा हर इंसान की कमजोरी है। कुछ पति इतने कंजूस होते हैं कि दुनिया भर की तारीफ करेंगे, लेकिन कभी अपनी पत्नी की प्रशंसा में एक शब्द नहीं बोलेंगे। दो मीठे बोल ही तो प्रशंसा है। प्रशंसा जीवन का टॉनिक है। तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया। हम सब में एक प्रशंसक छुपा है।

कल अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों का दिन था। अमिताभ की एक पुरानी फिल्म थी, सौदागर, जरा उसके इस गीत पर गौर फरमाइए ;

हर हंसीं चीज का मैं तलबगार हूं।

रस का, फूलों का,

गीतों का बीमार हूं।।

कुछ ऐसे ही भाव इस गीत में भी देखे जा सकते हैं ;

आने से उसके आए बहार

जाने से उसके जाए बहार

बड़ी मस्तानी है, मेरी महबूबा।

रुत ये सुहानी है, मेरी महबूबा।।

एक प्रशंसक कोई संपादक, समीक्षक, आलोचक अथवा समाज सुधारक नहीं होता। एक प्रशंसक के लिए कोई स्कूल, कॉलेज नहीं, कोई कोचिंग क्लास नहीं, कोई डिग्री डिप्लोमा नहीं, उसका कवि, लेखक अथवा साहित्यकार होना भी जरूरी नहीं ! एक अंगूठा छाप, निरक्षर भी किसी का प्रशंसक हो सकता है। प्रशंसा पर किसी का कॉपीराइट नहीं।।

प्रेम में तो फिर भी ढाई अक्षर है, फैन जी हां, फैन में तो सिर्फ दो अक्षर है।

किसी का मुरीद होना, अथवा प्रशंसक होना क्या इतना आसान है। हमें पता ही नहीं चलता, हम कब किसके प्रशंसक बन जाते हैं। उसकी तारीफ के पुल बांधने लगते हैं, उसकी बुराई नहीं सुन सकते, लोगों से लड़ने लग जाते हैं। क्या किसी का प्रशंसक होना, उसकी गिरफ्त में होना नहीं। ऐसे ही प्रशंसक जब किसी गलत व्यक्ति या विचारधारा के प्रशंसक हो जाते हैं, तो गिरफ्तार भी हो जाते हैं।

मैं भी एक इंसान हूं, और किसी का प्रशंसक भी ! एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त है, जो अगर शुरू हुई, तो खत्म होने का नाम नहीं लेगी। कहीं मेरी स्मरण शक्ति जवाब दे देगी तो कहीं मेरे शब्द और मेरी जुबां। एक शब्द है चुनिंदा जिसमें शामिल हैं मोहम्मद रफी, महमूद और अमीन सयानी, लता, सुरैया और खुर्शीद, मंटो, मोहन राकेश और शैलेश मटियानी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव वेद, परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल, कुबेरनाथ राय, विनोद खन्ना, जगजीत सिंह और गिरीश कर्नाड। पंडित जसराज, भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व, साहिर, शैलेंद्र और संगीतकार उषा खन्ना।।

जो इन चुनिंदा में शामिल नहीं, उन सबमें वे शामिल हैं, जिनके आप भी प्रशंसक हैं। सूर, तुलसी, कबीर और मीरा बाई के तो सब प्रशंसक हैं, अगर छूट जाती हैं तो सहजोबाई। इन्हें सुना नहीं जाता, गुना जाता है। जब किशोरी अमोणकर गाती हैं, म्हारो प्रणाम, बांके बिहारी जी, तो वही प्रशंसा स्मरण, कीर्तन और भजन में परिवर्तित हो जाती है। सहज समाधि लग जाती है।

प्रशंसा क्या है, राम का गुणगान, कृष्ण का ध्यान ही तो उस निर्गुण, निराकार, ओंकार की आराधना है। जहां साकार निरंकार एक होते हैं, यही वह सृष्टि है, वही सगुण है और वही निर्गुण।

जो घट घट में व्याप्त है, हम तो वास्तव में उसी के प्रशंसक हैं ;

जाकी रही भावना जैसी।

प्रभु मूरत, तिन देखी तैसी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप  ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप ? ?

तीसरा शब्ददीप

आज भाईदूज है। प्रातःभ्रमण पर हूँ। हर तरफ सुनसान, चुप। दीपावली के बाद शहर अलसाया हुआ है। सोसायटी का चौकीदार भी जगह पर नहीं है। इतनी सुबह दुकानें अमूमन बंद रहती हैं पर अख़बार वालों, मंडी की ओर जाते सब्जीवालों, कुछ फलवालों, जल्दी नौकरी पर जाने वालों और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों से सड़क ठसाठस भरी रहती है। आज सार्वजनिक छुट्टी है। नौकरीपेशा, विद्यार्थी सब अपने-अपने घर पर हैं। सब्जी मंडी भी आज बंद है। अख़बारों को कल छुट्टी थी। सो आज अख़बार विक्रेता भी नहीं हैं। वातावरण हलचल की दृष्टि से इतना शांत जैसे साइबेरिया में हिमपात के बाद का समय हो।

वातावरण का असर कुछ ऐसा कि लम्बे डग भरने वाला मैं भी कुछ सुस्ता गया हूँ। डग छोटे हो गये हैं और कदमों की गति कम। देह मंथर हो तो विचारों की गति तीव्र होती है। एकाएक इस सुनसान में एक स्थान पर भीड़ देखकर ठिठक जाता हूँ। यह एक प्रसिद्ध पैथालॉजी लैब का सैम्पल कलेक्शन सेंटर है। अलसुबह सैम्पल देने के लिए लोग कतार में खड़े हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें वृद्धों के साथ-साथ मध्यम आयु के लोग काफी हैं। मुझे स्मरण हो आता है, ‘ शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा।’

सबसे बड़ी सम्पदा स्वास्थ्य है। हम में से अधिकांश  अपनी जीवन शैली और लापरवाही के चलते प्रकृति प्रदत्त इस सम्पदा की भलीभाँति रक्षा नहीं कर पाते हैं। चंचल धन और पार्थिव अधिकार के मद ने आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि हम त्योहार या उत्सव की मूल परम्परा ही भुला बैठे हैं। आद्य चिकित्सक धन्वंतरी की त्रयोदशी को हमने धन की तेरस तक सीमित कर लिया। रूप की चतुर्दशी, स्वरूप को समर्पित कर दी। दीपावली, प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने, मूल्यों की विजय एवं अर्चना का प्रतीक न होकर केवल द्रव्यपूजन का साधन हो गई।

उत्सव और त्योहारों को उनमें अंतर्निहित उदात्तता के साथ मनाने का पुनर्स्मरण हमें कब होगा? कब हम अपने जीवन के अंधकार के विरुद्ध एक दीप प्रज्ज्वलित करेंगे? जिस दिन एक भी दीपक सुविधा के अर्थ के अंधेरे के आगे सीना ठोंक कर खड़ा हो गया, यकीन मानिये, अमावस्या को दीपावली होने में समय नहीं लगेगा।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को  आँवला नवमी,अक्षय नवमी या धात्री नवमी भी कहा जाता है।इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है।

माना जाता है कि इस वृक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी सहित निवास करते हैं।जो व्यक्ति इस दिन आँवले की पूजा और इसका दान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में  इसे“अमृत फल” कहा गया है ।इसकी छाया में बैठने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं। ये सब तो आध्यात्मिक महत्व है । इसके साथ ही इसके औषधीय गुण भी हैं जैसे-

त्रिदोष नाशक: वात, पित्त, कफ — तीनों दोषों को संतुलित करता है।

विटामिन C का भंडार: एक आँवले में एक संतरे से 20 गुना अधिक विटामिन C होता है।

  • प्रतिरक्षा शक्ति (इम्युनिटी) बढ़ाता है।
  • बालों को काला और घना रखता है।
  • आंखों की रोशनी में सुधार करता है।
  • पाचन क्रिया सुधारता है।
  • त्वचा को चमकदार बनाता है।

च्यवनप्राश, त्रिफला, आंवला मुरब्बा, रस, तेल आदि में मुख्य घटक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ।

हरियाली से जुड़े पर्व सनातन संस्कृति को वैज्ञानिक आधार पर भी संपुष्ट करते हैं ।

यह वृक्ष यह हवा को शुद्ध करता है।इसके पत्ते, फल, और जड़ सब उपयोगी है।भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद करता है।

हमारी संस्कृति हमें अध्यात्म के साथ- साथ चैतन्य भी बनाती है, हम सपरिवार वनभोज करने आँवला वृक्ष के नीचे जाते हैं, उसकी छायातले बैठकर, पूजन अर्चन करके महाप्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं ।

आइए मिलकर संकल्प लें कि इस तरह के त्योहारों से अपने बच्चों को जरूर जोड़ेंगे जिससे ये चेतना दिनों दिन बढ़े और हमारी धरती हरी- भरी रहे ।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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