हिंदी / अंग्रेजी साहित्य – आलेख/Articles ☆ गर्दिश के दिन: Days of Despair ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

😎 गर्दिश के दिन: Days of Despair 🥸

(हिंदी और अंग्रेजी में एक मिश्रित / A bilingual experiment in Hindi and English)

काफी समय पूर्व, एक प्रतिष्ठित पत्रिका में, कई लेखकों ने अपने गर्दिश के दिनों पर लिखा था। उन्होंने सफल और महान होने के बाद, संपादक के आग्रह पर, ऐसा किया था। मैं सफल और महान हुए बिना, ऐसा अपनी मर्जी से कर रहा हूं।

उम्र के अनेक मोड़ पार कर चुका हूं। अब तक न सफल हुआ हूं और न ही महान बन पाया हूं। मेरे देखते-देखते, मुझसे कम योग्य लोग मुझसे अधिक सफल हो चुके हैं और मुझसे घटिया लोग महान बन गए हैं। यही मेरे दुख का कारण है।

A long time ago—long enough for nostalgia to acquire a few grey hairs of its own—a reputed Hindi magazine brought out a remarkable series. It was dedicated to the days of despair of celebrated writers: tales of their hollow pockets, hollow kitchens, and occasionally hollow souls. The contributors were friendly luminaries who had, by then, climbed to heights from where despair looked like a poetic childhood disease—painful at the time, but now excellent material for charming anecdotes at literary gatherings.

They wrote of wretched rooms where even hope hesitated to enter; they narrated the evenings when the lamp had more soot than light, and the mornings when fortune seemed to have overslept on purpose. Their stories reminded us that greatness, like good compost, must sprout from organic suffering.

They were invited by the Editor because they were great, famous, and suitably wrinkled by experience.

I, however, attempt the same task without possessing greatness, fame, or even the sort of wrinkles that literary editors find aesthetically inspiring. If anything, mine are plain domestic creases, the ordinary lines produced by old age and electric bills.

I have grown old—old enough to avoid mentioning numbers, lest someone mistakes my age for a historical period—but alas, greatness has not arrived. Nor has fame. Nor has even that modest rumour that “someone in our locality is doing something interesting.” I have waited politely. Greatness, it seems, has not reciprocated the courtesy.

What adds flavour to this mild tragedy is that, as the years have trotted past, I have seen—quite helplessly—the rise of men lesser, meaner, and, in some extreme cases, louder than me. They flourished with the ease of mildew in monsoon. Every time a new one rose, I experienced an unhappiness so refined and aristocratic that Oscar Wilde himself might have complimented it.

My friends, naturally, have prospered beyond belief. Their bungalows are so large that one needs Google Maps to locate the guest bathroom. Their chauffeur-driven luxury cars glide through town like well-bred crocodiles. Their wives, robust in both health and wealth, supervise homes where everything—including the dogs of foreign breed—has a higher market value than my bank balance. They possess vast fortunes in Swiss banks, majestic collections of fat, cholesterol, high blood pressure, diabetes, and heart disease. I possess none of these. Not even the cholesterol.

I am a tortoise. They are hares—and some, on festive days, hunt with the hounds too. But before you assume I lack talent or refinement, let me clarify with the humility of a saint and the accuracy of a government form: I am physically, mentally, and spiritually sound; honest to a degree that makes honesty awkward; and financially and intellectually cleaner than freshly laundered linen.

My achievements—scattered across reading, writing, sports, games, love, sex, and friendship—are enough to fill a respectable diary, if not a library. But I cannot bring myself to practise sycophancy. I cannot flatter a man merely because he has a necktie and a position. Had I embraced hypocrisy with the enthusiasm of my peers, I, too, might have gathered a following of disoriented devotees. But shame is a stubborn thing.

Over time, I have read the autobiographies of the great. They describe how they saw poverty, hunger, disease, famine, and other educational experiences; how they struggled bravely, laboured endlessly, and rose steeply; how they eventually reached the mountaintop, from where everything below looked small—especially other people’s problems.

And then, feeling generous, they shared the stories of their struggles for the benefit of lesser mortals.

I, unfortunately, do not believe in shortcuts. As I read and write and wander into the dense forest of spirituality, I realise that a vast world remains unconquered. And I, firmly stationed at the starting point, can only wave at potential as it passes by.

So here I am—no one, nowhere—trudging along with my despair and gloom walking faithfully beside me, like two old companions who have tired of trying to cheer me up and now simply keep pace out of habit.

Greatness may yet arrive. Fame may yet stumble upon me. But until then, I shall continue writing pre-fame memoirs of despair, hoping they will someday become post-fame classics.

After all, even a tortoise deserves a footnote in literary history.

लोगों ने गरीबी देखी, भूख देखी, अकाल देखा, बीमारी देखी, संघर्ष किया, साधना की, और महान हो गए। महानता के शिखर पर पहुंचने के बाद, वो पीछे मुड़कर अपने गर्दिश के दिनों पर विहंगम दृष्टि डाल सकते हैं। यह उनका सौभाग्य है।

सफलता के टीले पर, शॉल ओढ़े बैठकर, गर्दिश के दिनों को याद करने की रूमानियत मेरे नसीब में नहीं है। जितना पड़ता जाता हूं, उतना ही पाता हूं कि अभी तो अनंत आयाम बाकी हैं जानने को। जितना लिखता जाता हूं, उतना ही पाता हूं कि कलम बहुत छोटी है और स्याही बहुत कम। मेरी गर्दिश और गहराती जाती है।

झूठमूठ की सफलता और महानता के शॉर्टकट मैं नहीं पकड़ पाता। मेरी गर्दिश मेरे संग-संग चलती है!

(इस रचना के हिंदी अंश तीस बरस पहले लिखे गए थे और अंग्रेज़ी वाला हिस्सा अब लिखा है।

The Hindi portion of this article was written thirty years ago and the English portion has been blended now.)

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८१ ☆ आलेख – “भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८१ ☆

?  आलेख – भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात कर्म में कौशल ही योग है

कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए। 

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य ,  सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।

समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था ,  बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।

आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं।

पहले  भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। पर आज राजनीति इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं में क्षेत्रीय  विकास के नाम पर हावी दिखती है।

भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है।

हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीक का लेखन, महत्वपूर्ण है।  यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है  ‘ज्ञान सभी के लिए’।

भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है।

आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है

हम आशा करते हैं कि भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है और सृजन की गाथा है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५१ – देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one बास्केट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५१ ☆ देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one basket ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अंग्रेज़ी भाषा के इस फ्रेस को मिडिल स्कूल में पढ़ाया गया था, तो गुरुजी ने इस का तात्पर्य पूछा था ? हम शाकाहारी हैं, हमने भी कह दिया था, हमारे घर में अंडे नहीं आते हैं, इस लिए हमको इस के बारे में कुछ भी पता नहीं हैं।पूरी कक्षा खिलखिला कर खूब हंसने लगी थी।

घर आकर पिताश्री से हमने पूरी बात बताई, तब उन्होंने हमें याद दिलाया कि जब भी रेल यात्रा में जाते है, तो नगद राशि को पेंट की दोनों जेब और शर्ट के नीचे पहनने वाली बंडे की चोर पॉकेट में अलग अलग रख कर यात्रा पर जाते हैं।ये ही नियम अंडों पर भी लागू होता हैं।

विगत दिन जबलपुर स्टेशन पर एक यात्री ने प्लेटफार्म के एक वेंडर से समोसा खरीदा, मोबाइल से भुगतान पूरा ना होने पर विक्रेता ने यात्री की हाथ घड़ी निकाल ली थी।किसी सज्जन ने पूरी वारदात का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दिया हैं।

मीडिया को एक काम मिल गया, विक्रेता का लाइसेंस निरस्त हो गया हैं।रेलवे पुलिस उस यात्री को खोज रही हैं, ताकि आगे की कार्यवाही की जा सकें।ये भी हो सकता है, यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहा होगा, फिर वो क्यों सामने आएगा ? विक्रेता ने पुलिस को बताया की घड़ी को उसने ट्रेन में ही फेंक दिया था।ये सलाह उसके वकील ने दी होगी, ताकि वो निर्दोष साबित हो जाए।

यदि यात्री का मोबाइल भुगतान करने में फेल हो गया था, तो उसको कुछ धन राशि नगद भी अलग अलग जेबों में रखनी चाहिए थी, और उसकी तस्वीर भी वायरल नहीं होती।

जबलपुर शहर इस घटना से अलग बदनाम हो गया हैं।लोग नेहरू को याद कर रहें है, जिन्होंने जबलपुर को गुंडों का शहर तक कह दिया था, वो तो बाद में स्वर्गीय विनोबा भावे, भूदान आंदोलन के जनक ने जबलपुर को संस्कारधानी बताया था।

इस घटना से दो बातें सामने आई एक तो मोबाइल या बैंक कार्ड के रहते हुए भी कुछ राशि नगद में अवश्य रखें। दूसरी बात “ऊपर वाला सब देख रह है” एक दम सही है।सी सी टीवी कैमरे, मोबाइल आपकी हर हरकत पकड़ ही लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२१ ⇒ लोकतंत्र चौराहे पर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लोकतंत्र चौराहे पर।)

?अभी अभी # ८२१ ⇒ आलेख – लोकतंत्र चौराहे पर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिल के दर्द का कुछ यूं इंतजाम हुआ,पहले चाके ज़िगर हुआ,फिर जश्ने आम हुआ। इस दिल के टुकड़े जरूर हुए,लेकिन आज सुकून है,यह क्या कम है। हम आजाद भी हैं,और लोकतंत्र भी जिंदा है,बस यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।

इस लोकतंत्र पर भी कभी आपातकाल का काला साया पड़ा था, लेकिन गम के बादल छंट गए, फिर रोशनी का इज़हार हुआ।

कुछ अतीत के पन्ने पलटें,तो कभी अंग्रेजी में एक शंकर्स वीकली नाम की पत्रिका प्रकाशित होती थी,जिसकी तुलना विदेशी पत्रिका punch से आसानी से की जा सकती है। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट के.शंकर पिल्लई द्वारा संपादित यह देश की पहली कार्टून पत्रिका थी।

शंकर्स वीकली, शंकर का सपना था जो सन् १९४८ में साकार हुआ था। ।

बहुत कम लोग जानते होंगे, इसी पत्रिका की तर्ज पर, शंकर्स वीकली का हिंदी में भी प्रकाशन हुआ था। लेकिन, खेद है, इसके कुछ ही अंक प्रकाशित हो पाए। इसी पत्रिका के एक अंक में श्रीलाल शुक्ल का एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था, चौराहे पर। यह अंक और यह व्यंग्य शायद आज कहीं उपलब्ध न हो,लेकिन उसकी एक पंक्ति, आज ४५ वर्ष के बाद भी मुझे अच्छी तरह से याद है।

चारों ओर जनसंघ फैला हुआ था“।

तब और अब में कितना अंतर है। आज की भारतीय जनता पार्टी, तब जनसंघ ही तो थी। जनसंघ का साधारण अर्थ जन समूह भी होता है। अर्थ तो राग दरबारी का भी कुछ और ही होता है। बस यही खूबी है, शब्दों की और व्यंग्य के जादूगर श्रीलाल शुक्ल की ।

अब आइए,व्यंग्य के शीर्षक “चौराहे पर” की ओर मुखातिब होते हैं। तब लोकतंत्र चौराहे पर नहीं,खतरे में था। हिंदी की कई अच्छी पत्रिकाएं बंद हो गई थी, जिनमें दोनों हिंदी अंग्रेजी शंकर्स वीकली शामिल थी। धर्मयुग, दिनमान, पुराना ज्ञानोदय और सारिका का भी यही हश्र हुआ। आज सिर्फ राजनीति जिंदा है, अच्छी तरह फल फूल रही है, लोकतंत्र फिर भी चौराहे पर ही है।

जो लोग आजादी के बाद पैदा हुए हैं, वे आजादी का सपना नहीं देख सकते लेकिन मजबूत लोकतंत्र और एक साधन संपन्न व सशक्त राष्ट्र का सपना तो देख ही सकते हैं। जन्म किसी राष्ट्र का हो अथवा किसी बालक का, पीड़ा और संघर्ष तो मां को ही झेलना पड़ता है। जिसे नौ महीने अपने पेट में पाला पोसा, उस जिगर के टुकड़े को अपने से अलग करना पड़ता है,और तब ही वह एक मां कहलाती है। मां का त्याग एक बालक नहीं जान सकता। ।

आज हमारा लोकतंत्र सुरक्षित है और मजबूत है और यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। आज लोकतंत्र चौराहे पर है।

चहुंमुखी विकास के रास्ते खुले हुए हैं। स्वदेशी जागरण और स्मार्ट सिटी की जुगलबंदी चल रही है। हमने मन्नू भंडारी का महाभोज भी देखा अब तो बस छप्पन भोग की तैयारी है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०९ – संभावना के बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०९ संभावना के बीज… ?

सीताफल की पिछले कुछ दिनों से बाज़ार में भारी आवक है। सोसायटी की सीढ़ियाँ उतरते हुए देखता हूँ  कि बच्चे सीताफल खा रहे हैं। फल के बीज निकालकर करीने से एक तरफ़ रख रहे हैं। फिर सारे बीज एक साथ उठाकर डस्टबिन में डाल दिए। स्वच्छता और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से यह उचित भी है।

यहीं से चिंतन जन्मा। सोचने लगा, हर बीज के पेट में एक पौधा  है, पौधे का बीज फेंका जा रहा है। फ्लैट में रहने की विवशता कितना कुछ नष्ट कराती है।

सर्वाधिक दुखद होता है संभावनाओं का नष्ट होना। वस्तुत: संभावना की हत्या महा पाप है। हर संभावना को अवसर मिलना चाहिए। पनपना, न पनपना उसके प्रारब्ध और प्रयास पर निर्भर करता है।

चिंतन बीज से मनुष्य तक पहुँचा। सही ज़मीन न मिलने पर जैसे बीज विकसित नहीं हो पाता, कुछ उसी तरह अपने क्षेत्र में काम करने का अवसर न पाना, संभावना का नष्ट होना है। साँस लेने और जीने में अंतर है। अपनी लघुकथा ‘निश्चय’ के संदर्भ से बात आगे बढ़ाता हूँ। कथा कुछ यूँ है,

“उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।

जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं  दर्शक यहीं, पर मैदान मानो निष्प्राण है।

एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने‌ लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग‌ वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।

दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।”

अँग्रेज़ी की एक कहावत है, ‘यू गेट लाइफ वन्स। लिव इट राइट। वन्स इज़ इनफ़।’ जीवन को सही जीना अर्थात अपनी संभावना को समझना, सहेजना और श्रमपूर्वक उस पर काम करना।

स्मरण रहे, आप जीवन के जिस भी मोड़ पर हों, जीने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२० ⇒ |||संस्पर्श||| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|||संस्पर्श|||।)

?अभी अभी # ८२० ⇒ आलेख – |||संस्पर्श||| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Contiguity)

किसी से इतना सामिप्य, कि स्पर्श का अहसास होने लगे, संस्पर्श कहलाता है।

यह आकस्मिक भी हो सकता है और प्रयत्न स्वरूप भी। भीड़ में ऐसा स्पर्श स्वाभाविक है, क्योंकि वहां तो धक्का मुक्की भी होती है और इरादतन चेष्टा भी। कुछ लोगों के लिए यह स्वाभाविक और अपरहार्य भी हो सकता है तो कुछ के लिए असुविधाजनक और तकलीफदायक। बच्चे, वृद्ध और बीमार अक्सर जहां भीड़ और भगदड़ के शिकार होते हैं, वहीं महिलाओं के लिए तो यह स्थिति और भी बदतर हो सकती है, जिसमें कुचेष्टा के साथ साथ अभद्र व्यवहार की भी आशंका बनी रहती है।

स्पर्श में सुख है, अगर वह आपकी मर्जी और सहमति से हो रहा है। बच्चों का कोमल स्पर्श कितना रोमांचित कर देता है। प्रेम और रिश्तों की गर्माहट है जहां, संस्पर्श की संभावना है वहां। एक विज्ञापन में तो युवा मां और उसकी अति सुंदर और नाजुक बिटिया की कोमल त्वचा की देखभाल पारदर्शी पियर्स pears साबुन ही करता है।।

मुझे जड़ और चेतन दोनों में इस स्पर्श का अहसास होता है। स्पर्श को छूना भी कहते हैं, कोई भी चीज आपके मन को छू सकती है। फूल से कोमल बच्चे भी होते हैं और रात को हमारे सिरहाने लगा तकिया भी। टेडी बियर में ऐसा क्या है, आखिर है तो वह भी निर्जीव ही।

गुलाबी ठंड और सुबह सवा पांव बजे का वक्त ! सुबह का टहलना और सांची प्वाइंट के बूथ से दूध लाना, यानी एक पंथ दो काज, मेरी दिनचर्या का अंग है। दूध के इंतजार में चौराहे पर अकेले खड़े रहने का भी एक अलग ही आनंद है। इक्के दुक्के इंसान और मोहल्ले के आवारा कुत्ते चौराहे को व्यस्त बनाए रखते हैं। जो इन कुत्तों से डरते हैं, वे सुबह टहलने नहीं जाते अथवा किसी लाठी का सहारा अवश्य ले लेते हैं।।

मुझमें कुछ ऐसा खास है कि कुत्ते मेरे पास नहीं फटकते और अगर कोई गलती से पास आ गया, तो वह और अधिक पास आने की कोशिश करता है। उसे पास बुलाने में कुछ योगदान मेरी चेष्टाओं का भी हाथ होता है।

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। दूध के इंतजार में मैं चौराहे का निरीक्षण कर रहा था। अचानक एक काले सफेद रंग का कुत्ता मेरे सामने से गुजरा। वह जब तेज चलने की कोशिश करता था, तो उसका एक पांव लंगड़ाने लगता था। एक स्वाभाविक दया अथवा करुणा का संचार मेरे मन में हुआ होगा, मुझे नहीं पता।।

एकाएक घूमते घूमते वह मेरे पास आकर ठिठक गया। कुत्ते सूंघकर निरीक्षण करते हैं। एक दो चक्कर लगाकर, वह थोड़ा और पास आकर मेरे पास खड़ा हो गया। न जाने क्यों, बेजुबान प्राणियों की आँखें मुझे लगता है, बहुत कुछ कह जाती हैं। उसने मुझसे लगभग सटकर, मुंह ऊंचा कर दिया। अब वह मेरी कमजोरी का फायदा उठा रहा था।

मुझे गाय को सहलाने की आदत है। हमारे छूने का इन प्राणियों को अहसास होता है। इनके कहां हमारी तरह हाथ होते हैं।

ये प्राणी अक्सर किसी दीवार अथवा पेड़ से अपना शरीर रगड़ लेते हैं।

गाय हो या कुत्ता बिल्ली, अधिक लाड़ में ये अपना मुंह ऊपर कर देते हैं ताकि आप इनको आसानी से सहला सकें।।

हमारे अजनबी श्वान महाशय ने भी यही किया। और हमने भी, आदत से मजबूर, उसे सहला भी दिया। बस कुत्ते में इंसान जाग उठा। वह तो हमारे गले ही पड़ गया। इतने में मेरे पास एक दो कुत्ते और आ गए, और मेरे वाले कुत्ते पर भौंकने लगे। शायद मैं उनके इलाके का था, और जिस कुत्ते को मैने मुंह लगाया था, वह किसी और इलाके का होगा।

उनके लगातार भौंकने से मेरा वाला कुत्ता विचलित हो गया, और उसे मजबूरन मुझे छोड़कर जाना पड़ा।

मुझे अब केवल इन कुत्तों से छुटकारा पाना था। क्योंकि उनकी मुझमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। उनका उद्देश्य शायद केवल उस कुत्ते को खदेड़ना ही रहा होगा।।

गुलजार अप्रत्यक्ष रूप से शायद इन शब्दों में यही कहना चाहते होंगे ;

हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू।

हाथ से छू के इसे

रिश्तों का इल्जाम ना दो।।

जब गुलजार की ये पंक्तियां हमें इतना छू जाती हैं, तो रिश्तों की तो बात ही कुछ और है। मजबूर हम, मजबूर तुम। प्रेम के वशीभूत हमने तो जानवर में इंसान जागते देखा है, कभी तो यह इंसान भी जागेगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ रात की मुस्कान–पारिजात ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ रात की मुस्कान–पारिजात ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

ऐसा नहीं कि इन्द्र दरबार की अप्सरा ” उर्वशी” ही पारिजात के कोमल फूलों को छू सकती है। उसकी महक और दूधिया सिन्दूरी रंग को नैनों में बसा सकती है। समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक दिव्य पुष्प पारिजात की पंखुड़ी पंखुड़ी पर लिखी हुई पौराणिक कथाओं को बाँच सकती है।

यह द्वापर युग की कथा है कि पारिजात के रूप का जादू कृष्णप्रिया सत्यभामा ने भी अनुभव किया। हुआ यूँ कि देवर्षि नारद ने सत्यभामा को यह मोहक पुष्प भेंट किया। मोहाविष्ट सत्यभामा, कृष्ण से ज़िद कर बैठीं कि उनकी वाटिका में देवतरु चाहिए। इन्द्र के इंकार करने के बावजूद कृष्ण गरुड़ पर बैठकर गये और स्वर्ग से पारिजात धरती पर ले आये। कितनी रूनझुन करती कथा है कि पारिजात रोपा गया सत्यभामा की वाटिका में और फूल झरते रहे रुक्मिणी की बगिया में।

कहा तो ये भी जाता है अर्जुन, यह वृक्ष माता कुन्ती की खातिर स्वर्ग से लेकर आये थे।

हर सिंगार, शेफालिका या शिउली और मराठी में प्राजक्त ये सारे तितली के पंखों जैसे कोमल नाम पारिजात के ही हैं। यूँ ही नहीं इसे पश्चिम बंगाल के राज्य पुष्प का दर्जा दिया गया। इसमें देवत्व का वास है एवं यह सकारात्मकता का सौंदर्य बिखेरता है। कोई इसे  दुःख का वृक्ष कहता है तो कोई ” रात की मुस्कान। “रात के अंधेरे का रेशा रेशा महकाता,प्रकृति की कविता  कहलाता है। हवाएं महक के साथ मधुमय सरगम साथ लिए चलती हैं। सूर्यकिरणों के छूते ही धरती पर झर जाता है। पारिजात के मानी हैं किसी से अवतरित होना या दिव्य रूप से प्रकट होना।

यह हर या शिव का प्रियतम पुष्प है। कितनी सुकुमार अभिव्यंजना है कि इसे तोड़ा नहीं जाता, चुना जाता है।

इसे प्रकृति का उपहार ही कहेंगे कि यह औषधि गुणों से भरपूर है। सायटिका एवं उदर रोगों में रामबाण। रूप गंध रंग के साथ उपचार की बात, गजब है पारिजात।

इतना कोमल  कि डाल से अलग करते हुये हस्तस्पर्श से आहत हो जाता है। इन फूलों का सौंदर्य ही नहीं पीड़ा भी वही समझ सकता है जिसका अंतस पारिजात सा हो।

झरो हरसिंगार झरो

प्राणों से लिपटी है जो

जाने कितने जन्मों से

कुछ तो पीर हरो।।”

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २९ – आलेख – केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २९ ☆

☆ आलेख ☆ ~ केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(प्रकृति के आराधना का पर्व -छठ)

आज सांय अस्त होते सूर्य को अर्घ देने के साथ ही छठ महापर्व के पावन बेला पर भगवान भास्कर की प्रथम पूजा पूर्ण हुई। सदियों नहीं बल्कि युगों से परंपरागत ढंग से मनाए जाने वाली छठ पूजा आज करीब एक दशक बाद बड़े आत्मविश्वास के साथ एवं आत्म संतुष्टि के साथ यह बता पाने में सफल हुई, कि ये पुरबिहा लोग आखिर कौन सी पूजा करते हैं ? और किसकी पूजा करते हैं ?

दरअसल पूर्णतः प्रकृति की पूजा का यह पर्व अपने आत्म गौरव के साथ आज इतने दिनों बाद बताने में सफल हो रहा है कि पूरी दुनिया उगते हुए सूर्य को तो प्रणाम करती है लेकिन अस्त होते सूर्य की पूजा कोई नहीं करता और ऐसे अस्त होते सूर्य की पूजा करने से लाभ ही क्या ? जो अस्त होने के लिए उन्मुख है। लेकिन एक बड़ा जनमानस जो हर बार ट्रेन एवं बसों में धक्के खाते हुए अपने गांव परिवार और अपने घर सिर्फ इसीलिए पहुंचता है कि उसे प्रथम दिवस अस्त होते सूर्य को ही पूजना है। क्योंकि उसे पता था सूर्य अस्त ही कहां होता है। जिस समय यह अस्त हो रहा होता है तो कहीं उदय हो रहा होता है। इसका कारण यह कि वह सामान्य तो है नहीं !!! और सामान्य हो भी क्यों हो!!

इस पृथ्वी पर उगने वाली किसी भी वनस्पति की इतनी क्षमता नहीं, जो सूर्य के प्रकाश के बिना, या सूर्य की आभा के बिना, नदी या सरोवर में स्थिर या बहते जल के बिना स्वयं के जीवन या स्वयं के अस्तित्व को प्राप्त नहीं कर सकते। जब जब की वेद वेदांत में पौराणिक धर्म ग्रंथो में पांच भूतों की बात कही गई है सृष्टि के पंचभूत कोई और नहीं प्रकृति के ही पांच स्वरूप है।

श्री राम किशोर उपाध्याय जी की पुस्तक सृष्टि के गीत इन्हीं पांच भूतों की बात करती है। सूर्य अग्नि तत्वों के साथ पांच भूत का ही अंग है। मैं अपनी बात आगे रखता हूं

हालांकि यह सब मेरा अपना अनुभव है। एक समय हुआ करता था, हम शर्माते थे अपने ही कार्यालय में बैठ यह बात नहीं पाते हैं कि हमारा यह पर्व है क्या ? और इसका महत्व क्या है। हालांकि वह समाज,वह क्षेत्र जो इस सूर्य आराधना के पर्व को श्रद्धा पूर्वक तब भी मनाता था।

उसके आस्था विश्वास और ज्ञान की पराकाष्ठा यह थी कि ऐसे परिवेश में जन्म लेकर यहां की माटी पर लोटपोट कर जिसने ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को छुआ, प्रशासनिक पदों पर रहकर अपने ज्ञान को सिद्ध करता रहा। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरकर यह बताता रहा कि हमारी खगोलीय संरचना क्या है, हमारे लिए सूर्य कितना महत्वपूर्ण है, उसके मन में दसको वर्ष पूर्व भी यह पर्व वैज्ञानिक पर्व था, आस्था के साथ-साथ प्रकृति की पूजा का पर्व था , नदियों और जल तालाबों के संरक्षण का पर्व था, कंदमूल फल जड़ी बूटियां, के महत्व को जानने का पर्व था , जलते हुए अखंड दीप का पर्व, डूबते हुए और अस्त होते हुए सूर्य से निकली हुई निर्विकार किरणों का पर्व था, अपने पूर्वजों के विश्वास का पर्व था, और आज भी उसके लिए श्रद्धा और विश्वास का पर्व है।

एक समय था जब हम परदेस में इस पर्व को मानते थे? हमारे सामने प्रश्न ही होते थे? आज हमारे पास प्रश्न नहीं बल्कि आज सबकी श्रद्धा और सब का विश्वास हमारे साथ है , साधारण विश्वास नहीं बल्कि हमसे ज्यादा अटूट विश्वास है।

निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से लेकर सफलता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति, हर कोई एक साथ, एक कतार में ,एक ही नदी और एक ही तालाब में, घुटने भर पानी में, खड़े होकर अस्त होते सूर्य को निहार, उसको प्रणाम करने, उदय होते हुए सूर्य की अगवानी करने और उसका उसको अर्घ समर्पित करने का सुखद सौहार्दपूर्ण समय ढूढ़ता है।

भगवान भास्कर हमारे जीवन में, अपनी सतरंगी किरणों के द्वारा नवीन विकास के पथ को अपने प्रकाश से प्रकाशित करें। भारत दिन-रात नित नवीन ऊंचाइयों को छू छुए और, इसी प्रकार विकासोंमुख बना रहे।

आप सभी को छठ महापर्व की हार्दिक बधाई…💐🙏

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१९ ⇒ धूम्रपान और मद्यपान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धूम्रपान और मद्यपान।)

?अभी अभी # ८१९ ⇒ आलेख – धूम्रपान और मद्यपान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आपका खानपान अच्छा या बुरा हो सकता है, लेकिन मद्यपान और धूम्रपान किसी भी परिस्थिति में अच्छा नहीं हो सकता। शायर पीने को बुरा नहीं मानते। अगर शराब न हो, तो शायद शायरी भी ना हो। शायर लोग कलम स्याही में नहीं,  शराब में डुबोकर लिखते थे। तब दर्द झलकता था,  और हुस्न के दीदार होते थे।

देव हों या असुर,  दोनों ही इस रस से सराबोर हैं। देव इसे सोम रस कहते हैं,  और असुर इसे सुरा ! सुंदरी का अगर इस धरती पर राज़ है तो अप्सराओं का स्वर्ग पर। कलयुग में इसे अंग्रेज़ी में वाइन और हिंदी में शराब कहते हैं। जो अंग्रेज़ पीते हैं, वह वाइन होती है, जो हम पीते हैं,  वह liquor लिकर होता है। लिकर से लिवर खराब होता है,  वाइन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी गई है।

Wine is divine.डॉक्टर्स ब्रांडी बच्चों को भी दी जाती है।।

शराब में अल्कोहल होता है। अल्कोहल दवाइयों में भी होता है। पुदीन हरा में किसी समय सात प्रतिशत अल्कोहल होता था।पारखी लोग तो पुराने कोको कोला में तांबे का सिक्का डालकर ही मस्त हो जाते थे।

सीनियर बच्चन के हिसाब से मधुशाला हिन्दू मुस्लिम का मेल कराती है। झगड़ा तो मंदिर मस्जिद कराते हैं। जो गरीब देशी मदिरा पीता है, वह सेहत और घर बर्बाद करता है,  जो अमीर विदेशी शराब पीता /पिलाता है,  वह बड़े बड़े ठेके हासिल करता है,  ट्रांसफर करवाता/रुकवाता है। शराब पीकर वाहन चलाना अपराध है,  शराब पीकर वाहन खरीदना नहीं।।

शराब पीने की जितनी सुविधाएं सरकार देती है,  धूम्रपान पर उतनी ही रोक लगाती है। देशी और विदेशी शराब की दुकानों के विज्ञापन बोर्ड देखने के लिए आपको अर्जुन की आंख की आवश्यकता नहीं। बस आंख खुली और दीदार हुए।धूम्रपान निषेध के साथ साथ सार्वजनिक स्थानों पर अगर यह भी लिख दिया जाय कि शराब पीना मना है,  तो लोगों के होश उड़ जाएं।अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन जितना धूम्रपान के प्रति सजग है,  उतना ही इस अंगूर की बेटी के प्रति उदासीन ! कारण वे ही जानें।

आइए अब धूम्रपान पर चर्चा करें ! धूम्रपान का भी एक इतिहास है। इसे मद्यपान का सहयोगी माना गया है। पुरानी महफिलों में जब नाच गाने होते थे, तब मदिरा के साथ बड़े बड़े हुक्के उपयोग में लाए जाते थे। राज दरबार हो या किसी रायबहादुर की कोठी, हुक्का शाही ठाठ में आता था।

शौक पूरे करने में आम आदमी भी कभी पीछे नहीं रहा। गांव गांव में खाट पर, आज भी जाट द्वारा ठाठ से हुक्का गुड़गुड़ा या जाता है। सरपंच हो और हुक्का न हो,  ऐसा हो नहीं सकता।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। हुक्का न सही,  चिलम ही सही ! चिलम फूंकने से आपको कोई नहीं रोक सकता। वह कैसा साधु, जो चिलम भी न पिये। आप चाहे तो उसमें गांजा भरो या चरस। याद कीजिए ! दम मारो दम,  और ज़ीनत अमान को। हरे रामा,  हरे कृष्णा।।

ये अमीर गरीब की खाई कोई नहीं भर सकता। गरीब की बीड़ी और अमीर की सिगरेट ही तो वह एस्केप है,  पलायन है,  जो हर फिक्र को धुएं में उड़ाने की खूबी रखता है। सच बड़ा कड़वा होता है अमर बाबू ! दो कड़वे घूंट ज़िन्दगी की सब कड़वाहट दूर कर देते हैं। सारा तनाव धुआं धुआं हो जाता है।

आप समझदार हैं,  गरीब अथवा अमीर,  अनपढ़ अथवा पढ़े लिखे हैं, आपसे करबद्ध निवेदन है कि धूम्रपान और मद्यपान से दूर रहें। धर्म का नशा उससे भी गहरा है, एक बार उसमें बस पांव रख दें हर हर गंगे हो जाएगा। आपके सभी दुख दर्द दूर हो जाएंगे।।

इतने धार्मिक चैनल हैं। कथा, सत्संग, प्रवचन चल रहे हैं। धर्म के प्रति थोड़े जागरूक हों। इन वामियों ने शराब की गंध और सिगरेट के धुएं से वातावरण को प्रदूषित किया हुआ है। सर पर चंदन लगाएं,  घर में अगरबत्ती। घर में कुत्ता नहीं गाय पालें। सभी धार्मिक आयोजनों, भंडारों और जगरातों में उत्साह से भाग लें। विश्व का कल्याण हो। धर्म की विजय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों का कल्याण हो। धूम्रपान, मद्यपान मुर्दाबाद।

पान खाएँ सैंया हमार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९८ ☆ स्वास्थ्य, पैसा व संबंध… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख स्वास्थ्य, पैसा व संबंध। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९८ ☆

☆ स्वास्थ्य, पैसा व संबंध… ☆

आप जिस वस्तु पर आप ध्यान देना छोड़ देते हैं, नष्ट हो जाती है–चाहे वह स्वास्थ्य हो, पैसा हो या संबंध; यह तीनों आपकी तवज्जो चाहते हैं। जब तक आप उन्हें अहमियत देते हैं, आपका साथ देते हैं और जब आप उनकी ओर ध्यान देना बंद कर देते हैं, वे मुख मोड़ लेते हैं तथा अपना आशियाँ बदल लेते हैं। वे स्वार्थी हैं तथा तब तक आप के अंग-संग रहते हैं, जब तक आप उन्हें पोषित करते हैं अर्थात् उनके साथ अमूल्य समय व्यतीत करते हैं।

स्वस्थ बने रहने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और यह दो प्रकार का होता है। व्यायाम से आप शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेंगे और सकारात्मक सोच व चिंतन-मनन से मानसिक रूप से दुरुस्त रहेंगे, जो जीवन का आधार है। वास्तव में शरीर तभी स्वस्थ रह सकता है– यदि मन स्वस्थ व जीवंत हो और उसका चिंतन सार्थक हो। दुर्बल मन असंख्य रोगों का आग़ार है। भय, चिंता आदि मानव को तनाव की स्थिति में ले जाते हैं, जो भविष्य में अवसाद की स्थिति ग्रहण कर लेते हैं। यह एक ऐसा भंवर है, जिससे    बाहर आना नामुमक़िन होता है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें मानव प्रवेश तो कर सकता है, परंतु बाहर निकलना उसके वश में नहीं होता। वह आजीवन उस भूल-भुलैया में भटकता रहता है और अंत में दुनिया से अपने सपनों के महल के साथ रुख़्सत हो जाता है। इसलिए इसे मानसिक स्वास्थ्य से अधिक अहमियत प्रदान की गई है।

मन बहुत चंचल है और पलभर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। उसे वश में रखना बहुत कठिन होता है। मन भी लक्ष्मी की भांति चंचल है, एक स्थान पर नहीं टिकता। परंतु बावरा मन अधिकाधिक धन कमाने में अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है और भूल जाता है कि यह ‘दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ इतना ही नहीं, वह इस तथ्य से भी अवगत होता है कि ‘खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’  और यह भी शाश्वत् सत्य है कि तूने जो कमाया है/  दूसरा ही खायेगा।’ परंतु बावरा मन स्वयं को इस मायाजाल से मुक्त नहीं कर पाता। जब तक साँसें हैं, तब तक रिश्ता है और साँसों की लड़ी जिस समय टूट जाती है; रिश्ता भी टूट जाता है। ‘जीते जी तू माया में राम नाम को भूला/ मौत का समय आया, तो राम याद आएगा ‘–इन पंक्तियों में छिपा है जीवन का सार। जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे, यह किसी दूसरे की संपत्ति थी और जब तुम मर जाओगे, तो भी  यह किसी दूसरे की होगी। एक अंतराल के लिए यह तुम्हें प्रयोग करने के लिए मिली है। यह प्रभु की संपदा है; किसी की धरोहर नहीं। आज सुबह यह संदेश व्हाट्सएप पर सुना तो हृदय सोचने को विवश हो गया कि इंसान क्यों स्वयं को इस मायाजाल के विवर्त से मुक्त नहीं कर पाता, जबकि वह जानता है कि ‘कलयुग केवल नाम अधारा।’ पैसा तो  हाथ की मैल है और वक्त में सामर्थ्य है कि वह मानव को किसी भी पल अर्श से फ़र्श पर ला सकता है। इसलिए हमें पैसे की नहीं, वक्त की अहमियत को स्वीकारना चाहिए। पैसा इंसान को अहंवादी बनाता है, संबंधों में दूरियाँ लाता है और दूसरों की अहमियत को नकारना उसकी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। पैसा ‘हॉउ से हू’ तक लाने का कार्य करता है। जब तक इंसान के पास धन-संपदा होती है, सब उसे अहमियत देते हैं। उसके न रहने पर वह ‘हू आर यू ‘ तक पहुँच जाता है। सो! आप अनुमान लगा सकते हैं कि पैसा कितना बलवान, शक्तिशाली व प्रभावशाली है। यह पलभर में संबंधों को लील जाता है। इसके ना रहने पर सब अपने पराए हो जाते हैं तथा मुख मोड़ लेते हैं, क्योंकि पैसा सबको एक लाठी से हाँकता है। जब तक मानव के पास धन रहता है, उसके कदम धरा पर नहीं पड़ते। वह आकाश की बुलंदियों को छू लेना चाहता है तथा अपने सुख-ऐश्वर्य व खुशियाँ दूसरों से साँझा नहीं करना चाहता।

परंतु सब संबंध स्वार्थ के होते हैं, जो धनाश्रित होते हैं, परंतु आजकल तो यह अन्योन्याश्रित हैं। इंसान भूल जाता है कि यह संसार मिथ्या है; नश्वर है और पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। इसलिए उसे माया में उलझे नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभु के साथ शाश्वत् संबंध बनाए रखना ही कारग़र उपाय है। ‘सुमिरन कर ले बंदे/ यह तेरे साथ जाएगा।’ प्रभु नाम ही सत्य है और अंतकाल वही मानव के साथ जाता है।

संबंध ऐसे बनाओ कि आपके चले जाने के पश्चात् भी लोग आपका अभाव अनुभव करें और परदा गिरने के पश्चात् भी तालियाँ निरंतर बजती रहें। परंतु आजकल संबंध रिवाल्विंग चेयर की भांति होते हैं। नज़रें घुमाते ही वे सदैव के लिए ओझल हो जाते हैं, क्योंकि अक्सर लोग स्वार्थ साधने हेतू संबंध स्थापित करते हैं। मानव को ऐसे लोगों से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि वे अपने बनकर अपनों पर घात लगाते व निशाना साधते हैं।

दूसरी ओर यदि आप पौधारोपण करने के पश्चात् उसे खाद व पानी नहीं देते, तो वह मुरझा जाता है; पल्लवित-पोषित नहीं हो पाता। उसके आसपास कुकुरमुत्ते उग आते हैं, जिन्हें उखाड़ना अनिवार्य होता है, अन्यथा वे ख़रपतवार की भांति बढ़ते चले जाते हैं। एक अंतराल के पश्चात् बाड़ ही खेत को खाने लगती है। इसी प्रकार संबंधों को पोषित करने के लिए समय, देखभाल और संबंध बनाए रखने के लिए स्नेह, त्याग, समर्पण व पारस्परिक सौहार्द की दरक़ार होती है। यदि हमारे अंतर्मन में ‘मैं अर्थात् अहं’ का अभाव होता है, तो वे संबंध पनप सकते हैं, अन्यथा मुरझा जाते हैं। ‘मैं और सिर्फ़ मैं’ का भाव तिरोहित होने पर ही हम शाश्वत् संबंधों को संजोए रख सकते हैं। वहाँ अपेक्षा व उपेक्षा का भाव समाप्त हो जाता है। आत्मविश्वास व परिश्रम सफलता प्राप्ति का सोपान है। सो! स्वास्थ्य, पैसा व संबंध तीनों की एक की दरक़ार है। यदि हम समय की ओर ध्यान देते हैं, तो यह संबंध स्वतंत्र रूप से पनपते है, अन्यथा दरक़िनार कर लेते हैं। आइए! मर्यादा में रहकर सीमाओं का अतिक्रमण ना करें और उन्हें खुली हवा में स्वतंत्र रूप से पल्लवित होने दें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares