श्री राजेन्द्र निगम

(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14 पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “ग्रीन कार्ड“।)
☆ कथा-कहानी – ग्रीन कार्ड – गुजराती लेखिका – गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆
मनीष ने सामने थाली में रखी खिचड़ी की ओर देखा। साथ में कटोरी में छाछ भी थी। थाली को दूर खिसकाकर वह गुस्से-भरी नजरों से सामने बैठी नयना को देखता रहा, जो उस वक्त उसकी गोदी में सोए मंदार का सिर दबा रही थी। नयना ने रसोई की आलमारी में रखा उसका निजी बचत का छोटा-सा डिब्बा खोलकर मनीष के सामने रख दिया। तब मानो राह देखकर बैठी हों, उस तरह पलकों के किनारे से आँसू की एक बूँद आँख से गिरी और आँख के नीचे ही बन गए काले गड्डे में रुक गई। कुछ बोलने के लिए खुले मनीष के होंठ, पुनः बंद हो गए। नयना के आँसुओं की दो बूँदों ने उसके सभी प्रश्नों का जवाब दे दिया था – चार दिनों से थाली में सब्जी क्यों नहीं परोसी जा रही है, नुपुर की शाला से फीस भरने के लिए फोन क्यों आ रहे थे, किरानेवाला उधार देने के लिए क्यों मना करने लगा और मंदार का बुखार क्यों नहीं उतर रहा था। उसने थाली को नजदीक खींचा, ठंडी हो गई लुसलुस-सी खिचड़ी को खा लिया और हाथ धोकर खूँटी पर लटके शर्ट को पहना और घर के बाहर निकल गया।
बाहर निकलने के बाद उसने दो-तीन गहरी श्वास लीं। वह क्यों बाहर निकल गया था ? घर में वह नयना की नज़रों का सामना नहीं कर सकता था, इसलिए ?अपना धंधा करने के लिए उसने गुजराती शाला की नौकरी छोड़ दी, तब एक बार उसने इंकार किया था, –‘मैं जितना आता है, उसमें घर चला सकती हूँ। मुझे अधिक नहीं चाहिए। ’ लेकिन वह स्वयं ही नहीं माना था और अब उसके फलस्वरूप—
विमान की घरघनाहट सुनकर मनीष ने ऊपर देखा और विमान नजर से जब तक अदृश्य नहीं हो गया, तब तक उसकी नजर उन चमकती लाइट का पीछा करती रही। फिर बहुत दिन से मन में घूम रहे विचारों को उसने कार्यान्वित किया। सामने खंभे पर लटके हुए बोर्ड जिस पर लिखा था, ‘विदेश जाना है?’ उसके नजदीक जाकर उसे ध्यान से पढ़ने लगा।
‘क्यों मनीष, तुम भी जाने के बारे में सोच रहे हो, क्या ?’
हितेन की आवाज सुनकर मनीष ने पीछे देखा। हितेन ने पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा।
‘तुमने जवाब नहीं दिया, लो। अपना पूरा गाँव अमेरिका में इकट्ठा हो गया है। तुम्हें नहीं जाना?
‘अरे यार, पूरे गाँव में लगे हुए ऐसे बोर्ड देखता हूँ तो मुझे भी होता है कि मैं भी पहुँच जाऊँ, उस सोने के देश में। अन्यथा यहाँ तो दिनों -दिन बढ़ती जा रही महँगाई में सब कुछ बिगड़ता ही जा रहा है। एक साल के बाद तो मंदार को भी शाला भेजना पड़ेगा। कैसे भरूँगा, दो बच्चों की फीस ?’
‘हाँ यार, वहाँ कुछ तो है। अपने हरिया कोई ही देख लो न !वहाँ से कितना पैसा भेजता है ! उसके पिता ने तीन मंजिल का मकान बनवा लिया। बेटी के शादी में भी पानी की तरह पैसा बहाया। पूरा कुटुंब मौज कर रहा है। ’
‘हाँ यार, मेरा भी एक हास मित्र है नरेंद्र, तुम्हें याद है न ? कुछ दिनों पहले उसने वीडियोकॉल किया था। अरे पूरा बदल गया है ! जब उसकी शादी हुई थी, तब काली, छड़ी जैसी थी, वह मीना अब तो बड़ी मेडम हो गई है !’
मनीष की आँखों के सामने अभी, जिसे रुलाकर आया था, वह नयना आ गई। बेचारी हँसती-खेलती अब सूखकर काँटा हो गई थी। पिचका हुआ चेहरा, बैठे हुए गाल, फटी हुई साड़ी। पट्टी में सेफ्टीपिन लगाकर स्लीपर पहनती थी।
‘क्या सोच रहे हो ? तुम्हारेमित्र सेऐसी दोस्ती है, तो उससे ही पूछो न कि वह कैसे गया था?’
घर जाने के बाद बहुत देर तक मनीष को नींद नहीं आई। हितेन के शब्दों ने आग में घी ही डाला था। उसकी नजर के सामने नरेंद्र ने वीडियो में बताया उसका बड़ा घर, घर के पीछे का बगीचा, सामने रखी दो बड़ी गाड़ियाँ, पट-पट अँग्रेजी बोलते उसके दो लड़के,आकर्षित करते थे। गाँव से जितने अमेरिका गए थे, सब सुखी हो गए थे। एक बार जाने के बाद कोई वापस नहीं लौटता था। रमणीककाका तो जब वह छोटा था, तब अमेरिका गए और अब उनकी बेटी के विवाह करने के वक्त आए। उनकी मोटी और बुच्ची लड़की को कितना अच्छा वर मिला। अमेरिका का प्रताप ! वे तो दामाद को भी वहाँ ले गए। मैं अमेरिका में रहूँ, तो फिर मेरी नूपुर को भी अच्छा लड़का मिल जाएगा न ! वह चाहे अभी बारह वर्ष की हो, लेकिन लड़की को बड़ा होने में कहाँ वक्त लगता है ? मंदार तो वहीं पढ़ाई करेगा, इसलिए पहले से ही बड़ा साहब हो जाएगा। और क्या चाहिए ?
कुछ दिन बाद, बच्चे सो गए फिर उसने नयना से बात की।
‘मैंने नरेंद्र को फोन किया था, उसने उसके एजेंट का नाम और नंबर दिया है। ’
नयना बिस्तर पर बैठ गई। ‘आप किसकी बात कर रहे हो ?
‘अमेरिका जाने की। ’
नयना उसकी चौड़ी हो गई आँखों से सुनती रही। ‘एजेंट ने कहा है कि अभी किसी को इसके बारे में मालूम नहीं पड़ना चाहिए। पैसा लेंगे, लेकिन काम हो जाएगा, इसका विश्वास दिया है। पहले कनाडा ले जाएँगे और फिर वहाँ से अमेरिका। कई को इसने पहुँचाया है। वहाँ जाकर पहले किसी छोटे गाँव में रहना होगा। अपनी जाति वालों की मोटलों में नौकरी मिल जाती है। वहाँ यहाँ जैसा नहीं होता है। सब नए आनेवालों की मदद करते हैं। नौकरी पर रख लेते हैं। फिर वहाँ तो घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है। जितने अधिक घंटे काम करो, उतनी अधिक रकम। पगार तो हर सप्ताह ले लो और वह भी डॉलर में। तुम काम करना।
इंद्रधनुषी सपनों के पंख फैलते जा रहे थे।
‘नहीं जी, मुझे अंग्रेजी नहीं आती। ’
‘अरे मोटल में तो मशीन में कपड़े धोना है और चादर बिछाना हैं। ऐसा ही सब काम होता है। दो लोग काम करें तो देखते-देखते लखपति हो जाएँ। एक डालर का भाव मालूम है ? कम से कम ₹80 तो मिलते ही हैं और घंटे के छह डॉलर मिलते हैं
बोलते समय मनीष की दृष्टि कमरे की छत पर डॉलर की खेती कर रही थी। हम दो यदि रोज 15-16 घंटे काम करें, तो रोज के 15 गुणा 6 अर्थात 90 डॉलर हो जाएँगे और फिर उसका 80 से गुणा, तो रोज के इतने रुपए हो गए। फिर महीने के और फिर वर्ष के…
‘हाँ, लेकिन हमारे जाने के कितने पैसे लगेंगे ?’
‘डॉलर की गड्डी, हाथ में आए, उसके पहले मनीष को रुपियों के नोटउड़ते हुए दिखाई दिए। लेकिन वह आँकड़ा बताकर नयना को घबराना नहीं चाहता था। ‘वह तो खासे लगेंगे, लेकिन उसके लिए तो हम अपना खेत बेच देंगे न ?’
‘हाय हाय ! खेत बेच देना पड़ेगा ?’
‘जब हमें लौटकर आना ही नहीं है, तो फिर इसे रखकर क्या करेंगे ? और उसमें भी एक वर्ष अकाल और दुसरे वर्ष ऐसी बरसात, कि सब फसल बह जाए। कभी कीटाणु लग जाए। भाग्य कुछ बताता नहीं। एक बार कनाडा जाने का वीजा मिल जाए, बस। ’
‘लेकिन हमरमणीककाका के जमाई की तरह सीधे अमेरिका क्यों नहीं जाते ? पहले कनाडा क्यों जाएँ ?’
‘थोड़ा घूम कर जाएँगे। ’ मनीष ने नयना की कमर में पीछे से हाथ रखा और उसे कुछ नजदीक खींच लिया। तुम बहुत पूछ-पूछ करती रहती हो,लेकिन वहाँ जाकर पूछने में समय मत बर्बाद करना। अपने मोहल्ले में जैसे यह पेड़ है न, वैसा वहाँ डॉलर का पेड़ लगने वाला है, देखना। ’
मनीष खिड़की में से दिखाई दे रहे वृक्ष पर ऊपर से खिर रहे पत्तों की मीठी लग रही खरखराहट सुनता रहा। नयना खिड़की के कोने में मकड़ी के द्वारा बनाए जाले की तरफ देखती रही। आज उसजाले के रेशे स्वर्णिम और चमकते हुए लग रहे थे।
वे ग्यारह लोग मुंबई हवाई अड्डे पर इकट्ठे हुएथे। उनका एजेंट वहाँ आया था और उसने सब समझा दिया — ‘उनका आदमी टोरंटो एयरपोर्ट के बाहर मौजूद होगा। उसके पास उनके फोटो पहुँच गए हैं, इसलिए वही उनको ढूँढ लेगा। अन्य किसी से कुछ पूछना नहीं है। वह एजेंट अमेरिका की सीमा तक बस में ले जाएगा और आगे के बारे में सब समझा देगा। उसने उनके साथ के अनिलभाई को सब समझा दिया है। वे जैसा कहेंगे, वैसे ही सबको करना है। किसी को कुछ पूछना है ?’
किसी के कुछ होंठ खुले, उसके पहले तो वह जैसा प्रकट हुआ था, वैसा ही अंतर्ध्यान हो गया।
टोरंटो पहुँचने तक कुछ डर और आशंका मिश्रित उत्साह की जंजीरों ने सबको एक दूसरे के साथ बाँध दिया था। पहली बार प्लेन में यात्रा कर रहे वे सब, प्लेन के बाहर दिखाई दे रहे बादलों के साथ उड़े और इंद्रधनुष के सहारे लटके। मानो एक जन्म पूरा हुआ, इस तरह सोए और सपने में दूसरे जन्म में अमेरिका पहुँच गए।
टोरंटो उतरने की घोषणा हुई और तब अनिलभाई ने जिस प्रकार की सूचना दी, उसके अनुसार सब ने हैंडबैग में जो उनके कपड़े रखे हुए थे, वे सब निकालकर पहन लिए। लेकिन ‘बहुत ठंड’ की उनकी व्याख्या नीचे उतरने के साथ ही बदल गई। शरीर काँप रहा था। दाढ़ी फडफडा रही थी और बोलते समय मुँह से शब्द से अधिक धुँआ निकल रहा था। कुछ ही देर में वहाँ के एक गोरे एजेंट ने उन्हें ढूँढ लिया और उसके बाद एक ऊष्मादायक छोटी बस में बैठने के बाद उन्होंने श्वास में श्वास ली।
अनिलभाई बस के ड्राइवर के साथ आगे बैठे। उसका बोला हुआ जितना समझ में आता, वह उसे जोर से बोलकर पीछे पहुँचाते देते।
‘सब सुनो, यह हमें अमेरिका की सीमा से जितने नजदीक हो सकेगा, वहाँ तक पहुँचा देगा। फिर हमें कुछ बर्फ में चलना पड़ेगा। वह पूछ रहा है कि यह सबको अनुकूल होगा न ?’
‘तुम उन्हें कह दो कि इतना तो हम खेतों में रोज चलते थे। कुछ अधिक चलना होगा तो परेशानी नहीं। सिर फट जाए, ऐसी गर्मी में भी काम करते तब, जब कुछ न हो तो बर्फ में क्या हो जाएगा ? ठंड सहन कर लेंगे, लेकिन साली भूख तो धूप में नहीं सूख सकती है न ? उसे कहो कि एक बार अमरीका पहुँचा दो, फिर हम सब देख लेंगे। ठीक है न मनीषभाई ?’
मनीष ने उसके लम्बे हुए हाथ पर ताली दी। हालाँकि उसके बाद नयना के बोलने में कुछ हताशा टपकती हुई दिखाई दी।
‘यह नन्हा अब परेशान हो गया है, अनिलभाई, उससे पूछो कि बस में कितनी दूर और जाना है?’
ड्राइवर के स्थान पर उनकी नई बनी सखी ने जवाब दिया, नयनाबेन तुम नन्हे को सँभालना। इसके खिलौने की और कपड़े की बैग को हम बारी-बारी से कंधे पर ले लेंगे। जय श्रीकृष्णा बोलते- बोलते सब चल देंगे। ’
फिर छह दिन की यात्रा के बाद, वे लोग जब उतरे तब किसी को भी जय श्रीकृष्ण बोलने का भान नहीं था। उतरने के पहले अनिलभाई के शब्द भी कुछ काँपते हुए और कुछ थकान के साथ निकल रहे थे।
‘देखो, यहाँ बर्फ में चलना है। हवा भी बहुत ठंडी होगी। ग्यारह लोग साथ ही रहना। आज उसने विशेष रूप से कहा है कि अलग मत होना, नहीं तो गुम हो जाओगे। सामने उनका एजेंट, हमें लेने के लिए खड़ा होगा। ’
***
जल्दी सुबह पुलिसकार लेकर राउंड पर निकले जॉर्ज को रास्ते के एक और खड़ी हुई वांन को देखकर आश्चर्य हुआ। इस समय, इतनी ठंड में, इस जगह, किसने इस वान को खड़ा रखा होगा ? कोई समस्या उत्पन्न हुई होगी ? ड्राइवर को मदद की यदि जरूरत हो तो पूछने के लिए उन्होंने अपनी कार को वांन के पास लिया। अफ्रीकन अमेरिकन ड्राइवर के साथ, पीछे आधी लाश जैसे दो एशियाई बैठे थे। उसने उनसे पासपोर्ट और दस्तावेज माँगे। कुछ ही मिनट में चित्र स्पष्ट हो गया। वहाँ तो दूसरे पाँच लोग सामने से आते हुए दिखाई दिए। उनके सामान की जाँच करने पर, एक के बैकपैक में से छोटे बच्चों के कपड़े, खिलौने आदि निकले। उसने दूर नजर घुमाई। नहीं, कोई पीछे नहीं आ रहा था। अनिलभाई ने बताने में देरी नहीं की कि ये लोग कुल ग्यारह व्यक्ति थे। चार व्यक्तियों का एक कुटुंब अलग रह गया है। डाकोटा पुलिस इस प्रकार की खोज करने की अभ्यस्त थी। कुछ ही देर में हेलीकॉप्टर के पंखघुर्र की आवाज के साथ, पवन के साथ स्पर्धा करते हुए आकाश में उड़ने लगे। पायलट के मुँह से बार-बार निकल रहा था. ‘गाड नोज व्हाट कंडीशंस दे वुड बी। ’
***
मनीष की नजर जहाँ दूर तक देख सकती थी,वहाँ तक नजर घुमाने की कोशिश की। चारों ओर बर्फ के सिवा अन्य कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। नरेंद्र ने उसे चेतावनी दी थी, इस समय आ रहे हो तो हड्डियों को कंपा दे, वैसी हवा तुम्हें बहुत परेशान करेगी। ठंड- 35 डिग्री होती है। बहुत ध्यान रखना। ’ सावधानी तो रखी थी। गादियों जैसे वजनदार कपड़े पहने थे। आँखों के अलावा सब ढँक दिया था। लेकिन बर्फ के कणों से भरी, धुआं जैसी हवा,आँखों में घुसकर ऐसी जलन करती थी कि आँख खुल ही न सके। और ऐसे में वे सात लोग कैसे अलग हो गए, मालूम ही नहीं पड़ा। अच्छा है कि वे चार तो साथ थे ! इस बर्फ के महासागर में दिशा कैसे मालूम हो ? उसने कहा था कि सीधे-सीधे चलना। लेकिन सीधे किस दिशा में है, यह तो मालूम होना चाहिए न ? कुछ देर तक तो नयना का ‘वहाँ क्या गलत था?’ बेकार वहाँ से निकले। नन्हे को कुछ हो जाएगा तो – नहीं बड़बड़ाहट के जवाब में ‘अभी पहुँच जाएँगे’, ऐसा कहता रहा। लेकिन फिर तो किसी से कुछ बोलने में ही नहीं आ रहा था। उँगली पकड़कर चलती हुई नूपुर ने तो खनकना ही बंद कर दिया। ‘पहुँच जाएँगे, या बाद में’, ऐसे अपने मन में उठाते हुए प्रश्न उसे नयना की हाँफ में भी सुनाई दे रहे थे। लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। बस अब तो चलते ही रहना था।
अचानक उसके हाथ के ऊपर वजन कम हो गया है, ऐसा लगा। अकड़ गई गर्दन को पीछे घुमा कर मनीष ने देखा कि नूपुर गिर गई थी। पैर पर एक-एक टन का वजन बँधा हो, ऐसे पैरों के साथ मनीष उसके पास गया। वह उसे खड़ी करना चाहता था, लेकिन हाथ मानो बर्फ की जंजीर से बंध गए हों, ऐसा वे उसका कहा मानते ही नहीं थे। उसने आसपास कोई हो तो आवाज देने के लिए मुँह खोलने की कोशिश की। लेकिन ऐसा करते समय होंठ के कोने के चिर जाने से वहाँ से कुछ प्रवाही की बूँद निकली और वहीं जम गई। लगता था कि शरीर के अंदर रक्त है ही नहीं,हड्डी तक सब जमकर बर्फ हो गया था। ठंड की धीमे-धीमे बढ़ती हुई प्यास उसके शरीर में से ऊष्मा के एक-एक कण को चूस-चूस कर पी रही थी। शरीर के एक-एक बारीक छिद्र से अंदर घुस रही हवा शरीर में जाकर बर्फ की नोकदार कटार जैसा बनकर उसे चुभारही थी। पहले थपेड़े मारता पवन अब बंदूक की गोलियों की तरह चुभ रहा था। ऊपर से लगातार बरस रही बर्फ की क्रूर छुरियाँ अंग-अंग को चीर रही थी और शरीर के अंदर बैठकर नसों के टुकड़े कर देती। अमेरिका जैसे स्वर्ग में जाने से पहले नर्क से गुजरना शायद अनिवार्य होता होगा।
अब तो मनीष को वह यहाँ क्यों आया था, यह भी याद नहीं आ रहा था। रोते हुए हृदय के आँसू आँखों से बाहर निकले, उसके पहले अंदर ही जमकर नजर को अधिक धुँधला बना रहे थे। आँख की पुतलियों में मानो दरारें हो गई थी। उन दरारों के बीच से वह हरा-हरा क्या दिखाई दे रहा था ? मेरे नए घर के पीछे उगी हुई हरी घास थी या ग्रीनकार्ड का ढेर ? उसके ऊपर चलकर सामने से क्या कोई आ रहा था ? ‘पापा’यह कौन बोला ? यह तो मेरी नुपुर, सोने के गहनों से लदी हुई वह लाल सुहाग के जोड़े में कितनी सुंदर लग रही थी ! उसके पीछे मंदार है ! हाँ, कितना ऊँचा हो गया है ! सूट-बूट में तो वाह ! नयना को कहेंगे कि चाहे बड़ा हो जाए, लेकिन कान के पीछे काला बिंदु जरूर लगाना, नहीं तो हमारी नजर ही लग जाएगी।
फटे हुए होंठ को कुछ अधिक चीरकर आई मुस्कुराहट के साथ मनीष ने नूपुर और मंदार से लिपटने के लिए हाथ लंबा करने की कोशिश की।
तब ही एक मानव आकार की बर्फ की शिला, नीचे बिछी हुई बर्फ की जाजम की तरफ झुकी।
अनंत अवकाश में कुछ शोध के लिए मथ रही मनीष की आँखें खुल नहीं सकती थी। चारों ओर बिखरी निशब्दता से प्रकट हो रही हो, ऐसी हेलीकॉप्टर की घरघराहट उसे सुनाई देती रही।
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मूल गुजराती कहानीकार – गिरिमा घारेखान
संपर्क – 10, ईशान बंगलोज, सुरधारा- सत्ताधार मार्ग, थलतेज, अहमदाबाद- 380054 मो. 8980205909.
हिंदी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम,
संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈