(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “सरस्वती”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
कामवाली के साथ एक छोटी बच्ची आई, प्यारी सी! कामवाली उसे बर्तन पोछे का काम सिखाने लाई थी। मैंने बच्ची से उसका नाम पूछा और उसका जवाब सुनकर हैरान हो गया।
बच्ची ने नाम बताया – “सरस्वती!”
मैंने पूछा – “कहां तक पढ़ी हो?”
जवाब सुन मेरे होश उड़ गये, जब उसने कहा कि – “मैंने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा!”
– “अरे! ऐसा?” फिर सरस्वती बर्तन मांझने का काम सीखने में लग गयी!
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘गिरगिट‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५८ ☆
☆ लघुकथा – गिरगिट☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
विनम्रता की प्रतिमूर्ति, गुरु जी का वह आज्ञाकारी शिष्य। गुरु जी उसकी शालीनता से बहुत प्रभावित। वह कृतार्थ थे, मन ही मन सोचते ऐसे विद्यार्थी मिलते कहाँ हैं कलियुग में?
‘विद्या दान श्रेष्ठ दान’ मानकर और विद्यार्थी को योग्य पात्र समझकर गुरु जी यथासंभव सहयोग करते रहे। एक-एक कर इस विद्यार्थी के सब कार्य पूरे हो गए। उनकी कृपा से वह अच्छे पद पर नियुक्त भी हो गया। गुरु जी उसे अक्सर याद करते, मिलने को कहते पर वह अपनी व्यस्तता बताता रहा। मिलने न आने के हर बार नए कारण बन जाते। दरअसल गुरु जी से मिलने जाने का अब कोई कारण न रहा—?
गुरु जी लॉन में बैठे थे, सामने बड़ी देर से पेड़ पर निश्चल बैठा गिरगिट अब रंग बदल चुका था।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – घड़ी
अंततः यमलोक को झुकना पड़ा। मर्त्यलोक और यमलोक में समझौता हो गया। समझौते के अनुसार जन्म के साथ ही बच्चे की कलाई पर यमदूत जीवनकाल दर्शाने वाली घड़ी बांध जाता। थोड़ी समझ आते ही अब हर कोई कलाई पर बंधी घड़ी की सूइयाँ पीछे करने लग गया।
वह अकाल मृत्यु का युग था। उस युग में हर कोई जवानी में ही गुज़र गया।
केवल एक आदमी उस युग में बेहद बुजुर्ग होकर गुज़रा। सुनते हैं, उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी बचपन में ही उतार फेंकी थी।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “बयान… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४५ ☆
लघुकथा – बयान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
इंस्पेक्टर साहब, मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ । मेरे माता पिता गरीब जरूर थे पर संस्कारवान थे। धर्म में उनकी पूरी आस्था थी और न किसी का बुरा करते थे और न चाहते थे। विवाह योग्य उम्र होने पर उन्होंने मेरा विवाह सतीश के साथ कर दिया। सतीश पढे लिखे और समझदार आदमी थे। अपने माता-पिता तथा मेरा बहुत ख्याल रखते। घर में कोई कमी नहीं थी। जब मेरी बड़ी बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने बहुत खुशी मनाई। पूरे उत्साह के साथ। बेटी बड़ी होने लगी उतना ही उसके साथ खेलने लगे। दूसरी बार भी बेटी पैदा हुई तो उनका उत्साह कुछ कम दिखाई देने लगा।
बड़ी बेटी विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह कर दिया। दामाद अच्छे मिले। अब छोटी बेटी की ही जिम्मेदारी रह गई । पता नहीं क्यों सतीश के व्यवहार में परिवर्तन आता गया। हफ्ते में एक दो बार शराब पीकर घर आने लगे। कुछ दिन मैं चुप रही पर जब उनका पीने का क्रम बढता गया तो टोका कि कोई टेंशन है क्या जो पीने लगे हो तो उन्होंने हाथ झटक दिया और मुझे एक थप्पड़ मार दिया। धीरे-धीरे रोज पीकर आने लगे। मैं कुछ बोलने के लिए जैसे ही मुंह खोलती तो तुरंत पीटने लगते। पीटने का क्रम रोजाना का क्रम बन गया। बस घर शराब पीकर आते और मेरी धुनाई शुरू कर देते। मेरा क्या अपराध था, मेरी समझ में कभी नहीं आया और न उन्होंने बताया। पड़ोसी बीच बचाव करने आते पर वे किसी की नहीं सुनते और दूसरे के सामने तो ज्यादा जोर से पीटते तथा गाली गलौज करते, तमाम अपशब्द कहकर मुझे नीचा दिखाते। कभी बेटी दामाद आते तो उनके सामने और ज्यादा पीटते गाली बकते। छोटी बेटी बीच में आती तो एकाध हाथ उसको भी पड़ जाता। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
पिछले महीने बेटी दामाद आए थे तो उनके सामने मुझे खूब पीटा गालियां दीं अपशब्द कहे। बेटी दामाद का कोई ख्याल नहीं रखा और वे अपने गांव चले गए। अभी एक हफ्ते पहले उन्होंने मुझे इतना पीटा कि मैं गिर गई। गिरी हुई होने पर भी लात मारते रहे। मेरे सिर के पीछे एक डंडा पड़ा था, जो मेरे हाथ पड़ गया और मैंने लेटे हुए ही वह डंडा सतीश के सिर पर दे मारा, वे गिर पड़े और मुझे क्या हुआ पता नहीं पर मैं उन्हें तब तक डंडे से मारती रही जब तक उनके प्राण न निकल गए। छोटी बेटी ने मुझे रोका और झिंझोड़ा तो मेरे हाथ रुके और सतीश को देखकर उनसे लिपट कर रोने लगी कि उन्हें यह क्या हो गया। बेटी ने बताया कि मां तुमने पापा को मार डाला। मैं घबरा गई और बेटी की सहायता से उनके शव को कमरे में अंदर ले गई ताकि कोई देख न ले। लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि सतीश मर गए हैं। मुझे लगता रहा कि वे नशे में गहरी नींद सो गए हैं। ऐसे ही चार दिन बीत गए। मैं कुछ समझने लायक हुई तो पांचवें दिन उनके शव को आंगन में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया। फिर बड़ी बेटी के यहां चली गई। बेटी और दामाद को सब बतला दिया।
मुझे नहीं मालूम इंस्पेक्टर साहब कि आपको कैसे पता चला और मुझे पकड़ लिया। पर सच में सतीश को मारना नहीं चाहती थी। आप ही बताइए कि हम दोनों में अपराधी कौन है। मैंने एकदम सच्चा बयान दिया है इंस्पेक्टर साहब, कुछ भी छुपाया नहीं है।
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टिप्पणी: 8 तारीख के दैनिक भास्कर पुणे में एक समाचार देखा कि एक स्त्री ने पीट पीट कर अपने पति को मार डाला प्रकाशित हुआ।इस समाचार ने मुझे झकझोर दिया और इस लघुकथा की कल्पना हुई।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नवजीवन।)
अरे! सुबह-सुबह अलार्म क्लॉक की तरह आ जाती है उठाने, क्या तुझे ठंडी नहीं लगती कमल जी ने दरवाजा खोलते हुए अपनी नौकरानी झुमरी से कहा?
झुमरी ने कहा-बीबी ठंडी लगती है लेकिन आप बताओ पेट की आग कैसे बुझेगी?
बीबी जी आपको चाय नाश्ता देना है और दो घरों में और काम करना है हम काम करने वालों को क्या ठंडी क्या गर्मी और क्या बरसात बस गोलू के बॉल की तरह दिन रात काम करना है।
और मेरे पास तो दो बेटियां हैं उनकी पढ़ाई की चिंता रहती है अब वह बड़ी भी हो रही है।
कमल जी ने मुस्कुराते कहा हां सब पता है चल चाय बना और मुझे भी पिला और तू भी पी उसके बाद काम करना।
ठीक है बीबी जी झुमरी ने कहा।
बीबी आज आपको स्कूल नहीं जाना क्या?
जाना है ठंड के कारण अब स्कूल का टाइम बदल गया है।
दीदी जब से भैया लोग बाहर रहने चले गए हैं आप स्कूल में पढ़ाते हो और फिर पार्क में गरीब बच्चों को भी पढ़ते हो आप बहुत ही नेक काम करते हो। दीदी आप तो मेरी हर मदद करते हो और आराम करने को बोलते हो बोलते हो आज नहीं कल काम कर लेना और घरों में तो सब लोग ज्यादा काम करवाते हैं मजाल है जो जरा देर सांस भी ले लूं?
कमल जी ने कहा गंभीर स्वर में तुझे तो कितने बार कहा है कि मेरे घर में ही बस काम कर और सब घर छोड़ दे लेकिन तू मानती ही नहीं।
दीदी आप मेरे लिए बहुत कुछ करते हो लेकिन आप पर मैं कितना बोझ बनूँ आपके घर में तो अकेले हो कुछ काम भी नहीं रहता।
चलो दीदी बातों में मत उलझाओ आप तैयार हो जाओ अच्छा झुमरी तुम्हारे नाम से एक मेरे घर में चिट्ठी आई है?
दीदी मुझे कौन चिट्ठी लिखेगा झुमरी ने कहा?
दीदी आप पढ़ कर मुझे बताओ ना इसमें क्या लिखा है?
ठीक है सुन यह चिट्ठी किसी विनोद नाम के व्यक्ति ने लिखी है. यह विनोद कौन है अरे दीदी वही मेरा शराबी पति उसको छोड़कर मैं बच्चों को लेकर मायके आ गई थी ना मेरी दो बेटियां हैं मेरी कहानी तो आपको पता ही है ना?
अब क्यों वह मुझे याद कर रहा है अपने भाई भोजाई के साथ रहे ना।
कह रहा एक बार तुझे और बच्चों को देखना चाहता है।
आपको तो पता है दीदी जीवन के कुछ घाव भरते नहीं है ये दिल की चोट है दीदी आपको भी सब ने छोड़कर चले गए दूसरी औरत के चक्कर में और मेरे आदमी ने भी मुझे दो बेटी होने के बाद छोड़ दिया।
आज उसके खत में मुझे अतीत की याद दिला दी आंखों के सामने संपूर्ण दृश्य घूमने लगा है
दीदी आप भी तो अपनी जिंदगी में आगे ही बढ़ गए बच्चे भी आपको छोड़कर चले गए।
कमल जी ने कहा-हां झुमरी क्या करूं?
तेरी दोनों बेटियां अच्छे से पढ़ लिख ले बस यही चाहती हूं तू भी एक उद्देश्य को लेकर चल।
जीवन एक नदी की तरह है जैसे नदी सारी कठिनाई को पार करते हुए समुद्र में मिलती है और जिस जिस शहर नगर से हो गुजरती है वहां सभी को नवजीवन देती है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “रिटर्न गिफ्ट ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४८ ☆
🌻लघुकथा🌻 🎁रिटर्न गिफ्ट 🎁
घर में परिवार छोटा हो या बड़ा। गृहणी पर घर की जिम्मेदारियों का बोझ सर्वाधिक होता है। घर में किसी का जन्मदिन हो, किसी का आना- जाना हो, शादी – ब्याह हो, दुख- सुख हो, चाहे किसी भी प्रकार का आयोजन, रसोई घर से लेकर साज- सज्जा, मंदिर से लेकर हाट- बाजार सभी में उसकी सहभागिता होती है।
और उसके बिना कुछ काम होता भी नहीं है। भोजन व्यवस्था में खाने की फरमाइश सबकी अलग-अलग, सभी के पसंद- नापसंद का ख्याल रखते गृहणी सारा दिन रसोई में।
आज ऐसा ही जन्म दिवस का उत्सव मनाया जा रहा था। घर में सुबह से हल्ला-गुल्ला, गीत – संगीत, और खुशी का माहौल। काम करते-करते वह थक चुकी थी।
वह सब का इंतजाम करते-करते जब रात्रि भोजन पर सबके साथ बैठी तो आज अनायास उसके मुँह से निकला – – – वह बोल पड़ी – मुझे ना एक बात याद आ रही है भोजन बनाते- बनाते व्यवस्था देखकर जब मैं मरूंगी तो भगवान भी मुझे फिर से रसोईया ही बनाकर भेज देंगे।
पतिदेव ने बड़े प्यार से देखा और मुस्कुराते हुए कहा– अरे तुम्हें तो कम से कम रसोईया बनाकर भेजेंगे। हम तो न जाने तैतीस करोड़ जीव- जंतुओं में कहाँ भटकेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है।
तुम्हें तो गर्व होना चाहिए तुम फिर से रसोईया बनकर इस धरा पर आओगी।
क्या? यही है मेरा रिटर्न गिफ्ट गृहणी सोचने लगी। नाहक ही मैं परेशान होती हूँ। मेरे बारे में कितना अच्छा सोचा जाता है। मेरी भावनाओं के लिए, इतनी अच्छी बातें, विचार आते ही खुशी से आँखें भर आई।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– बेटे की माँ…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८५ — बेटे की माँ —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
बिगड़ैल बेटा बारह साल बाद जेल की सज़ा काट कर लौटा। वह जर्जर हो गया था। झुकी टूटी माँ उसी के लिए जी रही थी। माँ ने बेटे के कैद जाने से पहले दिपाली नाम की दुल्हन पसंद की थी। दिपाली की तो कब के शादी हो गई। पर माँ तो उसी सपने में ठहर गई थी। विक्षिप्त सी माँ बड़ी मायूसी से अपने बेटे से बोली, “अब तुम्हारी शादी दिपाली से करवा दूँ। नाती नातिन मेरी गोद में खेलेंगे।”
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “चाय पानी”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
– सर…
– कहो। क्या बात है?
– सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।
– कोई जरूरत नहीं इसकी।
– फिर बिल पास नहीं होगा, सर!
– न हो। बोलो जो आब्जेक्शन लगाना हो लगा दो!
वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर चला गया! कुछ पल बाद वापस आया।
– सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो!
– बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं!
वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया!
अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।
– क्यों?
– क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?
वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया!
वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका!
– हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं! बोलो चाय मंगवा लूं?
राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!
– फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।
उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अदृश्य तमाचा।)
स्वाति तुम मेरे लिए पूरी सब्जी बनाई है नाश्ता क्या बना रही हो?
स्वाति ने कहा – पूरी सब्जी नाश्ते में कर लेना और वही टिफिन में लेते जाना क्योंकि आज मेरे दांत में बहुत दर्द है।
स्वाति तुम्हारे रोज-रोज के नाटक से मैं थक गया हूं।
स्वाति की आंखों से आंसू निकलते रहे और उसने नाश्ते में पोहा बनाया।
पति के ऑफिस जाते ही वह उदास होकर टीवी देखने लग गई, मन में यह सोचने लगी चलो थोड़ा मन बहल जाएगा, तभी अचानक 1:00 बजे के करीब दरवाजे पर आहट होती है, वह दरवाजा खोलती है और बोलती है – अरे! अमर आप इतनी जल्दी घर आ गए।
अमर ने कहा कि – घर आने के लिए भी तुम्हारी इजाज़त लेनी होगी।
स्वाति ने कहा- नहीं क्या हुआ?
अमर मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है।
– गैस बन गई है, इंजेक्शन लगवा लिया, दवा ले लिया है थोड़ी देर आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।
अचानक 4:00 बजे उसकी तबीयत ठीक लगती है और वह कहता है – स्वामी मुझे कुछ खाने को दे दो।
उसने कहा – मैंने अपने लिए खिचड़ी बनाई है आपको दूं क्या?
हां दे दो तुम बहुत अच्छी हो धन्यवाद अब तुम्हारे दांत का दर्द कैसा है चलो मैं डॉक्टर को दिखा देता हूं।
स्वाति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।
और उसने कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए मैं रुक गई।
मैंने अपना बैक पैक कर लिया है अब मैं मम्मी के घर जा रही हूं। अपने घर रहकर फिर आऊंगी। आप अपना ध्यान रखना आपके उठने का इंतजार कर रही थी।
अमर उसे देखता रहता है उसे रोकने की कोशिश करता है पर वह एक बात नहीं सुनती और तुरंत चली जाती है। उसे ऐसा एहसास होता है जैसे उसे कोई अदृश्य तमाचा लगा हो ।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है हेमन्त बावनकरद्वारा लिखित “अभिमन्यु कौन?” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९१ ☆
☆ “अभिमन्यु कौन?” – लेखक – हेमन्त बावनकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – अभिमन्यु कौन?”
लेखक – हेमन्त बावनकर
प्रकाशक – किताब राइटिंग पब्लिकेशन, मुंबई
मूल्य – रु १४९
☆ हेमन्त बावनकर का कथा-संग्रह ‘अभिमन्यु कौन?’– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह पुस्तक मध्यमवर्गीय जीवन की यथार्थवादी चित्रण के साथ नैतिक मूल्यों को स्थापित करने वाली आठ कहानियों का संग्रह है। यह प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा की याद दिलाता है जहाँ सामाजिक विसंगतियाँ पात्रों के संवादों से उभरती हैं तथा सकारात्मक समाधान की ओर इशारा करती हैं।
हेमन्त बावनकर
संग्रह पारिवारिक अनुशासन, कार्यालयी चालबाजियाँ, दहेज-कानून का दुरुपयोग, सोशल मीडिया की विडंबनाएँ तथा अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को सरल भाषा में कहानियों में बुनता है।
‘शुभ विवाह’ में कठोर अनुशासनप्रिय पिता के माध्यम से मध्यमवर्गीय विवाह की आर्थिक बाधाएँ चित्रित हैं। रिश्तेदार त्रिपाठी से पैसों का बजट पूछते हुए पाठक का प्रश्न समाज की दहेज को लेकर धारणाओ को उजागर करता है। अंत में विधवा गायत्री के साथ मितव्ययी विवाह तथा संयुक्त फिक्स्ड डिपॉजिट का प्रस्ताव पिता की दूरदर्शिता प्रकट करता है। यह सब मुंशी प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ जैसी कहानी में भाईचारे की याद दिलाता है।
‘हाथी की सवारी’ कार्यालयीन खानापूर्ति का व्यंग्यपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती है। बड़े बाबू रमेश इंजीनियर के टूलकिट को छिपाकर कहते हैं कि यदि टूलकिट लाए हैं तो यहीं कहीं होगा। मैनेजर को “हाथी की सवारी” कहकर स्पष्टवादिता रेखांकित होती है। यह हरिशंकर परसाई की व्यंग्य परंपरा के समानांतर लगता है।
शीर्षक कहानी ‘अभिमन्यु कौन?’ में प्रोफेसर श्रीधर कुलकर्णी तथा पत्नी उषा जर्मनी पहुँचते ही पुत्र अरुण के गुप्त विवाह की सूचना पाते हैं। जर्मन पुत्रवधू मारिया के संस्कारपूर्ण व्यवहार से गिले-शिकवे मिट जाते हैं तथा पोते अभिमन्यु की घोषणा पारिवारिक एकता का प्रतीक बनती है। यह भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी ‘पिता’ जैसी भावुकता से युक्त वैश्विक भारतीयता को दर्शाती है।
संग्रह की संवाद-प्रधान शैली तथा सकारात्मक समाधान के साथ कहानी का समापन हिंदी कहानी के मान्य मूल्यों, यथार्थवाद, सामाजिक सुधार तथा भावनात्मक गहराई को प्रतिबिंबित करते हैं। जो रचनात्मक साहित्य का मूल सिद्धांत है। प्रस्तावना में विजय तिवारी ‘किसलय’ तथा आमुख में शेर सिंह द्वारा सराही गई सार्थकता इस कथा संग्रह को चिंतनोद्दीपक बनाती है। कुल मिलाकर, यह संग्रह भावी पीढ़ियों के लिए धरोहर सिद्ध होगा, यह स्पष्ट है। कथाकार हेमंत जी ई अभिव्यक्ति के संस्थापक प्रधान संपादक हैं, वे नियमित विपुल साहित्य पढ़ते और गम्भीर लेखन करते हैं, जो इस संग्रह की कहानियों में स्पष्ट दिखता है।