हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१० – पड़ाव के बाद का मौन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१० ☆ पड़ाव के बाद का मौन… ?

एक परिचित के घर बैठा हूँ। उनकी नन्ही पोती रो रही है। उसे भूख लगी है, पेटदर्द है, घर से बाहर जाना चाहती है या कुछ और कहना चाह रही है, इसे समझने के प्रयास चल रहे हैं।

अद्भुत है मनुष्य का जीवन। गर्भ से निकलते ही रोना सीख जाता है। बोलना, डेढ़ से दो वर्ष में आरंभ होता है। शब्द से परिचित होने और तुतलाने से आरंभ कर सही उच्चारण तक पहुँचने में कई बार जीवन ही कम पड़ जाता है।

महत्वपूर्ण है अवस्था का चक्र, महत्वपूर्ण है अवस्था का मौन..। मौन से संकेत, संकेतों से कुछ शब्द, शब्दों के माध्यम से भाषा से परिचित होते जाना और आगे की यात्रा।

मौन से आरंभ जीवन, मौन की पूर्णाहुति तक पहुँचता है। नवजात की भाँति ही बुज़ुर्ग भी मौन रहना अधिक पसंद करता है। दिखने में दोनों समान पर दर्शन में जमीन-आसमान।

शिशु अवस्था के मौन को समझने के लिए माता-पिता, दादी-दादा, नानी,-नाना, चाचा-चाची, मौसी, बुआ, मामा-मामी, तमाम रिश्तेदार, परिचित और अपरिचित भी प्रयास करते हैं। वृद्धावस्था के मौन को कोई समझना नहीं चाहता। कुछ थोड़ा-बहुत समझते भी हैं तो सुनी-अनसुनी कर देते हैं।

एक तार्किक पक्ष यह भी है कि जो मौन, एक निश्चित पड़ाव के बाद जीवन के अनुभव से उपजा है, उसे सुनने के लिए लगभग उतने ही पड़ाव तय करने पड़ते हैं। क्या अच्छा हो कि अपने-अपने सामर्थ्य में उस मौन को सुनने का प्रयास समाज का हर घटक करने लगे। यदि ऐसा हो सका तो ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों के जीवन में आनंद का उजियारा फैल सकेगा।

इस संभावित उजियारे की एक किरण आपके हाथ में है। इस रश्मि के आलोक में चलिए आज सुनें और पढ़ें किसी बुज़ुर्ग का मौन।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३० – आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३० ☆

☆ आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(बलिया का ददरी मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत)

विशाल गंगा का पाट, एक तरफ उत्तर प्रदेश, दूसरी तरफ बिहार। इस बीच रेत पर बसा हुआ एक नगर सिर्फ आज ही नहीं बल्कि सैकड़ो वर्ष पुराने अतीत को अपने दामन में सजोये, अपनी पुरानी पहचान के साथ जस का तस खड़ा है।

महर्षि भृगु के शिष्य दर-दर मुनि के नाम से लगने वाले प्रख्यात कार्तिक पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाला ददरी मेला भारत में ही नहीं बल्कि विश्व मैं भी अपनी पहचान कायब रखा है। हमारे धर्म संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र में नदी और सरोवर में स्नान करने का विधान है। इसी क्रम में एक ऐतिहासिक स्नान महर्षि भृगु की नगरी बलिया में गंगा स्नान करने का बड़ा महत्व है।

यदि हम आज से तीन दशक पीछे जाए तो हमारे गांव संवरा की सड़कों पर मेले के लिए पैदल जाती हुई भीड़, जिसके भीतर श्रद्धा और आस्था कूट-कूट कर भरी होती थी, लगातार पूरी रात चलती थी। लोग सड़क के किनारे खड़े होकर पूरी रात, टैक्सी, बस का इंतजार करते थे। सब की इच्छा या होती थी कि कब गंगा जी के तीर पहुचें और गंगा जी में पवित्र डुबकी गं लगावें।

मुझे याद है, एक बार भईया ( सबसे बड़े भाई साहब -स्व. डॉ शमशेर सिंह, ) मुझे कार्तिक पूर्णिमा ददरी स्नान के लिए गाँव सायकिल से ले गये। वे साइकिल चला रहे थे। पीछे की सीट पर एक बढ़िया सा कपड़ा बांध दिए और उस पर मुझे बैठा दिया। मैं दोनों हाथ पकड़ कर उनके पीछे बैठकर बलिया पहुंचा था। मेरे गांव से बलिया करीब 26 किलोमीटर दूर और बलिया से कम से कम 3-4 किलोमीटर गंगा की थी। हम रात के 10:00 बजे घर से चले थे और लगभग 1:30 के आसपास सामने स्नान कर लिये था। गंगा स्नान करने का क्रेज इतना जबरदस्त था कि लोग कहां-कहां से दूर-दूर से पैदल, गाड़ी से बैलगाड़ियों से ट्रेन से, बस से स्नान करने बलिया आते थे।

मैंने अपने शुरू के पंक्ति में लिखा है ‘सतुवा पिसान के लबरी’ इसका मतलब भी आता है कि लोग इस यात्रा पर निकलते थे तो अपने साथ बलिया का खास रेडीमेड व्यंजन सतुआ अवश्य ही ले आते थे। यानी यदि कोई 15 -20 -25 किलोमीटर पैदल यात्रा करके गंगा स्नान करने जा रहा है, तो वह रास्ते में रुककर सतुवा घोल कर या सुतुआ को सानकर कर खा लेता था।

इस प्रकार अपनी इस आस्था यात्रा को पूरा करते हुए गंगा जी में डुबकी लगाकर वापस लौटता था। वापस लौटने के पहले प्रत्येक दर्शनार्थी या स्नानार्थी की इच्छा यह होती थी कि वह भारतीय भृगु के जरूर दर्शन करें। तत् पश्चात् बालेश्वर बाबा के दर्शन करें।

ये वही महर्षि बाबा है जिनके शिष्य दर-दर ऋषि के नाम पर ददरी मेला लगता है। ददरी मेला भारत के बड़े मेलों में से एक है। ऐसे बड़े मेलों में एक मेला बिहार के सोनपुर में लगता है। जिसे लोग हरिहरनाथ का मेला कहते हैं। लोगों मानता है कि बलिया मेला जब समाप्त होता है तो हरिहर क्षेत्र का सोनपुर का मेला शुरू हो जाता है। ये ही सारी दुकान वहां जाकर शिफ्ट हो जाती थी। इस मेले की विशेषता यह थी कि इस मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के अलावा पशुओं का बाजार विशेष रूप से हाथी घोड़ा भी बिकते हैं। न जाने अब हाथी दिखाते हैं या नहीं नहीं मैं बता सकता। पहले लोग हाथी पालने के शौकीन होते थे जो रइस जाते या समृद्ध परिवार के लोग होते थे उन्हें हाथी पालने का शौक था। वे अपने दरवाजे पर हाथी रखते थे। हाथी को शुभ मानते थे। लक्ष्मी का स्वरूप मानते थे। हाथी को खरीदने से ज्यादा हाथी को पालने का महत्व होता था। हर किसी कूबत नहीं होती थी कि वह हाथी पाल सके क्योंकि हाथी ऐसा जानवर है जिसको भरपूर चारा चाहिए। उसका पूरा-पूरा देख-रेख होना चाहिए। उसके ड्राइवर यानी महावत का पूरा खर्च देना होता है। यानी एक ऐसा वाहन जिसका आउटपुट जीरो हो लेकिन उसमें लागत बड़ी तगड़ी हो।

शायद अबके जमाने में कोई ऐसा वाहन को नहीं खरीदना चाहेगा। मेरे बड़ी बुआ के घर हाथी हुआ करता था उसे हाथी के लिए अलग से दो चार बीघा गन्ने बोए जाते थे। वह हाथी कभी-कभार मेरे गांव भी आता था और एक दिन नहीं हफ्तों रुक जाता था अब तो उसे तक उसके चेहरे की सारी व्यवस्था हम सबको करनी पड़ती थी। लेकिन एक शोहरत तो थी ही कि हमारे बुआ के पास हाथी है।

इस समय ददरी मेले हाथी बिक रहा है या नहीं बिक रहा है लेकिन नहीं कह सकता।

मेले में का ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्वरूप जिसे लोग बहुत याद करते हैं वह स्वयं में विशिष्ट हुआ करता था। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम साहित्यिक गोष्ठीयाँ एवं कवि सम्मेलन आदि भी होते थे, आज भी होते हैं। अपने ईंटर के हिंदी पुस्तक में “भारतवर्षोन्नति कैसे हो “शीर्षक से एक लेख हुआ करता था। यह लेख भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा 1884 में बलिया के ददरी मेले में दिए गये भाषण पर आधारित था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि यह मेला कितना प्राचीन मेला रहा है। यदि आप बलिया के निवासी हैं तो आपको बलिया भृगुजी, ददरी मेला, रसड़ा की रामलीला, बलिया का महावीरी झंडा, बलिया बलिदान दिवस, आदि ऐतिहासिक तिथि एवं अवसरों का ज्ञान या जानकारी अवश्य होगी।

 फिर मैं ददरी मेंले की ओर लौटता हूं। इस ददरी मेले में जब महिलाएं गीत गाते हुए सड़कों पर निकलती थी तो हमारे पिताजी, उन महिलाओं का गया हुआ एक गीत गुनगुनाया करते थे, मैं उस गीत की कुछ पंक्तियों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूं।

” योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जैसे रे सोनरा सोनवा के जोगवे ला,

घटे न पावे एको रत्ती,

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जइसे रे पन्हेंरिया पनावा के जोगवेला,

सड़े न पावे एको पती,

योगव हूँ निशि वासर जोगजती,

वैसे हो रामजी सीता जी के जोगवे ले,

घटे न पावे मान मती

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

ऐसे अनेक भक्ति गीतों गाते हुए महिलाएं सिर पर गठरी रखे हुए मेले की तरफ निकलती थी और अपनी यात्रा को बड़े ही आनंद के भाव से पूरा करतीं थीं।

वैसे जो प्रसिद्ध गंगा स्नान के मेले लगते थे उनमें बलिया का ददरी मेला, बटेश्वर का मेला, गढ़मुक्तेश्वर का स्नान पर्व, रायबरेली में लगने वाला गंगा स्नान मेला, लखनऊ में गोमती के किनारे कतकी मेला। न जाने यह मेल अब कितने प्रभावी हैं और किस स्तर पर लग रहे हैं, नहीं कह सकता। लेकिन बलिया का ददरी मेला आज भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को, सजोते हुए, अपनी पहचान बनाए हुए है

कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस ददरी मेले की आपको हृदय से बधाई देता हूं।

भृगु बाबा की जय।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२६ ⇒ ताला-चाबी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताला-चाबी।)

?अभी अभी # ८२६ ⇒ आलेख – ताला-चाबी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस पृथ्वी पर आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो सबसे अधिक समझदार भी है और स्वार्थी भी ! यह जानते हुए भी कि सिगरेट से फेफड़े खराब होते हैं, वह सिगरेट पीता है और खत्म हो जाने के बाद उसे ज़मीन पर फेंक, निर्ममता से जूते से मसल देता है। पेड़ से आम तोड़ता है और चूसकर गुठली और छिलका फेंक देता है। खुद घर में रहता है, और दूसरों के घर में आग लगाने की जुगाड़ में रहता है।

वह बहादुर भी है, और सुरक्षा-प्रेमी भी ! अपनी मूल्यवान चीजों को तिजोरी और लॉकर में रखता है। अपनी पत्नी-बच्चों के लिए घर बनाता है, उनकी सुरक्षा के लिए दरवाज़े लगवाता है और चाबी-ताले का भी इंतजाम करता है।।

ताले-चाबी का भी चोली-दामन का साथ है। लोग ताले को नहीं, चाबी को सम्भालकर रखते हैं। ताले के साथ चाबी दहेज में आती है, एक नहीं दो-दो आती है। गलत चाबी से ताला नहीं खुलता ! चोर के लिए कोई ताला ताला नहीं होता। चाबी खो जाने पर चाबी बनवाई जा सकती है, ताला खो जाने पर बेचारी चाबी एक ऐसी बेवा हो जाती है जिसे कोई ताला स्वीकार नहीं करता।

केवल ज़ुबान को छोड़कर सब पर ताला लगाया जा सकता है। जब किसी फैक्ट्री में तालाबंदी होती है तो कई कर्मचारी-मज़दूर बेरोजगार हो जाते हैं। जब किसी बंद घर के ताले टूटते हैं, तो बहुत कुछ सामान चोरी चला जाता है। ताला सुरक्षित लगे होने पर भी अगर चाबी खो जाए, तो ताले को बदल डालने में ही समझदारी होती है।।

लॉकर की चाबियाँ संभालकर रखनी पड़ती हैं, गुम जाने पर डुप्लीकेट नहीं बनती, लॉकर ड्रिल ओपन होता है। जब इनकम टैक्स का छापा पड़ता है, तब कोई चाबी काम नहीं आती। ऐसे वक्त अक्सर चाबियाँ नहीं मिलती और ताले तोड़ दिए जाते हैं।

अपराधी लॉकअप में बंद होते हैं तो सज़ायाफ्ता जेल की हवा खा रहे होते हैं। खुली जेल में भी बाहर से ताला लगा रहता है। मोटे-मोटे ताले, और मोटी-मोटी चाबियाँ आजकल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं।।

समय के साथ ताला-चाबी का साथ भी अब छूटने लग गया है। दोनों के मिलने का समय बाँध दिया गया है ! सभी ताले इन-बिल्ट लॉक हो गए हैं। कोई डोअर-लॉक हो गया है तो कोई हैंडल लॉक। जब रिमोट ही सब काम करने लगे तो कैसा ताला और कैसी चाबी।

लोग आज भी ट्रेन में सफर करते हैं तो सामान की सुरक्षा के लिए जब तक ताला-चाबी और चेन नहीं रख लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता। एक समय वह भी था जब एक दकियानूस शंकालु आदमी चेस्टिटी- बेल्ट लगाकर ही परदेस जाता था और आज अक्षयकुमार पैड-मैन बन एक नए उन्मुक्त खुले दिमाग वाले समाज की रचना कर रहा है।।

बहुत ताले में रख लिया पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को। आज तो नए एंड्राइड फ़ोन का लॉक खोलने के लिए दादाजी सात साल के पोते को ही आवाज़ देते हैं। बेटा ! ये फोन फिर लॉक हो गया है। एक पुरानी कहावत है, सफलता की कुँजी हमारे हाथ में ही है। लगता है वह चाबी हमें मिल गई है। बस लगाने की देर है। खुल जा सिम सिम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९९ ☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं, क्रोध, काम व लोभ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९९ ☆

☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆

‘अहं त्याग देने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है; क्रोध छोड़ देने पर वह शोक रहित हो जाता है; काम का त्याग कर देने पर धनवान हो जाता है और लोभ छोड़ देने पर सुखी हो जाता है’– युधिष्ठिर की यह उक्ति विचारणीय है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है क्योंकि जब तक उसमें ‘मैं’ अथवा कर्त्ता का भाव रहेगा, तब तक उसके लिए उन्नति के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं। जब तक उसमें यह भाव रहेगा कि मैंने ऐसा किया और इतने पुण्य कर्म किए हैं, तभी यह सब संभव हो सका है। ‘जब ‘मैं’ यानि अहंकार जाएगा, मानव स्वर्ग का अधिकारी बन पाएगा और उसे इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी’– प्रख्यात देवाचार्य महेंद्रनाथ का यह कथन अत्यंत सार्थक है। अहंनिष्ठ व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं हो सकता और कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करता। वह अपने द्वीप में कैद होकर रह जाता है, क्योंकि सर्वश्रेष्ठता का भाव उसे सबसे दूर रहने पर विवश कर देता है।

वैसे तो किसी से उम्मीद रखना कारग़र नहीं है। ‘परंतु यदि आप किसी से उम्मीद रखते हैं, तो एक न एक दिन आपको दर्द ज़रूर होगा, क्योंकि उम्मीद एक न एक दिन अवश्य टूटेगी और जब यह टूटती है, तो बहुत दर्द होता है’– विलियम शेक्सपियर यह कथन अनुकरणीय है। जब मानव की इच्छाएं पूर्ण होती है, तो वह दूसरों से सहयोग की उम्मीद करता है, क्योंकि सीमित साधनों द्वारा असीमित इच्छाओं की पूर्ति संभव नहीं होती। उस स्थिति में जब हमें दूसरों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं होता, तो मानव हैरान-परेशान हो जाता है और जब उम्मीद टूटती है तो बहुत दर्द होता है। सो! मानव को उम्मीद दूसरों से नहीं, ख़ुद से करनी चाहिए और अपने परिश्रम पर भरोसा रखना चाहिए… उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है। इसलिए मानव तो खुली आंखों से सपने देखने का संदेश दिया गया है और उसे तब तक चैन से नहीं बैठना चाहिए; जब तक वे साकार न हो जाएं–अब्दुल कलाम की यह सोच अत्यंत सार्थक है। यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्म-विश्वासी है; कठिन परिश्रम करने में विश्वास करता है, तो वह भीषण पर्वतों से भी टकरा सकता है और अपनी मंज़िल पर पहुंच सकता है।

‘यदि तुम ख़ुद को कमज़ोर समझते हो, तो तुम कमज़ोर हो जाओगे; अगर ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो तुम ताकतवर हो जाओगे’– विवेकानंद की यह उक्ति इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि मन में अलौकिक शक्तियाँ विद्यमान है। वह जैसा सोचता है, वैसा बन जाता है और वह सब कर सकता है, जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की होती। ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ दूसरे शब्दों में मानव स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। इसलिए कहा जाता है कि असंभव शब्द मूर्खों की शब्दकोश में होता है और बुद्धिमानों से उसका दूर का नाता भी नहीं होता। इसी संदर्भ में मैं इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहूंगी कि प्रतिभा जन्मजात होती है उसका जात-पात, धर्म आदि से कोई संबंध नहीं होता। वास्तव में प्रतिभा बहुत दुर्लभ होती है और प्रभु-प्रदत्त होती है। दूसरी और शास्त्र ज्ञान व अभ्यास इसके पूरक हो सकते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान’ अर्थात् अभ्यास करने पर मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। जिस प्रकार पत्थर पर अत्यधिक पानी पड़ने से वे अपना रूपाकार खो देते हैं, उसी प्रकार शास्त्राध्ययन द्वारा मर्ख अर्थात् अल्पज्ञ व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। स्वामी रामतीर्थ जी के मतानुसार ‘जब चित्त में दुविधा नहीं होती, तब समस्त पदार्थ ज्ञान विश्राम पाता है और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।’ सो! संशय की स्थिति मानव के लिए घातक होती है और ऐसा व्यक्ति सदैव ऊहापोह की स्थिति में रहने के कारण अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकता।

इसी संदर्भ में मुझे स्मरण हो रहा है हज़रत इब्राहिम का प्रसंग, जिन्होंने एक गुलाम खरीदा तथा उससे उसका नाम पूछा। गुलाम ने उत्तर दिया – ‘आप जिस नाम से पुकारें, वही मेरा नाम होगा मालिक।’ उन्होंने खाने व कपड़ों की पसंद पूछी, तो भी उसने उत्तर दिया ‘जो आप चाहें।’ राजा के उसके कार्य व इच्छा पूछने पर उसने उत्तर दिया–’गुलाम की कोई इच्छा नहीं होती।’ यह सुनते ही राजा ने अपने तख्त से उठ खड़ा हुआ और उसने कहा–’आज से तुम मेरे उस्ताद हो। तुमने मुझे सिखा दिया कि सेवक को कैसा होना चाहिए।’ सो! जो मनुष्य स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, उसे ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।

क्रोध छोड़ देने पर मनुष्य शोक रहित हो जाता है। क्रोध वह अग्नि है, जो कर्त्ता को जलाती है, उसके सुख-चैन में सेंध लगाती है और प्रतिपक्ष उससे तनिक भी प्रभावित नहीं होता। वैसे ही तुरंत प्रतिक्रिया देने से भी क्रोध द्विगुणित हो जाता है। इसलिए मानव को तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, क्योंकि क्रोध एक अंतराल के पश्चात् शांत हो जाता है। यह तो दूध के उफ़ान की भांति होता है; जो पल भर में शांत हो जाता है। परंतु यह मानव के सुख, शांति व सुक़ून को मगर की भांति लील  जाता है। क्रोध का त्याग करने वाला व्यक्ति शांत रहता है और उसे कभी भी शोक अथवा दु:ख का सामना नहीं करना पड़ता। काम सभी बुराइयों की जड़ है। कामी व्यक्ति में सभी बुराइयां शराब, ड्रग्स, परस्त्री- गमन आदि बुराइयां स्वत: आ जाती हैं। उसका सारा धन परिवार के इतर इनमें नष्ट हो जाता है और वह अक्सर उपहास का पात्र बनता है। परंतु इन दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होने पर वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट, मन से बलवान् व धनी हो जाता है। सब उससे प्रेम करने लगते हैं और वह सबकी श्रद्धा का पात्र बन जाता है।

आइए! हम चिन्तन करें– क्या लोभ का त्याग कर देने के पश्चात् मानव सुखी हो जाता है? वैसे तो प्रेम की भांति सुख बाज़ार से खरीदा ही नहीं  जा सकता। लोभी व्यक्ति आत्म-केंद्रित होता है और अपने इतर किसी के बारे में नहीं सोचता। वह हर इच्छित वस्तु को संचित कर लेना चाहता है, क्योंकि वह केवल लेने में विश्वास रखता है; देने में नहीं। उसकी आकांक्षाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका खरपतवार की भांति कोई अंत नहीं होता। वैसे भी आवश्यकताएं तो पूरी की जा सकती हैं, इच्छाएं नहीं। इसलिए उन पर अंकुश लगाना आवश्यक  है। लोभ व संचय की प्रवृत्ति का त्याग कर देने पर वह आत्म-संतोषी जीव हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह प्रभु द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से संतुष्ट रहता है।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जो मनुष्य अहं, काम, क्रोध व लोभ पर विजय प्राप्त कर लेता है; वह सदैव सुखी रहता है। ज़माने भर की आपदाएं उसका रास्ता नहीं रोक सकतीं। वह सदैव प्रसन्न-चित्त रहता है। दु:ख, तनाव, चिंता, अवसाद आदि उसके निकट आने का साहस भी नहीं जुटा पाते। ख़लील ज़िब्रान के शब्दों में ‘प्यार के बिना जीवन फूल या फल के बिना पेड़ की तरह है।’ ‘प्यार बांटते चलो’ गीत भी इसी भाव को पुष्ट करता है। इसलिए जो कार्य- व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे; वैसा दूसरों के साथ न करना ही सर्वप्रिय मार्ग है–यह सिद्धांत चोर व सज्जन दोनों पर लागू होता है। महात्मा बुद्ध की भी यही सोच है। स्नेह, प्यार त्याग, समर्पण वे गुण हैं, जो मानव को सब का प्रिय बनाने की क्षमता रखते हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२५ ⇒ गाड़ी और लाइसेंस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाड़ी और लाइसेंस।)

?अभी अभी # ८२५ ⇒ आलेख – गाड़ी और लाइसेंस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो चलती रहे, उसे कबीर गाड़ी कहते हैं। हमारे लिए आज वह वाहन है, और अगर इसमें पहिये और इंजिन भी है, तो लाइसेंस भी ज़रूरी है। आदमी की तरह आजकल गाड़ियों के भी कागजात बनते हैं, उन्हें भी नाम और पहचान दी जाती है। इंसानों की तरह उनका भी बीमा होता है, दुर्घटना होने पर उन्हें भी क्लेम मिलता है। हमारी तरह इनके भी अवयव होते हैं, जिन्हें, हॉर्न, लाइट, क्लच, ब्रेक और एक्सीलेटर कहते हैं। इनके डॉक्टर्स को मैकेनिक और इनके अस्पताल को गैरेज कहते हैं।

कुछ गाड़ियों का तो गैरेज ही ब्यूटी पार्लर होता है। जब सजधज कर वापस मालिक के पास आती है, तो मालिक ही नहीं पहचान पाता।

गाडियां नई भी होती हैं और सेकंड हैंड भी ! इन गाड़ियों का कोई चरित्र नहीं होता, कोई भी नौसिखिया, अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखा, इन्हें उड़ा ले जाता है। गाड़ियों का सिर्फ फिटनेस सर्टिफिकेट होता है, कोई चरित्र प्रमाण पत्र नहीं। अक्सर पैसे वाले रईस लोग एक से अधिक गाड़ियां रखते हैं, जिन्हें उनके ड्राइवर चलाते हैं। नये नये कपड़ों की तरह कुछ लोगों को गाड़ियां बदलने का भी शौक होता है तो कुछ लोग किसी विशेष गाड़ी के प्रति अति भावुक हो जाते हैं, मानो उसमें उनकी जान बसती हो।।

गाड़ी में दो पहिए जरूरी होते हैं। एक पहिये की साइकिल सिर्फ सर्कस में चलती है। एक गाड़ी गृहस्थी की भी होती है, जिसमें शुरू में दो पहिये ही होते हैं।

आवश्यकता और भार अनुसार गाड़ी के पहिये और स्वरूप भी बदलता रहता है। आज वही एक आदर्श गृहस्थी है, जिसके पास एक चार पहिये की गाड़ी है। आप चाहें तो इस गाड़ी को, हम दो, हमारे दो, भी कह सकते हैं।

अगर एक स्टेपनी साथ में हो, तो अधिक बेहतर।

जिंदगी की सड़क पर अगर गृहस्थी की गाड़ी चलेगी, तो वह भी पहिये पर ही चलेगी। दोनों पहियों का साथ ही जिंदगी का साथ है। एक पहिये की जिंदगी किसी अपाहिज की जिंदगी से कम नहीं होती, लेकिन लोग जी लेते हैं। जहां जीवन में आदर्श होता है, उत्साह और उमंग होती है, उद्देश्य होता है, लक्ष्य होता है, जीवन चक्र रुकता नहीं, आत्म विश्वास के पहिये ही काफी होते हैं, जीवन रथ के लिए।।

यूं तो ये जनम जनम के फेरे हैं, लेकिन गृहस्थी की गाड़ी भी कहां सात फेरे और लाइसेंस के बिना चल पाती है। पति का लाइसेंस कोई चेक नहीं करता, यहां पत्नी के कागजात चेक होते हैं। उसे पहले पत्नी बनना होता है, तब ही वह मां बन सकती है। दंड कोई भी भुगते, चालान तो गाड़ी का ही बनता है।

काश गृहस्थी की भी ऐसी कोई गाड़ी बन जाए, जो बिना पहिये के, बिना लाइसेंस के, सिर्फ प्रेम, आदर्श और मर्यादा के कागजात पर चले। किसी गाड़ी के चरित्र पर कभी उंगली ना उठे। कोई यूं ही मुंह उठाकर, पैसे और शोहरत के बल पर शोरूम से नई चमचमाती गाड़ी उठा लाए, और पुरानी गाड़ी गैरेज में, मन मसोसती रह जाए। इंसान अगर गाड़ियों को भी रिश्तों की तरह सहेजना सीख जाए, तो शायद केवल घर गृहस्थी ही नहीं, यह दुनिया भी स्वर्ग हो जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८२ ☆ आलेख – “कालजयी व्यंग्य उपन्यास लेखक डॉ ज्ञान चतुर्वेदी” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८२ ☆

?  आलेख – कालजयी व्यंग्य उपन्यास लेखक डॉ ज्ञान चतुर्वेदी  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(डॉ पदमश्री ज्ञान चतुर्वेदी जी प्रबुद्ध व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव जी की पुस्तक व्यंग्य कल आज और कल के साथ)

ज्ञान चतुर्वेदी समकालीन हिंदी व्यंग्य लेखन के शिखर पुरुषों में गिने जाते हैं। उनके उपन्यासों में व्यंग्य केवल हास्य की उत्पत्ति का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों पर तीव्र, चुटीला और गहरे स्तर तक प्रहार करने का औजार भी है। उन्होंने अपने व्यंग्य उपन्यासों के माध्यम से जिस यथार्थ को प्रस्तुत किया है, वह हमारे समय का आईना है।एक ऐसा आईना जिसमें समाज की कुरूपता, राजनीतिक चरित्रों की चालाकियाँ, आम आदमी की विवशता और व्यवस्था की विफलताएं स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होती हैं।

ज्ञान चतुर्वेदी की लेखनी के सम्मान में ही उन्हें पद्मश्री का सम्मान दिया गया । यद्यपि किसी व्यंग्यकार को सत्ता से सम्मानित होने पर खा जाता है कि वे किसी विशेष दलगत सोच का लेखन करते हैं,पर ज्ञान जी के लेखन ने इस अवधारणा को समूल झुठला दिया है ।उन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी पैनी दृष्टि और गहरी समझ है। वे उन विषयों को चुनते हैं जो आम जीवन से जुड़े होते हैं, जिन्हें पाठक रोजमर्रा में झेलता है, पर समझ नहीं पाता कि उसमें हास्य या व्यंग्य भी छिपा हो सकता है। यही वह दृष्टिकोण है, जिससे उनकी रचनाएँ महज मनोरंजन नहीं रहतीं, बल्कि पाठक को सोचने और झकझोरने पर विवश करती हैं। अपने उपन्यासों में उन्होंने न केवल हास्य का अद्भुत संयोजन किया है, बल्कि भारतीय समाज की परतों को उधेड़कर उसमें मौजूद विकृतियों को  उजागर किया है।

भारतीय राजनीति का एक करुण-क्रूर चित्रण , व्यवस्था की नौटंकी को उन्होंने इस तरह चित्रित किया गया है कि पाठक हँसते-हँसते रोने लगता है। पात्रों के नामों, उनके व्यवहार और संवादों में वह जीवंतता है जो केवल अनुभव-संपन्न लेखक ही दे सकता है। उनके उपन्यास एक बड़े कैनवास पर फैली राजनीतिक रंगमंच की कहानी हैं, जिसमें चरित्र विशुद्ध भारतीय पृष्ठभूमि से होते हैं, लेकिन उनके कृत्य किसी भी वैश्विक सत्ता की विद्रूपताओं से मेल खाते हैं। ज्ञान जी सत्ता की नौटंकी, जनतंत्र की विडंबनाओं और मीडिया की भूमिका को लेकर जितनी व्यंग्यात्मक तीव्रता से लिखते हैं, उतनी ही संवेदनशीलता से भी।

‘बारामासी’ उनकी एक और उत्कृष्ट कृति है, जिसमें एक छोटे कस्बे के जीवन को उन्होंने महीनों के माध्यम से उकेरा है। यहाँ व्यंग्य की धार इतनी तीव्र है कि वह पात्रों के व्यवहार, उनकी मानसिकता और सामाजिक तानेबाने में पैठकर व्यवस्था की नब्ज पकड़ती है।   कस्बाई जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज बन जाता है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग की इच्छाएं, निराशाएं, चालाकियाँ और लाचारियाँ एक साथ सामने आती हैं। यह उपन्यास बताता है कि ज्ञान चतुर्वेदी केवल राजनीतिक व्यंग्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका दृष्टिकोण सामाजिक सांस्कृतिक जीवन की बारीकियों तक फैला हुआ है।

उनकी भाषा शैली का वैविध्य भी विशेष उल्लेखनीय है। वह ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो न केवल हास्य की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं, बल्कि पात्रों को यथार्थ के करीब ले आते हैं। व्यंग्य तब अधिक प्रभावी होता है जब वह कृत्रिमता से दूर होकर अपने मूल स्वरूप में बोले। ज्ञान चतुर्वेदी की भाषा यही काम करती है। उनकी भाषा में संवादों की ताकत है, और संवादों में छिपी विडंबनाओं की पकड़। उन्होंने पात्रों के ज़रिये जिन बातों को उजागर किया है, वे लाउड होकर भी स्थूल नहीं हैं, और चुप रहकर भी मुखर हैं। यह विशेषता उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से अलग पहचान देती है।

उनके भीतर के अंतर्विरोधों, संघर्षों और सामाजिक राजनीतिक झुंझलाहटों का परिणाम उनकी कलम से अभिव्यक्ति पाता है ।  व्यंग्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है।  पेशे से वे चिकित्सा जगत में हैं, इसलिए कही जिस डॉक्टर पात्र को वे केंद्र में रखते है, वह केवल चिकित्सा व्यवस्था की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की बीमारी का प्रतीक बन जाता है। उन के लिए व्यंग्य केवल एक  उपकरण नहीं, बल्कि विचारधारा का विस्तार बन जाता है।  आम आदमी की असहायता, अपने ही पेशे के प्रति विरोधाभास, और व्यवस्था की अराजकता को इतनी खूबी से चित्रित कर पाना उनकी खासियत है ।

ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यासों में पात्रों की बहुलता भी एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ये पात्र न तो केवल प्रतीकात्मक हैं और न ही केवल कार्टूननुमा। वे हमारे आसपास के लोग हैं, अधूरी आकांक्षाओं से ग्रसित, कभी विद्रोही तो कभी समझौतावादी, और अधिकतर बार हास्यास्पद। इन पात्रों के माध्यम से लेखक समाज की परतें उधेड़ता है और उन्हें पुनः सिलने की कोई कोशिश नहीं करता। वह पाठक को अकेला छोड़ देता है, जिससे वह खुद सवाल करे कि इस बेतुकेपन का समाधान क्या हो सकता है।

ज्ञान चतुर्वेदी की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता उनकी कथा कहने की शैली है। उनका उपन्यास कभी रेखीय नहीं चलता। वह बार-बार विषयांतर करते हैं, पर यह विषयांतर बिखराव नहीं, बल्कि कथा की नई परत खोलता है। जैसे किसी कस्बे की गलियों में भटकते हुए अचानक हम किसी नए मोहल्ले में पहुँच जाएँ, जहाँ हर घर की अपनी कहानियाँ हैं, और हर कहानी किसी बड़ी कथा का हिस्सा बन जाती है। यह शैली पाठक को बाँधती भी है और थकाती भी, परन्तु अंततः एक समृद्ध अनुभव देती है। उन्होंने व्यंग्य को फूहड़ता से बचाया है, वह सतही चुटकुलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि गहरे सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों को सहज रूप से जोड़ते हैं।

ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यासों में एक प्रकार का ‘विवेकपूर्ण पागलपन’ दिखाई देता है। वे व्यवस्था के इस हद तक विश्लेषक बन जाते हैं कि स्वयं को उससे अलग कर एक पैरोडी खडी कर देते हैं। ‘पागलखाना’ उपन्यास इसी दृष्टिकोण की चरम परिणति है, जहाँ समाज की हर विसंगति एक मानसिक विकार की तरह प्रस्तुत होती है। यह पागलपन केवल पात्रों का नहीं, व्यवस्था का भी है, जो पागल को समझदार और समझदार को पागल बना देती है। ज्ञान चतुर्वेदी ने इस उपन्यास के माध्यम से पाठक को यह सोचने पर विवश किया है कि पागलपन की परिभाषा आखिर तय कौन करता है?

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि ज्ञान चतुर्वेदी अपने उपन्यासों में समय का बहुत सूक्ष्मता से चित्रण करते हैं। वे घटनाओं को केवल वर्तमान में सीमित नहीं रखते, बल्कि अतीत और भविष्य के संकेत भी देते हैं। उनका व्यंग्य एक कालखंड विशेष तक सीमित न रहकर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बन जाता है। वे घटनाओं को उनकी जड़ों से जोड़ते हैं और भविष्य की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। यह दृष्टिकोण उनके उपन्यासों को कालजयी बनाता है।

कुल मिलाकर ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यासों की विशेषताएँ उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान देती हैं। उनकी रचनाओं में हास्य, व्यंग्य, गूढ़ आलोचना, पात्रों की विविधता, भाषा की जीवंतता और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम हो सकता है। उनके उपन्यास इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य का कार्य केवल सौंदर्य बोध कराना नहीं, बल्कि समय की नब्ज पर उंगली रखना भी है। ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उपन्यासों के माध्यम से यही किया है। समाज की नब्ज टटोली है, और उसके अस्वस्थ हिस्सों पर कलम की शल्यक्रिया की है। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आचार्य डॉ.आनंदप्रकाश दीक्षित को याद करते हुए ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

पुनर्पाठ –

? संजय दृष्टि – आचार्य डॉ.आनंदप्रकाश दीक्षित को याद करते हुए  ? ?

5 नवंबर 2019 को हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और रस सिद्धांत के पुरोधा आचार्य डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित का निधन हो गया। पुणे विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्यापन करने वाले डॉक्टर दीक्षित 1985 में हिंदी विभाग के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। तत्पश्चात वर्ष 2010 तक वे प्राध्यापक के रूप में सक्रिय रहे।

डॉक्टर दीक्षित का जन्म माघ शुक्ल द्वितीया विक्रम संवत 1980 (अंग्रेजी वर्ष 1923/24) को हुआ था। माता-पिता के अलावा घर में तीन भाई और थे, दो उनसे बड़े और एक छोटा। पिता संस्कृत के अध्यापक थे। दोनों बड़े भाई भी हिंदी साहित्य से जुड़े हुए थे। फलत: साहित्य का संस्कार उन्हें बचपन से मिला। नवीं में पढ़ते थे तब मासिक ‘दीपक’ में ‘मातृस्नेह’ शीर्षक से उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। आरंभिक दिनों में वे ‘सर्वजीत’ उपनाम से लिखा करते थे। उन दिनों बच्चन जी की ‘सप्तरंगिणी’ प्रकाशित हुई थी। इस पर दीक्षित जी का  आलोचनात्मक लेख लाहौर से प्रकाशित होने वाली वाले ‘विश्वबंधु’ ने पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित किया था। पंडित विजयशंकर भट्ट ने एस लेख की प्रशंसा की थी। यहीं से कविता की आलोचना के क्षेत्र में उनकी रुचि, उनका जीवन बन गई।

वर्ष 2016 में हिंदी आंदोलन परिवार की वार्षिक पत्रिका ‘हम लोग’ के लिए मैंने उनका साक्षात्कार किया था। इस साक्षात्कार में कविता पर भाष्य करते हुए उन्होंने कहा था “कविता में अर्थ की जो गहनता हम पाते हैं, वह किसी दूसरी विधा में नहीं मिलती। पहली बार तो कविता का केवल ऊपरी अर्थ समझ में आता है, उसके प्रति आसक्ति जागृत होती है। यदि आप विचारक हैं तो उसका अर्थ समझने के लिए आगे बढ़ेंगे। उसके लिए बार-बार कविता पढ़नी पड़ेगी। बार- बार पढ़ने से कविता ऐसी रच जाएगी कि अर्थ पर अर्थ निकलने लगेंगे। तब कविता चमत्कारी चीज़ हो जाती है।”

समकालीन कविताओं को लेकर उनका मानना था कि आज जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, उनके छंद और उक्ति में परिवर्तन है। पुरानी कविता में कोई सूक्ति रहती थी, कोई ना कोई उपमान रहता था जिससे सौंदर्य आता था। उसकी विशेषताएं आकर्षित करती थीं। अब कविता पत्रकारिता की तरह हो गई है। वर्तमान का वर्णन करके वे चुप हो जाती हैं। जब आप घटित के बारे में लिखने लगते हैं तो इससे एकरूपता आ जाती है। इनसे इतिहास तो हमें मिल जाएगा लेकिन भविष्य में इनसे जीवन का दृश्य क्या मिलेगा?

अलबत्ता कविता की प्रयोजनीयता सर्वदा बनी रहेगी। कविता अच्छी नहीं है तो निष्प्रयोजन हो जाएगी लेकिन इससे सारी कविताएँ  निष्प्रयोजन नहीं हो जातीं। आदमी सदैव कविता पढ़ना चाहेगा।

आलोचना की मीमांसा करते हुए उन्होंने टिप्पणी दी, “आलोचना दो प्रकार की होती है। पहला प्रकार अध्ययन करके गहनता से आलोचनात्मक लेख लिखना है तो दूसरा प्रकार समीक्षाएँ लिखना है। समीक्षा ऊपरी तल पर रह जाती है। विवेकपूर्ण लंबी आलोचना जो समझदारी से लिखी जाती है, उसका महत्व होते हुए भी मैं यह मानता हूँ कि आलोचक दूसरे दर्जे का नागरिक बनता है। आलोचक तब लिखेगा जब उसके सामने सर्जन होगा। सर्जनात्मकता पहली चीज़ है। सर्जनात्मकता में भावुकता है, आलोचना में विवेक को संभालना पड़ता है। तर्क-वितर्क संभालना पड़ता है, शास्त्र का ध्यान रखना होता है। आलोचना बहुत कठिन कर्म है।”

कवि की अनुभूति और आलोचक द्वारा ग्रहण किये गए भाव के अंतर्सम्बंध पर उनका कहना था कि कई बार आलोचक वहाँ तक नहीं पहुँच पाता। लेकिन यह भी है कि कई बार कवि का सोचा हुआ भी नहीं होता।

उनसे बातचीत में अनेक पहलू खुलते गए। आज का लेखक अपनी कमजोरी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। उस पर चर्चा नहीं करना चाहता। अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि  जिन भी कवियों को उन्होंने उनकी कविता की कमजोरियों के बारे में बताया, उनमें से अधिकांश बुरा मान गए।

आचार्य जी भाषा के क्रियोलीकरण के विरुद्ध थे। उनका विचार था कि इसके पक्षधर विशेषकर समाचारपत्र यह दिखाना चाहते हैं कि व्यवहार में इस तरह की भाषा चलती है। अख़बारवालों को लगता है कि ऐसी मिली-जुली भाषा के उपयोग से युवा वर्ग तक पहुँचा जा सकता है। वस्तुतः हमें इस बात का अभ्यास नहीं है कि हम शुद्ध भाषा का उपयोग कर सकें।  हम कभी शब्दकोश देखने या सोचने का भी प्रयत्न नहीं करते। सत्य तो यह है कि दुभाषिया भी शब्दश: अनुवाद न करके सार अपनी भाषा में कहता है।

हिंदी विषय लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की तुलनात्मक रूप से घटती संख्या का सबसे बड़ा कारण उन्हें इस विषय को  पढ़कर विद्यार्थियों को रास्ते खुलते हुए नहीं दिखाई देना लगता था। विडंबना है कि ज्ञान के लिए जो हिंदी पढ़ना चाहता है उसे केवल साहित्य पढ़ाया जाता है। साहित्य तो बिना पाठशाला या कॉलेज में पढ़े अलग से पढ़ा जा सकता है। लोगों को इंजीनियर या टेक्नीशियन बनना है तो केवल साहित्य पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। हिंदी को समुचित स्थान दिलाने के लिए जो किया जाना चाहिए था, अब तक नहीं किया जा सका है।

हिंदी वालों से एक शिकायत उन्हें सदा रही कि हिंदीक्षेत्र में काम करने वाले लेखक को ही वे लेखक मानते हैं लेकिन जो बाहर निकल आए हैं या अहिंदीभाषी प्रदेशों के रहनेवाले हैं, उन्हें वे लेखक नहीं मानते। जब आप हिंदी को राष्ट्रभाषा कहते हैं तो सभी प्रदेशों के लोगों का सहयोग चाहिए। हिंदी के विस्तार को हमने खुद ही रोक दिया है। एक बात और, जो मराठीभाषी हिंदी पढ़ कर हिंदी में लिख रहा है, मराठी मंच उसे स्वीकार नहीं करता। यहाँ बस गए हिंदी के लेखकों को हिंदी प्रदेशों के मंच अब याद नहीं करते। ऐसे लेखक दोनों ओर से तिरस्कृत हैं।

सांप्रतिक जीवन में संवाद के अभाव को लेकर वे चिंतित थे। “आजकल संवाद नहीं हो रहा है।  बिना संवाद के बुद्धि विकसित नहीं होती। संवाद से तर्क-वितर्क सामने आते हैं। मालूम होता है कि आप जो सोच रहे हैं, उसके प्रतिपक्ष में कोई सोच सकता है। शास्त्र में दो पक्ष होते हैं। एक ही व्यक्ति जब शास्त्र लिखता है तो दोनों पक्षों को लिखता है। इसका अर्थ है कि विवेक जागृत करने के लिए दूसरे पक्ष को भी सामने रखना आवश्यक है।”

“लोग कहते हैं कि मैं रसवादी हूँ। मैं रस में विश्वास नहीं करता। यदि वादी हूँ तो मैं विवेकवादी हूँ। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने ‘विवेक’ शब्द का प्रचुर प्रयोग किया है। विवेक क्या है? भले बुरे को समझना, क्या करणीय है, क्या अकरणीय है, इन दोनों के बीच से सही रास्ते को ढूँढ़ना, निरंतर शोध करना ही विवेक है। विवेक मंथन करने के बाद आता है। ज्ञानप्राप्ति के लिए आत्ममंथन आवश्यक होता है।”

भविष्य को लेकर वे सदा आशावादी रहे। “जीवन में बहुत कुछ करना अभी बाकी है। हमारी संस्कृति को मिली-जुली कहा जाता है। इसकी पूरी जानकारी के लिए मैं संस्कृत ग्रंथों का पारायण करना चाहता हूँ। अपने संस्कारों से हमें कितना जुड़ाव है, कितना होना चाहिए, कितना हम उन से हटे हैं, इसका विवेक पैदा करना ज़रूरी है। मैं इस्लाम की मूल पुस्तकें पढ़ना चाहता हूँ। इस्लाम की पूरी जानकारी करना चाहता हूँ। मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि अगर यह मिली-जुली संस्कृति है तो हम आपस में इतना लड़ते क्यों हैं? आपसी लड़ाई से बचाव के लिए मैं इस तरह का अध्ययन आवश्यक मानता हूँ।”

भाषाविज्ञान, संपादन, अध्यापन, अनुवाद, लेखन, पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य दीक्षित का योगदान बहुमूल्य रहा। उनके अनेक विद्यार्थी विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष हुए। हिंदी साहित्य का शायद ही कोई अध्येता हो जिसने डॉ. दीक्षित की कोई पुस्तक संदर्भ के लिए न पढ़ी हो। ‘आलोचना-रस सिद्धांत : स्वरूप विश्लेषण’,   ‘साहित्य : सिद्धांत और शोध’  त्रेता : एक अंतर्यात्रा’,  ‘हिंदी रीति परंपरा : विस्मृत संदर्भ’, ‘रसचिंतन के विविध आयाम’ (मराठी के 15 लेखकों के साहित्य का अनुवाद),

‘हरिचरणदास ग्रंथावली’ (काव्यखंड), ‘प्रताप पचीसी’, ‘दौलत कवि ग्रंथावली’, ‘आज के लोकप्रिय कवि शिवमंगल सिंह सुमन’, ‘कबीर ग्रंथावली’ ‘मैथिलीशरण गुप्त’  ‘सुमित्रानंदन पंत : आलोचना, प्रक्रिया और स्वरूप’,  ‘कबीरदास : सृजन और चिंतन’, ‘मराठी संतों की हिंदीवाणी’ जैसे अन्यान्य ग्रंथों का लेखन, संपादन और अनुवाद हिंदी साहित्य को उनकी महती देन है।

सरकारी और गैरसरकारी अनेक संस्थाओं और संस्थानों ने उन्हें सम्मानित कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया। उन्हें प्राप्त प्रमुख अलंकरणों में साहित्य अकादमी द्वारा ‘भाषा सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘भारत भारती सम्मान’, हिंदी साहित्य समिति इंदौर द्वारा ‘अखिल भारतीय साहित्य पुरस्कार’, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ‘अखिल भारतीय हिंदी सेवा पुरस्कार’,  साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’  हिंदी साहित्य समिति कानपुर द्वारा ‘साहित्य भारती’ आदि सम्मिलित हैं।

हिंदी आंदोलन परिवार के एक आयोजन में उन्होंने कहा था कि लिखने के लिए वे दो सौ वर्ष जीना चाहते हैं। अपनी बहुआयामी प्रतिभा के साथ वे जीवन के अंत तक सक्रिय रहे। सजब मैंने उनसे जानना चाहा कि अपने बहुआयामी व्यक्तित्व की चर्चा सुनकर खुद डॉ. दीक्षित के मन में किस तरह का चित्र उभरता है तो उनका उत्तर था, ” मुझे अच्छा लगता है लेकिन ऐसा कोई भाव पैदा नहीं होता जिसे मैं अहंकार कह सकूँ। हाँ, लगता है कि मैं जीवित हूँ।”

अपने सृजन के रूप में आचार्य डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित सदा जीवित रहेंगे।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें।।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला।।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२४ ⇒ मेरी आवाज सुनो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरी आवाज सुनो।)

?अभी अभी # ८२४ ⇒ आलेख – मेरी आवाज सुनो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ आवाज़ें हम कई वर्षों से सुनते चले आ रहे हैं, वे आवाज़ें रेकॉर्ड की हुई हैं, वे लोग आज मौजूद नहीं हैं, सिर्फ उनकी आवाज आज मौजूद हैं। कभी उन्हें his master’s voice नाम दिया गया था और आज भी उन आवाजों को हम, नियमित रेडियो पर और अन्य अवसरों पर, विभिन्न माध्यमों द्वारा सुना करते हैं।

मेरी आवाज ही पहचान है ! जी हां, आज आप किसी भी आवाज को रेकाॅर्ड कर सकते हो, बार बार, हजार बार सुन सकते हो। जब कोई हमें आग्रह करता है, कुछ गा ना ! और जब हम कुछ गाते हैं, तो वह गाना कहलाता है। जो गाना हमें भाता है, उसे हम बार बार सुनते हैं, बार बार गाते हैं।।

बोलती फिल्मों के साथ ही, फिल्मों में गीत और संगीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले अभिनय के साथ अभिनेता को गाना भी पड़ता था, इसलिए कुंदनलाल सहगल और मुकेश अभिनेता बनते बनते गायक भी बन बैठे। बाद में अभिनेता आवाज उधार लेने लगे। और नूरजहां, सुरैया, खुर्शीद, शमशाद बेगम, लता, आशा, तलत,रफी, मुकेश और किशोर कुमार जैसी कई आवाजों ने अपनी पहचान बनाई।

क्या कोई गायक किसी की पहचान बन सकता है। मुकेश, आवारा हूं, गाकर राजकपूर की पहचान बन गए तो किशोर कुमार रूप तेरा मस्ताना गाकर, राजेश खन्ना की पहचान बन गए।

बड़ा विचित्र है, यह आवाज का सफर। पहले गीत जन्म लेता है, फिर संगीतकार पहले उसकी धुन बनाता है और बाद में एक गायक उसको अपना स्वर देता है। जब वह गीत किसी फिल्म का हिस्सा बन जाता है, तो नायक सिर्फ होंठ हिलाने का अभिनय करता है, और वह गीत एक फिल्म का हिस्सा भी बन जाता है। फिल्म में अभिनय किसी और का, और आवाज किसी और की। एक श्रोता के पास सिर्फ गायक की आवाज पहुंचती है। जब कि, एक दर्शक गायक को नहीं देख पाता, उस तक, पर्दे पर होंठ हिलाते, हाथों में हाथ डाले, राजेश खन्ना और फरीदा जलाल, बागों में बहार है, कलियों पे निखार है, गीत गाते, नजर आते हैं।।

सहगल के बाद ही गायकों का सिलसिला शुरू हुआ।

पहले तलत और लता अधिकांश नायक नायिकाओं की आवाज बने, लेकिन बाद में मोहम्मद रफी और मुकेश के साथ साथ किशोर कुमार, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, ही मुख्य गायक रहे। मुकेश सन् १९७६ में हम तो जाते अपने गाम कहकर चले गए तो १९८० में रफी साहब भी, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, कहकर गंधर्व लोक पहुंच गए। एकमात्र लता और आशा का साम्राज्य आदि से अंत तक आवाज की दुनिया में कायम रहा। जब तक सुर है साज है, गीत है आवाज है। सुमन कल्याणपुर, हेमलता, से होती हुई आज श्रेया घोषाल तक कई नारी कंठ की आवाजें और शैलेंद्र सिंह, येसुदास, सुरेश वाडकर तथा उदित नारायण तक कई पुरुष स्वर श्रोताओं पर अपना प्रभाव छोड़ चुके हैं, लेकिन किसी की आवाज बनना इतना आसान नहीं होता।

राजकपूर के अलावा देवानंद के लिए पहले तलत और बाद में किशोर और रफी दोनों ने अपनी आवाजें दीं। गाता रहे मेरा दिल किशोर गा रहे हैं लेकिन प्रशंसकों के बीच देव साहब छा रहे हैं। दिन ढल जाए में श्रोता एक ओर रफी साहब की आवाज में डूब रहा है और दूसरी ओर तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं, में दर्शक देव साहब की अदा पर फिदा हो रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि जब रफी साहब शम्मी कपूर के लिए गाते थे, तो उनकी काया में प्रवेश कर जाते थे और जब दिलीप साहब के लिए गाते थे, तो दोनों की रुह एक हो जाती थी।

एक दिलचस्प उदाहरण देखिए जहां अभिनेता और पार्श्व गायक एक साथ पर्दे पर मौजूद हैं। जी हां, मेरे सामने वाली खिड़की में, सुनील दत्त बैठे हैं, और उनके पीछे किशोर कुमार छुपकर एक चतुर नार से मुकाबला कर रहे हैं। कौन अच्छा अभिनेता, सुनील दत्त अथवा गायक किशोर कुमार, हम चुप रहेंगे।

आप सिर्फ इनकी आवाज सुनो और फैसला दो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२३ ⇒ गर्दिश के दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८२३ ⇒ आलेख – गर्दिश के दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गर्दिश के दिन अक्सर तब ही याद आते हैं, जब हमारे अच्छे दिन आ जाते हैं। सुख के क्षणों में दुःख के दिनों की दास्तान कितनी अच्छी लगती है न ! दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो।

जिनके सितारे हमेशा ही गर्दिश में रहते हैं उनके लिए गर्दिश स्थायी भाव हो जाता है और वे हनुमान चालीसा की जगह रोजाना मुकेश का, फिल्म रेशमी रुमाल का यह गीत गाना अधिक पसंद करते हैं ;

गर्दिश में हो तारे,

ना घबराना प्यारे

गर तू हिम्मत ना हारे

तो होंगे वारे न्यारे

विरले ही होते हैं, जिनके वारे न्यारे होते हैं, और जो प्रसिद्धि और शोहरत पाने के बाद अपने गर्दिश के दिनों को आत्म दया, आत्म प्रशंसा और आत्म विश्वास के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उनके गर्दिश के दिन धन्य हो जाते हैं, वे पुनः पुरस्कृत हो जाते हैं।।

जो इंसान गर्दिश में जीता है, वह गर्दिश का महत्व ही नहीं समझता ! अगर किस्मत से उसके अच्छे दिन आ भी गए, तो ईश्वर को धन्यवाद दे, दाल रोटी खा, प्रभु के गुण गाता रहता है। संतोषी सदा सुखी। लेकिन समझदार, सफल और व्यवहारकुशल लोग आपदा में अवसर ढूंढ लेते हैं। सर्व साधन संपन्न होने के बाद, सफलता के कदम चूमने के बाद, गर्दिश के दिनों का ऐसा तड़का लगाकर मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले की आँखें भर आती हैं, वह मन में सोचता है, काश मेरे जीवन में भी ऐसा संघर्ष होता। अगर मेरे भी ऐसे ही गर्दिश के दिन होते, तो मैं भी आज एक महान व्यक्ति होता। मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया।

गर्दिश के दिनों में दोस्तों और दुश्मनों दोनों को याद किया जाता है। जो पात्र आज नहीं हैं, उनके बारे में अतिशयोक्ति से भी काम चलाया जा सकता है। किसने आपका मुसीबत में साथ दिया और कौन मुंह फेरकर निकल गया, हिसाब चूकता किया जा सकता है। तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी याददाश्त और थोड़ी कल्पनाशीलता का पुट गर्दिश के दिनों को और अधिक आकर्षित बना सकता है।।

बेहतर तो यह हो, कि कुछ महान चिंतक, विचारकों और साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों का अध्ययन किया जाए, उन पर चिंतन मनन किया जाए, अपनी गर्दिशों में रोचकता ढूंढी जाए, उसके बाद ही गर्दिश के दिनों पर कुछ लिखा जाए। हर महान व्यक्ति अपने गर्दिश के दिन नहीं भूलता। अगर भूल जाए, तो वह महान बन ही नहीं सकता।

लोकप्रिय कथा मासिक सारिका में कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों की एक धारावाहिक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी, स्वयं कमलेश्वर जी की पुस्तक “गर्दिश के दिन” तीन खंडों में प्रकाशित हुई है। परसाई जी के अनुसार गर्दिश उनकी नियति है। कुछ ऐसे ही भाव इस गीत के भी हैं ;

रहा गर्दिशों में हरदम

मेरे इश्क का सितारा।

कभी डगमगाई कश्ती

कभी खो गया किनारा।।

अगर आप एक महान व्यक्ति बन चुके हैं, अथवा बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने जीवन में गर्दिश के दिनों को तलाशें, उन्हें तराशें, धो पोंछकर साफ करें और करीने से दुनिया के सामने पेश करें। अगर आपके जीवन में गर्दिश के दिन नहीं, तो आप इंसान नहीं। ऐसा आदमी क्या खाक महान बनेगा। पड़े रहिए गर्दिश के दिनों की तलाश में। क्योंकि गर्दिश के दिनों के बाद ही इंसान के जीवन में अच्छे दिन आते हैं। गर्दिश के दिन भुला ना देना।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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