हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४३ – कविता – राखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “राखी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४३ ?

? कविता – राखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

रिश्तों की मनभावन तरंग राखियाँ

सावन की पावन उमंग राखियाँ

=2=

लाई है बहना शुभ रिश्तों की डोरी

सजती कलाइयों पे नवरंग राखियाँ

=3=

संकट में जब बहन हो चमत्कार देखिए

बन जाया करती केशरी बजरंग राखियाँ

=4=

बंधन साहस का,जब भी बाँधती बहना

लड़ती हैं फ़िर सरहद पर जंग राखियाँ

=5=

अनमोल अनोखा है ‘ राजेश ‘ये रिश्ता

मधुरिम उत्सव की ये मृदंग राखियाँ

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१७ ☆ मुक्तक – ।।राखी।।रक्षासूत्र।।रक्षाबंधन।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१७ ☆

☆ मुक्तक ।।राखी।।रक्षासूत्र।।रक्षाबंधन।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

नहीं  खंडित हो कभी   भी, यह भाई बहन का प्यार।

विस्तार तो है अनंत इसका, महिमा भी   अपरम्पार।।

स्नेह – प्रेम का बंधन यह है, नहीं केवल    रक्षासूत्र।

बस एक धागे में पिरो  दिया, वचनबद्धता का संसार।।

=2=

भाई  बहन  के  प्रेम – स्नेह, का प्रतीक है रक्षाबंधन।

एक सूत्र  की   ताकत  का, यह यकीन है रक्षाबंधन।।

सदियों से यही एक  विश्वास, चलता  चला  आया है।

इसी अटूट बंधन की  ही एक, लकीर  है  रक्षाबंधन।।

=3=

एक धागा है राखी पर  बांधा, प्यार अपरम्पार    है।

एक सूत्र में भरा हुआ  वचनों, का  पूरा  संसार  है।।

प्रेम- स्नेह लगाव  का  गर्व  है, यह पर्व रक्षा बंधन।

भाई करता बहन की   सुरक्षा, हर बार लगातार है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

☆ कविता ☆

☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

सब कुछ छोडा

हमने धीरे धीरे,

पर कमबख्त ये

ये अच्छाई न छूटी हमसे…

 

जमाने ने,

खूब ताने मारे

रूलाया भी खूब

गलत हम न थे फिर भी,

क्यों की ये अच्छाई….

 

आपसे,

दिल से प्यार

किया था हमने

गैर के बाहों में थी आप

पर न टोका हमने

क्यों की अच्छाई…

 

एक बार पूछती

उसे चाहती हूँ मैं

बीच आपके न आता

तासीर है संस्कारो का

क्यों की अच्छाई…

(तासीर = प्रभाव)

 

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०९ – गीत – क्रंदन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – क्रंदन

? रचना संसार # १०९ ?

☆ गीत – क्रंदन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

शूलों की क्यों करते खेती,

होती निशदिन ही अनबन।

घर रण का मैदान बना अब,

गूँज रहा नभ में क्रंदन।।

*

धन-दौलत की चाह बुरी यह,

आज कहाँ हमको लाई।

हुआ मरूथल है ये जीवन,

सूखी घर की अँगनाई।।

भोगें फल अपनी करनी का,

बना शिला यह कोमल तन।

*

विपदाओं के इस जमघट में,

चैन जगत् भी खोता है।

नीयत में भी खोट छिपा है,

प्यासा पनघट रोता है।।

रुकने को भी ठाँव कहाँ अब,

ताप बढ़ा है भारी मन।

*

बाँहों में जो साँप पले थे,

उनको दूध पिलाया है।

मारा था उसने ही ख़ंजर,

जिससे हाथ मिलाया है।।

कंटक के पादप को सींचा,

पुष्ष खिलें कैसे उपवन।

*

आशाऐं सब धूल मिलीं हैं,

हँसने पर पाबंदी है।

पिस जाता है घुन गेहूँ सँग,

बाजारों में मंदी है।।

ओढ़ मुखौटे चालें चलती,

नित कौरव की यह पलटन।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३६ ☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – रक्षा बंधन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रक्षा बंधन प्यार का, प्यारा सा त्योहार।।।

खुशियां भाई बहिन की, मना रहा संसार।।

 *

भैया घर पर आ रहे, यही बहन की चाह।

धागा राखी का लिए , देख रही है राह।।

 *

लगी द्वार पर टकटकी, देख रही हूँ राह।

राखी का त्योहार है, है बहना को चाह।।

 *

चौमासे की धूम है, हर दिन है त्यौहार।

संग सखी, भाई बहन, मिले पिया का प्यार।।

 *

धागा प्यारा लग रहा, है बहन का प्यार।

यह केवल धागा नहीं, रक्षा का त्योहार।।

 *

भाव समाहित हो रहे, मिलता है आशीष।

भाई आदर कर रहा, झुके सदा ही शीष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१७ ☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है संतोष के दोहे – रक्षा बंधन आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१७ ☆

☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा ☆

राखी पावन पर्व है, धागे का त्यौहार

सजी कलाई प्रेम से, मिला बहिन का प्यार

*

रक्षा का बंधन बंधे, होता जो अनमोल

बहिन सुरक्षित हो सदा, भाई के यह बोल

*

भाई को आशीष दे, करती बहिन पुकार

ईश्वर से यह कामना, सुखी रहे परिवार

*

खुशियाँ लेकर आ गया, राखी का यह पर्व

भाई पर करतीं बहिन, सबसे ज्यादा गर्व

*

सावन सुखद सुहावना, सजे सावनी गीत

रक्षाबंधन,कजलियाँ, बांट रहे हैं प्रीत

*

भाई की यह कामना, मिले बहिन का प्यार

बहिन हमेशा खुश रहे, ईश्वर से दरकार

*

दिखने में दो तन दिखें, बहे एक सा खून

पावन राखी पर्व पर, खुशियाँ होतीं दून

*

इंद्रधनुष सी राखियाँ, भरतीं मन उत्साह

प्रेम बढ़ाती परस्पर, रिश्तों की यह राह

*

दे शीतलता चाँद सी, भ्रात-भगिनि का प्यार

दिल में भी “संतोष”हो, बढ़े प्रेम व्यबहार

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३७ – कविता – तेरा रह जाना… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा रह जाना।)

☆ शशि साहित्य # ३७ ☆

? कविता – तेरा रह जाना…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर रंग धूमिल पड़ जाते हैं,

ताजा से बदल, फीके पड़ जाते हैं…

हर पल बदल कर, बीता हुआ बन जाता है…

हर सांस…. जीवन कम कर जाता है,

बूंद बूंद टपक कर सागर रीता जाता है…

सुबह हुई और सांझ ढली,

दिन यूं ही ढलता जाता है…

मनुज रूप का जीवन दुर्लभ,

बेकार ही बीता जाता है…

उठ जाग मुसाफिर.. अब तो गुन ले,

तू रह जाए” याद” वह राह पकड़ ले !!!!!,

कुछ ऐसे रंग भी होते हैं,

जो कभी ना फीके पड़ते हैं…

मेहनत कह लो, भक्ति कह लो,

ज्ञान कहो या दान ही कह लो…

परहित को जीवन आनंद बना लें,

दूजे होठों को मुस्कान थमा दें…

त्याग करें स्वार्थ का और सद्गुण को व्यवहार बना लें,

निश्चित फिर ये हो पाएगा,

अनंत काल तक रह जाएगा…

चला जाएगा… फिर भी तू “रह जाएगा”

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ देश में जम्हूरियत है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – देश में जम्हूरियत है…!

☆ ॥ कविता॥ देश में जम्हूरियत है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

आसमां  में शमशीरें तनी हैं,

सुर-असुरों दरमियाँ ठनी है।

*

विदूषक अपनी हरकतों से,

हवा  में फैलाए सनसनी हैं।

*

कोई लाख  जतन कर देखे,

नाग-नेवलों में कब बनी है।

*

देश पर संकट मंडरा रहा है,

फिर  लौट  आया गजनी है।

*

लोग आँख के होते हुए अँधे,

श्यामा  यामिनी हुई घनी है।

*

सभी एक आदम के जाए हैं,

औ’ धरती सबकी जननी है।

*

बेशक; देश में जम्हूरियत है,

मगर  बावजूद दीन-धनी हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जिजीविषा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जिजीविषा ? ?

संकट, कठिनाई,

अनिष्ट, पीड़ादायी,

आपदा, अवसाद,

विपदा, विषाद,

अरिष्ट, यातना,

पीड़ा, यंत्रणा,

टूटन, संताप,

घुटन, प्रलाप,

इन सबमें सामान्य क्या है?

क्या है जो हरेक में समाता है,

उत्कंठा ने प्रश्न किया..,

मुझे इन सबमें चुनौती

और जूझकर परास्त

करने का अवसर दिखता है,

जिजीविषा ने उत्तर दिया..!

 

?

© संजय भारद्वाज   

 दोपहर 3: 24 बजे सोमवार 9 मार्च 2020

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०७ ☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०७ ☆ 

☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सुखद मृत्यु ही गीत सुनाए,

शुभ कर्मों को कर लेना।

मत करना अपमान साधु का,

ईश्वर से कुछ डर लेना।

पैसा-पैसा खूब कमाया,

जोड़-जोड़ जीवन बीता।

नहीं किसी की करी भलाई,

जाता फिर रोता, रीता।

 *

मत घमंड पैसे का करना,

दान, पुण्य कर तर लेना।

 **

त्रुटियाँ तो सबसे हो जाएँ,

पर स्वीकार करो इनको।

क्षमा शक्ति है यहाँ अपरिमित,

कर लो तुम अच्छे कल को।

 *

हँसते और हँसाते रहना,

झरनों-सा तुम झर लेना।

 **

अंत समय में किए कर्म सब,

आ जाते मन, आँखों में।

दृश्य हजारों घूम-घूम कर,

दर्शाते हैं लाखों में।

 *

पश्चाताप न रहे किसी का,

हँसते-हँसते मर लेना।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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