हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #217 – कथा कहानी – चतुराई धरी रह गई! – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम कथा  – चतुराई धरी रह गई!की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 217 ☆

☆ कथा कहानी – चतुराई धरी रह गई! ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

चतुरसिंह के पिता का देहांत हो चुका था. उस ने अपने छोटे भाई कोमलसिंह को बंटवारा करने के लिए बुलाया, “बंटवारे के पहले खाना खा लेते है. ” खाने परोसते हुए चतुरसिंह ने कोमलसिंह से कहा.

कोमलसिंह ने जवाब दिया, “ भैया ! बंटवारा आप ही कर लेते. मुझे अपना हिस्सा दे देते. बाकि आप रख लेते. मुझे बुलाने की क्या जरुरत थी ?”

 “नहीं भाई. मै यह सुनना बरदाश्त नहीं कर सकता हूँ कि बड़े भाई ने छोटे भाई का हिस्सा मार लिया, ” कहते हुए चतुरसिंह ने भोजन की दो थाली परोस कर सामने रख दी.

एक थाली में मिठाई ज्यादा थी. इस वजह से वह थाली खालीखाली नजर आ रही थी. दूसरी थाली में पापड़, चावल, भुजिए ज्यादा थे. वह ज्यादा भरी हुई नज़र आ रही थी. मिठाई वाली थाली में दूधपाक, मलाईबरफी व अन्य कीमती मिठाइयाँ रखी थी.

 “ जैसा भी खाना चाहो, वैसी थाली उठा लो, ” चतुरसिंह ने कहा, वह यह जानना चाहता था कि बंटवारे के समय कोमलसिंह किस बात को तवज्जो देता है. ज्यादा मॉल लेना पसंद करता है या कम.

चूँकि कोमलसिंह को मीठा कम पसंद था. इसलिए उस ने पापड़भुजिए वाली थाली उठा ली, “भैया मुझे यह खाना पसंद है, ” कहते हुए कोमलसिंह खाना खाने लगा.

चतुरसिंह समझ गया कि कोमलसिंह को ज्यादा मल चाहिए. वह लालची है. इस कारण  उस ने ज्यादा खाना भरी हुई थाली ली है. इसे इस का मज़ा चखाना चाहिए. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने बंटवारे के लिए नई तरकीब सोच ली.

खाना खा कर दोनों भाई कमरे में पहुंचे. चतुरसिंह ने घर के सामान के दो हिस्से कर रखे थे.

“ इन सामान में से कौनसा सामान चाहिए ?” चतुरसिंह ने सामने रखे हुए सामान की ओर इशारा किया.

एक ओर फ्रीज़, पंखें, वाशिंग मशीन रखी थी. दूसरी ओर ढेर सारे बरतन रखे थे. चुंकि कोमलसिंह के पास फ्रीज़, पंखे, वाशिंग मशीन थी. उस ने सोचा कि भाई साहब के पास यह चीज़ नहीं है. इसलिए ये चीज़ भाई साहब के पास रहना चाहिए.

यह सोचते हुए कोमलसिंह ने बड़े ढेर की ओर इशारा कर के कहा, “मुझे यह बड़ा वाला ढेर चाहिए. ”

चतुरसिंह मुस्कराया, “ जैसी तेरी मरजी. यूँ मत कहना कि बड़े भाई ने बंटवारा ठीक से नहीं किया, ” चतुरसिंह अपनी चतुराई पर मंदमंद मुस्कराता हुआ बोला. जब कि वह जानता था कि उसे ज्यादा कीमती सामान प्राप्त हुआ है.

कोमलसिंह खुश था. वह अपने बड़े भाई की मदद कर रहा था.

 “अब इन दोनों ढेर में से कौनसा ढेर लेना पसंद करोगे ?” चतुरसिंह ने अपने माता की जेवरात की दो पोटली दिखाते हुए कहा.

कोमलसिंह ने बारीबारी दोनों पोटली का निरिक्षण किया, एक पोटली भारी थी, दूसरी हल्की व छोटी. उस ने सोचा कि चतुरसिंह बड़े भाई है. इसलिए उन्हें ज्यादा हिस्सा चाहिए.

“ भैया ! आप  बड़े है. आप का परिवार बड़ा है, इसलिए आप बड़ी पोटली रखिए, ” कोमलसिंह ने छोटी पोटली उठा ली, “यह छोटी पोटली मेरी है. ”

“ नहींनहीं भाई, तुम बड़ी पोटली लो, “ चतुरसिंह ने बड़ी पोटली कोमलसिंह के सामने रखते हुए कहा.

“ नहीं भैया, आप बड़े है, बड़ी चीज़ पर आप का हक बनता है, ” कहते हुए कोमलसिंह ने छोटी पोटली रख ली.

चतुरसिंह चकित रह गया. उस ने बड़ी पोटली में चांदी के जेवरात रखे थे. छोटी पोटली में सोने के जेवरात थे. वह जानता था कि कोमलसिंह लालच में आ कर बड़ी पोटली लेगा. जिस में उस के पास चांदी के जेवरात चले जाएँगे और वह सोने के जेवरात ले लेगा.

मगर, यहाँ उल्टा हो गया था.

अब की बार चतुरसिंह ने चतुराई की, “ कोमलसिंह इस बार तू बंटवारा करना. नहीं तो लोग कहेंगे कि बड़े भाई ने बंटवारा कर के छोटे भाई को ठग लिया, “ चतुरसिंह ने कोमलसिंह को ठगने के लिए योजना बनाई.

कोमलसिंह कोमल ह्रदय था. वह बड़े भाई साहब का हित चाहता था. बड़े भाई के ज्यादा बच्चे थे. इसलिए वह चाहता था कि जमीन का ज्यादा हिस्सा बड़े भाई साहब को मिले. इसलिए वह चतुरसिंह को अपने पैतृक घर पर ले गया.

 “भाई साहब ! यह अपने पैतृक मकान है. पिताजी ने आप के जाने के बाद इसे बनाया था, ” कोमलसिंह ने कहा.

चतुरसिंह ने देखा कि एक ओर दो मकान और तीन मंजिल भवन खड़ा है, दूसरी ओर एक दुकान के पास से अन्दर जाने का गेट है. यानि एक ओर बहुमंज़िल भवन के साथ दो दुकान बनी हुई थी. दूसरी ओर एक दुकान और पीछे जाने का गेट था.

चतुरसिंह नहीं चाहता था कि जेवरात की तरह ठगा जाए इसलिए उस ने कहा, “ कोमलसिंह तुम ही बताओ. मुझे कौनसा हिस्सा लेना चाहिए ?”

“ भाई साहब, मेरी रॉय में तो आप दूसरा हिस्सा ले लेना चाहिए, ” कोमलसिंह ने कहा तो चतुरसिंह चकित रह गया.

छोटा भाई हो कर बड़े भाई को ठगना चाहता है. खुद बहुमंजिल मकान और दो दुकान हडप करना चाहता है. मुझे एक दुकान और छोटासा बाड़ा देना चाहता है. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमलसिंह, मेरा परिवार बड़ा है, इसलिए मै चाहता हूँ कि यह बहुमंजिल मकान वाला हिस्सा में ले लूँ. ”

इस पर कोमलसिंह ने कहा, “ भैया ! आप हिस्सा लेने से पहले यह दूसरा हिस्सा देख ले. ” कोमलसिंह ने चतुरसिंह से कहा. वह चाहता था कि बड़े भाई को ज्यादा हिस्सा मिलें. क्यों कि दूसरे हिस्से के अंदर १० मकान और लंबाचौडा खेत था, साथ ही बहुत सारे मवेशी भी थे.

मगर, चतुरसिंह ने सोचा कि छोटा भाई उसे ठगना चाहता है. इसलिए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमल, मुझे कुछ नहीं देखना है, यह दूसरा हिस्सा तेरे रहा, पहला हिस्सा मेरे पास रहेगा. ”

“भैया ! एक बार और सोच लो, ” कोमलसिंह ने कहा, “ आप को ज्यादा हिस्सा चाहिए, इसलिए आप यह दूसरा हिस्सा ले लें. ”

चतुरसिंह जानता था कि खाली जमीन के ज्यादा हिस्से से उस का यह बहुमंजिल मकान अच्छा है. इसलिए उस ने छोटे भाई की बात नहीं मानी. सभी पंचो के सामने अपनेअपने हिस्से का बंटवारा लिख लिया.

“ भैया. एक बार मेरा हिस्सा भी देख लेते,” कहते हुए कोमलसिंह चतुरसिंह को अपना हिस्सा दिखने के लिए दुकान के पास वाले गेट से अंदर गया.

आगेआगे कोमलसिंह था, पीछेपीछे चतुरसिंह चल रह था. जैसे ही वे गेट के अंदर गए, उन्हें गेट के पीछे लम्बाचौड़ा खेत नजर आया. सामने की तरफ १० भवन बने हुए था. कई मवेशी चर रहे थे.

यह देख कर चतुरसिंह ढंग रह गया, “कोमल यह हिस्सा पापाजी ने कब खरीदा था ?”

“ भैया ! आप के जाने के बाद,” कोमलसिंह ने बताया, “इसीलिए मै आप से कहा रहा था कि आप बड़े है, आप को बड़ा हिस्सा चाहिए, मगर, आप माने नहीं,”

मगर, अब चतुरसिंह क्या करता ? उस की चतुराई की वजह से वह स्वयम ठगाया जा चूका था. वह चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#67 – टोना टोटकी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– टोना टोटकी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 67 — टोना टोटकी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

चौराहे पर दो मृत कबूतर पड़े हुए थे। लोग सनक में घिरे यह तो अपने गाँव के हर आदमी की आत्मा को झकझोर जाने वाली टोना टोटकी है। तब तो अपने गाँव में दुर्भिक्ष आएगा और यहाँ तक कि घरों से मुर्दे उठेंगे। तभी एक बिल्ली ने इस शंका का समाधान कर दिया। बिल्ली ने कहीं से आ कर दोनों कबूतरों को एक साथ अपने जबड़ों में दबाया और चलते बनी। उसी ने दोनों कबूतरों का शिकार किया था।

© श्री रामदेव धुरंधर

27 – 06 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – पहुँच ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ पहुँच प्रो. नव संगीत सिंह

श्वेता को एम.ए. करने के तुरंत बाद विश्वविद्यालय में तदर्थ व्याख्याता के रूप में नौकरी मिल गई। उसने न तो नेट पास किया था और न ही एमफिल। उसने पीएचडी शब्द के बारे में भी नहीं सुना था। दरअसल, उसके पिता शिक्षा सचिव के निजी सहायक थे और उन्होंने ही श्वेता को यह नौकरी दिलाने की सिफारिश की थी। श्वेता की अन्य सहेलियाँ पैमी और सुखी उससे ईर्ष्या करती थीं। एक दिन श्वेता ने पैमी से पूछा, “सभी शिक्षकों के नेम-प्लेटों पर उनके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ क्यों लिखा हुआ है?” पैमी ने बताया कि “उन सभी के पास डॉक्टरेट की डिग्री है, इसलिए… ” फिर  पैमी ने उसे पीएचडी के बारे में विस्तृत जानकारी दी। सुखी भी पास ही बैठी थी। लेकिन वह पैमी को एक तरफ ले गई और बोली, “इसका कुछ नहीं होगा।” तो पैमी ने तुरंत कहा, “देखना, इसका ही कुछ होगा, हम जैसे रह जाएंगे।” शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति के लिए साक्षात्कार शुरू हुए, जिसमें श्वेता विजयी रही और पैमी व सुखी को ‘डॉक्टर’ होने के बावजूद निराशा ही हाथ लगी। पैमी ने सुखी को याद दिलाया, “मैंने तुमसे कहा था ना कि यह बहुत बड़ी चीज़ है!”

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© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं आज अपनी कार में बेटी को यूनिवर्सिटी छोड़ने जा रहा था। आमतौर पर अपनी सरकारी लाल बत्ती वाली चमचमाती गाड़ी में छोड़ने जाता हूँ। ‌लाल बत्ती देखते ही सिक्युरिटी पर तैनात सिपाही सैल्यूट ठोकना नहीं भूलते। पर आज ड्राइवर छुट्टी पर था। मैंने सोचा कि मैं ही अपनी कार में बेटी को छोड़ आता हूँ।

जैसे ही मेन गेट पर कार पहुंची, सिक्युरिटी वालों ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया। मैं हैरान! जो मुझे देखे बिना सैल्यूट ठोकते थे, आज चैकिंग के लिए पूछ रहे थे क्योंकि आज लाल बत्ती वाली गाड़ी जो नहीं थी !

मैंने बताने की कोशिश की कि मैं वही हूँ, जिसे आप बिना देखे सलाम करते हो लेकिन वे मानने को तैयार न थे! तो क्या लाल बत्ती ही मेरी पहचान है, मैं नहीं? और मैं आईकार्ड ढूंढने लगा!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १२ – कथा-कहानी – होनहार की तस्वीर ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १२ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ~ होनहार की तस्वीर ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

अखिलेश के पास न अब सोचने के लिए समय था और न ही करने के लिए कोई काम था। नौकरी की तलाश में वह अहमदाबाद जरूर आ गया, लेकिन अहमदाबाद उसे रास नहीं आया।

कागज़ के गत्तो से कार्टन बनाने वाली एक फैक्ट्री में गत्ते की चादर पर लेटे अखिलेश को रोटी भी चबाते नहीं बन रही थी। कई दिनों की बटोरी रोटियाँ, धूप में सुख कर ककटी हो गई थी तभी मानस उसके पीछे आया और धीरे से बोला।

अखिलेश..अखिलेश इधर आना। अखिलेश बुरी तरह से डर गया। उसे लगा कि कोई और आफत फिर आकर खड़ी हो गई। पीछे मुड़कर देखा तो मानस खड़ा था।

अबे, सुन बे इधर आ!

कागज की गिलास में भरे चाय को अखिलेश को पकड़ाते हुए मानस इस तेजी से पीछे की तरफ भाग लिया कि कोई उसे देखना ले। चाय की गिलास में डूबी हुई रोटी है, अब जाकर थोड़ी सी मुलायम हो रही थी। अखिलेश को कई दिनों बाद पहली बार इतना स्वादिष्ट भोजन मिला था।

जिंदगी में धुली कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी।

अखिलेश बड़ी शिद्दत और मेहनत से उस कंपनी में काम करता था। जितना सब लोग काम करते थे, अखिलेश उनसे कई गुना काम निकाल देता था, लेकिन न जाने क्या हुआ एक दिन उसे क्या सूझी। कंपनी में गत्तों को पैक करने वाले छोटे छोटे दो तीन पिन अखिलेश ने उसे अपने पॉकेट में डाल लिए।

मेटल डिटेक्टर की घंटी बजी, तो गार्ड ने उसे किनारे खड़ा होने के लिए कहा। अखिलेश को यह नहीं समझ में आया कि आखिर उसे किनारे क्यों खड़ा किया जा रहा है।

तलाशी में उसके पाकेट से वे छोटे- छोटे दो तीन पिन निकले तो कंपनी के लिए बड़ा अपराध हो गया। कंपनी ने उसे एक हफ्ते ले लिए काम करने से मना कर दिया।

अखिलेश की कहानी जहां से शुरू हुई थी, वहीं समाप्त हो गयी। वह अपने साथियों से दूर नहीं जा सकता था और इससे अधिक मेहनत का काम भी नहीं कर सकता था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले अखिलेश को बेरोजगारी का मार झेलना पड़ रहा था। इस पढ़ाई के बाद उसे किसी प्रकार का संतोषजनक जॉब नहीं मिला। ऊपर से परिवार के तानों की मार बढ़ गई, तो मजबूरन उसे भाग कर अहमदाबाद पड़ा।

यहां खोजते खोजते काम मिला तो गत्ते की फैक्ट्री में गत्तों के बॉक्स बनाने का काम मिला।

जिंदगी का सूरज अभी ठीक से चमक भी नहीं पाया था कि घनघोर काले बादलों ने उसे ढक लिया।

चाय के साथ रोटी खाने से उसके मन को तृप्ति मिली तो बड़े दिनों बाद उसे गहरी नींद भी आयी।

वह वहीं गत्ते पर लेट गया।

रात का वक्त था इधर अचानक फैक्ट्री में अफरा तफरी मच गई थी। इलेक्ट्रिक जनरेट करने वाली टरबाइन में कोई खराबी आ गई, तो पूरा सिस्टम इस शट डाउन हो गया। कंपनी के इंजीनियर उसको बनाने में जुटे पड़े थे। एक पैनल का काम किसी को समझ में नहीं आ रहा। शायद फाल्ट भी उधर ही कहीं छिपा था। फैक्ट्री को रात में ही चलाना जरूरी था, क्योंकि कंपनी ने एक बहुत बड़ा ऑर्डर ले रखा था। जिसके माल की सप्लाई अगले दिन 11:00 बजे तक हर हाल में करनी थी। इंजीनियरों के पसीने छूट रहे। कंपनी का चीफ इंजीनियर अपने मातहतों को इस तरह से डांट रहा था, मानो वे उसके घरेलू नौकर हो। चीफ इंजीनियर को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से फैक्ट्री के मालिक का फोन उसके खोपड़ी को हिलाये दे रहा था।

काफी हिम्मत करके मानस चीफ इंजीनियर के बगल में जा पहुंचा और धीरे से बोला।

साहब… आपसे एक बात कहनी है।

अबे तू कौन? क्या बात करनी है तुमको?

मानस डर गया। डरते डरते बोला।

साहब! हमारी कंपनी में एक लड़का है, वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है, लेकिन गत्ते का कार्टन बनाता है।

कहां है वह? बताओ? चीफ इंजीनियर ने अपनी गर्दन पीछे घुमाते हुए कहा।

साहब, है तो, लेकिन उसे निकाल दिया गया।

अबे साले…अब तक, क्या – क्या पहाड़ पढ़ रहा है।

लड़का है, इंजीनियर है, मजदूर है, निकाल दिया गया है। यह सब अनाप-शनाप क्या बक रहा है।

मानस ने एक बार और हिम्मत करके अपनी उंगली से अखिलेश की तरफ इशारा किया। अखिलेश अभी भी कार्टून के रद्दी गत्तों पर इस तरह से लेटा पड़ा था।

ठीक है उसे बुलाओ..

इंजीनियर का इतना कहना था कि मानस दौड़े दौड़े अखिलेश के पास पहुंचा।

अबे साले, उठ चल चल। कंपनी के एक मशीन खराब है बना देगा तो इंजीनियर बन जाएगा।

इंजीनियर बन जाएगा। अखिलेश कान में गयी ये आवाज उसे गाली जैसी लग रही थी। आंखें मिजते हुए अखिलेश उठा और सीधे टरबाइन के इलेक्ट्रिकल पैनल के पास पहुंच गया। इंजीनियर ने ऊपर से नीचे तक उसका हुलिया निहारा तो एक बार उसे लगा कि यह क्या मैं करने जा रहा हूँ।

लेकिन पता नहीं क्या इंजीनियर के दिमाग में आया कि चलो एक बार इस लड़के को भी अजामा लेते हैं।

उसके दिमाग में कहीं से आया कि न जाने किस भेष में नारायण मिल जाए।

मशीन को प्रणाम कर, जरूरी सेफ्टी गार्डस पहन, हाथ में कुछ टूल्स लेकर अखिलेश टरबाइन मशीन के यार्ड में चला गया।

चीफ इंजीनियर की न समझी पर, उसकेअधीन के असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्निशियनस एक जगह खड़े होकर उसका मजाक उड़ाने लगे। यह बॉस भी पागल हो गया है। हम लोग इतने देर से इस फाल्ट को ढूंढ रहे हैं, हम सबसे तो मिला नहीं। यह मजदूर ढूंढ के निकलेगा … ऐसा कहते हुए सभी ठहाका मार कर हंस पड़े।

इधर ठहाको की आवाज चीफ इंजीनियर के कान में गई, उधर पैनल की बत्ती लाल से ग्रीन हो गयी।

टरबाइन के इलेक्ट्रिकल सेक्शन से बाहर निकलकर, अखिलेश के चीफ इंजीनियर से कहा..

सर.. एक बार फिर स्टार्ट करवाइए, मुझे पूरा यकीन है की मशीन स्टार्ट हो जाएगी और इस बार ट्रिप नहीं होगी।

मशीन का स्विच दबाया गया, सिस्टम ऑन हुआ और मशीन चल पड़ी। इस बार मशीन चली तो दुबारा रुकने का नाम नहीं लिया। वहां खड़े सभी लोगों ने ख़ुशी से तालियां बजाई तो बगल में खड़े असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्नीशियन भी खुद को ताली बजाने से रोक नहीं सके।

उन्हें नहीं समझ में आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, उन लोगों ने अपनी ताली रोकी और एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। इधर चीफ इंजीनियर उनकी तरफ घूर करके देख रहा था, अब अखिलेश इंजीनियर की बाहों में था

इंजीनियर ने उसे बच्चों को प्रेम से अपने बाहों में लपेट लिया।

 अगले दिन की सुबह अखिलेश के लिए खास सुबह थी।

चीफ इंजिनियर : अपने डॉक्यूमेंट मेरे सामने रखो। कहां से बीटेक किया है ?

अखिलेश : सर..जबलपुर से।

 चीफ इंजिनियर : प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कहां से किया था ?

 अखिलेश : सर..एनटीपीसी ऊंचाहार से।

एनटीपीसी ऊंचाहार का नाम आते ही चीफ इंजीनियर चेहरे की रंगती बदल गई। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।

 चीफ इंजिनियर : किस ईयर में तुमने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की थी ?

 अखिलेश : सर.. 2017, में।

वर्ष 2016 सुनते ही चीफ इंजीनियर, अखिलेश को गौर से देखने लगा।

चीफ इंजिनियर : किसके अंडर में तुमने इंटर्नशिप की थी।

अखिलेश : सर.. आपके ही अंडर में तो की थी।

यह कहते हुए अखिलेश की आंखों से झर झर आंसू गिरने लगे,

चीफ इंजीनियर ने अपनी मेमोरी रिकॉल की, तो उन्हें उस होनहार की तस्वीर अखिलेश चेहरे में नजर आई जिसे वह उसे बैच का सबसे होनहार और समझदार अप्रेंटिस स्टूडेंट मानता बहुत था।

अगले दिन अखिलेश अपने केबिन में बैठा था, तो चीफ इंजीनियर अखिलेश के केबिन के सामने से यह कहते हुए गुजरे …

कहो, इंजीनियर अखिलेश कैसे हो?

सर मैं ठीक हूं कहते हुए अखिलेश अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। उसके बगल में बैठा हुआ मानस भी उठ खड़ा हुआ।

अखिलेश ने मानस की तरफ इशारा करते हुए, चीफ इंजीनियर से बड़े ही स्नेहिल भाव से कहा।

सर…यह मानस है, इसने भी आईटीआई किया है। इसे भी टेक्नशियन के पद पर रख लीजिए न।

चीफ इंजीनियर ने मुस्कुराते हुए.. यस..यस कहते हुए गर्दन हिलाई, जिसमे उनकी मौन स्वीकृति झलक रही थी।

अखिलेश और मानव दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, दोनों के चेहरों पर खुशियों के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – दुविधा ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ दुविधा प्रो. नव संगीत सिंह

श्रुति और आकाश अलग-अलग कॉलेजों में प्रोफेसर थे। घर पहुंचने पर दोनों ने अपने-अपने हिसाब से सारे कामों को बांटा हुआ था। अक्सर आकाश को सब्जियां लाने और बाजार के कामों की जिम्मेदारी मिली हुई थी, जबकि श्रुति खाना बनाने और चाय-नाश्ता का ध्यान रखती थी। उन्होंने बर्तन साफ करने और कपड़े धोने के लिए एक नौकरानी रखी थी। आकाश जब भी घर से सब्जी खरीदने निकलता तो अक्सर दुकान पर जाकर अपनी पत्नी को फोन पर पूछता, “क्या लाऊं?” आटा गूंथती हुई पत्नी खीझकर बोलती, “मैं क्या जानूं?  दुकान पर तो तुम खड़े हो। जो पसंद हो, जो अच्छा हो, ले आओ।” बेचारा आकाश, असहाय होकर, जो भी सब्जियाँ मिल जातीं, ले आता और जब वह घर पहुँचता, तो अपनी पत्नी के ताना सुनता, “ओह, क्या ले आए हो तुम! कितनी बासी सब्जियाँ हैं ये सब! मिर्चें और धनिया नहीं लाए क्या?” आकाश चुपचाप सब कुछ विवश होकर सुनता रहता। श्रुति की बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

एक दिन पति-पत्नी दोनों शहर से बाहर कहीं गये हुए थे। घर लौटने से पहले वे सब्जी वगैरह खरीदने बाज़ार चले गए। आकाश कार में ही बैठा रहा, क्योंकि उसे कार पार्क करने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल रहा था, और उसे यह भी डर था कि अगर वे दोनों कार से बाहर निकल गए, तो नगर निगम वाले कहीं कार को उठाकर ले ना जाएं, क्योंकि कार सही जगह पर पार्क नहीं की गई थी। यह घटना उसके साथ पहले भी घटित हो चुकी थी। खैर…सब्जी वाले के पास जाकर श्रुति ने अपने पति को फोन किया और पूछा, “क्या लाऊं, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता।” अब आकाश के पास उसके तानों का साफ जवाब था, “मुझे क्या पता, सब्जी वाले के पास तो तुम खड़ी हो! जो अच्छा लगे, ले आओ…”

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© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #216 – लघुकथा – कुंठा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा  “कुंठाकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 216 ☆

☆ लघुकथा- कुंठा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

रात की एक बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम का सफल का सञ्चालन करा कर वापस लौट कर घर आए पति ने दरवाज़ा खटखटाना चाहा. तभी पत्नी की चेतावनी याद आ गई. ‘ आप भरी ठण्ड में कार्यक्रम का सञ्चालन करने जा रहे है. मगर १० बजे तक घर आ जाना. अन्यथा दरवाज़ा नहीं खोलुंगी तब ठण्ड में बाहर ठुठुरते रहना.’

‘ भाग्यवान नाराज़ क्यों होती हो.’ पति ने कुछ कहना चाहा.

‘ २६ जनवरी के दिन भी सुबह के गए शाम ४ बजे आए थे. हर जगह आप का ही ठेका है. और दूसरा कोई सञ्चालन नहीं कर सकता है ?’

‘ तुम्हे तो खुश होना चाहिए,’ पति की बात पूरी नहीं हुई थी कि पत्नी बोली, ‘ सभी कामचोरों का ठेका आप ने ही ले रखा है.’

पति भी तुनक पडा, “ तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा पति …”

‘ खाक खुश होना चाहिए. आप को पता नहीं है. मुझे बचपन में अवसर नहीं मिला, अन्यथा मैं आज सब से प्रसिद्ध गायिका होती.”

यह पंक्ति याद आते ही पति ने अपने हाथ वापस खीच लिए. दरवाज़ा खटखटाऊं या नहीं. कहीं प्रसिध्द गायिका फिर गाना सुनाने न लग जाए. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

०२/०२/२०१७

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 75 – आपदा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)

☆ लघुकथा # 75 – आपदा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

 “मैडम जी मैडम जी … मेरी बेटी गौरी को बचा लो।” बदहवास सी मीरा के पैरों पर गिर कर रो पड़ी।

“मीरा ने अभी दो दिन पहले तो इसका विवाह हुआ था अब क्या हुआ? गई। शादी के लिए छुट्टी लेकर गयी थी और हमें भी तो विवाह में बुलाया था।“

“नहीं नहीं… मैडम जी, दूल्हा के तो पहले से एक बेटा बेटी-है, अभी मालूम चला है।”

“ऐ.. क्या बक रही है, क्या तूने पहले बिना पता किए ही शादी कर ली थी? तुझे मालूम नहीं था?” मीरा ने पूछा।

 “अरे मैडम जी मेरे आदमी ने शादी तय कर दी। बोला लड़का अच्छा है कमाता है। दहेज भी नहीं लेगा। मैं क्या करती मैडम जी जब बेटी घर गई, तब पता चला वह तुरंत वहां से भाग कर आ गई। अब मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है कि मैं क्या करूँ?”

“साहब तो अभी कोर्ट गए हैं तो वहीं चली जा नहीं तो शाम को उनसे बात करना?”

“क्या हम सब वहां नहीं चल सकते? अभी बात नहीं हो सकती? कहीं मेरा आदमी यहां आ गया तो हल्ला करेगा और बेटी को उसके घर ससुराल छोड़ आएगा।”

“चल अच्छा, मैं तैयार होकर आ रही हूं तब तक तू सड़क पर ऑटो को रोक।”

दोनों ऑटो रिक्शा में बैठकर रवि के ऑफिस जाते हैं।

वहां पर असिस्टेंट से उसने पूछा “साहब, चेंबर में फ्री है क्या?”

“जी भाभी आप जाइए।”

“अरे क्या हुआ तुम अचानक यहां पर?”

“एक समस्या है, तुमसे सलाह लेने के लिए आई हूं जो अपनी यहां काम करती थी जिसकी   लड़की की शादी में हम गए थे ना।”

“हां तुमने उसे ₹5000 भी दी थी, याद है मुझे अच्छे से आगे बोलो जल्दी।“

“जहां पर उसकी बेटी की शादी हुई है उसके आदमी के पहले से दो बच्चे हैं बड़े-बड़े कॉलेज में पढ़ते हैं इसलिए उसकी बेटी घर छोड़कर आ गई है अब कुछ सलाह दो।“

“मीरा तुम कहां इनके चक्कर में पड़ी हो उसका पति शराबी है उसे सब मालूम होगा कर्ज उधार लिया होगा और जाने क्या किया होगा। बिना दोनों पक्षों की बात सुनने में कैसे कोई निर्णय ले सकता हूं। उसे पैसे की जरूरत हो तो दे दो तुम इस सब से दूर रहो।“

“कैसी बात कर रहे हो क्या इंसानियत के नाते कोई हमारा फर्ज नहीं है?”

“नहीं हमारा कोई फर्ज नहीं है जितना कह रहा हूं उतनी बात तुम मानो। इस तरह के केस में रोज देखता हूं शराब पी लेते हैं या कर्ज ले लेते हैं या अपने आइशों ऐशो आराम से खाते रखना लड़कियों को यह लोग भेज भी देते हैं। अच्छा तुम उसे बुलाओ। और तुम अपने घर जाओ। कमला अपनी बेटी के लिए स्वयं लड़ेगी।“

फिर राजेश ने कमला को बुला कर कहा –

“अपने आदमी को साथ लेकर आना और तुम्हारी बेटी को यह लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी। उसका ही निर्णय मान्य होगा कि उसे क्या करना है? जीवन में हर किसी को लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है। जीवन में आपदाएँ आती रहती है उनका सामना करना पड़ता है।“

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – शपथ ग्रहण परेड ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ शपथ ग्रहण परेड ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सीनियर सिटिज़न की बैठक में आज फिर व्हाट्स एप्प ग्रुप पर आए किसी संवेदनशील मुद्दे से संबन्धित पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों के बीच में सामान्य चर्चा बहस में परिवर्तित होने लगी। कुलकर्णी जी और आत्माराम जी अपने अपने तर्क देते हुए एक दूसरे को गलत साबित करने का प्रयास कर रहे थे।

समय के साथ बहस तीखी होने लगी। अपने स्वभाव के अनुसार हरिलाल जी बीच बचाव करने का प्रयास करने लगे। हरिलाल और सेवकराम जी स्वयं को शांत रखते हुए ऐसी बेवजह की बहसों से दूर ही रहने का प्रयास करते थे।  

आज स्थिति बिगड़ने के आसार लग रहे थे। ऐसे में सेवकराम जी को लगा कि उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा की तरह हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उठे।

इस बार हरिलाल जी को उनका इस तरह जाना अच्छा नहीं लगा। उनसे रहा न गया।

“अरे सेवकराम जी, थोड़ा रुक जाइए। आप ऐसे नहीं जा सकते।“

“हरिलाल भाई, क्या करूँ मैं रुक कर? मेरी बात तो किसी को अच्छी लगेगी नहीं।“

उनके इस बदले हुए व्यवहार को देख कर थोड़ी देर के लिए सभी शांत हो गए।

हरिलाल जी, कुलकर्णी जी और आत्माराम जी की ओर देखते हुए बोले – “अरे नहीं सेवकराम जी, आप तो बोलिए। हम सुन रहे हैं।“

सेवकराम जी वापस बेंच पर बैठते हुए बोले – “क्या आप लोगों ने कभी शपथ ग्रहण परेड के बारे में सुना है?

लगभग सभी के मुंह से एक साथ निकला – “नहीं”

अब सभी की दृष्टि सेवकराम जी की ओर थी। सेवकराम जी ने इत्मीनान से कहना शुरू किया।

“हम सभी ने राजनेताओं को मंत्री पद और विधानसभा/संसद सदस्यों को शपथ लेते हुए देखा है। किन्तु, शायद ही किसी को सैनिकों या सेना के अफसरों के पास-आउट परेड और शपथ/कसम परेड को देखने या जानने का अवसर मिला होगा। हम लोग सोशल मीडिया के संदेशों को सच मान कर आपस में वैमनस्य पैदा कर लेते हैं। लेकिन सेना और अनुशासित सैन्य जीवन से प्रेरणा क्यों नहीं लेते?”   

कुलकर्णी जी बोले – “हम समझे नहीं।“

सेवकराम जी ने सविस्तार बताने का प्रयास किया।

“भारतीय सेना में सभी धर्मों के धार्मिक शिक्षक या रिलिजियस टीचर (पंडितजी, ज्ञानी जी, पादरी, मौलवी, बौद्ध गुरु आदि) होते हैं जो कि जूनियर कमीशण्ड ऑफिसर (JCO) रेंक के होते हैं। प्रत्येक सैनिक किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। सैनिक प्रारम्भिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने पर ‘पासिंग आउट परेड’ के दौरान शपथ ग्रहण करते हैं। सभी धार्मिक शिक्षक उन्हें अपने-अपने धार्मिक ग्रंथ की शपथ दिलाते हुए संविधान और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की शपथ दिलाते हैं। उदाहरण हमारे सामने है कि किस तरह हमारे वीर सैनिक अपने-अपने धर्म का सम्मान करते हुए धर्म, जाति और संप्रदाय को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए हमारी और राष्ट्र की सुरक्षा करते हैं। और यहाँ हम जाने अनजाने लोगों और असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाये गए व्हाट्सएप्प संदेशों पर बिना अपने विवेक का उपयोग किए विश्वास कर लेते हैं। फिर बेवजह की बहस कर समय बर्बाद करते हैं और आपसी संबंध खराब करते हैं। आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। सर्वधर्म समभाव की विचारधारा के साथ इतना समय यदि हम अपने घर परिवार, समाज और अपने आसपास कॉम्प्लेक्स/सोसायटी के परिवार की बेहतरी के लिए दें तो कैसा रहेगा? प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने के लिए स्वतंत्र है। आगे आप की इच्छा। सभी समझदार हैं। काश हमें भी नागरिकता की शपथ दिलाई गई होती।”

इतना कह कर वे हाथ जोड़कर उठे और घर की ओर चल दिये।

और सब अवाक एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

©  हेमन्त बावनकर  

21 जून 2025, 11.50 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 – द्रौपदी का चीर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “द्रौपदी का चीर”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 ☆

🌻लघुकथा 🔥द्रौपदी का चीर🔥

लगातार बारिश से चारों तरफ पानी ही पानी, देखते-देखते शहर, गाँव, नदी – नाले सभी पानी से जलाजल भर गए।

झुग्गी झोपड़ियों में भी जीवन बढ़ता, पलता, संवरता और प्रफुल्लित होता है। सूखे मौसम में सब कुछ अच्छा लगता है। तेज हवा का झोंका तपती सूर्य की किरणें, सब सहन हो जाता है, परंतु बारिश में जहाँ पानी ही पानी। वहाँ पर एक घास फूस पन्नी टूटे-फूटे सामानों से ढकी, झोपड़ी जहाँ पर वह अपने पति के साथ, पति क्या कहना दो अनाथ को एक साथ  मजदूरी करते-करते दो जून की रोटी ने हमसफर बना दिया।

जहाँ तन, मन, धन से वह एक जान हो गए थे। पति दो दिन से तेज ज्वर से पीड़ित था। गरीबी की मार और बारिश का खेल। सभी कुछ गीला, आटा चाँवल की तो बात ही न करें, चूल्हे में गीली लकड़ियाँ जलाकर वह आसपास के वातावरण को गरम करना चाहती थी।

परंतु सिसकती साँसे और सुलगती लकड़ियाँ, दोनों अपनी-अपनी कहानी कह रही थी।

पास में जड़ी बूटी बेचने वाला भी झोपड़ी बनाकर रहता था। परंतु उसकी झोपड़ी सूखी क्योंकि चारों तरफ से मोटी पल्ली, मिट्टी की दीवार से ढका हुआ था।

अपनी झोपड़ी पर रहता तो था, परंतु आँखें चौबीसों घंटे उस झोपड़ी पर रहती जिसमें रूपा अपने पति के साथ रहती थी।

दियासलाई की रोशनी दरवाजे पर दिखाई दी। रूपा काँपते हुए बोली– मेरे पति को दवाई देकर बचा लीजिए। आज वह मन ही मन खुश हो रहा था मौका और जरुरत दोनों है।

कुछ जड़ी – बूटी लेकर वह वहाँ पहुंच गया, नब्ज देख कर बोला – – – इसे तो ताप देना पड़ेगा। आग सुलगनी चाहिए।

कुछ जलाने का सामान ले आओ। रूपा ने चूल्हे की गीली लकड़ियाँ लगाई थी, उसको जलाने के लिए अपने शरीर पर उतना ही साड़ी का पल्ला बचाया जितनी जरूरी थी।

शेष साड़ी फाड़ कर चूल्हे में जला दी। लकड़ियाँ सुलग उठी।

ताप से पति को ज्वर और ठंड से आराम मिला।

परंतु रूपा आज चीर फाड़ते समझ चुकी थी कि– इस बारिश में झोपड़ी की आवाज,  सुलगती चीर, शायद कलयुग है, कान्हा जी को सुनाई नहीं दिया होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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