हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२० ⇒ |||संस्पर्श||| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|||संस्पर्श|||।)

?अभी अभी # ८२० ⇒ आलेख – |||संस्पर्श||| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Contiguity)

किसी से इतना सामिप्य, कि स्पर्श का अहसास होने लगे, संस्पर्श कहलाता है।

यह आकस्मिक भी हो सकता है और प्रयत्न स्वरूप भी। भीड़ में ऐसा स्पर्श स्वाभाविक है, क्योंकि वहां तो धक्का मुक्की भी होती है और इरादतन चेष्टा भी। कुछ लोगों के लिए यह स्वाभाविक और अपरहार्य भी हो सकता है तो कुछ के लिए असुविधाजनक और तकलीफदायक। बच्चे, वृद्ध और बीमार अक्सर जहां भीड़ और भगदड़ के शिकार होते हैं, वहीं महिलाओं के लिए तो यह स्थिति और भी बदतर हो सकती है, जिसमें कुचेष्टा के साथ साथ अभद्र व्यवहार की भी आशंका बनी रहती है।

स्पर्श में सुख है, अगर वह आपकी मर्जी और सहमति से हो रहा है। बच्चों का कोमल स्पर्श कितना रोमांचित कर देता है। प्रेम और रिश्तों की गर्माहट है जहां, संस्पर्श की संभावना है वहां। एक विज्ञापन में तो युवा मां और उसकी अति सुंदर और नाजुक बिटिया की कोमल त्वचा की देखभाल पारदर्शी पियर्स pears साबुन ही करता है।।

मुझे जड़ और चेतन दोनों में इस स्पर्श का अहसास होता है। स्पर्श को छूना भी कहते हैं, कोई भी चीज आपके मन को छू सकती है। फूल से कोमल बच्चे भी होते हैं और रात को हमारे सिरहाने लगा तकिया भी। टेडी बियर में ऐसा क्या है, आखिर है तो वह भी निर्जीव ही।

गुलाबी ठंड और सुबह सवा पांव बजे का वक्त ! सुबह का टहलना और सांची प्वाइंट के बूथ से दूध लाना, यानी एक पंथ दो काज, मेरी दिनचर्या का अंग है। दूध के इंतजार में चौराहे पर अकेले खड़े रहने का भी एक अलग ही आनंद है। इक्के दुक्के इंसान और मोहल्ले के आवारा कुत्ते चौराहे को व्यस्त बनाए रखते हैं। जो इन कुत्तों से डरते हैं, वे सुबह टहलने नहीं जाते अथवा किसी लाठी का सहारा अवश्य ले लेते हैं।।

मुझमें कुछ ऐसा खास है कि कुत्ते मेरे पास नहीं फटकते और अगर कोई गलती से पास आ गया, तो वह और अधिक पास आने की कोशिश करता है। उसे पास बुलाने में कुछ योगदान मेरी चेष्टाओं का भी हाथ होता है।

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। दूध के इंतजार में मैं चौराहे का निरीक्षण कर रहा था। अचानक एक काले सफेद रंग का कुत्ता मेरे सामने से गुजरा। वह जब तेज चलने की कोशिश करता था, तो उसका एक पांव लंगड़ाने लगता था। एक स्वाभाविक दया अथवा करुणा का संचार मेरे मन में हुआ होगा, मुझे नहीं पता।।

एकाएक घूमते घूमते वह मेरे पास आकर ठिठक गया। कुत्ते सूंघकर निरीक्षण करते हैं। एक दो चक्कर लगाकर, वह थोड़ा और पास आकर मेरे पास खड़ा हो गया। न जाने क्यों, बेजुबान प्राणियों की आँखें मुझे लगता है, बहुत कुछ कह जाती हैं। उसने मुझसे लगभग सटकर, मुंह ऊंचा कर दिया। अब वह मेरी कमजोरी का फायदा उठा रहा था।

मुझे गाय को सहलाने की आदत है। हमारे छूने का इन प्राणियों को अहसास होता है। इनके कहां हमारी तरह हाथ होते हैं।

ये प्राणी अक्सर किसी दीवार अथवा पेड़ से अपना शरीर रगड़ लेते हैं।

गाय हो या कुत्ता बिल्ली, अधिक लाड़ में ये अपना मुंह ऊपर कर देते हैं ताकि आप इनको आसानी से सहला सकें।।

हमारे अजनबी श्वान महाशय ने भी यही किया। और हमने भी, आदत से मजबूर, उसे सहला भी दिया। बस कुत्ते में इंसान जाग उठा। वह तो हमारे गले ही पड़ गया। इतने में मेरे पास एक दो कुत्ते और आ गए, और मेरे वाले कुत्ते पर भौंकने लगे। शायद मैं उनके इलाके का था, और जिस कुत्ते को मैने मुंह लगाया था, वह किसी और इलाके का होगा।

उनके लगातार भौंकने से मेरा वाला कुत्ता विचलित हो गया, और उसे मजबूरन मुझे छोड़कर जाना पड़ा।

मुझे अब केवल इन कुत्तों से छुटकारा पाना था। क्योंकि उनकी मुझमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। उनका उद्देश्य शायद केवल उस कुत्ते को खदेड़ना ही रहा होगा।।

गुलजार अप्रत्यक्ष रूप से शायद इन शब्दों में यही कहना चाहते होंगे ;

हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू।

हाथ से छू के इसे

रिश्तों का इल्जाम ना दो।।

जब गुलजार की ये पंक्तियां हमें इतना छू जाती हैं, तो रिश्तों की तो बात ही कुछ और है। मजबूर हम, मजबूर तुम। प्रेम के वशीभूत हमने तो जानवर में इंसान जागते देखा है, कभी तो यह इंसान भी जागेगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ रात की मुस्कान–पारिजात ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ रात की मुस्कान–पारिजात ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

ऐसा नहीं कि इन्द्र दरबार की अप्सरा ” उर्वशी” ही पारिजात के कोमल फूलों को छू सकती है। उसकी महक और दूधिया सिन्दूरी रंग को नैनों में बसा सकती है। समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक दिव्य पुष्प पारिजात की पंखुड़ी पंखुड़ी पर लिखी हुई पौराणिक कथाओं को बाँच सकती है।

यह द्वापर युग की कथा है कि पारिजात के रूप का जादू कृष्णप्रिया सत्यभामा ने भी अनुभव किया। हुआ यूँ कि देवर्षि नारद ने सत्यभामा को यह मोहक पुष्प भेंट किया। मोहाविष्ट सत्यभामा, कृष्ण से ज़िद कर बैठीं कि उनकी वाटिका में देवतरु चाहिए। इन्द्र के इंकार करने के बावजूद कृष्ण गरुड़ पर बैठकर गये और स्वर्ग से पारिजात धरती पर ले आये। कितनी रूनझुन करती कथा है कि पारिजात रोपा गया सत्यभामा की वाटिका में और फूल झरते रहे रुक्मिणी की बगिया में।

कहा तो ये भी जाता है अर्जुन, यह वृक्ष माता कुन्ती की खातिर स्वर्ग से लेकर आये थे।

हर सिंगार, शेफालिका या शिउली और मराठी में प्राजक्त ये सारे तितली के पंखों जैसे कोमल नाम पारिजात के ही हैं। यूँ ही नहीं इसे पश्चिम बंगाल के राज्य पुष्प का दर्जा दिया गया। इसमें देवत्व का वास है एवं यह सकारात्मकता का सौंदर्य बिखेरता है। कोई इसे  दुःख का वृक्ष कहता है तो कोई ” रात की मुस्कान। “रात के अंधेरे का रेशा रेशा महकाता,प्रकृति की कविता  कहलाता है। हवाएं महक के साथ मधुमय सरगम साथ लिए चलती हैं। सूर्यकिरणों के छूते ही धरती पर झर जाता है। पारिजात के मानी हैं किसी से अवतरित होना या दिव्य रूप से प्रकट होना।

यह हर या शिव का प्रियतम पुष्प है। कितनी सुकुमार अभिव्यंजना है कि इसे तोड़ा नहीं जाता, चुना जाता है।

इसे प्रकृति का उपहार ही कहेंगे कि यह औषधि गुणों से भरपूर है। सायटिका एवं उदर रोगों में रामबाण। रूप गंध रंग के साथ उपचार की बात, गजब है पारिजात।

इतना कोमल  कि डाल से अलग करते हुये हस्तस्पर्श से आहत हो जाता है। इन फूलों का सौंदर्य ही नहीं पीड़ा भी वही समझ सकता है जिसका अंतस पारिजात सा हो।

झरो हरसिंगार झरो

प्राणों से लिपटी है जो

जाने कितने जन्मों से

कुछ तो पीर हरो।।”

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २९ – आलेख – केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २९ ☆

☆ आलेख ☆ ~ केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(प्रकृति के आराधना का पर्व -छठ)

आज सांय अस्त होते सूर्य को अर्घ देने के साथ ही छठ महापर्व के पावन बेला पर भगवान भास्कर की प्रथम पूजा पूर्ण हुई। सदियों नहीं बल्कि युगों से परंपरागत ढंग से मनाए जाने वाली छठ पूजा आज करीब एक दशक बाद बड़े आत्मविश्वास के साथ एवं आत्म संतुष्टि के साथ यह बता पाने में सफल हुई, कि ये पुरबिहा लोग आखिर कौन सी पूजा करते हैं ? और किसकी पूजा करते हैं ?

दरअसल पूर्णतः प्रकृति की पूजा का यह पर्व अपने आत्म गौरव के साथ आज इतने दिनों बाद बताने में सफल हो रहा है कि पूरी दुनिया उगते हुए सूर्य को तो प्रणाम करती है लेकिन अस्त होते सूर्य की पूजा कोई नहीं करता और ऐसे अस्त होते सूर्य की पूजा करने से लाभ ही क्या ? जो अस्त होने के लिए उन्मुख है। लेकिन एक बड़ा जनमानस जो हर बार ट्रेन एवं बसों में धक्के खाते हुए अपने गांव परिवार और अपने घर सिर्फ इसीलिए पहुंचता है कि उसे प्रथम दिवस अस्त होते सूर्य को ही पूजना है। क्योंकि उसे पता था सूर्य अस्त ही कहां होता है। जिस समय यह अस्त हो रहा होता है तो कहीं उदय हो रहा होता है। इसका कारण यह कि वह सामान्य तो है नहीं !!! और सामान्य हो भी क्यों हो!!

इस पृथ्वी पर उगने वाली किसी भी वनस्पति की इतनी क्षमता नहीं, जो सूर्य के प्रकाश के बिना, या सूर्य की आभा के बिना, नदी या सरोवर में स्थिर या बहते जल के बिना स्वयं के जीवन या स्वयं के अस्तित्व को प्राप्त नहीं कर सकते। जब जब की वेद वेदांत में पौराणिक धर्म ग्रंथो में पांच भूतों की बात कही गई है सृष्टि के पंचभूत कोई और नहीं प्रकृति के ही पांच स्वरूप है।

श्री राम किशोर उपाध्याय जी की पुस्तक सृष्टि के गीत इन्हीं पांच भूतों की बात करती है। सूर्य अग्नि तत्वों के साथ पांच भूत का ही अंग है। मैं अपनी बात आगे रखता हूं

हालांकि यह सब मेरा अपना अनुभव है। एक समय हुआ करता था, हम शर्माते थे अपने ही कार्यालय में बैठ यह बात नहीं पाते हैं कि हमारा यह पर्व है क्या ? और इसका महत्व क्या है। हालांकि वह समाज,वह क्षेत्र जो इस सूर्य आराधना के पर्व को श्रद्धा पूर्वक तब भी मनाता था।

उसके आस्था विश्वास और ज्ञान की पराकाष्ठा यह थी कि ऐसे परिवेश में जन्म लेकर यहां की माटी पर लोटपोट कर जिसने ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को छुआ, प्रशासनिक पदों पर रहकर अपने ज्ञान को सिद्ध करता रहा। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरकर यह बताता रहा कि हमारी खगोलीय संरचना क्या है, हमारे लिए सूर्य कितना महत्वपूर्ण है, उसके मन में दसको वर्ष पूर्व भी यह पर्व वैज्ञानिक पर्व था, आस्था के साथ-साथ प्रकृति की पूजा का पर्व था , नदियों और जल तालाबों के संरक्षण का पर्व था, कंदमूल फल जड़ी बूटियां, के महत्व को जानने का पर्व था , जलते हुए अखंड दीप का पर्व, डूबते हुए और अस्त होते हुए सूर्य से निकली हुई निर्विकार किरणों का पर्व था, अपने पूर्वजों के विश्वास का पर्व था, और आज भी उसके लिए श्रद्धा और विश्वास का पर्व है।

एक समय था जब हम परदेस में इस पर्व को मानते थे? हमारे सामने प्रश्न ही होते थे? आज हमारे पास प्रश्न नहीं बल्कि आज सबकी श्रद्धा और सब का विश्वास हमारे साथ है , साधारण विश्वास नहीं बल्कि हमसे ज्यादा अटूट विश्वास है।

निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से लेकर सफलता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति, हर कोई एक साथ, एक कतार में ,एक ही नदी और एक ही तालाब में, घुटने भर पानी में, खड़े होकर अस्त होते सूर्य को निहार, उसको प्रणाम करने, उदय होते हुए सूर्य की अगवानी करने और उसका उसको अर्घ समर्पित करने का सुखद सौहार्दपूर्ण समय ढूढ़ता है।

भगवान भास्कर हमारे जीवन में, अपनी सतरंगी किरणों के द्वारा नवीन विकास के पथ को अपने प्रकाश से प्रकाशित करें। भारत दिन-रात नित नवीन ऊंचाइयों को छू छुए और, इसी प्रकार विकासोंमुख बना रहे।

आप सभी को छठ महापर्व की हार्दिक बधाई…💐🙏

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१९ ⇒ धूम्रपान और मद्यपान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धूम्रपान और मद्यपान।)

?अभी अभी # ८१९ ⇒ आलेख – धूम्रपान और मद्यपान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आपका खानपान अच्छा या बुरा हो सकता है, लेकिन मद्यपान और धूम्रपान किसी भी परिस्थिति में अच्छा नहीं हो सकता। शायर पीने को बुरा नहीं मानते। अगर शराब न हो, तो शायद शायरी भी ना हो। शायर लोग कलम स्याही में नहीं,  शराब में डुबोकर लिखते थे। तब दर्द झलकता था,  और हुस्न के दीदार होते थे।

देव हों या असुर,  दोनों ही इस रस से सराबोर हैं। देव इसे सोम रस कहते हैं,  और असुर इसे सुरा ! सुंदरी का अगर इस धरती पर राज़ है तो अप्सराओं का स्वर्ग पर। कलयुग में इसे अंग्रेज़ी में वाइन और हिंदी में शराब कहते हैं। जो अंग्रेज़ पीते हैं, वह वाइन होती है, जो हम पीते हैं,  वह liquor लिकर होता है। लिकर से लिवर खराब होता है,  वाइन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी गई है।

Wine is divine.डॉक्टर्स ब्रांडी बच्चों को भी दी जाती है।।

शराब में अल्कोहल होता है। अल्कोहल दवाइयों में भी होता है। पुदीन हरा में किसी समय सात प्रतिशत अल्कोहल होता था।पारखी लोग तो पुराने कोको कोला में तांबे का सिक्का डालकर ही मस्त हो जाते थे।

सीनियर बच्चन के हिसाब से मधुशाला हिन्दू मुस्लिम का मेल कराती है। झगड़ा तो मंदिर मस्जिद कराते हैं। जो गरीब देशी मदिरा पीता है, वह सेहत और घर बर्बाद करता है,  जो अमीर विदेशी शराब पीता /पिलाता है,  वह बड़े बड़े ठेके हासिल करता है,  ट्रांसफर करवाता/रुकवाता है। शराब पीकर वाहन चलाना अपराध है,  शराब पीकर वाहन खरीदना नहीं।।

शराब पीने की जितनी सुविधाएं सरकार देती है,  धूम्रपान पर उतनी ही रोक लगाती है। देशी और विदेशी शराब की दुकानों के विज्ञापन बोर्ड देखने के लिए आपको अर्जुन की आंख की आवश्यकता नहीं। बस आंख खुली और दीदार हुए।धूम्रपान निषेध के साथ साथ सार्वजनिक स्थानों पर अगर यह भी लिख दिया जाय कि शराब पीना मना है,  तो लोगों के होश उड़ जाएं।अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन जितना धूम्रपान के प्रति सजग है,  उतना ही इस अंगूर की बेटी के प्रति उदासीन ! कारण वे ही जानें।

आइए अब धूम्रपान पर चर्चा करें ! धूम्रपान का भी एक इतिहास है। इसे मद्यपान का सहयोगी माना गया है। पुरानी महफिलों में जब नाच गाने होते थे, तब मदिरा के साथ बड़े बड़े हुक्के उपयोग में लाए जाते थे। राज दरबार हो या किसी रायबहादुर की कोठी, हुक्का शाही ठाठ में आता था।

शौक पूरे करने में आम आदमी भी कभी पीछे नहीं रहा। गांव गांव में खाट पर, आज भी जाट द्वारा ठाठ से हुक्का गुड़गुड़ा या जाता है। सरपंच हो और हुक्का न हो,  ऐसा हो नहीं सकता।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। हुक्का न सही,  चिलम ही सही ! चिलम फूंकने से आपको कोई नहीं रोक सकता। वह कैसा साधु, जो चिलम भी न पिये। आप चाहे तो उसमें गांजा भरो या चरस। याद कीजिए ! दम मारो दम,  और ज़ीनत अमान को। हरे रामा,  हरे कृष्णा।।

ये अमीर गरीब की खाई कोई नहीं भर सकता। गरीब की बीड़ी और अमीर की सिगरेट ही तो वह एस्केप है,  पलायन है,  जो हर फिक्र को धुएं में उड़ाने की खूबी रखता है। सच बड़ा कड़वा होता है अमर बाबू ! दो कड़वे घूंट ज़िन्दगी की सब कड़वाहट दूर कर देते हैं। सारा तनाव धुआं धुआं हो जाता है।

आप समझदार हैं,  गरीब अथवा अमीर,  अनपढ़ अथवा पढ़े लिखे हैं, आपसे करबद्ध निवेदन है कि धूम्रपान और मद्यपान से दूर रहें। धर्म का नशा उससे भी गहरा है, एक बार उसमें बस पांव रख दें हर हर गंगे हो जाएगा। आपके सभी दुख दर्द दूर हो जाएंगे।।

इतने धार्मिक चैनल हैं। कथा, सत्संग, प्रवचन चल रहे हैं। धर्म के प्रति थोड़े जागरूक हों। इन वामियों ने शराब की गंध और सिगरेट के धुएं से वातावरण को प्रदूषित किया हुआ है। सर पर चंदन लगाएं,  घर में अगरबत्ती। घर में कुत्ता नहीं गाय पालें। सभी धार्मिक आयोजनों, भंडारों और जगरातों में उत्साह से भाग लें। विश्व का कल्याण हो। धर्म की विजय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों का कल्याण हो। धूम्रपान, मद्यपान मुर्दाबाद।

पान खाएँ सैंया हमार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९८ ☆ स्वास्थ्य, पैसा व संबंध… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख स्वास्थ्य, पैसा व संबंध। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९८ ☆

☆ स्वास्थ्य, पैसा व संबंध… ☆

आप जिस वस्तु पर आप ध्यान देना छोड़ देते हैं, नष्ट हो जाती है–चाहे वह स्वास्थ्य हो, पैसा हो या संबंध; यह तीनों आपकी तवज्जो चाहते हैं। जब तक आप उन्हें अहमियत देते हैं, आपका साथ देते हैं और जब आप उनकी ओर ध्यान देना बंद कर देते हैं, वे मुख मोड़ लेते हैं तथा अपना आशियाँ बदल लेते हैं। वे स्वार्थी हैं तथा तब तक आप के अंग-संग रहते हैं, जब तक आप उन्हें पोषित करते हैं अर्थात् उनके साथ अमूल्य समय व्यतीत करते हैं।

स्वस्थ बने रहने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और यह दो प्रकार का होता है। व्यायाम से आप शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेंगे और सकारात्मक सोच व चिंतन-मनन से मानसिक रूप से दुरुस्त रहेंगे, जो जीवन का आधार है। वास्तव में शरीर तभी स्वस्थ रह सकता है– यदि मन स्वस्थ व जीवंत हो और उसका चिंतन सार्थक हो। दुर्बल मन असंख्य रोगों का आग़ार है। भय, चिंता आदि मानव को तनाव की स्थिति में ले जाते हैं, जो भविष्य में अवसाद की स्थिति ग्रहण कर लेते हैं। यह एक ऐसा भंवर है, जिससे    बाहर आना नामुमक़िन होता है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें मानव प्रवेश तो कर सकता है, परंतु बाहर निकलना उसके वश में नहीं होता। वह आजीवन उस भूल-भुलैया में भटकता रहता है और अंत में दुनिया से अपने सपनों के महल के साथ रुख़्सत हो जाता है। इसलिए इसे मानसिक स्वास्थ्य से अधिक अहमियत प्रदान की गई है।

मन बहुत चंचल है और पलभर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। उसे वश में रखना बहुत कठिन होता है। मन भी लक्ष्मी की भांति चंचल है, एक स्थान पर नहीं टिकता। परंतु बावरा मन अधिकाधिक धन कमाने में अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है और भूल जाता है कि यह ‘दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ इतना ही नहीं, वह इस तथ्य से भी अवगत होता है कि ‘खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’  और यह भी शाश्वत् सत्य है कि तूने जो कमाया है/  दूसरा ही खायेगा।’ परंतु बावरा मन स्वयं को इस मायाजाल से मुक्त नहीं कर पाता। जब तक साँसें हैं, तब तक रिश्ता है और साँसों की लड़ी जिस समय टूट जाती है; रिश्ता भी टूट जाता है। ‘जीते जी तू माया में राम नाम को भूला/ मौत का समय आया, तो राम याद आएगा ‘–इन पंक्तियों में छिपा है जीवन का सार। जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे, यह किसी दूसरे की संपत्ति थी और जब तुम मर जाओगे, तो भी  यह किसी दूसरे की होगी। एक अंतराल के लिए यह तुम्हें प्रयोग करने के लिए मिली है। यह प्रभु की संपदा है; किसी की धरोहर नहीं। आज सुबह यह संदेश व्हाट्सएप पर सुना तो हृदय सोचने को विवश हो गया कि इंसान क्यों स्वयं को इस मायाजाल के विवर्त से मुक्त नहीं कर पाता, जबकि वह जानता है कि ‘कलयुग केवल नाम अधारा।’ पैसा तो  हाथ की मैल है और वक्त में सामर्थ्य है कि वह मानव को किसी भी पल अर्श से फ़र्श पर ला सकता है। इसलिए हमें पैसे की नहीं, वक्त की अहमियत को स्वीकारना चाहिए। पैसा इंसान को अहंवादी बनाता है, संबंधों में दूरियाँ लाता है और दूसरों की अहमियत को नकारना उसकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। पैसा ‘हॉउ से हू’ तक लाने का कार्य करता है। जब तक इंसान के पास धन-संपदा होती है, सब उसे अहमियत देते हैं। उसके न रहने पर वह ‘हू आर यू ‘ तक पहुँच जाता है। सो! आप अनुमान लगा सकते हैं कि पैसा कितना बलवान, शक्तिशाली व प्रभावशाली है। यह पलभर में संबंधों को लील जाता है। इसके ना रहने पर सब अपने पराए हो जाते हैं तथा मुख मोड़ लेते हैं, क्योंकि पैसा सबको एक लाठी से हाँकता है। जब तक मानव के पास धन रहता है, उसके कदम धरा पर नहीं पड़ते। वह आकाश की बुलंदियों को छू लेना चाहता है तथा अपने सुख-ऐश्वर्य व खुशियाँ दूसरों से साँझा नहीं करना चाहता।

परंतु सब संबंध स्वार्थ के होते हैं, जो धनाश्रित होते हैं, परंतु आजकल तो यह अन्योन्याश्रित हैं। इंसान भूल जाता है कि यह संसार मिथ्या है; नश्वर है और पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। इसलिए उसे माया में उलझे नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभु के साथ शाश्वत् संबंध बनाए रखना ही कारग़र उपाय है। ‘सुमिरन कर ले बंदे/ यह तेरे साथ जाएगा।’ प्रभु नाम ही सत्य है और अंतकाल वही मानव के साथ जाता है।

संबंध ऐसे बनाओ कि आपके चले जाने के पश्चात् भी लोग आपका अभाव अनुभव करें और परदा गिरने के पश्चात् भी तालियाँ निरंतर बजती रहें। परंतु आजकल संबंध रिवाल्विंग चेयर की भांति होते हैं। नज़रें घुमाते ही वे सदैव के लिए ओझल हो जाते हैं, क्योंकि अक्सर लोग स्वार्थ साधने हेतू संबंध स्थापित करते हैं। मानव को ऐसे लोगों से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि वे अपने बनकर अपनों पर घात लगाते व निशाना साधते हैं।

दूसरी ओर यदि आप पौधारोपण करने के पश्चात् उसे खाद व पानी नहीं देते, तो वह मुरझा जाता है; पल्लवित-पोषित नहीं हो पाता। उसके आसपास कुकुरमुत्ते उग आते हैं, जिन्हें उखाड़ना अनिवार्य होता है, अन्यथा वे ख़रपतवार की भांति बढ़ते चले जाते हैं। एक अंतराल के पश्चात् बाड़ ही खेत को खाने लगती है। इसी प्रकार संबंधों को पोषित करने के लिए समय, देखभाल और संबंध बनाए रखने के लिए स्नेह, त्याग, समर्पण व पारस्परिक सौहार्द की दरक़ार होती है। यदि हमारे अंतर्मन में ‘मैं अर्थात् अहं’ का अभाव होता है, तो वे संबंध पनप सकते हैं, अन्यथा मुरझा जाते हैं। ‘मैं और सिर्फ़ मैं’ का भाव तिरोहित होने पर ही हम शाश्वत् संबंधों को संजोए रख सकते हैं। वहाँ अपेक्षा व उपेक्षा का भाव समाप्त हो जाता है। आत्मविश्वास व परिश्रम सफलता प्राप्ति का सोपान है। सो! स्वास्थ्य, पैसा व संबंध तीनों की एक की दरक़ार है। यदि हम समय की ओर ध्यान देते हैं, तो यह संबंध स्वतंत्र रूप से पनपते है, अन्यथा दरक़िनार कर लेते हैं। आइए! मर्यादा में रहकर सीमाओं का अतिक्रमण ना करें और उन्हें खुली हवा में स्वतंत्र रूप से पल्लवित होने दें।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१८ ⇒ बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े भाग, बैंक जॉब पायो।)

?अभी अभी # ८१८ ⇒ आलेख – बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जहाँ शिक्षण ग्रहण करते हैं, उस स्थान को alma mater कहते हैं ! संसार एक विश्व-विद्यालय है, मुझे वास्तविक व्यावहारिक ज्ञान तो तब ही प्राप्त हुआ, जब मेरी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नियुक्ति हो गई। अतः मैं उसे ही alma mater मानता हूँ। जब शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं, तो मुहावरे भी क्यों पीछे रहें।

वैसे मुझे कोई खास खुशी नहीं हुई थी, इस नियुक्ति से ! पढ़ने-पढ़ाने और लिखने का शौक तब से ही लग गया था, जब पिताजी के लिए, अहिल्या लाइब्रेरी से, पढ़ने के लिए किताबें लाता था। गुरुदत्त को छोड़ शरद, बंकिम, आचार्य चतुरसेन, बिमल मित्र और रेणु, प्रेमचंद के साहित्य से अच्छा लगाव हो गया था। शौकत थानवी, फिक्र तौंसवी, और जी पी श्रीवास्तव तो मानो सराफे के चाट हो गए थे। मुझे खेद है कि जासूसी उपन्यास तो ठीक गुलशन नंदा तक कभी मेरी नज़रों में चढ़ ना सके। बहुत कोशिश की पढ़ने की, बस पन्ने पलटकर रह गया। हां ! चंद्रकांता संतति न जाने कैसे, पूरी पढ़ गया।।

करेला और नीम चढ़ा ! बचपन से ही मेरी आँखों पर चश्मा चढ़ा था। छोटा मोटा नहीं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल वाला, बिल्लोरी काँच वाला। माँ बताती थी, किसी मंदिर के घंटे की निशानी थी, जिसने नज़र और याददाश्त दोनों कमज़ोर कर दी।

मेरी नज़र भले ही कमज़ोर थी, नीयत ठीकठाक थी। स्कूल कॉलेज में कभी किसी कन्या को नज़र उठाकर नहीं देखा, नज़र नीची रखकर ही देखा। जिनकी नज़र नीची होती है, वे नज़र कम ही मिलाते हैं। ज़िन्दगी के नजारे देखना हो तो, नज़र उठानी भी पड़ती है, किसी से मिलानी भी पड़ती है। वर्ना खयाली पुलाव बनाते रहिये, कोई निगाह आप पर नज़र नहीं उठाएगी।।

हम यूँ ही बैंक-कर्मी नहीं बन गए ! बड़े अरमान थे डॉक्टर, इंजीनियर बनने के। पर क्या करें, गणित कमज़ोर था। गणित छोड़ बायोलॉजी का दामन पकड़ा। वहाँ भी फिजिक्स, केमिस्ट्री ने साथ नहीं दिया। बीएससी रिटर्न हुए, कला-वाणिज्य महाविद्यालय की ओर रुख किया। तब और विकल्प था ही क्या हमारे पास ? कोई बीबीए, एमबीए का कोर्स नहीं, शहर में कोई कोचिंग इंस्टीटूट नहीं। ले देकर बीए, बीकॉम कर लो।

तब कॉमर्स विषय को हम हीन दृष्टि से देखते थे। जो हमारे साथ के छात्र ढंग से बीए नहीं कर पाए, एलएलबी पास करके वकील बन गए और हम आयएएस बनने के चक्कर में ना घर के रहे ना घाट के। और तब का हमारा पूरा घान का घान बैंकों और एलआयसी की ओर दौड़ पड़ा। बीए, बीकॉम, बीएससी हो या एमएससी ! चलो बुलावा आया है, बैंक, एलआईसी ने बुलाया है।।

वह आज ही का दिन तो था, 22 अक्टूबर 1971, जब मुख्य प्रबंधक अमेरिकन मेहता की साँटा बाजार, इंदौर शाखा में मेरी नियुक्ति हुई थी। समय कैसे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। आज लगता है, मानो एक फ़िल्म चल रही हो। खट्टे-मीठे अनुभव, सहयोगियों का प्रेम और अपनापन और ग्राहकों के रूप में कुछ विलक्षण व्यक्तित्वों से प्रगाढ़ परिचय, किसी की दुआ और किसी का आशीर्वाद शायद जीवन की सबसे बड़ी कमाई रही।

तब बैंक और एलआईसी वालों की शादी बड़ी आसानी से हो जाती थी। डॉक्टर, इंजीनियर न सही, बैंक वाला तो है। लड़का लोन भी ले लेगा, और हर तीन साल में बीवी बच्चों को एलटीसी पर घुमाने भी ले जाएगा। शुरू शुरू में तो सैलरी फ़ॉर सविंग और ओ टी फ़ॉर रोटी का रिवाज था। लेकिन हमारे जैसे संतों के पाँव पड़ते ही सब बंटा-धार हो गया। अब तो बैंकें ही मर्ज़ हो रही हैं और आदमी मशीन होता जा रहा है।।

एक नौकरीपेशा इंसान को कभी तो रिटायर होना ही है। मनोरंजन के लिए टीवी तो था ही, अब तो 4-G एंड्रॉइड फ़ोन भी मुट्ठी में आ गया है। फेसबुक के जरिये नये नये मित्र सम्पर्क में आते हैं। बड़ा आश्चर्य हुआ जब अधिकतर फेसबुक मित्रों को बैंक से जुड़ा देखा। जब तक सेवारत रहे, केवल काम-धंधे, पे- रिवीजन और डीए की बातें ही होती रहीं। अब रिटायरमेंट के बाद उनकी असली प्रतिभा का पता चला।

कितने कवि, लेखक, चिंतक, साहित्यकार और व्यंग्यकार कभी बैंककर्मी रहे हैं, जानकर मन प्रसन्न हो गया। विश्व में, यत्र तत्र सर्वत्र कभी बैंक से जुड़े लोग, छाए हुए हैं। ब से बँक वाले सुरेश कांत जी भी कभी रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अमोल पालेकर भी कभी हमारी बैंक से ही जुड़े थे, लेकिन उनकी कला और प्रतिभा उन्हें कहां से कहां ले गई। हम सबके प्रिय प्रतिभाशाली फेसबुक मित्र श्री सुरेंद्र मोहन, भी स्टेट बैंक से जुड़े थे। हमारे परम मित्र और सहयोगी, व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर श्री धर्मपाल महेंद्र जैन तब भी हमारे साथ थे, और आज भी हमारे साथ ही हैं। उनकी अध्य्यनशीलता, साहित्यिक ज्ञान, और सृजनशीलता से आज कौन परिचित नहीं।।

हम भाग्यशाली हैं कि फेसबुक के माध्यम से ही सही, आज भी हम एक दूसरे के इतने करीब हैं। लोग टाटा का नमक खाते हैं, आज अगर पीछे मुड़कर देखें तो लगभग ५५ बरसों से हम बैंक का ही तो नमक खा रहे हैं। तब यह हमारी रोजी रोटी थी, और आज भी इसके ही बदौलत हम दाल रोटी खा रहे हैं, और बैंक के गुण गा रहे हैं। आज बस यही मन में आता है, बड़े भाग, बैंक जॉब पायो, और उन्हीं साथियों को पुनः फेसबुक पर पायो। सभी बैंक के वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व फेसबुक मित्रों, सहयोगियों का सादर अभिवादन।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें। ।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला। ।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी  की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय  (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१७ ⇒ दूसरी पारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूसरी पारी।)

?अभी अभी # ८१७ ⇒ आलेख – दूसरी पारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा जीवन भी किसी क्रिकेट के मैदान से कम नहीं ! चार दिन की चांदनी ही यहाँ कभी फाइव डे क्रिकेट है तो 50-50 ओवर वाला एक दिवसीय क्रिकेट भी। फटाफट जिंदगी जिंदगी जीने वाले तो आजकल टी-20 में ही पूरे जीवन का आनंद ले लेना चाहते हैं। काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

यह जिंदगी भले ही दोबारा ना मिले, एक क्रिकेट के टेस्ट मैच की तरह यहाँ भी दूसरी पारी का प्रावधान है। हमारे जीवन के दो भाग होते हैं, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, कुछ लोग इन दोनों ही पारियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, तो कुछ एक पारी में शून्य में आउट हो जाते हैं, तो दूसरी पारी में कमाल दिखा जाते हैं। होते हैं कुछ बदनसीब, जो दोनों पारियों में शून्य पर पेवेलियन लौट आते हैं। ईश्वर बड़ा दयालु है, वह फिर भी उन्हें मौका देता है, क्षेत्ररक्षण का और गेंदबाजी का। वे चाहे तो वहां भी अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।।

जिन्होंने अभी जीवन में पदार्पण ही किया है, उनके लिए सभी रास्ते खुले हैं, उनके हाथ खुले हैं, उनके बाजू खुले हैं, वे कितने चाहें, चौके छक्के, अर्ध शतक, शतक, दोहरा शतक और तिहरा शतक मार सकते हैं। बल्लेबाजी नहीं तो गेंदबाजी ही सही, तेज़ नहीं तो स्पिन ही सही। फिरकी, यॉर्कर और फुलटॉस का कमाल ही सही। जीवन में फेंकना और झेलना भी एक कला है। गेंद को मैदान से बाहर भेजना भी कला है और बाउंड्रीलाइन पर जाते शॉट को कैच करना और रोकना भी क्षेत्ररक्षण का ही हिस्सा है।

हमने कितनी पारियां खेली हैं, यह हम ही जानते हैं। कोई आज अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में है तो कोई उत्तरार्द्ध में। जीवन में जितनी उपलब्धियां जरूरी हैं उतनी ही खिलाड़ी भावना भी। हमारे ग्रंथ तो हमारी औसत, सौ बरस की जिंदगी को चार बराबर बराबर पारियों में बांटकर चले गए और इन्हें उन्होंने आश्रम का नाम दे दिया। लेकिन एक भारतीय नारी की केवल दो ही पारियां। शादी के पहले मायका और शादी के बाद ससुराल। एक पारी दूसरी पारी के बिना अधूरी।।

आजकल स्त्री पुरुष में ज्यादा भेद नहीं। पुरुषों की तरह महिलाएं भी क्रिकेट खेलने लग गई हैं। घरेलू जीवन हो या किसी दफ्तर का जीवन, जीवन की दोनों पारियों को हंसते हंसते ही तो खेलना है। जरूरी नहीं कि सबके हाथ में बल्ला अथवा गेंद ही हो। जिस पुरुष के हाथ में कभी तलवार थी, आज उसके हाथ में कलम भी हो सकती है और जिस नारी के हाथ में कभी बेलन था, उसके हाथों में कभी देश की बागडोर भी हो सकती है।

हर व्यक्ति अपनी दूसरी पारी शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। इतिहास गवाह है, अधिकांश लोगों की दूसरी पारी ही पहली पारी से बेहतर साबित हुई है। जीवन का संघर्ष, कांटों भरी राह, कदम कदम पर चुनौतियाँ ही तो रास्ता सुगम बनाती हैं। इनके अनुभव से ही इंसान की दूसरी पारी रंग लाती है। अक्सर महान लोगों की दूसरी पारी ही उनकी उपलब्धि बन जाती है। हाथ कंगन को आरसी क्या। मोदीजी की दूसरी पारी को ही देख लीजिए।।

जीवन का क्या भरोसा। मुसीबत के वक्त यह पहाड़ जैसा नज़र आता है और सुख के आते ही क्षणभंगुर हो जाता है। हाय यही तो मेरे दिन थे सिंगार के, दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के। इन्हीं रास्तों से गुजर कर ही हम दूसरी पारी तक पहुंच पाए हैं। कुछ साथ छोड़ गए, कुछ साथ रह पाए हैं। कुछ हमारे सहारे हैं, कुछ को हमारा सहारा है।

एक उम्र के बाद जीवन में ठहराव, सुरक्षा और सुकून आ जाता है। हम इसे रिटायरमेंट, सेवानिवृत्ति अथवा निवृत्ति का नाम दे देते हैं। बस यही हमारी दूसरी पारी है, जब हम अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। अपने लिए जी सकते हैं। यह उम्र आदेश पालन करने की नहीं, अपने आपको आदेश देने की उम्र है। अपनों को साथ लेकर चलने की उम्र है।।

यह उम्र खामियों की नहीं, खूबियों की उम्र है। कमजोरी और मजबूरी के स्थान पर मजबूती और दृढ़ संकल्प के रास्ते पर चलने का समय है। अपने आपको जानने और समझने का मौका तो हमें कभी मिला ही नहीं। कर गुजरें, जो करना चाहते हैं। आपका जीवन कोरा काग़ज़ नहीं ! यह कुछ खोने का नहीं, पाने का वक्त है। आपकी यह दूसरी पारी व्यर्थ ना जावे। जीवन का सूरज तो अब खिला है, जीवन की शाम में सुबह की धूप का आनंद लें। हम सबकी दूसरी पारी, पहली पारी से बेहतर हो। आमीन !

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१६ ⇒ अमर बेल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८१६ ⇒ आलेख – अमर बेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(CUSCATA)

जड़ नहीं, तना नहीं, फल, फूल, पत्ती नहीं, अमरवल्लवी लता हूं, मैं अमर बेल। हां, आत्म निर्भर नहीं, परजीवी, पैरासाइट हूं मैं, छा जाती हूं मैं पौधों पर, लेकिन औषधीय गुणों की खान हूं मैं।

हर लता, बेल नहीं होती, हर बेल अमर बेल नहीं होती।

लौकी, गिलकी, कद्दू और तो और करेले की भी बेल होती है, लेकिन ये सब अपने पांव पर खड़ी, आत्म निर्भर होती हैं। अपनी तो हींग फिटकरी भी नहीं लगती, फिर भी ठाठ हैं मुझ अमर बेल के।।

यूं ही नाम नहीं पड़ा मेरा अमर बेल, अमृत मंथन में निकली अमृत की बूंदों से उत्पत्ति के कारण ही तो मुझे अमर बेल कहा जाने लगा। आप मुझे बेर और बबूल की बांहों में उलझा देख सकते हैं। लेकिन मैं खुद नहीं उलझती, जिसका खाती हूं, उसे ही उलझा लेती हूं। वह बेचारा सूखता रहता है और मैं फलती फूलती रहती हूं।

परजीवी सिर्फ वनस्पति में ही नहीं पाए जाते, जूं, डैंड्रफ, और खटमल जैसा जीव तो ठीक, किसी का खून चूसने वाले सूदखोर, स्वार्थी, और लालची, दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाले लोग भी इसी श्रेणी में आते हैं, जो समाज को खोखला करते रहते हैं।।

अमर बेल होते हुए भी मैं आत्मा की तरह अमर नहीं। आत्मा तो सभी तरह के बंधनों से मुक्त है लेकिन मैं तो स्वयं ही अपने आप में एक ऐसा बंधन हूं, जो जन्मदाता और आश्रयदाता को ही जकड़ लेती है, जिस थाली में खाती हूं, उसी में छेद करती हूं।

मेरी भी मुक्ति तभी संभव है, जब मेरी यह परजीवी देह, मानवता के कुछ काम आए। ईश्वर ने भी शायद मुझे गिलोय की तरह आयुर्वेदिक उपचार हेतु ही अमर रहने का वरदान दिया है। ऐसा सौभाग्य कहां हर परजीवी को नसीब होता है। बीमार दुखी और अस्वस्थ मानवों की सेवा ही मेरी अमरता का मुख्य रहस्य है।।

एक पुण्यात्मा कई जीवों के बंधनों को काट उन्हें मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर करती है, इस अमर बेल की भी यही आस है, उसका जीवन भी किसी के काम आए, ताकि एक परजीवी होते हुए भी, वह अपने आश्रयदाता का कर्ज तो उतार सके। मैं अमरबेल, एक परजीवी समाजसेवी ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१५ ⇒ हाय मैं मर जावां ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हाय मैं मर जावां ।)

?अभी अभी # ८१५ ⇒ आलेख – हाय मैं मर जावां ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुबह सुबह मरने की बात ? कतई नहीं ! यह एक पंजाबी तकिया कलाम है, जिसे हिंदी में हाय मै मर जाऊं कहते हैं। किसी की तारीफ़ करने का यह अजीबो गरीब अंदाज़ है, ठीक उसी तरह, जैसे तुझ पे कुर्बान मेरी जान।

यह मरने का बड़ा अजीब ज़िंदादिल अंदाज़ है, जिसमें किसी की जान नहीं जाती।

हमारे बीच ऐसे कई लोग मौजूद हैं, जो यह कहते नहीं थकते, जब वे कॉलेज में थे, तब उन पर कई लड़कियां मरती थीं। अब उन्हें कौन बताए, कि वे सब लड़कियां आज भी जिंदा हैं, और अपना सुखी जीवन गुज़ार रही हैं।।

जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर हमारा दिल आ जाता है, तो हम उस पर मरने लगते हैं। विश्वास नहीं होता न ! होते हैं कुछ जाबांज़ देशभक्त, जो सर पर कफ़न बांधे निकल पड़ते हैं मातृभूमि पर कुर्बान होने, मां, मेरा रंग दे बसंती चोला गीत गाते हुए। उनके लिए मौत ज़िन्दगी से बड़ी है, क्योंकि उनका मक़सद बड़ा है। वे सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़ते हैं, और देश के लिए शहीद हो जाते हैं। दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।

देशभक्ति की तरह भक्ति में भी जान की परवाह नहीं की जाती ! कबीर साहब तो साफ कह गए हैं ;

सर कटाए, घर जलाए,

वो हमारे साथ आए।

हम ऐसी शर्तों के ख़िलाफ़ हैं। इन सूफ़ी संतों ने ईश्वर को अपनी प्रेमिका बना रखा है, और खुद आशिक बने घूमते रहते हैं। ये हमेशा मरने मारने की ही बात करते हैं। आशिक का ज़नाजा है, बड़ी धूम से निकले।

और हमारे ये शायर !

महफ़िल में जल उठी शमां परवाने के लिए,

प्रीत बनी है दुनिया में, मर जाने के लिए।

अब यह क्या बात हुई ;

जान चली जाए, जिया नहीं जाए

जिया चला जाए, तो जीया नहीं जाए। और ;

वो देखो मुझसे रूठकर

मेरी जान जा रही है।।

दूसरे की जान को अपनी जान कहना कहां की समझदारी है। और दलील देखिए ! जब दो दिल एक हो जाते हैं, तो दोनों एक जान हो जाते हैं। यारी दोस्ती में भी बात बात पर, तेरे लिए जान हाज़िर है, बोल कर के तो देख, तो कहने वाले बहुत हैं, लेकिन एक पांच सौ का गांधी छाप मांगो तो मिमियाने लगते हैं। यार जान ले ले, पर पैसे की बात मत कर।

हमारे जीवन में जब भी हमारी जान बची है, हम यही कहते पाए गए हैं, जान बची और लाखों पाए। आखिर वो लाखों फिर गए कहां, कोई नहीं बताता। लगता है स्विस बैंक में पैसा लोगों ने जान पर खेलकर ही जमा किया है।

यह अलग बात है, जान किसी और की भी हो सकती है।।

कई बार हमारी जान मुट्ठी में आ जाती है। डर के मारे लोग मुट्ठी नहीं खोलते। इधर मुट्ठी खोली, उधर प्राण पखेरू बन उड़ते नजर आए। जी और जान का भी चोली दामन का रिश्ता है। जब हम जी जान एक कर देते हैं, तो क्या बच रह जाता है।

बच्चा जब मां को ज़्यादा परेशान करता है, तो मां भी यही कहती है, जान मत खा ! ये ले पांच रुपए। जा Kit kat ले आ। बचपन में जब मां पिताजी के साथ मेला देखने जाते थे, तो पिताजी उंगली नहीं छोड़ते थे। एक बार मेले में सब गुमते हैं और जब बड़ी मुश्किल और मन्नतों के बाद मिलते हैं, तब मां की जान में जान आती है।।

रेडियो पर फरीदा आपा कह रही हैं, आज जाने की ज़िद ना करो।

हाय मर जाएंगे, हाय लुट जाएंगे, ऐसी बातें किया ना करो।

चलो ! हम भी ऐसी बातें नहीं करते। जान है तो जहान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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