हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री सुनील सैनी सीना ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है श्री सुनील सैनी सीना जी द्वारा लिखित पुस्तक “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)पर चर्चा।

“मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री सुनील सैनी सीना ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – मेरी परछाई 

कवि – सुनील सैनी सीना 

समीक्षक- मनजीत सिंह 

 सहायक प्राध्यापक उर्दू कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

प्रकाशन- वैदिक प्रकाशन हरिद्वार 

कीमत- 250 रूपए 

☆ समता के हित की सरोकार कविताएं  – श्री मनजीत सिंह 

सुनील सैनी सीना की किताब मेरी परछाई भाग -2 की कविताएं हमारी सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक और सामाजिक चेतना की ऐसी प्रखर धारा हैं कि समय के प्रवाह ने उन पर कोई प्रभाव नहीं डाला है और हमारा अस्तित्व उनके बहुमूल्य लेखन से आलोकित और संरचित होता रहा है। उनकी वैज्ञानिक और साहित्यिक उपलब्धियाँ अब भी अध्ययन का विषय बन रहीं हैं और उनसे संबंधित कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रहतीं है। जिन्होंने बहुआयामी जीवन के हर रंग को स्वीकार किया और सामूहिक जीवन को प्रभावित करने वाले हर पहलू पर न केवल अपने विचार व्यक्त किए, बल्कि उसके संबंध में एक दूरगामी रणनीति भी तैयार की। जो पुस्तकें सामने आई हैं, उनके स्रोत मुख्यतः गौण है। सुनील सैनी सीना की कविता जो देश प्रेम से ओतप्रोत है कि पंक्ति 

इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से हैं, जलाने का शौक़ अंगारों पर अपने बदन को है।

वो जज़्बा वो हौसला ना कभी परस्त होगा, खिलेगा गुल कोई ऐसा आस जिसकी सारे चमन को है। ।

वार करेंगे सीने पे वार रहेगा “सीना”, दान कर देंगें अपने जीवन को शिक्षा मिली हमको कर्ण से है।

इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से है, क्रांति रूपी विरासत के अनमोल रत्न से है। ।

इनकी कविताओं में साहित्य, धर्म, इतिहास, नीतिशास्त्र, अध्यापन, संपादन, राजनीति, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, धर्मसुधार, दर्शन, पत्रकारिता, कृषि आदि पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है। इन्होंने दुष्ट दहेज के नाम से जो कविता लिखी उम्दा है।

बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। इसे मारना है तो कसम खाओ, करेंगे हमेशा हम दहेज से परहेज। ।

दहेज के कारण उत्पन्न होते, मामले इतने सनसनीखेज। मारते-जलाते गृहलक्ष्मी को, दहेज के लोभी बन दुष्ट-चंगेज। । बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। ।

इनकी कविताओं में देश प्रेम से ओतप्रोत सांस्कृतिक विरासत को बचाएं रखने वाली कविताएं हैं सलाम-ए-मंच की कविता की कुछ पंक्तियां 

पहचान दी, नाम दिया। जीने का मुकाम दिया। डर नहीं किसी बात का, वो जोश भरा जाम दिया। ।

जिन्दगी जीना है खुलकर बुजदिलों से वास्ता नहीं।

खुले आसमान में

शामियाना तान दिया

इसको सलाम है।

इस मंच ने हमें निखार दिया इसको सलाम है। ।

इस दरी ने

इसको

आवाज अब बुलन्द होगी, भीषण यह जंग होगी।

और बढ़ेगा कारवां शंखनाद से, रफ्तार अब नहीं तक मंद होगी। ।

इनकी कविताओं में सृजनात्मक, सृजनशीलता की भूमिका है। कहीं जीवन का कड़वा सच उजागर हाता है कविता में प्रगतिशीलता और जनवादी के स्तर पर पहुंचाने की पूरी कोशिश की है। कविता के अंदर कविता की की आत्मा को देखा जा सकता है। कवि की कविता जीवन जीने और आगे बढ़ने की बात कहतीं हैं। बहुत से सामयिक विषयों को छुआ है ‌कविता धोखा, मजबूर, इंसान, किसको ख़तरा, कहानी जिंदगी की, एक बदनसीब कहानी, जर्जर दिया, कल सबको पता चल जाएगा, ओ मां, गुरुदेव प्रणाम तुम्हे, रब जाने, मेरी पहचान, मुकाम जीने का, मजबूर इंसान, सोचो आदि कविताएं सहरानीये है। कहीं प्रकृति का अनुसरण सौन्दर्य, कहीं रिश्तों और सम्बन्धों का तालमेल दिखता है, तो कहीं देशप्रिय ओत-प्रोत रचनाएं, कहीं अन्तर्मन की आवाज़ सुनाई देती है, तो कहीं कल की उड़ान, कहीं उनकी रचनाएं समाज को शिक्षित करती हैं, कहीं कारे समाज को आईना दिखा जाती हैं, कहीं पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता। अभिव्यक्त करती हैं, तो कहीं भावों का समन्दर अन्तर्मन की गहराइयों को जाता है। सुन्दर आकर्षक और बेहद खूबसूरत रचनाओं का गुलदस्ता है मैंने परखा जिसको बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। जिसके लिए वैदिक प्रकाशन को कोटि कोटि धन्यवाद।

चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “जहर जो हमने पिया” – संपादक – अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है जहर जो हमने पिया पर  श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ “जहर जो हमने पिया” – संपादक – अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक – जहर जो हमने पिया

लेखक —  महिला सफाईकर्मी

संपादक — अशोक कुमार गर्ग/मनोज छाबड़ा/राजकुमार जांगड़ा

कीमत — ₹250/-(पेपरबैक)

प्रकाशक — यूनिक पब्लिशर्स कुरुक्षेत्र ।

Mbl — 90501-82156

☆ जहर पीकर भी ज़िन्दा हैं – श्री जयपाल ☆

हरियाणा में महिला सफाई-कर्मियो की आप -बीती की एक पुस्तक इन दिनों  में बहुत चर्चित है। जिसका शीर्षक है– ‘जहर जो हमने पिया’ । दरअसल यह  हरियाणा के हिसार मंडल की महिला सफाई कर्मियो की आप-बीती की दास्तान है जिसे उन्होंने स्वयं लिखा है । इस पुस्तक को हिसार मंडल के कमिश्नर श्री अशोक कुमार गर्ग,  प्राचार्य /लेखक श्री मनोज छाबड़ा और अध्यापक/लेखक श्री राजकुमार जांगड़ा जी ने संपादित किया है । प्रकाशित किया है, यूनिक-पब्लिशर्स कुरुक्षेत्र ने । इस पुस्तक में लगभग इकतालीस महिला सफाई कर्मियो की जीवन की पीड़ा दर्ज है ।

इन महिलाओं की आप-बीती सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । दरअसल इन महिलाओं ने हमारे समाज की पोल खोलकर रख दी है। सुविधा-संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त ऊंची  कही जाने वाली जातियों के पढ़े लिखे लोग अक्सर कहते सुने जाते हैं कि  समाज में जाति अब कहाँ है…!  लेकिन इन महिलाओं के बयानों से पता चलता है कि ऊपर से हमारा समाज भले ही ठीक-ठाक दिखाई देता हो लेकिन जाति की सडांध अभी भी उसके भीतर समाई हुई है, विशेष कर दलित समाज के प्रति घृणा की भावना। जिन लोगों को जाति का दंश नहीं झेलना पड़ता वे लोग ही यह कहते हैं कि अब जातीय भेदभाव समाप्त हो गया है लेकिन असलियत इसके ठीक विपरीत है …जाति है कि जाती ही नहीं।

अशोक कुमार गर्ग और उसकी टीम ने एक ऐतिहासिक कार्य का आगाज कर दिया है । इसका दूरगामी असर हमारे समाज पर पड़ेगा । जो लोग दलित जातियों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं, उन्हें भी सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि इतनी तरक्की कर लेने के बाद भी हम उनके प्रति  अपने व्यवहार को बदलना क्यों नहीं चाहते !! वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति की बात करते हुए आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि ऐसी कोई व्यवस्था अब भारतीय समाज में लागू नहीं है लेकिन ये महिलाएं अपने साथ बीती घटनाओं से यह साबित कर रही है कि वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति आज भी उनके उनके सिर पर बैठी हुई है ।

‘जिल्लत की रोटी’  में ‘सूरजमुखी’ कहती है–माँ-पिता ज़मींदार के सीरी थे।  तारों की छाँव में जाते थे । तारों  की छाँव में लौटते थे । मेरी पांच बहने और और चार भाई थे। गरीबी इतनी थी कि पढ़ाई की कभी सोच ही नहीं पाए..

.’..यदि कभी गलती हो जाए तो मालिक जाति की गाली देता,कभी ‘डेढ़’ तो कभी ‘चूहड़ा’ तो कभी मादर…’ ..’खाना खाने के वक्त एक-आध रोटी ज़्यादा खायी जाती तो फुसफुसाहट सुनाई देती– सेर अनाज खाकर भी पेट नहीं भरता । भूखे लोग हैं.. अपनी जात दिखा देते हैं ।’

सूरजमुखी भगवान से पूछती है– ‘तूं कैसा भगवान है..!! जी-तोड़ मेहनत के बाद भी भरपेट खाना नहीं देता !! तूं मिले तो मैं पूछूं कि बता मेरी खता क्या है ..!!’ अभी मेरी उम्र 12 बरस  की थी ।शादी की समझ नहीं थी ।लेकिन घरवालों ने बड़ी बहन के साथ ही उसके देवर के साथ मेरी शादी कर दी ।

इसी तरह ‘रेखा’  कहती है– “जब बारात आई तो उसमें एक की जगह  दो दुल्हे थे’ हम हैरानी में पड़ गए । एक लड़की की शादी है , दो दुल्हे क्यों..!! आखिरकार दादा जी ने बताया कि उसने ज़ुबान दी है कि मैं अपनी बेटी के साथ-साथ अपनी पोती की शादी दूल्हे के छोटे भाई से करूँगा ।’

‘कमलेश’कहती हैं..’ एक दिन एक आदमी काई लगी बाल्टी में से टॉयलेट के डिब्बे से पानी पिलाने लगा । हमने वहाँ पानी नहीं पिया ।

बबीता’कहती है…’ हम तीनो भाई-बहनों की बहुत दुर्गति हुई…किसी के भी मम्मी- पापा नहीं मरने चाहिए उनके बगैर बच्चों की जिंदगी खराब हो जाती है’ ।

मीना कहती है..’गंदगी बुरी लगती हैं पर पेट भरने के लिए सब करना पड़ता है…वे नंगे बदन, नंगे पैर सीवर में उतरते थे..पैरों में कांच भी थे..बहुत बार इन कर्मचारियों की मौत हो जाती थी क्योंकि उन्हें तुरंत उपचार नहीं मिलता..कई बार सांप,बिच्छू जैसे जहरीले जीव भी काट लेते हैं.. सीवरेज के पास से लोग निकलते हैं,उन्हें इतने से ही बहुत बदबू आ जाती है । लेकिन सीवरेज में सफाई का काम करते हुए  गंदगी, मुंह व आँखों में चली जाती है..काम के दौरान भूख लगने पर  गंदे हाथों से खाना पड़ता है..कोई पानी तक नहीं देता।

मेरी सास कहती थी–‘ज़मींदारों के घर काम करने से तो ये आठ हजार की नौकरी ठीक है’..

‘मीना’ भगवान से पूछती है…’ हमने तो अपनी जिंदगी में ऐसे बुरे काम भी नहीं किये…यह कैसा भगवान है.. जो मेहनत करने वालों के साथ न्याय नहीं कर पाता …कहीं मिले तो मैं उससे पूछूं कि हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है,जो हम इतना बुरा जीवन जीते हैं..सुना है कि तुम खूब दयालु हो..पर क्या तुम्हें हम पर दया नहीं आती..!!!

 इसी प्रकार से अन्य महिला कर्मियों के भी ऐसे ही अनुभव है जो दलित समाज के प्रति हमारे अमानवीय व्यवहार को बेनकाब करते हैं जिन्हें हम लीपापोती करके छुपाते रहते हैं और महान देश के महान नागरिक बने रहते हैं। आप-बीती की इन दास्तानों से यह पता चलता है कि दलित स्त्री को दोहरे शोषण का शिकार होना पड़ता है । एक दलित होने के कारण दूसरा पितृसत्तात्मक तानाशाही रवैये के कारण । एक तरह से वह महादलित है ।

नगर पालिका में काम करने वाली महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता ।ठेकेदार उनके साथ मनमानी करते हैं ।समय पर वेतन नहीं मिलता। कच्चे और पक्के कर्मचारियों में वेतन का भारी अंतर रहता है । उनके बच्चे उनकी इस हालत के कारण अनपढ़ रह जाते हैं । उनके चरित्र पर ताने कसे जाते हैं। स्कूल में अध्यापक भी इन बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते ।आज भी उन्हें लोग टूटी डंडी वाला कप देते हैं । पानी पिलाने से परहेज करते हैं । दूर बिठा देते हैं, सड़ चुकी या खराब चीजें खाने को देते हैं। इन चीजों को भी वे दूर से उनके हाथों में पटक देते हैं । 

घर में सास,पति,ननद देवरानी,जेठानी, बड़े बुजुर्गों और घर के  बाहर ज़मींदारों / ठेकेदारों /  पड़ोसियों/मालिको/दुकानदारों द्वारा इन इनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है । इतना विकास होने पर भी सीवरेज की सफाई के लिए सरकार के पास कोई उचित प्रबंध नहीं है । दलित मरते हैं तो मरें..किसी को क्या फर्क़ पड़ता है…!!

यह पुस्तक यही सवाल उठाती है कि समाज की दुर्गन्ध/गंदगी को दूर करने के लिए जो लोग आपने सारे जीवन को होम कर देते हैं, उन्हें हम सम्मान क्यों नहीं देते…!!उन्हें इंसान क्यों नहीं माना जाता..!!

महिला सफ़ाई कर्मचारियों की ये आप बीती कहानियां  इन कर्मियों द्वारा स्वयं लिखी गयी है । इसलिए इनके लेखन में भले ही एक  लेखक जैसी  कसावट और प्रवाह न हो  लेकिन इनमें जिस मासूमियत, निश्छलता औेर सादगी से इन महिला सफाई कर्मियों ने अपनी बात कही है, वह आत्मा को झकझोर देने के लिए काफी है । ये बहुत ही मार्मिक और भावुक कर देने वाले पल हैं जिन्हें इन्होंने अपने आत्म कथ्य में बहुत ही सिद्दत से पिरोया है।

पुस्तक को निश्चित रूप से पढ़ा जाना चाहिए ताकि अपने आप को श्रेष्ठ ,पवित्र, ऊंचे, और महान बताने वाले कुलीन वर्ग को इन कथाओं में अपने असली चरित्र का पता चले । ये कहानियां हमारे समाज को आईना दिखाने का काम तो करती ही है साथ इस गली-सड़ी व्यवस्था को बदलने के लिए प्रेरित भी करती हैं। पुस्तक के संपादकों–अशोक कुमार गर्ग,मनोज छाबड़ा ,राजकुमार जांगड़ा तथा प्रकाशक विकास सालयान को इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए सलाम..!!

समीक्षा – जयपाल

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम : कौन रोया रात भर?

विधा : कविता

कवयित्री : डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन : क्षितिज प्रकाशन, पुणे

 

? अनुभव में पगी नवोदित रचनाएँ  श्री संजय भारद्वाज ?

‘कौन रोया रात भर’ कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होनेवाला दूसरा संग्रह है। चूँकि उनका पहला और दूसरा कविता संग्रह एकसाथ ही प्रकाशित हुए हैं, अत: एक अर्थ में वे नवोदित हैं। दूसरा पहलू यह कि वे दीर्घकाल से लेखन कर रही हैं, अत: उनकी रचनाओं में जीवन का अनुभव उतरा है। फिर वे मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हैं, फलत: मनोभावों को बेहतर अनुभव करना और अनुभूति को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देना, इस कविता संग्रह में प्रखरता से दृष्टिगोचर होता है।

अनुभव जब शब्दों में उतरता है तो कुछ इस तरह अभिव्यक्त होता है-

वक़्त अपने साथ भी बिता लीजिए,

फ़ुर्सत मिले तो कुछ गुनगुना लीजिए।

अनुभव की एक और बानगी देखिए-

पार उतरने वालों ने मूल्य नहीं दिया,

अब स्वयं दे रहा नदी पर पहरा पानी है।

आयु के साथ चेहरे पर झुर्रियों का आना प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में अनुभव से उपजे दर्शन के दर्शन कुछ यूँ होते हैं-

दुखी मत होना ख़ुुद को आईने में देखकर,

सारे सिलवटें तब्दील हो जाएँगी राख में।

सिलवटों का राख होना जीवन की नश्वरता का प्रतीक हो सकता है। साथ ही यह आशावाद का उदाहरण भी हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि विसर्जन के बाद ही सृजन होगा।

अनुभवी जानता है कि समय अपना लेखा-जोखा यहीं पूरा कर लेता है। कविता में कुछ इस तरह उतरा है यह लेखा-जोखा-

किसने क्या किया और क्यों किया,

सबसे सवाल-जवाब कर लेगा।

हमें ज़रूरत नहीं है जोड़ने-घटाने की,

व़क्त  सारा हिसाब कर लेगा।

शिक्षित होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं होता। नेह, अपनत्व न हो तो निरा अक्षर ज्ञान किसी काम का नहीं।

शिक्षित होने का इतना प्रमाण काफ़ी है मुझे,

मेरे मानस पर तुम्हारा स्नेह का हस्ताक्षर हो।

दाम्पत्य का प्राणतत्व है प्रेम। इसमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, सहमति, असहमति सबका इंद्रधनुष अंतर्निहित होता है । इस इंद्रधनुष के अनेक रंगों को अपनी लेखनी की स्याही में भरकर कवयित्री कुछ चित्र उकेरती हैं-

1)

अपने मज़बूत इरादों से तुम हामी भरवा ही लेते हो,

लेकिन अब इच्छा है मेरी आनाकानी तुम तक पहुँचे।

2)

सोचा था कि कुछ पढ़ूँगी देर रात तक जाग कर,

और उनकी ख़्वाहिश थी कि बंद करके किताब रख दूँ।

सामान्यतः दो ध्रुवों का आत्मीय समन्वय होता है दाम्पत्य। यही दाम्पत्य का आकर्षण है और सहधर्मिता का सौंदर्य भी। इसकी यह बानगी देखिए-

बंधन होता है अगर सात जन्मों का, तेरे मेरे साथ का ये पहला जनम है।

जब तक साथ है, हाथों में ये हाथ है, हाथ ये छुड़ा ले नहीं किसी में भी दम है।

शब्दों का अपना सामर्थ्य है, अपने अर्थ हैं, अपनी अभिव्यक्ति है, तथापि मौन की मुखरता का आयाम  विस्तृत होता है।

अंतर्मन के द्वंद्व को, समझ सका है कौन।

वाणी जब सकुचा गई, मुखर हो गया मौन॥

फिर स्त्री का मानिनी रूप अपनी ख़ामोशी को मनवाना भी चाहता है।

जिन्हें फ़र्क पड़ता हो मेरी ख़ामोशियों से,

मना लेें वे मुझे आकर, रूठे हुए हैं हम।

प्रेम की विशेषता है रूठना, मनाना, एक दूसरे की भावना को समझना और उसे मान देना। राधा रानी रूठती थीं तो कृष्ण मनाते थे। सिक्के का दूसरा पहलू है कि कृष्ण मनाते थे तो राधा रानी रूठती थीं।

हम इक्कीसवीं सदी का नागरिक होने का कितना ही ढोल पीट लेें पर घर-परिवार, समाज में स्त्री को उसका समुचित स्थान और सम्मान देने में हमारा हाथ तंग ही रहा है। इस विसंगति की अभिव्यक्ति कवयित्री के शब्दों में कुछ इस तरह से स्थान पाती है-

परिवार को अपनी ममता और स्नेह से बाँध रखा,

रिश्तों की इस गर्माहट के प्रति रही है सर्द दुनिया।

सामूहिक थे तो परिवार थे, एकल हुई तो ‘फैमिली’ हो गए। समूह से एकल होने की यात्रा ने विश्व के किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा भारतीय समाज को अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में सामूहिकता का आनंद और सुरक्षा चक्र देख चुकी कवयित्री का युवाओं को स्पष्ट संदेश है-

घोसलों में अपने लौट कर परिंदे भी आते हैं,

भूल मत कभी करना, घर अलग बसाने की।

एकल होना यानी जड़ों से कटना, अपनों से कटना। जो अपनों का ना हो सका, उसका किसी अन्य से जुड़ सकने का विचार ही अतार्किक है। 

दूसरों में क्या जुड़ेंगे, जुड़ न पाए अपनों से जो,

बढ़ रहा है सामर्थ्य लेकिन भावनाएँ घट रही हैं।

एकल से एकाकी होता है मनुष्य। फिर इच्छा जागती है कि कोई जाने, पूछे उसके दुख को। इस पीड़ा की यह अभिव्यक्ति देखिए,

हमें भी ख़्वाहिश है कि मन के बोझ को हल्का करें,

पूछोगे तो बता देंगे कि क्यों इतने उदास हैं।

स्त्री को दो घरों की ज्योति यूँ ही नहीं कहा जाता है। डॉ ज्योति कृष्ण का मायका बिहार है जबकि उनकी ससुराल उत्तर प्रदेश है। दोनों राज्यों के भौगोलिक और सांस्कृतिक दर्शन पर उनकी कविताएँ इस संग्रह में हैं। यह सम्बंधों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो मायके और ससुराल के प्रति उनके ममत्व को भी अभिव्यक्त करता है।

इस संग्रह में प्रकृति की सुंदरता, उसकी अठखेलियोेंं का वर्णन है। कहीं वसंत का ख़ुमार शब्द पाता है, कहीं वर्षा की बयार की सौंध से कहन महक उठती है। कहीं काम की तलाश में गाँव से शहर की ओर होते पलायन का चित्रण है तो कहीं पर्यावरण पर चिंता शब्दों में ढलती है। इस संग्रह में माँ से सम्बंधित कविता है, पिता पर आधारित कविता है, अपने मकान से मध्यम वर्ग के जुड़ाव को दर्शाया गया है। संग्रह में मनुष्य की वाणी के महत्व पर रचना है तो देशभक्ति की वीणा की झंकार भी है।

पेड़-पौधों लता-गुल्मों से पर्यावरण हरा रहे,

विनाश से बची रहे, दीर्घायु धरा रहे।

सामूहिक हो या एकल, रिश्तो में वह प्रगाढ़ता नहीं रही जिसके चलते रिश्तों को रिश्ता कहा जाता था। सांप्रतिक स्थिति का यह सटीक बिम्बात्मक वर्णन देखिए-

रिश्तों की रौनकें आबाद अगर रहतीं,

घरों में मकड़ियों के जाले नहीं होते।

कहा जाता है, ’बेसिक्स नेवर चेंज।’ कितनी ही प्रौद्योगिक उन्नति हो जाए, सुख, सुविधा के साधन आ जाएँ, मूलभूत कभी नहीं बदलता। इसकी यह बानगी देखिए-

ज़िंदगी एक मोड़ पर थक कर बैठ जाती है,

अगर चलते रहना है तो पाँव से रिश्ता रखना।

‘य: क्रियावान स पंडित:।’ बिना उद्यम, बिना श्रम के कभी कोई परिणाम नहीं मिलता।

सोचा बहुत कुछ, किया कुछ नहीं,

तभी हाथ मेरे, लगा कुछ नहीं॥

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। कवयित्री को संविधान की प्रस्तावना मानो कंठस्थ है। इस संदर्भ में वे कहती हैं-

संविधान की हर पंक्ति सर आँखों पर,

प्रस्तावना के शब्द ज़बानी याद रहेें।

सृजन मनुष्य को विचार देता है। विचार मेेंं मनुष्य को चमत्कृत करने की क्षमता छिपी होती है। उसके चिंतन और मनन का कैनवास बड़ा हो जाता है। इस संदर्भ में शब्दों का यह चमत्कार देखिए-

जाने कौन चुपके से, ख़्वाब अपने रखकर गया,

चौकसी करनी पड़ेगी अब हमें सिरहाने की।

डॉ. ज्योति कृष्ण की कविता यात्रा जीवन के सारे खट्टे- मीठे अनुभवों को जोड़कर चलती है।  उनकी रचनाएँ स्वयं को जलाकर रोशनी करने की मानिंद हैं।

एक छंद मिला उस पार नदी के,

एक पर्वत के पार मिला।

पुष्प-पराग से अक्षर निकले,

शब्दों को शृंगार मिला॥

*

भाव मिले सागर के अंदर,

भाषा स्वर्ण खदानों से।

सब जोड़ा तब जाकर कवि के,

अंतस को उद्गार मिला॥

प्रस्तुत पुस्तक का मुखपृष्ठ प्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर ने बनाया है। यह चित्र शीर्षक को बहुआयामी बनाता है।

जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुए कवयित्री के अंतस के उद्गारों के इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद।’ कामना है कि उनका यह संग्रह उन्हें साहित्य के क्षेत्र में समुचित प्रतिष्ठापना दे।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अंतःकरण की आवाज है – सोल  वायस (Soul Voice: the voice within – by Swati Varma)☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अंतःकरण की आवाज है – सोल  वायस ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(Soul Voice: the voice within – by Swati Varma)

हाल में ही श्रीमती स्वाति वर्मा का एक लघु काव्य संग्रह “सोल वायस” का प्रकाशन हुआ है जिसमें उनके द्वारा हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में रचित 25 उत्कृष्ट कविताएं शामिल की गई हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि अपने इस काव्य संग्रह के माध्यम से स्वाति वर्मा साहित्य जगत से अपना परिचय एक समर्थ कवियत्री के रूप में कराने में सफल हुई हैं। यद्यपि यह स्वाति वर्मा का प्रथम काव्य संग्रह है परन्तु इसमें संग्रहीत सभी रचनाएं उनके सिद्धहस्त कवियत्री होने का प्रमाण देती हैं। एक ओर जहां उनकी कुछ कविताओं में उनकी विद्वता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है तो दूसरी ओर अंग्रेजी में लिखी उनकी कुछ कविताएं पाठकों को भावुक कर  सकती हैं। वर्तमान परिवेश को विषय वस्तु बना कर लिखी गई कविताओं को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि आज कल  के उथल-पुथल भरे माहौल ने उनके मन को  उद्वेलित किया है । स्वाति वर्मा की कविताओं से उनके अंतर्मन का आक्रोश और व्याकुलता की अनुभूति तो होती है लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनकी  कविताएं उनके  सुधारवादी दृष्टिकोण की परिचायक हैं । सहज सरल भाषा में लिखी गई उनकी कुछ कविताओं में आप कल्पना की उड़ान नहीं देख सकते क्योंकि सीधे दिल में उतर जाने वाली ये यथार्थ के धरातल पर लिखी गई हैं यही कारण है कि स्वाति वर्मा की कविताएं पाठक  को सोचने पर मजबूर करती हैं।यही कवि की सफलता है।स्वाति वर्मा की कविताएं जहां एक ओर समाज को प्रकृति के प्रति अपने उत्तर दायित्व का अहसास कराती हैं वहीं दूसरी ओर नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट और सामाजिक सरोकारों की उपेक्षा से उपजी पीड़ा भी उनकी कविताओं में उजागर होती है। स्वाति वर्मा अपनी समय सापेक्ष रचनाओं के माध्यम से यह संदेश देने में सफल रही हैं कि समाज में अगर कहीं  कुछ ग़लत हो रहा है तो साहित्यकार मूकदर्शक बना नहीं रह सकता। उनकी कलम में गलत को ग़लत कहने का साहस है परन्तु वे निराशावादी नहीं हैं घने अन्धकार में भी वे उम्मीद की किरण देख ही लेती हैं –

सुनसान अंधेरों में जैसे कुछ

रोशन सितारे दिखते हैं

सफेद पोशाक पहने वैसे कुछ

गिने चुने फ़रिश्ते हैं।

अपनी एक कविता में वे समाज को यह संदेश दे रही हैं कि हमारा अतीत कितना भी सुंदर क्यों न रहा हो लेकिन हमारे पास केवल हमारा वर्तमान है उसे ही हमें सुंदर बनाना है –

एक बस आज है हमारे पास,

चल इस आज को खास बनाते हैं।

कवि का मानना है कि यदि  मनुष्य के अंदर मिट्टी का कर्ज चुकाने की भावना समाप्त हो जाए तो इससे बड़ी कृतघ्नता और कोई नहीं हो सकती।” मिट्टी ” शीर्षक कविता में स्वाति वर्मा ने अपनी मन की पीड़ा को इस तरह उजागर किया है –

करती रही वो पोषण हमारा,

और हम उसमें जहर मिलाते चलें।

“हुड़दंगों का मेला” शीर्षक कविता में उन्होंने समाज विरोधी ताकतों पर तीखा प्रहार किया है-

हुड़दंगों का मेला लगा है,

सबके हुड़दंग की एक एक दुकान।

“मेरा नटखट लाल” शीर्षक कविता वात्सल्य रस से सराबोर सराहनीय रचना है।

स्वाति वर्मा ने अंग्रेजी में भी काफी कविताएं लिखीं हैं । उनमें से कुछ चुनिंदा कविताओं को इस काव्य संग्रह में शामिल किया गया है जो इस बात का प्रमाण हैं कि उन्हें अंग्रेजी भाषा में भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति में प्रभावी अभिव्यक्ति में हासिल है। स्वाति वर्मा ने “Love is” शीर्षक कविता में प्रेम को जिन उपमानों के  माध्यम से परिभाषित किया है वे सर्वथा उपयुक्त हैं-

A Mountain of feelings,

An Ocean of emotions,

A River of excitement,

The Tree of commitment.

स्वाति वर्मा ने अपने इस काव्य संग्रह में अपनी जिन अंग्रेजी कविताओं को शामिल नहीं किया है उन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत है कि उन्हें अपनी अंग्रेजी कविताओं का एक संकलन अलग से प्रकाशित करना चाहिए। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि उनके पास अपने मन की उदात्त भावनाओं की मर्म स्पर्शी अभिव्यक्ति  के लिए पर्याप्त शब्द भंडार है  और  पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देने की शैली में भावप्रवण सृजन की सामर्थ्य भी उनके अंदर मौजूद है।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “आपको दिक्कत क्या है..?” – श्री ईशम सिंह ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है  श्री ईशम सिंह के काव्य संग्रह आपको दिक्कत क्या है..?और उन पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ “आपको दिक्कत क्या है..?” – श्री ईशम सिंह ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक-आपको दिक्कत क्या है..?

लेखक– ईशम सिंह

कीमत–225/- पेपर-बैक

प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिककेशन, नई दिल्ली-1100032

☆ दलित विमर्श पर केंद्रित प्रतिरोधी कविताएं – श्री जयपाल ☆

आपको दिक्कत क्या है..? ईशम सिंह का इसी वर्ष न्यू वर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है । पुस्तक का शीर्षक–आपको दिक्कत क्या है ? इन कविताओं का मुख्य सवाल है । दरअसल हिंदू समाज में जाति प्रथा और उसमें भी  अस्पृश्यता का सवाल एक विचित्र प्रश्न है जो भारत को छोडकर अन्य कहीं नहीं पूछा जाता। ये कविताएं बार-बार पूछती हैं सवर्ण समाज से, अपने आप को श्रेष्ठ समझने वाली जातियों से, छोटी-छोटी मामूली बातों पर अपमानित करने वालों से, धर्मग्रंथों, देवी-देवताओं, भगवानों आदि से, जो बात-बात में दलित समाज को प्रताडित, लांछित और अपमानित करते हैं ।

आधुनिक बताए जाने वाले भारत में भी दलित जाति के व्यक्तियों को मल-मूत्र पिलाए जाने, पीट-पीटकर मार देने, माबलिंचिंग, गांए,देवता, मंदिर,धर्म-स्थानों के नाम पर प्रताड़ित करने/ बहिष्कार करने से कवि हैरान होता है और सवाल करता है कि आखिर आपको दिक्कत क्या है..?? अर्थात  क्या आप मानसिक रोगी  हैं या आपको किसी पागल कुत्ते ने काटा है या आप किसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं .?..? जो हमारे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करते हैं ।

कवि सवाल करता है कि उन्हें दिक्कत क्या है, घुड़चढ़ी से, नई पोशाक से, हमारे अंगूठों से अम्बेडकर की उंगलियों से,हमारी गर्दन से, मूंछों से..आखिर में कवि सीधा सवाल करता है—

अच्छा सच बताओ

 हमारे होने से

आपको दिक्कत क्या है..??

अधिकांश कविताएं दलित समाज की  दबा दी गई पीड़ा पर केंद्रित हैं लेकिन बहुत सारी कविताएं किसान, मजदूर, भिखारी , ट्रांसजेंडर, लैंगिक-भेदभाव, आनर-किलिंग, स्कूल कालेज के विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवन के एकतरफा/दोतरफ़ा/असफल  प्रेम ,भ्रूण हत्या, सोलोगेमी, दिव्यांग, एसिड अटैक, बहिष्कार की पीड़ा और समाज में अन्य हाशिया-गत वंचित समाज की  प्रताड़ना और पीड़ा को  बहुत ही मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं ।

दलित कविताओं–यूं ही तो नहीं, पदचिन्ह, डिफाल्टर, फिर आरक्षण..सर्विस बुक, आपको दिक्कत क्या है ?, चमार का पर्यायवाची,जाति,पोलिंग बूथ, प्रदूषण, गहरे पानी पैठी, मनु, तुम मिलावटी हो, टोकन, जय सियापति की, हमें गांव में नहीं रहना, मेरे गाँव का विद्रोह, पूर्वाग्रह’, माबलिंचिंग आदि में सदियों के संताप की पीड़ा है। शेष कविताएं भी मानवीय संघर्ष का उद्घोष है । मानवीय शोषण के विरुद्ध हैं । इंसानियत के पक्ष में ये कवितायें अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रही हैं।

कुछ कविताओं के कुछ हिस्सों का ज़िक्र करना यहां उचित होगा–

सर्विस बुक ने मुझसे

मेरी पहचान छीन कर

एक नई पहचान दी

…शेड्यूल कास्ट

 

चमार का है क्या ?

चल मर साले !

 

कोई तो होगा जिम्मेदार

हमारी इस स्थिति का

 

हो सकता है, अब फिर हो धृतराष्ट्र अंधा

मगर नहीं बंधी होगी पट्टी

गांधारी की आंखों पर

 

बियाबान जंगल सा हूं

अब यहां कोई शकुंतला नहीं आती

अपने दुष्यंत को पुकारने

 

मनु विचरण करता है आज भी

उसी यौवन अवस्था में

 

जो तुमने हमारी पीठ पीछे झाड़ू बांधा था न

उसी के प्रत्युत्तर में लिखी है कविता

 

असल में युद्ध सीमाओं पर नहीं

औरतों की छाती पर खेले जाते हैं

 

मत दिखाओ मुझे झूठी आजादी का सपना

जिसको जश्न है आजादी का, वो फहराए झंडा

क्योंकि मेरी मां मैला ढोती है

आज भी महाजन के घर

मेरा बाप सीरी है ज़मींदार के घर

हमें नहीं बनना मिट्टी का माधो

नहीं रहना हमें तेरे गांव में

 

हमारे पशुओं को भी नहीं बख्शा

शायद चमार थे वो भी

तभी पता चला मुझे

कि पशुओं की भी जात होती है

जैस जाट की भैंस जाट

‘आपको दिक्कत क्या है’–कवि का प्रथम कविता-संग्रह है । इन कविताओं में कवि कौशल कुछ कमतर दिखाई दे सकता है लेकिन कवि का विचार पक्ष किसी भी तरह से कमतर नहीं है। इस विचार के पीछे दर्द का एक दरिया है। विशेषकर दलित विमर्श की कविताओं में कवि की स्वानुभूति बेहद संवेदनशील और मार्मिक है। इन कविताओं में वर्ण-व्यवस्था के प्रति आक्रोश और विद्रोह के साथ नकार का तीखा स्वर है । श्रेष्ठता,कुलीनता और पवित्रता की कुंठा पर सीधा-सीधा प्रहार है।

सदियों के अन्याय और शोषण के खिलाफ कविता में आवाज उठाने वाले इस उभरते युवा कवि ईशम सिंह को सलाम !!

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

? चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – चौदह रत्न

विधा – कविता

कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

चौदह रत्न : धरोहर का स्मरण कराता संग्रह

? चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ  श्री संजय भारद्वाज ?

समुद्र मंथन हमारे पुराणों में वर्णित एक प्रमुख घटना है। इस मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी। इसी भाँति लम्बे समय के चिंतन-मनन के पश्चात कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का कविता-संग्रह ‘चौदह रत्न’ अब पाठकों के हाथ में है। संग्रह में मुख्य रूप से चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ हैं।

संग्रह का आरम्भ श्री गणेश एवं सरस्वती वंदना से होता है। कवयित्री की कामना है कि माँ सरस्वती उनके घर में विराजें।

*

श्वेत कमल का छोड़के आसन,

चरणों को धरती पे धारो ज़रा।

रख दो मेरे सर पे ज्ञान का हाथ,

माँ, आज विराजो तुम मेरे ही घर में॥

 *

लयात्मकता का अपना प्रभाव होता है। लय के चलते रचनाएँ सरलता से कंठस्थ हो जाती हैं। यही कारण रहा कि हमारी श्रुति परंपरा में इसका बड़ा योगदान रहा। कंठस्थ साहित्य एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक सहज रूप से संप्रेषित हो जाता है। इसका यह प्रमाण देखिए-

*

सिद्ध स्वाभिमान की, पुत्री वृषभान की,

मुरली की तान की पुकार जैसी राधिका।

कानन में, कुँज में, कृष्ण की कलाई धरे,

कच्ची, कली कोरी, कचनार जैसी राधिका॥

*

श्री राम और श्री कृष्ण हमारे लोकनायक हैं। उनकी जीवनगाथा हमारे जीवन के कण-कण में है, क्षण-क्षण में है। श्री राम के लिए कहा गया है, ‘रमते कणे कणे इति राम:।’ जो कण-कण में रमता हो, वही श्री राम हैं। संग्रह की चौदह कविताओं में श्री राम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित पर पाँच रचनाएँ हैं। इस रचना में श्री राम के प्रति कवयित्री का यह विश्वास देखिए-

*

अनुनय-विनय सब काम आ जाएँगे,

स्मरण करो तो सारे नाम आ जाएँगे,

छोड़कर अयोध्या का धाम आ जाएँगे,

हृदय से पुकार लो तो राम आ जाएँगे॥

*

वनवास के लिए निकले श्री राम भारद्वाज आश्रम पहुँचे थे। भारद्वाज मुनि से श्री राम ने पूछा था कि वे किस स्थान कहाँ रहें? भारद्वाज मुनि ने उन्हें नाना स्थान सुझाए। उसका एक उदाहरण देखिए-

*

जिनके मन में काम नहीं, क्रोध नहीं मद, मोह नहीं,

उसी हृदय में रहो जहाँ पर, लोभ नहीं और द्रोह नहीं।

जो मनुष्य नित विचार कर कहते प्रिय और सत्य वचन,

उसी हृदय में रहो सर्वदा सिय सहित तुम रघुनंदन॥

*

श्री राम यूँ ही पुरुषोत्तम नहीं हैं। वे मनुष्यता का मर्म हैं-

*

राम केवल नाम नहीं, सद्भाव है, सत्कर्म हैं ,

अंतस में विराजती इस मनुष्यता का मर्म हैं।

*

श्री राम कण-कण में हैं तो श्री कृष्ण चराचर में बसते हैं। वे सृष्टि का बीज तत्व हैं। श्रीमद्भागवद्गीता में स्वयं योगेश्वर का उवाच है-

*

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥

(अध्याय 10, श्लोक 39)

*

भावार्थ है कि चराचर का बीज कृष्ण हैं। उनके बिना किसी भी चर या अचर का अस्तित्व नहीं है। चराचर में विराजमान माधव के जीवन से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बंधित दो प्रसंग इन कविताओं में हैं। महाभारत से सम्बंधित प्रसंग भी इनमें देखने को मिलते हैं।

इन्हीं में एक प्रसंग अक्षय पात्र का है। सर्वविदित है कि केशव ने अक्षयपात्र द्वारा द्रौपदी एवं पांडवों की दुर्वासा मुनि के क्रोध से रक्षा  की थी। ब्रह्मांड के स्वामी का एक अन्न के एक दाने से तृप्त होना, जगत की तृप्ति है। इस भाव का यह प्रकटन देखिए-

*

इस कथा से केशव ने जग को दिया यही संदेश,

अन्न के प्रत्येक दाने की महत्ता है विशेष।

सारा ब्रह्मांड जिन योगेश्वर श्रीकृष्ण में व्याप्त है,

उनका भोजन करके तृप्त हो जाना पर्याप्त है।

*

श्री कृष्ण का जीवन 64 कलाओं में निपुणता का अनन्य उदाहरण है। कौन सोच सकता है कि जीवन के उत्तरार्द्ध में गीता का ज्ञान देनेवाला योगेश्वर, पूर्वार्द्ध में मनभावन कान्हा था। कान्हा का यह मनभावन रूप कवयित्री की इन पंक्तियों में अनुभव कीजिए-

*

सिर मोरपंख धारे, कारे नैन कजरारे,

मतवाले अलकों के झोल मनभावने॥

धूल-मिट्टी खाए, जसुमति रिसियाए,

बोले तोतले से मीठे-मीठे बोल मनभावने॥

*

मनभावन मनोहर रूप आगे चलकर अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक और मनुज के उत्थान का मानक बना।

*

अधर्म पर धर्म की विजय प्रतीक कृष्ण हैं,

पाप के कुचक्र का उत्तर सटीक कृष्ण हैं॥

……………………

जिनके बिन हर कथा अधूरी वह कथानक कृष्ण हैं,

मनुज के उत्थान का सर्वोच्च मानक कृष्ण हैं॥

*

गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य के साथ जो अन्याय किया, वह गुरुता के विरुद्ध था। शक्तिशाली की निर्बलता पर कवयित्री की यह अभिव्यक्ति देखिए-

*

अद्भुत, अद्वितीय, बेमिसाल थी वो दक्षिणा,

उससे भी बढ़कर वह निश्छल उसकी गुरुभक्ति थी।

एक परंपरा का दुरुपयोग करते-करते

निर्बल साबित हो गए वे श्रेष्ठ जिनमें शक्ति थी॥

*

कहा जाता है कि अंतर्मन से, करुण स्वर में, पूर्ण निष्ठा से ईश्वर को पुकारा जाए और ईश्वर न आएँ, यह हो ही नहीं सकता। गज और ग्राह के संघर्ष के संदर्भ में कवयित्री की ये पंक्तियाँ देखिए-

*

निश्छल मन करुण स्वरों में, जब हम उन्हें पुकारेंगे,

निस्संदेह विकट घड़ी से, हमको भगवान उबारेंगे।

*

इसी भाव का विस्तार इन पंक्तियों में शब्दबद्ध हुआ है-

*

जिनका स्वरूप निर्विकार है,उनके चरणों में नमस्कार है,

जो हरि गरुड़ पर सवार हैं, उनके चरणों में नमस्कार है।

*

मानव के भीतर देवता और दानव दोनों निवास करते हैं। यही कारण है कि एक देवव्रत और एक दुर्योधन हम सबके हिस्से में आया है। अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे मनुष्य का यह चित्रण भीतर तक उतर जाता है-

*

एक देवव्रत छिपा हुआ है, हम साधारण मानव में भी,

किसी न किसी माँ गंगा के, हम सारे भी बेटे हैं।

और एक दुर्योधन भी आया है हम सबके हिस्से में,

इसीलिये हम अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे हैं॥

*

भारतीय संस्कृति में गंगा, नदी मात्र नहीं अपितु माँ है। शिव ने जिसे जटा में धारण किया हो, जिसके जल का छिड़काव हर संस्कार में हमारी जीवन पद्धति का अंश हो, वह अमृतदायिनी मात्र नदी हो भी नहीं सकती। इस पयस्विनी की जो दुर्दशा हमने की है, कवयित्री उसके लिए माता से क्षमायाचना करती हैं-

*

अवनि पर अवतरित हो सब पाप तुमने धो दिए,

कृतज्ञता हमको दिखानी थी, मगर हम स्वार्थी हैं।

हमसे हुआ अपराध गंगे, भूल हमसे हो गई,

शर्म से गर्दन झुकी है, हम क्षमा के प्रार्थी हैं॥

*

संग्रह में माँ दुर्गा एवं महादेव की स्तुति पर आधारित रचनाएँ हैं। देवी-देवताओं की गाथा पर छोटी कविताएँ हैं। गंगा के प्रदूषण पर विमर्श है तो राधा रानी, गोपियों, बाँसुरी, माँ सीता, शबरी, कैकेयी पर भी चर्चा है।

कुल मिलाकर प्रस्तुत कविता संग्रह मूल रूप से आध्यात्मिक, धार्मिक आख्यानों पर आधारित है। यह काव्यात्मक प्रस्तुति आख्यानों को स्मृति में रखने में सहायक सिद्ध होगी। इसके माध्यम से संस्कृति से कट रही पीढ़ी हमारी धरोहर से परिचित भी हो सकेगी।

डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होने वाला यह पहली कविता संग्रह है। प्रकाशन का आरम्भ संस्कृति, दर्शन एवं आस्था पर आधारित रचनाओं से हो रहा है। यह शुभ लक्षण है। वे निरंतर लिखती रहें। कामना है कि उनकी आने वाली पुस्तकों के माध्यम से साहित्य एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो सके।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com, sanjayuvach2018@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ वैशाली की नगरवधू – आचार्य चतुरसेन की अनुपम कृति ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ पुस्तक चर्चा 🌺 वैशाली की नगरवधू🌺 श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

🍀आचार्य चतुरसेन की अनुपम कृति🍀

आज से लगभग पचास साल पहले यह पुस्तक पढ़ी थी। तब कितनी समझ में आई, याद नहीं। अभी इसको फिर से पढ़ा है, इत्मीनान से।

दोबारा पढ़ने की वजह भी स्पष्ट कर दूं। मैंने कहीं पढ़ा कि आचार्य चतुरसेन ने कहा था, “मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूं और ‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूं।”

यह भी कहीं पढ़ा कि मुंशी प्रेमचंद ने बनारस में आचार्य चतुरसेन से कहा था, “लिखते तो आप हैं, मैं तो कलम रगड़ता हूं।”

अम्बपाली जब अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुकी तो वैशाली जनपद ने उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी निर्णीत किया। वज्जी गणतंत्र के कानून अनुसार उसे ‘वैशाली की नगरवधू’ घोषित किया जाना था।

शुभ्र कौशेय धारण किए हुए अम्बपाली संथागार में उपस्थित हुई। वह अपना मत परिषद के सामने प्रकट करने के लिए प्रस्तुत हुई थी। अम्बपाली के होंठ हिले और वीणा की झंकार के समान उसकी वाणी ने सुधावर्षण किया, “भंते, आपके आदेश पर मैंने विचार कर लिया है। मैं वज्जीसंघ के धिक्कृत कानून को स्वीकार करती हूं। मैं सहस्र बार इस शब्द को दोहराती हूं। वज्जीसंघ का यह धिक्कृत कानून वैशाली जनपद के यशस्वी गणतंत्र का कलंक है। भंते, मेरा अपराध केवल यही है कि विधाता ने मुझे यह अथाह रूप दिया। इसी अपराध के लिए आज मैं अपने जीवन के गौरव को लांछना और अपमान के पंक में डुबो देने को विवश की जा रही हूं।”

उसने अपनी कुछ शर्तें रखीं। पहली शर्त यह कि उसे रहने के लिए सप्तभूमि प्रासाद, नौ कोटि स्वर्णभार, प्रासाद के समस्त साधन और वैभव सहित दिया जाए। दूसरी शर्त यह कि उसके आवास की दुर्ग की भांति व्यवस्था की जाए और तीसरी यह कि उसके आवास में आने-जाने वाले अतिथियों की जांच-पड़ताल गणकाध्यक्ष न करें।

प्रारंभ में जिस सुख-सज्जा को उसने तुच्छ समझा था, वह अब उसके जीवन की अनिवार्य सामग्री हो गई थी। लेकिन अब भी संपूर्ण वैशाली के प्रति उसका पूर्ण विद्रोह जस का तस विद्यमान था।

एक दिन एकाएक आंख खुलने पर उसने देखा, उस सुरक्षित लताकुंज में एक प्रभावशाली पुरुष उसके सम्मुख खड़ा है। उसके एक हाथ में अप्रतिम वीणा है। अंबपाली ने उस रहस्यमय पुरुष का परिचय जानना चाहा।

उन्होंने वीणा झंकृत की। अंबपाली मूढ़वत बैठी रही। वह टकटकी बांधकर वीणा पर विद्युत-वेग से थिरकती उंगलियों को देखते-देखते अचेत-सी हो गई।

उसी अचेतन अवस्था में उसने उठकर नृत्य करना प्रारंभ कर दिया। नृत्य और वादन एकीभूत हो गया। कौन नृत्य कर रहा है, कौन वीणावादन और कौन उस अलौकिक दृश्य को देख-सुन रहा है, यह नहीं कहा जा सकता था।

1938 में आचार्य चतुरसेन को उपचार के सिलसिले में बिहार जाना पड़ा। वहां पहाडि़यों में भटकते हुए और जलस्रोत में घंटों स्‍नान करने के दौरान वे एक जागृत स्‍वप्‍न देखने लगे। ऐसा लगने लगा जैसे कोई ग्रंथ लिख रहे हों। आंखों के सामने दृश्‍य बनने लगते। पत्‍तों की बातचीत प्रत्‍यक्ष कानों में पड़ने लगी। उनके मस्तिष्‍क में अम्‍बपाली की छवि बनने लगी. अजंता एलोरा के भ्रमण के बाद अम्‍बपाली की मूर्ति आकार ले चुकी थी। वे इस छवि के साथ इतना घुलमिल गए थे कि एक दिन जब वे खुले आकाश तले चांदनी रात में लेटे थे तो आसमान में सजीव मूर्ति दिखाई दी।

‘मेरी आत्‍मकहानी’ में वे लिखते हैं, “मेरे शरीर के संपूर्ण जीवकोष कल्पना के वशीभूत हो गए और मैंने कहा – नाचो अम्बपाली! और अम्बपाली नाची। मैंने अपनी आंखों से उसे नील गगन में चंद्रमा के उज्ज्वल आलोक में नाचते देखा। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं भी आकाश में उसके निकट पहुंच गया हूं। एकाएक मुझे प्रतीत हुआ कि वह मूर्ति गायब हो गई। मैं दृढतापूर्वक कहता हूं कि मैंने स्वप्न नहीं देखा था। मैंने जो कुछ देखा जागते हुए देखा। सब सत्य। उस समय रात्रि के दो बजे थे। मेरे साहित्य लेखन का यही समय है। मैंने तुरंत उठकर उस नृत्य का वर्णन लिखा, जिसका संशोधित रूप ‘वैशाली की नगर वधू’ में कलमबद्ध है।”

उपन्यास में भावों का चित्रण और भाषा का सौष्ठव अद्भुत, अप्रतिम, अलौकिक है। पाठकों के आनंद के लिए एक प्रसंग ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:

“युवक ने समूचा भुना हुआ हरिण कंधे पर लादकर ज्यों ही कुटी में प्रवेश किया, वह वहां का दृश्य देखकर आश्चर्य-चकित जड़वत् रह गया। उसने देखा, पारिजात कुसुम-गुच्छ की भांति शोभाधारिणी एक अनिंद्य सुंदरी दिव्यांगना कुटी में आत्मविभोर होकर असाधारण नृत्य कर रही है।

“उसके सुचिक्कण, घने पादचुंबी केश-कुंतल मृदु पवन में मोहक रूप में फैल रहे हैं। स्वर्ण-मृणाल-सी कोमल भुज-लताएं सर्पिणी की भांति वायु में लहरा रही हैं। कोमल कदली-स्तंभ-सी जंघाएं व्यवस्थित रूप में गतिमान होकर पीन नितंबों पर आघात-सा कर कटि-प्रदेश को ऐसी हिलोर दे रही हैं जैसे समुद्र में ज्वार आया हो। कुंदकली-सा धवल गात, चंद्रकिरण-सी उज्ज्वल छवि और मुक्त नक्षत्र-सा दीप्तिमान मुखमंडल– सब कुछ अलौकिक था।

“क्षण-भर में ही युवक विवश हो गया। उसने आखेट एक ओर फेंककर वीणा की और पद बढ़ाया। अंबपाली के पदक्षेप के साथ वीणा आप ही ध्वनित हो रही थी। युवक ने वीणा उठा ली, उस पर उंगली का आघात किया, नृत्य मुखरित हो उठा।

“अब तो जैसे ज्वालामुखी ने ज्वलित, द्रवित सत्त्व भूगर्भ से पृथ्वी पर डंडेलने प्रारंभ कर दिए हों, जैसे भूचाल आ गया हो, पृथ्वी डगमग करने लगी हो। वीणा की झंकृति पर क्षण-भर के लिए देवी अंबपाली सावधान होती और फिर भाव-समुद्र में डूब जाती।

“उसी प्रकार देवी सम पर ज्यों ही पदक्षेप करती और निमिषमात्र को युवक की अंगुली सम पर आकर तार पर विराम लेती, तो वह निमिष-भर को होश में आ जाता। धीरे-धीरे दोनों ही बाह्यज्ञान-शून्य हो गए।

“सुदूर नील गगन में टिमटिमाते नक्षत्रों की साक्षी में, उस गहन वन के एकांत कक्ष में ये दोनों ही कलाकार पृथ्वी पर दिव्य कला को मूर्तिमती करते ही रहे। उनके पार्थिव शरीर जैसे उनसे पृथक हो गए। उनका पार्थिव ज्ञान लोप हो गया, जैसे वे दोनों कलाकार पृथ्वी के प्रलय हो जाने के बाद समुद्रों के भस्म हो जाने पर, सचराचर वसुंधरा के शेष-लीन हो जाने पर, वायु की लहरों पर तैरते हुए ऊपर आकाश में उठते चले गए हों और वहां पहुंच गए हों जहां भू: नहीं, भुवः नहीं, स्क: नहीं, पृथ्वी नहीं, आकाश नहीं, सृष्टि नहीं, सृष्टि का बंधन नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, एक नहीं, अनेक नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं!”

यह विशाल फलक की एक कालजयी कृति है। कहानी वैशाली और मगध साम्राज्यों, आसपास और दूर-दूर के छोटे राज्यों के लोक-जीवन, संस्कृति और राजनीतिक उठापटक के इर्दगिर्द घूमती है। इसकी केंद्रीय पात्र अंबपाली है लेकिन इसमें अनेकों अन्य प्रभावशाली पात्र हैं और उनसे संबंधित घटनाओं का विस्तृत चित्रण किया गया है। घटनाक्रम बहुत क्लिष्ट है लेकिन उसका वर्णन बखूबी किया गया है। राज-घरानों के भीतर छुपे रहस्यों की बुनावट, उनके प्रति पाठकों की उत्सुकता जगाए रखना, और उचित समय पर उनका उद्घाटन बहुत ही विस्मयकारी ढंग से किया गया है।

इसमें युद्ध की विभीषिका का भयावह रूप दिखाया गया है। महासमर्थ मागध सैन्य चमत्कारिक रूप से पराजित हुई थी। फिर भी, विराम-संधि पर मंत्रणा करते समय वैशाली के गणपति सुनंद ने पूर्ण परिपक्वता दिखाते हुए कहा, “भंतेगण सुनें, आयुष्मान मगध में एक स्वतंत्र गणतंत्र स्थापित किया चाहता है। गण-शासन का मूल मंत्र गण-स्वातंत्र्य है; यह शासन नहीं, व्यवस्था है जिसका दायित्व प्रत्येक सदस्य पर है। वास्तविक अर्थों में गणतंत्र में राजा भी नहीं है। प्रजा भी नहीं है। गण का संपूर्ण स्वामी गण है और गणपरिषद उसका प्रतिनिधि।”

लेखक ने कई वर्षों तक बौद्ध, जैन और आर्यों के साहित्य का गहन अध्ययन किया। उसमें पूरी तरह डूबकर, अपने को भुला बैठे, सबकुछ गहरे आत्मसात् किया, गूढ़ चिंतन-मनन किया, पागलों की तरह दिन-रात स्वप्न देखे, तब जाकर यह अनुपम कृति का सृजन कर सके।

उपन्यास में चित्रित काल-खंड तब का है जब बुद्ध और महावीर एक-साथ इस पृथ्वी पर धर्म के उपदेश कर रहे थे। इसमें धर्म और दर्शन का समुचित समावेश है। और अंत में, इस दृश्य की परिकल्पना करें:

“आनंद के साथ देवी अंबपाली ने भगवान के निकट आ परिक्रमा कर अभिवादन किया और बद्धांजलि सम्मुख खड़ी हो तीन महावाक्य कहे–

बुद्धं शरणं गच्छामि!

संघम शरणं गच्छामि!

धम्मं शरणं गच्छामि!

“भगवत ने उसे प्रव्रज्या दी, उपसंपदा की; और स्थिर धीर स्वर से कहा– ‘कल्याणी अंबपाली, सुन! जिन धर्मों को तू जाने कि, वह सराग के लिए हैं विराग के लिए नहीं, संयोग के लिए हैं वियोग के लिए नहीं, जमा के लिए हैं विनाश के लिए नहीं, इच्छाओं के बढ़ने के लिए हैं इच्छाओं के कम करने के लिए नहीं, असंतोष के लिए हैं संतोष के लिए नहीं, भीड़ के लिए हैं एकांत के लिए नहीं, अनद्योगिता के लिए हैं उद्योगिता के लिए नहीं, दुर्भरता के लिए हैं सुभरता के लिए नहीं; तो तू अंबपाली शुभे एकान्तेन जान कि न वह धर्म है, न विनय है, न शास्ता का शासन है।’

“कुछ देर मौन रहकर भगवत ने फिर कहा– ‘जा अंबपाली! तुझे उपसंपदा प्राप्त हो गई। अपना और प्राणिमात्र का कल्याण कर!

भगवत अरहन्त प्रबुद्ध बुद्ध ने इतना कह, उच्च स्वर से कहा– ‘भिक्षुओं महासाध्वी अंबपाली भिक्षुणी का स्वागत करो!

“फिर जयनाद से दिशाएं गूंज उठीं। अंबपाली ने आंसू पोंछे। भगवत सुगत की प्रदक्षिणा की और भिक्षुसंघ के बीच में होकर पृथ्वी पर दृष्टि दिए वहां से चल दी।”

#वैशालीकीनगरवधू #आचार्यचतुरसेन

#vaishalikinagarvadhu #acharyachatursen

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “हार्ट लैंप “– से निकली रोशनी की पड़ताल ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “हार्ट लैंप “– से निकली रोशनी की पड़ताल ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

नारी अस्मिता और उससे जुड़ी जमीनी हकीकत ,उत्पीड़न,टूटती खामोशियों और धधकते विद्रोह को कथा कहानियों का उपजीव्य बनाया जाता रहा है। पर कोई आवश्यक नहीं कि हर साहित्यकार की दृष्टि की गहराई और समझ का क्षेत्रफल एक जैसा हो। साहित्य एक शाश्वत प्रवाह है।हर लेखक पाठकों को कुछ नया और ताजा दे जाता है।

इस दिशा में  सन 2025 की बुकर पुरस्कार विजेता “बानू मुश्ताक” की  12 कहानियों के संकलन  “हार्ट लैंप” का उल्लेख जरूरी है।जिसका अंग्रेजी अनुवाद “दीपा भारती” ने किया है।यह संकलन उनके समग्र कथा संग्रह ” हसीना” से चयनित कहानियों का है।यूँ तो बानू– काव्य, कहानी ,उपन्यास, और निबंध को लेकर 9 कृतियों की प्रणेता हैं पर हार्ट लैंप में कुछ तो ऐसा है जो विश्व मानस को झकझोर रहा है। निर्णायक समिति के मैक्सपोर्टर के शब्द इसे भली भाँति अभिव्यक्ति दे सकते हैं— “यह अंग्रेजी के पाठकों के लिये कुछ नया और अनूठा है। यह एक क्रान्तिकारी अनुवाद है जो भाषा में खलबली मचा देता है। अंग्रेजी भाषा में एक नयी बुनावट पैदा करता है।”

बानू ने निजी जिन्दगी में, शादी के बाद कितनी ही तकलीफों का सामना किया है। कन्नड़ माध्यम से शिक्षा ग्रहण करनेवाली बानू लेखिका होने से पूर्व पत्रकार, वकील और सामाजिक न्याय की अवधारणा को बल देने वाले “बांदाया आन्दोलन” की प्रवर्तक रहीं। ये सारे पक्ष पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझने में मददगार रहे। दक्षिण भारत की मुस्लिम महिलाओं के जीवन की त्रासदी को उन्होंने वाणी दी है। न्याय के इस विचार के साथ उन्हें पर्याप्त विरोध सहना पड़ा और धमकियों से भी दो चार होना पड़ा।

उनकी कहानियों में सहनशीलता का वह रूप अंकित है जिसके सीने में खामोश विद्रोह पलता रहता है। यही उनका उद्देश्य भी रहा। सतह के अंदर पलने वाली उष्मा कभी न कभी ज्वालामुखी के रूप में फूटती ही है।

कृति में, हाशिए पर जी रही मुस्लिम स्त्रियों के प्रजनन अधिकारों,अदम्य आस्था, अंतर्हित उर्जा और शोषण की गाथा को अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।मुस्लिम समाज की असीम जीवट और संभावनाओं से भरी बालिकाओं, लकीर की फकीर खूसट बुड्ढियों, पूर्वाग्रही मानसिकता से ग्रस्त मौलवियों तथा छली भाइयों की दास्तां हैरान कर देती है जो अनेक भावनात्मक उतार चढ़ावों के ताने बाने से बुनी गयी है। इसे सन 1990 से 1923 के मध्य के कालखण्ड की अविकल तस्वीर कहा गया है।

कृति का भाषायी स्वरूप भी चौंकाता है। बोलचाल की मजाकिया, जीवंत, कहीं मार्मिक तो कहीं कटुतिक्त भाषा, कथानकों में विश्वसनीयता पैदा करती है।

जाति और धर्म की दरारों को चीरती हुई, सतह के नीचे पनपती सड़ांध  और  ताप को उजागर करती हुई, हर मोड़ पर विस्मित करनेवाली यह कलाकृति अद्भुत है। 

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆  जयपाल के काव्य-संग्रह “बंद दरवाजे” का समग्र विश्लेषण ☆ समीक्षा – श्री एस पी भाटिया ☆

पुस्तक चर्चा ☆ जयपाल के काव्य-संग्रह “बंद दरवाजे” का समग्र विश्लेषण  ☆ समीक्षा – श्री एस पी भाटिया 

आज प्रस्तुत है श्री एस पी भाटिया जी, (वरिष्ठ पत्रकार, अजीत समाचार) द्वारा श्री जयपाल जी के काव्य संग्रह बंद दरवाजे की समीक्षा।

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।)

पुस्तक – बंद दरवाजे (कविता-संग्रह)

कवि – जयपाल

प्रकाशक- यूनिक पब्लिशर्स-कुरुक्षेत्र

कीमत – 150/- पेपर-बैक

कवि जयपाल की कविताएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारत के #सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ का जीवित दस्तावेज़ हैं। उनका काव्य दलित जीवन, सामाजिक भेदभाव, जातिवाद, धर्मसत्ता और सत्ता की पाखंडता का वास्तविक अनुभव प्रस्तुत करता है। “बंद_दरवाजे” नामक यह काव्य संग्रह उस दुनिया की गहन पड़ताल है जहाँ समाज ने जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर मानवता को बाँट रखा है। इस समीक्षा में कवि की दृष्टि, भाषा, शैली, विषय, दार्शनिक दृष्टि और सामाजिक प्रासंगिकता का क्रमवार और निरंतर विश्लेषण किया गया है।

जयपाल का दृष्टिकोण अनुभवजन्य है। वह केवल सामाजिक यथार्थ का दर्शक नहीं, बल्कि उसमें जीने वाला कवि है। उसकी कविताएँ तीन स्तरों पर काम करती हैं – सामाजिक, दार्शनिक और मानवीय। सामाजिक दृष्टि से वह जातिवाद, धर्मसत्ता और असमानता की आलोचना करता है। दार्शनिक दृष्टि से वह ईश्वर, मानव और समानता के प्रश्न उठाता है। मानवीय दृष्टि से उसकी कविताएँ जीवन, प्रेम और अस्तित्व का सम्मान करती हैं। इस कारण उसकी कविताएँ प्रचार नहीं, प्रकाश हैं। वह चिल्लाता नहीं, सवाल करता है।

भाषा की दृष्टि से जयपाल की कविताएँ सरल और सहज हैं। वह कठिन शब्दों या अलंकारों का प्रयोग नहीं करता, बल्कि सादगी की गहराई में शक्ति रखता है।  इसमें पूरी सभ्यता और सामाजिक यथार्थ की टिप्पणी निहित है। उसकी शैली कथात्मक, संवादात्मक और प्रतीकात्मक है। वह कविता नहीं लिखता, बल्कि कथन को कविता बनाता है।

संग्रह में विभिन्न विषय प्रमुखता से उभरते हैं। “एक झूठी पत्तल” और “पूछताछ” जैसी कविताएँ जाति और असमानता पर केंद्रित हैं, जहाँ कवि जाति व्यवस्था को मानसिक रोग के रूप में प्रस्तुत करता है। “पवित्र–अपवित्र” में धार्मिक और सामाजिक पवित्रता का व्यंग्य है। यहाँ कवि ईश्वर या देवी-देवता पर नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक व्याख्या पर प्रहार करता है। “साफ-सफाई करते हुए” और “मैं जीना चाहती हूं” में स्त्री और दलित चेतना का संगम है, जहाँ दोहरी दासता और पीड़ा स्पष्ट रूप से सामने आती है। “जग्गु सरपंच”, “फूलों का टोकरा” और “दलितों के घर खाना” में राजनीतिक सत्ता की पाखंडता और वोट राजनीति पर करारा व्यंग्य है। “अंतिम सवाल”, “शूद्र” और “ढक्कन” जैसी कविताओं में सृष्टि, धर्म और मानवता को मानवीय कसौटी पर कसने का प्रयास किया गया है।

दार्शनिक दृष्टि से जयपाल का काव्य आंबेडकर और कबीर की परंपरा का आधुनिक रूप है। कबीर की तरह वह कहता है कि धर्म अगर इंसान को बाँटे तो वह धर्म नहीं। आंबेडकर की तरह वह चेतावनी देता है कि समानता के बिना स्वतंत्रता केवल छल है। उसका दर्शन मानववाद पर आधारित है, जहाँ ईश्वर नहीं, मनुष्य ही केंद्र है। जब वह पूछता है, “क्या भगवान भी मनुष्य बनना चाहता है कभी?” तो यह प्रश्न केवल ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि उस संपूर्ण व्यवस्था के लिए है जिसने मानवता को भुला दिया। यह एक दार्शनिक क्रांति है, जिसमें धर्म की ऊँचाई मानवता के दृष्टिकोण में खड़ी हो जाती है।

जयपाल का व्यंग्य गहरा और शालीन है। वह किसी व्यक्ति को निशाना नहीं बनाता, बल्कि पूरी व्यवस्था पर प्रहार करता है। वह हँसी नहीं उड़ाता, बल्कि सवाल उठाता है। “राम ने भीलनी के घर जाकर बेर खाए थे, और बाद में शंबूक ऋषि का सिर काट दिया था” जैसी पंक्तियाँ धार्मिक आख्यान पर व्यंग्य और सामाजिक विवेक का प्रयोग हैं। कवि धर्म और भेदभाव के संबंध को स्पष्ट करता है।

भाषा-विज्ञान की दृष्टि से जयपाल की कविताएँ लोकभाषा में लिखी गई हैं। ये भाषा साधारण है, पर भावनाओं और विचार की गहराई में अत्यंत प्रभावशाली है। उनकी कविताएँ किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सभी के भीतर मानवता और विवेक के लिए हैं।

कवि ने अपनी रचनाओं के साथ पूर्ण न्याय किया है। उसने न भावना को दबाया, न विचार को। हर कविता अपने उद्देश्य और अर्थ के प्रति ईमानदार है। क्रोध को वह तर्क में बदल देता है। उसकी हर कविता समाज की नब्ज़ पर रखा गया सर्जिकल प्रहार है।

जहाँ तक सीमाओं का प्रश्न है, कभी-कभी भाव-आवेश भाषा पर भारी पड़ता है। कुछ कविताएँ अत्यधिक सीधी हो जाती हैं, प्रतीकात्मकता कम दिखाई देती है। दलित पीड़ा का स्वर कुछ जगहों पर पुनरावृत्त प्रतीत होता है। पर ये खामियाँ ईमानदार काव्य की स्वाभाविक थकान हैं, कमजोरी नहीं।

संग्रह का सामाजिक और शिक्षाप्रद महत्व अत्यधिक है। इन्हें स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाने के लिए कि भेदभाव नैतिक रूप से खोखला है, और विश्वविद्यालय में दलित साहित्य, समाजशास्त्र और मानवाधिकार अध्ययन के लिए। समाज में यह कविता समझ और संवाद दोनों के लिए आवश्यक है। यह साहित्य केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि बदलने के लिए लिखा गया है।

कुल मूल्यांकन में जयपाल की विचार शक्ति अत्यंत सशक्त और तर्कसंगत है। भावनात्मक गहराई प्रामाणिक है। भाषा सरल, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली है। समाज पर उसका प्रभाव विचारोत्तेजक और परिवर्तनकारी है। कविता का उद्देश्य मनुष्य को केंद्र में रखना है और इस कसौटी पर कवि पूरी तरह खरा उतरता है।

समीक्षाश्री एस. पी. भाटिया
वरिष्ठ पत्रकार,अजीत समाचार।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

विचार मंथन करने से मैं अनुभव करता हूँ कि सृष्टि में कोई भी व्यक्ति किसी भी गुण- ज्ञान या विषय में पूर्णा-पूर्ण नहीं हुआ है और यदि ऐसा हुआ है तो वह देव तुल्य हो गया है या हो जाता है। तब आपका ‘प्रेम’ मानता है कि इस विचार में जो भी मैंने पूर्णिका (ग़ज़ल) गीत और काव्य रचे (लिखे) है, वो सभी नियम-धरम का पालन कर लिखे गये हों अर्थात इन रचनाओं पूर्णिका उर्दू में कामिल, गीत लेखन के नियम-धरम का पालन हुआ हो कहना उचित प्रतीत नहीं होता। यह मैं स्वतः स्वीकार करता हूँ कि काव्य लेखन के नियम-धरम में चूक हुई होगी, किन्तु इस पुस्तक “विचार” में समाहित ‘ग़ज़ल’ जिसे मैं हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहता हूँ इसे  ही उर्दू में ‘कामिल’ कहा जा सकता है। और तब मैं कह सकता हूँ कि इस पुस्तक में प्रकाशित पूर्णिका (कामिल), गीत और कवितायें पूर्णरूपेण सशक्त रचनाएं हैं और ये सीधे-सरल शब्दों में विचार से ओतप्रोत हैं ।

विचार आप तक पहुँचाना चाहता हूँ कि आखिर मैंने ग़ज़ल को ‘पूर्णिका’ नाम क्यों दिया है। तब मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने ग़ज़ल को जो पूर्णिका कहा है वह पूर्णरूपेण सत्य-सही, उचित एवं न्यायसंगत है। वह इसलिये कि पहले ग़ज़ल स्त्री-पुरुष, प्रेमी-प्रेमिका के हाव-भाव, भाव-भंगिमा, अंग-प्रतंग, चाल-चलन, सुन्दरता, त्याग-तपस्या पर कही जाती थी। जैसे कि अरेबिक, इंगलिश डिक्शनरी के अनुसार ग़ज़ल का मूल अर्थ ‘प्रेमोपासना’ करना अथवा ‘नारी से प्रेम करना’ है। फारसी शब्दकोश के अनुसार ‘वह बात जो औरतों के या उनकी तारीफ़ के सम्बन्ध में कही जाय।’ उर्दू शब्दकोश के अनुसार ‘मासूक की महबूब से या सम्बन्धित बात करना।’ अब ग़ज़ल जिसे मैंने ‘पूर्णिका’ कहा है (उर्दू वाले “कामिल” कह सकते हैं) या कहता हूँ स्त्री-पुरुष के संबंध में ही नहीं बल्कि गरीबी, अमीरी, सुख-दुख, जन्म-मरण अथवा यों कहूँ कि अब ये समस्त विषयों पर कही रची, लिखी जा रही है । तब इसे ‘ग़ज़ल’ कहना इसके साथ अन्याय प्रतीत होता है।

इसलिये ‘प्रेम’ का विचार है कि अब ग़ज़ल को ‘कामिल’ उर्दू में, हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहना चाहिये अतएव मैं दृढता से ‘’विचार’ व्यक्त करता हूँ कि मैं ‘ग़ज़ल’ कोपूर्णिका कहता हूँ उर्दू वालों को ‘कामिल’ कहना चाहिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप भी मेरे इस ‘विचार’ से सहमत होंगे।

विचार करने के पश्चात् ‘प्रेम’ समझता है कि शायद इस पुस्तक‘विचार’ में सम्मिलित गीत, पूर्णिका या काव्य रचने में, नियम-धरम का पालन करने में सफल न हुआ हो फिर भी ‘प्रेम’ को पूर्ण विश्वास है कि वह इन रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त अधिकांश विषयों पर सहज, सरल रूप से अपने विचार से अवगत कराने में सफल है। विचार अभिव्यक्ति के उपरान्त ‘प्रेम’ प्रेम के साथ आग्रह करता है कि ‘विचार’ में संग्रहीत रचनाओं को पाठकगण अवश्य पढ़ें और आनंद उठायें। अपने व्यस्त समय के कुछ समय निकालकर इसके कलेवर में भी झाँकें साथ ही रचनाओं के गुण-दोषों के संबंध में शीघ्र ही मुझे अवगत करायें। आप के सुझावों और प्रतिक्रियाओं की मुझे उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी।

एक पूर्णिका 

 आँख वालों को वो ही रास्ता दिखाता है

बिना जो आँख के दुनिया को नजर आता है

 *

नया कुछ करके दिखाने की बात आये तो

बिना कमान के ही तीर वो चलाता है

 *

मौत भी गोद में न उसको सुला पाती है

जो शख्स लौट के मरघट से घर को आता है

 *

आज जब शुद्ध तेल, घी नहीं मयस्सर है

शहीद के बुत पे वो अपना लहू जलाता है

 *

खुद एक रोटी ही पाता है दाल थोड़ी सी

न जाने किसको खिला के वो खिलखिलाता है

 *

जो आदमखोर है दहशत है जिससे दुनिया को

पकड़ के कान वो उस शेर को बिठाता है

 *

प्रेमने रंग ही बदरंग कर दिया उसका

जो अपने रूप से दुनिया का मुँह चिढ़ाता है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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