हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

? चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – चौदह रत्न

विधा – कविता

कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

चौदह रत्न : धरोहर का स्मरण कराता संग्रह

? चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ  श्री संजय भारद्वाज ?

समुद्र मंथन हमारे पुराणों में वर्णित एक प्रमुख घटना है। इस मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी। इसी भाँति लम्बे समय के चिंतन-मनन के पश्चात कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का कविता-संग्रह ‘चौदह रत्न’ अब पाठकों के हाथ में है। संग्रह में मुख्य रूप से चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ हैं।

संग्रह का आरम्भ श्री गणेश एवं सरस्वती वंदना से होता है। कवयित्री की कामना है कि माँ सरस्वती उनके घर में विराजें।

*

श्वेत कमल का छोड़के आसन,

चरणों को धरती पे धारो ज़रा।

रख दो मेरे सर पे ज्ञान का हाथ,

माँ, आज विराजो तुम मेरे ही घर में॥

 *

लयात्मकता का अपना प्रभाव होता है। लय के चलते रचनाएँ सरलता से कंठस्थ हो जाती हैं। यही कारण रहा कि हमारी श्रुति परंपरा में इसका बड़ा योगदान रहा। कंठस्थ साहित्य एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक सहज रूप से संप्रेषित हो जाता है। इसका यह प्रमाण देखिए-

*

सिद्ध स्वाभिमान की, पुत्री वृषभान की,

मुरली की तान की पुकार जैसी राधिका।

कानन में, कुँज में, कृष्ण की कलाई धरे,

कच्ची, कली कोरी, कचनार जैसी राधिका॥

*

श्री राम और श्री कृष्ण हमारे लोकनायक हैं। उनकी जीवनगाथा हमारे जीवन के कण-कण में है, क्षण-क्षण में है। श्री राम के लिए कहा गया है, ‘रमते कणे कणे इति राम:।’ जो कण-कण में रमता हो, वही श्री राम हैं। संग्रह की चौदह कविताओं में श्री राम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित पर पाँच रचनाएँ हैं। इस रचना में श्री राम के प्रति कवयित्री का यह विश्वास देखिए-

*

अनुनय-विनय सब काम आ जाएँगे,

स्मरण करो तो सारे नाम आ जाएँगे,

छोड़कर अयोध्या का धाम आ जाएँगे,

हृदय से पुकार लो तो राम आ जाएँगे॥

*

वनवास के लिए निकले श्री राम भारद्वाज आश्रम पहुँचे थे। भारद्वाज मुनि से श्री राम ने पूछा था कि वे किस स्थान कहाँ रहें? भारद्वाज मुनि ने उन्हें नाना स्थान सुझाए। उसका एक उदाहरण देखिए-

*

जिनके मन में काम नहीं, क्रोध नहीं मद, मोह नहीं,

उसी हृदय में रहो जहाँ पर, लोभ नहीं और द्रोह नहीं।

जो मनुष्य नित विचार कर कहते प्रिय और सत्य वचन,

उसी हृदय में रहो सर्वदा सिय सहित तुम रघुनंदन॥

*

श्री राम यूँ ही पुरुषोत्तम नहीं हैं। वे मनुष्यता का मर्म हैं-

*

राम केवल नाम नहीं, सद्भाव है, सत्कर्म हैं ,

अंतस में विराजती इस मनुष्यता का मर्म हैं।

*

श्री राम कण-कण में हैं तो श्री कृष्ण चराचर में बसते हैं। वे सृष्टि का बीज तत्व हैं। श्रीमद्भागवद्गीता में स्वयं योगेश्वर का उवाच है-

*

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥

(अध्याय 10, श्लोक 39)

*

भावार्थ है कि चराचर का बीज कृष्ण हैं। उनके बिना किसी भी चर या अचर का अस्तित्व नहीं है। चराचर में विराजमान माधव के जीवन से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बंधित दो प्रसंग इन कविताओं में हैं। महाभारत से सम्बंधित प्रसंग भी इनमें देखने को मिलते हैं।

इन्हीं में एक प्रसंग अक्षय पात्र का है। सर्वविदित है कि केशव ने अक्षयपात्र द्वारा द्रौपदी एवं पांडवों की दुर्वासा मुनि के क्रोध से रक्षा  की थी। ब्रह्मांड के स्वामी का एक अन्न के एक दाने से तृप्त होना, जगत की तृप्ति है। इस भाव का यह प्रकटन देखिए-

*

इस कथा से केशव ने जग को दिया यही संदेश,

अन्न के प्रत्येक दाने की महत्ता है विशेष।

सारा ब्रह्मांड जिन योगेश्वर श्रीकृष्ण में व्याप्त है,

उनका भोजन करके तृप्त हो जाना पर्याप्त है।

*

श्री कृष्ण का जीवन 64 कलाओं में निपुणता का अनन्य उदाहरण है। कौन सोच सकता है कि जीवन के उत्तरार्द्ध में गीता का ज्ञान देनेवाला योगेश्वर, पूर्वार्द्ध में मनभावन कान्हा था। कान्हा का यह मनभावन रूप कवयित्री की इन पंक्तियों में अनुभव कीजिए-

*

सिर मोरपंख धारे, कारे नैन कजरारे,

मतवाले अलकों के झोल मनभावने॥

धूल-मिट्टी खाए, जसुमति रिसियाए,

बोले तोतले से मीठे-मीठे बोल मनभावने॥

*

मनभावन मनोहर रूप आगे चलकर अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक और मनुज के उत्थान का मानक बना।

*

अधर्म पर धर्म की विजय प्रतीक कृष्ण हैं,

पाप के कुचक्र का उत्तर सटीक कृष्ण हैं॥

……………………

जिनके बिन हर कथा अधूरी वह कथानक कृष्ण हैं,

मनुज के उत्थान का सर्वोच्च मानक कृष्ण हैं॥

*

गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य के साथ जो अन्याय किया, वह गुरुता के विरुद्ध था। शक्तिशाली की निर्बलता पर कवयित्री की यह अभिव्यक्ति देखिए-

*

अद्भुत, अद्वितीय, बेमिसाल थी वो दक्षिणा,

उससे भी बढ़कर वह निश्छल उसकी गुरुभक्ति थी।

एक परंपरा का दुरुपयोग करते-करते

निर्बल साबित हो गए वे श्रेष्ठ जिनमें शक्ति थी॥

*

कहा जाता है कि अंतर्मन से, करुण स्वर में, पूर्ण निष्ठा से ईश्वर को पुकारा जाए और ईश्वर न आएँ, यह हो ही नहीं सकता। गज और ग्राह के संघर्ष के संदर्भ में कवयित्री की ये पंक्तियाँ देखिए-

*

निश्छल मन करुण स्वरों में, जब हम उन्हें पुकारेंगे,

निस्संदेह विकट घड़ी से, हमको भगवान उबारेंगे।

*

इसी भाव का विस्तार इन पंक्तियों में शब्दबद्ध हुआ है-

*

जिनका स्वरूप निर्विकार है,उनके चरणों में नमस्कार है,

जो हरि गरुड़ पर सवार हैं, उनके चरणों में नमस्कार है।

*

मानव के भीतर देवता और दानव दोनों निवास करते हैं। यही कारण है कि एक देवव्रत और एक दुर्योधन हम सबके हिस्से में आया है। अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे मनुष्य का यह चित्रण भीतर तक उतर जाता है-

*

एक देवव्रत छिपा हुआ है, हम साधारण मानव में भी,

किसी न किसी माँ गंगा के, हम सारे भी बेटे हैं।

और एक दुर्योधन भी आया है हम सबके हिस्से में,

इसीलिये हम अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे हैं॥

*

भारतीय संस्कृति में गंगा, नदी मात्र नहीं अपितु माँ है। शिव ने जिसे जटा में धारण किया हो, जिसके जल का छिड़काव हर संस्कार में हमारी जीवन पद्धति का अंश हो, वह अमृतदायिनी मात्र नदी हो भी नहीं सकती। इस पयस्विनी की जो दुर्दशा हमने की है, कवयित्री उसके लिए माता से क्षमायाचना करती हैं-

*

अवनि पर अवतरित हो सब पाप तुमने धो दिए,

कृतज्ञता हमको दिखानी थी, मगर हम स्वार्थी हैं।

हमसे हुआ अपराध गंगे, भूल हमसे हो गई,

शर्म से गर्दन झुकी है, हम क्षमा के प्रार्थी हैं॥

*

संग्रह में माँ दुर्गा एवं महादेव की स्तुति पर आधारित रचनाएँ हैं। देवी-देवताओं की गाथा पर छोटी कविताएँ हैं। गंगा के प्रदूषण पर विमर्श है तो राधा रानी, गोपियों, बाँसुरी, माँ सीता, शबरी, कैकेयी पर भी चर्चा है।

कुल मिलाकर प्रस्तुत कविता संग्रह मूल रूप से आध्यात्मिक, धार्मिक आख्यानों पर आधारित है। यह काव्यात्मक प्रस्तुति आख्यानों को स्मृति में रखने में सहायक सिद्ध होगी। इसके माध्यम से संस्कृति से कट रही पीढ़ी हमारी धरोहर से परिचित भी हो सकेगी।

डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होने वाला यह पहली कविता संग्रह है। प्रकाशन का आरम्भ संस्कृति, दर्शन एवं आस्था पर आधारित रचनाओं से हो रहा है। यह शुभ लक्षण है। वे निरंतर लिखती रहें। कामना है कि उनकी आने वाली पुस्तकों के माध्यम से साहित्य एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो सके।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com, sanjayuvach2018@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ वैशाली की नगरवधू – आचार्य चतुरसेन की अनुपम कृति ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ पुस्तक चर्चा 🌺 वैशाली की नगरवधू🌺 श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

🍀आचार्य चतुरसेन की अनुपम कृति🍀

आज से लगभग पचास साल पहले यह पुस्तक पढ़ी थी। तब कितनी समझ में आई, याद नहीं। अभी इसको फिर से पढ़ा है, इत्मीनान से।

दोबारा पढ़ने की वजह भी स्पष्ट कर दूं। मैंने कहीं पढ़ा कि आचार्य चतुरसेन ने कहा था, “मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूं और ‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूं।”

यह भी कहीं पढ़ा कि मुंशी प्रेमचंद ने बनारस में आचार्य चतुरसेन से कहा था, “लिखते तो आप हैं, मैं तो कलम रगड़ता हूं।”

अम्बपाली जब अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुकी तो वैशाली जनपद ने उसे सर्वश्रेष्ठ सुंदरी निर्णीत किया। वज्जी गणतंत्र के कानून अनुसार उसे ‘वैशाली की नगरवधू’ घोषित किया जाना था।

शुभ्र कौशेय धारण किए हुए अम्बपाली संथागार में उपस्थित हुई। वह अपना मत परिषद के सामने प्रकट करने के लिए प्रस्तुत हुई थी। अम्बपाली के होंठ हिले और वीणा की झंकार के समान उसकी वाणी ने सुधावर्षण किया, “भंते, आपके आदेश पर मैंने विचार कर लिया है। मैं वज्जीसंघ के धिक्कृत कानून को स्वीकार करती हूं। मैं सहस्र बार इस शब्द को दोहराती हूं। वज्जीसंघ का यह धिक्कृत कानून वैशाली जनपद के यशस्वी गणतंत्र का कलंक है। भंते, मेरा अपराध केवल यही है कि विधाता ने मुझे यह अथाह रूप दिया। इसी अपराध के लिए आज मैं अपने जीवन के गौरव को लांछना और अपमान के पंक में डुबो देने को विवश की जा रही हूं।”

उसने अपनी कुछ शर्तें रखीं। पहली शर्त यह कि उसे रहने के लिए सप्तभूमि प्रासाद, नौ कोटि स्वर्णभार, प्रासाद के समस्त साधन और वैभव सहित दिया जाए। दूसरी शर्त यह कि उसके आवास की दुर्ग की भांति व्यवस्था की जाए और तीसरी यह कि उसके आवास में आने-जाने वाले अतिथियों की जांच-पड़ताल गणकाध्यक्ष न करें।

प्रारंभ में जिस सुख-सज्जा को उसने तुच्छ समझा था, वह अब उसके जीवन की अनिवार्य सामग्री हो गई थी। लेकिन अब भी संपूर्ण वैशाली के प्रति उसका पूर्ण विद्रोह जस का तस विद्यमान था।

एक दिन एकाएक आंख खुलने पर उसने देखा, उस सुरक्षित लताकुंज में एक प्रभावशाली पुरुष उसके सम्मुख खड़ा है। उसके एक हाथ में अप्रतिम वीणा है। अंबपाली ने उस रहस्यमय पुरुष का परिचय जानना चाहा।

उन्होंने वीणा झंकृत की। अंबपाली मूढ़वत बैठी रही। वह टकटकी बांधकर वीणा पर विद्युत-वेग से थिरकती उंगलियों को देखते-देखते अचेत-सी हो गई।

उसी अचेतन अवस्था में उसने उठकर नृत्य करना प्रारंभ कर दिया। नृत्य और वादन एकीभूत हो गया। कौन नृत्य कर रहा है, कौन वीणावादन और कौन उस अलौकिक दृश्य को देख-सुन रहा है, यह नहीं कहा जा सकता था।

1938 में आचार्य चतुरसेन को उपचार के सिलसिले में बिहार जाना पड़ा। वहां पहाडि़यों में भटकते हुए और जलस्रोत में घंटों स्‍नान करने के दौरान वे एक जागृत स्‍वप्‍न देखने लगे। ऐसा लगने लगा जैसे कोई ग्रंथ लिख रहे हों। आंखों के सामने दृश्‍य बनने लगते। पत्‍तों की बातचीत प्रत्‍यक्ष कानों में पड़ने लगी। उनके मस्तिष्‍क में अम्‍बपाली की छवि बनने लगी. अजंता एलोरा के भ्रमण के बाद अम्‍बपाली की मूर्ति आकार ले चुकी थी। वे इस छवि के साथ इतना घुलमिल गए थे कि एक दिन जब वे खुले आकाश तले चांदनी रात में लेटे थे तो आसमान में सजीव मूर्ति दिखाई दी।

‘मेरी आत्‍मकहानी’ में वे लिखते हैं, “मेरे शरीर के संपूर्ण जीवकोष कल्पना के वशीभूत हो गए और मैंने कहा – नाचो अम्बपाली! और अम्बपाली नाची। मैंने अपनी आंखों से उसे नील गगन में चंद्रमा के उज्ज्वल आलोक में नाचते देखा। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं भी आकाश में उसके निकट पहुंच गया हूं। एकाएक मुझे प्रतीत हुआ कि वह मूर्ति गायब हो गई। मैं दृढतापूर्वक कहता हूं कि मैंने स्वप्न नहीं देखा था। मैंने जो कुछ देखा जागते हुए देखा। सब सत्य। उस समय रात्रि के दो बजे थे। मेरे साहित्य लेखन का यही समय है। मैंने तुरंत उठकर उस नृत्य का वर्णन लिखा, जिसका संशोधित रूप ‘वैशाली की नगर वधू’ में कलमबद्ध है।”

उपन्यास में भावों का चित्रण और भाषा का सौष्ठव अद्भुत, अप्रतिम, अलौकिक है। पाठकों के आनंद के लिए एक प्रसंग ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:

“युवक ने समूचा भुना हुआ हरिण कंधे पर लादकर ज्यों ही कुटी में प्रवेश किया, वह वहां का दृश्य देखकर आश्चर्य-चकित जड़वत् रह गया। उसने देखा, पारिजात कुसुम-गुच्छ की भांति शोभाधारिणी एक अनिंद्य सुंदरी दिव्यांगना कुटी में आत्मविभोर होकर असाधारण नृत्य कर रही है।

“उसके सुचिक्कण, घने पादचुंबी केश-कुंतल मृदु पवन में मोहक रूप में फैल रहे हैं। स्वर्ण-मृणाल-सी कोमल भुज-लताएं सर्पिणी की भांति वायु में लहरा रही हैं। कोमल कदली-स्तंभ-सी जंघाएं व्यवस्थित रूप में गतिमान होकर पीन नितंबों पर आघात-सा कर कटि-प्रदेश को ऐसी हिलोर दे रही हैं जैसे समुद्र में ज्वार आया हो। कुंदकली-सा धवल गात, चंद्रकिरण-सी उज्ज्वल छवि और मुक्त नक्षत्र-सा दीप्तिमान मुखमंडल– सब कुछ अलौकिक था।

“क्षण-भर में ही युवक विवश हो गया। उसने आखेट एक ओर फेंककर वीणा की और पद बढ़ाया। अंबपाली के पदक्षेप के साथ वीणा आप ही ध्वनित हो रही थी। युवक ने वीणा उठा ली, उस पर उंगली का आघात किया, नृत्य मुखरित हो उठा।

“अब तो जैसे ज्वालामुखी ने ज्वलित, द्रवित सत्त्व भूगर्भ से पृथ्वी पर डंडेलने प्रारंभ कर दिए हों, जैसे भूचाल आ गया हो, पृथ्वी डगमग करने लगी हो। वीणा की झंकृति पर क्षण-भर के लिए देवी अंबपाली सावधान होती और फिर भाव-समुद्र में डूब जाती।

“उसी प्रकार देवी सम पर ज्यों ही पदक्षेप करती और निमिषमात्र को युवक की अंगुली सम पर आकर तार पर विराम लेती, तो वह निमिष-भर को होश में आ जाता। धीरे-धीरे दोनों ही बाह्यज्ञान-शून्य हो गए।

“सुदूर नील गगन में टिमटिमाते नक्षत्रों की साक्षी में, उस गहन वन के एकांत कक्ष में ये दोनों ही कलाकार पृथ्वी पर दिव्य कला को मूर्तिमती करते ही रहे। उनके पार्थिव शरीर जैसे उनसे पृथक हो गए। उनका पार्थिव ज्ञान लोप हो गया, जैसे वे दोनों कलाकार पृथ्वी के प्रलय हो जाने के बाद समुद्रों के भस्म हो जाने पर, सचराचर वसुंधरा के शेष-लीन हो जाने पर, वायु की लहरों पर तैरते हुए ऊपर आकाश में उठते चले गए हों और वहां पहुंच गए हों जहां भू: नहीं, भुवः नहीं, स्क: नहीं, पृथ्वी नहीं, आकाश नहीं, सृष्टि नहीं, सृष्टि का बंधन नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, एक नहीं, अनेक नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं!”

यह विशाल फलक की एक कालजयी कृति है। कहानी वैशाली और मगध साम्राज्यों, आसपास और दूर-दूर के छोटे राज्यों के लोक-जीवन, संस्कृति और राजनीतिक उठापटक के इर्दगिर्द घूमती है। इसकी केंद्रीय पात्र अंबपाली है लेकिन इसमें अनेकों अन्य प्रभावशाली पात्र हैं और उनसे संबंधित घटनाओं का विस्तृत चित्रण किया गया है। घटनाक्रम बहुत क्लिष्ट है लेकिन उसका वर्णन बखूबी किया गया है। राज-घरानों के भीतर छुपे रहस्यों की बुनावट, उनके प्रति पाठकों की उत्सुकता जगाए रखना, और उचित समय पर उनका उद्घाटन बहुत ही विस्मयकारी ढंग से किया गया है।

इसमें युद्ध की विभीषिका का भयावह रूप दिखाया गया है। महासमर्थ मागध सैन्य चमत्कारिक रूप से पराजित हुई थी। फिर भी, विराम-संधि पर मंत्रणा करते समय वैशाली के गणपति सुनंद ने पूर्ण परिपक्वता दिखाते हुए कहा, “भंतेगण सुनें, आयुष्मान मगध में एक स्वतंत्र गणतंत्र स्थापित किया चाहता है। गण-शासन का मूल मंत्र गण-स्वातंत्र्य है; यह शासन नहीं, व्यवस्था है जिसका दायित्व प्रत्येक सदस्य पर है। वास्तविक अर्थों में गणतंत्र में राजा भी नहीं है। प्रजा भी नहीं है। गण का संपूर्ण स्वामी गण है और गणपरिषद उसका प्रतिनिधि।”

लेखक ने कई वर्षों तक बौद्ध, जैन और आर्यों के साहित्य का गहन अध्ययन किया। उसमें पूरी तरह डूबकर, अपने को भुला बैठे, सबकुछ गहरे आत्मसात् किया, गूढ़ चिंतन-मनन किया, पागलों की तरह दिन-रात स्वप्न देखे, तब जाकर यह अनुपम कृति का सृजन कर सके।

उपन्यास में चित्रित काल-खंड तब का है जब बुद्ध और महावीर एक-साथ इस पृथ्वी पर धर्म के उपदेश कर रहे थे। इसमें धर्म और दर्शन का समुचित समावेश है। और अंत में, इस दृश्य की परिकल्पना करें:

“आनंद के साथ देवी अंबपाली ने भगवान के निकट आ परिक्रमा कर अभिवादन किया और बद्धांजलि सम्मुख खड़ी हो तीन महावाक्य कहे–

बुद्धं शरणं गच्छामि!

संघम शरणं गच्छामि!

धम्मं शरणं गच्छामि!

“भगवत ने उसे प्रव्रज्या दी, उपसंपदा की; और स्थिर धीर स्वर से कहा– ‘कल्याणी अंबपाली, सुन! जिन धर्मों को तू जाने कि, वह सराग के लिए हैं विराग के लिए नहीं, संयोग के लिए हैं वियोग के लिए नहीं, जमा के लिए हैं विनाश के लिए नहीं, इच्छाओं के बढ़ने के लिए हैं इच्छाओं के कम करने के लिए नहीं, असंतोष के लिए हैं संतोष के लिए नहीं, भीड़ के लिए हैं एकांत के लिए नहीं, अनद्योगिता के लिए हैं उद्योगिता के लिए नहीं, दुर्भरता के लिए हैं सुभरता के लिए नहीं; तो तू अंबपाली शुभे एकान्तेन जान कि न वह धर्म है, न विनय है, न शास्ता का शासन है।’

“कुछ देर मौन रहकर भगवत ने फिर कहा– ‘जा अंबपाली! तुझे उपसंपदा प्राप्त हो गई। अपना और प्राणिमात्र का कल्याण कर!

भगवत अरहन्त प्रबुद्ध बुद्ध ने इतना कह, उच्च स्वर से कहा– ‘भिक्षुओं महासाध्वी अंबपाली भिक्षुणी का स्वागत करो!

“फिर जयनाद से दिशाएं गूंज उठीं। अंबपाली ने आंसू पोंछे। भगवत सुगत की प्रदक्षिणा की और भिक्षुसंघ के बीच में होकर पृथ्वी पर दृष्टि दिए वहां से चल दी।”

#वैशालीकीनगरवधू #आचार्यचतुरसेन

#vaishalikinagarvadhu #acharyachatursen

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “हार्ट लैंप “– से निकली रोशनी की पड़ताल ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “हार्ट लैंप “– से निकली रोशनी की पड़ताल ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

नारी अस्मिता और उससे जुड़ी जमीनी हकीकत ,उत्पीड़न,टूटती खामोशियों और धधकते विद्रोह को कथा कहानियों का उपजीव्य बनाया जाता रहा है। पर कोई आवश्यक नहीं कि हर साहित्यकार की दृष्टि की गहराई और समझ का क्षेत्रफल एक जैसा हो। साहित्य एक शाश्वत प्रवाह है।हर लेखक पाठकों को कुछ नया और ताजा दे जाता है।

इस दिशा में  सन 2025 की बुकर पुरस्कार विजेता “बानू मुश्ताक” की  12 कहानियों के संकलन  “हार्ट लैंप” का उल्लेख जरूरी है।जिसका अंग्रेजी अनुवाद “दीपा भारती” ने किया है।यह संकलन उनके समग्र कथा संग्रह ” हसीना” से चयनित कहानियों का है।यूँ तो बानू– काव्य, कहानी ,उपन्यास, और निबंध को लेकर 9 कृतियों की प्रणेता हैं पर हार्ट लैंप में कुछ तो ऐसा है जो विश्व मानस को झकझोर रहा है। निर्णायक समिति के मैक्सपोर्टर के शब्द इसे भली भाँति अभिव्यक्ति दे सकते हैं— “यह अंग्रेजी के पाठकों के लिये कुछ नया और अनूठा है। यह एक क्रान्तिकारी अनुवाद है जो भाषा में खलबली मचा देता है। अंग्रेजी भाषा में एक नयी बुनावट पैदा करता है।”

बानू ने निजी जिन्दगी में, शादी के बाद कितनी ही तकलीफों का सामना किया है। कन्नड़ माध्यम से शिक्षा ग्रहण करनेवाली बानू लेखिका होने से पूर्व पत्रकार, वकील और सामाजिक न्याय की अवधारणा को बल देने वाले “बांदाया आन्दोलन” की प्रवर्तक रहीं। ये सारे पक्ष पितृसत्तात्मक समाज की संरचना को समझने में मददगार रहे। दक्षिण भारत की मुस्लिम महिलाओं के जीवन की त्रासदी को उन्होंने वाणी दी है। न्याय के इस विचार के साथ उन्हें पर्याप्त विरोध सहना पड़ा और धमकियों से भी दो चार होना पड़ा।

उनकी कहानियों में सहनशीलता का वह रूप अंकित है जिसके सीने में खामोश विद्रोह पलता रहता है। यही उनका उद्देश्य भी रहा। सतह के अंदर पलने वाली उष्मा कभी न कभी ज्वालामुखी के रूप में फूटती ही है।

कृति में, हाशिए पर जी रही मुस्लिम स्त्रियों के प्रजनन अधिकारों,अदम्य आस्था, अंतर्हित उर्जा और शोषण की गाथा को अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।मुस्लिम समाज की असीम जीवट और संभावनाओं से भरी बालिकाओं, लकीर की फकीर खूसट बुड्ढियों, पूर्वाग्रही मानसिकता से ग्रस्त मौलवियों तथा छली भाइयों की दास्तां हैरान कर देती है जो अनेक भावनात्मक उतार चढ़ावों के ताने बाने से बुनी गयी है। इसे सन 1990 से 1923 के मध्य के कालखण्ड की अविकल तस्वीर कहा गया है।

कृति का भाषायी स्वरूप भी चौंकाता है। बोलचाल की मजाकिया, जीवंत, कहीं मार्मिक तो कहीं कटुतिक्त भाषा, कथानकों में विश्वसनीयता पैदा करती है।

जाति और धर्म की दरारों को चीरती हुई, सतह के नीचे पनपती सड़ांध  और  ताप को उजागर करती हुई, हर मोड़ पर विस्मित करनेवाली यह कलाकृति अद्भुत है। 

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆  जयपाल के काव्य-संग्रह “बंद दरवाजे” का समग्र विश्लेषण ☆ समीक्षा – श्री एस पी भाटिया ☆

पुस्तक चर्चा ☆ जयपाल के काव्य-संग्रह “बंद दरवाजे” का समग्र विश्लेषण  ☆ समीक्षा – श्री एस पी भाटिया 

आज प्रस्तुत है श्री एस पी भाटिया जी, (वरिष्ठ पत्रकार, अजीत समाचार) द्वारा श्री जयपाल जी के काव्य संग्रह बंद दरवाजे की समीक्षा।

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।)

पुस्तक – बंद दरवाजे (कविता-संग्रह)

कवि – जयपाल

प्रकाशक- यूनिक पब्लिशर्स-कुरुक्षेत्र

कीमत – 150/- पेपर-बैक

कवि जयपाल की कविताएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारत के #सामाजिक और सांस्कृतिक यथार्थ का जीवित दस्तावेज़ हैं। उनका काव्य दलित जीवन, सामाजिक भेदभाव, जातिवाद, धर्मसत्ता और सत्ता की पाखंडता का वास्तविक अनुभव प्रस्तुत करता है। “बंद_दरवाजे” नामक यह काव्य संग्रह उस दुनिया की गहन पड़ताल है जहाँ समाज ने जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर मानवता को बाँट रखा है। इस समीक्षा में कवि की दृष्टि, भाषा, शैली, विषय, दार्शनिक दृष्टि और सामाजिक प्रासंगिकता का क्रमवार और निरंतर विश्लेषण किया गया है।

जयपाल का दृष्टिकोण अनुभवजन्य है। वह केवल सामाजिक यथार्थ का दर्शक नहीं, बल्कि उसमें जीने वाला कवि है। उसकी कविताएँ तीन स्तरों पर काम करती हैं – सामाजिक, दार्शनिक और मानवीय। सामाजिक दृष्टि से वह जातिवाद, धर्मसत्ता और असमानता की आलोचना करता है। दार्शनिक दृष्टि से वह ईश्वर, मानव और समानता के प्रश्न उठाता है। मानवीय दृष्टि से उसकी कविताएँ जीवन, प्रेम और अस्तित्व का सम्मान करती हैं। इस कारण उसकी कविताएँ प्रचार नहीं, प्रकाश हैं। वह चिल्लाता नहीं, सवाल करता है।

भाषा की दृष्टि से जयपाल की कविताएँ सरल और सहज हैं। वह कठिन शब्दों या अलंकारों का प्रयोग नहीं करता, बल्कि सादगी की गहराई में शक्ति रखता है।  इसमें पूरी सभ्यता और सामाजिक यथार्थ की टिप्पणी निहित है। उसकी शैली कथात्मक, संवादात्मक और प्रतीकात्मक है। वह कविता नहीं लिखता, बल्कि कथन को कविता बनाता है।

संग्रह में विभिन्न विषय प्रमुखता से उभरते हैं। “एक झूठी पत्तल” और “पूछताछ” जैसी कविताएँ जाति और असमानता पर केंद्रित हैं, जहाँ कवि जाति व्यवस्था को मानसिक रोग के रूप में प्रस्तुत करता है। “पवित्र–अपवित्र” में धार्मिक और सामाजिक पवित्रता का व्यंग्य है। यहाँ कवि ईश्वर या देवी-देवता पर नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक व्याख्या पर प्रहार करता है। “साफ-सफाई करते हुए” और “मैं जीना चाहती हूं” में स्त्री और दलित चेतना का संगम है, जहाँ दोहरी दासता और पीड़ा स्पष्ट रूप से सामने आती है। “जग्गु सरपंच”, “फूलों का टोकरा” और “दलितों के घर खाना” में राजनीतिक सत्ता की पाखंडता और वोट राजनीति पर करारा व्यंग्य है। “अंतिम सवाल”, “शूद्र” और “ढक्कन” जैसी कविताओं में सृष्टि, धर्म और मानवता को मानवीय कसौटी पर कसने का प्रयास किया गया है।

दार्शनिक दृष्टि से जयपाल का काव्य आंबेडकर और कबीर की परंपरा का आधुनिक रूप है। कबीर की तरह वह कहता है कि धर्म अगर इंसान को बाँटे तो वह धर्म नहीं। आंबेडकर की तरह वह चेतावनी देता है कि समानता के बिना स्वतंत्रता केवल छल है। उसका दर्शन मानववाद पर आधारित है, जहाँ ईश्वर नहीं, मनुष्य ही केंद्र है। जब वह पूछता है, “क्या भगवान भी मनुष्य बनना चाहता है कभी?” तो यह प्रश्न केवल ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि उस संपूर्ण व्यवस्था के लिए है जिसने मानवता को भुला दिया। यह एक दार्शनिक क्रांति है, जिसमें धर्म की ऊँचाई मानवता के दृष्टिकोण में खड़ी हो जाती है।

जयपाल का व्यंग्य गहरा और शालीन है। वह किसी व्यक्ति को निशाना नहीं बनाता, बल्कि पूरी व्यवस्था पर प्रहार करता है। वह हँसी नहीं उड़ाता, बल्कि सवाल उठाता है। “राम ने भीलनी के घर जाकर बेर खाए थे, और बाद में शंबूक ऋषि का सिर काट दिया था” जैसी पंक्तियाँ धार्मिक आख्यान पर व्यंग्य और सामाजिक विवेक का प्रयोग हैं। कवि धर्म और भेदभाव के संबंध को स्पष्ट करता है।

भाषा-विज्ञान की दृष्टि से जयपाल की कविताएँ लोकभाषा में लिखी गई हैं। ये भाषा साधारण है, पर भावनाओं और विचार की गहराई में अत्यंत प्रभावशाली है। उनकी कविताएँ किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सभी के भीतर मानवता और विवेक के लिए हैं।

कवि ने अपनी रचनाओं के साथ पूर्ण न्याय किया है। उसने न भावना को दबाया, न विचार को। हर कविता अपने उद्देश्य और अर्थ के प्रति ईमानदार है। क्रोध को वह तर्क में बदल देता है। उसकी हर कविता समाज की नब्ज़ पर रखा गया सर्जिकल प्रहार है।

जहाँ तक सीमाओं का प्रश्न है, कभी-कभी भाव-आवेश भाषा पर भारी पड़ता है। कुछ कविताएँ अत्यधिक सीधी हो जाती हैं, प्रतीकात्मकता कम दिखाई देती है। दलित पीड़ा का स्वर कुछ जगहों पर पुनरावृत्त प्रतीत होता है। पर ये खामियाँ ईमानदार काव्य की स्वाभाविक थकान हैं, कमजोरी नहीं।

संग्रह का सामाजिक और शिक्षाप्रद महत्व अत्यधिक है। इन्हें स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाने के लिए कि भेदभाव नैतिक रूप से खोखला है, और विश्वविद्यालय में दलित साहित्य, समाजशास्त्र और मानवाधिकार अध्ययन के लिए। समाज में यह कविता समझ और संवाद दोनों के लिए आवश्यक है। यह साहित्य केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि बदलने के लिए लिखा गया है।

कुल मूल्यांकन में जयपाल की विचार शक्ति अत्यंत सशक्त और तर्कसंगत है। भावनात्मक गहराई प्रामाणिक है। भाषा सरल, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली है। समाज पर उसका प्रभाव विचारोत्तेजक और परिवर्तनकारी है। कविता का उद्देश्य मनुष्य को केंद्र में रखना है और इस कसौटी पर कवि पूरी तरह खरा उतरता है।

समीक्षाश्री एस. पी. भाटिया
वरिष्ठ पत्रकार,अजीत समाचार।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

विचार मंथन करने से मैं अनुभव करता हूँ कि सृष्टि में कोई भी व्यक्ति किसी भी गुण- ज्ञान या विषय में पूर्णा-पूर्ण नहीं हुआ है और यदि ऐसा हुआ है तो वह देव तुल्य हो गया है या हो जाता है। तब आपका ‘प्रेम’ मानता है कि इस विचार में जो भी मैंने पूर्णिका (ग़ज़ल) गीत और काव्य रचे (लिखे) है, वो सभी नियम-धरम का पालन कर लिखे गये हों अर्थात इन रचनाओं पूर्णिका उर्दू में कामिल, गीत लेखन के नियम-धरम का पालन हुआ हो कहना उचित प्रतीत नहीं होता। यह मैं स्वतः स्वीकार करता हूँ कि काव्य लेखन के नियम-धरम में चूक हुई होगी, किन्तु इस पुस्तक “विचार” में समाहित ‘ग़ज़ल’ जिसे मैं हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहता हूँ इसे  ही उर्दू में ‘कामिल’ कहा जा सकता है। और तब मैं कह सकता हूँ कि इस पुस्तक में प्रकाशित पूर्णिका (कामिल), गीत और कवितायें पूर्णरूपेण सशक्त रचनाएं हैं और ये सीधे-सरल शब्दों में विचार से ओतप्रोत हैं ।

विचार आप तक पहुँचाना चाहता हूँ कि आखिर मैंने ग़ज़ल को ‘पूर्णिका’ नाम क्यों दिया है। तब मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने ग़ज़ल को जो पूर्णिका कहा है वह पूर्णरूपेण सत्य-सही, उचित एवं न्यायसंगत है। वह इसलिये कि पहले ग़ज़ल स्त्री-पुरुष, प्रेमी-प्रेमिका के हाव-भाव, भाव-भंगिमा, अंग-प्रतंग, चाल-चलन, सुन्दरता, त्याग-तपस्या पर कही जाती थी। जैसे कि अरेबिक, इंगलिश डिक्शनरी के अनुसार ग़ज़ल का मूल अर्थ ‘प्रेमोपासना’ करना अथवा ‘नारी से प्रेम करना’ है। फारसी शब्दकोश के अनुसार ‘वह बात जो औरतों के या उनकी तारीफ़ के सम्बन्ध में कही जाय।’ उर्दू शब्दकोश के अनुसार ‘मासूक की महबूब से या सम्बन्धित बात करना।’ अब ग़ज़ल जिसे मैंने ‘पूर्णिका’ कहा है (उर्दू वाले “कामिल” कह सकते हैं) या कहता हूँ स्त्री-पुरुष के संबंध में ही नहीं बल्कि गरीबी, अमीरी, सुख-दुख, जन्म-मरण अथवा यों कहूँ कि अब ये समस्त विषयों पर कही रची, लिखी जा रही है । तब इसे ‘ग़ज़ल’ कहना इसके साथ अन्याय प्रतीत होता है।

इसलिये ‘प्रेम’ का विचार है कि अब ग़ज़ल को ‘कामिल’ उर्दू में, हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहना चाहिये अतएव मैं दृढता से ‘’विचार’ व्यक्त करता हूँ कि मैं ‘ग़ज़ल’ कोपूर्णिका कहता हूँ उर्दू वालों को ‘कामिल’ कहना चाहिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप भी मेरे इस ‘विचार’ से सहमत होंगे।

विचार करने के पश्चात् ‘प्रेम’ समझता है कि शायद इस पुस्तक‘विचार’ में सम्मिलित गीत, पूर्णिका या काव्य रचने में, नियम-धरम का पालन करने में सफल न हुआ हो फिर भी ‘प्रेम’ को पूर्ण विश्वास है कि वह इन रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त अधिकांश विषयों पर सहज, सरल रूप से अपने विचार से अवगत कराने में सफल है। विचार अभिव्यक्ति के उपरान्त ‘प्रेम’ प्रेम के साथ आग्रह करता है कि ‘विचार’ में संग्रहीत रचनाओं को पाठकगण अवश्य पढ़ें और आनंद उठायें। अपने व्यस्त समय के कुछ समय निकालकर इसके कलेवर में भी झाँकें साथ ही रचनाओं के गुण-दोषों के संबंध में शीघ्र ही मुझे अवगत करायें। आप के सुझावों और प्रतिक्रियाओं की मुझे उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी।

एक पूर्णिका 

 आँख वालों को वो ही रास्ता दिखाता है

बिना जो आँख के दुनिया को नजर आता है

 *

नया कुछ करके दिखाने की बात आये तो

बिना कमान के ही तीर वो चलाता है

 *

मौत भी गोद में न उसको सुला पाती है

जो शख्स लौट के मरघट से घर को आता है

 *

आज जब शुद्ध तेल, घी नहीं मयस्सर है

शहीद के बुत पे वो अपना लहू जलाता है

 *

खुद एक रोटी ही पाता है दाल थोड़ी सी

न जाने किसको खिला के वो खिलखिलाता है

 *

जो आदमखोर है दहशत है जिससे दुनिया को

पकड़ के कान वो उस शेर को बिठाता है

 *

प्रेमने रंग ही बदरंग कर दिया उसका

जो अपने रूप से दुनिया का मुँह चिढ़ाता है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(ई-अभिव्यक्ति- में ‘पूर्णिका’ जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’का स्वागत.)

संक्षिप्त परिचय 

सम्प्रति : आयुध निर्माणी खमरिया से सेवा निवृत्ति के पश्चात मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत।

कृतियाँ: अनुराग (कहानी संग्रह) फरवरी 2009, धरती की धरोहर (कहानी संग्रह) नवंबर २०११। किलकारी (बाल काव्य-संग्रह) जनवरी 2014 विचार (काव्य-संग्रह) 2017. बुंदेली भोजपुरी गीत समागम 2020. गांव की बेटी (उपन्यास) जनवरी 2021, आह (पूर्णिका संग्रह) 2021, घर संसार (गीत संग्रह) 2023, सुखानुभूति (पूर्णिका संग्रह). का मओ…बिन्ना (बुन्देली पूर्णिका संग्रह) 2025, पूर्णिका विद्या पर विमर्श के साथ ही ‘बधाई हो बघाई’ (पूर्णिका संकलन) आपके जन्म दिवस को समर्पित 93 पूर्णिका-कारों ने केवल एक विद्या विशेष ‘पूर्णिका’ पर अपनी पूर्णिकाएं समर्पित की, इसके साथ ही नगर, प्रदेश, देश से प्रकाशित होने वाले करीब 130 संकलनों में आपकी रचनाएँ यथा प्रकाशित हुई हैं। अभी आप कई पत्र पत्रिकाओं के साथ साहित्य परिवार पत्रिका नदियाद गुजरात के सह संपादक, काव्यामृत पत्रिका पीलीभीत के क्षेत्रीय संपादक भी है। ‘माई’ उपन्यास प्रकाशाधीन है आप आकाशवाणी जबलपुर से निरंतर कहानी पाठ करते हैं।

सहभागिता : आपने विभिन्न विभागीय और अविभागीय अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा त्वरित – भाषण, निबंध-लेखन, कविता-लेखन, बाद-विवाद और कविता पाठ में विजय श्री प्राप्त की है।

सम्बध्दता : आप विभिन्न सामाजिक, साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़े हैं। जैसे पूर्व नगर महासचिव स.पा. अध्यक्ष विधिक साक्षरता समिति पंजीकृत जबलपुर हैं।

संयोजक / संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आमा साहित्य संघ जबलपुर मप्र, उपाध्यक्ष यादव महासभा, उपाध्यक्ष त्रिपुर वरिष्ठ नागरिक महासंघ जबलपुर मप्र, इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन – विधिक सलाहकार मप्र … आदि।

सम्मान : अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय साहित्यिक, सामजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं मानद उपाधियों से अलंकृत / विभूषित।

विशेष : विक्रम शिला हिन्दी विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) भागलपुर बिहार से पूर्णिका- जनक की उपाधि से सम्मानित (2022)

 

आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

(डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ जी को हिंदी साहित्य की विधा पूर्णिका का जनक होने का श्रेय है. आपकी पुस्तक सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह) के आत्मकथ्य के माध्यम से आपने पूर्णिका के इतिहास पर प्रकाश डाला है जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके पूर्व हमने इसी प्रकार गद्य क्षणिका के जनक श्री रामदेव धुरंधर जी, मारीशस के आलेख को भी प्रकाशित किया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं. – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))

👉 हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ # 30 – मारिशस से ~ गद्य – क्षणिका : मेरे लेखन का एक सबल पक्ष ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

“सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह को पुस्तक रूप तक लाने में मुझे भी बहुत कुछ नये नये अनुभव प्राप्त हुए है। जब से हमने सन् 2017 से पूर्णिका पर काम करना प्रारम्भ किया है।

अनुभव यह हुआ कि यदि कोई भी चीज या चलन सदियों से चल रहा है तब भी उसे हमें बिना सोचे समझे आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिये हमें ईश्वर ज्ञान बुध्दि प्रदान किये हैं उसका धनात्मक, ऋणात्मक समझ बूझकर नुकसान फायदा सोच कर स्वीकार करना चाहिये मानना चाहिये और यदि हमें लगता है कि यह तो गलत है हमारे या जन हित में नहीं है तो उसे स्वीकार करने की जगह अस्वीकार करना चाहिये।

लेकिन हाँ यदि आप ने ऐसा किया तो उस प्रथा चलन को आँख बंद करके मानने वाले आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मेरे साथ पूर्णिका को लेकर ही नहीं बड़े बड़े वैज्ञानिको के साथ भी हुआ लेकिन वो अपने उद्देश्य से विरोध के पश्चात भी भटके नहीं तभी आज विश्व विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुका है कि आज वर्तमान में चाँद पर बस्ती बनाने की चर्चा जोरों पर है। यदि आज भी लोग चाँद को चन्दा मामा जानते रहते हमें बताते रहते और हम वही मानते रहते तो आज भी विकास से दूर होते।

एक महान होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति की खोज करने वाले जब डॉ. हैनीमन साहब ने कहा कि रोग जिस तत्व की कमी से हो जाये तब उसे ही पूरा कर दो रोग ठीक हो जायेगा।

लेकिन उनकी इस बात का उस समय पुरजोर विरोध हुआ फिर भी वो अपने काम में विरोध को दर किनारे कर के लगे रहे और आज होमियो पैथी चिकित्सा पद्यति से रोगियों का इलाज कर उन्हें खुशहाल किया जा रहा है रोग मुक्त किया जा रहा है।

यदि आज सारे के सारे लोग दुनियाँ की उन्हीं पुरानी विचार धाराओं प्रथाओं को मान कर चल रहे होते तो ऐसा विकास जो हम देख रहे हैं किसी भी क्षेत्र में न हुआ होता वह चाहे दूर संचार, सुरक्षा अथवा किसी भी क्षेत्र में अकल्पनीय, विकास न हो पाया होता।

हाँ किसी खोज का विरोध यदि तर्क संगत हो तो होना भी चाहिये किन्तु तर्क हीन नई खोज का विरोध तो नहीं होना चाहिये किन्तु कुछ लोग तर्क संगत खोज का तर्क हीन विरोध करते हैं।

कुछ लोग उस तर्क हीन विरोध करने वाले व्यक्ति को अपने पाले में करने के लिये उस व्यक्ति जिसने तर्क हीन विरोध उस नई खोज का किया बिना उसकी योग्यता का उचित अध्ययन मूल्यांकन किये पावर या क्षमता न होते हुए भी किसी उपाधि विशेष से अलंकृत कर देते हैं जो न तो अलंकृत होने वाले को और न ही अलंकृत करने वाले को कोई लाभ पहुँचा पाती है बस इतना ही होता है अपने मुँह मियां मिट्ठू बने रहिये खुश होते रहिये।

हम लोग यह भी जान लें कि जब कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक, साहित्यकार नई बात उठाता है तब भी जो लोग स्थापित नहीं होते हैं वो विरोध इसलिये करते हैं कि हमने तो इतने बड़े बड़े काम किये हैं लेकिन नया कुछ भी नहीं कर पाये है जो सदियों से चल रहा है वही किये हैं लेकिन यह व्यक्ति नया कुछ कर के अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है हम ऐसे ही रह गये।

लेकिन आगे चलकर जो विरोध होता है वह यह साबित करता है कि अब वह व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो रहा तभी यह विरोध हो रहा है। यही हाल पूर्णिका जनक और पूर्णिका के साथ भी है।

साहित्य हो विज्ञान हो या अविष्कार का कोई नया क्षेत्र हो। विरोधियों के अलावा एक समय ऐसा आता है कि उस व्यक्ति (जो नया काम कर रहा है) के साथ उसकी विचार धारा से सहमत हो कर अनेकानेक लोग, अनुयायी साहित्यकार वैज्ञानिक उस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं

जिससे वह खोज दुनिया स्वीकार कर लेती है और विरोधियों कि जुबान बंद हो जाती है उन्हें विवश हो कर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है या मुँह छुपाना पड़ता है।

यही हाल पूर्णिका और पूर्णिका जनक के साथ हुआ आज पूर्णिका हिन्दी साहित्य की जानी मानी एक सशक्त विधा है जिसे हिन्दी साहित्य में एक सम्मान जनक स्थान प्राप्त हो जिसके लिखने पढ़ने वाले पूर्णिकाकारों की एक लंबी सूची बन गई है जिसमें सर्व प्रथम डॉ. प्रो. खेदू भारती ‘सत्येश’ जी धमतरी छत्तीसगढ़ का नाम आता है जिनकी पूर्णिका की पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में हैं।

जबलपुर के पूर्णिका पुरोधा कदम जबलपुरी जी नों सौ दिन से निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं इनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिव अलग जी जिनकी तीन पूर्णिका संग्रह के साथ पूर्णिका में एक महाकाव्य प्रकाशित हो रहा है जो लगभग तीन हजार पृष्ठों का होगा। मारीशस से भाई गोवर्धन सिंह फौदार सच्चिदानंद जी निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ जी जिन्होंने बुन्देली बोली में पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित करा दी है। रजनी कटारे जी जिनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीन दयाल यादव जी जिनकी पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी। भाई श्री ओम प्रकाश खरे और रमेश सेठ तथा चन्द्रभान चन्द्र और डॉ ललित कुमार सिंह ‘ललित’ अलीगढ़ उत्तरप्रदेश के साथ ही देश के अनेकानेक पूर्णिका कारों की पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें कुंज बिहारी यादव नरसिंहपुर मप्र, नीलम यादव एहसास प्रयाग राज उप्र, किरत सिंह यादव भिण्ड मप्र, गायत्री सिंह ठाकुर ‘सक्षम’ नरसिंहपुर मप्र, सतीश तिवारी भी शामिल हैं। और अभी दिसम्बर 2024 में एक साथ पैतालिस पूर्णिका की पुस्तकों का विमोचन हुआ जो ऐतिहासिक है। अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक समय में एक मंच से किसी एक विधा विशेष की इतनी पुस्तकों का विमोचन हुआ हो।

और यह बात सिध्द करती है कि “सफल हुआ अभियान” सत्य और सही है कि अभी पूर्णिका जनक के 3 फरवरी 2024 को जन्मदिन पर चार हिन्दी साहित्य अकादमी भारत सरकार उच्च शिक्षा विभाग की पत्रिका, दो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने पूर्णिका को अपनी मान्यता प्रदान कर इस बात पर और चाँद लगा दिये कि “सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह अद्वितीय पुस्तक है।

अंत में मै अपने समस्त पूर्णिकार मित्रों को नमन करता हूँ कि यह केवल और केवल पूर्णिका के प्रति आप के लगाव और अभियान” समर्पण के कारण हो पाया है। कि “सफल हुआ अभियान’ (पूर्णिका संग्रह) अब आप और समस्त पूर्णिका कारों और पूर्णिका पाठको के हाथों में यह पुस्तक “सफल हुआ अभियान’ पूर्णिका पहुँच पा रही है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १८९ ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – ☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है आपके द्वारा लिखित  व्यंग्य : कल आज और कलपर आपका आत्मकथ्य।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १८९ ☆

“व्यंग्य : कल आज और कल☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य विधा के समय के साथ बदलते स्वरूप, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालती यह नई किताब है। ‘व्यंग्य आलोचना के वर्गीकरण बिंदुय् लेख व्यंग्य के मूल्यांकन के लिए आवश्यक सैद्धांतिक ढांचे और मानदंडों की पड़ताल करती है, यह समझने का प्रयास है कि व्यंग्य की आलोचनात्मक समझ कैसे विकसित हो सकती है। पुस्तक व्यंग्य की अभिव्यक्ति की विविधता को भी रेखांकित करती है। काव्य रचनाओं में हास्य, व्यंग्यऔर हिंदी नाटकों में व्यंग्य जैसे लेख स्पष्ट करते हैं कि कैसे कविता की सघनता और नाटक की नाटकीयता में भी व्यंग्य अपनी पैनी धार बनाए रखता है। नुक्कड़ नाटकों में प्रायः व्यंग्य ही वह रोचक अस्त्र होता है जो दर्शकों को बांधे रखता है। इसी तरह लघुकथा में जो चमत्कृत करता अंत किये जाने की परंपरा दृष्टव्य है उसमें भी व्यंग्य का सहारा लघुकथा को आकर्षक बनाता है। ‘व्यंग्य के विविध आयाम’ लेख विधा की बहुरूपता को और विस्तार से व्याख्यायित करता है।

166 पृष्ठ की पुस्तक में व्यंग्य विषयक 22 अध्याय हैं। समकालीन महिला व्यंग्यकारों की चर्चा पर एक अध्याय है। परसाई, त्यागी, जोशी जी पर स्वतंत्र आलेख हैं तो समकालीन व्यंग्यकारों से चर्चा भी शामिल है। किताब का मूल्य 224 रु में अमेजन पर सुलभ है। पुस्तक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली से अच्छे कागज पर साफ तरीके से पेपर बैक आवरण में प्रकाशित है। व्यंग्य संदर्भ है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “स्वयंसिद्धा…” (बुंदेली कथा संग्रह)– डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है  डॉ. सुमलता श्रीवास्तव जी की कृति स्वयंसिद्धा की समीक्षा)

☆ “स्वयंसिद्धा…” (बुंदेली कथा संग्रह)– डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆ 

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक ‏: स्वयंसिद्धा 

कथाकार  : डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव

☆ बुंदेली में रचित डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव की भावभरी कहानियां – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

स्वयंसिद्दा” (स्वयंसिद्धा) जबलपुर की विदुषी लेखिका  डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव की बुंदेली में रचित भाव भरी कहानियों का संग्रह है। कहानियों में हमसे जुड़े, हमारे आसपास, हमारे समाज, हमारे देश के आमजन की परिस्थितियों, विषमताओं, संघर्ष, उनके दुःख – सुख, संतोष, उनकी संकल्प शक्ति का ऐसा शब्द चित्र है कि पाठक पात्रों को चलचित्र की भांति जीता जागता, जीवन संघर्ष करता देखता है। पात्रों के सुख दुख, संघर्ष उसे अपने महसूस होते हैं। कभी उसे लगता है कि काश वह कहानी के किसी विशिष्ट पात्र को कोई सलाह दे पाता अथवा उसकी कोई मदद कर पाता। क्षेत्रीय बोलियां/भाषाएं चाहे वह बुंदेली हो अथवा बघेली, मालवीय, निमाड़ी आदि आदि …. यदि हम चाहते हैं कि ये जीवित रहें तो हमें इनमें लिखना, बोलना होगा। इनका संरक्षण आवश्यक है। बुंदेली बोली में रचित यह कृति निःसंदेह बुंदेली को समृद्ध करेगी। कृति की  प्रथम कहानी “स्वयंसिद्दा” का  कथानक, पात्रों की सहजता – सरलता, भाषा शैली, प्रवाह पाठकों को बांधने में सक्षम है। भाव भरी यह कथा काल्पनिक नहीं ऐसी घटनाएं समाज में होती रहती हैं। “स्वयंसिद्दा” कहानी निरमला के इर्द गिर्द घूमती है। निरमला के पिता उसका विवाह गांव के सम्पन्न व प्रतिष्ठित पुरोहत जू के पुत्र से कराना चाहते हैं। कथा का एक प्रसंग प्रस्तुत है जिसे पढ़ते हुए आपकी आँखें उसे देखने भी लगेंगी।

“मिसरा जू प्रबचन के बाद पुरोहत जू खों अपने घरे लोआ लै गए। घर की देख-संभार निरमलइ करत ती। घिनौची तो, बासन तो, उन्ना-लत्ता तो, सब नीचट मांज-चमका कें, धो-धोआ कें रखत ती। छुई की ढिग, उम्दा गोबर सें लिपौ आंगन देखकें पुरोहत जू की आत्मा प्रसन्न हो गई। दोई पंडत तखत पै बैठकें बतयान लगे कै बालमीक की रामायन और तुलसी के मानस में का-कित्तौ फरक है? मौका देखकें मिसराजी बात छेड़बे की सोचइ रए ते, कै ओइ घरी निरमला छुइ-गेरू सें जगमग तुलसी-चौरा में दिया धरबे आई। दीपक के उजयारे में बिन्ना बाई कौ मों चंदा सो दमक उठौ। पुरोहत जू ने संध्याबंदन में हांत जोरे और निरमला खों अपने घर की बहू बनाबे कौ निस्चै कर लओ। “

सुमनलता जी की एक अन्य कथा “संतान – सातें” में पुत्र की प्रताड़ना से त्रस्त मां –

“मैंने कल्ल घाट पै संतान – सातें के कड़ा के संगे – संगे मोड़ा खों भी तिलांजलि दै दई। घाट के पंडत सें ओको किरिया-करम करबा दऔ। जोई मोड़ा मोरे बदन पै कित्ती लातें पटकत तो, जब ऑपरेशन के बाद ओखों दर्द  होत तौ, मैं चूं नैं करत ती, मनों अब लात चलाबे कौ का मतलब? ऊनें द्रोपदी घाईं मोरे केस पकर कें मोहे घसीटो थो, बाई साब! बो तो दुस्सासन सें भी खराब निकरौ। ई कौरब ने भौजाई खों नईं, जनम देबे बारी मताई खों घसीटो है। ऐंसे पापी पूत की महतारी होबे सें तो मैं निपूती भली। “

यह कथा है चंदा नामक एक गरीब महिला की जिसने चार पुत्रियों के बाद ईश्वर से मनौती मांग कर एक पुत्र की प्राप्ति की थी। गरीब श्रमिक महिला को पुत्र मिला किंतु शक्तिहीन पैरों वाला। अधिक श्रम करके, भूखे रह कर उसने पुत्र का इलाज करवाया, पढ़ाया – लिखाया। पति की उपेक्षा का शिकार तो वह पहले से ही थी, विवाह उपरांत पुत्र ने भी बहू के साथ मिलकर उस पर अत्याचार शुरू कर दिए। अंततः मां को अपनी ममता का दमन करना पड़ा। एक स्त्री का पीड़ा से भरा जीवन, उसका जीवन संघर्ष और स्वाभिमान जागृत होने पर उसका कठोर निर्णय पाठकों के मन को झकझोर कर वेदना से भर देता है। यह सिर्फ इस कथा की नायिका चंदा की कहानी नहीं है। देश – दुनिया में लाखों  महिलाएं इसी तरह का जीवन जी रही हैं। मुझे लगता है कि  इस कथा को पढ़ कर अवश्य ही उन लोगों में अपनी मां के प्रति कर्तव्यबोध जागृत होगा जो मां के द्वारा अपने लालन – पालन, उनकी त्याग – तपस्या से अनभिज्ञ और उनके प्रति निष्ठुर हैं।

इस संग्रह की कहानी “एक कटुरिया दूध” भी मन को द्रवित कर देती है जिसमें अत्यधिक गरीब किंतु ईमानदार मजदूरन अपने बच्चे को बार बार मांगने पर भी चोरी करके मालकिन के यहां का दूध नहीं पीने देती। बच्चा पूछता है – दूध का स्वाद कैसा होता है मां?

सुमनलता जी के इस बुंदेली कहानी संग्रह में जलसमादी, नजर, कचोंट, देसनिकारो, डर, मूसरचंद, कुल्फी, सौ-बटा-सौ, अपराधन, परास्त, सांचे की मूरत, लायसेंस, बुद्धिजीवी और कलाबन्त शामिल हैं। अपने विषयों, पात्रों, परिवेश, कथा पर केंद्रित रहते हुए उसके कसे हुए विस्तार, सहज सरल प्रवाहपूर्ण बुंदेली भाषा/बोली और पाठकों के मन में सजीव हो उठते पात्रों के कारण यह “कथा संग्रह” न सिर्फ बुंदेली बोली में रचित कथाओं में वरन अन्य भाषाओं में सृजित कथा संग्रहों में विशिष्ट स्थान बनाएगा।

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव  संस्कृत और संगीत में एम.ए. तथा संस्कृत में ही संगीतशास्र में पी. एच-डी हैं। पूर्व में उनके कुछ अन्य ग्रंथों के साथ ही दो (हिन्दी ) कहानी संग्रह “जिजीविषा” एवं “सरे राह” भी प्रकाशित हो चुके हैं। इन संग्रहों में प्रकाशित कहानियों ने उनके पाठकों और प्रशंसकों का विशिष्ट वर्ग बनाया है।

मुझे विश्वास है कि “बुंदेली बोली” में रचित उनके इस नव कथा संग्रह “स्वयंसिद्दा” से न केवल उनकी यश – कीर्ति में, उनके पाठकों की संख्या में वृद्धि होगी वरन और लोगों को भी बुंदेली में सृजन की प्रेरणा मिलेगी। बुंदेली कथा साहित्य में वर्तमान समाज की समस्याओं, विसंगतियों का ऐसा मार्मिक सजीव चित्रण शायद ही इससे पूर्व प्रस्तुत किया गया हो। हो सकता है कि बुंदेलखंड के कतिपय बुंदेली रचनाकार इसकी  बुंदेली बोली/भाषा को मानक न माने, इसकी आलोचना करें, किंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि “कोस –  कोस पै बदलै पानी, ढाई कोस पै बानी”। अब गांव में शहर और शहर में गांव घुस गए हैं अतः शहरी क्षेत्रों के निकटवर्ती गांवों की भाषा/बोली ठेठ क्षेत्रीय नहीं रह गई। बोलियों के बदलते स्वाभाविक स्वरूप को स्वीकार करते हुए हमें इन्हें रक्षित करने और आमजन के समझने योग्य बनने में बाधक नहीं होना चाहिए। हिन्दी (खड़ी बोली) पूरे देश के लिए तैयार की गई संपर्क भाषा है अतः यह कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपूर्ण देश में एक सामान होना चाहिए किंतु विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों, विभिन्न भाषा भाषियों द्वारा जब सुगढ़ित हिंदी बोली अथवा लिखी जाती है तो उसके  उच्चारण और लहजे में भी अनचाहे, स्वाभाविक दोष उत्पन्न हो जाता है जो लेखन में भी प्रकट होता है अतः हमें ठेठ क्षेत्रीय भाषाओं में ही साहित्य सृजन होने जैसी जिद छोड़ कर लोगों द्वारा क्षेत्रीय बोलियों के सहज स्वीकार्य स्वरूप को मान्यता देना चाहिए।

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव जी का बुंदेली प्रेम और बुंदेली में सृजन का प्रयास प्रशंसनीय है। बहुत बहुत बधाई, मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर, मध्यप्रदेश – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री हरभगवान चावला जी द्वारा लिखित उपन्यास ““देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला पर चर्चा।

☆ “देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – देख फ़रीदा जो थिआ [उपन्यास]

लेखक – हरभगवान चावला/9354545440

कीमत – 350/- पेपर-बैक (पृष्ठ199)

प्रकाशक – आधार प्रकाशन, पंचकूला।

संपर्क – 0172-2566952

विभाजन के दर्द का दस्तावेज – श्री जयपाल

देख फरीदा जो थिआ, शक्कर होई वेस्स।

साईं बाँझों आपणे, वेदन कहिए केस्स। ।

बाबा फ़रीद कहते हैं–शक्कर विष हो गई है यानी सुख के दिन‌ दुख में बदल गए, अपना दुखड़ा साईं को छोड़कर किसको कहें। देख फरीदा जो थिया- दोहड़े/दोहे में जो दर्द बाबा फरीद का है , वही दर्द इस उपन्यास में रचनाकार हरभगवान चावला का है।

‘देख फरीदा जो थिआ’-हरभगवान चावला का उपन्यास विभाजन की एक दुःख भरी मार्मिक दास्तान है।

1928 में पाकिस्तान में बनी एक नहर की चर्चा के साथ इस उपन्यास का फ़लक 1939/40 से शुरू होकर 1947 तक और आजादी के बाद से 2022 तक जाता है। यह पाकिस्तान के कौड़ा राम, उत्तम चंद, नौबतराय, नूर मोहम्मद ख़ान, भोजराज, बशकण ख़ान, चार-पाँच मुख्य-परिवारों और तीन-चार गाँवों ( कोटला अली-दस्ती, डाबराँ, खंगराँवाला ) की बसने, उजड़ने और विस्थापित होने की दर्द भरी कहानी है। 1946 तक रावलपिंडी से मुल्तान तक सारा इलाक़ा पूरी तरह हिन्दू-मुस्लिम के भेद से अनजान एक परिवार की तरह रहता है। हिन्दू, मुस्लिम सब एक दूसरे की शादियों, जनेऊ संस्कार, आदि में शामिल होते हैं l नाड़ से टोकरियाँ, रोटी रखने का डिब्बा, पंखे, पंखियाँ, आसन आदि सब हिन्दू-मुस्लिम औरतें मिल-जुलकर बनाती हैं। ग्राम-पंचायत के इकठ्ठ, पुलिस के मसले, दरगाह, मेले, ताश के पत्तों की बाज़ी, धार्मिक-यात्राओं, आदि में सब शिरकत करते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं।

नौबत राय की बैठक में हर रोज ताश खेली जाती है। ताश खेलने के लिए हिन्दू भी आते, बलोच भी, मोची भी। तीन हुक्के लगातार चलते रहते। एक हिन्दुओं के लिए, दो मुसलमानों के लिए।

लियाक़त और नियामत व जुम्मा-दाया की जोड़ी इस इलाके की दो मशहूर गवैयों की जोड़ियाँ थीं जिनकी गायकी के हिन्दू-मुस्लिम दोनों दीवाने थे। लियाकत और नियामत रसखान के भजन गाते। जब वे दोहड़े, ग़ज़लें, बैंतें, बाबा फरीद के दोहड़े आदि गाते तो लोग झूम उठते। हीर-राँझा, सस्सी-पुन्नु, सोहणी-महिवाल मिर्ज़ा-साहिबाँ शीरीं-फ़रहाद , ..आदि के क़िस्से सुनते समय लोग खुद भी प्रेम-प्यार की पींगें लेने लगते। एक दूसरे के साथ क़िस्सागोई में समय व्यतीत करते।

इस ख़ुशनुमा हँसते-गाते माहौल को एक दिन किसी की नज़र लग जाएगी..यह तो कोई सोच भी कैसे सकता था ..??

नूर मोहम्मद की माँ फ़ातिमा और भोजराज की माँ ज्ञान देवी दोनों पक्की सहेलियाँ हैं। बचपन में ‘सखी सरवर की दरगाह’ पर जाने के बाद वे दोबारा से दोनों परिवारों के साथ वहाँ जाती हैं और मुल्तान शहर को भी देखती हैं। इस उपन्यास में भोजराज और नूर मोहम्मद की साली नूराँ की अद्भुत प्रेम कहानी भी है। भोजराज हिन्दू और नूराँ मुस्लिम, दोनों प्रेम विवाह करते हैं लेकिन अपना धर्म नहीं बदलते। इस उपन्यास में यह प्रेमकथा मानवीय प्रेम की मिसाल साबित होती है और यही इस उपन्यास का मुख्य-संदेश भी है।

आख़िर वही हुआ जिसका डर था।

दोनों तरफ़ कुछ कट्टरपंथी सामाजिक और राजनीतिक संगठन भी थे, जो दो राष्ट्रों के सिद्धांत का प्रचार कर रहे थे और बँटवारे के पक्ष में थे। ये दोनों ख़ुद को राष्ट्रवादी और देश-भक्त मानते थे। दोनों तरफ महात्मा गाँधी की जय बोलने वाले भी थे और हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के नारे लगाने वाले भी। इन कट्टरपंथी हिन्दू- मुस्लिम संगठनों ने आग में घी डालने का काम किया। कुछ अपराधी और समाज-विरोधी तत्व भी इसमें शामिल हो गए थे। उन्होने घरों का क़ीमती सामान, सोना ज़ेवरात, रुपये-पैसे और पशु सब लूटने शुरू कर दिए। लेकिन इस सबके बीच अल्लारखा शाह, ख़ुदायार ख़ान, दोस्तमंद ख़ान पठान, आगू बलोच, मंजूर शाह, फ़ातिमा, संभावित कत्लेआम के बारे में पूर्व सूचना देने वाले मुस्लिम मर्द और मुस्लिम औरतें आदि सबने अपनी जान पर खेलकर बेक़ुसूर हिन्दुओं को बचाने का प्रयत्न भी किया। इन्सानियत को बचाने का यह जज़्बा अभी भी बचा हुआ था, हिन्दू और मुस्लिम दोनों में..और इसी जज़्बे को दिखाने और स्थापित करने का प्रयास इस उपन्यास में भी हुआ है।

बँटवारे का ऐलान हो गया था। असामाजिक/अपराधी तत्व और कट्टरवादी गिरोह सक्रिय हो गये थे।

नूर मोहम्मद खान की माँ फ़ातिमा को जब अपनी बचपन की सहेली ज्ञान देवी के संदेश से यह पता चला कि उसका अपना बेटा नूर मोहम्मद दंगों की साज़िश रच रहा है और वह भोजराज से अपनी पुरानी रंजिश के कारण ज्ञान देवी के परिवार पर हमला कर सकता है तो वह अपने बेटे नूर मोहम्मद को कहती है–” बदले का जिन्न सवार है न तुझ पर, तू आज बदला ले ही ले, मैं ज्ञान देवी के घर चलती हूँ। तू आजा पीछे-पीछे, पहले मेरी लाश बिछा देना, फिर आराम से अपना बदला लेना। ” अपनी माँ के इस रौद्र रूप का नूर मोहम्मद सामना नहीं कर पाता है और माँ को वचन देता है कि अब वह भोजराज पर हमला नहीं करेगा, बल्कि उसकी सुरक्षा करेगा। वह अंत तक भोजराज और उसके परिवार की सुरक्षा करता है। यहाँ तक कि भोजराज के आग्रह पर उसकी पत्नी नूराँ को भी अपने घर रखकर उसको यथासंभव सुरक्षा देता है, क्योंकि भोजराज को डर था कि नूराँ अगर उस के साथ हिन्दोस्तान जाएगी तो रास्ते में उसके साथ दरिंदगी हो सकती है। जब भोजराज हिंदुस्तान जाने के लिए कैंप में होता है तो नूराँ मर्दाने भेस में घोड़े पर सवार होकर उसे कहरोड पक्का स्टेशन-कैंप में मिलने जाती है l दोनों मिलते हैं l दोनों के मिलन का यह दृश्य लैला-मजनूं, हीर-राँझा सोहणी-महिवाल, शीरीं-फ़रहाद, मिर्ज़ा-साहिबाँ और सस्सी-पुन्नु के मिलन को साकार कर देता है।

इसके बाद तो लोगों का उजड़ना शुरू हो गया और दुनिया के सबसे बड़े ख़ौफ़नाक और ख़ूनी विभाजन में बदल गया। ट्रेनें लाशों से भर गईं। परिवार के सदस्य बिछुड़ गए। सब कुछ लूट लिया गया। खेत, खलिहान, पशु सब वहीं छूट गया। न आबरू बची, न दौलत…देखते-देखते सब भूखे-नंगे हो गए..बीमार, गर्भवती औरतें, बच्चे, बूढ़े, अपंग कैसे वहाँ से आए..इसके लोमहर्षक दृश्य उपन्यास में पढ़ते हुए मन बार-बार भर आता है और इसका कोई जवाब नहीं मिलता कि जिनका क़त्लेआम हुआ और जो विस्थापित हुए, आख़िर उनका क़ुसूर क्या था? जिन्होंने इस कत्लेआम को अंजाम दिया, उनकी इन लोगों से क्या दुश्मनी थी? बस इंसानियत से बड़ा मज़हब हो गया था। एक अनुमान के मुताबिक़ इस मारकाट में लगभग 10-15 लाख लोग मारे गए और 1.5 से 2 करोड़ विस्थापित हुए।

आख़िर जो किसी तरह बच पाए , वे आधे-अधूरे, भूख-प्यासे, कटे-फटे, लुटे-पिटे, टूटे-फूटे और बचे-खुचे किसी तरह हिन्दोस्तान के पंजाब क्षेत्र मे बने कैंपों में पहुँचे और यहाँ पाँच-छः साल तक रहने के बाद इन्हें घर और खेत अलॉट हो सके। इसके बाद दिल्ली और पानीपत में छोटे-छोटे कामों की तलाश की गई। एक पीढ़ी तो इसी संघर्ष में मर-खप गई। 1966 में एक और विभाजन होता है। पंजाब से कटकर हरियाणा अलग राज्य बनता है। इस राज्य में विस्थापितों को आज तक परायेपन का दर्द झेलना पड़ रहा है। आज भी पाकिस्तानी, खत्री, रिफ्यूजी, सिंधी, झांगी, मुल्तानी, भाप्पे, पंजाबी आदि शब्दों से जब उन पर व्यंग्य किया जाता है तो उनके ज़ख़्म फिर से हरे हो जाते हैं। आज भी वे सामाजिक/राजनीतिक/धार्मिक/आर्थिक क्षेत्र में इस उत्पीड़न का शिकार हैं। हरियाणा की राजनीति में पंजाबी/गैर-पंजाबी का विवाद हर इलेक्शन में मुद्दा बन जाता है।

लेखक की मानवीय पक्षधरता के कारण यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है l इस प्रकार की साहित्यिक रचनाओं के बारे में ही कहा जाता है कि इतिहास में तथ्य होते हैं तो साहित्य में सत्य। आम जीवन की सच्चाई तो साहित्य में ही मिलती है। इस उपन्यास में विभाजन के इस सत्य को दिखाने का ईमानदाराना-रचनात्मक प्रयास है। स्थानीय बोलियों के शब्दों, लोक-कथाओं, लोकगीतों, लोक-संगीत, कहावतों आदि से वहाँ के गाँवों की साँझी संस्कृति जीवंत हो उठी है। सरल/सहज भाषा, स्थानीयता के रंग में रंगे संवाद और कथानक की रोचकता, उपन्यास की पठनीय तो बनाती ही है, साथ में पाठक में विचारशीलता , संवेदनशीलता और मानवता के मूल्यों को भी मज़बूती प्रदान करती है।

अपने अतीत से सबक़ लेकर अगर हम अपने वर्तमान को बेहतर मानवीय स्वरूप देना चाहते हैं और एक बेहतरीन भविष्य की ओर बढ़ना चाहते हैं तो इस उपन्यास को हमें ज़रूर पढ़ना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि देख फरीदा जो थिआ विभाजन की अन्य महान कृतियों में शुमार होकर वैश्विक मानवीय मूल्यों की स्थापना में अपना साहित्यिक योगदान देगा।

लेखक को बहुत-बहुत बधाई!!

समीक्षा-… श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री जयपाल जी द्वारा  सुश्री मनजीत मानवी  जी के काव्य संग्रह “बूंद बूंद शब्द” पर सार्थक विमर्श ।

☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक —  बूंद बूंद शब्द [ काव्य संग्रह ]

लेखिका — मनजीत मानवी [9896850047]

कीमत — 295/- [पेपर बैंक]

प्रकाशक — ‘आथर्स प्रेस,  नई दिल्ली

कविता और व्यथा का अंतरंग रिश्ता – श्री जयपाल ☆

मैं लिखती हूँ कि

अब बदले दुनिया

अन्तिम व्यक्ति के हक में

 

मैं लिखती हूँ कि

सपनों की घुटन

नहीं और  समा सकती मन में

 

मैं लिखती हूँ कि

खुद का अपना दावा

मैं पेश करूँ हर सूरत में

उपरोक्त पंक्तियाँ है—‘बूद बूंद शब्द’–कविता-संग्रह की एक कविता से । कविता संग्रह है मंजीत मानवी का । इन पंक्तियों में जीवन के प्रति जैसी जिजीविषा दिखाई देती है, जीवन जीने की उत्कट लालसा जैसी इन पंक्तियों में मौजूद है,वैसी ही जीवन की धड़कन इस संग्रह की हर कविता में सुनी जा सकती है–‘

कभी कोई बूंद

मेरी पीर लिए

बरसे वहां

तुम हो जहां

 

कभी कोई पत्ता

तेरी प्रीत लिए

यूं सरसराए

कि तुम आए !

निश्छल प्रेम से लबालब इन कोमल भावनाओं को समर्पित है यह काव्य-संग्रह । इसका एहसास पाठक को हर पन्ने पर कविताओं को पढ़ते हुए होता है l दरअसल  कवयित्री के काव्य सरोकार और जीवन सरोकारों को अलग अलग नहीं किया जा सकता । उनके जीवन आदर्श और जीवन संघर्ष दोनों इन कविताओं के असली सर्जक हैं । जीवन से प्यार और जीवन से संघर्ष-यही है इन कविताओं का सारांश—

ऊपर से कठोर

उलझी

सुप्त

भीतर से उजली

स्पष्ट

तृप्त….

 

बहुत दिन हुए

कोई चेहरा नहीं देखा

दर्द की लौ से

साबुत और रोशन

कवयित्री महिला-जनान्दोलनों से जुड़ी रही है । एक स्त्री की मानसिक पीड़ा और उसके संघर्ष को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस करती है l अंतिम व्यक्ति के साथ  अंतिम स्त्री के दर्द और संघर्ष को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति देती है–

मेहरबानी की

जूठन पर पलती

वह अंतिम स्त्री भी

चाहती है

पंख पसार के जीना..

 

पांव में छाले हैं

सर पर मैला

महिला के प्रति पुरुषवादी-पितृसत्तात्मक रवैये को वह महिला शोषण का एक हथियार करार देती है जो महिला को मात्र एक शरीर समझता है और उसकी गरिमा और सम्मान को कोई महत्त्व नहीं देता–

मेरा शरीर

तुम्हारे खेल का

मैदान नहीं

 

न ही तुम्हारी

सत्ता का

तुच्छ गलियारा

कवयित्री दलित स्त्री, मजदूर स्त्री, गुलाम स्त्री, बलात्कृत स्त्री, पितृसत्ता/ पुरूष सत्ता की शिकार स्त्री आदि स्त्रियों के सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सीधे विद्रोह का आह्वान करती है कि इस व्यवस्था को अब बदलना ही  होगा, इसे अब और  सहन नहीं किया जा सकता ।

प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवयित्री शुभा  मनजीत की काव्य कला पर अपनी  सारपूर्ण टिप्पणी में कहती हैं– ‘सरल प्रवाहमयी भाषा, मार्मिक बिम्ब और उपमाएं, प्रतिगामी सामाजिक ढांचों,शास्त्रों के प्रतिरोध में चिन्हित की गई विषय वस्तु और एक तरह की गीतात्मकता मनजीत की लेखन शैली की विशेषता है …..।’

कवयित्री न केवल सामाजिक संबंधों  और अंतरंग मानवीय रिश्तों के प्रति संवेदनशील है बल्कि वह शब्दों के प्रयोग के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है। शब्दों की मितव्ययिता सभी कविताओं की विशेषता है। शब्दों और वाक्यों की तराश कविताओं को गंभीरता प्रदान करने में सफल रही हैं l

मनजीत स्वयं स्वीकार करती हैं–

कितना अंतरंग रिश्ता है

कविता और व्यथा का

 

छंदों की आत्मा में

अनायास ही

घुल मिल जाता है

इस दौर की आर्थिक/सामाजिक, राजनीतिक/साँस्कृतिक विकृतियों के विरोध में खड़ी और गहरे मानवीय सरोकारों की पक्षधर इन कविताओं को पढ़ा जाना बहुत जरूरी है।

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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