हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५१ ☆ कविता – अचानक मिल जाती जब कभी मन की खुशी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – अचानक मिल जाती जब कभी मन की खुशी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५१ ☆

☆ अचानक मिल जाती जब कभी मन की खुशी…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

अचानक मिल जाती जब कोई मन चाही खुशी

दिखने लगती सामने दुनियां जो थी मन में बसी।

खुलने लगती खिडकिया, दिखने लगता वह गगन

* 

उमगने लगती नई संभावनाएं निखरता संसार है

लेने लगते स्वप्न सुंदर नए कई आकार भी

 दूर हो जाता अँधेरा छिटक जाती चाँदनी-

 *

स्वतः सज जाता है मन में प्रेम का दरबार है

मधु गमक से आप भर जाता है सब वातावरण

कामनायें नाच-गाकर करती है नव सुख सृजन

 *

 गुनगुनाती भावनायें अधरों में मुस्कान ले

भावनायें भाग्य का करती सहज वन्दन नमन

खुशी तो खुशी का वरदान प्रकृत स्वभाव है

 *

 खुला है व्यवहार उसका कहीं नहीं दुराव है

इसी से सबको है प्यारी कल्पना मनभावनी

सद‌भाव से करता है मन हर दिन ही जिसकी आरती

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७४ – नवगीत – जाग सखी री… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जाग सखी री…।

? रचना संसार # ७४ – गीत – जाग सखी री…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

जाग सखी री उतर क्षितिज से

आया सुखकर भोर।

*

उदयाचल से झाँक रहा है,

देखो शुभदे दिनकर।

बादल अभिनंदन करते हैं,

सूर्यदेव का हँसकर।।

तुहिन कणों के अगणित मोती,

बिखरे चारों ओर ।

*

जाग सखी री उतर क्षितिज से,

आया सुखकर भोर ।।

**

महकी देखो सुभग वाटिका,

लदी सुमन से डाली।

पंचम स्वर में कूक रही है,

कोयलिया मतवाली।।

मन को आनंदित करता सखि,

मधुप -वृंद का शोर ।

*

जाग सखी री उतर क्षितिज से,

आया सुखकर भोर ।।

**

सरिता के तट चकवा- चकवी,

गीत प्रणय के गाते।

बड़े सवेरे उठे बटोही,

अपने पथ पर जाते।।

नभ में ओझल हुआ सुधाकर,

दिखता व्यथित चकोर ।

*

जाग सखी री उतर क्षितिज से,

आया सुखकर भोर ।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता ? ?

वे जिन्हें

आशंकाएँ कहते थे,

मैं उनमें

संभावनाएँ पढ़ा करता था,

अब जाने क्यों

संभावनाओं की

सदाफूली आँखों में

उग आई हैं

आशंकाओं की नागफनियाँ,

ऐसा क्यों हुआ कि

मृग को अपनी नाभि में

कस्तूरी नहीं दिखी,

अरे ! कितने दिन हुए,

कोई कविता नहीं लिखी!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०३ ☆ भावना के दोहे – प्रीत ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रीत।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रीत ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

शब्द सुमन सुरभित हुए, प्रीत प्रेम का भाव।

नेह नयन की लालसा, पड़ता यही प्रभाव।।

* 

गीत प्रीत लिखते गए, जग में गाते गान।

तुलसी मीरा सूर की,  होता छबि का भान।।

 *

प्रियवर तुम कविवर बने, ख्याति बढ़ी है खूब।

गर्व बहुत तुम कर रहे,  जाओ कहीं न डूब।।

 *

पावन  धरणी सौम्यता, अबला बनती आज।

उसे निगलता आज वह, कुंठित यही समाज।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८४ ☆ कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी…। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८४ ☆

☆ कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

खूब घूम लो मथुरा काशी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

*

दान दिखावे के तुम करते

जबरन अपने मन को भरते

खूब  लगाते गंगा डुबकी

घर में बैठी मात उदासी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

*

दया धर्म का ज्ञान नहीं है

अपनों का भी मान नहीं है

हर क्षण रहते घिरे स्वार्थ में

माँ को समझें घर में दासी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

*

झूठ – कपट के संगी साथी

कोरी बातों में जो हाथी

धनी न बिल्कुल बात-साख के,

लेते सच के नाम उबासी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

*

धन दौलत की चाह बहुत है

राग-द्वेष की दाह बहुत है

धर्म-कर्म  करनी-कथनी के

सब व्यवहार  विरोधाभासी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

*

रिश्ते – नाते रखे ताक पर

हर पल गुस्सा रहे नाक पर

चैन नहीं ‘संतोष’ नहीं है

सुख-सुविधा की चाह बिलासी

पर अँखियाँ प्यासी की प्यासी

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ४ – कविता – कुछ पता नहीं… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘कुछ पता नहीं…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४ ☆

? कविता – कुछ पता नहीं…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

इस छोर को तो थामा मैंने,

उस छोर का,

कुछ पता नहीं..

 

क्यों डर रही पतंग हवा में,

पकड़ कुछ ढीली,

कुछ पता नहीं..

 

थी अब तक खुशियां मेरी मुट्ठी में,

रेत की तरह फिसल रही,

कुछ पता नहीं..

 

जो मेरे भी इंतजार में तड़प उठे,

उन तरसती निगाहों का,

कुछ पता नहीं..

 

हम तो चले थे कदम ब कदम पीछे तेरे,

कब मिटा दिए निशां लहरों ने,

कुछ पता नहीं..

 

उतावली हो रही बहारें,

महकने को मचलने को..

मगर अब इंतजार..

कुछ पता नहीं..

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २७४ – मिसळ पाव…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २७४ – विजय साहित्य ?

☆ मिसळ पाव…! ☆

☆

मोड आलेल्या, मटकी संगे

रस भाजीचा, आस्वाद नवा

मसालेदार, झणझणीत 

पोटभरीचा, पदार्थ हवा.

* 

फरसाणाची, करा पेरणी

कोथींबीरीचा , हात सढळ

रस लिंबाचा, तर्री वरती

कांदा बारीक, मधे चपळ.

 *

मऊ पावाची, घेऊन जोडी

चला मारूया ,‌मजेत ताव

भूक लागता, रस्त्यावरती

चला खाऊया, “मिसळ पाव”.

 *

कोल्हापुरचा, झणका भारी

नाशिकातला, खासच स्वाद

खान्देशातला, खडा मसाला

मिसळींचा या ,चाखा आस्वाद.

 *

पोहे घालून, वाढे लज्जत

नगरी कींवा, असो पुणेरी

पदार्थ न्यारा,भूक वाढवी

कधी कुठेही, लावे हजेरी.

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ प्रकृति ☆ श्री परम शिवम ☆

श्री परम शिवम

(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी कविता – प्रकृति.)

☆ कविता – प्रकृति ☆ श्री परम शिवम ☆

प्रकृति स्त्रैण है

सहसा नहीं खुलती

प्रतीक्षा करती

थाहती है-

संसार की चोट खाते मर्म में संरक्षित विस्मयों की, विकलता की

अजानी दिशाओं की अलौट को पुकार माने मन

और जानने पर लहलहा उठे पुलक की, विह्वलता की

निश्छल जिज्ञासा की

ग़ैर लोलुप, ग़ैर-गिद्ध, ग़ैर-धंधाई दृष्टि की

देह में घुले काव्य, रस, ताप, वृष्टि की

हम से परखती हम को

तब प्रस्तुत करती स्वयं को

लिखा विधना ने जितना, नहीं उतना

उससे भी प्रचुर

निर्धारित से अधिक

नियति से अधिक

सृष्टा से अधिक

मृत्यु रचने वाला, छोटे मन का एक अधिनायक लगता ईश्वर

प्रकृति सबको जीवनाती-उदारती विराट गणतंत्र है

ये स्त्री, ईश्वर से मुक्त है

उससे स्वतंत्र है

☆

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – फंटूस! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – फंटूस! ? ?

ना सच्चे मन से

हँसते हो तुम,

ना सच्चे मन से

रोते हो तुम,

सारा जीवन

कृत्रिमता का लबादा

ओढ़े रहते हो तुम,

इतने पाखंडों में

कैसे जी लेते हो तुम?

 

इस प्रदर्शनप्रियता से

क्या तुम्हारा

दम नहीं घुटता फानूसो?

मरने से पहले,

जीना तो सीख लो फंटूसो!

?

© संजय भारद्वाज  

16: 47 बजे, बलि प्रतिपदा, 22.10.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ और वह…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – और वह…!

☆ ॥ कविता॥ और वह…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

उसने खरी-खरी कही

बिना  लाग- लपेट के

और वह मौन हो गया।

*

उसने सचाई के पक्ष में

अपनी जुबां को खोला

और  वह शत्रु हो गया।

*

उसने झूठ के खिलाफ

अपनी  सदा बुलंद की

और बेमौत मारा गया।

*

उसने एक अच्छे पिता

होने का फ़र्ज़ निभाया

और वह बुरा हो गया।

*

उसने  समय  के साथ

तालमेल बिठाया और

वह कामयाब हो गया।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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