हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆

☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तिनके अब पैरों के तले

रौंदे नहीं जाएंगे

अगर जोर जबरदस्ती की

तो पैर जख्मी हो जाएंगे

 

तिनकों का जख्म

आसानी से नहीं भरता है

जख्म नासूर बन जाए

तो कभी-कभी इंसान

दर्द से मरता है

 

बड़े-बड़े आंधी और तूफान

बरगद को उखाड़ देते हैं

लेकिन वह भी

तुच्छ समझे जाने वाले

तिनके के आगे

सर झुका देते

 

तिनके की जड़ें

अंदर तक जाती है

ना वह मरती है

ना कुंभलाती है

इसकी गहराई किसी को

समझ नहीं आती है

 

तिनके दुर्बल सही

पर कमजोर नहीं है

किसी और का

उन पर जोर नहीं है

जंगल ही उनका अपना घर है

कहीं और ठौर नहीं है

 

तिनके को प्रकृति की पनाह

में रहने दो

उन्मुक्त  हवा ओं के साथ बहने दो

परिंदों की बोली कहने दो

निसर्ग  की धूप-छांव

सहने दो

 

क्यों की,

जब तिनके प्रचंड गर्मी में

झुलसते है

अंदर ही अंदर

सुलगते है

जंगल की भीषण आग बनते हैं

दावानल में ढलते है

तो वन के वन

जलकर राख हो जाते है

अहंकार में डूबे हुए

सब ख़ाक हो जाते है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०४ – युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता युद्ध और धुआं।)

☆ अभिव्यक्ति # १०४ ☆  

☆ युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

क्यों की हमने, प्रकृति से होड़,

क्यों लगाई हमने, प्रगति से दौड़,

क्या मिला हमें, आ गए हम कहां,

क्या मिला हमें, बस धुआं ही धुआं,

युद्ध में, कौन, जीता है आज तक,

जो भी लड़ा है, हारा ही है, आज तक,

अपनो को खो कर, कौन खुश हुआ,

जो भी जीता, वही  हारा ही तो है,

शांति, कभी युद्ध का प्रति फल नहीं,

विध्वंस ही तो युद्ध का परिणाम है,

चारों तरफ बस गुबार ही गुबार,

शांति है कहां, बस धुआं ही धुआं,

ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार, का, द्योतक है, युद्ध,

विनाशकारी, प्रलयंकारी होता, है युद्ध,

युद्ध में, युद्ध से कौन जीत सका है

सबका अहितकारी, ही तो  है युद्ध,

क्या मिला, कब किसे, क्या कहां,

बस धुआं ही धुआं, बस धुआं ही धुआं.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शृंगार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शृंगार ? ?

वह करती है शृंगार

परतें ढाँपे रखती हैं

काया और मन की

असंगति-विसंगति,

शृंगार स्त्रीत्व का

सच्चा पहरेदार है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४९ – कविता – राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४९ ☆

☆ कविता ☆ ~ राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सीता  का  संताप  बड़ा  था,  बीता  जीवन  संघर्षो  में ।

राघव  का  दुःख  भी कम न था,  आया सुख के वर्षो में।।

*

पर अग्नि में तप कर कैसे से, सोना निज चमक दिखाता है।

सीता  का  तप  तपकर मानो, राघव को विजय दिलाता है।।

*

सीता  शब्द  राम  दोनों  मिल,  महामन्त्र  बन   जाते  है।

ध्वजा शिखर की आज  कह  रही,  राम अवध में  आतें  हैं।।

*

सीताराम  शब्द  दोनों  मिल  मानवता  का  मान  बढ़ते हैं।

जीवन   जीने   के   कौशल   को  कौशलेंद्र  बतलाते  हैं।।

*

कैसे   रिश्ते   जिए   जाते   किससे   कैसा   नाता  हो।

वह  भी  जीवन  जी  सकता है, जिसको कुछ न आता हो ।।

*

आदर्शो  को   मानदंड   पर   कैसे    नापा   जाता   है।

राम  तुला  हैं  मानवता  के,  रिश्तों  को तौला  जाता  है।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २८ – कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “परिन्दे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २८ ?

? कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ऋतु विशेष में दूर देश से, ख़ास परिंदे आते हैं

बच्चे यूँ त्यौहारों में, मेहमान सरीखे आते हैं

 =2=

हेलमेल के मिसरी जैसे, जाने कहाँ गये वो दिन

अब रिश्तों की नीरसता ज्यों, फल भी फीके आते हैं

=3=

पीढ़ी नई, मृदंग नगड़िया रसिया फगुआ क्या जाने

इनको तो बस डी.जे.वाले, तौर-तरीक़े आते हैं

=4=

हँसी-ठिठोली न पहले-सी, हुई दिल्लगी भी ग़ायब

रंग लगाने के वो दिलकश, किसे सलीक़े आते हैं

=5=

देख दूसरों को संकट में, जश्न मनाती है दुनिया

लम्हे आगे-पीछे अच्छे-बुरे सभी के आते हैं

=6=

हमसे मिलने उमड़-घुमड़कर, देखो काले बादल भी

प्यार जताने समय-समय पर, पास ज़मीं के आते हैं

=7=

हमको भी ताउम्र फर्ज़ की, रीत निभानी होती है

तब जीवन के हिस्से में कुछ, ख़ास वज़ीफ़े आते हैं

=8=

इम्तिहान से सीख सबक़, अंज़ाम की कर न फ़िक्र ज़रा

पल जीवन में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे आते हैं

=9=

‘ठाकुर’ ठसक दिखाने से यूँ, काम नहीं चलने वाला

कथनी-करनी के दम, ख़ुशियों के दिन नीके आते हैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆ मुक्तक – ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆

☆ मुक्तक ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

कभी बोल मीठे तो कभी चीत्कार लिखता है।

कभी विपक्ष  तो  कभी सरकार लिखता है।।

यह कलम  का  सिपाही रुकता नहीं  कभी।

सही बात हो   तो  वह बार – बार लिखता है।।

=2=

कभी आर -पार तो कभी कारोबार लिखता है।

कभी विसंगति और कभी  प्रचार लिखता है।।

समाज राष्ट्र के  हर एक बिंदु को छूती कलम।

हर विषय को  छूता  वह सरोकार लिखता है।।

=3=

कभी ओज तो कभी  रस श्रृंगार   लिखता है।

कभी खिजा तो कभी खूब बहार   लिखता है।।

खुशी गम के   हर   एक पहलू को छूता वह।

कभी जीत तो कभी  कोई हार  लिखता   है।।

=4=

कभी व्यंग तो कभी बन के हास्यकार लिखता है।

कभी शांति  तो कभी वह अंगार  लिखता  है।।

छू जाती है कलम उसकी दिल  को    कभी।

जब भावनाओं का  पूरा ही संसार लिखता है।।

=5=

सब पढ़ते हैं   कि  बहुत जोरदार  लिखता है।

कभी दब के या  बन कर असरदार लिखता है।।

हर हालात को   लिखता वह खूब समझ कर।

सब कोई   और नहीं बस पत्रकार लिखता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६४ ☆ कविता – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६४

☆ भगवान हमें प्यार का वरदान दीजियेस्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये ।

औरों के कष्ट का सही अनुमान दीजिये ॥

*

दुनिया में भाई-भाई से हिलमिल के सब रहें

है द्वेष जड़ लड़ाई की – यह ज्ञान दीजिये ॥

*

होता नहीं लड़ाई से कुछ भी कभी भला

सुख-शांति के निर्माण का अरमान दीजिये ॥

*

निर्दोष मन औ’ शुद्ध भावनाओं के लिये

हर व्यक्ति को सबुद्धि औ’ सद्ज्ञान दीजिये ॥

*

दुनिया सिकुड़ के  आज हुई एक नीड़ सी

इस नीड़ के कल्याण का विज्ञान दीजिये ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ फिर, फिर, फिर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – फिर, फिर, फिर…!

☆ ॥ कविता॥ ☆

☆ फिर, फिर, फिर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

फिर   बिसात   बिछाए हैं,

फिर    पियादे   बिठाए हैं,

फिर    ख्वाब     जगाए हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  नगाड़े बजने लगे हैं,

फिर  योद्धा सजने लगे हैं,

फिर  शोले बरसने लगे हैं,

फिर  चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  परस्पर ठना ठनी है,

फिर  जंग में असि तनी है,

फिर  बीच कुर्सी ठगनी है,

फिर  चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  हार-जीत के दावे हैं,

फिर  धोखे हैं, बहकावे हैं,

फिर  दलदल बीच नावें हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  ढोल  पीटे जा रहे हैं,

फिर  वादे  किए जा रहे हैं,

फिर  सिर  झुके जा रहे हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यौवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – यौवन ? ?

वह परिभाषित

नहीं करती यौवन को,

यौवन उससे

परिभाषित होता है,

वह परिभाषा को

यौवन प्रदान करती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१८ ☆ सरस्वती वंदना ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपके द्वारा रचित – सरस्वती वंदना )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१८ – साहित्य निकुंज ☆

🙏 सरस्वती वंदना 🙏 डॉ भावना शुक्ल ☆

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

तेरे चरणों में मैया मेरा माथा होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

श्वेत कमल पर तू राजे

कर में वीणा धार।

मधुर-मधुर स्वर निकले

प्यारी – सी झंकार।

मन मंदिर में आना होगा।

माँ सरस्वती तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

नाद से तेरे गूंजे जग सारा

चारों दिशी  फैले उजियारा।

ज्ञान सुधा का अमृत बरसता

जीवन रस  बरसाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

 तेरी कृपा से मिलता  ज्ञान।

मन में सुमंगल गाते गान।

चरणों में तेरे शीश झुकाता।

भक्ति भाव का पुष्प चढ़ाता  ।

हर हृदय में प्रकाश फैलाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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