हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ९३ – क्या-क्या लिखूं…? ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘क्या-क्या लिखूं…?।)

☆ अभिव्यक्ति # ९३ ☆ क्या-क्या लिखूं…? ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

लिखना चाहता हूं,

पर क्या लिखूं,

यादें, बचपन की,

क्या होगा उससे,

रिक्तता आ जाएगी,

सामने जहां हम,

जा नहीं सकते,

उन यादों को,

याद करने से क्या होगा,

बस याद ही आएगी,

बचपन के दोस्तों की,

बचपन की शैतानियों की,                    

बचपन में खेले गए खेलों की,

और पूरे बचपन की,

पढ़ाई के लिए निकलना,

स्कूल जाते वक्त,

रास्ते में बैठ जाना,

लंच बॉक्स खत्म कर देना,

और छुट्टी के वक्त,

स्कूल से वापस आ जाना,

क्या-क्या लिखूं,

क्या क्या याद करूं,

यादों में तो सब है,

पर लिखना नहीं चाहता,

क्यों लिखना है,

जब वह मिल ही नहीं सकता,

आशा और विश्वास की,

एक डोर बंधी हुई,

उन यादों से बस बंधे ही रहें,          

लिखने की जरूरत नहीं है.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६५ – चंद अश’आर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – चंद अश’आर)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६५ ☆

☆ चंद अश’आर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

दस्तक दरे-दिल पर न देता दोस्त हो

दिन न मुझको जिंदगी में देखना है।

.

दोस्त दरिया दिल दयानतदार दे

जिंदगी ने जिंदगी कर दी अता।

.

दिल! दुखाना मत कभी दिल दोस्त का

मुआफी मौला नहीं देगा तुझे।

.

तीरगी में दोस्त ही बनकर दिया

साथ मेरे उम्र भर चलता रहा।

.

बाँह थामी दोस्त की बर्बाद ने

दोस्ती ने कर दिया आबाद झट।

.

दोस्त को साया कभी मत बोलना

वह नहीं यह अँधेरे में साथ दे।

.

दोस्त के लगकर गले ऐसा लगा

चाँद-सूरज जमीं पर मिलते गले।

.

कयामत कुदरत ने ढाई दोस्त पर

दोस्त बोला- ‘छोड़ उसको, मुझपे ढा।

.

दोस्ती ने तर्क सारे फर्क कर

दो दिलों को एक कर ही दम लिया।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२७.१.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०४ ⇒ ३० जनवरी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “३० जनवरी।)

?अभी अभी # ९०४ ⇒ ३० जनवरी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गांधीजी का दूसरा नाम

प्रार्थना था ! एक प्रार्थना

सभा में ही उनके मुख से

अंतिम शब्द, हे राम !

निकला था ।

उनकी सर्व-धर्म प्रार्थना;

ॐ तत्सत् श्री नारायण तू

पुरुषोत्तम गुरु तू

सिद्ध बुद्ध तू,स्कंध-विनायक

सविता पावक तू ।

ब्रह्म मज्द तू,यह्व शक्ति तू

ईश पिता प्रभु तू,

रुद्र विष्णु तू,रामकृष्ण तू,

रहीम,ताओ तू ।

वासुदेव गो-विश्व रूप तू,

चिदानंद हरि तू,

अद्वितीय तू,अकाल निर्भय

आत्म-लिंग शिव तू ।।

ॐ तत्सत् …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उत्सवधर्मी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उत्सवधर्मी ? ?

जीवन की अंतिम घड़ी,

श्यामल छाया सम्मुख खड़ी,

चित्र, चक्र-सा घूमा,

क्षण भर विहँसा,

छाया के संग चल पड़ा,

छाया विस्मित!

जीवन से वितृष्णा

या उससे प्रीत?

ना वितृष्णा, ना प्रीत,

ब्रह्माण्ड की सनातन रीत,

अंत नहीं तो आरंभ नहीं,

गमन नहीं तो आगमन नहीं,

मैं आदि सूत्रधार हूँ,

आत्मा का भौतिक आकार हूँ,

सृष्टि के मंच का रंगकर्मी हूँ,

सृजन का सनातन उत्सवधर्मी हूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २१ – कविता – संविधान खोलकर… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “संविधान खोलकर“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २१ ?

? कविता – संविधान खोलकर… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

हम बाँटने वाले हैं अपना, ज्ञान खोलकर

ध्यान से सुनियेगा अपने, कान खोलकर

=2=

तज़ुर्बे की क़िताब में, खुलकर ये लिखा है

चोरों को न दिखाना, तुम मकान खोलकर

=3=

पाखण्ड – ढोंग, उसके  लिए पूजनीय है

जिसने पढ़ा-लिखा नहीं, विज्ञान खोलकर

=4=

वादों में-प्रलोभन दे, कटपीस बाँटकर

पूरा का पूरा ले गये, वे थान  खोलकर

=5=

सारे ज़हाँन के रचा, जिसने मकाँ-दुकाँ

बैठे हैं लोग उसी की दुकान खोलकर

=6=

निज आन-बान-शान-स्वाभिमान के लिए

खींच ले तलवार अपनी, म्यान खोलकर

=7=

‘राजेश’ वन्दे मातरम्, उन्हीं को ख़ल रहा

पढ़ा नहीं जिन्होंने, संविधान खोलकर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९४ ☆ गीत – ।। हर दिन एक नया संग्राम है जिन्दगी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९४ ☆

☆ मुक्तक ।। हर दिन एक नया संग्राम है जिन्दगी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

बस सुख और आराम ही नहीं है जिंदगी।

न होना दुख का निशान नहीं है जिंदगी।।

संघर्षों से जूझती वो होती जिंदगी है।

गमों पर लगे विराम वो नहीं है जिंदगी।।

=2=

ऐशो आराम तामझाम ही नहीं है जिंदगी।

बस खुशियों का पैगाम ही नहीं है जिंदगी।।

कभी खुशी कभी गम का ही नाम जिंदगी।

कोशिशों से पाना मुकाम वो है जिंदगी।।

=3=

हर सुख का मिला जाम नहीं है जिंदगी।

बस यूँ ही रहे गुमनाम नहीं है जिंदगी।।

संघर्ष अग्नि पर,तप कर बनता है सोना।

अपने स्वार्थ से ही काम नहीं है जिंदगी।।

=4=

सुख-दुःख का साया और घाम है जिंदगी।

हर दिन एक नया ही संग्राम है जिंदगी।।

अपने लिए नहीं दूजों के लिए जीना यहाँ।

सरोकारों के चारों धाम, वो है जिंदगी।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५७ ☆ कविता – ।। भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा ।। ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५७

☆ ।। भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा ।। स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

भारत परम पुरातन प्रिय देश है हमारा

दुनियाँ सराहती है इसकी विचार धारा ।

*

भावों की भव्यता देता इसे हिमालय

मन को पवित्र रखती गंगा की पुण्य धारा

वातावरण यहाँ का जन जन को मोह लेता

जो भी यहाँ पे आया वह हो गया हमारा।

*

हर देश, धर्म, भाषा संस्कृति को मान देना

हिल मिल के सबसे रहना, संदेश है हमारा ।

*

सुख- शांति से रहे सब जो भी यहां पे आये

बढ़ता रहा निरन्तर आपस का भाई-चारा

*

हम प्रेम के पुजारी वसुधा कुटुम्ब हमारा

पारस्परिक समन्वय शुभ मंत्र है हमारा ।

*

सर्वे भवन्तु सुखिनः निर्भय तथा निरामय

यह कामना हमारी जीवन का सहज नारा ।

*

जिसने हमें पुकारा, सहयोग कोई चाहा

उसके लिये निरन्तर उपलब्ध हर सहारा ।

*

सत्य न्याय के हर युग से रहे पुजारी

जो मानता है इनको वह मित्र है हमारा ।

*

सम्पन्न हुई कल जो ट्रेड डील फाइनल

जग के भविष्य को, देगी वो बड़ा सहारा

*

दुनियाँ ने एक स्वर से प्रस्ताव सब जो माने

उससे हुआ प्रकाशित भारत-सुयश सितारा ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७९ – नवगीत – मिलन की आस… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतमिलन की आस

? रचना संसार # ७९ – गीत – मिलन की आस…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।

उलझा बाहुपाश में मनवा,

हृदय मिलन की आस।।

*

महके बेला गंधिल क्यारी,

मधुर कलश मकरंद।

मंजुल मुखी रूप रति मोहे,

मधुमासी आनंद।।

महुआ किंशुक गुलमोहर ने,

लिखे प्रेम अनुप्रास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

चंदन काया दिव्य सुवासित,

दे आमंत्रण भान।

सम्मोहित सब चपल चंचला,

अवगुंठित पट जान।।

इन अधरों की पढ़ लो पाती,

सुखद मिले आभास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

चहुँदिशि है प्रतिबिंब प्रेम का,

क्षण संदल अभिसार।

प्रतिभासित कोमल सुदीप्त भी,

यौवन की रसधार।।

करे समर्पण तन-मन अपना,

डोर थाम विश्वास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

**

मेघावरी ललित प्रिय अलकें,

अनुपम अंजन धार।

दृष्टि-वाण से करती घायल,

दो आलिंगन हार।।

बजती मादक शहनाई भी,

आलोकित मधुमास।

*

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – परिवर्तन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – परिवर्तन ? ?

(कविता-संग्रह ‘यों ही’ से।)

खेत,

कुआँ,

दिशा-मैदान,

हाट,

साझा-चूल्हा,

चौपाल,

भीड़ से घिरा

बतियाता आदमी…..,

कुरिअर,

टेलिफोन,

मोबाइल,

फाइव-जी,

ई-मेल,

फेसबुक,

वॉट्सएप,

एक्स,

इंस्टाग्राम,

अलग-थलग पड़ा

अकेला आदमी…!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “एक मुट्ठी भर धूप” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – एक मुट्ठी भर धूप ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मैं एक मुट्ठी भर धूप

सहेज लाया था

तुम्हारे सानिध्य की

गुनुगुनाहट पाने को

ये अलग इत्तेफाक़ था, कि

जब कभी ज़ुल्फ़ों को छूने की तलब होती

तब तसव्वुर में बेपरवाह सी घटाओं

के स्पर्श की ख़्वाहिश जागती।

कभी किसी ख़ुशबू का एहसास

तकिये के किनारे कुलबुला कर

नींदों में किसी ख़्वाब का दख़ल करता है

यह तुम्हारा वजूद मेरी बेचैनियों का सबब

हमेशा बना करता

अब हम जुदा- जुदा हैं, यह और बात है

कि अब भी, माज़ी में रिश्तों का कोई सबब

बेवजह ज़हन को झकझोरता ज़रूर है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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