हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेट लतीफ।)

?अभी अभी # 708 ⇒ लेट लतीफ… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किसी और का नाम किसी व्यक्ति पर आरोपित करना कहां की समझदारी है। वक्त के बाद आप पहुंचते हैं, गलती आपकी है, लेट आप हो रहे हैं, और बदनाम बेचारा लतीफ हो रहा है। अजीब लतीफा है।

वियोगी होगा पहला कवि की तरह शायद लतीफ पहला इन्सान ऐसा हुआ होगा, जो बेचारा कहीं वक्त पर नहीं पहुंचा होगा, उसकी कुछ मजबूरी रही होगी। लेकिन बद अच्छा, बदनाम बुरा। लतीफ अच्छा, लेट लतीफ, ना बाबा ना।।

जो आदतन लेट होते हैं, उन्हें इस विशेषण से सम्मानित किया जाता है। राजा महाराजाओं की सवारी की तरह, लोग उन्हें देखते ही कह उठते हैं, लो आ गए, महाराज लेट लतीफ। वे भी आदत से मजबूर हैं अथवा उनकी भी कोई मजबूरी रहती होगी।

हर दफ्तर में लेट लतीफ पाए जाते हैं। महिलाओं में भी लेट लतीफी होती होगी, लेकिन कोई लता अथवा ललिता कभी लेट नहीं हुई, इसलिए उनके लिए कोई लेट लता अथवा लेट ललिता जैसा आदर्श स्थापित नहीं हो सका। घर गृहस्थी भी संभालना, बच्चों को स्कूल भेजना, पतिदेव का टिफिन तैयार करना, कितने कामकाज होते हैं उनके पास, हम समझते हैं। मैडम, कोशिश कीजिए, थोड़ा समय पर आने की।।

जो आदतन लेट होते हैं, उनका आत्म विश्वास बड़ा गज़ब का होता है। हमारा एक साथी घड़ी से पंद्रह मिनट लेट आता था, इसे कहते हैं वक्त की पाबंदी। आप अपनी घड़ी मिला लो। उसके पास कोई बहाना नहीं था। आधी हकीकत, आधा फसाना था। उसके और दफ्तर के बीच रेलवे क्रॉसिंग आते थे, ट्रेन का भी अपना टाइम था, और उसका भी दफ्तर का। बस अक्सर टकराहट हो जाती थी। अगर कभी शंटिंग शुरू हो गई, तो गए काम से। उससे आग्रह किया जाता, अपना समय थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो। लेकिन एडजस्ट दफ्तर को ही करना पड़ता था।

एक हमारे वरिष्ठ मित्र के बारे में शर्त लगाई जाती समय पर आने की। खुद से अधिक दूसरा आप पर भरोसा करे। लगा लो शर्त, अगर वे कभी समय पर आ जाएं ! किसी दिन अगर वे समय से आ जाते, तो उनका अभिनंदन किया जाता। उन्हें सफाई देनी पड़ती, आज वे समय से कैसे आ गए।।

चलिए लेट लतीफ को छोड़िए, जो दफ्तर से जल्दी घर जाते हैं, बताइए, उन्हें क्या कहते हैं ! देखिए, यह आपसी मामला है, अगर इंसान अपना काम खत्म करके, किसी जरूरी काम से, जल्दी घर जाना चाहता है, तो जा सकता है। इसके लिए लतीफ की तरह किसी हनीफ को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जो आदतन जल्दी घर जाते हैं, जरा उनके भी तो जलवे देखिए।

एक सज्जन अपने वरिष्ठ अधिकारी की सदाशयता का लाभ उठाकर दफ्तर से रोजाना शाम दो घंटे पहले ही घर खसक जाते थे। बाबू अफसर राजी, तो इससे हमें क्यों आपत्ति जी ! लेकिन एक दिन तो गजब हो गया। जल्दी जाने वाले सज्जन के घर से उनकी धर्मपत्नी का फोन आ गया। फोन दरियादिल अफ़सर ने ही उठाया। उधर से दहाड़ सुनाई दी। वे रोज तो अब तक घर आ जाते हैं, आज ऐसा क्या हो गया जो अभी तक नहीं आए, हमें चिंता हो गई, इसलिए फोन लगाया है। अगले ही दिन पहले उनकी खिंचाई हुई और उसके बाद से वे भी, दफ्तर के नियत समय पर ही घर जाने लगे। अति सर्वत्र वर्ज्यते।।

हमारे एक पुराने पड़ोसी थे, संयोग से उनका नाम भी मिस्टर लतीफ ही था। बड़े मिलनसार भले इंसान। बरसों से उनसे भेंट नहीं हुई। कहीं से उनका फोन नंबर तलाशा और संपर्क किया तो पता चला he is mo more.

मिस्टर लतीफ अब late लतीफ हो गए, इस दुनिया में नहीं रहे। बड़ा बुरा लगा।

इन सत्तर वर्षों में बहुत कुछ बदला है। प्राइवेट दफ्तरों में समय की और काम की भी बहुत

सख्ती है। लेट लतीफों के दिन अब हवा हुए। अब तो दफ्तरों में भी मस्टर नहीं, ई – अंगूठे चलते हैं। समय की पाबंदी और अनुशासन से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जो बेहतर है, उसका स्वागत है। लेट लतीफ कहीं अब एक लतीफा बनकर ही न रह जाए। यह कहावत अब शायद ही उनके काम आए ;

लेट लतीफ ?

Better late than never. !!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अहं ब्रह्मास्मि ? ?

अहं ब्रह्मास्मि।…सुनकर अच्छा लगता है न!…मैं ब्रह्म हूँ।….ब्रह्म मुझमें ही अंतर्भूत है।

ब्रह्म सब देखता है, ब्रह्म सब जानता है।

अपने आचरण को देख रहे हो न!…अपने आचरण को जान रहे हो न!

बस इतना ही कहना था।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

 

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 707 ⇒ दास – बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दास – बोध।)

?अभी अभी # 707 ⇒ दास – बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर सबका मालिक एक हुआ, तो हम सब उसके दास हुए। जो अपनी मर्ज़ी का मालिक है, वह किसी का दास नहीं। जिसे अपने कदमों पर सबको झुकाने में मज़ा आता है, उसे मालिक नहीं तानाशाह कहते हैं। शाब्दिक अर्थ को लिया जाए तो दास एक तुच्छ सेवक है। हर भक्त ईश्वर का एक तुच्छ सेवक है, दास है।

ईश्वर के सभी भक्त दास हैं, कबीरदास, सूरदास, रैदास और भगवान राम के तुलसीदास। सभी भक्त समर्थ हैं, रामदास हैं। दास में अहंकार नहीं, सात्विक अपराध-बोध है, तभी वह कह पाता है –

प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो !

यही दासबोध है।।

सामंती युग में दास दासियाँ हुआ करती थीं। कैकई की भी एक दासी थी, जिसके नाम से ही मन थर्रा जाता है। दासों के साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता था। देवदास अगर सिर्फ पारो का दास था तो एक देवदासी आराधना गृह की एक समर्पित दासी।

समय के साथ दास की कालिख घुलने लगी। सभी दास लोकतंत्र में सेवक हो गए। भगवानदास पढ़-लिखकर डॉ भगवानदास हो गए और श्यामसुन्दर डॉ श्यामसुंदर दास। अंग्रेजों ने सेवक को सर्वेंट कर दिया तो वे सभी सिविल सर्वेंट हो गए। सर्वेंट अफसर बन गए, तुच्छ-सेवक बाबू-चपरासी बन गए। जनता के सेवक मंत्री बन गए, उदास जनता फिर उनकी दास बन गई, चेरि बन गई।।

दास भक्ति का प्रतीक है, समर्पण की मिसाल है।

हम अगर आज भी अपने अवगुणों के दास हैं, तो ऐसी दास-प्रथा की जंजीरों को तत्काल तोड़ना होगा। हम केवल मात्र परम-पिता परमेश्वर के दास हैं। उनकी शरण मे जाते ही हम अतुलित बलधारी भक्त शिरोमणि, दासों-के-दास हनुमान के समान हो सकते हैं। ईश्वर का दास न अन्याय सहता है, न किसी का अपमान करता है। वह सर्व-गुण-सम्पन्न है, समर्थ है, राम का दास है। और यही सच्चे अर्थों में “दास-बोध” है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोस्ती बढ़ाना।)

?अभी अभी # 706 ⇒ दोस्ती बढ़ाना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब दोस्ती बढ़ती है, तब वह दोस्ताना कहलाती है। किसी से दोस्ती बढ़ाना इतना आसान नहीं होता। पहले परिचय, हैलो हाय से औपचारिक मेल-मिलाप होता है। कच्ची उम्र में दोस्ती, प्यार जैसी, अनायास ही हो जाती है। एक दूसरे का नाम भी नहीं जानते और दोस्ती हो जाती है।

आजकल दोस्ती का प्रबंधन फेसबुक ने अपने ज़िम्मे ले लिया है। किसी परिचित/अपरिचित की प्रोफाइल में जाओ, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजो, उधर से मंजूरी आई और we are friends! भले ही रिश्ते में वो आपका बाप लगता हो।।

फेसबुक के पास एक ही दर्ज़ा है, एक ही क्लास है, all are friends! हमारे शहर में एक लॉज थी, उसका नाम भी फ्रेंड्स लॉज ही था। वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा फेसबुक ने साकार कर दी।

स्कूल का एक साथी था, राम नाम था उसका, राम पाहूजा। खतीपुरे पर सायकल की दुकान थी उसकी। एक ही स्कूल, एक ही क्लास में थे, घर भी आसपास ही थे। दोस्ती हो गई। वह सायकल से मुझे घर लेने आता। डबल सवारी स्कूल जाते। उसकी सायकल की दुकान पर रेडियो सीलोन और विविध भारती सुनते। हफ़्ते में एक फ़िल्म ज़रूर देखते।

हम अच्छे दोस्त थे। फिर भी दोस्ती बढ़ाया करते थे। हमारा एक मौखिक करार था, खिलाओ पिलाओ, दोस्ती बढ़ेगी। कभी मुझे दोस्ती बढ़ाना पड़ती, कभी उसे। जिसकी जेब में पैसे होते, वह दोस्ती बढ़ा देता।।

कभी कभी नोंकझोंक भी हो जाती ! आज दोस्ती कौन बढ़ाएगा। दोनों के पास पैसे नहीं ! जेब की तलाशी ली जाती। दुकान के पैसे हैं, खर्च नहीं कर सकता। आज से दोस्ती खत्म।

दूसरे ही दिन ! चलो दोस्ती बढ़ाते हैं। दोनों की जेब में पैसे होते थे। कभी दामू अण्णा की कचोरी और एक फुल चाय से दोस्ती बढ़ती थी तो कभी प्रशांत के उसल पोहे अथवा दही मिसल से। इतना सस्ता, सुंदर लेकिन टिकाऊ तरीक़ा था हमारा दोस्ती बढ़ाने का।।

रामकथा हम बड़े भाव और श्रद्धा से सुनते हैं लेकिन किसी की रामकहानी में हमें कब दिलचस्पी होती है। मेरे इस दोस्त राम की भी बहुत अग्नि-परीक्षा ली गई। इसके भी लक्ष्मण और भरत जैसे दो भाई थे। राम का भी वनवास शुरू हुआ। पिताजी के शांत होते ही जहाँ पहले राम सायकल स्टोर्स था, वहाँ पहले ऑटो गैरेज और बाद में कपड़े की दुकान खुल गई। कलयुग के लक्ष्मण और भरत ने भ्राता राम को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बड़ा परेशान रहा मेरा दोस्त ! चार लड़कियों की शादी की। मर्यादा में रहा, लेकिन किसी अफसर, नेता से मतलब की दोस्ती नहीं बढ़ाई। दोस्ती बढ़ाई भी तो मुझ जैसे साधारण आदमी से, निःस्वार्थ निश्च्छल।

आज भी संघर्षरत है मेरा राम ! बहुत ठोकरें खाई लेकिन कभी निराश, हताश नहीं हुआ, डगर डगर भटका, लेकिन कभी कदम नहीं भटके। अपना छोटा मोटा धंधा करता है। कम मिलता है आजकल, लेकिन जब भी मिलता है, यही कहता है, चलो दोस्ती बढ़ाते हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 136 – देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 136 ☆ देश-परदेश – खिड़की ☆ श्री राकेश कुमार ☆

खिड़की कही भी हो अच्छी लगती है। मानव हमेशा से ही उत्सुकता लेकर जीता है। उसके मन में हमेशा एक जिज्ञासा रहती है, नया देखने, महसूस करने की। घर में भी सुबह सुबह खिड़की ही तो खोलते हैं।

रेलगाड़ी की खिड़की सपनों का दरवाजा लगती है मुझे, जब भी रेलगाड़ी में खिड़की वाली सीट मिलती है तब एक नई दुनिया में चले जाते हैं हम!

भले वह दुनिया हकीकत में कोसों दूर है लेकिन एक खिड़की हमें उस दुनिया में जीने की अनुमति देती है|

हम गुनगुनाते हैं तराने, अपना हाथ खिड़की से बाहर निकाल कर उसे हवा के साथ बहने देते हैं, पर अचानक किसी के डर से वह हाथ भीतर कर लेते हैं।

पर उस वक्त बेखबर हो जाते हैं हम, रेल गाड़ी की शोर भरी दुनिया में भी हम अपने लिए बना लेते हैं एक सपनो भरा शहर!!

हम सपने बुनने लगते हैं पर सपनों में किसी धीमी नदी के लहर से बहते चले जाते हैं, अचानक हम पाते हैं कि हमें मुस्कुरा रहे हैं।  मुस्कुराहट के साथ कुछ आँसू भी चेहरे पर चिपक जाते हैं, हमें अपनी उस दुनिया में होते हैं जहा हम सच में खुश होते हैं और हम वास्तव में तब तक वास्तविक दुनिया में वापस नही आते जब तक हमारे कंधे पर किसी का हाथ आकर हमें जगा ना दे।

हवाई यात्रा में भी खिड़की की सीट किसी का जीवन रक्षक बन कर पुरानी मान्यता “जाको राखे साइयां मार सके ना कोय” को चरितार्थ करती है, को हालिया विमान दुर्घटना से साबित हो गया हैं। 

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ पितृ दिवस विशेष – तीन लकीरें , तीन वचन; पिता के नाम… ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनकेहृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है पितृ दिवस पर विशेष तीन लकीरें , तीन वचन; पिता के नाम……’।)

☆ पितृ दिवस विशेष – तीन लकीरें , तीन वचन; पिता के नाम… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

वे जेब खर्ची देने वाले पिता नहीं थे। वे उन पिताओं जैसे भी नहीं थे जो अपने बच्चों के बस्ते आप उठाकर उन्हे स्कूल बस में चढ़ाने जाते हैं। न ही वे हमें किसी आधुनिक पिता जैसा लाड़ प्यार करते थे। वे सख्त किस्म के पिता थे। उनका मानना था कि लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ते हैं अत: जहां वे मामूली गलती भी करें, उनकी पिटाई होती रहनी चाहिए। मार पीट के मामले में हम बचपन से ही ढीठ बन चुके थे।।

जीवन मूल्यों व संघर्ष की स्वयं अपनी शिक्षा के लिए पिताजी ने स्कूल वगैरा को कभी बीच में आने नहीं दिया। कोई लिखना पढ़ना नहीं। कोई थिअरी नहीं। सब कुछ प्रैक्टिकल। यही कुछ वे हमें सिखाना चाहते थे। 1947 में गांव में आ बसे पंजाबी परिवारों की सोभत में उन्होंने अपने पुत्रों को स्कूल भेजना तो शुरू किया पर जीवन कौशल की सख्त प्रैक्टिकल ट्रेनिंग में कोई रियायत नहीं की।

इस सब के बावजूद पिता सही मायने में हमारे शुभचिंतक व संरक्षक थे। संतान प्राप्ति के लिए ही तो उन्होंने एक के बाद एक, चार शादियां की थी।

हमारे गांव में स्कूल नहीं था। पास के गांव पूंडरी में था। पहली क्लास में हमारा दाखिला वहीं हुआ।

हम कापियों पर पेंसिल या पैन से नहीं, तख्तियों पर स्याही और कलम से सुलेख लिखते थे। मुल्तानी मिट्टी से तख्ती पोची जाती थी।

तख्ती लड़ने के काम भी आती थी। कई बच्चे तो तलवार की तरह घुमाकर तख्ती चलाते थे। एक दिन दो बच्चों में ऐसा तख्ती युद्ध हुआ कि एक बच्चे के सिर से खून बहने लगा। एक अध्यापक ने उसकी मरहम पट्टी की। स्कूल में फर्स्ट एड बॉक्स था।

फिर सभी बच्चों को इकट्ठा किया और अध्यापक ने गुस्से से सभी को धमकाया कि अगर वे लड़ाई करेंगे तो उन्हे स्कूल से निकाल दिया जाएगा। जो पढ़ना नहीं चाहता वह स्कूल में न आए।

आखरी बात मुझे बड़ी अच्छी लगी। जब दोबारा कक्षाएं शुरू हुईं तो मैं अपना थैलानुमा बस्ता और तख्ती उठाकर अध्यापक के पास गया और उनसे कहा कि मैं नहीं पढ़ना चाहता। यहां बच्चे लड़ाई करते हैं। मैं घर जाना चाहता हूं।

“अबे जा उल्लू के पट्ठे। तुझे कौन बुलाने गया था कि तू स्कूल में आ!”

मैं डर कर पीछे हटा। हैरान था कि कुछ देर पहले यह कहने वाला अध्यापक कि जो पढ़ना नहीं चाहता, अपने घर जाए, अब क्यूं गुस्सा हो रहा था। खैर, मैं अपना तख्ती बस्ता लेकर त्यागी चौपाल में चल रहे स्कूल से वापिस अपने गांव और घर की ओर निकल गया।

गांव पहुंचा तो गली में ही चंद्रभान बनिए की दुकान पर बापू को बैठे पाया और ठिठक कर वहीं रुक गया। उन्होंने पूछा कि जल्दी कैसे आ गया तो मैंने साफ़ साफ़ सारा किस्सा सुना दिया यह कहते हुए कि मैं स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता।

अच्छा तू नहीं पढ़ना चाहता… यह कहते हुए बापू ने अपने पैर की जूती उठाई और ज़ोर से मेरी तरफ फेंकी। उनका निशाना कुछ चूक गया और उन्हें अपनी तरफ आता देख मैं वहां से भाग लिया।

मैं आगे और बापू पीछे, गांव की फिरनी का पूरा चक्कर काट लिया। घूम कर स्कूल के रास्ते पर जब मैं मुड़ा तो बापू ने मेरा पीछा करना छोड़ा।

मैं बापू के गुस्से को समझ नहीं पाया पर पिटाई से बचने के लिए वापिस स्कूल की तरफ हो लिया। मन में एक और डर था कि अध्यापक भी पिटाई करेगा।

स्कूल की तरफ कुछ ही दूर गया था कि पंजाबी लड़का अविनाश ग्रोवर वापिस आता मिल गया। कहने लगा, आगे कोई लंबा सांप निकला है और उसने सांप के रास्ते से गुजरने के निशान देखे हैं।

मैं और डर गया। अकेला आगे कैसे जाऊं? रास्ते में सांप आ गया तो?

मैं वापिस अविनाश के साथ गांव की तरफ ही मुड़ लिया। पिता का भी डर था। मुझे दोनों तरफ सांप नज़र आने लगे। गांव की तरफ ही चलता गया यह सोच कर कि बापू तब तक दुकान से जा चुका होगा।

पर वो तो वहीं बैठा मिला ।

फिर वापिस आ गया तू? वह गुस्से से बोला। मैंने हकलाते हुए कहा, रास्ते में सांप था।

चन्द्रभान बनिए ने कुछ बीच बचाव किया। ….चाचा, बच्चा डर गया है, अब की बार माफ़ कर। आगे से यह स्कूल से नहीं भागेगा…

मैंने बगैर पूछे ही बार बार हामी भरते हुए गर्दन हिलाई।

“क्यों, फिर भागेगा”, बापू ने पूछा। वह पूरी तसल्ली करना चाहता था। मैंने दोनों कान पकड़ कर गर्दन दाएं बाएं हिलाते हुए ना कहा।

ऐसे काम नहीं चलेगा। नाक से तीन लकीरें निकाल कि तू फिर स्कूल से नहीं भागेगा।

मैंने तुरंत नाक से तीन लकीरें निकाली और कहा कि फिर कभी स्कूल से नहीं भागूंगा।

बापू ने कहा, जा घर जा।

आज माफ़ कर दिया, फिर नहीं करूंगा।

बस वो दिन और आज का दिन। मैं कभी स्कूल तो क्या कॉलेज या फिर दफ्तर की ड्यूटी से भी नहीं भागा। तीन लकीरें जो निकाली थीं नाक से।

तीन लकीरें सहज ही मेरे लिए बापू को दिए तीन वचन बन गईं : पहला वचन कि कभी किसी काम से नहीं भागना भले ही कश्मीर के आतंकवाद में ड्यूटी करनी हो;

दूसरा वचन कि पूरे मन से काम करना, इसी से ज्ञान व कौशल मिलेगा और मान सम्मान प्राप्त होगा तथा आखरी व तीसरा वचन यह कि जिस काम की दिल गवाही न दे, उसे करने से बचना।

पितृ दिवस पर नमन मेरे पिता को और उन जैसे सभी पिताओं को।

🇮🇳 भारत माता की जय 🇮🇳 

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 – आलेख – “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख)

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 8 ☆

☆ आलेख ☆ “वृद्धाश्रम में घर से ज्यादा सेवा और सुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

अपनों से दूर 93 वृद्धों का परिवार

आज सामाजिक सोच और परिस्थितियां ऐसी हो गईं हैं कि अधिकांश लोगों को अपने घर के बुजुर्ग बोझ लगने लगे हैं। ऐसे समय वृद्धाश्रमों की आवश्यकता और उपयोगिता बढ़ गई है। वृद्धाश्रमों में वृद्धों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। मैंने अपनी पारिवारिक मित्र श्रीमती भारती साहा से अक्सर उनके वृद्धाश्रम जाने और सुख सुविधा से रहते प्रसन्नचित्त वृद्धों के बारे में सुना। मेरा मन भी वृद्धाश्रम जाकर वहां की व्यवस्था देखने और खुशहाल वृद्धजनों से मिलने का हो गया और एक दिन मैं वहां पहुंच गया। भारती जी के साथ ही मेरी पत्नी श्रीमती विमला श्रीवास्तव भी मेरे साथ थीं। जिज्ञासा यह जानने की थी की एक ठिकाने पर इतने सारे बुजुर्गों की इतनी अच्छी देखरेख कैसे होती है कि वे सभी खुश और संतुष्ट रहते हैं।

निराश्रित वृद्ध आश्रम, जबलपुर में वृद्धों के बीच गुंजन संस्था, जबलपुर के सदस्य

नेताजी सुभाषचंद बोस मेडिकल कालेज, जबलपुर के पास स्थित निराश्रित वृद्धाश्रम में हम लोग संध्या 5 बजे के आसपास पहुंचे। वृद्धाश्रम के अहाते का द्वार खोलकर जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया तो लगा जैसे हम शहर के कोलाहल, आपाधापी, राजनीति, स्वार्थ और आपसी खींचतान की दुनिया से निकलकर एक ऐसी दुनिया में पहुंच गए हैं जहां सिर्फ अपनापन है, शांति है, सद्भाव है। वृद्धाश्रम के मुख्य प्रवेश द्वार के अंदर ही दाहनी ओर एक मंदिर बना है यहां अनेक वृद्ध पुरुष/महिलाएं बैठे हुए शांतचित्त से ईश्वर की आराधना में लीन थे। आश्रम के अत्यंत साफ सुथरे अहाते के बड़े छायादार वृक्ष और बगीचे में लगे सुंदर पौधे वहां के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर रहे थे। आश्रमवासी अनेक वृद्ध नर/नारी अहाते में रखी बैंचों और कुर्सियों में बैठे या तो आपस में वार्तालाप कर रहे थे अथवा आत्म चिंतन में लीन थे, कुछ लोग चहल कदमी करते हुए भी नजर आए। लगा जैसे इन वृद्धों को यहां मिले सेवा, सुख और संतोष ने उनके तमाम दुखों को हर लिया है।

यह वृद्धाश्रम भारतीय रेडक्रास सोसायटी द्वारा 2 अप्रैल 1988 में स्थापित किया गया था। वृद्धाश्रम के पदेन अध्यक्ष जिला कलेक्टर हैं। नगर के विभन्न क्षेत्रों में सक्रिय समाज सेवा से जुड़े 24 व्यक्ति यहां के सम्माननीय सदस्य हैं। ये सभी पूरी चिंता और जिम्मेदारी के साथ समय समय पर वृद्धाश्रम पहुंचकर यहां की व्यवस्थाओं व आवश्यकताओं पर नजर रखते हैं और उन्हें बिना विलंब पूरा करने तत्पर रहते हैं।

एक प्रश्न पर बताया गया कि 96 लोगों के निवास की क्षमता वाले इस वृद्धाश्रम में वर्तमान में 93 वृद्ध हैं जिनमें 36 पुरुष और 57 महिलाएं हैं। यहां रह रहीं रामकली शर्मा सर्वाधिक 92 वर्ष की हैं। शांति साहू आश्रम में विगत 21 वर्षों से रह रही हैं। यहां के पुरुष निवासियों में कुछ सर्वाधिक 75 वर्ष के हैं। वृद्धाश्रम में धर्म जाति जैसा कोई बंधन नहीं है। व्यक्ति जबलपुर का निवासी हो, 60 वर्ष की उम्र हो और निराश्रित व निशक्त हो तभी उसे यहां रहने की पात्रता प्राप्त होती है। यहां रहने का कोई शुल्क नहीं किंतु पेंशन प्राप्त बुजुर्गों से कुछ सहयोग राशि ली जाती है। वृद्धाश्रम में साफ सुंदर विशाल भोजन कक्ष है जहां भोजन करने टेबिल कुर्सी लगी हैं। कार्यक्रमों आदि के लिए एक बड़ा हाल भी है। आश्रम की व्यवस्थाओं हेतु कार्यालय में 3, वृद्धों की देखरेख के लिए 4, भोजन बनाने 3, भोजन कक्ष की सफाई हेतु 1, स्वीपर 1, चौकीदार 1 और 1 एम्बुलेंस चालक है।

आश्रम का रखरखाव एवम खर्च सामाजिक न्याय विभाग से प्राप्त अनुदान से होता है। यहां निवासरत लोगों को भोजन, इलाज, दवा, वस्त्र, मनोरंजन सभी प्राप्त होता है। नगर के समाज सेवी तथा सहृदय लोग भी वृद्धाश्रम में सेवा सहयोग हेतु तत्पर रहते हैं। अनेक लोग अपने परिजनों की स्मृति में आश्रमवासियों को भोजन, चाय नाश्ता अथवा अन्य वस्तुओं का वितरण करते रहते हैं। संपन्न लोगों से आश्रम के लिए उपयोगी वस्तुएं भी प्राप्त होती रहती हैं। समय समय पर आश्रम में भी मनोरंजक, ज्ञानवर्धक कार्यक्रम होते हैं। आश्रमवासियों को नगर में आयोजित विशिष्ट समारोहों में भी ले जाया जाता है। यहां रहने वाले स्वेच्छा से जब तक चाहें अथवा अंत समय तक रह सकते हैं। यहां स्थाई चिकित्सक भी हैं जो हफ्ते में दो दिन स्वास्थ्य परीक्षण हेतु आते हैं। बताया गया कि समाज से आए लोगों से मिलकर आश्रमवासी प्रसन्न होते हैं और उनसे खुलकर बात करते हैं। यहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोगों से मिलने उनके रिश्तेदार/परिचित आते रहते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनसे मिलने कभी कोई नहीं आया। यहां कार्यरत लोग सभी बुजुर्गों में अपने माता पिता के दर्शन करते हूं। उनके दुखी, परेशान अथवा बीमार होने पर उनके पास आत्मीयता से बैठकर बातें कर उन्हें राहत पहुंचाने का प्रयास करते हैं। जबलपुर में 4/5 वृद्धाश्रम और भी हैं। रेडक्रास द्वारा मध्यप्रदेश में 81 वृद्धाश्रम संचालित किए जा रहे हैं। देशभर में बढ़ते वृद्धाश्रमों की संख्या वृद्धों की चिंताजनक स्थिति प्रगट करने पर्याप्त हैं। आवश्कता है वृद्धों की सेवा सुरक्षा के लिए परिवारों के साथ ही सम्पूर्ण समाज को जाग्रत करने और शिक्षा जगत के माध्यम से भी बच्चों में बुजुर्गों के प्रति आदर व प्रेम भाव भरने की। अपने परिजनों की उपेक्षा से दुखी किंतु वृद्धाश्रम की व्यवस्था और कर्मचारियों के स्नेह से तृप्त बुजुर्गों को देखकर हम सुख और दुख के मिश्रित भाव लिए वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए सोच रहे थे कि क्या फिर ऐसा समय आएगा जब हर वृद्ध सुख शांति से अपने ही घर में रहेगा। वृद्धाश्रम बंद हो जाएंगे।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # 705 ⇒ गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है।

हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है।

कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बधाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का।

इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है।

वैसे तो आप आप स्वयं भी गुणों की खान हैं। होते हैं कुछ ऐसे गुणीजन, जो स्वयं के गुणों को पहचान जाते हैं, और उनका गुणगान अपने मुंह से करते नहीं अघाते। जीवन से उदासी, निराशा, अवसाद और नकारात्मकता को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय यही है, सकारात्मक सोच। खुद को किसी से कम नहीं आंकना। यहां आपको अपने दोष नहीं, गुण ही गुण नजर आते हैं। आत्मप्रशंसा उनका स्वभाव बन जाता है। आप स्वयं तो अपना गुणगान करते ही हैं, आप चाहते हैं, लोग भी आपकी तारीफ करें। वैसे भी तारीफ का भूखा कौन नहीं। लेकिन जब ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करते हैं, तो यह भी कहना नहीं भूलते,

प्रभु मोरे अवगुन

चित ना धरो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 292 – पाणी केरा बुदबुदा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 292 पाणी केरा बुदबुदा… ?

आयुः पल्लवकोणाग्रलाम्बान्बुकानभंगुरम्

उन्मत्तमिव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरिणम्।

जीवन की क्षणभंगुरता ऐसा विषय है, जिसे हर व्यक्ति प्रति क्षण अनुभव करता है, तथापि प्रति क्षण भूला रहता है। जगत से जाने के सत्य को जानकर भी जानना नहीं चाहता।

योगवासिष्ठम् के वैराग्य प्रकरण के 14वें सर्ग से लिया गया उपरोक्त श्लोक इसी क्षणभंगुरता की पुष्टि करता है।

इस श्लोक का अर्थ है कि जीवन, किसी पल्लव अथवा पत्ते के कोने पर टपकी हुई जल की बूँद के समान क्षणभंगुर है। यह जीवन (प्राण)  देह को बिना किसी पूर्व चेतावनी के, एक विक्षिप्त या नशे में धुत व्यक्ति की भाँति अकस्मात छोड़कर चला जाता है।

क्षणभंगुरता का यह यथार्थ निरी आँखों से दिखता है। हरेक इसे देखता है। इसका आस्तिकता या नास्तिकता से कोई सम्बंध नहीं है। कर्म या कर्मफल के सिद्धांत से भी इसका कोई लेना-देना नहीं है। ‘परलोक के लिए पुण्य संचित करो’ में विश्वास रखने वाले हों या ‘खाओ, पिओ, ऐश करो’ पर  भरोसा करने वाले, मानने-न मानने वाले, सब पर, हरेक पर यह लागू होता है। यूँ भी कोई किसी भी पंथ, सम्प्रदाय का हो, मत-मतांतर का हो, पार्थिव अमरपट्टा नहीं ले सकता।

क्षणभंगुरता के सिक्के का दूसरा पहलू है शाश्वत होना। ‘क्षणं प्रतिक्षणं गच्छति’, में प्रतिध्वनित होता नश्वरता का शाश्वत सत्य, सीमित देहकाल में मनुष्यता के अपार विस्तार की संभावना भी है।

यहाँ से एक विचार यह उठता है कि भोजन, निद्रा, मैथुन तो सभी सजीवों पर समान रूप से लागू है। तथापि मनुष्य देह का वरदान मिला है तो जीवन को  भोगते हुए कुछ ऐसा अवश्य किया जाना चाहिए जिससे मनुष्यता बेहतर फले-फूले। यह हमारा नैमित्तिक कर्तव्य भी है।

कहीं पढ़ा था कि आदिवासियों के एक समूह को नागरी सभ्यता और विकास दिखाने के लिए लाया गया। शहर की विशाल अट्टालिकाएँ देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उनका आश्चर्य यह जानकर बढ़ गया कि इनमें से अधिकांश घर खाली पड़े हैं। कुछ आगे चलकर उन्होंने देखा कि सड़क पर बड़ी संख्या में भिखारी हैं जो मांग कर अपना गुज़ारा कर रहे हैं और उनके सिर पर किसी तरह की कोई छत नहीं है। आदिवासियों ने जानना चाहा कि वे लोग बिना छत के क्यों हैं, जबकि इतने सारे घर खाली पड़े हैं?

उन्हें बताया गया कि यहाँ एक व्यक्ति कई घर खरीदता है। आगे चलकर जब घर की कीमत बढ़ जाती है तो उसे बेच देता है। पैसा इसी तरह कमाया जाता है। आदिवासी आश्चर्यचकित रह गए। उनमें से एक बुज़ुर्ग ने कहा, “कैसे मनुष्य हैं आप? कुछ लोग सड़क पर बिना घर के जी रहे हैं और एक व्यक्ति के पास अनेक घर हैं। जीवन काटने के लिए तो एक घर ही पर्याप्त है। हम आदिवासियों में प्रथा है कि हम सब मिलकर नवयुगल के लिए अपने हाथों से घर बनाते-बाँधते हैं और उनके जीवन का शुभारंभ करते हैं। इस तरह हम, हमारी आनेवाली पीढ़ी को  बसाते हैं।”

इस घटना का संदर्भ सांप्रतिक जीवन में धन या पैसे के महत्व को नकारने के लिए नहीं है। जीवन के केंद्र में इस समय पैसा है। जगत के सारे व्यवहार का कारण और आधार पैसा है। अर्थार्जन हमारे चार पुरुषार्थों  में सम्मिलित है। अत: परिश्रम और बुद्धि से अर्जन तो अनिवार्य है।

यहाँ संदर्भ मनुष्य में वांछित मनुष्यता के लोप अथवा सामुदायिक चेतना के अभाव का है। इस चेतना के उन्नयन का एक श्रेष्ठ उदाहरण महाराज अग्रसेन रहे। माना जाता है कि उन्होंने ‘एक रोटी, एक ईंट’ का मंत्र अपने राज्य की जनता दिया था।

मंत्र का व्यवहार यह था कि बाहर से आकर कोई व्यक्ति यदि  उनके राज्य में बसना चाहे तो अपेक्षित है कि समाज का हर समर्थ व्यक्ति उसके लिए एक रोटी और एक ईंट की व्यवस्था करे। रोटी से नवागत के परिवार का पेट भरता और एक-एक ईंट करके उसका मकान बनता। सामुदायिकता और सामासिकता का यह अनुपम उदाहरण है।

किसी सुपात्र निर्धन को एक रोटी और एक ईंट दे सकने का सामर्थ्य ईश्वर ने बड़ी संख्या में लोगों को दे रखा है। इसका क्रियान्वयन मनुष्यता को प्राणवान रखने के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकता है। 

संत कबीर ने लिखा है,

पाणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति।

एक दिनाँ छिप जाँहिगे, तारे ज्यूँ परभाति॥

स्मरण रहे कि क्षणभंगुर जीवन  पानी के बुलबुले की भाँति अकस्मात फूट जाएगा। बुलबुले के फूटने से पहले सामुदायिक विकास में थोड़ा-सा हाथ लगा सकें, पंच महाभूतों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकें तो मनुष्य जीवन में कुछ सार्थक कर सकने का संतोष लिए प्रस्थान हो सकेगा।

© संजय भारद्वाज 

अपराह्न 1:05 बजे, 14 जून 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 704 ⇒ गर्दिश के दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गर्दिश के दिन।)

?अभी अभी # 704 ⇒ गर्दिश के दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गर्दिश के दिन अक्सर तब ही याद आते हैं, जब हमारे अच्छे दिन आ जाते हैं। सुख के क्षणों में दुःख के दिनों की दास्तान कितनी अच्छी लगती है न ! दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो।

जिनके सितारे हमेशा ही गर्दिश में रहते हैं उनके लिए गर्दिश स्थायी भाव हो जाता है और वे हनुमान चालीसा की जगह रोजाना मुकेश का, फिल्म रेशमी रुमाल का यह गीत गाना अधिक पसंद करते हैं ;

गर्दिश में हो तारे,

ना घबराना प्यारे

गर तू हिम्मत ना हारे

तो होंगे वारे न्यारे

विरले ही होते हैं, जिनके वारे न्यारे होते हैं, और जो प्रसिद्धि और शोहरत पाने के बाद अपने गर्दिश के दिनों को आत्म दया, आत्म प्रशंसा और आत्म विश्वास के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उनके गर्दिश के दिन धन्य हो जाते हैं, वे पुनः पुरस्कृत हो जाते हैं।।

जो इंसान गर्दिश में जीता है, वह गर्दिश का महत्व ही नहीं समझता ! अगर किस्मत से उसके अच्छे दिन आ भी गए, तो ईश्वर को धन्यवाद दे, दाल रोटी खा, प्रभु के गुण गाता रहता है। संतोषी सदा सुखी। लेकिन समझदार, सफल और व्यवहारकुशल लोग आपदा में अवसर ढूंढ लेते हैं। सर्व साधन संपन्न होने के बाद, सफलता के कदम चूमने के बाद, गर्दिश के दिनों का ऐसा तड़का लगाकर मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले की आँखें भर आती हैं, वह मन में सोचता है, काश मेरे जीवन में भी ऐसा संघर्ष होता। अगर मेरे भी ऐसे ही गर्दिश के दिन होते, तो मैं भी आज एक महान व्यक्ति होता। मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया।

गर्दिश के दिनों में दोस्तों और दुश्मनों दोनों को याद किया जाता है। जो पात्र आज नहीं हैं, उनके बारे में अतिशयोक्ति से भी काम चलाया जा सकता है। किसने आपका मुसीबत में साथ दिया और कौन मुंह फेरकर निकल गया, हिसाब चूकता किया जा सकता है। तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी याददाश्त और थोड़ी कल्पनाशीलता का पुट गर्दिश के दिनों को और अधिक आकर्षित बना सकता है।।

बेहतर तो यह हो, कि कुछ महान चिंतक, विचारकों और साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों का अध्ययन किया जाए, उन पर चिंतन मनन किया जाए, अपनी गर्दिशों में रोचकता ढूंढी जाए, उसके बाद ही गर्दिश के दिनों पर कुछ लिखा जाए। हर महान व्यक्ति अपने गर्दिश के दिन नहीं भूलता। अगर भूल जाए, तो वह महान बन ही नहीं सकता।

लोकप्रिय कथा मासिक सारिका में कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों की एक धारावाहिक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी, स्वयं कमलेश्वर जी की पुस्तक “गर्दिश के दिन” तीन खंडों में प्रकाशित हुई है। परसाई जी के अनुसार गर्दिश उनकी नियति है। कुछ ऐसे ही भाव इस गीत के भी हैं ;

रहा गर्दिशों में हरदम

मेरे इश्क का सितारा।

कभी डगमगाई कश्ती

कभी खो गया किनारा।।

अगर आप एक महान व्यक्ति बन चुके हैं, अथवा बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने जीवन में गर्दिश के दिनों को तलाशें, उन्हें तराशें, धो पोंछकर साफ करें और करीने से दुनिया के सामने पेश करें। अगर आपके जीवन में गर्दिश के दिन नहीं, तो आप इंसान नहीं। ऐसा आदमी क्या खाक महान बनेगा। पड़े रहिए गर्दिश के दिनों की तलाश में। क्योंकि गर्दिश के दिनों के बाद ही इंसान के जीवन में अच्छे दिन आते हैं। गर्दिश के दिन भुला ना देना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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