गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ सुसज्जित फूल ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
स्त्रियों की वजूद बिलकुल गेदें के फूल के हिसाब जैसा है, वक़्त पड़े तो औषधि बन जाती हैं तो कभी साज्ज सज्जा में लिप्त नज़र आती है। बड़ा मोहक है यह गेंदें का फूल!
‘तोरण बन दरवाजे पर लटक के लक्ष्मी आगमन की सुगंध बन बिखर जाती हैं तो कभी शिव के थाली में सुज्जित होकर मंदिरों में चढ़ जाती हैं।
अक्सर आसानी से खिल जाता यह गेंदें का फूल। मिट्टी ही तो चाहिए इसे पनपने के लिए और थोडी सी देखभाल फिर आंगन में खडी़ खुद ही सबकों मोहित कर देता है यह गेंदें का फूल।
भींगी भींगी खुशबु से परिपूर्ण पीले रंग की अत्यंत मनभावन किंतु भावनाओं से परिपूर्ण होती है ।
कहते हैं, गेंदें का फूल जहाँ खिलाता हैं वहां खुशियाँ इक़ट्ठा करती तभी तो तस्वीर या दरवाजे पे बैठीं पुरनिया स्त्री नज़र कवच सा बन लिपटी मोह माया के धागों से पिरोने के बाद अथाह अपनत्व के पीड़ा में डूबीं केवल संवेदना को छुपाई मौन नज़र आती है लेकिन कमब्खत उफ्फ्फ तक नहीं करतीं ।
गेंदें के इस फूल को आंगन में लाने के बाद पुरुषों ने मन के हिसाब से उपयोग किया क्योंकि गुलाब की तरह उसनें मुहब्बत की मांग जो नहीं रखीं बस ताउम्र मौन उपलब्धि दर्ज करातीं अपने भाग्य के भरोसे बैठीं थोड़ी सी मिट्टीसे परिपूर्णता दर्शाती रही।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना…“।)
अभी अभी # 747 ⇒ आलेख – ∆ घराना ∆ श्री प्रदीप शर्मा
मेरा नाम राजू, घराना अनाम,
बहतीहै गंगा, जहां मेरा धाम …
लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।
घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।
नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।
भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।
घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।
इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।
सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।
जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;
१. मेवाती घराना पंडित जसराज
२.पटियाला घराना; उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना
३. जयपुर अंतरौली घराना ; मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।
४. भीमसेन जोशी किराना घराना,
५. आगरा घराना जितेंद्र अभिषेकी
इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती। ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।
धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 300 ☆ शिवोऽहम्…(3)
निर्वाण षटकम् का हर शब्द मनुष्य के अस्तित्व पर हुए सारे अनुसंधानों से आगे की यात्रा कराता है। इसका सार मनुष्य को स्थूल और सूक्ष्म की अवधारणा के परे ले जाकर ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता है जहाँ ओर से छोर तक केवल शुद्ध चैतन्य है। वस्तुत: लौकिक अनुभूति की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से निर्वाण षटकम् जन्म लेता है।
तृतीय श्लोक के रूप में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का परिचय और विस्तृत होता है-
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।3।।
अर्थात न मुझे द्वेष है, न ही अनुराग। न मुझे लोभ है, न ही मोह। न मुझे अहंकार है, न ही मत्सर या ईर्ष्या की भावना। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से परे हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।
राग मनुष्य को बाँधता है जबकि द्वेष दूरियाँ उत्पन्न करता है। राग-द्वेष चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र है। अनेक लोग, समान और विपरीत ध्रुवों के निकट आने से उपजने वाले क्रमश: विकर्षण और आकर्षण तक ही अपना जीवन सीमित कर लेते हैं। यह मनुष्य की क्षमताओं की शोकांतिका है।
इसी तरह मोह ऐसा खूँटा होता है जिससे मनुष्य पहले स्वयं को बाँधता है और फिर मोह मनुष्य को बाँध लेता है। लोभ मनुष्य को सीढ़ी दर सीढ़ी मनुष्यता से नीचे उतारता जाता है। इनसे मुक्त हो पाना लौकिक से अलौकिक होने, तमो गुण से वाया रजो गुण, वाया सतो गुण, गुणातीत होने की यात्रा है।
एक दृष्टांत स्मरण हो आ रहा है। संन्यासी गुरुजी का एक नया-नया शिष्य बना। गुरुजी दैनिक भ्रमण पर निकलते तो उसे भी साथ रखते। कोई न कोई शिक्षा भी देते। आज भी मार्ग में गुरुजी शिष्य को अपरिग्रह की शिक्षा देते चल रहे थे। संन्यास और संचय का विरोधाभास समझा रहे थे। तभी शिष्य ने देखा कि गुरुजी एक छोटे-से गड्ढे के पास रुक गये, मानो गड्ढे में कुछ देख लिया हो। अब गुरुजी ने हाथ से मिट्टी उठा-उठाकर उस गड्ढे को भरना शुरू कर दिया। शिष्य ने झाँककर देखा तो पाया कि गड्ढे में कुछ स्वर्णमुद्राएँ पड़ी हैं और गुरुजी उन्हें मिट्टी से दबा रहे हैं। शिष्य के मन में विचार उठा कि अपरिग्रह की शिक्षा देनेवाले गुरुजी के मन में स्वर्णमुद्राओं को सुरक्षित रखने का विचार क्यों उठा? शिष्य का प्रश्न गुरुजी पढ़ चुके थे। हँसकर बोले, “पीछे आनेवाले किसी पथिक का मन न डोल जाए, इसलिए मैं मिट्टी पर मिट्टी डाल रहा हूँ।”
मिट्टी पर मिट्टी डालने की लौकिक गतिविधि में निहितार्थ गुणातीत होने की अलौकिकता है।
गतिविधि के संदर्भ में देखें तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से हर पुरुषार्थ की विवेचना अनेक खंडों के कम से कम एक ग्रंथ की मांग करती है। यदि इनके प्रचलित सामान्य अर्थ तक ही सीमित रहकर भी विचार करें तो धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की लालसा न करना याने इन सब से ऊपर उठकर भीतर विशुद्ध भाव जगना। ‘विशुद्ध’, शब्द लिखना क्षण भर का काम है, विशुद्ध होना जन्म-जन्मांतर की तपस्या का परिणाम है।
परिणाम कहता है कि तुम अनादि हो पर आदि होकर रह जाते हो। तुम अनंत हो पर अपने अंत का साधन स्वयं जुटाते हो। तुम असीम हो पर तन और मन की सीमाओं में बँधे रहना चाहते हो। तुम असंतोष और क्षोभ ओढ़ते हो जबकि तुम परम आनंद हो।
राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सब से हटकर अपने अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करो। तुम अनुभव करोगे अपना अनादि रूप, अनुभूति होगी अंतर्निहित ईश्वरीय अंश की, अपने भीतर के चेतन तत्व की। तब शव होने की आशंका समाप्त होने लगेगी, बचेगी केवल संभावना, जो प्रति पल कहेगी ‘शिवोऽहम्।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नि गु रा…“।)
अभी अभी # 746 ⇒ आलेख – नि गु रा श्री प्रदीप शर्मा
गुरु बिन कौन करे भव पारा !
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ..
हमारे देश में आदमी अनपढ़, अशिक्षित रह सकता है, लेकिन बिना गुरु के नहीं रह सकता। इतने जगतगुरु, साधु संत, महात्मा, शिक्षक, प्रोफेसर,
विद्वान, आचार्य, ज्योतिष, योग, आर्युवेद, महंत, और महामंडलेश्वर के रहते, भला कोई निगुरा कैसे रह सकता है। जिस देश में लोगों का तकिया कलाम ही गुरु हो, कोई महागुरु और कोई गुरु घंटाल हो, वहां गुरुओं की क्या कमी। गुरु, इसी बात पर ठोको ताली।
गुरु से बचना इतना आसान भी नहीं ! पहले गुरु तो माता पिता ही होते हैं। अब आप अजन्मे तो नहीं रह सकते। आप पालने में पड़े हो और किसी ज्योतिष गुरु ने आपका नामकरण भी कर दिया। घर में भवानीप्रसाद, और ज्वालाप्रसाद तो पहले से ही मौजूद थे, आप हो गए गुरुप्रसाद। लाड़ प्यार में नाम बनता बिगड़ता रहता है, किसी के लिए गुड्डू, तो किसी के लिए गुल्लू। गुरु कृपा से अच्छे पढ़ लिख लिए, तो बड़े होकर कॉलेज में आप प्रोफेसर जी.पी.दुबे कहलाने लगे। यथा नाम तथा गुण।।
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊँ ! द्रोणाचार्य और शुक्राचार्य। मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, या फिर निगुरा ही रह जाऊँ। जो आपको जीवन के गुर सिखलाए, वह गुरु। वैसे भी गुरु को तो गुड़ ही रहना है, शक्कर तो चेले ही बनते हैं। जीवन में मिठास जरूरी है। या तो गुड़ बन जाएं, या फिर शक्कर। वैसे आप गुरु करें ना करें, आपकी मर्जी। लेकिन किसी ज्योतिष गुरु के कहने पर गुरुवार करने में क्या हर्ज है। जिन लोगों का गुरु कमज़ोर होता है, वे किसी उस्ताद की शरण में जाते हैं। गुरुवार तो वैसे भी हर हफ्ते आता ही रहेगा।
एक समय था, जब शहर में हर गुरुवार को सिनेमा घरों में नई पिक्चर लगती थी। व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखते थे। गुरुवार अब भी आता है, लेकिन क्या करें, सिनेमागृहों की गृह दशा ही खराब चल रही है। व्यापारी भी गुरुवार की जगह संडे मनाने लग गए।।
संत कबीर बड़े ज्ञानी थे, गुरु ग्रंथ साहब तक में उनका जिक्र है, फिर भी वे निगुरे नहीं रह सके। उन्हें भी गुरु रामानंद की शरण में जाना ही पड़ा। दत्तात्रय तो भगवान थे, लेकिन उनके भी एक दो नहीं चौबीस गुरु थे। उन्हें सृष्टि के जिस जीव में गुण नजर आते, वे उसे गुरु रूप में स्वीकार कर लेते। जो हमें सीख दे, वही गुरु, वही शिक्षक और वही सदगुरु। अगर हम अपना सबक ठीक से याद नहीं करें, तो इसमें गुरु का क्या दोष।
आखिर गुरु को बाहर क्यूं ढूंढा जाए जब हमारे अंदर ही ब्रह्मांड समाया हुआ है। और लोग अंतर्गुरु तलाशने पहले ओशो, कृष्णमूर्ति और महर्षि रमण की शरण में गए लेकिन जब बात नहीं बनी तो जग्गी वासुदेव का दामन थाम लिया। श्री श्रीरविशंकर और योगगुरु बाबा रामदेव अपने अपने सुदर्शन चक्र चला ही रहे हैं, बचकर कहां जाओगे।।
एक तरफ कुआं, एक तरफ खाई ! इन निगुरों के बीच यह वामपंथी कहां से आ टपका भाई ? ब्रिटिश चैनल से बड़ी हमारे देश में आस्था और संस्कार की चैनल है। यहां 24 x 7 संत महात्माओं, साधुओं और परम हंसों का जमघट लगा रहता है। चित्रकूट के घाट से कम नहीं यह सत्संग और स्वाध्याय की चौपाटी। रामकथा, भागवत और शिव पुराण। कभी मोरारी बापू तो कभी रमेश भाई ओझा। दान पुण्य और गऊ सेवा का पुण्य अलग।
जो भी भक्त है, उसका अपना भगवान है। शिष्य का अपना गुरु है। बाकी सब स्वयं ही गुरु हैं। अहं ब्रह्मास्मि ! बस इस देश में वामपंथी ही निगुरे हैं। निगुरे नहीं, विश्व गुरु हैं हम।।
☆ स्मृति शेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध.. गीता को जीते हुये, बिदा हुए साहित्यकार☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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(गुरुवर स्मृति शेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी द्वारा ई–अभिव्यक्ति में सतत ‘काव्य धारा’ साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से अब तक २३२ रचनाएँ प्रकाशित की जा चुकी हैं. उनके सुपुत्र श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, सम्पादक ई-अभिव्यक्ति (हिंदी) के सहयोग से इस स्तम्भ को अगले सप्ताह से पुनः प्रारम्भ करने का मानस है.)
भगवत गीता के उनके द्वारा किये गये हिन्दी काव्य अनुवाद का पांचवा संस्करण प्रकाशित हुआ है. महाकवि कालिदास के रघुवंश, मेघदूत का भी उन्होने हिन्दी में श्लोकशः अनुवाद कर इन अप्रतिम ग्रंथो को संस्कृत न जानने वाले पाठको के लिये भी काव्य के उसी सौंदर्य के संग सुलभ कर दिया है. वे एक सिद्धांतो के पक्के, अपनी धुन में रमें हुये सहज सरल व्यक्ति थे.
जन्म… मण्डला में गौड़ राजाओ के दीवानी कार्यो हेतु मूलतः मुगलसराय के पास सिकंदरसराय से मण्डला आये हुये कायस्थ परिवार में प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” का जन्म सन १९२७ में हुआ था. उन्होंने विकास के बड़े लम्बे आयाम देखे हैं, मण्डला में ही नेरो गेज से ब्राड गेज रेल्वे के वे साक्षी हैं. आज वे दुबई, श्रीलंका, आदि हवाई विदेश यात्रायें कर रहे हैं और कहां उन्होने लालटेन की रोशनी में पढ़ा, पढ़ाया है. स्वतंत्रता के आंदोलन में छात्र जीवन में सहभागिता की है. मण्डला के अमर शहीद उदय चंद जैन उनकी ही डेस्क पर बैठने वाले उनके सहपाठी थे..
व्यवसाय… वे केंद्रीय विद्यालय क्रमांक १ जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य रहे. शिक्षा विभाग में दीर्घ कालीन सेवाये देते हुये प्रांतीय शासकीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत हुये. उस पुराने जमाने में उनका विवाह लखनऊ में हुआ था. इतनी दूर शादी, मण्डला जैसे पिछड़े क्षेत्र में सहज बात नही थी. फिर पत्नी ने नौकरी भी की. यह तो मुहल्ले के लिये अजूबा ही रहा होगा.
साहित्य सेवा… १९४८ में सरस्वती पत्रिका में उन की पहली रचना प्रकाशित हुई. निरंतर पत्र पत्रिकाओ में कविताये, लेख, छपते रहे हैं. आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण होते रहे हैं. दूरदर्शन भोपाल ने “एक व्यक्तित्व ऐसा ” नाम से उन पर फ़िल्म बनाई है । दिल्ली से ट्रू मीडिया ने उन पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित किया।
पुस्तकें… ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा, मुक्तक संग्रह, अंतर्ध्वनि, समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, शिक्षण में नवाचार मानस के मोती, अनुभूति, रघुवंश हिंदी भावानुवाद, भगवत गीता हिंदी काव्य अनुवाद, मेघदूतम, शब्दधारा आदि साहित्यिक व शैक्षिक ४० से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.
वे संस्कृत से हिन्दी भावानुवाद के मर्मज्ञ थे. महाकवि कालिदास के अमर प्रेम काव्य मेघदूत के सारे श्लोक उन्होने यथा भाव छंद बद्ध हिन्दी कविता में रचे जो पुस्तक रूप में प्रकाशित हैं. इसी तरह कालिदास कृत रघुवंशम के समस्त १९०० श्लोको का श्रमसाध्य छंद बद्ध हिन्दी अनुवाद भी उन्होने किया है यह भी पुस्तक रूप में सुलभ है. देशबन्धु समाचार पत्र ने इसे तथा उनके द्वारा अनुवादित भगवत गीता को धारावाहिक रूप से प्रकाशित भी किया है.
वे बाल साहित्य व राष्ट्रीय भावधारा की कविताओ के साथ ही भक्ति गीतों, समसामयिक घटनाओ पर त्वरित कविताओ और हिन्दी गजलो के लिये भी पहचाने जाते थे.
उनकी अनेकानेक कविताओ में से दो एक यहाँ उधृत हैं….
बाल साहित्य…
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भारत हमें है प्यारा यह देश है हमारा
हम इसकी करें सेवा इसका हमें सहारा
इसकी जमीन मां की गोदी सी है सुहानी
फल अन्न इसके मीठे अमृत सा इसका पानी
इस भूमि पर ही कभी राम कृष्ण आए
गुणगान जिनके अब तक जाते सदा सुनाएं
यहां देवगिरी हिमालय सरिता पुनीत गंगा
इनकी यशों की गाथा गाता है नित तिरंगा
या
राष्ट्रीय भाव धारा की रचना…
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हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥
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प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥
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ज्ञानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
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भक्ति रचनायें…
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दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो
मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो
मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है
नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला
हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है
जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं
जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
या
शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
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हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !
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सुविकसित विज्ञान ने तो की सुखों की सर्जना
बंद हो पाई न अब भी पर बमों की गर्जना
रक्त रंजित धरा पर फैला धुआं और और ध्वंस है
बचा मृग मारिचिका से, मनुज को माँ प्यार दे
थक गया चल विश्व, झुलसाती तपन की धूप में
हृदय को माँ ! पूर्णिमा सा, मधु भरा संसार दे
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उनके हिन्दी गीत देखें…
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शारदी चांदनी सा धुला मन, जब पपीहा सा तुमको पुकारे
सावनी घन घटा से उमड़ते, स्वप्न से तुम यहां चले आना
प्राण के तार खुद झनझना के, याद की वीथिका खोल देंगे
नैन मन की मिली योजना से, चित्र सब कुछ स्वतः बोल देंगे
बात करते स्वतः बावरे से, प्रेम रंग में रंगे सांवरे से
वीण से गीत गुनगुनाते, स्वप्न से तुम यहां चले आना
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हिन्दी गजल…
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तुम्हारे संग जिये जो दिन भुलाये जा नहीं सकते
मगर मुश्किल तो ये है फिर से पाये जा नहीं सकते
कदम हर एक चलके साथ तुमने जो निभाया था
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दुखी मन से किसी को वे बताये जा नहीं सकते
चले हम राह में जब धूप थी तपती दोपहरी थी
सहे लू के थपेडे जो गिनाये जा नही सकते
लगाये ध्यान पढते पुस्तकें रातें बिताई गई
दुखद किस्से परिश्रम के सुनाये जा नहीं सकते
तुम्हारे नेह के व्यवहार फिर फिर याद आते है
दुखाकुल मन से जो सबको बताये जा नही सकते
बसी हैं कई प्रंसगो की सजल यादें नयन मन में
चटक हैं चित्र ऐसे जो मिटाये जा नही सकते
पर्यावरण, साफ सफाई अभियान, शिक्षा, रानी दुर्गावती, महाराणा प्रताप, सरदार पटेल, माँ नर्मदा, लगभग हर विषय पर उन्होने बड़ी प्रभावी गीत रचनायें की है.
गद्य पर भी उनका समान अधिकार है. उन्होने विविध विषयों पर ललित निबंध, चिंतन, मानस विषयक, स्त्री विमर्श व शैक्षिक शोध आलेख खूब लिखे हैं.
उनके दो एक आलेखों के उधृत अंश देखिये…
“धन सदा सुखदायी ही नहीं होता. अनुचित साधनों से धन की प्राप्ति नये संकट ले आती है. सुख सचमुच में धन प्राप्ति के लिए अंधी दौड़ में नहीं, प्रेम के निश्छल आदान-प्रदान में है. सहयोग और ईमानदारी में सुख के बीज छिपे होते हैं। परन्तु इस सचाई को भुलाकर नवीनता की चका-चौंध में जो गलत प्रयत्न धन पाने के लिए अपनाएँ जा रहे हैं उन्होंने जीवन की कठिनाइयाँ बढ़ा दी है। भारतीय संस्कृति में तप और त्याग का धार्मिक महत्व रहा है। इसी पवित्र भावना ने समाज को बाँधे रखा है और मन को बेलगाम होकर दौडऩे से रोके रखा है। किन्तु आज अन्य सभ्यताओं की देखा देखी भारतीय संस्कारों को तिलांजलि देकर लोगों ने बाह्य आकर्षणों में सुख की साध पाल ली है इससे ही समाज का नैतिक पतन हो रहा है. यदि हमें अपने देश को फिर से नैतिक रूप से स्वस्थ और समृद्ध बनाना है तो भारत भूमि की ही जलवायु की उपासना करनी होगी और युग की नवीनता को अपने कार्यक्रमों में उचित रूप से समायोजित करना होगा । बिना सदाचरण, निष्ठा और नैतिकता को अपनायें जीवन में वास्तविक सुख-शांति और समृद्धि असंभव है।”
या
जिसमें आत्मविश्वास प्रबल है उसकी विजय प्राय: सुनिश्चित होती है। कोई भी कार्य छोटा हो या बड़ा, सरल हो या कठिन काम करने वाले के मन में सफलता पाने का आत्मविश्वास होना बहुत जरूरी है। विश्व इतिहास के पन्ने, आत्मविश्वासी की विजयों से भरे पड़े हैं। क्षेत्र राजनीति का हो या विज्ञान का, व्यक्ति के आत्मविश्वास ने समस्याओं का सदा समाधान कराया है। चन्द्रगुप्त के आत्मविश्वास ने भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट की हर जीत का रहस्य उस का आत्मविश्वास ही था। विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी नये आविष्कार के लिये वैज्ञानिकों की लगन, परिश्रम और सूझबूझ के साथ ही उनके आत्मविश्वास और धैर्य के बल पर ही सफलता प्राप्त होती है। आत्मविश्वासी वीरों ने ही हिमालय की सर्वोच्च ऊंची चोटी गौरीशंकर जिसे एवरेस्ट भी कहा जाता है तक पहुंचकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया है। आत्मविश्वास व्यक्ति को निडर, उत्साही और धैर्यवान बनाता है।
या
“नैतिक, चरित्रवान, कर्मनिष्ठ समाज तैयार करने के लिये सही शिक्षा की आवश्यकता है. शालाओं और परिवार दोनो की बच्चो में सही गुणो के विकास की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है. वर्तमान में जो आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियां हैं वे इस दिशा में परिवर्तन चाहती हैं. सबके सही व्यक्तित्व के निर्माण की आवश्यकता है. राष्ट्रीय चरित्र में इसी से स्थाई सुधार संभव होगा. आत्म अनुशासन ही समाज में स्थाई सुख और शांति का श्रोत है. समाज में नैतिकता का सम्मान अतिआवश्यक है, और यह सब ऐसे बाल साहित्य की जरूरत प्रतिपादित करता है जो शिशु शिक्षा से प्रारंभ व्यक्तित्व निर्माण, किशोर, युवा, व इस तरह एक आत्म अनुशासित पीढ़ी का विकास कर सके.”
वे अपने परिवेश में सदैव साहित्यिक वातावरण सृजित करते रहे, जिस भी संस्थान में रहे वहां शैक्षणिक पत्रिका प्रकाशन, संपादन व साहित्यिक आयोजन करवाते रहे. उन्होने संस्कृत के व हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा, तथा बुल्ढ़ाना संस्कृत साहित्य मण्डल के साथ बहुत कार्य किये. अनेक पुस्तकालयो में लाखो की किताबें उन्होंने दान में दिया था.
गुप्त दान की अभिरुचि… प्रधानमंत्री सहायता कोष, उदयपुर के नारायण सेवा, तारांशु व अन्य संस्थानो में घर के किसी सदस्य की किसी उपलब्धि, जन्मदिन आदि मौको पर नियमित चुपचाप दान राशि भेजने में उन्हें अच्छा लगता है. वे आडम्बर से दूर सरस्वती के मौन साधक कर्मवीर हैं. वे गीता को जीते थे.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आलेख – मोहर और गुलमोहर…“।)
अभी अभी # 745 ⇒ आलेख – मोहर और गुलमोहर श्री प्रदीप शर्मा
खूबसूरती की कोई कीमत नहीं होती। फिर भी जब हम किसी गुलमोहर के पेड़ को देखते हैं तो लगता है इसकी सुन्दरता प्रकृति पर अपनी मोहर लगा रही है।
इंसान जब लाल पीला होता है, तब उसकी प्रकृति बड़ी विचित्र हो जाती है और जब प्रकृति लाल पीली होती है तो कभी गुलमोहर में, तो कभी अमलतास में बहार आ जाती है।
गुलशन अगर गुलमोहर और अमलतास से गुलजार है तो हमारी दुनिया में भी अशर्फी, मोहर और स्वर्ण मुद्रा की बहार है। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। लेकिन जितने रंग इंसान बदलता है, उतने कुदरत नहीं बदलती। पतझड़, सावन, वसंत बहार से जब इंसान का मन नहीं भरा तो उसने एक मौसम प्यार का भी ढूंढ लिया। और उसकी नीयत और नियति देखिए, वह पैसे से ही प्यार करने लगा।।
आज जिसे हम पैसा कहते हैं, वही कभी स्वर्ण मुद्रा कहलाता था तो कभी अशर्फी। हमने तो मोहरें भी नहीं देखी, सोने के सिक्के तो छोड़िए, चांदी के चंद सिक्कों के लिए हमने अपना ईमान तक बेच दिया। गुलमोहर आज भी शान से खड़ा है, अशर्फी और मोहर ने घुटने टेक दिए।
स्वर्ण मुद्रा छूट जाए, अशर्फी मोहर भले ही छूट जाए, लेकिन इंसान का मोह कभी नहीं छूटे।
जो कभी मोहर थी, समय के साथ वह रबर की मोहर बन गई। कानूनी कागजातों पर हस्ताक्षर के साथ रबर की मोहर भी लगने लगी। जहां कभी टकसाल में सोने चांदी के सिक्के ढले जाते थे, उसकी जगह, अब जगह जगह रबर की मोहरों का कारखाना खुलने लगा। रबर स्टांप को वह अधिकार प्राप्त हो गया, जो कभी सोने की मोहरों को था। एक कागज के टुकड़े पर लगी मोहर, लाखों करोड़ों की अफरा तफरी करने लगी। जब जागीर ही चली गई तो कहां सोना चांदी, मोहर अशर्फी और जेवरात। वक्त वक्त की बात।।
मोहर, यानी पद और पैसे के लालच में इंसान को रबर स्टांप अथवा किसी का मोहरा बनने से कोई परहेज नहीं होता। आज हमारे आसपास मोहरे ही मोहरे हैं। कुछ रबर स्टांप तो कुछ जीते जागते शतरंज के मोहरे। राजनीति कहें अथवा सियासत यहां जितना रबर स्टांप जरूरी होता है उतना ही अपने हिसाब से चाल चलने वाला मोहरा।
एक सोने की मोहर कब पहले रबर की मोहर बनी और इंसान कब किसी का मोहरा, पता ही नहीं चला। प्रकृति नहीं बदली, अमलतास गुलमोहर नहीं बदला, लेकिन लाल, हरे, पीले, नीले नोटों ने इंसान को बदल डाला।
मोहर से किसी का मोहरा बना इंसान आगे, कब क्या बन जाए, कहना मुश्किल है।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिकायतें नहीं वाज़िब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 286 ☆
☆ शिकायतें नहीं वाज़िब… ☆
न जाने कौन सी शिकायतों का हम शिकार हो गये/ जितना दिल साफ रखा, उतने हम गुनहगार हो गये–गुलज़ार की यह पंक्तियाँ हमें जीवन के कटु सत्य से अवगत कराती हैं। मानव जितना छल-कपट, राग-द्वेष व स्व-पर से दूर रहेगा, लोग उसे मूर्ख समझेंगे; अकारण दोषारोपण करेंगे और उसका उपहास करेंगे–जिसका मूल कारण है आत्मकेंद्रिता का भाव अर्थात् स्व में स्थित रहना और बाह्याडंबरों में लीन न होना तथा अपने से इतर व्यर्थ की बातों का चिंतन-मनन न करना। ऐसा इंसान दुनियादारी से दूर रहता है, मानव निर्मित कायदे-कानूनों की परवाह नहीं करता तथा प्रचलित परंपराओं, मान्यताओं व अंधविश्वासों में लिप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति से लोगों को बहुत-सी शिकायतें रहती हैं, जिससे उसका दूर का नाता भी नहीं होता।
वैसे भी आजकल लोग शुक्रिया कम, शिकायतें अधिक करते हैं। वैसे तो यही दुनिया का दस्तूर है। शिकायत करने से अहम् का पोषण होता है और शुक्रिया करते हुए अहम् का विगलन व विसर्जन होता है और दूसरे को महत्ता देने का भाव रहता है, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं होता। शिकायतें न करने से दोनों पक्षों का हित होता है।
शिकायत व निंदा का निकट का संबंध है। शिकायतें आप व्यक्ति के मुख पर करते हैं और निंदा उसके पीछे करते हैं। यदि हम दोनों में भेद करना चाहें, तो शिकायतें निंदा से बेहतर हैं और उनका समाधान भी लभ्य होता है। शायद! इसलिए ही कबीर ने निंदक को अपने समीप रखने का संदेश दिया है, क्योंकि वह आपको आपकी कमियों, दोषों व सीमाओं से अवगत कराता है तथा स्वयं से अधिक अहमियत देता है; अपना अमूल्य समय आपके हित नष्ट करता है। है ना वह आपका सबसे बड़ा हितैषी? चलिए, उसके द्वारा निर्दिष्ट सुझावों पर ध्यान दें।
शिकायतें यदि स्वार्थ हित की जाती है तो उन पर ध्यान ना देना उचित है। यदि वे वाज़िब हैं, तो उसे दूर करने का प्रयास करें। इससे आत्मविश्वास ही नहीं, परहित भी होगा। परंतु यह तभी संभव है, जब आपके हृदय में किसी के प्रति मलिनता का भाव ना हो। उसके लिए आवश्यक है, अपने हृदय को गंगा जल की भांति पावन व निर्मल रखने की। जैसे गंगाजल बरसों तक पवित्र रहता है, उसमें कोई दोष उत्पन्न नहीं होता, हमें भी स्वयं को माया-मोह के बंधनों से मुक्त रखना चाहिए। ‘ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या’ को स्वीकारते हुए मानव शरीर को पानी के बुलबुले की भांति नश्वर, क्षणिक व अस्तित्वहीन स्वीकारना चाहिए और संसार को दो दिन का मेला, जहां मानव को दिव्य खुशी पाने के लिए एकांत में रहना अपेक्षित है, क्योंकि मौन हमें ऊर्जस्वित करता है।
समय नदी की भांति निरंतर गतिशील है तथा प्रकृति पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी आते- जाते रहते हैं। इस संसार में जो भी मिला है, प्रभु का कृपा प्रसाद समझ कर स्वीकारें, क्योंकि सब यहीं छूट जाना है। ‘यह किराए का मकाँ है/ कौन तब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जायेगा।’ वैसे शिकायत अपनों से होती है, गैरों से नहीं, क्योंकि शिकायत का सीधा संबंध निजी स्वार्थ से होता है; दूसरों के हृदय में आपके प्रति ईर्ष्या भाव नहीं होता– क्योंकि उनका आपके साथ गहन संबंध नहीं होता। अपनों की भीड़ में अपनों को तलाशना दुनिया का सबसे कठिनतम कार्य है। अक्सर अपने ही आप पर पीछे से वार करते हैं। इसलिए मानव को यह सीख दी गई है कि ‘पीठ हमेशा पीछे से मज़बूत रखें, क्योंकि शाबाशी और धोखा दोनों पीछे से मिलते हैं।’ जो इंसान दूसरों पर अधिक विश्वास करता है, सबसे अधिक धोखे खाता है।
बहुत कमियाँ निकालते हैं हम, दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात हम उस आईने से भी कर लें’ अर्थात् दूसरों से शिकायतें व दोषारोपण करने से पूर्व आत्मावलोकन करना अत्यंत आवश्यक है। आईना हमें हक़ीक़त से परिचित कराता है, अपने पराये का भेद बताता है/ ज़िंदगी कहाँ रुलाती है हमें/ रुलाते तो वे लोग हैं/ जिन्हें हम अपनी/ ज़िंदगी समझ बैठते हैं। वैसे भी सुक़ून बाहर से नहीं मिलता, इंसान के अंतर्मन में बसता है। बाहर ढूंढने पर तो उलझनें ही मिलेंगी। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/ बेवजह न किसी से ग़िला कीजिए।’ जी हाँ! मेरे गीत की पंक्तियाँ इसी कटु यथार्थ से परिचित कराती हैं कि जीवन में उलझनें बहुत है। परंतु हमें उनका समाधान अपने अंतर्मन में ढूँढना चाहिए, क्योंकि जब समस्या हमारे मन में है तो समाधान दूसरों के पास कैसे संभव है?
हम अपने मन के मालिक हैं और उस पर अंकुश लगा दिशा परिवर्तन कर सकते हैं। परंतु है तो यह अत्यंत कठिन, क्योंकि वह तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। ‘मन को मंदिर हो जाने दो/ देह को चंदन हो जाने दो/ मन में उठ रहे संशय को/ उमड़-घुमड़ कर बरस जाने दो’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ इसी भाव को प्रकट करती हैं। यदि मन मंदिर होगा, तो देह चंदन की भांति पावन रहेगी और मन प्रभु चरणों में समर्पित होगा। ऐसी स्थिति में संदेह, संशय व शंका के बादल बरस जाएंगे और मन उस दिशा की ओर चल निकलेगा। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ यदि आपका हृदय पवित्र है, तो आपको गंगा स्नान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसमें दुष्भावनाओं का वास नहीं होना चाहिए। परंतु 21वीं सदी इसका अपवाद है। आजकल वही व्यक्ति दोषी ठहराया जाता है, जिसका हृदय निर्मल, निश्छल व पवित्र होता है तथा उसमें कलुषता नहीं होती। ‘शक्तिशाली विजय भव’ आज का नारा है। निर्बल पर प्रहार किए जाते हैं। वैसे तो यह युगों-युगों की परंपरा है। आइए! स्वयं को इस जंजाल से मुक्त रखें। सरल, सहज व सामान्य जीवन जीएँ। अपेक्षा व उपेक्षा से दूर रहें, क्योंकि यह संसार दु:खालय है। जीवन अनमोल है और हर पल को अंतिम जानकर जीएँ। पता नहीं, यह हंसा तब उड़ जाएगा। खाली हाथ तू आया है/ खाली हाथ तू जाएगा। ‘जितना दिल साफ रखा/ उतना हम गुनहगार हो गए।’ परंतु हमें यही सोचना है कि जीवन यात्रा बहुत छोटी है। हमें तेरी-मेरी अर्थात् निंदा-स्तुति के जाल में नहीं फँसना है ।भले ही हम पर कितने ही इल्ज़ाम लगाए जाएं। झूठ के पाँव नहीं होते और सत्य सात परर्दों के पीछे से भी उजागर हो जाता है। संघर्ष अखरता ज़रूर है, लेकिन बाहर से सुंदर व भीतर से मज़बूत बनाता है।
समय और समझ दोनों को दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलते हैं, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल चुका होता है। सो! दस्तूर-ए- दुनिया को समझिए, पर अपने मन को मालिन मत होने दें। ‘ज़िंदगी में समझ में आ गई तो अकेले में मेला/ समझ में नहीं आई तो मेले में अकेला।’ सो! चिंतन-मनन कीजिए और प्रसन्नता के भाव से ज़िंदगी बसर कीजिए। शिकायतें तज, शुक्रिया करें और जो मिला है, उसी में संतोष से रहें। यह जीवन व समय बहुत अनमोल है, लौट कर आने वाला नहीं। हर लम्हे को अंतिम साँस तक खुशी से जी लें।
पद : प्राचार्य,सी.पी.गर्ल्स (चंचलबाई महिला) कॉलेज, जबलपुर, म. प्र.
विशेष –
39 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव। *अनेक महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के अध्ययन मंडल में सदस्य ।
लगभग 62 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण।
इंडियन साइंस कांग्रेस मैसूर सन 2016 में प्रस्तुत शोध-पत्र को सम्मानित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान शोध केंद्र इटली में 1999 में शोध से संबंधित मार्गदर्शन प्राप्त किया।
अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एनकरेज’ ‘अलास्का’ अमेरिका 2010 में प्रस्तुत शोध पत्र अत्यंत सराहा गया।
एन.एस.एस.में लगभग 12 वर्षों तक प्रमुख के रूप में कार्य किया।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक काउंसलर ।
आकाशवाणी से चिंतन एवं वार्ताओं का प्रसारण।
लगभग 110 से अधिक आलेख, संस्मरण एवं कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें- 1.दृष्टिकोण (सम्पादन) 2 माँ फिट तो बच्चे हिट 3.संचार ज्ञान (पाठ्य पुस्तक-स्नातक स्तर)
☆ “छत्तीसगढ़ का प्रयागराज – राजिम” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे ☆
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छत्तीसगढ़ की राजधानी ‘रायपुर’ के जिला ‘गरियाबंद’ में स्थित ‘राजिम’ गाँव का पहुंच मार्ग अत्यंत सरल सुगम है। शानदार पक्की सड़कों पर नियमित बस व्यवस्था की सुविधा है। रायपुर से मात्र 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘राजिम’ स्वयं के वाहन से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है।
राजिम’ महानदी, पैरी और सौंढूंर नदी के तट पर बसा है। माना जाता है ‘राजिम’ का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र था। राजिम में मंदिरों की श्रंखलाएँ हैं। यहाँ का ‘कुलेश्वर महादेव’ एवं ‘राजीव लोचन मंदिर’ अत्यंत विख्यात लोकप्रिय और मुख्य तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु की नाभि से कमल यहीं गिरा था और ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना इसी स्थल से प्रारंभ की। ‘कमलक्षेत्र’ अर्थात ‘राजिम’ के नाम से जाना जाने वाला यह प्रसिद्ध स्थल सदियों पुराना है। ‘राजीव लोचन मंदिर’ जिसमें भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर के ठीक सामने ‘हर-हर महादेव मंदिर’ स्थित है। यहां के पुरोहित बताते हैं कि भारत का यह एकमात्र स्थल है जहाँ भगवान विष्णु (हरि)और भगवान महादेव (हर ) का मंदिर एक दूसरे के सम्मुख है इसी कारण यह ‘हरिहर मंदिर परिसर’ के नाम से जाना जाता है।
कुलेश्वर मंदिर एवं राजीव लोचन मंदिर
‘राजिम’ में नदियों के संगम पर ‘कुलेश्वर महादेव’ जी का मंदिर भी आस्था और आकर्षण का केंद्र है। जल धाराओं के बीच स्थिति यह मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। मान्यताओं के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने इसी स्थान पर अपने कुलदेवता भगवान शंकर की पूजा अर्चना की थी जिसे महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। आस्था -विश्वास आध्यात्मिक ,धार्मिक स्थल के साथ-साथ इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी जाना जाता है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग यहां श्रद्धा-विश्वास से दर्शनार्थ आते हैं। हर वर्ष यहाँ माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है,जिसमें दूर दराज से हजारों श्रद्धालु इस स्थल पर एकत्रित होते हैं । यहां हर कामना पूरी होती है मान्यता तो यह भी है कि यहां के दर्शन के बिना तीर्थ यात्रा अधूरी होती है।
नदी के बीचों -बीच स्थित यह मंदिर अत्यंत रमणीय है। चारों ओर हरियाली,शीतल बयार, खुला आसमान और स्वच्छ निर्मल नीर आत्मा को शांति प्रदान करता है। निकट में ही आश्रम स्थित है। कुछ दूरी पर बनाया गया गौमुख और उसके आसपास की पत्थर की कला कृतियां बरखा ऋतु में ऊपर से बहती जलधारा संपूर्ण वातावरण को और अधिक मनोरम बना देती हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्षा ऋतु में छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा मानी जाने वाली ‘महानदी’ अपनी सहायक नदियों के साथ कुलेश्वर महादेव जी का स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करती है और क्षेत्र वासियों को धन धान्य से परिपूरित करती हैं।
अनेक किवदंतियों के बीच इतिहास के पन्ने पलटने पर ज्ञात होता है कि नल राजवंश के प्रतापी शासक विलासतुंग ने ‘राजिम राजीव लोचन’ मंदिर का निर्माण 660 -700 इस ई. के बीच कराया था। विलासतुंग भगवान विष्णु के उपासक थे वे पांडुवंशीय शासक महाशिव गुप्त बालार्जुन के समकालीन थे। तत्कालीन समय को छत्तीसगढ़ का स्वर्णिम युग कहा जाता है। कला ,धर्म, स्थापत्य एवं सांस्कृतिक विकास इस समय चरमोत्कर्ष पर था। मंदिर के निर्माण में राजा रत्नदेव द्वितीय और जयदेव प्रथम के भी नामों का उल्लेख आता है। इस स्थल के सम्बंध में अनेक अन्य कथाएं भी प्रचलित है।
संगम पर बसे छत्तीसगढ़ के प्रयागराज कहलाने वाले आस्था -विश्वास के साथ संस्कृति की महक, अद्भुत स्थापत्य शिल्प कला युक्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले ‘राजीव लोचन’ और ‘कुलेश्वर महादेव’ मंदिर के दर्शन करने अवश्य जाएं एक बार ‘राजिम’…!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साज और आवाज …“।)
अभी अभी # 744 ⇒ आलेख – साज और आवाज श्री प्रदीप शर्मा
जहां साज है, वहां आवाज है, जहां वीणा है वहां तार है और जहां पायल है, वहां झंकार है। जहां भोलापन और मासूमियत है वहां बचपन है और जहां दिल है वहां धड़कन है। हमारी कर्मेंद्रियां हों अथवा ज्ञानेंद्रियां, उनका अपना भोजन होता है, जिसके रस से उनकी पुष्टि होती है।
भोजन हवा, पानी से हमारे शरीर में रस की उत्पत्ति होती है और वह स्वस्थ व पुष्ट होता रहता है। हमारी इंद्रियों को भी भोजन की आवश्यकता होती है। आँखें कुछ अच्छा देखना चाहती हैं, कान कुछ अच्छा सुनना चाहते हैं और लब कुछ अच्छा बोलने के लिए तरस जाते हैं।
जब भोजन से प्राप्त रसों से तन और मन पुष्ट और निरोग हो जाता है, तो चेहरे पे खुशी छा जाती है, आंखों में सुरूर आ जाता है। जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे गुरूर आ जाता है। लीजिए, बातों ही बातों में साहिर ने गीत भी लिख दिया, संगीतकार रवि ने उसकी धुन भी बना दी, और आशा जी ने उसे अपनी आवाज भी दे दी। एक गीत का सृजन हो गया, जो इस कायनात में अमर हो गया।।
रस का मूल स्रोत है आनंद। योगिराज श्री कृष्ण सोलह कलाओं में पारंगत थे। हमने तो उनकी एक बांसुरी का ही कमाल देखा है, और वही सुदर्शन चक्र धारी एक अंगुली में पर्वत उठाकर गिरधारी भी बन बन जाते हैं। और सूर और मीरा के भक्तिपद हमें झकझोर देते हैं, जब हमारे एक कान में लता की आवाज गूंजती है, मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो और दूसरे कान में जगजीत सिंह, भाव प्रवाह में डूबे हुए हे गोविन्द, हे गोपाल पुकारते, प्रवेश कर जाते हैं।।
शास्त्रज्ञों ने नव रस का वर्णन किया है जिसमें आश्चर्यजनक ढंग से श्रृंगार, प्रेम, शांत, हास्य, वीर और करुण रस के साथ साथ ही रौद्र, भयानक और वीभत्स रस को भी शामिल किया गया है। कला में भले ही भेद हो, लेकिन सभी कलाओं का आपस में समावेश ही ललित कला है। नाचे मोरा मन, गीत सुनते ही तन और मन क्यों सुर और ताल पर नृत्य करने लग जाते हैं। जब तक श्रृंगार रस की उत्पत्ति नहीं होती, पांवों में घुंघरू शोभा नहीं देते। मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे, तो फिर मेरी चाल देख ले।
संगीत हमें गंधर्व लोक की देन है। सात ही लोक हैं, और सात ही सुर। इन सात सुरों में पिछले सत्तर सालों में जो साज बजे हैं और जो आवाजें गूंजी हैं,उन्हें आज बच्चा बच्चा जानता है। सन् १९५२ की फिल्म बैजू बावरा ही ले लीजिए। एक से बढ़कर एक गीत। राग मालकौंस, मन तड़पत हरि दर्शन को आज, और राग दरबारी, ओ दुनिया के रखवाले। जरूरी नहीं कि आपको सुर ताल की समझ हो, जब सृजन आत्मा से होता है, तो वह परमात्मा का प्रसाद हो जाता है।।
बहुत लंबी फेहरिस्त है सिर्फ साज और आवाज की। क्लासिकल, सेमी क्लासिकल, गीत, गजल, कव्वाली, भजन, नात और कीर्तन। अगर गीत ही ना हो, तो कैसा गायन और कैसा वादन।
पहले गीतकार खुद गाते थे। जब सड़कों पर, चौराहों पर और कवि सम्मेलनों के मंच पर सर्वश्री वीरेंद्र मिश्र, सर्वेश्वरदयाल, दिनकर, रमानाथ अवस्थी और गोपाल दास नीरज जैसे कवि उपस्थित होते थे, तो कविता जाग उठती थी, जो सुबह तीन साढ़े तीन बजे तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए, जगाए रखती थी। किसी मुशायरे की महफिल में साहिर, कैफ़ी आज़मी, बशीर बद्र, हसरत जयपुरी, और निदा फ़ाज़ली मौजूद हों और दाद और इरशाद का समां ना बने, ऐसा हो ही नहीं सकता।
आज सब कुछ सपना सा लगता है, जो कभी अपना सा लगता था। साज बदल गए, आवाज़ें बदल गईं। इधर अगर पुरुष गायक सहगल, तलत, रफी, मुकेश, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और जगजीत सिंह ने मैदान छोड़ा तो उधर नूरजहां, सुरैया, शमशाद, बेगम अख्तर, और खुर्शीद के बाद सबसे पुरानी लता भी अभी अभी मुरझा गई।
न आज गीतकार पंडितों की तिकड़ी पंडित भरत व्यास, नरेंद्र शर्मा और प्रदीप ही मौजूद हैं और ना ही शैलेंद्र, हसरत, मजरूह साहिर, रवींद्र जैन, इंदीवर और आनंद बक्षी जैसे प्रतिभाशाली गीतकार।
कहां हैं आज कोई नौशाद, हुस्नलाल भगतराम, खेमचंद प्रकाश, गुलाम मोहम्मद, मदन मोहन, ओपी नय्यर, सचिन देव बर्मन, रवि, रोशन और शंकर जयकिशन।।
लगता है साज और आवाज का संसार सूना हो गया है। लेकिन आशा से आकाश थमा है। गर ये ज़मीं तेरी नहीं, वो तेरा आसमां तो है। भले ही हमारा चांद कहीं खोया है, लेकिन आसमान खुला है। रहमतों की बारिश अक्सर होती ही रहती है। फरिश्ते आते जाते ही रहते हैं। वे अपनी दुनिया बसा जाते हैं, और साथ कुछ नहीं ले जाते, अपनी धरोहर यहीं छोड़ जाते हैं और बस ढेर सारा प्यार और दुआ ले जाते हैं। साज और आवाज का मंदिर कभी खाली नहीं रहता। यहां रोज इबादत होती है, रोज सजदा होता है। इंसाफ का मंदिर है ये, भगवान का घर है।
कितनी धुनें, कितने गीत, कितनी ग़ज़ल, कितने गायक और कितने तराने, और गायकी और मौसिकी के भी अपने अपने घराने, एक बार कुबेर का खजाना खत्म हो जाएगा लेकिन साज और आवाज का यह सुहाना सफर यूं ही चलता रहेगा। चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना। कभी अलविदा ना कहना ….
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वाह – वाह में बह जाना …”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 253 ☆वाह – वाह में बह जाना… ☆
बगीचे की बाड़ी काँटेदार बबूल से ही बनाई जाती है। कड़वे अनुभव ही उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ऐसा कहना नेकीलाल जी का है। यदि ये, नेकी कर दरिया में न डालते चलते तो कैसे इतने सारे लोग अपना अलग – अलग आशियाँ बसाते। जान बूझ कर की गई नेकी ही बहुत से रास्ते बनाते हुए चलती है। कड़वाहट न फैले इसलिए उपेक्षा में भी परीक्षा का भाव लाते हुए आगे चलते जाना है। जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, इसी सोच के साथ उम्मीदलाल स्वयं को तराशते हुए बढ़ रहे हैं। हालाँकि हर पल उनके सिर पर खतरे की तलवार लटक रही है, फिर भी कुछ न कुछ नया सीखते हुए अपने समय का सदुपयोग कर स्वयं को उन्नत करने की सोच लिए हुए आज तक अपनी जगह पर विराजमान है। ये बात सही है कि अब उनकी पूछ – परख कम होने लगी है, पर चलो कोई बात नहीं, वो लगातार खुद को अपडेट करने के मंत्र पर कार्यशील हैं।
दूर बैठकर निर्विकार भाव से सब कुछ देखते हुए भी तटस्थ बनें रहना कोई सरल कार्य नहीं होता है, ऐसे लोगों के लिए महाकवि दिनकर ने लिखा – जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध। सब को एक- एक कर जाते हुए देखना,घुट- घुट कर जीने के समान ही था। खैर जो आया है वो जायेगा ये तो परम् सत्य है सो यही सोच आज तक दूरदृष्टि के साथ जीवन में तारतम्यता स्थापित कर रही है।
जिसे देखो रोनी सूरत बनाए हुए सफलता की उम्मीद की कामना करता है। कुछ नहीं तो फेसबुक पर अपनी पोस्ट को स्पांसर करते हुए अधिक लाइक, कमेंट द्वारा अपनी ही वाल पर वाह – वाह सुनने की चाहत लिए हुए जिए जा रहा है। वैसे भी जीना तो प्रसन्नता पूर्वक ही चाहिए। भले ही इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। आजकल तो मन हल्का करने हेतु जो जी चाहो लिख दो। जितना उदासी भर नगमा होगा, उतनी जल्दी लोग पूछ – परख करने आपकी वाल पर हाजिर हो जाएंगे। ये लोग केवल दुःख के साथी हैं ऐसा नहीं है,आपकी उपलब्धियों पर भी ये फूलों के गुच्छों का इमोजी भेजते हुए बधाई अवश्य देते हैं। कुछ जो सच्चे मित्र होते हैं वो कम से कम पाँच से सात, इमोजी तो भेजते ही हैं। ये बात अलग है कि शेयर करने की जहमत वहीं लोग उठाते हैं जब पोस्ट उपयोगी हो या उनके लिए पोस्टकर्ता कोई विशेष महत्व का हो।
अब देखिए न दस हजार सब्सक्राइबर बनाते ही हिम्मती जी स्वयं घोषित यू ट्यूबर बन चुके हैं। ये बात अलग है कि सब ने मिलकर उन्हें दस हजारी माला पहना ही दी। जैसी रकम खर्च करोगे वैसा ही तो परिणाम मिलेगा। यहाँ पर कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ये इंसान, ऐसा कोई नियम नहीं चलता है। बस प्रमोट करिए और कराइए, सफलता तो आपकी होकर ही रहेगी। लोग बस वाह- वाह करेंगे, उसमें जो बह गया सो बह गया। जो टिककर लखपति बनने की जोड़ – तोड़ करने लगा, समझो वही सच्चा खिलाड़ी है।