( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “महापुण्य उपकार है, महापाप अपकार“. )
☆ किसलय की कलम से # 26 ☆
☆ महापुण्य उपकार है, महापाप अपकार ☆
स्वार्थ के दायरे से निकलकर व्यक्ति जब दूसरों की भलाई के विषय में सोचता है, दूसरों के लिये कार्य करता है। वही परोपकार है।
इस संदर्भ में हम कह सकते हैं कि भगवान सबसे बड़े परोपकारी हैं, जिन्होंने हमारे कल्याण के लिये प्रकृति का निर्माण किया। प्रकृति का प्रत्येक अंश परोपकार की शिक्षा देता प्रतीत होता है। सूर्य और चाँद हमें प्रकाश देते हैं। नदियाँ अपने जल से हमारी प्यास बुझाती हैं। गाय-भैंस हमारे लिये दूध देती हैं। मेघ धरती के लिये झूमकर बरसते हैं। पुष्प अपनी सुगन्ध से दूसरों का जीवन सुगन्धित करते हैं।
परोपकारी मनुष्य स्वभाव से ही उत्तम प्रवृत्ति के होते हैं। उन्हें दूसरों को सुख देकर आनंद मिलता है। परोपकार करने से यश बढ़ता है। दुआयें मिलती हैं। सम्मान प्राप्त होता है।
तुलसीदास जी ने कहा है-
‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधभाई।’
प्रकृति भी हमें परोपकार करने के हजारों उदाहरण देती है जैसे :-
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थं इदं शरीरम् ॥
अपने लिए तो सभी जीते हैं किन्तु वह जीवन जो औरों की सहायता में बीते, सार्थक जीवन है.
उदाहरण के लिए किसान हमारे लिए अन्न उपजाते हैं, सैनिक प्राणों की बाजी लगा कर देश की रक्षा करते हैं। परोपकार किये बिना जीना निरर्थक है। स्वामी विवेकानद, स्वामी दयानन्द, रवींद्र नाथ टैगोर, गांधी जी जैसे महापुरुषों के जीवन परोपकार के जीते जागते उदाहरण हैं। ये महापुरुष आज भी वंदनीय हैं।
आज का इन्सान अपने दुःख से उतना दुखी नहीं है, जितना की दूसरे के सुख से।
मानव को सदा से उसके कर्मों के अनुरूप ही फल भी मिलता आया है। वैसे कहा भी गया है:-
‘जैसी करनी, वैसी भरनी’।
वे रहीम नर धन्य हैं, पर-उपकारी अंग ।
बाँटन बारे के लगे, ज्यों मेहंदी के रंग ॥
जब कोई जरूरतमंद हमसे कुछ माँगे तो हमें अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उसकी सहायता अवश्य करना चाहिए। सिक्खों के गुरू नानक देव जी ने व्यापार के लिए दी गई सम्पत्ति से साधु-सन्तों को भोजन कराके परोपकार का सच्चा सौदा किया।
एक बात और ये है कि परोपकार केवल आर्थिक रूप से नहीं होता; वह मीठे बोलकर, किसी जरूरतमंद विद्यार्थी को पढ़ाकर, भटके को राह दिखाकर, समय पर ठीक सलाह देकर, भोजन, वस्त्र, आवास, धन का दान कर जरूरतमंदों का भला कर के भी किया सकता है।
पशु-पक्षी भी अपने ऊपर किए गए उपकार के प्रति कृतज्ञ होते हैं, फिर मनुष्य तो विवेकशील प्राणी है। उसे तो पशुओं से दो कदम आगे बढ़कर परोपकारी होना चाहिए ।
परोपकार अनेकानेक रूप से कर आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। जैसे-प्यासे को पानी पिलाना, बीमार या घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाना, वृद्धों को बस में सीट देना, अन्धों को सड़क पार करवाना, गोशाला बनवाना, चिकित्सालयों में अनुदान देना, प्याऊ लगवाना, छायादार वृक्ष लगवाना, शिक्षण केन्द्र और धर्मशाला बनवाना परोपकार के ही रूप हैं ।
आज का मानव दिन प्रति दिन स्वार्थी और लालची होता जा रहा है। दूसरों के दु:ख से प्रसन्न और दूसरों के सुख से दु:खी होता है। मानव जीवन बड़े पुण्यों से मिलता है, उसे परोपकार जैसे कार्यों में लगाकर ही हम सच्ची शान्ति प्राप्त कर सकते हैं। यही सच्चा सुख और आनन्द है। ऐसे में हर मानव का कर्त्तव्य है कि वह भी दूसरों के काम आए।
उपरोक्त तथ्यों से अवगत कराने का मात्र यही उद्देश्य है कि यदि हमें ईश्वर ने सामर्थ्य प्रदान की है, हमें माध्यम बनाया है तो पीड़ित मानवता की सेवा करने हेतु हमें कुछ न कुछ करना ही चाहिए। सच यह भी है कि ऐसी अनेक संस्थाएँ यत्र-तत्र-सर्वत्र देखी जा सकती हैं जो निरंतर लोक कल्याण में जुटी हैं। मेरी दृष्टि से इससे अच्छे कोई दूसरे विकल्प हो भी नहीं सकते और मानवता का भी यही धर्म है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
पुनर्पाठ-
☆ संजय दृष्टि ☆ ककनूस ☆
‘साहित्य को जब कभी दफनाया, जलाया या गलाया जाता है, ककनूस की तरह फिर-फिर जन्म पाता है।’
उसकी लिखी यही बात लोगों को राह दिखाती पर व्यवस्था की राह में वह रोड़ा था। लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने मिलकर उसके लिखे को तितर-बितर करने का हमेशा प्रयास किया।
फिर चोला तजने का समय आ गया। उसने देह छोड़ दी। प्रसन्न व्यवस्था ने उसे मृतक घोषित कर दिया। आश्चर्य! मृतक अपने लिखे के माध्यम से कुछ साँसें लेने लगा।
मरने के बाद भी चल रही उसकी धड़कन से बौखलाए लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने उसके लिखे को जला दिया। कुछ हिस्से को पानी में बहा दिया। कुछ को दफ़्न कर दिया, कुछ को पहाड़ की चोटी से फेंक दिया। फिर जो कुछ शेष रह गया, उसे चील-कौवों के खाने के लिए सूखे कुएँ में लटका दिया। उसे ज़्यादा, बहुत ज़्यादा मरा हुआ घोषित कर दिया।
अब वह श्रुतियों में लोगों के भीतर पैदा होने लगा। लोग उसके लिखे की चर्चा करते, उसकी कहानी सुनते-सुनाते। किसी रहस्यलोक की तरह धरती के नीचे ढूँढ़ते, नदियों के उछाल में पाने की कोशिश करते। उसकी साँसें कुछ और चलने लगीं।
लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने जनता की भाषा, जनता के धर्म, जनता की संस्कृति में बदलाव लाने की कोशिश की। लोग बदले भी लेकिन केवल ऊपर से। अब भी भीतर जब कभी पीड़ित होते, भ्रमित होते, चकित होते, अपने पूर्वजों से सुना उसका लिखा उन्हें राह दिखाता। बदली पोशाकों और संस्कृति में खंड-खंड समूह के भीतर वह दम भरने लगा अखंड होकर।
फिर माटी ने पोषित किया अपने ही गर्भ में दफ़्न उसका लिखा हुआ। नदियों ने सिंचित किया अपनी ही लहरों में अंतर्निहित उसका लिखा हुआ। समय की अग्नि में कुंदन बनकर तपा उसका लिखा हुआ। कुएँ की दीवारों पर अमरबेल बनकर खिला और खाइयों में संजीवनी बूटी बनकर उगा उसका लिखा हुआ।
ब्रह्मांड के चिकित्सक ने कहा, ‘पूरी तन्मयता से आ रहा है श्वास। लेखक एकदम स्वस्थ है।’
अब अनहद नाद-सा गूँज रहा है उसका लेखन।अब आदि-अनादि के अस्तित्व पर गुदा है उसका लिखा, ‘साहित्य को जब कभी दफनाया, जलाया या गलाया जाता है, ककनूस की तरह फिर-फिर जन्म पाता है।’
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ प्रत्येक बुधवार को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “विभिन्नता में समरसता”)
☆ आलेख ☆ विभिन्नता में समरसता -1 ☆
विश्व में अनेक सभ्यतायें फली फूली किन्तु काल ने उनमें से अधिकांश का नामोनिशान मिटा दिया। मिस्र की सभ्यता और संस्कृति जो ईसा पूर्व दो- अढाई हज़ार साल पुरानी थी, उसका आज कोई अस्तित्व नहीं बचा है। अरब देशों का हाल तो और भी बुरा है वे आपस में ही लड़ रहे है। एशिया और यूरोप के अनेक देश परिवर्तन की आंधी के आगे ढह गए हैं।उर्दू के प्रसिद्ध शायर सर मुहम्मद इकबाल इसलिए लिख गए कि:
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा।।
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।। सारे…
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।। सारे…
हमारी अजर अमर हस्ती को संक्षेप में बता पाना दुष्कर है। भारत के असंख्य गाँव, शहर, प्रांत के निवासी जिन भाषाओं में संवाद करते आये हैं जो भोजन वे ग्रहण करते रहे हैं, जिस कला संगीत, नृत्य और साहित्य ने उन्हें बांधे रखा है और सदियों पुराने रीतिरिवाज, त्यौहार, मनोरंजन के साधन, खेलकूद आदि जो आज भी अक्षुण हैं, गहन अध्यन का विषय हैं और इन पर लिखा भी बहुत गया हैं। इन्हे हम सदियों से मानते आए हैं, उनका परिपालन करते आए हैं। यही हमारी सामासिक संस्कृति के मूल स्तम्भ है, हमारी विस्तृत परम्परा का अभिन्न अंग है।
भारत में दो विभिन्न संस्कृतियों के मेलमिलाप का पहला उदाहरण आर्य व द्रविड़ सभ्यताओं के परस्पर मिलन के रूप में दिखाई देता है। आर्य उत्तर भारत के निवासी तो दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता फल फूल रही थी। ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अगस्त्य ने सर्वप्रथम उत्तर और दक्षिण भारत में समन्वय स्थापित करते हुए विभिन्न जन समूहों में स्नेह संपर्क तथा भाषाओं में प्रभावपूर्ण विकास लाने का कार्य किया। उन्होंने आर्येतर जाति की कन्या लोपमुद्रा से विवाह कर समन्वय व उदारता की भावना को और आगे बढाया। महर्षि अगस्त्य के पश्चात रामायण व महाभारत जैसे महाकाव्यों ने भी उत्तर और दक्षिण के भेद को मिटाने में महती भूमिका निर्वाहित की। संस्कृत ने इन भारतीय प्रदेशों के निवासियों के बीच संपर्क भाषा का स्थान पाया किन्तु तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़ आदि क्षेत्रीय भाषाए भी फलती फूलती रही व अनेक उच्च स्तर के साहित्य का सृजन इन भाषाओं में होता रहा। शैव वैष्णव समुदाय के कवियों द्वारा रचे गए भक्ति काव्यों ने हमारी सामासिक संस्कृति और अधिक बल प्रदान किया। आर्य एवं द्रविड़ संस्कृति और कई प्रादेशिक व साम्प्रदायिक संस्कृतियों ( जैन बौध, शैव, वैष्णव आदि) के संगम से सामासिक संस्कृति बनी। भिन्न भिन्न पर्व, त्यौहार, वृत, उत्सव, आदि में आर्य संस्कृति आज भी सजीव है। शिल्प के क्षेत्र में, उत्तर व दक्षिण, दो अलग अलग शैलियाँ का प्रभाव हमारे प्राचीन मंदिरों भवनों आदि में दिखाई देता है। उत्तर भारत के हिन्दुस्तानी संगीत व दक्षिण के कार्नेटिक संगीत की जुगलबंदी भी राष्ट्रीय समरसता की प्रतीक है। इस अमिट अंतरधारा की विशेषता है विविधताओं और विभिन्नताओं के बीच अभिन्नता को बनाए रखने की संजीवनी सामंजस्य भावना। इस सार्वजनीन भावना पर समस्त भारतीयों आर्य, आर्येतर, द्रविड़ आदि सभी का समान अधिकार है। यही भावना हम सभी को एक बनाए रख सकने में सक्षम है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 75 – अर्द्धनारी-नटेश्वर ☆
मीमांसा की दृष्टि से वैदिक दर्शन अनन्य है। देवों के देव को महादेव कहा गया और परंपरा में महादेव अर्द्धनारी-नटेश्वर के रूप में विद्यमान हैं। अर्द्धनारी-नटेश्वर, स्त्री-पुरुष के सह अस्तित्व का प्रतीक हैं। नर के अस्तित्व को आत्मसात करती नारी और नारी से अस्तित्व पाता नर।
इस दर्शन की यथार्थ के धरातल पर पड़ताल करें तो पाते हैं स्त्री पुरुष को आत्मसात नहीं करती अपितु पुरुष में लीन हो जाती है।
एक बुजुर्ग दंपति के यहाँ जाना होता था। बुजुर्ग की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं। तब भी सदा घर के काम करती रहतीं। उन्हें आवभगत करते देख मुझे बड़ी ग्लानि होती थी। पीछे सूचना मिली कि वे चल बसीं।
लगभग बीस रोज़ बाद बुजुर्ग से मिलने पहुँचा। वे मेथी के लड्डू खा रहे थे। मुझे देखा तो आँखों से जलधारा बह निकली। बोले, “उसने जीवन भर कुछ नहीं मांगा, बस देती ही रही। घुटनों के दर्द के चलते मैं पाले में मेथी के लड्डू खाता हूँ। जाने से पहले इस पाले के लड्डू भी बना कर गई है, बल्कि हमेशा से कुछ ज्यादा ही बना गई।”
चंद्रकांत देवल ने लिखा है कि आत्महत्या करने से पहले भी स्त्री झाड़ू मारती है, घर के सारे काम निपटाती है, पति और बच्चों के लिए खाना बनाती है, फिर संखिया खाकर प्राण देती है।
पुरुष का नेह आत्मसात करने का होता है, स्त्री का लीन होने का।
आत्मसात होने से उदात्त है लीन होना। निपट अपढ़ से उच्च शिक्षित, हर स्त्री लीनता के इस भाव में गहन दीक्षित होती है।
समर्पण से संपूर्णता की दीक्षा और लीन होने का पाठ स्त्री से पढ़ने की आवश्यकता है।
जिस दिन यह पाठ पढ़ा सुना और गुना जाने लगेगा, अर्द्धनारी-नटेश्वर महादेव घर-घर जागृत हो जाएँगे।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(आज “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद साहित्य “ में प्रस्तुत है श्री सूबेदार पाण्डेय जी का विशेष आलेख “रक्तदान ”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – रक्तदान ☆
रक्तदान के संबंध में विचारणीय प्रश्न यह है कि – स्वैक्षिक रक्तदान क्यों ?
दान एक आदर्श जीवन वृत्ति है जो मानव को लोक कल्याण हेतु प्रेरित करती है, जिसके बहुत सारे आयाम तथा स्वरूप है। इन्हें याचक की आवश्यकता के अनुसार दिया जाता है जैसे भूखे को अन्नदान, प्यासे को जलदान, नंगे बदन को वस्त्रदान। उसी प्रकार मृत्यु शै य्या पर पडे़ जीवन की आस में मौत से जूझ रहे व्यक्ति को अंग दान तथा रक्त दान की आवश्यकता पड़ती है। रक्तदान तथा अपने परिजनों की मृत्यु के पश्चात अंग दान द्वारा हम किसी की जान बचा कर नर से नारायण की श्रेणी में जा सकते हैं।
अपने परिजनों के नेत्रों को किसी की आंखों में संरक्षित उस नेत्रज्योति को जो मानव को ईश्वरीय उपहार में मिली है को लंबे समय तक दूसरों की आंखो में सुरक्षित कर सकते हैं। इससे ज़रूरत मंद नेत्रहीन तो दुनियां देखेगा हमें भी अपने परिजनों की आंखों के जीवित होने का एहसास बना रहेगा।
आज के इस आधुनिक युग में दुर्घटना, बिमारी तथा युद्ध के समय घायल अवस्था में मानव शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव के चलते मानव अस्पतालों में मृत्युशैया पर पड़ा मृत्यु से जूझ रहा होता है, उस समय उसके शरीर को रक्त की अति आवश्यकता पड़ती है। इसके अभाव में व्यक्ति की जान जा सकती है। रक्तदाताओं द्वारा दान किए गये रक्त के प्रत्येक बूंद की कीमत का पता उसी समय चलता है। रक्तदान से किसी भी व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। जिस अनुपात में रक्तकी जरूरत है उस अनुपात में आज रक्त की उपलब्धता नहीं है। आज भी दुर्घटना में घायलों मरीजों के परिजनों अथवा रक्ताल्पता से जूझ रहे बीमारों के परिजनों को उसके ग्रुप के रक्त के लिये भटकते हुए, लाइन में लगते छटपटाते देखा जा सकता है। उस समय यदि रक्त की सहज सुलभता हो और समय से उपलब्ध हो तो किसी का जीवन आसानी से बचाना संभव हो सकता है इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए रक्तकोष बैंकों की स्थापना की गई।
स्वैक्षिक रक्तदान में बाधायें –
स्वैक्षिक रक्तदान में सबसे ज्यादा बाधक अज्ञानता तथा जनचेतना का अभाव है। संवेदनशीलता का अभाव तथा तमाम प्रकार की भ्रांतियों से भी हमारा समाज ग्रस्त हैं। उन्हें दूर कर, युद्ध स्तर पर अभियान चला कर, विभिन्न प्रचार माध्यमों द्वारा रक्तदान के महत्व तथा उसके फायदे से लोगों को अवगत कराना होगा। लोगों को समझा कर, जनचेतना पैदा कर, अपने अभियान से वैचारिक रूप से जोड़ना होगा। संवाद करना होगा,और इस बात को समझाना होगा कि आप द्वारा किया गया रक्तदान अंततोगत्वा आप के समाज के ही तथा आप के ही परिजनों के काम आता है। जब हम मानसिक रूप से लोगों को अपने अभियान से जोड़ने में सफल होंगे तथा अपने अभियान को जनांदोलन का रूप दे पायेंगे तो निश्चित ही रक्तदाता समूहों की संख्या बढ़ेगी। रक्त का अभाव दूर कर हम किसी को जीवन दान देने में सफल होंगे। स्वैक्षिक रक्तदान की महत्ता का ज्ञान करा सकेंगे।
रक्तदान से होने वाले फायदे –
जब हम रक्तदान करते हैं तो हमें दोहरा फायदा होता है, प्रथम तो हमारा रक्त हमारे समाज के किसी परिजन की प्राण रक्षा करता है, दूसरा जब हमारे शरीर से रक्त दान के रूप में रक्त बाहर निकलता है तब हमारा शरीर कुछ समय बाद ही नया रक्त बना कर शरीर को नये रक्त से भर देता है, जिसके चलते शरीर को नइ स्फूर्ति तथा नवचेतना का आभास होता है और नया रक्त कोलेस्ट्राल तथा ब्लड शुगर से मुक्त होता है। जिसके चलते हम स्वस्थ्य जीवन जी सकते हैं। इस लिए प्रत्येक व्यक्ति को रक्तदाता समूहों से जोड़ कर, किसी की जान बचाकर जीवन दाता के रूप में खुद को स्थापित कर अक्षय पुण्य लाभ का भागी बनना चाहिए।
अंत में लोक मंगल कामना “सर्वेभवन्तु सुखिन:” के साथ एक अनुरोध – लोक मंगल हेतु इस आलेख को जन-जन तक पहुंचा इस मंगल कार्य में सहभागिता करें।
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का एक अत्यंत विचारणीय आलेख ख़ामोशी एवं आबरू।यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 73 ☆
☆ ख़ामोशी एवं आबरू ☆
‘शब्द और सोच दूरियां बढ़ा देते हैं, क्योंकि कभी हम समझ नहीं पाते, कभी समझा नहीं पाते।’ शब्द ब्रह्म है, सर्वव्यापक है, सृष्टि का मूलाधार व नियंता है और समस्त संसार का दारोमदार उस पर है। सृष्टि में ओंम् शब्द सर्वव्यापक है, जो अजर, अमर व अविनाशी है। इसलिए दु:ख, कष्ट व पीड़ा में व्यक्ति के मुख से ‘ओंम् तथा मां ‘ शब्द ही नि:सृत होते हैं। परमात्मा ने शिशु की उत्पत्ति व संरक्षण का दायित्व मां को सौंपा है। वह नौ माह तक भ्रूण रूप में गर्भ में पल रहे शिशु का, अपने लहू से सिंचन व भरण-पोषण करती है, जो किसी करिश्मे से कम नहीं है। जन्म के पश्चात् शिशु के मुख से पहला शब्द ओंम, मैं व मां ही प्रस्फुटित होता है। मां के संरक्षण में वह पलता-बढ़ता है और युवा होने पर वह उसके लिए पुत्रवधु ले आती है, ताकि वह भी सृष्टि-संवर्द्धन में योगदान देकर, अपने दायित्व का वहन कर सके।
घर में गूंजती बच्चों की किलकारियां सुनने को आतुर मां… अपने आत्मज के बच्चों को देख पुनः उस अलौकिक सुख को पाना चाहती है और यह बलवती लालसा उसे हर हाल अपने आत्मजों के परिवार के साथ रहने को विवश करती है। वहां रहते हुए वह खामोश रहकर हर आपदा सहन करती रहती है, ताकि हृदय में खटास उत्पन्न न हो और कटुता के कारण दिलों में दूरियां न बढ़ जाएं। वह परिवार रूपी माला के सभी मनकों को स्नेह रूपी डोरी में पिरोकर रखना चाहती है, ताकि घर में सामंजस्य व सौहार्द बना रहे। परंतु कई बार यह खामोशी उसके अंतर्मन को सालने लगती है।
वैसे ख़ामोशी की सार्थकता, सामर्थ्य व प्रभाव- क्षमता से सब परिचित हैं। खामोशी सबकी प्रिय है और वह आबरू को ढक लेती है, जो समय की ज़बरदस्त मांग है। ‘रिश्ते खामोशी का भूषण धारण कर, न केवल जीवित रहते हैं, बल्कि पनपते भी हैं। वे केवल उसकी शोभा ही नहीं बढ़ाते…उसके जीवनाधार हैं।’ लड़की जन्मोपरांत पिता व भाई के सुरक्षा-दायरे में, विवाह के पश्चात् पति के घर की चारदीवारी में और उसके देहांत के बाद पुत्र के आशियां में सुरक्षित समझी जाती है। परंतु आजकल ज़माने की हवा बदल गई है और वह कहीं भी सुरक्षित नहीं है। सो! समय की नज़ाकत को देखते हुए बचपन से ही उसे खामोश रहने का पाठ पढ़ाया जाता है और असंख्य आदेश-उपदेश दिए जाते हैं; प्रतिबंध लगाए जाते हैं और हिदायतें भी दी जाती हैं। अक्सर भाई के साथ प्रिय व असामान्य व्यवहार देख उसका हृदय क्रंदन कर उठता है और उसके समानाधिकारों की मांग करने पर, उसे यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि ‘वह कुल-दीपक है, जो उन्हें मोक्ष के द्वार तक ले जाएगा।’ परंंतु तुझे तो यह घर छोड़ कर जाना है… सलीके से मर्यादा में रहना सीख। खामोशी तेरा श्रृंगार है और तुझे ससुराल में जाकर सबकी आशाओं पर खरा उतरने के लिए खामोश रहना है… नज़रें झुका कर हर हुक्म बजा लाना है तथा उनके आदेशों को वेद-वाक्य समझ, उनके हर आदेश की अनुपालना करनी है।
इतनी हिदायतों के बोझ तले दबी वह नवयौवना, पति के घर की चौखट लांघ, उस घर को अपना घर समझ सजाने-संवारने में लग जाती है और सबकी खुशियों के लिए अपने अरमानों का गला घोंट, अपने मन को मार, ख्वाहिशों को दफ़न कर पल-पल जीती, पल-पल मरती है; कभी उफ़् नहीं करती है। परंतु जब परिवारजनों की नज़रें सी•सी•टी•वी• कैमरों की भांति उसकी पल-पल की गतिविधियों को कैद करती हैं और उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर देती हैं, तो उसका हृदय चीत्कार कर उठता है। परंतु फिर भी वह खामोश अर्थात् मौन रहती है, प्रतिकार अथवा विरोध नहीं दर्ज कराती तथा प्रत्येक उचित-अनुचित व्यवहार, अवमानना व प्रताड़ना को सहन करती है। परंतु एक दिन उसके धैर्य का बांध टूट जाता है और उसका मन विद्रोह कर उठता है। उस स्थिति में उसे अपने अस्तित्व का भान होता है। वह अपने अधिकारों की मांग करती है, परंतु कहां मिलते हैं उसे समानाधिकार …और वह असहाय दशा में तिलमिला कर रह जाती है। वह स्वयं को चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाती है, क्योंकि जिस घर को वह अपना समझती रही, वह उसका कभी था ही नहीं। उसे तो किसी भी पल उस घर को त्यागने का फरमॉन सुनाया जा सकता है।
अक्सर महिलाएं परिवार की आबरू बचाने के लिए खामोशी का बुर्क़ा अर्थात् आवरण ओढ़े घुटती रहती हैं; मुखौटा धारण कर खुश रहने का स्वांग रचती हैं। विवाहोपरांत माता-पिता के घर के द्वार उनके लिए बंद हो जाते हैं और पति के घर में वे सदा परायी अथवा अजनबी समझी जाती हैं…अपने अस्तित्व को तलाशती, हृदय पर पत्थर रख अमानवीय व्यवहार सहन करतीं, कभी प्रतिरोध नहीं करतीं। अन्तत: इस संसार को अलविदा कह चल देती हैं।
परंतु इक्कीसवीं सदी में महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। बचपन से लड़कों की तरह मौज-मस्ती करना, वैसी वेशभूषा धारण कर क्लबों व पार्टियों से देर रात घर लौटना व अपने हर शौक़ को पूरा करना… उनके जीवन का मक़सद बन जाता है और वे अपने ढंग से अपनी ज़िंदगी जीने लगती हैं। सो! प्रतिबंधों व सीमाओं में जीना उन्हें स्वीकार नहीं, क्योंकि वे पुरुष की भांति हर क्षेत्र में दखलांदाज़ी कर सफलता प्रात कर रही हैं। अब वे सीता की भांति पति की अनुगामिनी बनकर जीना नहीं चाहतीं, न ही अग्नि-परीक्षा देना उन्हें मंज़ूर है। वे पति की जीवन-संगिनी बनने की हामी भरती हैं, क्योंकि कठपुतली की भांति नाचना उन्हें अभीष्ठ नहीं। वे स्वतंत्रता-पूर्वक अपने ढंग से जीना चाहती हैं। मर्यादा की सीमाओं व दायरे में बंध कर जीवन जीना उन्हें स्वीकार नहीं, जिसके भयावह परिणाम हमारे समक्ष हैं। वे रिश्तों की अहमियत नहीं स्वीकारतीं; न ही घर-परिवार के क़ायदे-कानून उनके पांवों में बेड़ियां डाल कर रख सकते हैं। वे तो सभी बंधनों को तोड़ स्वतंत्रता-पूर्वक जीना चाहती हैं। सो! बात-बात पर पति व परिवारजनों से व्यर्थ में उलझना, उन्हें भला-बुरा कहना, प्रताड़ित व तिरस्कृत करना… उनके स्वभाव में शामिल हो जाता है, जिसके भीषण परिणाम तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष हैं।
संयुक्त परिवारों का प्रचलन तो गुज़रे ज़माने की बात हो गया है। एकल परिवार व्यवस्था के चलते पति-पत्नी एक छत के नीचे अजनबी-सम रहते हैं, एक-दूसरे के सुख-दु:ख व संबंध- सरोकारों से बेखबर… अपने-अपने द्वीप में कैद। वैसे हम दो, हमारे हम दो का प्रचलन ‘हमारा एक’ तक आकर सिमट गया। परंतु अब तो संतान को जन्म देकर युवा-पीढ़ी अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही नहीं चाहती, क्योंकि आजकल वे सब ‘तू नहीं और सही’ में विश्वास करने लगे हैं और ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ ने तो संस्कृति व संस्कारों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। इसलिए हर तीसरे घर की लड़की तलाक़शुदा दिखाई पड़ती है। लड़के भी अब इसी सोच में आस्था व विश्वास रखने लगे हैं और वे भी यही चाहते हैं। परंतु उन्हें न चाहते हुए भी घर में सुख-शांति व संतुलन बनाए रखने के लिए उसी ढर्रे पर चलना पड़ता है। अक्सर अंत में वे उसी कग़ार पर आकर खड़े हो जाते हैं, जिसका हर रास्ता अंधी गलियों में खुलता है अर्थात् विनाश की ओर जाता है। सो! वे भी ऐसी आधुनिक जीवन-संगिनी से निज़ात पाना बेहतर समझते हैं। अक्सर लड़के तो आजकल विवाह करना ही नहीं चाहते, क्योंकि वे अपने माता-पिता को सीखचों के पीछे देखने की भयावह कल्पना-मात्र से कांप उठते हैं। शायद! यह विद्रोह व प्रतिक्रिया है– उन ज़ुल्मों के विरुद्ध, जो महिलाएं वर्षों से सहन करती आ रही हैं।
‘शब्द व सोच दूरियां बढ़ा देते हैं। कई बार दूसरा व्यक्ति उसके मन के भावों को समझना ही नहीं चाहता और कई बार वह उसे समझाने में स्वयं को असमर्थ पाता है…दोनों स्थितियां भयावह व गंभीर हैं।’ इसलिए वह अपनी सोच, अपेक्षा व भावों को उजागर भी नहीं कर पाता। इन असामान्य परिस्थितियों में मन की दरारें इस क़दर बढ़ती चली जाती हैं ,जो खाई के रूप में मानव के समक्ष आन खड़ी होती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। शायद! इसीलिए कहा गया है कि ‘ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा’ अर्थात् अजनबी बनकर जीने से बेहतर है– संबंध-विच्छेद कर, स्वतंत्रता व सुक़ून से अपनी ज़़िंदगी जीना। जब ख़ामोशियां डसने लगें और हर पल प्रहार करने लगें, तो अवसाद की स्थिति में जीने से बेहतर है… उनसे मुक्ति पा लेना। जीवन में केवल समस्याएं नहीं हैं, धैर्यपूर्वक सोचिए और संभावनाओं को तलाशने का प्रयास कीजिए। हर समस्या का समाधान उपलब्ध होता है और उसके केवल दो विकल्प ही नहीं होते। आवश्यकता है, शांत मन से उसे खोजने की… अपनाने की और विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करने की। इसलिए ‘व्यक्ति जितना डरेगा, लोग उसे उतना डरायेएंगे’…सो! हिम्मत करो, सब सिर झुकायेंगे। ‘लोग क्या कहेंगे’ इस धारणा-भावना को हृदय से निकाल बाहर फेंक दें, क्योंकि आपाधापी भरे युग में किसी के पास किसी के लिए समय है ही कहां… सब अपने- अपने द्वीप में कैद हैं। सो! व्यर्थ की बातों में मत उलझिए, क्योंकि दु:ख में व्यक्ति अकेला होता है और सुख में तो सब साथ खड़े दिखाई देते हैं।
इसलिए दु:ख आपका सच्चा मित्र है, सदा साथ रहता है… सबक़ सिखाता है और जब छोड़कर जाता है, तो सुख देकर जाता है। वास्तव में दोनों का एक स्थान पर इकट्ठे रहना संभव नहीं है। इसलिए संसार में रहते हुए स्वयं को आत्मसीमित अर्थात् आत्मकेंद्रित मत कीजिए, क्योंकि यहां अनंत संभावनाएं उपलब्ध हैं। इसलिए यह मत सोचिए कि ‘मैं नहीं कर सकता।’ पूर्ण प्रयास कीजिए और सभी विकल्प आज़माइए। परंतु यदि फिर भी सफलता न प्राप्त हो, तो उस विषम व असामान्य परिस्थिति में अपना रास्ता बदल लेना श्रयेस्कर है, ताकि आबरू सुरक्षित रह सके।
ख़ामोशी मौन का दूसरा रूप है। मौन रहने व तुरंत प्रतिक्रिया न देने से समस्याएं, बाधाओं के रूप में आपका रास्ता नहीं रोक सकतीं…स्वत: समाधान निकल आता है। इसलिए समस्या के उपस्थित होने पर, क्रोधित होकर त्वरित निर्णय मत लीजिए… चिंतन-मनन कीजिए…सभी पहलुओं पर सोच-विचार कीजिए, समाधान आपके सम्मुख होगा। यही है…जीने की सर्वश्रेष्ठ कला। परिवार, दोस्त व रिश्ते अनमोल होते हैं। उनके न रहने पर उनकी कीमत समझ आती है और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए खामोशी के आवरण की दरक़ार है, क्योंकि वे प्रेम व त्याग की बलि चाहते हैं। खामोशी अथवा मौन रहना उर्वरक है, जो परिवार में प्रेम व रिश्तों को गहनता प्रदान करता है। दोनों स्थितियों में प्रतिदान का भाव नहीं आना चाहिए, क्योंकि वह तो हमें स्वार्थी बनाता है। सो! किसी से आशा व अपेक्षा मत रखिए, क्योंकि अपेक्षा ही दु:खों का कारण है और मांगना तो मरने के समान है। देने में सुख व संतोष का भाव निहित है। इसलिए सहन-शक्ति बढ़ाएं। यह सर्वश्रेष्ठ दवा है और खामोशी की पक्षधर है, जिसके संरक्षण में संबंध फलते-फूलते व पूर्ण रूप से विकसित होते हैं।
( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “एहसास“. )
☆ किसलय की कलम से # 25 ☆
☆ एहसास ☆
मुझे लगता है, जब हम अपनी पूर्ण सामर्थ्य और श्रेष्ठता से कोई कार्य करते हैं, सेवा करते हैं या फिर प्रयास करते हैं तब सफलता के प्रति अधिक आशान्वित रहते हैं। सफलता मिलती भी है। सफलताएँ अथवा असफलताएँ समय एवं परिस्थितियों पर भी निर्भर करती हैं। ये परिस्थितियाँ उचित-अनुचित अथवा अच्छी-बुरी भी हो सकती हैं। अक्सर सफलता का श्रेय हम स्वयं को देते हैं, जबकि इसमें भी अनेक लोगों का योगदान निहित होता है।
जब असफलता हाथ लगती है तब हम अपने भाग्य के साथ साथ दूसरों को भी कोसते हैं। कमियों को भी खोजते हैं।
सबसे महत्त्वपूर्ण बातें ये होती हैं कि उस समय हमें अपने द्वारा किये अधर्म, अन्याय, बुरे कर्म, अत्याचार, दुर्व्यवहार आदि की स्मृति अवश्य होती है। कदाचित पश्चाताप भी होता है।
आखिर खुद या अपने निकटस्थों के अनिष्ट पर उपरोक्त कर्मों को स्मरण करते हुए हम घबराए, चिंतित और पश्चाताप की मुद्रा में क्यों आ जाते हैं, जबकि यह पूर्णरूपेण सत्य नहीं होता!
जब सफलता का श्रेय स्वयं को देते हैं तब असफलता अथवा अनिष्ट होने पर भाग्य को, अनैतिक कार्यों को, दुर्व्यवहार को दोष क्यों देते हो जबकि आप के द्वारा किये गए कार्य अथवा कमियाँ ही इसकी जवाबदार होती हैं। अब मुद्दे की बात ये है कि अनिष्ट को अपने कर्मों, दुर्व्यवहारों और अनैतिक कार्यों का परिणाम निरूपित करने के पीछे उपरोक्त कारक सक्रिय क्यों हो जाते है। यह एक मानव का सामान्य स्वभाव है कि जब हताशा होती है तो हम अपने भूतकाल को स्मृतिपटल पर बार-बार दोहराते हैं और सोचते हैं, कहीं मेरे द्वारा किये गए फलां कार्य का यह परिणाम तो नहीं है। फिर ‘का बरसा जब कृषी सुखानी’ की तर्ज पर सोचने लगते हैं कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। पर “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत” लेकिन ये सभी बातें हैं कि मानस पटल से ओझल होती ही नहीं। आशय यही है कि कहीं न कहीं हम भयभीत जरूर होते हैं कि हमारे दुष्कर्मों के कारण ही ये अनिष्ट हुआ है। इन परिस्थितियों में हमारे मन को “बुरे कर्म का बुरा नतीजा” की बात सही लगती है। वास्तव में भी यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कुल मिलाकर अंत में यही सिद्ध होता है और निष्कर्ष भी यही निकलता है कि हमें बुरे कर्मों से बचना ही चाहिए।
इसमें दो मत नहीं है कि यदि हम जीवन में सदाचार, सरलता, सादगी, सत्यता और संतोष अपना लेते हैं, तो कम से कम पिछले बुरे कर्मों को दोष देने से बच सकते हैं। इसे जग के हर एक इंसान को एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए कि अब इंसानियत पुनर्जीवित करने के लिए आपको एक अवसर और दिया जाता है।
इसीलिए बुरे वक्त में पिछली बुरी बातें याद आती हैं और उन गल्तियों का एहसास भी होता है, जो एक अच्छे इंसान के रूप में नहीं करना चाहिए थीं।
(ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह समय-समय पर “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत चुनिंदा रचनाएँ पाठकों से साझा करते रहते हैं। हमारा आग्रह है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। आज प्रस्तुत है श्री अमरेन्द्र नारायणजी का डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के जन्मदिवस पर एक विशेष आलेख अनमोल रत्न : देशरत्न।)
☆ सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆डॉ राजेंद्र प्रसाद जन्मदिवस विशेष – अनमोल रत्न:देशरत्न ☆
देशरत्न डाॅ.राजेन्द्र प्रसाद एक अनमोल रत्न थे। वे प्रखर प्रतिभाशाली थे और उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। देश प्रेम,सादगी और कर्तव्य परायणता से ओत- प्रोत उनका जीवन एक तपोनिष्ठ कर्मयोगी का जीवन था। वे अपने विद्यार्थी जीवन से ही देश सेवा से सम्बंधित कार्यों में संलग्न थे। वे चम्पारण सत्याग्रह में गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये और उनके जीवन भर अनन्य सहयोगी बने रहे। उन्होंने अपनी मुद्रा वर्षिणी वकालत छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे समय में कूद पड़े जब त्यागी और मनसा-वाचा-कर्मणा समर्पित देश प्रेमियों की देश को बहुत आवश्यकता थी। चाहे सेवा कार्य हो या रचनात्मक कार्यक्रम का नेतृत्व करना हो, शिक्षा का प्रसार करना हो, कांग्रेस संगठन के कार्य हों, सरकार में मंत्री का दायित्व संभालना हो या आगे चलकर संविधान सभा के अध्यक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व वहन करना हो-उन्होंने अपनी कर्तव्य परायणता और कार्य कुशलता से सभी दायित्वों का अत्यंत सफलता पूर्वक निर्वाह किया।
यह हमारा सौभाग्य था कि वे देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में प्रतिष्ठित हुये।
उनके विषय में सरोजिनी नायडू ने लिखा था: “मुझे कुछ दिनों पूर्व राजेन्द्र बाबू पर एक वाक्य लिखने को कहा गया था। मैंने उत्तर दिया था कि मैं वैसा तभी कर सकती हूं जब मेरे हाथों में शहद की दावात में डूबी सोने की कलम हो क्योंकि विश्व की सारी स्याही उनके गुणों का वर्णन और उनके प्रति आभार प्रगट करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। “
लेकिन आज उनके महान व्यक्तित्व के कई पहलुओं से बहुत लोग अपरिचित से हैं। उनके योगदान को उचित सम्मान नहीं मिल पाया है। यहां तक कि संविधान निर्माण में उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख नहीं होता, पटना में उनकी समाधि उपेक्षित सी है और उनके जन्म दिवस एवं उनकी पुण्य तिथि पर मात्र औपचारिकता का निर्वाह कर दिया जाता है।
यह हमारा कर्तव्य है कि हम देशरत्न के विलक्षण व्यक्तित्व से लोगों को परिचित करायें और उनसे प्रेरणा लें। उनकी अद्वितीय प्रतिभा के सम्मान में उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय मेधा दिवस के रूप में मनाया जाये और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं का सम्मान किया जाये,स्वतंत्रता आन्दोलन और संविधान निर्माण में उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका और राष्ट्रपति के पद पर उनके योगदान से लोगों को अवगत कराया जाये। विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनके जीवन चरित को सम्मिलित किया जाये।
आईये, उनके महान व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर हम देशरत्न के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करें।
(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते हैं। इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है एक नवीनतम जानकारी से परिपूर्ण आलेख ‘नोबेल पुरूस्कार मिला जीन एडिटिंग की कैंची पर, दो महिला वैज्ञानिकों का कारनामा ’। हम आपसे उनकी अनुभवी कलम से ऐसे ही आलेख समय समय पर साझा करते रहेंगे।)
☆ आलेख ☆ नोबेल पुरूस्कार मिला जीन एडिटिंग की कैंची पर, दो महिला वैज्ञानिकों का कारनामा ☆
जीवन की आधारभूत इकाई को जीन कहा जाता है और इसे समझने व उपयोग में लाने के विज्ञान को जेनेटिक इंजीनियरिंग का नाम दिया जाता है। यह विज्ञान अब कपास जैसी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों और लुलू-नाना की कहानी से इतना आगे बढ़ गया है कि जीनोम एडिटिंग का एक नया, सरल और सस्ता उपाय ढूंढने के लिए दो महिला वैज्ञानिकों को इस वर्ष का केमिस्ट्री का नोबेल पुरुस्कार दिया गया है।
(सुश्री एमानुएल चरपैंटर और सुश्री जेनिफर डूडना)
एमानुएल चरपैंटर और जेनिफर डूडना की खोज को जीनोम की कांट छांट करने की ऐसी कैंची का नाम दिया गया है जो जीवन के किसी भी स्वरूप का एक नया कोड बना सकती है। इस कैंची का नाम क्रिस्पर कैस9 रखा गया है जिसकी मदद से वैज्ञानिक पशुओं, पौधों व सूक्ष्म जीवाणुओं का डीएनए बदल सकते हैं।
(हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की पूर्व प्रो डॉ सुनीता जैन)
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर डॉ सुनीता जैन कहती हैं कि जीनोम एडिटिंग का सरल और सस्ता तरीका उपलब्ध होने से एड्स, कैंसर, मलेरिया, देंगी और चिकनगुनिया जैसी असाध्य बीमारियों के इलाज की संभावना बन चली है।
जीन एडिटिंग के सहारे वैज्ञानिक वुली मैमथ और डायनासोर जैसे लुप्त जानवरों के जीवाश्मों से पुन: इन जीवों को ज़िंदा कर सकने की संभावना को देख रहे हैं। पशुओं और पौधों की बीमारियां उनके बीमार जीन निकाल कर दूर की जा सकेंगी।
मच्छर के जीन बदल कर उनकी अगली पीढ़ी को मलेरिया फैलाने के अयोग्य बना दिया जाएगा।
फसलों की पैदावार भी बढ़ाई जा सकेगी। पर क्या जीन एडिटिंग के प्रयोग मनुष्यों पर भी किए जाएंगे और उन्हे बेहतर या दुष्कर बनाया जा सकेगा?
इसका सभी सरकारें व वैज्ञानिक विरोध कर रहे हैं। इसी संदर्भ में लूलू और नाना की कहानी उभरती है। चीन के एक वैज्ञानिक ही जियानकुई ने एड्स की बीमारी से ग्रस्त एक व्यक्ति और उसकी सामान्य पत्नी के सीमन व अंडे से तैयार भ्रूण की जीनोम एडिटिंग कर एड्स बीमारी के जीन निष्क्रिय कर दिए और भ्रूण को महिला के गर्भाशय में स्थापित कर दिया। उसने दो स्वस्थ बेटियों को जन्म दिया जो एड्स मुक्त थीं। इन्हीं बच्चियों को लूलू और नाना के नाम से पुकारा जाता है। वैज्ञानिक ही जियानकुई ने जब अपनी इस उपलब्धि की घोषणा की तो हर तरफ से घोर विरोध हुआ। चीन की सरकार ने वैज्ञानिक ही जियानकुई पर मुकद्दमा चलाया और उन्हे तीन साल की कैद की सज़ा सुनाई गई
पर इस तकनीक के दुरुपयोग की संभावनाएं भी हैं। क्या इसके सहारे डिजाइनर बेबी तैयार किए जाएंगे? क्या मनुष्यों की अपार शक्ति बढ़ा कर उन्हे लड़ाई में उपयोग लाया जाएगा? क्या कुछ मानव प्रजातियों को समाप्त कर सभी को एक समान बनाया जाएगा? जैविक इंजीनियरिंग के उपयोग से कुछ जन्मजात बीमारियां जैसे अंधापन, थैलेसीमिया, सिक्कल सैल अनेमिया, सिस्टीक फाइब्रोसिस का इलाज ढूंढने की कोशिश की जा रही है। दुनिया में हर चालीस हजार बच्चों में से एक बच्चा जन्मजात अंधा होता है।
पर जीन एडिटिंग का उपयोग जैविक युद्ध करने के लिए भी किया जा सकता है। और सबसे ख़तरनाक होगा डिजाइनर बेबी तैयार करना। फिलहाल सभी वैज्ञानिक और सरकारें इसके खिलाफ हैं, पर टेक्नोलॉजी सुलभ होने पर इसके दुरुपयोग को रोकना हमेशा के लिए शायद संभव न हो। यह मानवता के सामने एक नैतिक प्रश्न रहेगा।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 74 – चेत जाओ !☆
रेल में भीड़-भड़क्का है। हर कोई अपने में मशगूल। एक तीखा, अनवरत स्वर ध्यान बेधता है। देखता हूँ कि साठ से ऊपर की एक स्त्री है संभवतः जिसके स्वरयंत्र में कोई दोष है। बच्चा मचलकर किसी वस्तु के लिए हठ करता है, एक साँस में रोता है, कुछ उसी तरह के स्वर में भुनभुना रही है वह। अंतर बस इतना कि बच्चे के स्वर को बहुत देर तक बरदाश्त किया जा सकता है जबकि यह स्वर बिना थके इतना लगातार है कि खीज़ पैदा हो जाए। दूर से लगा कि यह भीख मांगने का एक और तरीका भर है। वह निरंतर आँख की ज़द से दूर जा रही थी और साथ ही कान भुनभुनाहट से राहत महसूस कर रहे थे।
किसी स्टेशन पर रेल रुकी। प्लेटफॉर्म की विरुद्ध दिशा से वही भुनभुनाहट सुनाई दी। वह स्त्री पटरियों पर उतरकर दूसरी तरफ के प्लेटफॉर्म पर चढ़ी। हाथ से इशारा करती, उसी तरह भुनभुनाती, बेंच पर बैठे एक यात्री से अकस्मात उसका बैग छीनने लगी। उस स्टेशन से रोज़ यात्रा करनेवाले एक यात्री ने हाथ के इशारे से महिला को आगे जाने के लिए कहा। बुढ़िया आगे बढ़ गई।
माज़रा समझ में आ गया। बुढ़िया का दिमाग चल गया है। पराया सामान, अपना समझती है, उसके लिए विलाप करती है।
चित्र दुखद था। कुछ ही समय में चित्र एन्लार्ज होने लगा। व्यष्टि का स्थान समष्टि ने ले लिया। क्या मर्त्यलोक में मनुष्य परायी वस्तुओं के प्रति इसी मोह से ग्रसित नहीं है? इन वस्तुओं को पाने के लिए भुनभुनाना, न पा सकने पर विलाप करना, बौराना और अंततः पूरी तरह दिमाग चल जाना।
अचेत अवस्था से बाहर आओ। समय रहते चेत जाओ अन्यथा समष्टि का चित्र रिड्युस होकर व्यष्टि पर रुकेगा। इस बार हममें से कोई उस बुढ़िया की जगह होगा।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆