हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५३ ⇒ गृह-शांति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गृह-शांति।)

?अभी अभी # ७५३ ⇒ आलेख – गृह-शांति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जहाँ रहते हैं, उसको घर कहते हैं ! घर को ही गृह भी कहा जाता है। घर वह स्थान होता है, जहाँ हम घर जैसा महसूस करते हैं। जब ऐसा नहीं होता, तब घर कभी कबाड़खाना लगता है तो कभी, कोई अनजान स्थान भी हमें घर जैसा ही लगने लगता है। घर में शांति न मिलने के वैसे तो कई कारण होते हैं, लेकिन ज़्यादा गंभीर स्थिति होने पर बात वास्तु-दोष तक पहुँच जाती है।

जब भी नया घर बनाया जाता है, तो पहले भूमि-पूजन होता है, वास्तु-पूजन होता है, गृह का निर्माण होता है और गृह-प्रवेश के पहले ग्रह-शान्ति होती है।

गृह-प्रवेश के पहले, ग्रह-शान्ति !

जी हाँ। क्योंकि आपके पहले ही वहाँ नवग्रह विराजमान हो जाते हैं।।

कभी आपने रात में तारे गिने हैं !

क्या ग्रह और नक्षत्रों को कभी पहचान पाए हैं। चलिए आसमान की बात छोड़िए, अपनी जनम-पत्री ही देख डालिए। सोम-मंगल, बुध-रवि, गुरु-शुक्र तो छोड़िए, चंद्रमा और राहु-केतु भी आपकी जनम-पत्री में विराजमान है।

और है उस जनम-पत्री में आपका कच्चा-चिट्ठा ! आज जनम लिए बालक का भविष्य-फल। उन ग्रहों के आधार पर अब आपका नामकरण होगा। और तो और आपका भविष्य भी साथ होगा।

कर लो, क्या कर लेते हो?

क्या कहा ! आप ज्योतिष में विश्वास नहीं करते, भाग्य में विश्वास नहीं करते, अपनी जनम-पत्री के ग्रहों से नहीं डरते। आपने बड़ा होकर अपना नाम भी अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़ लिया, लेकिन जिस भी घर में शांति से रहना चाहोगे, अपनी मर्ज़ी से भले ही नहीं, पर परिवार-परिजनों, माता-पिता, पत्नी-पुत्र और रायचंदों के विचार-विमर्श के आगे नत-मस्तक हो, गृह-प्रवेश के पहले ग्रह-शान्ति तो करवानी ही पड़ेगी। अपनी ज़िद के पीछे आप घर-वालों की आस्था, श्रद्धा और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।।

जो पहले वास्तुविद थे, आज आप उन्हें आर्किटेक्ट (architect) कहते हैं। कौन से कोण में क्या किचन होगा और कौन से कोण में आपका बेड-रूम, वह पहले आपको नक्शे में बताएगा। आप नाक-भौं सिकोड़ेंगे, तो विकल्प भी बताएगा, लेकिन घर वही बनाएगा। बाद में शान से भले ही आप कहते फिरें, यह घर मैंने इतने लाख में बनवाया।

गृह और ग्रह से परे भी एक चीज़ है, जिसे मन की शांति कहते हैं।

मन अशांत हुआ तो राहु-केतु और शनि की महादशा शुरू हो जाती है। लो जी ! हमारे उनको तो साढ़े-साती लग गई ! अब कांग्रेस साढ़े-सत्तर साल तक सत्ता से बाहर हो गई। देखा लालू और आसाराम बापू का हाल ! सब ग्रहों की ही दशा है।।

याने हमारे देश में, और घर में शांति का ठेका हमने तांत्रिकों और ज्योतिषियों को दे दिया है।

सब ईश्वर का बनाया हुआ है।

आप नास्तिकों जैसी बातें नहीं कर सकते। इंदिरा के समय में भी उनके गुरु धीरेन्द्र ब्रह्मचारी थे। आनंदमयी माँ में भी उनकी श्रद्धा थी। नरसिंहाराव और चंद्रशेखर जैसे कई राजनेताओं के गुरु तांत्रिक चंद्रास्वामी रहे हुए हैं। यह आस्था और विश्वास का मामला है जी।

हमारे धर्म, आस्था और विश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं। हम कब अपने गृह को आसमान के ग्रहों से मुक्ति दिला पाएँगे, कब तक नौकरी और बच्चा न होने पर पत्रिका लेकर ज्योतिषी के घर के चक्कर लगाएंगे ! पितृ-दोष और काल-सर्प दोष के निवारण के लिए कभी उज्जैन तो कभी त्रयम्बकेश्वर की परिक्रमा लगाएंगे।।

वाकई हमारा देश चमत्कारों का देश है ! सभी विसंगतियों के बाबजूद अनूठा, निराला, अद्भुत !

असहमति, सहमति के बीच, तमाम संकल्प-विकल्पों के चलते, हम अपनी राह निकाल ही लेते हैं। आसमान में बैठे, हमारे जनम-पत्री में जमे समस्त ग्रहों की परवाह न करते हुए गृह की शांति का आनंद भी लेते चले आ रहे हैं। न चेहरे पर कोई शिकन, न तनाव। शायद इसे ही कहते हों,

सब का साथ,

आपका विकास . . .!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १८ – दस्तावेज ☆ मारीशस ~ पत्थर के नीचे सोना होता है़… ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १८ ☆

☆ दस्तावेज ☆ मारीशस ~ पत्थर के नीचे सोना होता है़… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

भारत से गिरमिटिया देशों को पहुंचे भारतीय मजदूर, जो हमारे ही पूर्वज थे, ने अपने धैर्य, संघर्ष, एवं श्रम के दम पर तथा इसके साथ अपने साथ ले गयी भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पूंजी के बल पर विरान द्वीपों को एक अत्याधुनिक, खूबसूरत, सुविधा सम्पन्न राष्ट्र में बदल दिया।

भारत से मजदूर के रूप में गिरमिटिया देशों को पहुंचे हमारे पूर्वजों ने समुद्र के किनारे वीरान पड़े द्वीपों को न सिर्फ स्वर्ग सा बना दिया, बल्कि स्वयं को सत्ता के शिखर पर स्थापित कर लिया। इन्होंने चौमुखी विकास किया। आज आधुनिकता के दौर में, जब हम भारत में रहते हुए अपनी संस्कृतियों से विमुख हो रहे हैं। ऐसे समय में भी इन गिरमिटिया मजदूरों के वंशज आज भी भारतीय साहित्य संस्कृति और कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान कर रहे हैं। इन साहित्यकारों के साहित्य अतीत की पीड़ा से लेकर वर्तमान के उजाले को अपने साहित्य में रोपित करती हुई दिखती है। कम से कम मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर के पथरीला सोना उपन्यास के सात खंड इस यात्रा को बखूबी प्रमाणित करते हैं।

डॉ दीपक पाण्डेय एवं डॉ नूतन पाण्डेय जी द्वारा संपादित पुस्तक “रामदेव की रचना धर्मिता” के पृष्ठ 24 पर डॉ.हरेराम पाठक जी का आलेख रामदेव धुरंधर का साहित्य समाजैतिहासिक दस्तावेज में #श्री_रामदेव_धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना को कोट को करते हुए डॉक्टर पाठक लिखते हैं –

“पथरीला सोना श्रम संस्कृति का महाआख्यान है। कारण इसमें श्रम की पीड़ा ही नहीं, बल्कि उसके सौंदर्य का भी अनुलेखन है। कोई भी मजदूर जब श्रम करता है तो उसके श्रम के बराबर उसे मजदूरी नहीं मिल पाती तो भी वह श्रम करना नहीं छोड़ता है। आखिर कहां से आती है उसमें यह शक्ति? क्या राज है उसकी कठोर जीवटता का, जो कभी उसे हार मानने नहीं देता है। धुरंधर स्पष्ट का उत्तर देते हुए कहते हैं –

शादी विवाह के गीत, भक्ति काव्य और इस तरह के भारतीय कृतियां और संस्कृति का इस देश में विस्तार होता चला गया था। जो लोग साधारण लोग थे उनके अंतस में भी समाने लगा था कि अपने भारत की इतनी सारी धरोहर से हम इस देश में अपने को धन्य पा रहे हैं। ” अर्थात भारतवर्ष की आस्था मूलक संस्कृति धरोहर ही उस समय प्रवासी भारतीयों की थाती थी जिसके बल पर शोषित होते हुए भी कठोर श्रम साधना के बल पर वे सुदूर मॉरीशस में अपने पैर जमा सके।

“उपन्यास की एक पात्र धानी कहती है – “मैं धरती और आसमान से तो नहीं लड़ सकती लेकिन कुदाल से काम करना मुझे आता है” ( पथरीला सोना खंड तीन पृष्ठ 309 )

श्री धुरंधर जी का यह उपन्यास सन 1834 से लेकर 1912 तक के भारतीय श्रम शूरवीरों की जीवट कथा है, जिन लोगों ने मॉरीशस को अपनी कर्मभूमि बनाया। आज अपनी श्रम संस्कृति एवं कर्म बल से उन्होंने मॉरीशस की बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया है एवं वहां की सरकार खुद उनकी सरकार है।

डॉ अमित कुमार गुप्ता एवं सुश्री ज्योति कुशवाहा द्वारा संपादित पुस्तक भारतीय संस्कृति के उन्नयन में प्रवासी साहित्यकार यह शीर्षक “मॉरीशस साहित्य का है।

#श्री_अभिमन्यु_अनत_युग” में प्रोफेसर रेखा पी मेमन एक गिरमिट गीत का उदाहरण देती है –

“सुन कहानी गिरमिटियन के।

काटे कलजन सुन सुन के

भइल मोहताज मजूरिया जब देशवा में,

फ़सलन मीठी बतिया दलालवा के,

पहुंचन मिरिचिया या जहाजी भाई बनन के,

गुलाम बनलन साहब गोरवन के,

मिलल झोपड़ियां हसवा पियासवासवा,

ओढ़ावन बिछावन पहनावा गोनिया के,

न सिक लीव न लोकल लिव न परब कोईई

बीतल समैय बांच चौपाइयां रामायण के,

बचाओलन धर्वा पूजा पाठ करके। ।

मॉरीशस के प्रख्यात नाटककार #श्री_सोमदत्त_बखोरी का एक नाटक “गुमान की गोली” जिसे डॉक्टर नूतन पाण्डेय जी की कृति “मरिशसीय हिंदी नाटक साहित्य और सोमदत्त बखोरी” के एक नाटक “गुमान की गोली” का एक पात्र सोमनाथ कहता है कि-

सोमनाथ : जिंदगी में ऐसी ऐसी ठोकर खाकर ही आंखें खुलती है। जिस क्रांति ने हमारे दिल में घर कर लिया है वह कब शांत होने वाली कवि में केवल रोने और गाने के गुण नहीं होते, कवि कल्पना का खिलौना नहीं, कवि समय आने पर निर्जीव हड्डियों में जान भी फूंक सकता है। आज तक मेरी कलम से कोमलता टपकती आई है। अब मैं चाहता हूं कि उसमें आग की लपटे निकले ताकि अन्याय, अनिति, शोषण दमन अत्याचार की दुनिया से हार कर मत जाए, ताकि हर एक मालिक समझ जाए कि गरीबों के ही भी पहलू में एक इंसान का दिल होता है ( पृष्ठ 118 )

रामदेव की रचना धर्मिता पुस्तक के अपने एक आलेख में डॉ. दीपक पांडेय सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली एवं पूर्व द्वितीय सचिव ( भाषा – संस्कृति ) भारतीय उच्चायोग त्रिनिडाड एवं टोबैगो अपने आलेख शीर्षक “रामदेव धुरंधर की लघु कथाओं का वैशिष्टय” के (पृष्ठ 230 ) रामदेव धुरंधर की लघुकथा “घर एक बसेरा” के हवाले से लिखते हैं कि-

“किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से विमुख न होना मानव का लक्ष्य है। परिस्थितियों से पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि समस्याओं का सामना करना ही समस्याओं पर विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। “

उपरोक्त संदर्भों आलेखों को पढ़कर हम कह सकते हैं कि प्रवासी साहित्यकार अपने लिखे के माध्यम से उन प्रवासी जनों की बात करते हैं, जो कोई दूसरे नहीं बल्कि हमारे ही पूर्वज थे। जिन्होंने दूसरे देश जाकर के मौज मस्ती नहीं मनाई बल्कि उन्होंने एक बड़ा संघर्ष किया। संघर्ष इतना बड़ा था, जिसकी सीमाए नहीं थी। दिशाएं तय ही नहीं थी। संघर्ष का अंत कहां है, इसका पता उनको नहीं चल रहा था।

संघर्ष की सीमा तो समुद्र के भीतर पानी के जहाज में जब वे बैठे तो उन प्रवासी मजदूरों को भी नही समझ में आ रही थी, जहां दूर-दूर तक धरती ही नजर ही नहीं आ रही थी।

पानी के जहाज पर के तांबूल पर बैठे हुए पक्षी की मनोस्थिति कैसी होती है – इसे ऐसे ही जान सकते हैं कि जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आवे।

“जाना कहां-कहां है रुकना कुछ भी उनको पता नहीं”

ऐसी मन:स्थिति को मैंने अपनी कृति काव्य कथा विथिका ” के माध्यम से लिखा था –

[ इस रचना के शीर्षक का भाव मुझे मारीशस के हिंदी साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना से मिला ]

पत्थर के नीचे सोना होता है़ ……

*

भारत की संस्कृति और ताकत,

श्रम के श्वासों मेंं बसती है़।

सेवा और श्रम के इर्द गिर्द,

शीतल बयार बन बहती है़ ॥

*

श्रम, सेवा का प्रतिमान बने,

हनुमान यहाँ पूजे जाते।

जन जन के मन मेंं बसते हैं,

वानर तन सुन्दर कहलाते ॥

*

पत्थर की चाकी मेंं पिस कर,

रोटी का आटा बनता है।

छाते की नोको से घिस कर,

श्रमयोगी का भाल चमकता है़ ॥

*

काली अधियारी स्याह भरी,

झोपड़ी मेंं सोना होता है़।

श्रमिको का भी संकल्प यही,

पत्थर के नीचे सोना होता है़।

*

निर्धन माँ बाप के बेटे भी,

इस देश के मुखिया बनते हैं।

श्रम के सोपान पर चढ़ कर के,

भारत का भाग्य बदलते है़ ॥

*

श्रम, और समर्पण, राष्ट्र प्रेम,

मिल कर शक्ति बन जाती है़।

फिर सात समुन्दर पार पहुँच,

अपना परचम लहराती है़ ॥

राजेश कुमार सिंह “श्रेयस “

अवधी साहित्य के श्रेष्ठ साहित्यकार डॉ राम बहादुर मिश्र जी जब श्री रामदेव धुरंधर की एक कहानी ‘ वास्तविक रचनाकार” पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं –

भारतीय वाग्मय में इस बात की अवधारणा ही स्थापित की जाती है। धुरंधर जी ने भी लघुकथा की एक त्रासदी को सुखान्त बनाया है।

मॉरीशस के भारतीय उच्चायोग में द्वितीय सचिव ( भाषा एवं संस्कृति ) के पद पर रह चुकी डॉ नूतन पाण्डेय, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली, प्रवासी साहित्यकारों के योगदान के विषय में लिखती हैं कि-

हम अतीत में न जाकर अब मॉरीशस में हिंदी के प्रचार प्रसार की बात करते हैं। फ्रेंच और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के द्वारा एग्रीमेंट के तहत भारतीयों को गिरमिटिया मजदूर के रूप में कर 1834 में मॉरीशस दीप में लाया गया था। मॉरीशस पहुंचे भारतीय मजदूर ने इस अपरिचित दीप में भारतीय भाषा और संस्कृति के जो बीज रोपे थे वे वट वृक्ष बनकर हिंदी साहित्य को ऑक्सीजन पहुंचाने का दायित्व निभा रहे हैं।

इन सभी बातों और इन सभी आलेखों के आधार पर हम कह सकते हैं कि –

भारत से गिरमिटिया देश पहुंचे भारतीय मजदूरो ने प्रत्येक क्षेत्र में एक बड़ी जमीन तैयार की, जहां आज भी भारतीय कला, संस्कृति, संस्कार और साहित्य की सुगंध महसूस की जा सकती है।

हम भारतीय उनके ऋणी है, तथा उनके संघर्ष को नमन करते हैं कारण की उन्होंने एक बहुत बड़ा कार्य किया। ऐसा भी होता कि वह किसी देश में जाते, अभावो के साथ जाते और फिर वहां एक लुप्त प्राय समूह बनाकर रह जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्होंने तो ऐसा कर दिया कि हमारा सीना गर्व से ऊंचा हो गया। उन्होंने ऐसे कई देशों में जाकर न सिर्फ भारतीय संस्कृति और भारतीयता का बीज रोपण किया, बल्कि स्वयं को एक विशाल वट वृक्ष की तरह से स्थापित किया।

आज भी उनके वंशज अपने कलम के दम पर, हमारी भाषा संस्कृति और सभ्यता के साथ कदम ताल करते हुए चल रहे है। यह कम गौरव की बात नहीं है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 05 अगस्त 2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #287 ☆ क्रोध बनाम पश्चाताप… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख क्रोध बनाम पश्चाताप। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 287 ☆

☆ क्रोध बनाम पश्चाताप… ☆

‘क्रोध मूर्खता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त होता है’ पाइथागोरस का यह कथन कोटिश: सत्य है कि मूर्ख व्यक्ति ही क्रोधित होता है,क्योंकि वह इस तथ्य से अवगत नहीं होता कि इसकी सबसे अधिक हानि क्रोधी को ही उठानी पड़ती है। क्रोध के समय मानव का विवेक नष्ट हो जाता है और वह आत्म-नियंत्रण में नहीं रहता। वह तुरंत प्रतिक्रिया दे देता है; जो आग में घी का काम करती है। इसलिए वह मूर्ख कहलाता है,क्योंकि अपने अहित के बारे में वह सोचता ही नहीं। अक्सर क्रोध की स्थिति में वह प्रतिपक्षी के प्राण लेने पर भी उतारू हो जाता है। वह वाणी पर भी आत्म-नियंत्रण खो देता है। उस स्थिति में वह ऊल-ज़लूल सोचता ही नहीं; दूषित भावों को बढ़ा-चढ़ा कर अकारण उगल देता है। एक अंतराल के पश्चात् उसे अपनी ग़लती का एहसास होता है और वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है, जिसका कोई लाभ नहीं होता,क्योंकि समय व अवसर हाथ से निकल जाने के पश्चात् व्यक्ति हाथ मलता रह जाता है, जैसा कि ‘फिर पछताय होत क्या,जब चिड़िया चुग गई खेत।’

गुस्सा और मतभेद बारिश की तरह होना चाहिए,जो बरस कर समाप्त हो जाए और प्रेम हवा की तरह ख़ामोश होना चाहिए और सदैव आसपास रहना चाहिए–यह सोच अत्यंत सार्थक है। दूसरे शब्दों में क्रोध दूध के उबाल जैसा होना चाहिए और मतभेद बारिश की तरह होने चाहिएं। जिस प्रकार बादल उमड़-घुमड़ कर आते हैं और बरस कर शांत हो जाते हैं; तप्त धरा को शीतलता प्रदान करते हैं,जिसके उपरांत मन-आँगन प्रफुल्लित हो जाता है। जैसे बारिश सब कुछ बहाकर ले जाती है और धरा हरी-भरी हो जाती है। उसी प्रकार हृदय में पल्लवित मलिनता व मनोमालिन्य भी तुरंत समाप्त हो जाने चाहिए। पति-पत्नी में विचार-वैषम्य   बारिश की तरह होने चाहिए और मानव को अपने मन की बात कहने के पश्चात् शांत हो जाना चाहिए; मनो-मालिन्य को घर में आशियां नहीं बनाने देना चाहिए, क्योंकि वह स्थिति अत्यंत घातक होती है,जिसका भयावह परिणाम बढ़ते तलाक़ों के रूप में हमारे समक्ष हैं। बच्चे व परिवारजन सब इस एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं। दूसरी ओर प्रेम मलय वायु की झोंकों की भांति होना चाहिए, जो ख़ामोशी के रूप में सदैव आपके अंग-संग रहे। स्नेह, प्रेम व सौहार्द का बसेरा मौन में ही संभव है। सो! इसके लिए सहनशीलता अपेक्षित है,जो मौन की प्राथमिक शर्त है। प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता; त्याग व समर्पण चाहता है,जो विनम्रता के भाव के रूप में जीवन में पदार्पण करता है। सो! जहां प्रेम है; वहां देवता निवास करते हैं; लक्ष्मी का वास रहता है तथा पारस्परिक वैमनस्य भाव का स्थान नहीं होता।

‘मरहम होते हैं कुछ लोग/ शब्द बोलते ही दर्द गायब हो जाता है/ ऐसे लोगों की वाणी में माधुर्य होता है और उनकी वाणी ज़ख्मों पर मरहम की भांति कार्य करती है।’ उस स्थिति में स्व-पर व राग-द्वेष के भाव समाप्त हो जाते हैं। उनमें ऐसी आकर्षण शक्ति होती है कि मन उनके आसपास रहने और सत्वचन सुनने को तत्पर रहता है। इसलिए कहा जाता है कि मानव अपने शब्दों द्वारा दूसरों की पीड़ा हर सकता है। ‘वीणा के तार ढीले मत छोड़ो/ ढीला छोड़ने व  अधिक खींचने से उसका स्वर मधुर व सुरीला नहीं

निकलता।’ इतना ही नहीं, यदि  वीणा के तारों को अधिक कसा जाए; वे टूट जाएंगे’ के माध्यम से सदैव मीठे वचन बोलने की सीख दी गई है। मीठी बातों से सर्वत्र सुख प्राप्त होता है। सो! कठोर वचनों का त्याग करना वशीकरण मंत्र है–तुलसीदास जी की यह सोच अत्यंत सार्थक है।

मनुष्य जब अपनी ग़लतियों का वकील और दूसरों की ग़लतियों का जज बन जाता है, फैसले नहीं फ़ासले बढ़ जाते हैं। सो! मानव को अपनी ग़लती को स्वीकारने में संकोच  कर लज्जा का अनुभव नहीं करना चाहिए,क्योंकि व्यर्थ वाद-विवाद से दिलों में दरारें पनप जाती हैं–जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। ‘ऐ मन! सीख ले तू/ ख़ुद से बात करने का हुनर/ खत्म हो जाएंगे/ सारे दु:ख द्वंद्व/ नहीं रहेगा तू अकेला जहान में/ साथ देंगे तेरे अपने ही दुश्मन/ तू सबका प्रिय बन जाएगा।’ स्वरचित पंक्तियां स्वयं से बात करने की सीख देती हैं। मौन नवनिधि है और सबसे कारग़र दवा है, जिससे रिश्ते पनपते हैं। ‘अपनी ऊंचाई पर कभी घमंड न करना ऐ दोस्त!/ सुना है बादलों को भी पानी ज़मीन से उठाना पड़ता है।’ दूसरी और कोई तुम्हारे लिए दरवाजा बंद कर ले,तो उसे एहसास दिला देना कि कुंडी दोनों ओर होती है। इससे तात्पर्य है कि मानव को रिश्तों को बनाए रखने व स्थायित्व प्रदान करने हेतु झुकने व समझौता करने में तनिक भी संकोच नहीं  चाहिए। परंतु अपने आत्म-सम्मान व  अस्तित्व को बनाए रखना उसकी प्राथमिक व आवश्यक शर्त है।

जीवन में आधा दु:ख ग़लत लोगों से उम्मीद रखने से होता है और बाकी का आधा दु:ख सच्चे लोगों पर संदेह अर्थात्  शंका करने से आता है। इसलिए सदैव अच्छे लोगों की संगति में रहना चाहिए। वह इंसान कभी हार नहीं सकता, जो बर्दाश्त करना जानता है। सो! मानव तो सहना चाहिए, कहना नहीं,क्योंकि ‘सहने’ से समाधान निकलता है और ‘कहने’ से राई का पर्वत बन जाता है। रिश्तों का निबाह करने के लिए मानव को सहन करना आना चाहिए; कहना नहीं। प्लेटो के मतानुसार ‘मानव व्यवहार तीन मुख्य स्रोतों से निर्मित होता है– इच्छा,भाव व ज्ञान और ऐसे व्यक्ति को सदैव संभाल कर रखना चाहिए,जिसने आपको यह तीन चीज़ें भेंट की हों–साथ, समय व समर्पण।’ ऐसे लोग सदैव मानव के सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

कोई कितना भी बोले व स्वयं को शांत रखें; आपको अकारण प्रभावित नहीं कर सकता,क्योंकि धूप कितनी भी तेज़ हो; समुद्र को सुखा नहीं सकती। मन को शांत रखना जीवन को सफल बनाने का अनमोल खज़ाना है। वाशिंगटन के मतानुसार ‘अपने कर्त्तव्य में लगे रहना और चुप रहना– बदनामी का सबसे सबसे अच्छा जवाब है।’ वैसे बोलना भी एक सज़ा है। सो! इंसान को यथायोग्य,यथास्थान उचित बात कहनी चाहिए। यदि सच्ची बात मर्यादा में रहकर मधुर भाषा में कही जाए,तो सम्मान दिलाती है,वरना कलह का कारक बन जाती है। ग़लत बात बोलने से चुप रहना उचित व श्रेयस्कर है। वाणी से निकला हर एक कठोर शब्द घाव करके महाभारत करा सकता है। यदि वाणी की मर्यादा को ध्यान में रखकर बात कही जाए,तो बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ रोकी जा सकती हैं। इसलिए कबीर जी कहते हैं कि ‘मीठी वाणी बोलना/ काम नहीं आसान/ जिसको आती यह कला/ होता वही सुजान।’

‘चुपचाप कहते रहो तो सब अच्छा है। अगर बोल पड़े तो आपसे बुरा कोई नहीं’ के माध्यम से मानव को मौन रहकर सहन करने का संदेश दिया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि संसार में वही व्यक्ति सफल है,जिसने जीवन में सर्वाधिक समझौते किए होते हैं। परंतु सहनशीलता तभी तक अच्छी होती है; जब तक उसे आत्म-सम्मान से समझौता नहीं करना पड़ता। हर वस्तु की अधिकता हानिकारक होती है और उसका खामियाज़ा मानव को अवश्य भुगतना पड़ता है। सो! जीवन में समन्वय की राह पर चलते हुए सांमजस्यता प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५१ ⇒ हास्य चिकित्सा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हास्य चिकित्सा।)

?अभी अभी # ७५१  ⇒ आलेख – हास्य चिकित्सा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

laughter therapy

जो हंसना नहीं जानता, वो बीमार है। जिस तरह कली का खिलना, फूल का खिलना और बच्चे का खिलखिलाना प्रकृति की देन है, उसी तरह जिन होठों पर मुस्कुराहट नहीं, वे होंठ उदास हैं, अतृप्त हैं। मुस्कान जिसे हम स्माइल भी कहते हैं, वह मीलों दूर तक अपना प्रभाव छोड़ती है। मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा।।

हास्य चिकित्सा एक प्रकार की चिकित्सा है जिसमें हँसी और हास्य का उपयोग स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। यह दर्द, तनाव, और चिंता को कम करने में मदद कर सकती है, साथ ही मनोदशा और आत्मसम्मान में सुधार कर सकती है.

हास्य चिकित्सा के कई फायदे हैं, जिनमें शामिल हैं –

  • हँसी से शरीर में एंडोर्फिन नामक रसायन का उत्पादन, जो दर्द को कम करने में मदद करता है.
  • हँसी से तनाव हार्मोन का स्तर कम होता है।
  • हँसी से शरीर में डोपामाइन नामक रसायन का उत्पादन होता है, जो खुशी के साथ साथ, मनोदशा में भी सुधार करने में मदद करता है. हँसी से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ सकती है।।
  • हँसी से सामाजिक संपर्क में वृद्धि हो सकती है, जो अकेलेपन को कम करने में मदद करता है.
  • हास्य चिकित्सा से जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

हँसी आती है सुनकर कि – 

आजकल आदमी हंसना भी भूल गया है। वह हंसता जरूर है, लेकिन अक्सर उसकी हंसी या तो खोखली होती है, या फिर वह अपनी खुद की दुर्दशा पर ही हंसता नजर आता है।।

हंसता और हंसाता तो एक जोकर भी है, लेकिन हंसना, हंसाना उसका स्वभाव नहीं, मजबूरी है।

हास्य को भी हमने संयम और मर्यादा में बांध दिया है। खी खी और हा हा करना भी कोई हास्य है। हंसने की भी तमीज होती है, जिस तरह छींकने और खांसने की होती है। अगर किसी कारण सबके सामने आपकी हंसी रुक नहीं रही है, तो पहले एक्स्यूज़ मी कहिए और मुंह पर रूमाल रखकर हंस लीजिए और फिर भी अगर हंसी नहीं रुक रही हो, तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाइए। यहां वहां, बिना वजह हंसना विक्षिप्तता की निशानी है।

हंसने की भी कुछ शर्तें होती हैं, कुछ सामाजिक मर्यादा होती है। फूहड़ हास्य संगीत और कपिल का लाफ्टर शो कथित हास्य की श्रेणी में नहीं आता . यहाँ तक कि अब तो व्यंग्य ने भी हास्य से पलड़ा झाड़ लिया है। व्यंग्य की तुलना में हास्य को कम ही आंका जाता है। व्यंग्य को साहित्य और हास्य को लुगदी साहित्य समझा जाने लगा है। क्या कभी सुरेन्द्र मोहन पाठक अथवा ओमप्रकाश शर्मा को साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा जा सकता है। ऐसी बातें अक्सर हंसी में उड़ा दी जाती हैं।।

लेकिन हम जीवन में हास्य के महत्व को समझते हैं और रोज सुबह एक लाफ्टर थेरेपिस्ट हमें लाफ्टर की ट्रेनिंग देते हैं।

दोपहर हमारा फिजियोथैरेपिस्ट के लिए नियत रहता है और शाम को हम म्यूजिक थेरेपी के लेसंस लेते हैं। अगर कुछ समय और निकाल पाए तो जिम जाने का भी इरादा है।

बस इतना सब कुछ करने के बाद हमारे जीवन में करने को और क्या रह जाता है। बड़ा टाइट शेड्यूल है जी। फिर भी अगर और कोई सकारात्मक सुझाव आप दे सकें तो आपका स्वागत है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 362 ☆ आलेख – “व्यंग्य लेखन के वर्तमान मानक” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 362 ☆

?  आलेख – व्यंग्य लेखन के वर्तमान मानक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य लेखन साहित्य की वह विधा है जो समाज के अंतर्विरोधों, विसंगतियों और विद्रूपताओं को उजागर करती है। यह महज़ हँसाने का माध्यम नहीं, बल्कि एक सशक्त सामाजिक टिप्पणी है, जो समाज को आईना दिखाने का साहस रखती है। वर्तमान समय में जब सूचना की गति तेज़ है, और सामाजिक ढाँचे में निरंतर परिवर्तन हो रहे हैं, तब व्यंग्य लेखन के मानकों में भी परिवर्तन और परिष्कार हुआ है।

आज के व्यंग्य लेखन में स्पष्ट दृष्टिकोण का होना अनिवार्य है। लेखक को यह पता होना चाहिए कि वह किस सामाजिक या राजनीतिक प्रवृत्ति पर प्रहार कर रहा है। व्यंग्य किसी घटना, व्यक्ति या प्रवृत्ति की आलोचना तो करता है, परंतु वह आलोचना बौद्धिक और कलात्मक होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत या अमर्यादित। आधुनिक व्यंग्य एक विचार का पक्ष लेकर उसकी विरोधी सोच को अतिशयोक्तिपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे हास्य उत्पन्न होता है और साथ ही मूल सन्देश भी स्पष्ट हो जाता है।

आज के व्यंग्य लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विषयवस्तु में अत्यधिक विशिष्टता है। सामान्य कथाओं या घटनाओं से हटकर, यदि किसी अजीब, अतिरेक और अप्रत्याशित उदाहरण के माध्यम से व्यंग्य रचा जाए, तो वह अधिक प्रभावशाली होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई लेखक सरकारी तंत्र की आलस्यपूर्ण कार्यशैली पर व्यंग्य लिखता है, तो वह ‘एक कछुए को नौकरी लगने और विभागीय फाइलों में अटक जाने’ जैसी कल्पना का सहारा ले सकता है, जिससे हास्य भी उत्पन्न हो और पाठक ठिठककर सोचने को भी मजबूर हो।

व्यंग्य का उद्देश्य केवल उपहास करना नहीं है। यह सामाजिक जागरूकता फैलाने, सोच बदलने और व्यवस्थागत सुधार के लिए जनमत तैयार करने का माध्यम है। आज के दौर में, जब संचार के नये माध्यम जैसे मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया और इंटरनेट समाचार पोर्टल सक्रिय हैं, व्यंग्य लेखन की पहुँच पहले से कहीं अधिक हो गई है। एक व्यंग्य रचना मिनटों में हज़ारों तक पहुँच सकती है, जिससे लेखक की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

आज व्यंग्य लेखन में नैतिक सीमाओं का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भाषा या विचार का। लेखक को यह सावधानी रखनी होती है कि वह किसी समूह, जाति, धर्म, लिंग या विकलांगता को लक्षित कर हास्य न बनाए। यह अंतर बहुत महीन होता है, पर समझना आवश्यक है कि व्यंग्य कहीं कटाक्ष न होकर मानहानि या असंवेदनशील मज़ाक में न बदल जाए। एक ज़िम्मेदार व्यंग्यकार वही है जो समाज को चुभने वाले प्रश्न पूछे, पर मर्यादा का पालन भी करे।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्तमान व्यंग्य लेखन ने नए रूप धारण किए हैं। जहाँ पहले व्यंग्य मुख्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं और अख़बारों तक सीमित था, अब यह मंचीय प्रस्तुतियों, सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और ऑनलाइन पत्रिकाओं तक पहुँच चुका है। मंचीय प्रस्तुतियों में “ऐसी तैसी डेमोक्रेसी” जैसे तीक्ष्ण प्रयोगों ने व्यंग्य को आधुनिक युवाओं के बीच पहुँचाया है। इन मंचों पर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर गीतों, संवादों और कविता के माध्यम से तीखा व्यंग्य प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार विज्ञापन की दुनिया में ‘अमूल’ के पोस्टर निरंतर हल्के फुल्के परंतु प्रभावशाली व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं।

हिंदी के समकालीन व्यंग्यकारों में पंकज प्रसून का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो विज्ञान आधारित व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा हरि जोशी, सुशील सिद्धार्थ, विवेक रंजन श्रीवास्तव जैसे लेखक आज भी क्लासिक व्यंग्य की परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए आगे बढ़ा रहे हैं। इनकी रचनाओं में भाषा की चपलता, प्रतीकों की नवीनता और सामाजिक अंतर्दृष्टि देखने योग्य है।

व्यंग्य लेखन की प्रक्रिया में रचनात्मक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। एक प्रभावी व्यंग्य में विषय वस्तु स्पष्ट, भाषा शैली सहज और कथानक सुसंगठित होता है। लेखक को यह निर्णय लेना होता है कि वह किसी एक विचार के पक्ष में रहेगा या उसके विरोध में, और उसके बाद रचना को उसी धारा में बहाना होता है। हास्य उत्पन्न करने के लिए अतिशयोक्ति, विरोधाभास, विडंबना, नकल, रूपांतरण और द्विअर्थता जैसे उपकरणों का उपयोग करना पड़ता है। यह सभी उपकरण भाषा, संदर्भ और समय के अनुसार भिन्न रूपों में प्रयुक्त होते हैं।

भाषा की दृष्टि से आज का व्यंग्य बहुस्तरीय हो गया है। एक ओर वह ग्रामीण परिवेश की बोलियों से लेकर शहरी शब्दावली तक को आत्मसात करता है, वहीं दूसरी ओर आज की पीढ़ी से जुड़ने के लिए वह विज्ञापन, फिल्मी संवाद, मोबाइल ऐप्स, मीम और इंस्टाग्राम की भाषा का भी प्रयोग करता है। यह बदलाव व्यंग्य को समसामयिक बनाता है, पर इसके साथ-साथ लेखक को इस बात का ध्यान भी रखना होता है कि उसकी भाषा कहीं अर्थ का अनर्थ न कर दे।

व्यंग्य लेखन आज केवल लेखकों तक सीमित नहीं रहा। पाठक, श्रोता और दर्शक भी इसके सहयात्री बन गए हैं। प्रतिक्रिया और समीक्षा की संस्कृति ने व्यंग्य को पारस्परिक संवाद का माध्यम बना दिया है। यही कारण है कि एक अच्छा व्यंग्यकार अपने पाठकों की प्रतिक्रिया को गंभीरता से लेता है और समयानुसार अपनी शैली में परिवर्तन करता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में व्यंग्य लेखन केवल एक साहित्यिक अभ्यास नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, आलोचना और चेतना का सशक्त माध्यम बन चुका है। इसके मानक अब भाषा की शुद्धता से अधिक विचार की स्पष्टता, दृष्टिकोण की गहराई, नैतिक जिम्मेदारी और समसामयिकता की माँग करते हैं। व्यंग्य अब महज़ ‘हँसाने’ के लिए नहीं, बल्कि ‘सोचने’ और ‘बदलने’ के लिए लिखा जा रहा है—और यही उसकी सबसे बड़ी सफलता है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 254 ☆ संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 254 ☆ संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी

वर्षा ऋतु आगमन से, सावन -भादों मास प्रकृति के रंगों में सराबोर हो धरती का स्वागत करने को आतुर हो उठता है। कजरी के राग सुन झूमते लोगों का दिखना बहुत अच्छा लगता है। रक्षाबंधन का पर्व मनाने के लिए बहनें मायके आतीं हैं। वहाँ सखियों से मिलना, कजरी तीज के अवसर पर व्रत रखकर शिव पार्वती के मिलन का पर्व मनाना। ऐसा माना जाता है कि इस दिन ही पार्वती जी को शिव जी मिले थे। हरे- भरे खेत देख किसान उमंगित हो जाते हैं। भादों मास के आने वाले त्योहारों की छटा अपनी फसल में देखते हैं। धान की रोपाई, मनभावनी छवि हृदय को छू जाती है।

*

हरी भरी धरती मन मोहे

हर डाली में पत्ते सोहे

रिमझिम बारिश होती ऐसे

नवयौवन छाया हो जैसे।

*

भींगी चूनर ओढ़े आतीं।

कजरी राग सुहावन गातीं। ।

सखियाँ मिलजुल झूला झूलें।

राग- द्वेष जीवन के भूलें। ।

*

आइए हम सभी मिलकर इन सांस्कृतिक धरोहरों का पालन -पोषण करें। इन्हें जीवन में शामिल कर अपनी परम्पराओं के जीवंत स्वरूप से लाभान्वित हों।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 750 ⇒ सिया तो से नैना लागे रे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिया तो से नैना लागे रे।)

?अभी अभी # 750 ⇒ आलेख – सिया तो से नैना लागे रे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार करने की, और ईश्वर स्मरण की कोई उम्र नहीं होती। प्यार तो हमने खूब किया होगा, नाम जपन क्यूं भूल गया। हम तो खैर अब प्यार करना भी भूल गए होते, अगर हमारे जीवन के ७५ वें वसंत में सिया के बाल स्वरूप का प्रवेश नहीं होता।

किसी भी भाव में और किसी भी स्थिति में अगर सियाराम से नेह लग जाए, तो समझो आपका बेड़ा पार। लोग कहते हैं, राधे राधे बोलो, चले आयेंगे बिहारी, तो हम अगर सिया सिया कहेंगे तो क्या सिया के साथ प्रभु श्रीराम नहीं चले आएंगे। हमारा तो मानना है, राम जी तो आएंगे ही, साथ ही साथ हनुमान जी भी चले आएंगे। हमने कहीं पढ़ा है ;

एकै साधे सब सधे।

सब साधे, सब जाय।।

ईश्वर का बाल स्वरूप भी होता है, और हर बाल शिशु ईश्वर स्वरूप ही होता है।

बच्चों की बाल लीला और ईश्वर की लीला में कोई भेद नहीं होता। सूरदास ने अगर प्रज्ञाचक्षु होते हुए श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का सजीव चित्रण किया तो रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का अलौकिक वर्णन किया ;

ठुमक चलत

ठुमक चलत रामचंद्र

ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियां ….।।

सीताजी की बाल लीलाओं के बारे में हमने बहुत कम पढ़ा अथवा जाना है। हां लेकिन लोकगीतों में सीताजी की भी बाल लीलाओं का वर्णन भक्तों और कवियों ने अवश्य किया होगा।।

हम ना तो मैथिलीशरण हैं और ना ही सियारामशरण, लेकिन फिर भी आज से दो वर्ष पूर्व हमारे जीवन में एक तीन माह की बालिका का प्रवेश हुआ, जिसके पालकों ने उस बच्ची का नाम सिया रख दिया। कहते रहें शेक्सपीयर, नाम में क्या रखा है, लेकिन अगर इस बच्ची का नाम सिया नहीं होता, हो शायद यह अभी अभी भी यहां नहीं होता।

हम तो नाम की महिमा से भलीभांति परिचित हैं, और इसी सिया को हमारा आज का यह अभी अभी समर्पित है।

पास के ही तो फ्लैट में सिया का जन्म हुआ था। गोद में थी, तब से उसके दादा दादी के साथ हमारे घर आती थी। वैसे सिया से नैन तो हमारे तब से ही मिल गए थे, लेकिन आज हम आपस में बहुत घुल मिल गए हैं।।

व्यावहारिक जगत में हमारे संगी साथी भी होते हैं और इष्ट मित्र भी। क्या आपका इष्ट भी आपका मित्र हो सकता है ? श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी भी थे और सखा भी। जब कि श्रीकृष्ण सुदामा के मित्र भी थे और इष्ट भी। इसी तरह सिया हमारी इष्ट भी है और मित्र भी। जहां मित्रवत व्यवहार होता है, वहां उम्र बीच में नहीं आती।

सिया को देखकर हमें बिहारी का यह दोहा याद आ गया ;

कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।

भरे भोन में करत है

नैननु हि सब बात।।

शब्द वही हैं लेकिन यहां हमारी सिया की, कृष्ण की तरह यह बाल लीला है। चितवन शब्द हमने सिर्फ सुना ही था, लेकिन सिया हमें साक्षात् हमें उस चित्त के वन में ले गई, जिसे आप चाहें तो भुवन भी कह सकते हैं। हमारी सिया नजरें मिलाते ही नज़र फेर लेती है, क्योंकि उसकी निगाहें तो पूरी सृष्टि पर ही टिकी हुई है। बाल स्वरूप में सिया पूरे ब्रह्माण्ड को निहार रही है, और उसी बीच उसकी हम पर भी कृपा हो गई।।

आसक्ति और भक्ति का अगर मिला जुला विराट स्वरूप देखना हो तो बस किसी बाल गोपाल अथवा कन्या से एक बार आँखें चार कर लो। प्रज्ञाचक्षु सूरदास जी ने जो बंद आंखों से पाया, क्या हम आंख रहते नहीं महसूस कर सकते।

बच्चे ईश्वर का ही रूप होते हैं, यह जानते हुए भी हम यह सुअवसर खो देते हैं।

हम इतने नादान नहीं, हमारे पास अखिल ब्रह्माण्ड आज बाल रूप में, सिया बनकर उपस्थित है। यह स्वर्ण अवसर हम हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं।

हनुमान जी के लिए सीता जी माता थी, हमारे लिए सीताजी का यह बाल रूप सिया बनकर प्रकट हुआ है। हमारे तो भाग जाग गए तो फिर हम क्यों ना कहें,

सिया तो से नैना लागे रे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 749 ⇒ जीरावन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीरावन।)

?अभी अभी # 749 ⇒ आलेख – जीरावन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन है मधुवन ! मैं कभी मधुवन गया नहीं। बचपन में मेरी अधिकतर जानकारी सोच पर ही आधारित होती थी। बालमन सोचता था, जहां अधिक मधु होगा, उसे मधुवन कहते होंगे। जहां आग होती है, वहां धुआं होता है, जहां मधु होता है, वहां मधुमक्खी भी होती ही होगी।

जब मैं मधुवन में राधिका नाचे रे, वाला गीत सुनता था, तब मुझे चिंता हो जाती थी कि कहीं राधिका के नाचने से अथवा गिरधर की मुरलिया के बजने से कोई मधुमक्खी मगन होने के बजाय विचलित ना हो जाए। समय के साथ मेरा ढाई आखर का ज्ञान विकसित होता चला गया और मैं मधुवन का सही अर्थ भी जान गया। फूल, पराग और खुशबू वाला भी मधुवन ही होता है। अब यह गीत मैं आराम से रस लेकर सुनता हूं। मेरे पास मधुमक्खी तो क्या, कोई मक्खी भी नहीं फटकती।।

बचपन से हम नमक और मिर्ची का नाम तो सुनते आ रहे थे, बोर, जाम, जामुन में नमक मिर्ची लगाते भी आ रहे थे। मां की मसालदानी में जीरा भी होता था, जो बघार में भी डाला जाता था, लेकिन जीरे की उत्पत्ति के बारे में इतना ज्ञान नहीं था। चने के खेत जैसा कोई गीत जीरे के बारे में हमने नहीं सुना।

जब मधुवन की तरह ही जब हमने जीरावन शब्द सुना तो हमें यही लगा, जीरे के वन की ही शायद जीरावन कहते हों। आप चाहें तो कह सकते हैं, बंदर क्या जाने जीरावन का स्वाद। लेकिन जब एक बार जीरावन का स्वाद मुंह को क्या लगा, हमें इस शब्द का वास्तविक अर्थ भी पता चल गया। जीरा क्या जी, सभी स्वादिष्ट चटपटे मसालों का वन है जीरावन।।

घर में अचार नहीं हो, नींबू नहीं हो, सब्जी नहीं हो, कोई चिंता नहीं। बस अगर घर में जीरावन हो तो काम बन जाता है। वैसे पसंद अपनी अपनी। हमें ना तो कोई गरम मसाला रास आता, और ना ही कोई चाट मसाला। जीरावन में गुण भी बहुत है, और स्वाद भी।

भले ही हींग और फिटकरी में कोई सांठगांठ हो, लेकिन रसोई में तो हींग जीरे का ही राज होता है। जीरे की खेती मुख्य रूप से गुजरात के ऊंझा क्षेत्र में और राजस्थान में ही अधिक होती है। और जहां तक जीरावन का सवाल है, आपको आश्चर्य होगा, राजस्थान का प्रतापगढ़ जीरावन का गढ़ है।।

जीरावन में वैसे कोई हीरे मोती तो जड़े नहीं होते। बस जीरा, सूखा धनिया, काला नमक, लाल मिर्ची, हींग और अमचूर ही तो होता है। आप चाहें तो घर में भी बना लें। वैसे जैनियों की दादावाड़ी में कहीं कहीं आपको केसर के साथ जीरावन भी नज़र आ जाएगा।

सात्विक आहार के भी अपने ठाठ हैं। उसे भी राजसी और तामसी बनाने के तरीके हमें आते हैं।

वैसे भी प्याज लहसुन नहीं होने के बावजूद यह स्वादिष्ट है। हमारा तो घर में ही, जीवन है मधुवन, क्योंकि हमारे पास है, नंबर वन जीरावन।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 141 – देश-परदेश – जंग, मोहब्बत और तिजारत में सब जायज़ है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 141 ☆ देश-परदेश – जंग, मोहब्बत और तिजारत में सब जायज़ है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

पुरानी कहावत हुआ करती थी, कि प्यार और युद्ध में सब चलता हैं। इसमें कुछ समय से व्यापार भी जुड़ गया हैं। वो समय और था, जब व्यापार में नैतिकता पर ज़ोर रहता था।

बचपन में एक कहानी सुनी थी, कि एक व्यक्ति दस रुपए में तोता बेच रहा था, जबकि अन्य लोग बीस रुपए में तोता बेच रहे थे। दस रुपए में तोता बेचने वाला पक्षी का पिंजरा बहुत महंगा बेच रहा था। बिना पिंजरे के तोता तो खरीदा नहीं जा सकता हैं। कुल मिला कर सस्ते तोता बेचने वाला अधिक लाभ कमा रहा हैं।

सत्तर के दशक में सरकारी राशन की दुकान पर सस्ती चीनी की बिक्री होती थी। राशन विक्रेता चीनी की बिक्री के साथ गेहूं भी जबरदस्ती बेचता था।

आज भी हमारे मोहल्ले में सरकारी डेयरी का दूध विक्रेता इस बात से नाराज़ रहता है, कि ब्रेड, मक्खन आदि दूसरी दुकान से क्यों खरीदते हो? जबकि  दूध कियोस्क से अन्य सामान बेचना अनधिकृत हैं।

उपभोक्ता हमेशा किसी ना किसी रूप में दबाया जाता रहा हैं। कस्टमर हमेशा कष्ट से ही मरता हैं। देश में उपभोक्ता सरंक्षण के लिए बहुत सारी संस्थाएं कार्य कर रही हैं। इसके बावजूद भी ग्राहक कहीं ना कहीं मात खाता हैं।

विश्व व्यापार में भी बहुत सारी संस्थाएं हैं। मुक्त व्यापार से लेकर भुगतान के लिए अनेक देशों ने नए नए समूह भी बनाएं गए हैं। MRTP नियम भी बनाया गया हैं।इन सब के होते हुए आज भी  तीसरी दुनिया देशों के हित सुरक्षित नहीं हैं।

बड़े देश बस हथियार, और विमान बनाकर अपना साम्राज्य चलाते हैं। छोटे देशों से कपड़े, घरेलू सामान आदि खरीदते हैं। विश्व व्यापार में  कुछ देश स्वयंभू नेतागिरी भी करते है, अपने निजी हितों को साधते हुए अन्य देशों को अपने प्रभाव से तंग करने में लगें रहते हैं।

टीप : इस आलेख का वर्तमान में “पूंजीपति देशों के सिरमौर” द्वारा नए टैरिफ नियम लागू करने से कोई दूर दूर तक सम्बन्ध नहीं हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 748 ⇒ कान, नाक, और गला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कान, नाक, और गला।)

?अभी अभी # 748 ⇒ आलेख – कान, नाक, और गला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(EAR, NOSE & THROAT)

हमारे शरीर के जितने भाग हैं, चिकित्सा की दुनिया में उसके उतने ही विभाग हैं। हर परिवार का एक चेहरा होता है, हमारे चेहरे का भी एक परिवार है, जहां निगरानी के लिए अगर आँखें हैं, तो सुनने, साँस लेने और गले मिलने के लिए कान, नाक और एक गला है। आँख के लिए अगर अलग से आई स्पेशलिस्ट है तो नाक, कान और गले, तीनों का भार, बेचारे अकेले ENT विशेषज्ञ पर है। अजीब सरकार है हमारी एनाटॉमी और फिजियोलॉजी की ! शरीर में ही पूरा मेडिकल कॉलेज खोल रखा है। नाक के नीचे मुंह है, जिसमें बत्तीस दांत हैं, अगर दांत में दर्द है तो यह मामला दंत विभाग का है, E N T का नहीं ! दंत विशेषज्ञ की सेवाएं लीजिए। सॉरी आंटी।

पर्दा आँख में भी होता है, और कान में भी। आँख के पर्दे को रेटीना और कान के पर्दे को ear drum कहते हैं। वैसे पर्दे घरों में, खिड़की दरवाजों में भी होते हैं। कोई पर्दे के पीछे से देखता है, तो कोई पर्दे के पीछे से सुनता है। दीवारों के भी जब कान हो सकते हैं, तो क्या कान के पर्दे नहीं हो सकते। जितना महत्व आंख के परदे का है, उतना ही महत्व कान के परदे का है। अधिक आवाज से कान के पर्दे फटने का अंदेशा रहता है।।

कान सुनने के लिए बने हैं और नाक सूंघने और साँस लेने के लिए। गला हमें धड़ से जोड़ता है। E N T यानी कान, नाक और गले को आप शरीर का 3BHK अपार्टमेंट भी कह सकते हैं, क्योंकि अंदर से ये तीनों अंग आपस में मिले हुए हैं। सर्दी जुकाम हुआ, तो गला भी खराब होना ही है। कान का दर्द भी किसी सरदर्द से कम नहीं। सरदर्द की तो कई गोलियाँ हैं, झंडू बाम है, कान के दर्द का इलाज या तो दादी मां के पास है या फिर किसी E N T के पास।

इस बार हमने कोरोना को मुंह नहीं लगाया। बार बार हाथ धोए, सैनिटाइज किया, गले का विशेष खयाल रखा। हल्दी, नमक और गिलोय हमारी संजीवनी बूटी रहे। मुंह पर मास्क रहा, हम जब भी घर से बाहर रहे। सोचिए, अगर हमारी नाक और कान नहीं होते तो कितनी परेशानी होती। नाक पर मक्खी ही नहीं, मास्क भी टिकता है और चश्मा भी। चश्मा चढ़ता तो आँख पर है, लेकिन उसको सहारा नाक और कान ही देते हैं। कुछ लोग आज भी कान पर जनेऊ चढ़ाते हैं।

श्रृंगार के क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रिय विभाग कान, नाक और गला ही है।

दांत के दर्द में अगर लौंग रामबाण नुस्खा है, तो महिलाओं की नाक पर भी लौंग विराजमान होती है। कहीं कहीं इसे नथ भी कहा जाता है। कान नहीं होते तो कर्ण श्रृंगार कैसे होता। झुमका बरैली वाला हो या कान के टॉप्स अथवा इयररिंग, कान, सुनसान अच्छा नहीं लगता। श्रृंगार में क्या कभी गला पीछे रहा है।

हीरे मोतियों की माला हो, मंगलसूत्र हो अथवा नौलखा हार, नारियों की पसंद का उपहार, हार ही तो होता है। प्रेयसी हो या पत्नी, दिल जीतने के लिए गले के हार से बेहतर कोई विकल्प नहीं।

हम कभी कान के कच्चे ना हों, कभी हमारी नाक नीची ना हो, गला सुरीला हो, नाक, कान और गले की बीमारियों से अपना बचाव करते हुए, अच्छा संगीत सुनें, अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध और सुगंधित बनाए रखें। गला काट स्पर्धा से दूर रहें। सबका हो भला, हमेशा निरोग रहे, कान, नाक गला।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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