हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२७ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२७ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

दाम दूल्हों के जैसे सोने हैं, 

मात्र शिक्षक के औने-पौने हैं, 

माफिये बिक रहे करोड़ों में 

क्या हुआ काम यदि घिनौने हैं।

0

साँप नेवले सभी हमारे दिल में पलते हैं, 

जैसे मन अपने हों वैसे रंग बदलते हैं, 

ये अपने कुविचारों-सुविचारों के प्रतिनिधि हैं, 

युद्ध हमेशा दो प्रवृत्तियों में ही चलते हैं।

0

प्यार के मौसम जब भी आये, 

लोगों ने पत्थर बरसाये, 

फिर आफत आने वाली है, 

तुमने फिर गेसू लहराये।

0

अफवाहों ने पंख लगाये, 

खौफनाक फिर मंजर आये, 

अम्न-चैन के जो दुश्मन हैं, 

उनने तिल के ताड़ बनाये।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ताकि… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ताकि… ? ?

सुनते हैं,

मरुस्थल कभी समंदर था,

एक समंदर है मेरे भीतर,

एक समंदर है तेरे भीतर,

चलो मिलें, बैठें, बतियाएँ,

ताकि हमारे समंदर में,

कभी कोई मरुस्थल न उग पाए!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०० – साथ निभाना साथी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “साथ निभाना साथी…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २००  – साथ निभाना साथी… ☆

☆

मेरा साथ निभाना साथी।

मुझे छोड़ मत जाना साथी।।

*

फेरे लिए अग्नि-पथ के हैं ।

प्रेम सुधा बरसाना साथी।।

*

सुख-दुख तो आना-जाना है।

इससे मत घबराना साथी।।

*

जीवन पथ पर चलें निरंतर।

कुछ भी नहीं छिपाना साथी।।

*

मेरा जो वह सब तेरा है।

ऐसे भाव मिलाना साथी।।

*

पथ पथरीले राह कठिन है।

उलझन सभी मिटाना साथी।।

*

ऊँचीं-ऊँचीं बनीं सीढ़ियाँ।

गहकर हाथ चढ़ाना साथी।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

27/11/25

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६१ – प्रतिष्ठा के नाम पर ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – प्रतिष्ठा के नाम पर…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६१ – प्रतिष्ठा के नाम पर ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

आयोजित होते हैं कार्यक्रम

लम्बी रकम देकर बुलाये जाते हैं

बाहर से लोग।

जब वे नहीं आ पाते

या कम आते हैं

तब नगर की प्रतिष्ठा का वास्ता देकर

फोकट में बुलाये जाते हैं नगर के लोग

जैसे

बाहरी लोगों को टिकिट देकर

की जाती है उन्हें जिताने की अपील

नगर की प्रतिष्ठा के नाम पर

सोचता हूँ

प्रतिष्ठा भी क्या चीज है

किसी के लिए अंडर गारमेन्ट

किसी के लिये

उतरी हुई कमीज है।

कुछ भी हो

प्रतिष्ठा बड़ी चीज है।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६१ – “राह तुम्हारी रही देखती…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “राह तुम्हारी रही देखती...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “राह तुम्हारी रही देखती...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

रहे कथानक अनुपम चर्चित

किंवदन्ती के ॥

जहाँ विछुड़कर रुके हंस थे

दमयंती के ॥

 

राह तुम्हारी रही देखती

मधुछंदा थी।

और पलट कर रही टेरती

प्रियंवदा  थी ।

 

इसी पुराने घाट, ठहर

पायल सँवारते ।

फूल टूट कर गिरे

अचानक वैजन्ती* के ॥

 

माला का सुखकर झुकाव

यों और कहीं था ।

फूल टूटने का कारण

बस वहीं कहीं था ।

 

हाँ, केवल उच्छवास वेग

वो सह न पाये ।

हुये मूर्च्छित गिरे

धरा पर, रसवन्ती के ॥

 

कर्ण फूल – कचनार, केश में

मृदुल कमल थे ।

जहाँ अलक के ब्याल

उड़ रहे सम्हल सम्हल थे ।

 

वहीं दूसरी ओर तनिक

विस्थापित होकर –

दृष्टि बिचारी विम्ब

खोजती पश्यंती के ॥

* वैजयंती

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – टी.आर.पी.  ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – टी.आर.पी. ? ?

लोकतंत्र के स्तम्भ का

अजब नज़ारा है,

आँख के गर्भ में है,

तब तक ही आँसू तुम्हारा है,

खारा पानी छलकाना

सबसे बड़ी भूल हो जाएगा,

देखते-देखते तुम्हारा आँसू

टी.आर.पी. टूल हो जाएगा..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४४ ☆ # “श्रद्धांजलि…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “श्रद्धांजलि…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४३ ☆

☆ # “श्रद्धांजलि…” # ☆

☆

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

व्यथित हैं वंचित शोषित

 गमगीन जवानी है

 

पिघल रहे हैं हिमखंड बहते धारे है

हमसे बिछड़े थे जो वह आज प्राण हमारे हैं

उजड़ गया है उपवन पतझड़ के मारे हैं

कांटो से चुभने लगे अब जो सहारे हैं

किससे करें फरियाद आंखों में पानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

तुम लाए थे गगन से तोड़कर तारे

जगमगाई थी कुटिया घर द्वार हमारे

रोशन हुए थे आंगन और चौबारे

कैसे भूलेंगे हम उपकार तुम्हारे

जीवन भर हम पर आपकी मेहरबानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

आपने हमको पढ़ना सिखाया

संगठित कर लड़ना सिखाया

दीक्षा दी हमें धम्म की

धम्म के मार्ग पर चलना सिखाया

धम्म के मार्ग पर चलते-चलते

मंजिल अपनी पानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

हम चिंतित है पर हारे नहीं है

हम विघटित है पर बेचारे नहीं है

सागर कितना भी उफान पर हो

हम विचलित है पर बेसहारे नहीं है

लड़ कर पाएंगे मंजिल अब डरना बेमानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

व्यथित हैं वंचित शोषित गमगीन जवानी है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ८६ – मगर चुपके, चुपके से… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मगर चुपके, चुपके से… ‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ८६ ☆ मगर चुपके, चुपके से… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

तू मुझे छुप छुप कर देखती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तू मुझे धीरे से स्पर्श, करती तो है,

 मगर चुपके, चुपके से,

तू हरदम मेरे सपने में, आती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तू मेरे दिल पर छाती जाती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरी नजर बयां करती, नाराज़गी,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरे लब भी करते हैं, शिकायतें,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरा दिल धड़कता है, मेरे लिए,

मगर चुपके, चुपके से,

तू भी मुझे रब से मांगती तो है,

मगर चुपके, चुपके से.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दो कविताएँ – [1] सफ़र [२] यात्राओं के स्वप्न ☆ श्री परम शिवम ☆

श्री परम शिवम

(ई-अभिव्यक्ति में श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) का स्वागत. पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर उपाधि। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी दो कविताएँ – [1] सफ़र [२] यात्राओं के स्वप्न .)

☆ दो कविताएँ – [1] सफ़र [२] यात्राओं के स्वप्न ☆ श्री परम शिवम ☆

[ १ ]

☆ सफ़र ☆ 

मै सफ़र याद करता

तो लोग याद आते

लोगों को याद करो

तो उनकी बातें

बातें

तो चेहरे

चेहरे !

तो उनपे पड़ती धूप, बुद्ध-स्तूप

धूप !

तो आँखे घिरी धूप में

आँखे याद करूँ

तो अपने ही स्वप्न याद आते-

पहाड़ों से गुजरते

देवदार पे सुस्ताते

अजानों को देख मुस्काते

और कभी किसी किनार पे डरता

मै सफ़र याद करता…

 

[ २ ]

☆ यात्राओं के स्वप्न ☆ 

यात्राओं से ज़्यादा

मेरे पास यात्राओं के स्वप्न रहे !

मैँ हर उस पहाड़, नदी, सिंधु-तट को जानता

जिसकी तरफ कोई पगडंडी जाती

या नहीं जाती

मैनें हर टपरे में चाय पी

काली चाय !

कई बार धूल-धक्कड़ से सना उठा

और सूर्योदय जमा किए

प्रकृति को घूरकर देखा

और चेहरों को कनखियों से

उतने जीवनों से मिला नहीं

स्मृति में जितने जीवन रहे

यात्राओं से ज़्यादा

मेरे पास यात्राओं के स्वप्न रहे !

☆

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५८ – हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५८ ☆

☆ हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ  ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

राइट टाइम ट्रेन रहें

कौन करेगा ट्रेन रहें?

.

टेलेन्टेड हैं यंग बहुत

राइट पथ पर ब्रेन रहें

.

बुलडोजर का जलवा है

साइलेंट क्यों क्रेन रहें

.

क्लीन-ग्रीन लाइफ-टाउन

तब जब बहती ड्रेन रहें

.

ड्रीम रियल्टी में बदलें

‘सलिल’ इनफ यदि ग्रेन रहें

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

६.१२.२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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