हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४७ ☆ # “रात अब तो ढल गई…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रात अब तो ढल गई…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४७ ☆

☆ # “रात अब तो ढल गई…” # ☆

☆

तुमको क्या कहें  हम

बिन कहें कैसे रहें हम

रातों को कितने ख्वाब टूटे हैं =

टूटे ख्वाबों को कैसे सहें हम

 

रात जब धीरे-धीरे बढ़ती है

अंधेरे की काली चादर चढ़ती है

तूफान आते हैं फिजाओं में

हवाऐं नई कहानी गढ़ती है

 

घटाओं में चांद छुप जाता है

वक्त कुछ देर रुक जाता है

सितारे बस टिमटिमाते हैं

आसमान जमीन पर झुक जाता है

 

तुम्हारे आंचल में रात होती है

चुपके चुपके से बात होती है

दो जवां जिस्म जब मिलते हैं

यादगार वह मुलाकात होती है

 

खुशनुमां रात अब तो ढल गई

ढलते ढलते हमको छल गई

प्रीत तो आज भी अधूरी है

हमारे अरमानों पर कालिख मल गई /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६२ – विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६२ ☆

☆ विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की…  

०

‘लोक‘ की भाषा है हिंदी,

‘तंत्र‘ की आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

०

वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

० 

एकता पर हिंदी बलिहार, 

लिंग दो वचन क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कविता – “लोग भूल जाते हैं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

पुनर्पाठ में —

☆ कविता – “लोग भूल जाते हैं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

लोग भूल जाते हैं

खराब मौसम और

गर्दिश के दिनों में

की गयी मदद ।

लोग भूल जाते हैं

संघर्ष के दौर में

अंधेरी काली रातों में

अपनी दहलीजों पर

दीया जला कर

राह दिखाने वालों को ।

लोग इस्तेमाल करते हैं

दूसरों के कंधों को

सीढ़ियों की तरह

और तमन्ना रखते हैं

आकाश छू लेने की ।

कोई नहीं जानता

वे लोग अपने अंधे सफर में

कहां गिर जाते हैं

कहां छूट जाते हैं

और कब लोग

उन्हें भूल जाते हैं ,,,,

कोई नहीं जानता

लोग कब भूल जाते हैं ,,,

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सिक्का ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सिक्का ? ?

मृत्यु क्या है?

फोटो का फ्रेम में टँक जाना,

जीवन क्या है?

फ्रेम बनवाना, फोटो खिंचवाना,

एक सिक्के के दो पहलू हैं,

कभी इस ओर आना,

कभी उस पार जाना।

(कविता-संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता से।‘)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५४ ☆ कविता – आत्मचिंतन से विमुख ये आज का संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – पंद्रह अगस्त-स्वतंत्रता दिवस…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५४ ☆

☆ आत्मचिंतन से विमुख ये आज का संसार…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

मै कौन हूं आया कहां से और है जाना कहाँ?

इन सरल प्रश्नों के उत्तर कठिन है पाना यहां ।

* 

 आदमी उलझा है बहुत जाति  के व्यवहार में

लाभ-हानि की जोड़-बाकी में फँसा बाजार में ।

 *

 है कहाँ सुधी आप की, मन में भरी है कामना

स्नेह और सद्भाव कम है द्वेष की है भावना ।

 *

 दृष्टि ओछी आज की है कल की न परवाह है

व्यर्थ ही अभिमान है सुनता न कोई सलाह है।

* 

 चाह उसकी सदा होती स्वार्थ औ सम्मान की

है कहाँ अवकाश इतना सोचे आत्म ज्ञान की ।

 *

 खुद से शायद कम है उसको धन के ज्यादा प्यार है

इसी से आत्म अध्ययन को न कोई तैयार है।

 *

ध्यान मन में आत्म सुख है और निज परिवार है

आत्मचिन्तन से विमुख  आजकल संसार है।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १८ – कविता – इस दौर के… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी  समसामयिक विषय पर एक विचारणीय रचना “इस दौर के…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १८ ?

? कविता – इस दौर के… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

पानी  पीकर  स्वर्ग सिधारो अमृतकाल के दौर में

गुरूघण्टाल बजा रये घण्टा,स्वच्छ शहर इन्दौर में

*

घूँट-घूँट की क़ीमत हमने दो-दो लाख चुकायी है

मातम की आवाज़  दब  गई ,  हर्ज़ाने के शोर में

*

साफ-सफाई में नंबर वन,उनकी इस गारण्टी को

देखो – देखो  लील  गई , लापरवाही एक कौर में 

*

सीवर का फीवर ले दूषित पानी घर-घर पहुँच रहा

चुल्लू  भर  पानी  भी  पहुँचे , भ्रष्ट ठिकाने-ठौर में

*

तीन – तीन इंज़न वाली ,गाड़ी की है रफ़्तार ग़ज़ब

पानी  से  पानी  टकराया  , पानी    मरा हिलोर में

*

गौर  से  देखो  तो  पाओगे  आस्तीन  में साँप पले,

छुपे  बबूलों  के  काँटे हैं , आज‌  आम   के बौर में

*

चुप रहना ‘राजेश’ मुनासिब,व्यर्थ झमेला क्यों करना

ठनी बहस जबसे सफाई पर,मीडिया औ महापौर में

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९१ ☆ मुक्तक – ।। नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९१ ☆

☆ मुक्तक।। नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

किसी की हार किसी की जीत होती है।

कुछ दोस्तों की जगह पाती नए मीत है।।

नई बात नया अंदाज  रखो नए साल में।

भरो मन प्रेम से जो रहे  न बिन प्रीत है।।

=2=

नववर्ष खत्म न हो ये तो जीवन गीत है।

प्रेम की धुन बनाओ   जीवन संगीत है।।

नव संकल्प का आगाज  हो नए साल में।

चलना साथ समय के यही   सही रीत है।।

=3=

अतीत नहीं भविष्य का दर्पण है नया साल।

नए विचारों नव   उत्साह सा है विशाल।।

जीवन ने दिया एक और मौका नए साल सा।

नववर्ष में सोचना चाहिए कुछ नए ख्याल।।

=4=

उम्र का वर्ष कम  नहीं  अनुभव बढ़ा है।

उत्साह का  पैमाना और  ऊपर चढ़ा है।।

नया साल पैगाम देता कुछ नया करने का।

वो ही जीता मुश्किलों सामने रहता खड़ा है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७७ – नवगीत – प्रीति गगरिया… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – प्रीति गगरिया…।

? रचना संसार # ७७ – गीत – प्रीति गगरिया…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

प्रीति गगरिया छलक रही है,

भटक रहा  उर बंजारा।

चातक मन निष्प्राण हुआ है,

मरुथल है जीवन सारा।।

*

प्रीत  घरौंदा टूट गया है,

करें चूड़ियाँ हैं क्रंदन।

मौन पायलों की रुनझुन है,

भूल गया है उर स्पंदन ।।

कैद पड़ी पिंजरे में मैना,

दूर करो अब अँधियारा।

*

अवसादों में प्रीत घिरी अब,

सहमी तो शहनाई है।

कुंठित हुई रागिनी सरगम,

प्रेम -वलय मुरझाई है।।

अवगुंठन में छिपा चाँद है,

पट खोलो हो उजियारा।

*

जर्जर ये जीवन की नैया,

हिचकोले पल -पल खाती।

बहती हैं विपरीत हवाएं,

भूले प्रिय लिखना पाती।।

गूँगी बहरी दसों दिशाएँ,

बहे आँसुओं की धारा।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बीज ? ?

धरती जन्मती है-

घने अरण्य, हरी घास,

कच्ची दूब, सुरभित पुष्प..,

 

धरती उपजाती है-

स्वादिष्ट कंदमूल, पौष्टिक अनाज,

फलों से लदी लताएँ, बुभुक्षा की सारी संभावनाएँ..,

 

धरती बलात पैदा करती है-

केमिकल से सने अनाज,

पेस्टिसाइड से भीगी तरकारियाँ,

संस्करित के नाम पर संकरित फल,

ख़ुशबू की राह तकते फूल..,

 

धरती उछालती है-

असीम समंदर, मीठी नदियाँ,

ताल-तलैया, प्यास बुझाती झील-कुईयाँ..,

 

धरती उगलती है-

सुनामी, ज्वालामुखी,

ज़हरीली गैस और भूकंप भी..,

 

जानते हो न,

‘धृ‘ धातु से बनती है धरती,

‘धरिणी‘ धारण करती है,

जो ‘धरती‘ है, वही धरती है,

जो निगलती है, वही उगलती है..,

 

सुनो,

कुछ समय अब भी शेष है,

विचार कर लो,

धरती क्या निगले,

ताकि क्या उगल सके..,

बीज तुम्हारे हाथ है..,

तुम सुन रहे हो न मनुष्य..!

(कविता-संग्रह ‘वह‘ से)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Dilemma/ऊहापोह… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Dilemma/ऊहापोह… ~”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Dilemma… ~ ??

☆

The deer was mesmerized,

gazing at its own reflection in the water

The infatuation with the self grew so intense that

all awareness of the surroundings faded away…

The deer lost all sense of caution

 

Suddenly—

a silent lethal leap,

and the deer’s neck was caught in the lion’s jaws

The reflection vanished from the water…

 

I do not know what has come over me—

the deer begins to look like a human,

and in place of the lion,

I see the jaws of Time

I am trapped in a dilemma—

is this merely an illusion of sight, or

has the truth finally begun to reveal itself?

☆☆☆☆

? ऊहापोह ?

☆

हिरण जल में अपनी ही छवि निहारने में मोहित था

‘मैं’ का आकर्षण इतना प्रबल हुआ

कि आसपास का भान जाता रहा

और चेतना, स्वयं से ही कट गई

अकस्मात—

दबे पाँव एक लम्बी छलांग

और हिरण की गरदन

शेर के जबड़ों में समा गई

जल की परछाई उसी क्षण अदृश्य हो गई

न जाने क्या हुआ है मुझे—

हिरण की जगह मनुष्य दिखने लगा

और शेर की जगह

काल के जबड़े

ऊहापोह में हूँ—

यह दृष्टि भ्रम है

या फिर

सत्य अब स्पष्ट होने लगा है?

☆

(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem ऊहापोह) 

☆हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि –  ऊहापोह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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