हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – ”चार दिना की ज्वानी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

चार दिना की ज्वानी है

काहे की अभमानी है

*

एक दिना सब खें जाने

छोटी सी जिनगानी है

*

मढ़िया की सिढ़ियाँ चढ़बे

याद आत अब नानी है

*

गर्मी में दरसन देउत

बो बाबा बरफानी है

*

देखे बिना न चैन परै

ऐंसो दुश्मन जानी है

*

बाँदकपुर बारो भोला

जागेसुर बरदानी है

*

नाकों दम कर दव ऊ ने

भगवत’ बा भैरानी है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जीवन जिए जा रहा हूँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – जीवन जिए जा रहा हूँ…!

☆ ॥ कविता॥ जीवन जिए जा रहा हूँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

बचपन में, गाँव में,

बरसात के दिनों में

नदिया के पानी को तूफ़ानी रफ्तार से

जोर-शोर से दहाड़ मारकर

अपने प्रियतम सागर से मिलने के लिए

रोते-बिलखते हुए देखा है।

 

पर पापी पेट के फेरे में

जबसे घर-गाँव छूटा है

और महानगर में आकर बसा हूँ

महानगर के बीचों-बीच

चौबीसों घंटों सड़कों पर

वाहनों के लगातार बहते हुए

रेलों का शोर-शराबा सुनकर

कान बहरा गए हैं  और ह्रदय

एक अजीब से खौफ से बैठा जाता है।

 

रोज-रोज, बार-बार

मन वापस गाँव लौट जाने को करता है

पर गाँव में भी अब कहाँ

वो बचपन के लंगोटिया यार

निःस्वार्थ प्रेम करने वाले लोग रह गए हैं

इसलिए न चाहते हुए भी

महानगर में रहने के लिए

अभिशप्त जीवन जिए जा रहा हूँ।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – युद्ध के विरुद्ध… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – युद्ध के विरुद्ध… ? ?

युद्ध लीलता है ज़िंदगियाँ,

कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष,

 

जो चले जाते हैं,

उनके अपने,

लंबे समय तक

संभल नहीं पाते हैं,

जिन बच्चों की

चढ़ जाती है बलि

क्रूर युद्ध में,

उनके माता-पिता

जीते जी मर जाते हैं,

 

उजड़ जाते हैं मकान,

बिखर जाते हैं मोहल्ले,

सभ्यता को निर्वसन कर

जुलूस निकाला जाता है,

आदमी के अंदर का राक्षस,

पूरी विद्रूपता के साथ

बाहर निकल आता है,

 

कोई खो देता है हाथ,

कोई पाँव, कोई आँख,

मनुष्य से लेकर

जीव-जंतु, पशु-पक्षी,

हरेक रोने पर विवश होता है,

बची साँसों को

ढोने पर विवश होता है,

 

उत्सव को चीखों में

बदल देता है यूद्ध,

संहार को सृजन

घोषित कर देता है युद्ध,

 

पंछियों को दाना खिलाने वाले हाथ,

गिद्धों का भक्ष्य बनने लगते हैं,

आदमी का चोला ओढ़े गिद्ध

शिकार पर निकलने लगते हैं,

 

सुनो मनुज!

युद्ध कभी

अंतिम विजय नहीं होता,

युद्ध कभी

समस्याओं का अंत नहीं होता,

 

युद्ध केवल मरण है,

बलात थोपा हुआ मरण,

मरण जीव की नियति तो है

पर जीवन की नीति नहीं हो सकती,

 

नियति को

नीति सिद्ध करने का प्रयास है युद्ध,

जीव को जीवन से

च्युत करने का अट्टहास है युद्ध,

 

जीव को

जीवन की राह पर लौटाओ।

हे मनुष्य!

मनुष्य को युद्ध से बचाओ!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 11:37 बजे, 4 मार्च 2026, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १ ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

कुछ दिनों से

अजब घटनाएँ घट रही हैं।

परिचितों के पाँवों में

बिमाइयाँ फट रही हैं

लोग

बड़ी आतुरता से / बड़े गौर से

देखते हैं मेरा चेहरा / मेरा मुख

शायद कोशिश करते हैं

मन की इबारत को पढ़ने की

जिसे कहते हैं दुख।

मुख और में दुख

कोई तालमेल नहीं

किसी के मुख को पढ़ लेना

दुख को हर लेना

हँसी खेल नहीं।

ज्यादा हुआ/ तो

हँसा जा सकता है

किसी विपत्ति में फँसे पर,

तिनके की जगह

फेंका जा सकता है पत्थर

धार में धँसे पर

बड़ी अलग सी बातें हैं

दुख में रहना

दुख को सहना

और

चुप रहना!

क्रमशः…

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७५ – “विपदा का क्या – क्या आशय है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “विपदा का क्या – क्या आशय है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “विपदा का क्या – क्या आशय है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जितने बेटे उतने कमरे,

कहाँ रहेगी माँ , यह भय है ।

बेशक यह बूढ़ी अम्मा का,

सुविधा वंचित कठिन समय है ॥

 

माता जो निश्चेष्ट बैठकर

देख रही करतब ।

क्या ग्यारस, रविवार दिवस –

तिथि अखरा करते सब ।

 

जिन बहुओं के होने का

वह गर्व सदा करती ।

उनकी घनाक्षरी के आगे

चकित,अचंभित ज्यों छप्पय है।

 

सुबह नाश्ता, दोपहरी हो

या फिर संध्या की ब्यालू ।

क्रम से बटे तीन हिस्सों में

पर माँ के हिस्से आलू –

 

की चीजें उस मधुमेही को

मिलती रहती हैं प्रतिदिन ।

जान सकी, पति न रहने की

विपदा का क्या – क्या आशय है॥

 

तीनों बहुयें स्वांग किया

करती हैं लोगों के आगे ।

” अम्मा जैसी सासू माँ से

भाग हमारे हैं जागे ।”

 

कोई अगर ना देखे तो

मुह फेर चली जाया करती ।

मगर लोग भी जान गये

उनका यह केवल अभिनय है ॥  

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15 – 03 – 20 26

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हँसी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – हँसी ? ?

(यह रचना लिखते समय लगभग बीस वर्ष पहले पढ़ी महान कथाकार प्रेमचंद जी की कहानी ‘घासवाली’ का धुँधला चरित्र मस्तिष्क में था।)

भीड़ को चीरती-सी एक हँसी

मेरे कानों पर आकर ठहर गई थी

कैसी विद्रूप, कैसी व्यावसायिक

कैसी जानी-बूझी लंपट-सी हँसी थी

मैं टूटा था, दरक-सा गया था

क्या यह वही थी, क्या वह उसकी हँसी थी…..?

 

पुष्पा गाँव की एक घसियारिन थी,

सलीके से उसके  हाथ

आधा माथा ढके जब घास काटते थे

तो उसके रूप की कल्पना मात्र से

कई कलेजे कट जाते थे…..

 

थी फूल अनछुई-सी

जंगली घास में जूही-सी

काली भरी-भरी सी देह

बोलती बड़ी-बड़ी-सी सलोनी आँखें

मुझे शायद आँखों से सुंदर

उसमें तैरते उसके भाव लगते थे

भाव जिनकी मल्लिका को

शब्दों की जरूरत ही नहीं

यों ही नि:शब्द रचना रच जाती थी…..

पुष्पा थी तो मधवा की घरवाली

पर कुँआरी लड़कियाँ भी

उसके रूप से जल जाती थीं,

गांव के मरदों के अंदर के जानवर को,

कल्पनाओं में भी

उसका ब्याहता रूप नहीं भाता था

लोक-लाज-रिवाज़ों के कपड़ों के भीतर भी

उनका प्राकृत रूप नज़र आ ही जाता था…..

 

पुष्पा न केवल एक घसियारिन थी

पुष्पा न केवल एक ब्याहता थी

पुष्पा एक चर्चा थी, पुष्पा एक  अपेक्षा थी…..

 

गाँव के छोटे ठाकुर …… बस ठाकुर थे

नतीजतन रसिया तो होने ही थे,

जिस किसी पर उनकी नज़र पड़ जाती

वो चुपचाप उनके हुक्म के आगे झुक जाती,

मुझे लगता था गाँव की औरतों में भी

कोर्ई अपेक्षा पुरुष बसा है,

अपनी तंग-फटेहाल ज़िन्दगी में

कुछ क्षण ठाकु र के,

उन्हें किसी रुमानी कल्पना से कम नहीं लगते थे

काँटों की शैया को सोने के पलंग

सपने सलोने से कम नहीं लगते थे…..

 

खेतों के बीच की पतली-सी पगडंडी

डूबते क्षितिज को चूमता सूरज

पक्षियों क ा कलरव,

घर लौटते चौपायों का समूह

दूर जंगल में शेर की गर्जना

अपने डग घर की ओर बढ़ाती

आतांकित बकरियों की छलांग,

इन सब के बीच,

सारी चहचहाट को चीरते

गूँज रही थी पुष्पा की हँसी …..

 

सर पर घास का बोझ, हाथ में हँसिया

घर लौटकर, पसीना सुखाकर

कुएँ का एक गिलास पानी पीने की तमन्ना

मधवा से होने वाली जोरा-जोरी की कल्पना…..

 

स्वप्नों में खोई परीकुमारी-सी

ढलती शाम को चढ़ते यौवन-सा

प्रदीप्त करती अक्षत कुमारी-सी

चली जा रही थी पुष्पा …..

 

एकाएक,

शेर की गर्जना ऊँची हुई

मेमनों में हलचल मची

एक विद्रूप चौपाया

मासूम बकरी को घेरे खड़ा था

ठाकुर का एक हाथ मूँछोें पर था

दूसरा पुष्पा की कलाई पकड़े खड़ा था …..

 

हँसी यकायक चुप हो गई

झटके से पल्लूू वक्ष पर आ गया

सर पर रखा घास का झौआ

बगैर सहारे के तन गया था

हाथ की हँसुली

अब हथियार बन गया था…..

 

रणचंडी का वह रूप

ठाकुर देखता ही रह गया

शर्म से ऑँखें झुक गई

आत्मग्लानि ने खींचकर थप्पड़ मारा,

निःशब्द शब्दों की जननी

सारे भाव ताड़ गई

ठाकुर, पुष्पा को क्या ऐसी-वैसी समझा है

तू तो गाँव का मुखिया है

हर बहू-बेटी को होना तुझे रक्षक है

फिर क्यों तू ऐसा है,

क्यों तेरी प्रवृत्ति ऐसी भक्षक है …..?

 

ऐ भाई!

आज जो तूने मेरा हाथ थामा

तो ये हाथ रक्षा के लिये थामा,

ये मैंनेे माना है,

एक दूब से पुष्पा ने रक्षाबंधन कर डाला था,

ठाकुर के पाप की गठरी को

उसके नैनों से बही गंगा ने धो डाला था,

ठाकुर का जीवन बदल चुका था

छोटे ठाकुर, अब सचमुच के ठाकुर थे…..

 

पुष्पा की हँसी का मैं कायल हो गया था

निष्पाप, निर्दोष छवि का मैं भक्त हो चला था,

फिर शहर में घास बेचती

ग्राहकों को लुभाकर बातें करती

ये विद्रूप हँसी, ये लंपट स्वरूप,

पुष्पा तेरा कौन-सा है सही रूप ?

 

उसे मुझे देख लिया था

पर उसकी तल्लीनता में

कोई अंतर नहीं आया था,

उलटे कनखियों से

उसे देखने की फ़िराक़ में

मैं ही उसकी आँखों से जा टकराया था

वह फिर भी हँसती रही……

गाँव के खेतों के बीच से जाती

उस संकरी पगडंडी पर

उस शाम पुष्पा फिर मिली थी

वह फिर हँसी थी…..

 

बोली, बाबूजी! जानती हूँ,

शहर की मेरी हँसी

तुमने गलत नहीं मानी है,

पुष्पा वैसी ही है

जैसी तुमने शुरू से जानी है

हँसती चली गई, हँसती चली गई

हँसती-हँसती चली गई दूर तक…..

 

अपने चिथड़ा-चिथड़ा हुए

अस्तित्व को लिए

निस्तब्ध, लज्जित-सा मैं

क्षितिज को देखता रहा

जाती पुष्पा के पदचिह्नों को घूरता रहा,

खुद ने खुद से प्रश्न किया

ठाकुर और तेरे जैसों की

सफेदपोशी क्या सही थी,

उत्तर में गूँजी फिर वही हँसी थी !

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆ # “परीक्षा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता परीक्षा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆

☆ # “परीक्षा…” # ☆

जीवन के हर मोड़ पर

हर पल हर क्षण

विधाता परीक्षा लेता है

एक सबक सबको देता है

छोटा हो या बड़ा

गरीब हो या अमीर

सबको एक मौका देता है

बचपन में पाठशाला होती है

मिडिल स्कूल होती है

उसके बाद हायर सेकेंडरी

उसके बाद कॉलेज में

आगे की पढ़ाई होती है

कॉलेज से निकलकर

जीवन के  अथाह सागर में

आपके ज्ञान की

तजुर्बा और

स्किल की आजमाइश होती है

स्पर्धा के इस युग में

गला काट प्रतियोगिता होती है

कुछ पास होते हैं

कुछ फेल होते हैं

दृढ़ निश्चय  वाले

निराशा में संयम नहीं खोते हैं

कई बार प्रयास करते हैं

कभी जीत तो कभी हार होती है

संघर्ष के इस दौर में

मेहनत और संकल्प से

हर कठिनाई पार होती है

ज्ञान के सागर की कोई सीमा नहीं है

ज्ञान प्राप्त करने का कोई फार्मूला

कोई तेज या कोई धीमा नहीं है

बस लगन, कड़ी मेहनत और समर्पण ही जरूरी है

इसके बिना लक्ष्य प्राप्त करने की जिद अधूरी है

यह आपके जीवन के हर ध्येय की समीक्षा है

जीवन भर हर व्यक्ति को कदम कदम पर देनी पड़ती परीक्षा है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९९ – शब्द अनमोल… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता शब्द अनमोल।)

☆ अभिव्यक्ति # ९९ ☆ शब्द अनमोल☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

शब्दों से ही रूठे तुम,

शब्दों से ही मना लिया,

शब्द कितने घातक हैं,

शब्दों से ही बता दिया,

*

शब्द मरहम बनते हैं,

शब्द ही घाव देते हैं,

बोल से पहले सोचिए,

शब्द ही लगाव देते हैं,

*

जब इंसान लड़ते हैं,

शब्द मुस्कराते हैं,

शब्दों के तीर चलते हैं,

शब्द ही लहराते हैं,

*

तोल मोल कर बोलिए,

जब भी बोलें बोल,

शब्द तब ही बोलिए,

जब मौन से हों अनमोल.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७१ – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७१ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जमाना जान गया पर मुझे पता ही नहीं

हुआ है इश्क़ अगर तो हुई ख़ता भी नहीं

.

अदाएँ देख अगर दिल हुआ दिवाना तो

जुनूने-इश्क से डरना कोई वजह तो नहीं

.

किया नहीं था, हुआ जो वो हो गया खुद ही

पता नहीं कि किया इश्क़ या किया ही नहीं

.

जिधर भी देखता तस्वीर एक ही दिखती

नहीं बाहर है कहीं दिल में वो बसा तो नहीं

.

नहीं वजूद रहा उससे अब अलग जब से

कहूँ कैसे कि कुछ हुआ तो पर हुआ ही नहीं

.

नदी की धार है वो घाट हूँ मैं ठहरा सा

जुदा होकर भी कभी मैं हुआ जुदा ही नहीं

.

कहो मत नाखुदा किस्सा-ए-इश्क को लोगों!

करे सजदा ‘सलिल’ उसको जो है खुदा भी नहीं

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१४-३-२०२६

संपर्क:

१. विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

२. ए ५०३ रुद्राक्ष, भोपाल

 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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