हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – दुविधा ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ दुविधा प्रो. नव संगीत सिंह

श्रुति और आकाश अलग-अलग कॉलेजों में प्रोफेसर थे। घर पहुंचने पर दोनों ने अपने-अपने हिसाब से सारे कामों को बांटा हुआ था। अक्सर आकाश को सब्जियां लाने और बाजार के कामों की जिम्मेदारी मिली हुई थी, जबकि श्रुति खाना बनाने और चाय-नाश्ता का ध्यान रखती थी। उन्होंने बर्तन साफ करने और कपड़े धोने के लिए एक नौकरानी रखी थी। आकाश जब भी घर से सब्जी खरीदने निकलता तो अक्सर दुकान पर जाकर अपनी पत्नी को फोन पर पूछता, “क्या लाऊं?” आटा गूंथती हुई पत्नी खीझकर बोलती, “मैं क्या जानूं?  दुकान पर तो तुम खड़े हो। जो पसंद हो, जो अच्छा हो, ले आओ।” बेचारा आकाश, असहाय होकर, जो भी सब्जियाँ मिल जातीं, ले आता और जब वह घर पहुँचता, तो अपनी पत्नी के ताना सुनता, “ओह, क्या ले आए हो तुम! कितनी बासी सब्जियाँ हैं ये सब! मिर्चें और धनिया नहीं लाए क्या?” आकाश चुपचाप सब कुछ विवश होकर सुनता रहता। श्रुति की बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

एक दिन पति-पत्नी दोनों शहर से बाहर कहीं गये हुए थे। घर लौटने से पहले वे सब्जी वगैरह खरीदने बाज़ार चले गए। आकाश कार में ही बैठा रहा, क्योंकि उसे कार पार्क करने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल रहा था, और उसे यह भी डर था कि अगर वे दोनों कार से बाहर निकल गए, तो नगर निगम वाले कहीं कार को उठाकर ले ना जाएं, क्योंकि कार सही जगह पर पार्क नहीं की गई थी। यह घटना उसके साथ पहले भी घटित हो चुकी थी। खैर…सब्जी वाले के पास जाकर श्रुति ने अपने पति को फोन किया और पूछा, “क्या लाऊं, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता।” अब आकाश के पास उसके तानों का साफ जवाब था, “मुझे क्या पता, सब्जी वाले के पास तो तुम खड़ी हो! जो अच्छा लगे, ले आओ…”

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© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #216 – लघुकथा – कुंठा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा  “कुंठाकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 216 ☆

☆ लघुकथा- कुंठा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

रात की एक बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम का सफल का सञ्चालन करा कर वापस लौट कर घर आए पति ने दरवाज़ा खटखटाना चाहा. तभी पत्नी की चेतावनी याद आ गई. ‘ आप भरी ठण्ड में कार्यक्रम का सञ्चालन करने जा रहे है. मगर १० बजे तक घर आ जाना. अन्यथा दरवाज़ा नहीं खोलुंगी तब ठण्ड में बाहर ठुठुरते रहना.’

‘ भाग्यवान नाराज़ क्यों होती हो.’ पति ने कुछ कहना चाहा.

‘ २६ जनवरी के दिन भी सुबह के गए शाम ४ बजे आए थे. हर जगह आप का ही ठेका है. और दूसरा कोई सञ्चालन नहीं कर सकता है ?’

‘ तुम्हे तो खुश होना चाहिए,’ पति की बात पूरी नहीं हुई थी कि पत्नी बोली, ‘ सभी कामचोरों का ठेका आप ने ही ले रखा है.’

पति भी तुनक पडा, “ तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा पति …”

‘ खाक खुश होना चाहिए. आप को पता नहीं है. मुझे बचपन में अवसर नहीं मिला, अन्यथा मैं आज सब से प्रसिद्ध गायिका होती.”

यह पंक्ति याद आते ही पति ने अपने हाथ वापस खीच लिए. दरवाज़ा खटखटाऊं या नहीं. कहीं प्रसिध्द गायिका फिर गाना सुनाने न लग जाए. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

०२/०२/२०१७

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 75 – आपदा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)

☆ लघुकथा # 75 – आपदा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

 “मैडम जी मैडम जी … मेरी बेटी गौरी को बचा लो।” बदहवास सी मीरा के पैरों पर गिर कर रो पड़ी।

“मीरा ने अभी दो दिन पहले तो इसका विवाह हुआ था अब क्या हुआ? गई। शादी के लिए छुट्टी लेकर गयी थी और हमें भी तो विवाह में बुलाया था।“

“नहीं नहीं… मैडम जी, दूल्हा के तो पहले से एक बेटा बेटी-है, अभी मालूम चला है।”

“ऐ.. क्या बक रही है, क्या तूने पहले बिना पता किए ही शादी कर ली थी? तुझे मालूम नहीं था?” मीरा ने पूछा।

 “अरे मैडम जी मेरे आदमी ने शादी तय कर दी। बोला लड़का अच्छा है कमाता है। दहेज भी नहीं लेगा। मैं क्या करती मैडम जी जब बेटी घर गई, तब पता चला वह तुरंत वहां से भाग कर आ गई। अब मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है कि मैं क्या करूँ?”

“साहब तो अभी कोर्ट गए हैं तो वहीं चली जा नहीं तो शाम को उनसे बात करना?”

“क्या हम सब वहां नहीं चल सकते? अभी बात नहीं हो सकती? कहीं मेरा आदमी यहां आ गया तो हल्ला करेगा और बेटी को उसके घर ससुराल छोड़ आएगा।”

“चल अच्छा, मैं तैयार होकर आ रही हूं तब तक तू सड़क पर ऑटो को रोक।”

दोनों ऑटो रिक्शा में बैठकर रवि के ऑफिस जाते हैं।

वहां पर असिस्टेंट से उसने पूछा “साहब, चेंबर में फ्री है क्या?”

“जी भाभी आप जाइए।”

“अरे क्या हुआ तुम अचानक यहां पर?”

“एक समस्या है, तुमसे सलाह लेने के लिए आई हूं जो अपनी यहां काम करती थी जिसकी   लड़की की शादी में हम गए थे ना।”

“हां तुमने उसे ₹5000 भी दी थी, याद है मुझे अच्छे से आगे बोलो जल्दी।“

“जहां पर उसकी बेटी की शादी हुई है उसके आदमी के पहले से दो बच्चे हैं बड़े-बड़े कॉलेज में पढ़ते हैं इसलिए उसकी बेटी घर छोड़कर आ गई है अब कुछ सलाह दो।“

“मीरा तुम कहां इनके चक्कर में पड़ी हो उसका पति शराबी है उसे सब मालूम होगा कर्ज उधार लिया होगा और जाने क्या किया होगा। बिना दोनों पक्षों की बात सुनने में कैसे कोई निर्णय ले सकता हूं। उसे पैसे की जरूरत हो तो दे दो तुम इस सब से दूर रहो।“

“कैसी बात कर रहे हो क्या इंसानियत के नाते कोई हमारा फर्ज नहीं है?”

“नहीं हमारा कोई फर्ज नहीं है जितना कह रहा हूं उतनी बात तुम मानो। इस तरह के केस में रोज देखता हूं शराब पी लेते हैं या कर्ज ले लेते हैं या अपने आइशों ऐशो आराम से खाते रखना लड़कियों को यह लोग भेज भी देते हैं। अच्छा तुम उसे बुलाओ। और तुम अपने घर जाओ। कमला अपनी बेटी के लिए स्वयं लड़ेगी।“

फिर राजेश ने कमला को बुला कर कहा –

“अपने आदमी को साथ लेकर आना और तुम्हारी बेटी को यह लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी। उसका ही निर्णय मान्य होगा कि उसे क्या करना है? जीवन में हर किसी को लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है। जीवन में आपदाएँ आती रहती है उनका सामना करना पड़ता है।“

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – शपथ ग्रहण परेड ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ शपथ ग्रहण परेड ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सीनियर सिटिज़न की बैठक में आज फिर व्हाट्स एप्प ग्रुप पर आए किसी संवेदनशील मुद्दे से संबन्धित पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों के बीच में सामान्य चर्चा बहस में परिवर्तित होने लगी। कुलकर्णी जी और आत्माराम जी अपने अपने तर्क देते हुए एक दूसरे को गलत साबित करने का प्रयास कर रहे थे।

समय के साथ बहस तीखी होने लगी। अपने स्वभाव के अनुसार हरिलाल जी बीच बचाव करने का प्रयास करने लगे। हरिलाल और सेवकराम जी स्वयं को शांत रखते हुए ऐसी बेवजह की बहसों से दूर ही रहने का प्रयास करते थे।  

आज स्थिति बिगड़ने के आसार लग रहे थे। ऐसे में सेवकराम जी को लगा कि उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा की तरह हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उठे।

इस बार हरिलाल जी को उनका इस तरह जाना अच्छा नहीं लगा। उनसे रहा न गया।

“अरे सेवकराम जी, थोड़ा रुक जाइए। आप ऐसे नहीं जा सकते।“

“हरिलाल भाई, क्या करूँ मैं रुक कर? मेरी बात तो किसी को अच्छी लगेगी नहीं।“

उनके इस बदले हुए व्यवहार को देख कर थोड़ी देर के लिए सभी शांत हो गए।

हरिलाल जी, कुलकर्णी जी और आत्माराम जी की ओर देखते हुए बोले – “अरे नहीं सेवकराम जी, आप तो बोलिए। हम सुन रहे हैं।“

सेवकराम जी वापस बेंच पर बैठते हुए बोले – “क्या आप लोगों ने कभी शपथ ग्रहण परेड के बारे में सुना है?

लगभग सभी के मुंह से एक साथ निकला – “नहीं”

अब सभी की दृष्टि सेवकराम जी की ओर थी। सेवकराम जी ने इत्मीनान से कहना शुरू किया।

“हम सभी ने राजनेताओं को मंत्री पद और विधानसभा/संसद सदस्यों को शपथ लेते हुए देखा है। किन्तु, शायद ही किसी को सैनिकों या सेना के अफसरों के पास-आउट परेड और शपथ/कसम परेड को देखने या जानने का अवसर मिला होगा। हम लोग सोशल मीडिया के संदेशों को सच मान कर आपस में वैमनस्य पैदा कर लेते हैं। लेकिन सेना और अनुशासित सैन्य जीवन से प्रेरणा क्यों नहीं लेते?”   

कुलकर्णी जी बोले – “हम समझे नहीं।“

सेवकराम जी ने सविस्तार बताने का प्रयास किया।

“भारतीय सेना में सभी धर्मों के धार्मिक शिक्षक या रिलिजियस टीचर (पंडितजी, ज्ञानी जी, पादरी, मौलवी, बौद्ध गुरु आदि) होते हैं जो कि जूनियर कमीशण्ड ऑफिसर (JCO) रेंक के होते हैं। प्रत्येक सैनिक किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। सैनिक प्रारम्भिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने पर ‘पासिंग आउट परेड’ के दौरान शपथ ग्रहण करते हैं। सभी धार्मिक शिक्षक उन्हें अपने-अपने धार्मिक ग्रंथ की शपथ दिलाते हुए संविधान और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की शपथ दिलाते हैं। उदाहरण हमारे सामने है कि किस तरह हमारे वीर सैनिक अपने-अपने धर्म का सम्मान करते हुए धर्म, जाति और संप्रदाय को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए हमारी और राष्ट्र की सुरक्षा करते हैं। और यहाँ हम जाने अनजाने लोगों और असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाये गए व्हाट्सएप्प संदेशों पर बिना अपने विवेक का उपयोग किए विश्वास कर लेते हैं। फिर बेवजह की बहस कर समय बर्बाद करते हैं और आपसी संबंध खराब करते हैं। आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। सर्वधर्म समभाव की विचारधारा के साथ इतना समय यदि हम अपने घर परिवार, समाज और अपने आसपास कॉम्प्लेक्स/सोसायटी के परिवार की बेहतरी के लिए दें तो कैसा रहेगा? प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने के लिए स्वतंत्र है। आगे आप की इच्छा। सभी समझदार हैं। काश हमें भी नागरिकता की शपथ दिलाई गई होती।”

इतना कह कर वे हाथ जोड़कर उठे और घर की ओर चल दिये।

और सब अवाक एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

©  हेमन्त बावनकर  

21 जून 2025, 11.50 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 – द्रौपदी का चीर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “द्रौपदी का चीर”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 ☆

🌻लघुकथा 🔥द्रौपदी का चीर🔥

लगातार बारिश से चारों तरफ पानी ही पानी, देखते-देखते शहर, गाँव, नदी – नाले सभी पानी से जलाजल भर गए।

झुग्गी झोपड़ियों में भी जीवन बढ़ता, पलता, संवरता और प्रफुल्लित होता है। सूखे मौसम में सब कुछ अच्छा लगता है। तेज हवा का झोंका तपती सूर्य की किरणें, सब सहन हो जाता है, परंतु बारिश में जहाँ पानी ही पानी। वहाँ पर एक घास फूस पन्नी टूटे-फूटे सामानों से ढकी, झोपड़ी जहाँ पर वह अपने पति के साथ, पति क्या कहना दो अनाथ को एक साथ  मजदूरी करते-करते दो जून की रोटी ने हमसफर बना दिया।

जहाँ तन, मन, धन से वह एक जान हो गए थे। पति दो दिन से तेज ज्वर से पीड़ित था। गरीबी की मार और बारिश का खेल। सभी कुछ गीला, आटा चाँवल की तो बात ही न करें, चूल्हे में गीली लकड़ियाँ जलाकर वह आसपास के वातावरण को गरम करना चाहती थी।

परंतु सिसकती साँसे और सुलगती लकड़ियाँ, दोनों अपनी-अपनी कहानी कह रही थी।

पास में जड़ी बूटी बेचने वाला भी झोपड़ी बनाकर रहता था। परंतु उसकी झोपड़ी सूखी क्योंकि चारों तरफ से मोटी पल्ली, मिट्टी की दीवार से ढका हुआ था।

अपनी झोपड़ी पर रहता तो था, परंतु आँखें चौबीसों घंटे उस झोपड़ी पर रहती जिसमें रूपा अपने पति के साथ रहती थी।

दियासलाई की रोशनी दरवाजे पर दिखाई दी। रूपा काँपते हुए बोली– मेरे पति को दवाई देकर बचा लीजिए। आज वह मन ही मन खुश हो रहा था मौका और जरुरत दोनों है।

कुछ जड़ी – बूटी लेकर वह वहाँ पहुंच गया, नब्ज देख कर बोला – – – इसे तो ताप देना पड़ेगा। आग सुलगनी चाहिए।

कुछ जलाने का सामान ले आओ। रूपा ने चूल्हे की गीली लकड़ियाँ लगाई थी, उसको जलाने के लिए अपने शरीर पर उतना ही साड़ी का पल्ला बचाया जितनी जरूरी थी।

शेष साड़ी फाड़ कर चूल्हे में जला दी। लकड़ियाँ सुलग उठी।

ताप से पति को ज्वर और ठंड से आराम मिला।

परंतु रूपा आज चीर फाड़ते समझ चुकी थी कि– इस बारिश में झोपड़ी की आवाज,  सुलगती चीर, शायद कलयुग है, कान्हा जी को सुनाई नहीं दिया होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – अपशब्द ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ अपशब्द प्रो. नव संगीत सिंह

यूं ही बातें करते-करते वह ऊंची आवाज में बोलने लगा – “अरे भाई, क्या हाल है, रिटायरमेंट के बाद… आजकल क्या कर रहे हो… तुम्हारे तो सारे दांत टूट गए हैं, देखो – मेरे सारे दांत पूरे हैं… बाल डाई करते हो क्या? देखो, मेरे सारे बाल सफेद हो गए हैं… बहुत पतले हो गए हैं, मैं तुमसे दस साल बड़ा हूं… फिर भी स्वस्थ दिखता हूं…” और मैं ‘हां-हां’ कहता रहा और उसे टालता रहा। लेकिन वह सोच रहा था कि मैं प्रतिक्रिया क्यों नहीं करता? कई अन्य अजीबोगरीब बातें करने के बाद उसने कहा, “क्या आप कभी अमेरिका गए हैं? वहां बहुत सारी सुविधाएं हैं। भारत में क्या है? समय की बर्बादी…। कभी आइए वहां मेरे पास…विदेशी शराब, अंग्रेजी कल्चर, झीलें, समुद्र, दृश्य, और भी बहुत कुछ है…”

उसने मुझे उत्तेजित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वो बेचारा हाथ मलता ही रह गया, इस उम्मीद में कि शिकार आएगा, लेकिन मैं उसके जाल में नहीं फंसा। आज मुझे अपने पिता के शब्द सच लगे – ‘एक चुप सौ सुख।’ अगर मैं भी उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगता तो बात ‘तू-तू मैं-मैं’ से होती हुई बहुत आगे बढ़ जाती। फिर बाबा फ़रीद जी की ये पंक्तियां दोहराने से क्या फायदा – “फ़रीदा, बुरे दा भला कर, गुस्सा मन न हडाए। देही रोग न लगई, पलै सब किछ पाए।” आज मैंने बाबा फ़रीद के श्लोकों को असली रूप से जाना। इससे पहले मैं इन्हें केवल पढ़कर ही बात खत्म कर देता था। मुझे उनकी शिक्षाओं और श्लोकों का पालन करने पर गर्व महसूस हुआ।

© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घंटाघर चौक। काफी समय से खड़ा हूँ। लोकल बस वही आ रही। दो चार आईं भी तो बुरी तरह ठसाठस भरी हुईं। मैं कस्बे का आदमी ठहरा। धक्कमपेल से घबरा गया। इसी डर से रुका रहा।

– आप तांगे में चले जाये़ं !

एक भला आदमी सलाह देता है।

मिलना जरूर होगा। उससे मिले साल डेढ़ साल हो गया ! समय कम है मेरे पास ! फिर भी जाऊंगा। क्या सोचेगी? व्यस्तताओं के सरकंडे बिना वजह फैलते जा रहे हैं।

पांच कदम स्टेशन की ओर जाता हूँ। तांगा बिल्कुल खाली है। आगे की सीट पर एक काला, गोल मटोल, चौदह पंद्रह साल का लड़का बैठा है।

– नये बस अड्डे चलेगा?

– हां, साब !

– कितने पैसे?

– तीस।

– चल फिर।

– पीछे की सीट पर बैठ जाता हूँ।

– नये बस अडडे, नये बस अड्डे का शोर चौड़ा बाज़ार के आसपास गूंजने लगता है। दो बाबू और आते हैं। एक वृद्ध भी आ जाता है ! इस तरह आधा दर्जन सवारियां हो जाती हैं।

– चल मेरे शेर‌!

– लगाम खींच देता है और घोड़ा हिनहिनाकर चल पड़ता है।

– एक सवारी बस अड्डे!

– वह लड़का फिर आवाज़ लगाता है तब बाबू कहता है कि, सवारियां तो पूरी हैं। क्यों भर रहा है मुर्गियों की तरह !

– एक कप चाय बनाऊंगा साब !

– वह दयनीय स्वर में कहता है !

दो सवारियां और मिल जाती हैं। टप् टप् शुरू होती है और साथ ही घोड़े को हल्ला शेरी !

चौराहे पर पहुंचते ही विफल बजती है।

लाइसेंस निकाल !

– है नहीं, साब !

– है क्यों नहीं? ऊपर से बारह सवारियां  !

आज जाने दो, साब !

गवर्नर का पुत्तर है क्या? ला, पैसे निकाल, तेरा चालान करूं।

– माफ कर दो, साब !

सवारियों में खलबली मच गयी है‌। बस पकड़नी है। यहां जाना है, वहां जाना है।

सभी मिलकर कहते हैं कि इसे माफ कर दो  !

– अच्छा, जा बेटा !

आंखें निकाल कर सिपाही चौक पर अपनी ड्यूटी देने लगता है।

सवारियां सलाह देती हैं – फिर न बिठाना इतनी सवारियां ! लाइसेंस पास रखो ! अभी बच्चे हो।

– साब, खायेंगे कहाँ से? महीना बांध रखा है ! घंटाघर चौक पर पान वाले की दुकान पर पहुंचाते हैं। इस बार घर में फाकाकशी चल रही है। इसे कहां से दें? हफ्ते बाद तांगा निकाला है। और वह आज के दिन ही मांग रहा है पैसे !

इतने में एक टैक्सी सिपाही के पास रुकती है। कुछ नोट हाथ में थमाये जाते हैं और फिर फुर्र हो जाती है !

मुझे लगने लगता है कि सरकार के सारे कानून इस तांगे वाले लड़के पर ही लागू होते हैं !

टप् ! टप्! तांगा चल रहा है !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – गलत गणित… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा गलत गणित

? लघुकथा – गलत गणित ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

सेठ रौनक मल के इकलौते बेटे की शादी का निमंत्रण पत्र मिला तो महेश ने अपने दोनों बच्चों से कहा –” देखो बेटा वहां ढेर से व्यंजन होंगे। आइसक्रीम , कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाई सभी को जी भर कर खा लेना। आखिर ₹501 देने हैं पूरी तरह वसूल हो जाने चाहिए। पास खड़ी पत्नी भी मुस्कुरा दी।

पार्टी खत्म होने के बाद घर लौटते ही दोनों बच्चे बड़े उत्साह से चहकने लगे –” पापा मैंने तीन आइसक्रीम खाई ….. , मैंने दो कोलड्रिंक पी….”

“ शाबास , आज तो तुमने पूरे पैसे वसूल कर लिए….” महेश ने उनकी पीठ थपथपाई।

घंटाघर बीता होगा कि बड़ा बेटा मां के पास आया –” मम्मी पेट में दर्द हो रहा है ….”उसके साथ ही उसे उल्टियां होने लगी। पति पत्नी घबरा गए फौरन अस्पताल ले गए।

“ शायद उसे खाने में विषबाधा हो गई है दो-तीन दिन अस्पताल रखना पड़ेगा “डॉक्टर ने बताया। दवाइयों, इंजेक्शनों, ग्लूकोज से बेटे की हालत सुधरी। तीसरे दिन पांच हजार रुपए का बिल थमा कर जब घर लौटे तो शादी में दिए रुपयों के  हिसाब से मन मसोसते रह गए।

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – बाल कहानी  – “मगर और मछली” – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी  – मगर और मछली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ बाल कहानी – मगर और मछली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

होशियार पुर गांव के पास एक नदी थी. उस में एक मछली रहती थी. उस का नाम मीना था. वह बहुत होशियार व चंचल थी. उस नदी में एक मगर आ गया. वह मछलियों को मार कर खाने लगा.

यह देख कर मीना की मां ने कहा, ” मीना ! तुम मगर से होशियार रहना. वह बहुत दुष्ट है.”

” ठीक है मां, ” मीना ने कहा और वह नदी की लहरें से खेलने चली गई.

दुष्ट मगर वही बैठा था. उस मीना बहुत अच्छी लगी. उस ने सोचा,’ यह बहुत प्यारी मछली है. यदि इसे मार कर खा लिया जाए तो यह बहुत स्वादिष्ट लगेगी.’ यह सोच कर दुष्ट मगर उस के पीछे पड़ गया.

मीना सतर्क थी. जब उस ने मगर को अपने पीछे आता देखा तो भागी. वह घबरा गई थी. फिर उस ने सोचा कि घबराने से काम नहीं चलेगा. उसे हिम्मत से काम लेना होगा. यह सोच कर उस ने अपने दिमाग को शांत किया.

तब उसे याद आया कि वही पास में नदी में एक चट्टान के नीचे गुफा है. उसी की तरफ दौड़ लगाई जाए. वह तेजी से उस ओर भागी. मगर, उस के पीछे हो लिया.

अब आगेआगे मीना तैर रही थी, पीछेपीछे मगर. मगर, मीना छोटी थी. वह तेजी से तैर नहीं पा रही थी. मगर, उस के पास तेजी से आ गया.

तभी मीना पलटी. वह दो चट्टानों के पास से गुजरी.

गुफा पास ही थी. उसे शरारत सूझी. उस ने मगर को छेड़ा, ” क्यों मामा ! तैरना नहीं आता है. या मुझे मार कर खाने की इच्छा नहीं है.”

मगर, यह सुन कर चौंका. मछली की इतनी हिम्मत. वह मगर को चुनौती दे. इसलिए वह उस के पीछे तेजी से भागा. अब मीना बहुत पास थी. वह चिल्लाई, ” पकड़ो मामा !”

मगर, ने अपना मुंह बढ़ाया. मगर, यह क्या ? वह दो चट्टानों के बीच फंस गया था.

” डर गए मामाजी !” मीना ने मगर को चिढ़ाया, ” क्या सारी ताकत खत्म हो गई है ?”

मगर को गुस्सा आ गया. वह तेजी से हाथपैर से जोर लगा कर आगे बढ़ा. वह जितना आगे बढ़ता गया, उतना चट्टानों के बीच फंसता चला गया. जब वह निकल नहीं पाया तब उस के समझ में आया कि एक छोटीसी समझदार मछली ने उसे चट्टानों  के बीच फंसा दिया था.

वह उस चट्टानों के बीच फंसा हुआ भूख से मर गया.

इस तरह समझदार मीना ने दुष्ट मगर से छुटकारा पा लिया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

06/03/2017

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 74 – बदलाव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदलाव।)

☆ लघुकथा # 74 – बदलाव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गौरी इस साल गर्मी की छुट्टी में चलो हम लोग  बाबूजी के गाँव चलते हैं।

माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी चाचा चाची के साथ वहीं पर ही रहते हैं। कभी कल हमारे पास आते हैं उन्हें वही अच्छा लगता है।

इस बार बच्चे छुट्टियों में घर आए हैं। बच्चों से पूछते हैं। माँ शालिनी ने गंभीर स्वर में कहा।

बोलो विवेक और चारु क्या तुम छुट्टियों में घर चलोगे?

जब देखो तब पापा आप गाँव चलने को बोलते रहते हैं हम लोग नहीं जाएंगे वहां बहुत गर्मी है।

चलो दो-चार दिन रहकर आएंगे पिकनिक हो जाएगी। शुद्ध हवा और खाना पीना सब कुछ अच्छा रहेगा। गाँव जंगल और पहाड़ी के किनारे है, इसी तरह तुम लोगों को प्रकृति की गोद में रहने का मौका मिलेगा और जो तुम लोग बहुत ऑर्गेनिक करते हो वह भी तुम्हें सही मायने में पता चलेगा।

तो सामान पैक कर लो हम अभी निकलते हैं 3 घंटे में पहुंच जाएंगे।

ठीक है, सभी लोग तैयार होकर जाते हैं और गाँव पहुंचते हैं। गाँव पहुंचकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। बड़ा सा बगीचा और बगीचे में सारे फलदार पेड़ लगे थे। आम, जामुन, नींबू कटहल, बेलपत्र का उसमें बेल भी बहुत लगे हुए थे। बाबूजी ने एक बड़े से बर्तन में बेल का शरबत बनाकर रखा था। सभी को उन्होंने पीने के लिए दिया और शाम को वह अपने बगीचों को पानी डालने के लिए चले गए उनके साथ विवेक और चारु भी गए।

उन लोगों ने खूब सारे फल तोड़े और सब्जियां भी टोडी और माँ लाकर दिया। माँ हम लोग समझ गए दादाजी वहां क्यों नहीं आते सच में यहां हमें बहुत अच्छा लग रहा है। दादाजी लेकिन आपके लिए हम लोग एक एसी लगवा देते हैं।

नहीं बच्चों तुम लोग यह सब अपने शहर के घर में ही करना चाहे जो करना। इसे ऐसा ही रहने दो। तुम लोग मायाजाल जैसा छोटे से डिब्बे के समान फ्लेट में रहते हो। मैं टोकरी में फल रखवा देता हूं।

इतने में बाबूजी के लिए चाची जी रात का खाना लेकर आती है। सभी लोगों को देख कर कहती हैं – अरे तुम लोग भी आई हो चलो घर चलकर खाना खाओ।

नहीं रहने दो यह लोगों का जो मन करेगा ये लोग बना कर खा लेंगे मेरे लिए तो तुम लोग ही सहारा हो। नए जमाने के बच्चे हैं।

जैसे मैं वहां नहीं रहता शायद वैसे ही तुम लोग यहां नहीं रहते जैसे मैंने बदलाव को समझ लिया है तुम लोग भी मुझे थोड़ा समझो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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