हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २८ – लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

लेखक की संपन्नता देखकर कुछ लोग उससे ईर्ष्या किया करते थे। वे लेखक की संपत्ति का आकलन कर पाने में स्वयं को अक्षम पाते थे।

लेखक के परिजन इस बात से बेखबर और मन ही मन निराश रहते थे कि लोग उसके पिता के किस संपत्ति की बात करते हैं। पिता नें मरने के काफी दिनों बाद तक लेखक के पुत्रों में यह चर्चा होती थी कि आखिर उसके पिता नें वह बहुमूल्य संपत्ति कहां छुपा रखी है जिसकी बात अक्सर आम लोगो में होती रहती है।

कुछ रहस्यमयी एवं गूढ चीजों की तलाश में विदेशी विद्वानो एवं राजनायिको का प्रतिनिधि मंडल लेखक के शहर में आया था।

लेखक के घर के चारों तरफ की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। आला अधिकारियों आना-जाना शुरू हो गया। घर को पूरी तरह से सरकारी कब्जे में ले लिया गया। घर के सभी लोगों की सिक्योरिटी चेकिंग की जा चुकी थी। लेखक के परिजन अभी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। इसी बीच उन्होंने किसी अधिकारी को यह कहते हुए सुना कि इस घर के लोगों के पिता के पास एक ऐसी बेशकीमती चीज है, जो शायद विश्व के किसे लेखक के घर या किसी लाइब्रेरी में नहीं है।

कुछ ही घंटे बाद गाड़ियों का काफिला लेखक के घर के सामने आकर रुका। मुश्किल से तीन या चार लोग लेखक के अध्ययनशाला में प्रवेश किये। जिसमें स्थानीय अधिकारी एवं कुछ विदेशी विद्वान थे। लेखक की अलमारी में रखी हुई एक पुस्तक से कुछ पंक्तियों के तस्वीर उतारते हुए, लेखक के घर पधारे प्रतिनिधियों नें लेखक के पुत्र -पुत्रियों से बड़े ही अदब के साथ भेंट की। साथ ही साथ कुछ बेशकीमती चीजे एवं उपहार भेंट करते हुए उनके साथ फोटो भी खिंचवाई।

अगले दिन यह खबर देश-विदेश के अखबार के पन्नों में थी कि अमुख बेशकीमती साहित्यिक दस्तावेज स्वर्गीय फलां (लेखक का नाम) के घर से प्राप्त किए गए। यह वैश्विक साहित्य जगत की बड़ी उपलब्धि है।

लेखक के परिजनों को अब अपनें स्वर्गीय लेखक पिता की वास्तविक संपन्नता का भान हो चुका था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

मराठी अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 👉 ☆ दोन अनुवादित कथा – (१) ‘स्क्रीनच्या अलीकडे.. पलिकडे‘ (२) ‘दिवे, वाती आणि तेल’

 

देट साइड ऑफ़ स्क्रीन ☆

अक्सर होता तो यही था कि जब भी कोई विशेष अवसर या त्यौहार होता तो सेवकराम जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी अपने बच्चों के साथ विडियो कांफ्रेंस कॉल कर उस अवसर या त्यौहार का आनंद ले लेते थे. जन्मदिवस किसी का भी हो मोबाईल के सभी स्क्रीन्स पर एक-एक केक होता. एक साथ सभी केक काटे जाते और जन्मदिवस मनाया जाता.

इस बार दीपावली पर्व पर उनके बेटे का विदेश से विडियो कॉल आया. स्क्रीन के दूसरी ओर उनके बेटे बहू के साथ ही उनका आठ साल का बड़ा पोता और दूसरा पोता जो कुछ ही महीनों में दो साल का होने जा रहा था बड़ी उत्सुकता से दीपावली की पूजा देखने लगे. बड़ा पोता कुछ समझदार था और यह सब पहले भी देख चुका था, किन्तु, छोटे पोते को यह सब बड़ा विचित्र लग रहा था. सेवकराम जी ने उन सभी को घर के आसपास के रंगबिरंगी रोशनी से जगमगाते हुए परिदृश्य को दिखाया. छोटा पोता देव बड़े कौतुहल से यह सब देख रहा था. जैसे ही उन्होंने उसे फुलझड़ियाँ जलाते बच्चे और पड़ोस के लोगों को आतिशबाजी करते हुए दिखाया तो देव की आँखों में कौतुहलवश अद्भुत चमक दिखाई दी. वे अकस्मात ही देव से बोले – “Next year we all will celebrate Diwali in India.”

देव थोड़ी देर चुप रहा. फिर अत्यंत कौतुकता से दिवाली की रंगबिरंगी जगमगाती रोशनी और आतिशबाजी देखते हुए उनसे बोला – “No Grandpa.. I would like to come to that side of screen just now..”

वह स्क्रीन के इस ओर आने की जिद के साथ रोने लगा. सेवकराम-अनुराधा और बेटा-बहू असहाय एक दूसरे की ओर देखते रह गए और थोड़ी ही देर में विडियो कॉल कट गया.  

☆ दिया, बाती और तेल ☆

पुन्य सलिला नदी के तट, जिन्हें आज कल रिवर-फ्रंट कहते हैं, देखते ही बनते हैं. सेवकराम जी अक्सर प्रातःकाल पास के बगीचे में और कभी कभी शाम के समय उसी रिवर फ्रंट पर अपने समवयस्क वरिष्ठ नागरिक मित्रों के साथ टहलने चले जाया करते हैं.

नदी के तट अब पहले जैसे प्राकृतिक नहीं रह गए. सुन्दर हरे भरे तटों का स्थान अब सपाट पार्क / मैदान और कंक्रीट की चौड़ी सडकों ने ले लिया है. पुण्य सलिला नदी के तट के प्राचीन मंदिर से मुख्य सड़क तक तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के लिए वाणिज्यिक कॉरिडोर बन गया था. मंदिर के सामने नदी के तट की सीढ़ियों पर अब संध्या की विशाल आरती होने लगी थी.

समय के साथ हो रहे परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए ऐसा सभी का मानना है.

प्रतिदिन प्रातः और संध्या वेला में दिया बाती लगभग सभी घरों में एक अध्यात्मिक एवं सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है. नदी के दोनों ओर बसे घर-मंदिरों के दीपक और कृत्रिम तथा आधुनिक विद्युत् प्रकाश से जगमगाने लगते हैं. नदी के तट पर बैठ कर नदी की लहरों पर इस झिलमिलाते हुए प्रकाश को देखने का अपना ही आनंद है.

सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला कि इस बार रिवर-फ्रंट पर लाखों की संख्या में दीप जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारियां चल रही है. हरिलाल भाई काफी जिद कर रहे थे कि हमें इस वेला का साक्षी बनने का अवसर हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए. रात्रि दस से ग्यारह बजे के मध्य इस कार्यक्रम को संपन्न होना था और तब तक लोग घर की पूजा भी संपन्न कर ही लेते हैं.

तय समय पर हरिलाल भाई और सेवकराम जी नदी तट पर पहुँच गये. सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक-चौबंद थी. काफी भीड़ थी. कई लोग स्वेच्छा से अपनी सेवायें दे रहे थे. छोटे छोटे समूह में आयोजकों ने दीपकों को सजाकर रखा था. तय समय पर दीप प्रज्वलित किये गए. साथ ही आकाश में ड्रोन कैमरे प्रकट हो गए. उन्होंने उन लाखों दीपकों के विभिन्न कोणों से विडियो और चित्र लिए और थोड़ी ही देर में विश्व रिकॉर्ड बनने की घोषणा की गई. इसी के साथ ही जयघोष प्रारंभ हो गया और कार्यक्रम के संपन्न होने की घोषणा भी हो गई.

हरिलाल भाई और सेवकराम जी ने भी आपस में एक दूसरे को इस क्षण के साक्षी होने के लिए बधाई दी. वे वापिस जाने के लिए दीपकों के समूह के बीच से जाने को तत्पर हुए तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए.

समय के साथ ही दीपक बुझने लग गए थे और तट की सुरक्षा व्यवस्था के हटते ही कुछ नर नारियों और बच्चो का हुजूम दीपकों पर टूट पड़ा. वे अपने साथ लाए गए पोलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल उड़ेल रहे थे.

सेवकराम जी और हरिलाल भाई एक दूसरे को हतप्रभ देखने लगे.

विश्व रिकॉर्ड बन चुका था. पॉलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल भरने वाले नर नारियों बच्चों को विश्व रिकॉर्ड से कोई लेना देना नहीं था. शायद इस तेल से उनके घरों में कुछ दिनों का खाना बन जायेगा. आसपास का उमंग भरा वातावरण शोरगुल में खो चुका था और ड्रोन विडियो और चित्र लेकर अपने कैमरामेन की ओर वापिस जा रहे थे.

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

भोर की पहली किरण धरती पर उतर रही थी। हवा में ठंडक थी और खेतों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। टोपी और छड़ी लिए गांव के बुजुर्ग धनीराम अपनी रोज़ की सैर पर निकले थे। रास्ते के किनारे अचानक उन्होंने देखा—एक युवक मिट्टी पर औंधा पड़ा है। उसके पास एक भूरा, दुबला कुत्ता चौकन्ना बैठा था, जैसे उसकी रखवाली कर रहा हो।

 

सूरज की किरण जब युवक के चेहरे पर पड़ी, तो कुत्ते ने उसकी नाक के पास सूंघकर एक गरम बौछार छोड़ दी। युवक कराहा, होंठ खुले, कुछ बूंदें भीतर चली गईं। उसने बड़बड़ाया—“और डालो रे, एक और पैग!”

 

धनीराम ठिठक गए। पास जाकर देखा—यह तो पारगांव का पंकज है! अच्छे किसान परिवार का लड़का, पर हाल के दिनों में बुरी संगत में पड़ गया था। उन्होंने छड़ी से कुत्ते को हलका इशारा किया और बोले—

“उठ भुला, घर जा। तेरी ईजा तेरे लिए रातभर जाग रही होगी।”

पंकज ने आंखें मलते हुए चारों ओर देखा। सिर भारी था, मुंह कसैला। कल रात के नशे और दोस्तों की हंसी-मजाक की धुंधली यादें दिमाग में तैर गईं। वह धीरे-धीरे उठा, लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर बढ़ा। कुत्ता उसके पीछे-पीछे चला।

 

घर पहुंचा तो मां मवेशियों को चारा डाल रही थी। आंगन में चिड़ियां चहचहा रही थीं। पंकज चुपचाप दहलीज पर बैठ गया। सिर झुका हुआ, चेहरा अपराधबोध से भरा। कुत्ता उसके पैरों के पास बैठा पूंछ हिलाने लगा।

मां ने देखा, पर कुछ नहीं कहा। न ताना, न डांट। बस थाली में दो रोटियां रख दीं। वही मौन, वही करुणा—जिसकी आवाज़ शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है।

पंकज ने एक रोटी का टुकड़ा तोड़कर कुत्ते के आगे डाल दिया, फिर बोला—

“चल साथी, खेत चलते हैं।”

 

दिनभर खेत में वही रहा। धान की बालियां हवा में झूम रही थीं, जैसे प्रभात की प्रार्थना कर रही हों। पसीना बहता गया, और हर बूंद के साथ भीतर की गंदगी भी धुलती गई।

दोपहर में दाल-चावल खाया, और उसी कटोरे में कुत्ते को दूध में चावल मिलाकर दिया। दोनों ने साथ भोजन किया।

शाम को जब घर लौटा, तो मां शांत थी। दीपक की लौ स्थिर थी।

पंकज ने उस मौन में वह पुकार सुनी, जो किसी प्रवचन में नहीं मिलती—मां की मूक क्षमा की पुकार।

 

रात हुई। पंकज के भीतर फिर बेचैनी उठी। दरवाजे की ओर बढ़ा ही था कि कुत्ता उछलकर उसकी पैंट पकड़ लेता है—बिना भौंके, बिना गुर्राए, बस रोकता है।

उसकी आंखों में जैसे लिखा था—“अब नहीं, बस अब लौट चल।”

 

पंकज ठिठक गया। मां का चेहरा आंखों के आगे घूम गया।

वह लौट आया, चुपचाप थाली में बैठा, खाना खाया और कुछ कौर कुत्ते को दिए।

रात गहरी थी, पर मन में एक अजीब-सी शांति थी।

 

सुबह पक्षियों की मधुर बोली ने उसे जगाया। सूरज की किरणें कमरे में उतर आई थीं। उसने शुद्ध जल से मुंह धोया, कुल्ला किया, आंखों में बूंदें डालीं।

तभी मां की आवाज़ आई—

“बेटा, बछिया को घास डाल दे, दूध दुहने का समय हो गया।”

 

पंकज मुस्कुराया—वह मुस्कान जो भीतर से आती है।

उसने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरा और बोला—

“चल साथी, आज सच में नई सुबह है।”

 

दोनों खेत की ओर चले—एक प्राणी, जिसने अपने मालिक को जगाया; और एक मनुष्य, जिसने खुद को पाया।

गांव की गलियों में रोशनी फैल चुकी थी।

 

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ – महालक्ष्मी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा महालक्ष्मी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕महालक्ष्मी 🛕

पेशे से इंजीनियर राहुल, पर सारा गुणांक उसकी पत्नी करती थी। आज माँ फिर से दिपावली पर पूरे घर की साफ सफाई कर घर की लक्ष्मी (बहु) आने का इंतजार कर रही थी।

छोटा बेटा अपनी माँ का पूरा ध्यान रखता, पर हाय रे विदेश में रहने वाले बेटा बहु!!

पेंशन में जितना मिलता घर का खर्च चलता। माँ ने खुश होकर साड़ी सुहाग का समान बहु के आने पर उपहार स्वरूप देने लगी।

अरे मम्मी जी – – माना कि आपके पास नही है। पर दे ही रही तो चाँदी के सिक्के देती तो कुछ काम आता।

ये मेरे किस काम के – – सामने खड़ी घर में काम करती बाई को देते फोन पर काल करने लगी।

छोटा बेटा दिये लगा रहा था। मुझे तो महालक्ष्मी ही सर्वोपरि है। बेटे के सिर पर हाथ फेरती माँ बोल उठी मुझे भी दीपक का उजाला आज दिखाई दिया है।

दोनों एक दूसरे की बात समझ। पूजन की तैयारी करने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।

कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।

-जरा सरकिए..

उसने शान से जमे आदमी से कहा।

-क्यों?

-मुझे बैठना है।

-किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?

-कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।

जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया, फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।

-क्योंकि यह सीट मेरी है।

-कहां लिखा है?

जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।

-हुजूर, आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।

सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला-मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।

-वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?

उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – चुप्पी का काला साया।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा  – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर को जहां हवाएं भी फुसफुसाती हैं, वहां रहता था विशाल नामक एक साधारण क्लर्क, जो दफ्तर की फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ता था, हर रिपोर्ट में वह लिखता ‘यह लूट है, जनता की कमर टूट रही है’, लेकिन एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, अचानक काले कोट वाले लोग आए और उसे घसीट ले गए, आरोप था ‘गोपनीय दस्तावेजों का दुरुपयोग कर सिस्टम को बदनाम करना’, अब विशाल उस ठंडी कोठरी में है जहां दीवारें कान लगाकर सुनती हैं, बाहर उसके सहकर्मी चुपचाप काम कर रहे हैं, डर से कि कहीं उनकी बारी न आ जाए, जबकि ऊपर वाले अधिकारी पार्टियां मना रहे हैं, व्यंग्य की धार यह कि जो ईमानदारी की मशाल जलाता है वही अंधेरे में फेंक दिया जाता है, जैसे कोई पुराना कागज कूड़ेदान में, विशाल की यादें अब उसके मन में घूमती हैं, बचपन की वे गलियां जहां वह सपने बुनता था एक बेहतर दुनिया के, लेकिन अब वे सपने सलाखों से टकराकर टूट रहे हैं, उसकी बूढ़ी मां घर के कोने में बैठी रोती है, हर दरवाजे पर दस्तक देती है न्याय की गुहार लगाते, लेकिन मिलते हैं सिर्फ खाली वादे और ठंडे जवाब, सिस्टम की यह ठंडी क्रूरता ऐसी है कि इंसान को धीरे-धीरे खोखला कर देती है, जैसे कोई जहर जो नसों में घुलता जाता है, विशाल की डायरी में आखिरी पन्ना खाली है, शायद वह लिखना चाहता था ‘मैं हार नहीं मानूंगा’, लेकिन हाथ कांपते हैं, आंखें धुंधली, और एक रात जब चांद छिप जाता है, विशाल की सांसें थम जाती हैं, वह अंतिम पल जहां वह फुसफुसाता है ‘क्यों?’, वह करुण फुसफुसाहट पूरे शहर की चुप्पी बन जाती है, एक ऐसी पीड़ा जो सीने को चीरती हुई निकलती है। विशाल की मौत के बाद उसके सहकर्मी चुप रहते हैं, मां की आंखें सूख जाती हैं आंसुओं से, और सिस्टम चलता रहता है अपनी रफ्तार से, लेकिन वह खालीपन, वह साया कभी नहीं मिटता, बस फैलता जाता है दिलों में, एक दर्द जो चीखता नहीं बल्कि सिसकता है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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English Literature – Short Stories ☆ “चाय” श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘The rituals of life go on, but the companion is gone…— The Forest…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Short Stories चाय.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

?~ The rituals of life go on, but the companion is gone... ~??

Diehard Tea Drinker…

“Papa ji,” the daughter-in-law said with soft firmness, “four cups of tea a day is not good for your health. I can’t imagine how Mom ever let this habit continue. From tomorrow, only one in the morning and one in the evening. Agreed?”

“Yes, beta… agreed,” Manohar ji replied. His words were steady, but his gaze drifted to the photograph on the bedside table—Gayatri, smiling faintly from behind the glass frame.

She, too, had never approved of his endless cups of tea. She needed no words to know when the craving stirred in him; a flicker in his eyes, the twitch of his fingers, was enough. With mock sternness she would chide,
“Too much tea will harm you. When I’m gone, you will find it hard to manage. Drink today if you must, but from tomorrow—never more than two cups.”

But that tomorrow had never arrived in their forty-five years of togetherness.

And now, it had been barely forty-five days since she had gone, and yet…

“You were right, Gayatri,” Manohar whispered, his voice breaking into silence. “What you could never make me do, your daughter-in-law has done—in a moment.”

He lifted the frame gently, as though it might shatter at the touch. And in that fragile stillness, he felt the glass turn moist beneath his fingers—
as if she communicated herself through the language of tears!

~ Pravin Raghuvanshi

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – लघुकथा – चाय ? ?

…पापा जी, ये चार-चार बार चाय पीना सेहत के लिए ठीक नहीं है। पता नहीं मम्मी ने कैसे आपकी यह आदत चलने दी? कल से एक बार सुबह और एक बार शाम को चाय मिलेगी। ठीक है..?

..हाँ बेटा ठीक है.., कहते-कहते मनोहर जी बेडसाइड टेबल पर फ्रेम में सजी गायत्री को निहारने लगे। गायत्री को भी उनका यों चार-पाँच बार चाय पीना कभी अच्छा नहीं लगता था। जब कभी उन्हें चाय की तलब उठती, उनके हाव-भाव और चेहरे से गायत्री समझ जाती। टोकती, ..इतनी चाय मत पिया करो। मैं नहीं रहूँगी तो बहुत मुश्किल होगी। आज पी लो लेकिन कल से नहीं बनेगी दो से ज़्यादा बार चाय।

….पैंतालीस साल के साथ में कल कभी नहीं आया पर गायत्री को गये अभी पैंतालीस दिन भी नहीं हुए थे कि..! …तुम सच कहती थी गायत्री, देखो जो तुम नहीं कर सकी, तुम्हारी बहू ने कर दिखाया.., कहते-कहते मनोहर जी का गला भर आया। जाने क्यों उन्हें हाथ में थामी फ्रेम भी भीगी-भीगी सी लगी।

?

♥ ♥ ♥ ♥

© संजय भारद्वाज  

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८६ – खिलौने वाला… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)

☆ लघुकथा # ८६ – खिलौने वाला श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

क्या बात है, लगता है आज कुछ कमाई नहीं हुई?

हां सच है भगवान भी पैसे वालों की ही मदद करता है उन्हीं को ज्यादा देता है।

लोग दुकानों से बिना मोलतोल के खरीद लेते हैं पर जब हम गरीबों के ठेले पर आते हैं तो बहुत मोल भाव करते हैं।

अब तो चौराहे पर खड़े होते हैं और गाड़ी के सामने जब लोग आ जाते हैं तो सब आगे निकल जाते हैं और वह कहते हैं कि तुमने नया तरीका भीख मांगने का निकाल लिया है कहते हैं, बाबूजी गाड़ी की सफाई कर दें।

तो वह कहते हैं कि अब सारा पैसा हम ही से कमाओगे क्या? एक बेटा था जिसको पढ़ाया लिखाया विदेश भेजा कर्ज लिया। आज उसी ने दाने-दाने को मोहताज किया है।

तभी कमल ने कहा भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं हैं। भगवान सब मदद करेगा अच्छे लोगों की बस।

तुम भगवान की बातें मत करो मेरा खून खोल जाता है।

अचानक किशोर जी बाहर जाते हैं और वह गिर जाते हैं।

उनकी पत्नी कमला मदद के लिए लोगों को बुलाती है।

तभी अचानक एक आदमी आता और कहता है – अरे! आंटी मैं आपके पास आया था कल हमारे घर में पार्टी है उसमें खाना बनाने के लिए चलिए।

अंकल को क्या हो गया मैं अस्पताल ले चलता हूं।

जब अस्पताल पहुंचता है तो वह देखता है कि उस अस्पताल में डॉक्टर दोस्त ही है। अस्पताल यह गुरुजी का है और उनके आश्रम भी है आप लोग वहीं पर क्यों नहीं रहते चलिए अकेले रहने से अच्छा है सबके साथ रहेंगे।

काम भी मिल जाएगा इससे कई लोगों को फिर फायदा होगा। ठीक है बेटा मैं यहां पर एक काउंटर लगा लूंगा और जो भी पैसा मिलेगा उससे तुम अस्पताल और इन बुजुर्गों की सेवा करना मेरा भी मन लगा रहेगा अब इस उम्र में पैसे का क्या  करूंगा? 

जीवन खिलौने ही तो है ।

उसे ऊपर वाले (भगवान) की खेल में हम सब अटक कर खेल रहे हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०६ ☆ कथा-कहानी – अपराध ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘अपराध‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०६ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ अपराध

मेहता साहब रिटायर हो गये। अब ज़रुरी हो गया कि ज़िन्दगी का अपना अलग ख़ाका बनायें ताकि बाकी ज़िन्दगी ठीक से बसर हो सके। रिटायर होने से पहले ज़िन्दगी का नियोजन नहीं किया था, इसलिए सहसा दिक्कत महसूस हुई। दोनों बेटे जब काम पर चले जाते हैं तो उन्हें महिलाओं के बीच फालतू रहने में परेशानी होती है। शायद धीरे-धीरे आदत हो जाए।

सवेरे घूमने चले जाते हैं। रास्ते में दूसरे रिटायर्ड लोग मिल जाते हैं। बातें होती हैं। लेकिन बातें ज़्यादातर बुढ़ापे के रोगों पर केन्द्रित होती हैं— गठिया, रक्तचाप, अपच, आंखों की तकलीफ़। कभी राजनीति पर बातचीत हो जाती है। एक  दो लोग ऐसे हैं जो अपने नाती-पोतों की चर्चा करके आल्हादित होते  रहते हैं, या फिर बेटे- बहू की बुराइयों का पुराण खोलकर बैठ जाते हैं।

मेहता साहब अभी चुस्त हैं। उनका शरीर अभी थका नहीं है। वे अक्सर सोचते हैं सरकार को रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी चाहिए, या फिर आदमी की सेहत देखकर रिटायर करना चाहिए। जब देश में औसत आयु बढ़ गयी तो रिटायरमेंट की उम्र उतनी ही बनाये रखने में कोई तुक नहीं।

सवेरे उठकर वे सैर से पहले कमरा बन्द करके हल्की वर्जिश कर लेते हैं। शरीर के सब हिस्से-पुर्ज़े अभी ठीक काम करते हैं। बालों की सफेदी और चेहरे की हल्की झुर्रियों जैसी बाहरी तब्दीलियां ज़रूर हैं, लेकर भीतर से चुस्ती और काम करने की ताकत बरकरार है।

इसीलिए मेहता साहब दिन में पलंग पर कम ही  लेटते हैं। घर में इधर-उधर घूमते रहते हैं। कमरे की सफाई कर लेते हैं। काम में पत्नी और बहुओं की मदद कर देते हैं। फूलों-पौधों की देखभाल कर लेते हैं।

लेकिन उन्हें महसूस होता है कि इतना सब काफी नहीं है। इस सब के बाद भी ऊब लगती है। भीतर से बेकारी का बोध होता है। शरीर बेकार होने तक नौकरी या व्यापार जैसा कोई काम करना ज़रूरी है। उन्हें अभी किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। आराम से कहीं भी आ-जा सकते हैं, बस में उतर-चढ़ सकते हैं, सड़कें पार कर सकते हैं। फिर घर में बैठे रहने का क्या मतलब?

उन्होंने घर के सदस्यों को बताये बिना विज्ञापन देखना शुरू किया। ज़्यादा खोज- बीन नहीं करनी पड़ी। उन्होंने देखा कि स्थानीय कंपनियों के बहुत से विज्ञापन रोज़ निकलते हैं— मैनेजर के लिए, एकाउंटेंट के लिए, क्लर्क के लिए। वे एकाउंट्स ऑफिसर के पद से रिटायर हुए थे, इसलिए उन्होंने महसूस किया कि एकाउंटेंट का काम पा जाना मुश्किल नहीं है। इतना अनुभवी आदमी भला कंपनी को कहां मिलेगा?

उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिये अर्ज़ी भेज दी। सोचा, नौकरी मिल गयी तो सब लोगों को ‘सरप्राइज़’ देंगे। जल्दी ही कंपनी से जवाब भी मिल गया। उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।

निश्चित तिथि पर मेहता साहब पुराने ऑफिस जाने का बहाना करके पुरानी नौकरी का प्रमाण-पत्र लेकर घर से निकल गये। साफ कमीज़ पैंट पर टाई लगाये वे इस उम्र में भी ‘स्मार्ट’ लग रहे थे।

कंपनी के दफ्तर में पहुंचे तो देखा वहां तीस चालीस लोग इकट्ठे थे। कुछ भीतर कमरे में बैठे थे, कुछ हाथ में फाइल लिए बाहर घूम रहे थे। मेहता साहब को आश्चर्य हुआ। एक जगह के लिए इतने उम्मीदवार। कमरे में देखा तो वहां उन जैसे पकी उम्र के तीन लोग और दिखे। बाकी सब नौजवान थे। बुज़ुर्गों में से एक ने खिसक कर उन्हें बैठा लिया। मेहता साहब ने बैठकर आसपास के लोगों पर नज़र फैलायी।

उन्होंने देखा, ज़्यादातर लोगों के चेहरे पर मायूसी का भाव था। लगता था वे पहले भी नौकरी के मोर्चे पर टकराकर शिकस्त खा चुके हैं। कई टाइयां लगाये थे, लेकिन साफ लगता था कि उन्हें टाइयां पहनने की आदत नहीं है। कई टाई बांथे थे, लेकिन उनकी कमीज़ों के कॉलर गन्दे और छिने हुए थे।

जल्दी ही इंटरव्यू शुरू हो गये और एक-एक कर उम्मीदवार अन्दर जाने लगे।

मेहता साहब के पास एक सांवले रंग का दाढ़ी वाला युवक बैठा था। वह मामूली  कमीज़-पैन्ट और पैरों में सस्ते काले जूते पहने था। वह अपने आसपास के नौजवानों से लगातार ऊंचे स्वर में बात कर रहा था। मेहता साहब को उसके बात करने के ढंग से कुछ तकलीफ महसूस हुई क्योंकि उसमें उस शिष्टता और नफ़ासत का अभाव दिखता था जिसकी अपेक्षा वे हर आदमी से करते थे।

मेहता साहब के कानों में उसकी बातें पड़ीं। वह कह रहा था— ‘नौकरी मिलेगी ठेंगा। आपका कोई माई-बाप है क्या? अभी किसी का फोन आ जाएगा और बस, बाकी लोग अपनी फाइल झुलाते वापस। बस यही करते रहो। कोई साला बस का किराया देने वाला भी नहीं। नौजवान इस देश के भविष्य हैं न। हमीं इस देश के भावी कर्णधार हैं।’ वह व्यंग्य से हंसा।

मेहता साहब उसकी बात सुनकर सिकुड़ गये। वह बार-बार उन चारों रिटायर्ड लोगों पर नज़र डाल रहा था।

थोड़ी देर में वह उन लोगों से मुखातिब होकर बोला, ‘आप लोग भी इसी नौकरी के लिए आये हैं?’

मेहता साहब ने  सिर हिलाया कहा, ‘हां।’

उसने उसी तरह बेलिहाज पूछा, ‘आप लोग रिटायर्ड हैं?’

मेहता साहब ने फिर सहमति में सिर हिलाया।

उस नौजवान के नथुने फड़कने लगे। सख़्त आवाज़ में बोला, ‘आप लोगों ने तो जिन्दगी भर नौकरी कर ली। सब सुख उठा लिये। बाल- बच्चों को नौकरी पर भी लगा दिया होगा। अब यहां हमारे पेट पर लात मारने क्यों आ गये  आप? पेंशन तो मिलती होगी?’

मेहता साहब मिनमिना कर बोले, ‘बिज़ी रहना ज़रूरी है। जब तक शरीर ठीक है कुछ न कुछ काम तो करना होगा।’

नवयुवक उसी तेज़ी से बोला, ‘मुहल्ले के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दीजिए, समाज सेवा का काम कीजिए, घर में बागवानी कीजिए। पैसा तो मिला होगा ही। कोई फार्म खरीद कर खेती कीजिए।’

मेहता साहब के बगल में जो रिटायर्ड सज्जन थे उनका जाति-नाम तम्हाने था।अब तक मेहता साहब का परिचय सभी रिटायर्ड लोगों से हो चुका था। तम्हाने  साहब नौजवान की बात पर उखड़ गये। अंग्रेजी में बोले, ‘यह हमारा निजी मामला है। तुम हमें उपदेश देने वाले कौन हो?’

नौजवान पलट कर बोला, ‘ठीक कहते हो। खा जाओ, पूरी नयी पीढ़ी को हजम कर जाओ। तुम सौ साल तक जिन्दा रहो और हमें पचास तक पहुंचना भी मुश्किल हो।’

फिर वह अपना हाथ घुमा कर बोला, ‘देख लो, इन नौजवानों में से कितने अभी से बूढ़े दिखने लगे हैं।’

मेहता साहब चुप्पी साधे बैठे थे। सौभाग्य से तभी उनका नाम पुकारा गया और वे बड़ी राहत महसूस करते हुए उठ गये।

भीतर काले कांच की  टॉप वाली बड़ी मेज़ के पीछे तीन आदमी बैठे थे। बीच वाला पैंतीस-चालीस की उम्र का होगा। चेहरा गोल, चिकना और गोरा। सुनहरे फ्रेम का चश्मा उसके चेहरे पर फब रहा था। उसके  दाहिने बायें के लोग  अधेड़ वय के थे।

बीच वाले ने पूछा, ‘मिस्टर वी के मेहता?’

मेहता साहब ने विनम्रता से ‘जी’ कहा।

बीच वाला बोला, ‘आप एकाउंट्स ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए?’

मेहता साहब ने फिर ‘जी’ कहा।

वही आदमी बोला, ‘हम आपकी सर्विसेज़ का फायदा ज़रूर उठाना चाहेंगे। आप एक्सपीरिएंस्ड हैं । नये लोगों को तो काम सिखाने में ही दो महीने लग जाते हैं। मैंने आपके पेपर्स देखे हैं।’

मेहता साहब ने चेहरे पर कृतज्ञता का भाव लाकर सिर  हिलाया।

बीच वाला आदमी हंस कर बोला, ‘रिटायर्ड लोगों को काम पर रखने का एक और बड़ा फायदा होता है। वे हड़ताल नहीं करते। नौजवानों का हाल तो यह है कि कंपनी में थोड़े पैर जमे नहीं कि हड़ताल शुरू। कंपनी की तरफ उनका कोई कमिटमेंट नहीं होता।’

मेहता साहब को उसकी बात पर झटका लगा। तो वह आदमी उन्हें बिलकुल सुरक्षित, हानिरहित समझता है। दूसरे शब्दों में मृत, अंतरात्माहीन, चलता फिरता ‘रोबो’।

गोरा आदमी अपनी तर्जनी से चश्मा पीछे धकेलते हुए, उनके चेहरे पर नज़र गड़ा कर बोला, ‘मेहता साहब, हमारी कंपनी अभी स्ट्रगल ही कर रही है। जमने में वक्त लगेगा। अभी हम आपको बीस हज़ार ही दे पायेंगे। एक साल बाद फिर सोचेंगे। आपको पेंशन तो मिलती ही होगी।’

मेहता साहब के दिमाग़ में कई बातें आ जा रही थीं। वे खोये हुए से बोले, ‘हां’।

वही आदमी बोला, ‘आपको मंजूर हो तो रुकिएगा। मैं दुबारा आपसे बात करूंगा।’

मेहता साहब बाहर आ गये, लेकिन अब उनके मन में कोई उत्साह नहीं था। दाढ़ी वाले नौजवान का नंबर अभी तक नहीं आया था। जिन नौजवानों का इंटरव्यू हो चुका था वे जा चुके थे, लेकिन रिटायर्ड लोग सभी हाज़िर थे।

मेहता साहब ने सुना दाढ़ी वाला कह रहा था, ‘ये प्राइवेट कंपनियों वाले हमारी मजबूरी जानते हैं, इसलिए अगर नौकरी मिल भी जाए तो दस्तखत होगा पचास हजार पर और मिलेंगे बीस हजार। न जीने  देंगे,न मरने देंगे। ड्यूटी आठ घंटे, दस घंटे। खून की एक एक बूंद चूस लेंगे। काम करना हो तो करो नहीं तो मुंह काला करो। तुम जैसे हजार मिल जाएंगे। सरकार इनका कुछ नहीं उखाड़ सकती।’

मेहता साहब अपराधी जैसे बैठे उसकी बातें सुनते रहे।

जल्दी ही उसका भी नंबर आ गया और वह भीतर चला गया। तम्हाने साहब  मेहता साहब से बोले, ‘आपको भी रुकने को कहा है?’

मेहता साहब कुछ चिढ़कर बोले, ‘जी’।

तम्हाने साहब उत्साह में बोले, ‘मुझे भी कहा है। लगता है सिर्फ रिटायर्ड लोगों को ही रोक रहे हैं।’

उनकी बात से मेहता साहब के चेहरे पर गुस्सा उभर आया, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।

दाढ़ी वाला नौजवान बाहर निकला। निकलते ही व्यंग्य के स्वर में बोला, ‘इंटरव्यू की औपचारिकता समाप्त।’ फिर किसी की नकल करता हुआ बोला, ‘जेंटिलमैन, वी विल इनफॉर्म यू बाई पोस्ट।’

फिर रिटायर्ड लोगों की तरफ आकर बोला, ‘शायद आप लोगों को रुकने के लिए बोला है।’

मेहता साहब ने सिर झुका लिया। तम्हाने साहब ने ‘हां’ कहा।

नौजवान बोला, ‘मैं जानता था। आप ही  लोगों में से किसी को नौकरी मिलेगी। जिसे भी मिले उसे बधाई। इसी तरह भावी पीढ़ी की जगह पर बैठकर जिन्दगी भर मलाई खाते रहिए और हमें आशीर्वाद और शुभकामनाएं देते रहिए।’

वह लंबे-लंबे हाथ फेंकता, लापरवाही दिखाते हुए चला गया। जल्दी ही सारे नौजवान गायब हो गये। सिर्फ रिटायर्ड ही बचे।

मेहता साहब का दुबारा बुलावा हुआ। वही चश्मे वाला बोला, ‘हम आपको लेना चाहेंगे, मेहता साहब। अगर आपको हमारे टर्म्स मंजूर हों तो आप कल से काम पर आ जाएं।’

मेहता साहब ने जवाब दिया, ‘मुझे अफसोस है, मैं यह नौकरी नहीं कर सकूंगा।’

वे तीनों विस्मित हुए। चश्मे वाला बोला, ‘वी आर सॉरी। हम तो समझे थे कि आप हमारे साथ काम करेंगे। हम आपको हज़ार दो हज़ार ज़्यादा दे सकते हैं।’

मेहता साहब ने सिर हिलाया, कहा, ‘पैसे वाली बात नहीं है। मुझे आपसे एक रिक्वेस्ट करनी है।’

चश्मे वाला आगे की तरफ झुक कर बोला, ‘कहिए।’

मेहता साहब बोले, ‘आप यह नौकरी रिटायर्ड लोगों को मत दीजिए। किसी नौजवान को ही मौका दीजिए। उनमें बहुत से ब्रिलिएंट होते हैं।’

चश्मे वाले के चेहरे पर अप्रसन्नता का भाव आ गया। बोला, ‘हमें अफसोस है, मिस्टर मेहता, इन मामलों में हम बाहर वालों की सलाह नहीं लेते। हम कंपनी के इंटरेस्ट्स के हिसाब से काम करेंगे। थैंक यू। आप जा सकते हैं।’

मेहता साहब बाहर आ गये। उनके मन से एक बोझ हट गया था, लेकिन फिर भी सारे दिन उन्हें उदासी घेरे रही।

दो-तीन महीने बाद एक दिन बस स्टॉप पर उन्हें तम्हाने साहब मिल गये। सलाम-दुआ के बाद मेहता साहब ने पूछा, ‘कहां जा रहे हैं?’

तम्हाने साहब ने जवाब दिया, ‘काम पर। उस दिन आपने शायद मना कर दिया तो मुझे अपॉइंटमेंट मिल गया।’

मेहता साहब बोले, ‘कितना दे रहे हैं?’

तम्हाने साहब कुछ शर्मा कर बोले, ‘बीस हजार। पेंशन के साथ बुरा नहीं है।’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद तम्हाने साहब बोले, ‘मालूम है? पांच छः दिन बाद दफ्तर में वही दाढ़ी वाला लड़का आया था, वही जो इंटरव्यू के टाइम ‘भासन’ मार रहा था। कंपनी ने ‘रिग्रेट’ का लैटर भेजा था, उसी को लेकर आया था। खूब हंगामा किया। मैनेजर से पूछता था हम में कौन सी कमी है जो हमें नौकरी नहीं दी। मेज पर मुट्ठियां पटकता था। फिर मैनेजर ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने दो तीन झापड़ लगाकर बाहर धकेल दिया, फिर लौट कर नहीं आया। एकदम इंडिसिप्लिंड लॉट।’

वे ‘ही ही’ करके हंसने लगे और मेहता साहब के पेट में मरोड़ सी उठी। इतने में बस आ गयी। तम्हाने साहब बोले, ‘आइए।’

मेहता साहब बोले, ‘आप निकल जाइए। मुझे जल्दी नहीं है। दूसरी बस से जाऊंगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७८ – आरोपित संस्कृति… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आरोपित संस्कृति…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७८ — आरोपित संस्कृति — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अपनी जन्मभूमि मॉरिशस की वह संस्कृति मुझे अच्छी तरह याद है। वह पहली संस्कृति थी जब हम से आज़ादी के लिए खून मांगा जाता था। वह संस्कृति इतनी लुभावनी थी कि वह हमारी धमनियों में रच – बस गई थी। आज़ादी की शर्त पर हम बेबाकी से खून देते थे। हमारे खून से होली खेलने की संस्कृति तो बाद में बनी है। इस विकृत संस्कृति के पक्षधर बहुत ताकतवर हैं। वे बगावत करने वालों को देश द्रोही तक कह लेते हैं।

 © श्री रामदेव धुरंधर

01 / 10 / 2025

 संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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