हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घंटाघर चौक। काफी समय से खड़ा हूँ। लोकल बस वही आ रही। दो चार आईं भी तो बुरी तरह ठसाठस भरी हुईं। मैं कस्बे का आदमी ठहरा। धक्कमपेल से घबरा गया। इसी डर से रुका रहा।

– आप तांगे में चले जाये़ं !

एक भला आदमी सलाह देता है।

मिलना जरूर होगा। उससे मिले साल डेढ़ साल हो गया ! समय कम है मेरे पास ! फिर भी जाऊंगा। क्या सोचेगी? व्यस्तताओं के सरकंडे बिना वजह फैलते जा रहे हैं।

पांच कदम स्टेशन की ओर जाता हूँ। तांगा बिल्कुल खाली है। आगे की सीट पर एक काला, गोल मटोल, चौदह पंद्रह साल का लड़का बैठा है।

– नये बस अड्डे चलेगा?

– हां, साब !

– कितने पैसे?

– तीस।

– चल फिर।

– पीछे की सीट पर बैठ जाता हूँ।

– नये बस अडडे, नये बस अड्डे का शोर चौड़ा बाज़ार के आसपास गूंजने लगता है। दो बाबू और आते हैं। एक वृद्ध भी आ जाता है ! इस तरह आधा दर्जन सवारियां हो जाती हैं।

– चल मेरे शेर‌!

– लगाम खींच देता है और घोड़ा हिनहिनाकर चल पड़ता है।

– एक सवारी बस अड्डे!

– वह लड़का फिर आवाज़ लगाता है तब बाबू कहता है कि, सवारियां तो पूरी हैं। क्यों भर रहा है मुर्गियों की तरह !

– एक कप चाय बनाऊंगा साब !

– वह दयनीय स्वर में कहता है !

दो सवारियां और मिल जाती हैं। टप् टप् शुरू होती है और साथ ही घोड़े को हल्ला शेरी !

चौराहे पर पहुंचते ही विफल बजती है।

लाइसेंस निकाल !

– है नहीं, साब !

– है क्यों नहीं? ऊपर से बारह सवारियां  !

आज जाने दो, साब !

गवर्नर का पुत्तर है क्या? ला, पैसे निकाल, तेरा चालान करूं।

– माफ कर दो, साब !

सवारियों में खलबली मच गयी है‌। बस पकड़नी है। यहां जाना है, वहां जाना है।

सभी मिलकर कहते हैं कि इसे माफ कर दो  !

– अच्छा, जा बेटा !

आंखें निकाल कर सिपाही चौक पर अपनी ड्यूटी देने लगता है।

सवारियां सलाह देती हैं – फिर न बिठाना इतनी सवारियां ! लाइसेंस पास रखो ! अभी बच्चे हो।

– साब, खायेंगे कहाँ से? महीना बांध रखा है ! घंटाघर चौक पर पान वाले की दुकान पर पहुंचाते हैं। इस बार घर में फाकाकशी चल रही है। इसे कहां से दें? हफ्ते बाद तांगा निकाला है। और वह आज के दिन ही मांग रहा है पैसे !

इतने में एक टैक्सी सिपाही के पास रुकती है। कुछ नोट हाथ में थमाये जाते हैं और फिर फुर्र हो जाती है !

मुझे लगने लगता है कि सरकार के सारे कानून इस तांगे वाले लड़के पर ही लागू होते हैं !

टप् ! टप्! तांगा चल रहा है !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – गलत गणित… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा गलत गणित

? लघुकथा – गलत गणित ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

सेठ रौनक मल के इकलौते बेटे की शादी का निमंत्रण पत्र मिला तो महेश ने अपने दोनों बच्चों से कहा –” देखो बेटा वहां ढेर से व्यंजन होंगे। आइसक्रीम , कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाई सभी को जी भर कर खा लेना। आखिर ₹501 देने हैं पूरी तरह वसूल हो जाने चाहिए। पास खड़ी पत्नी भी मुस्कुरा दी।

पार्टी खत्म होने के बाद घर लौटते ही दोनों बच्चे बड़े उत्साह से चहकने लगे –” पापा मैंने तीन आइसक्रीम खाई ….. , मैंने दो कोलड्रिंक पी….”

“ शाबास , आज तो तुमने पूरे पैसे वसूल कर लिए….” महेश ने उनकी पीठ थपथपाई।

घंटाघर बीता होगा कि बड़ा बेटा मां के पास आया –” मम्मी पेट में दर्द हो रहा है ….”उसके साथ ही उसे उल्टियां होने लगी। पति पत्नी घबरा गए फौरन अस्पताल ले गए।

“ शायद उसे खाने में विषबाधा हो गई है दो-तीन दिन अस्पताल रखना पड़ेगा “डॉक्टर ने बताया। दवाइयों, इंजेक्शनों, ग्लूकोज से बेटे की हालत सुधरी। तीसरे दिन पांच हजार रुपए का बिल थमा कर जब घर लौटे तो शादी में दिए रुपयों के  हिसाब से मन मसोसते रह गए।

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – बाल कहानी  – “मगर और मछली” – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी  – मगर और मछली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ बाल कहानी – मगर और मछली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

होशियार पुर गांव के पास एक नदी थी. उस में एक मछली रहती थी. उस का नाम मीना था. वह बहुत होशियार व चंचल थी. उस नदी में एक मगर आ गया. वह मछलियों को मार कर खाने लगा.

यह देख कर मीना की मां ने कहा, ” मीना ! तुम मगर से होशियार रहना. वह बहुत दुष्ट है.”

” ठीक है मां, ” मीना ने कहा और वह नदी की लहरें से खेलने चली गई.

दुष्ट मगर वही बैठा था. उस मीना बहुत अच्छी लगी. उस ने सोचा,’ यह बहुत प्यारी मछली है. यदि इसे मार कर खा लिया जाए तो यह बहुत स्वादिष्ट लगेगी.’ यह सोच कर दुष्ट मगर उस के पीछे पड़ गया.

मीना सतर्क थी. जब उस ने मगर को अपने पीछे आता देखा तो भागी. वह घबरा गई थी. फिर उस ने सोचा कि घबराने से काम नहीं चलेगा. उसे हिम्मत से काम लेना होगा. यह सोच कर उस ने अपने दिमाग को शांत किया.

तब उसे याद आया कि वही पास में नदी में एक चट्टान के नीचे गुफा है. उसी की तरफ दौड़ लगाई जाए. वह तेजी से उस ओर भागी. मगर, उस के पीछे हो लिया.

अब आगेआगे मीना तैर रही थी, पीछेपीछे मगर. मगर, मीना छोटी थी. वह तेजी से तैर नहीं पा रही थी. मगर, उस के पास तेजी से आ गया.

तभी मीना पलटी. वह दो चट्टानों के पास से गुजरी.

गुफा पास ही थी. उसे शरारत सूझी. उस ने मगर को छेड़ा, ” क्यों मामा ! तैरना नहीं आता है. या मुझे मार कर खाने की इच्छा नहीं है.”

मगर, यह सुन कर चौंका. मछली की इतनी हिम्मत. वह मगर को चुनौती दे. इसलिए वह उस के पीछे तेजी से भागा. अब मीना बहुत पास थी. वह चिल्लाई, ” पकड़ो मामा !”

मगर, ने अपना मुंह बढ़ाया. मगर, यह क्या ? वह दो चट्टानों के बीच फंस गया था.

” डर गए मामाजी !” मीना ने मगर को चिढ़ाया, ” क्या सारी ताकत खत्म हो गई है ?”

मगर को गुस्सा आ गया. वह तेजी से हाथपैर से जोर लगा कर आगे बढ़ा. वह जितना आगे बढ़ता गया, उतना चट्टानों के बीच फंसता चला गया. जब वह निकल नहीं पाया तब उस के समझ में आया कि एक छोटीसी समझदार मछली ने उसे चट्टानों  के बीच फंसा दिया था.

वह उस चट्टानों के बीच फंसा हुआ भूख से मर गया.

इस तरह समझदार मीना ने दुष्ट मगर से छुटकारा पा लिया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

06/03/2017

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 74 – बदलाव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदलाव।)

☆ लघुकथा # 74 – बदलाव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गौरी इस साल गर्मी की छुट्टी में चलो हम लोग  बाबूजी के गाँव चलते हैं।

माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी चाचा चाची के साथ वहीं पर ही रहते हैं। कभी कल हमारे पास आते हैं उन्हें वही अच्छा लगता है।

इस बार बच्चे छुट्टियों में घर आए हैं। बच्चों से पूछते हैं। माँ शालिनी ने गंभीर स्वर में कहा।

बोलो विवेक और चारु क्या तुम छुट्टियों में घर चलोगे?

जब देखो तब पापा आप गाँव चलने को बोलते रहते हैं हम लोग नहीं जाएंगे वहां बहुत गर्मी है।

चलो दो-चार दिन रहकर आएंगे पिकनिक हो जाएगी। शुद्ध हवा और खाना पीना सब कुछ अच्छा रहेगा। गाँव जंगल और पहाड़ी के किनारे है, इसी तरह तुम लोगों को प्रकृति की गोद में रहने का मौका मिलेगा और जो तुम लोग बहुत ऑर्गेनिक करते हो वह भी तुम्हें सही मायने में पता चलेगा।

तो सामान पैक कर लो हम अभी निकलते हैं 3 घंटे में पहुंच जाएंगे।

ठीक है, सभी लोग तैयार होकर जाते हैं और गाँव पहुंचते हैं। गाँव पहुंचकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। बड़ा सा बगीचा और बगीचे में सारे फलदार पेड़ लगे थे। आम, जामुन, नींबू कटहल, बेलपत्र का उसमें बेल भी बहुत लगे हुए थे। बाबूजी ने एक बड़े से बर्तन में बेल का शरबत बनाकर रखा था। सभी को उन्होंने पीने के लिए दिया और शाम को वह अपने बगीचों को पानी डालने के लिए चले गए उनके साथ विवेक और चारु भी गए।

उन लोगों ने खूब सारे फल तोड़े और सब्जियां भी टोडी और माँ लाकर दिया। माँ हम लोग समझ गए दादाजी वहां क्यों नहीं आते सच में यहां हमें बहुत अच्छा लग रहा है। दादाजी लेकिन आपके लिए हम लोग एक एसी लगवा देते हैं।

नहीं बच्चों तुम लोग यह सब अपने शहर के घर में ही करना चाहे जो करना। इसे ऐसा ही रहने दो। तुम लोग मायाजाल जैसा छोटे से डिब्बे के समान फ्लेट में रहते हो। मैं टोकरी में फल रखवा देता हूं।

इतने में बाबूजी के लिए चाची जी रात का खाना लेकर आती है। सभी लोगों को देख कर कहती हैं – अरे तुम लोग भी आई हो चलो घर चलकर खाना खाओ।

नहीं रहने दो यह लोगों का जो मन करेगा ये लोग बना कर खा लेंगे मेरे लिए तो तुम लोग ही सहारा हो। नए जमाने के बच्चे हैं।

जैसे मैं वहां नहीं रहता शायद वैसे ही तुम लोग यहां नहीं रहते जैसे मैंने बदलाव को समझ लिया है तुम लोग भी मुझे थोड़ा समझो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

हर दिन की तरह आज शाम को भी कॉम्प्लेक्स के सीनियर सिटीजन दोनों बेंचों पर जाकर बैठ आए गए जिन्हें नगर पार्षद ने मुहैया कराई थी।

हर दिन किसी न किसी मतलब-बेमतलब के टॉपिक पर बेमतलब की चर्चा छिड़ जाती। कुछ लोग सत्तापक्ष की विचारधारा से प्रेरित होकर बहस करते तो कुछ लोग विपक्ष की। सेवकराम जी जैसे कुछ सीनियर सिटिज़न तटस्थ या निष्पक्ष भाव से कभी कभार अपने विचार रखने का प्रयास करते।

वैसे तो टी वी पर आए दिन हर शाम विभिन्न पार्टी के प्रवक्ताओं की नूरा कुश्ती होती ही रहती थी और अक्सर कोई न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ चलती रहती थी। ब्रेकिंग न्यूज़ का विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे किसी नेता/बिजनेसमेन के घर ऑफिस में छापा पड़ना, राष्ट्रीय महत्व के नेता का शपथ ग्रहण, आतंकवादी घटना, सैनिकों का शहीद होना और बहुत कुछ।

आज के ब्रेकिंग न्यूज़ की बहस को नया मोड़ देते हुए हरीलाल जी बोले – “आप लोग बेमतलब परेशान हो रहे हो। कल को नई ब्रेकिंग न्यूज़ आएगी और आप लोगों के मन में जो संवेदनाएं हैं उस नई ब्रेकिंग न्यूज़ से जुड़ जाएंगी। फिर आज की ब्रेकिंग न्यूज़ पुरानी ब्रेकिंग न्यूज़ के ढेर में दब जाएंगी।”

कृष्णकांत जी बोले – “आप सही कह रहे हैं। संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति होने लगती है। अब इंसानियत तो जैसे रही ही नहीं। ऐसी न जाने कितनी ब्रेकिंग न्यूज़ गुजर चुकी हैं जिनपर हम लोगों ने घंटों बहस की और आज हम उनका अंजाम तक नहीं जानते।”

रिटायर्ड प्रो. रामलाल मुस्कराते हुए बोले – “कुछ मुद्दों पर तो हम लोगों में से कुछ लोगों में मतभेद भी हुए और संबंध भी बिगड़ गए। सेवकराम जी, आप क्या कहते हैं?”

सेवकराम जी जरा कम ही बोलते हैं किन्तु जो भी बोलते हैं लोग बड़े ध्यान से सुनते हैं। सब लोगों का ध्यान सेवकराम जी की ओर चला गया।

सेवकराम जी थोड़ा मुस्कराए और बोले – “शायद आज तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हम लोगों ने अपने जीवन में जितनी भी ब्रेकिंग न्यूज़ देखी हैं उन घटनाओं का अंजाम क्या हुआ? बस नई ब्रेकिंग न्यूज़ देखी सुनी और पिछली ब्रेकिंग न्यूज़ को किताब के पन्नों की तरह पलट दिया। फिर उन्हें दुबारा पलट कर उनका अंजाम न तो दिखाया गया न ही देखने मिला। यह तो शोध का विषय होना चाहिए। शायद साहिर लुधियानवी ने सच ही कहा है कि –

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।

सेवकराम जी उठे हाथ जोड़ कर विदा ली और घर की ओर चल दिये।

समय के साथ वर्तमान ब्रेकिंग न्यूज़ की संवेदनशीलता रोज़मर्रा की जिंदगी में शनैः शनैः संवेदनहीनता में परिवर्तित होने लगी। टी वी चैनलों को अगली ब्रेकिंग न्यूज़ तक टी आर पी बढ़ाने का मुद्दा मिल गया था। राजनीति अपनी जगह चलती रही। कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान अत्यावश्यक मुद्दों से भटक गया या भटका दिया गया।    

प्रो. रामलाल जी के मस्तिष्क में कुछ हलचल हुई। उनके विचारों को तो जैसे संजीवनी मिल गई। वे अपने परम शिष्य अनुराग के पी एच डी के लिए विषय ढूंढ रहे थे। भला ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ से बेहतर विषय क्या हो सकता है?

 

©  हेमन्त बावनकर  

16 जून 2025, 11.30 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 – सिंदूर की महिमा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा सिंदूर की महिमा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 ☆

🌻लघु कथा🌻सिंदूर की महिमा 🌻

कालेज का अंतिम वर्ष हॉस्टल में रेखा बहुत परेशान रहती थी।

रोज-रोज की चिंता, मनचले युवाओं की छींटाकसी से वह परेशान हो चुकी थी। इस बार घर जाऊगीं, तो लौटकर नहीं आऊंगी।

लेकिन रेखा जब आज लौटकर हॉस्टल आई तो सिंदूर भरी हुई मांग को देखकर, बाकी सब छात्राएं बोलने लगी – – – – क्या बात है बहुत छुपी हुई रुस्तम निकली, शादी कर ली बताया तक नहीं।

रेखा बहुत सुंदर शरमाते हुए मुस्कुरा कर बोली— गाँव में तो ऐसा ही होता है। माँ-बाप पसंद से शादी ब्याह करा देते हैं।

हॉस्टल से सभी बातें करते-करते कॉलेज चली जा रही थी। आज रेखा सबसे आगे बड़ी निडर होकर चल रही थी। न जाने कहाँ से उसके मन में यह भावना आ गई थी।

सभी छात्राएं कहने लगी– सच में शादी के बाद तो रेखा बहुत होशियार और निडर हो गई। अब तो हमें भी घर में मम्मी-पापा जो कहेंगे तैयार हो जाएंगे।

पलड़ा भारी होते देख, रेखा ने भगवान को दोनों हाथ उठाकर धन्यवाद दिया। जो लड़कियाँ सीधी बात नहीं समझ रही थी। दुनिया की चका-चौध में खिंची चली जा रही थी। उनको रास्ता दिखाने के लिए रेखा को यह सब नाटक करना पड़ा।

लड़कों के लिए यह चुनौती था। बेधड़क रेखा अब सभी को लेकर अपनी बात कह सकने में सक्षम हो चुकी थी। और आने-जाने में निडर हो चुकी थी।

गाँव से चुनिया काकी ने यह समझाया था – – – बिन माँ – बाप की बेटी हो होशियार बने रहना। सिंदूर को ही ईश्वर मानना और यह शस्त्र धारण कर लो।

बाकी समय आने पर सब ठीक होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – लघुकथा – नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा नियति ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ लघुकथा – नियति  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

” सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

” हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, ” दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथ पैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में… । “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला,” चल बेटा!  तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, ” क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

” वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

31-05-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 22 ☆ लघुकथा – पाखंड के आयाम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “पाखंड के आयाम“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 22 ☆

✍ लघुकथा – पाखंड के आयाम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मैं समुद्र के पास रहता था इसलिए रोज समुद्र के किनारे घूमने जाता। सुबह छ: बजे से सात बजे तक। काफी लोग सैर करते हुए दिखाई देते। कुछ परिचित और की अपरिचितों से परिचय हो जाया करता। गप शप और सैर एक साथ। इधर उधर की जानकारी भी मिल जाती। सुबह किनारे सुबह की हवा बहुत आनंद देती है, प्राणवायु जो ठहरी।

रेती के किनारे बड़े बड़े काले पत्थर हैं वहां और उन पर बैठ कर सुस्ताने वाले भी दिखते। कुछ जोड़े में भी रहते। हंसते खिलखिलाते। बड़ा अच्छा लगता।

एक दिन एक काले पत्थर पर नजर टिक गई। लगा कि मेरे अच्छे परिचित हैं परंतु वे ऊपर से नीचे एकदम काले कपड़े धारण किए हुए थे और चेहरा नीचे किए हुए। मुझे संकोच हो रहा था कि नजदीक जाऊं या नहीं क्योंकि ऐसी वेषभूषा में कभी देखा नहीं था। कद काठी से वही परिचित से लग रहे थे। फिर भी संकोच वश मैं उनके नजदीक नहीं गया।

लेकिन सैर करते करते कब उनके नजदीक पहुंच गया इसका आभास ही नहीं हुआ। अपने पास किसी की उपस्थिति महसूस करके उन्होंने अपना चेहरा ऊपर उठाया और मैंने देखा वही थे पर उन्हें देखते ही आश्चर्यमिश्रित “आप” मेरे मुंह से निकला। मैंने उन्हें काले कपड़ों में देखने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। हमेशा सामान्य वस्त्रों में ही देखा था। काले कपड़े और वे भी नीचे काली लुंगी और काला लंबा कुर्ता। मेरी आवाज़ सुनकर उनके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आई। कुछ बोले नहीं। मैं भी आगे कुछ नहीं बोला क्योंकि मुझे लगा कि किसी उद्देश्य से अघोर साधना तो नहीं कर रहे। उनके नेत्रों में लालामी और सपाटपन कुछ ऐसा ही संकेत दे रहे थे।

शहर के विद्वानों में उनकी गिनती होती थी। मुझे लगा कि अच्छी प्रतिभाएं भी पाखंड की शिकार हो जाते हैं, ?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 73 – तजुर्बा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – तजुर्बा।)

☆ लघुकथा # 73 – तजुर्बा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

कमल जी सुबह-सुबह मन्दिर से वापस आईं। देखा उनकी पोती रागिनी कालेज जाने के लिए तैयार खड़ी है। किसी से फोन पर बात कर रही है। दादी को देखकर वह बहुत गुस्सा हो गई  – आप मेरी बातें क्यों सुन रही हो क्या यह अच्छी बात है? मां इन्हें गांव क्यों नहीं भेज देती हो? एक तो इन्हें मेरे कमरे में रख दिया है, दिन भर पूजा पाठ करके मुझे डिस्टर्ब करती रहती हैं।  हमेशा मेरे कपड़े के पहने होने पर रोक लगाती रहती हैं।

– अच्छा यह तो बता तू मोबाइल में सारा दिन करती क्या रहती है?

– बस बेटी मैं सीखना चाहती हूं क्योंकि इसमें खाना बनाने की भी अच्छे-अच्छे विधियां बताते हैं। मैं सोचती हूं तुझे बनाकर खिलाऊँ और दोपहर में टाइम पास भी अच्छा हो जाता है। ठीक है तुझे गुस्सा लगता है तो अब नहीं पूछूंगी चुप रहूंगी।

– लेकिन एक बात सुन ले मैं भी कॉलेज की पढ़ाई की है और मैंने भी जमाना देखा है। तेरी मां ने तो आंख में पट्टी बांध ली है बेचारा मेरा बेटा तो दिन भर काम करता है।

– क्या मैं ऑंख में पट्टी बांध लूं? मन ही मन बुदबुदाई।

– हे राम जमाने को क्या हो गया है।  क्यों बहू रागिनी क्या तुम पेपर नहीं पढ़ती न्यूज़ नहीं सुनती आजकल जमाना कितना खराब है। खैर जमाना तो हमारे जमाने से भी ऐसा था।

– माँ आजकल यही फैशन है सब बच्चे इसी तरह पहनते हैं, देखकर उसका भी मन करता है यदि सलवार कमीज पहने की तो सब उसे गवार समझेंगे। जाने दो मैं आपके लिए नाश्ता बनाती हूं क्या बना दूं?

– तू चाय नाश्ता और घर गृहस्थी छोड़ थोड़ी बाहर की भी दुनिया देख। स्कूल कॉलेज में पढ़ना कोई बुराई नहीं है शिक्षा तो हर किसी को मिलनी चाहिए क्या हम तो पढ़े नहीं थे लेकिन क्या आजादी इतना देना उचित है वह तो बच्ची है उसे कुछ समझ नहीं है लेकिन तू तो समझ है?

– खाना तो मैं बना दूंगी। जा तू थोड़ा देख बिटिया रानी क्या करती है? पीछे देख चुपके से वह स्कूल कॉलेज में क्या कर रहे हैं, कहीं बुरी संगत में तो नहीं फंस गई है। तेरा यह फर्ज है। देख मेरी बातें तुझे बुरी जरूर लग रही है, पर तू मेरा कहा मान जा। आज तू अपनी जिंदगी जी ले खूब घूम ले फिर न मेरी तरफ से बाबूजी की पेंशन तो मुझे मिलती है। 1000 रुपया लो और कुछ अपने लिए खरीद लेना।

अब सासू मां ने कहा था तो रागिनी ने सोचा चलो इसी बहाने घूम फिर लूंगी और वह जब अपनी बेटी के कॉलेज पहुंची तो उसने दूर से देखा कि उसकी बेटी कुछ लड़कों के साथ सिगरेट पी रही है, और लड़कों की नजर और नीयत ठीक नहीं लग रही थी वह कुछ देर रुक कर यही देखने लग गई फिर कुछ और लौट के आगे देखा कि वह लोग क्लास में नहीं गए तभी उसने देखा कि वह लोग रागिनी के साथ कुछ अजीब सी हरकतें करने लग गए और वह चिल्लाने लग गई तो कुछ लड़कों ने मिलकर उसे पकड़ लिया।

तभी उसकी मां दौड़ी दौड़ी उसके पास आ गई। और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी इसी समय पूरे कॉलेज का स्टाफ इकट्ठा हो गया और उन लड़कों की बहुत पिटाई हुई वह माफी मांगने लग गए कि आंटी हमें पुलिस में मत दीजिए हमसे गलती हो गई और ऐसा नहीं करेंगे उसने भी समझदारी से कम लेकर उन्हें छोड़ दिया और अपनी बेटी को लेकर घर आ गई।

तभी कमल जी ने दरवाजा खोला और बोला क्या हुआ बहू तूने क्या खरीदा ?

– अपने लिए कुछ नहीं मांजी आपको मैं गलत सोचती थी पर बात सही है घर में बड़े बुजुर्गों का होना चाहिए उनकी सलाह और तजुर्बा से घर गृहस्थी चलना चाहिए। जब आपको रवि घर में लेकर आए थे तब मैं बोझ मानती थी और मुझे यह लगता था कि आप क्यों आ गई लेकिन अब आप कभी मत जाइएगा आप यही रहिएगा।

आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि माँ के रूप में मुझे एक सहेली मिल गई। बड़ों बुजुर्गों का का घर में होना कितना जरूरी होता है, आज मुझे अनुभव हुआ।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 353 ☆ लघुकथा – “प्रतीक्षा की प्रतीक्षा” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 353 ☆

?  लघुकथा – प्रतीक्षा की प्रतीक्षा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आंखों पर साया करते झुर्रियों भरे हाथ किसी छाया की चाह नहीं थे, बल्कि किसी अपने की राह तकते समय की आदत बन चुके थे। यह चेहरा, समय के उस पृष्ठ की तरह था, जिसका उत्तर खोजना खुद एक अनुत्तरित प्रश्न बन गया था।

अम्मा  एक वृद्धा नहीं,  वो मां हैं, जिसने जीवन दिया, परंतु बदले में जीवन भर प्रतीक्षा ही पाई।

बेटी प्रतीक्षा को विदेश भेजा था ‘कुछ बन जाने’ के लिए। पर अब वर्षों से उनका क्रम बन गया है  नज़रें टिकाए प्रतीक्षा की प्रतीक्षा का। कोई पत्र नहीं, कोई संदेश नहीं, बस एक उम्मीद, बाकी रह गई है। जो  हर सुबह उन की आंखों में उगती है और हर संध्या  जिंदगी सी बुझने  लगती है। बेटी नहीं लौटी तो नहीं ही लौटी।

प्रतीक्षा की प्रतीक्षा एक पूरी पीढ़ी की उम्मीदें हैं, जो गाँवों से निकलकर शहरों की चकाचौंध में गुम हो रही है। अम्मा के हाथ की रेखाएँ, चेहरे की झुर्रियां केवल उम्र की नहीं, बुजुर्ग होती पीढ़ी के उस त्याग की कथा कहती हैं जो रोटियाँ बेलने, खेतों में काम करने और अकेलेपन से जूझते हुए गुजरे वर्षों की गाथा कहना तो चाहती है पर उसे सुनने वाला कोई पास नहीं।

उम्मीद है और प्रतीक्षा बस।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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