हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – खुशियाॅं बाँटना।)

☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆ 

सफाई जोर शोर से चल रही रीना बहू आज चमत्कार कैसे?

हर कमरे से लेकर किचन तक सुंदर सजा हुआ दिख रहा है। बहु क्या आपके कुछ दोस्त घर पर खाने पर आ रहे हैं क्या?

कहीं भी धूल का एक कण नहीं, ऐसा लग रहा है किसी फाइव स्टार होटल में आ गए हैं पूरा घर फूलों से सजा है एक-एक चीज अपनी जगह पर है पहले तो कभी ऐसा नहीं किया?

क्या बात है मां क आज आपने तो बिल्कुल सवालों की झड़ी लगा दी रीना ने मुस्कुराते हुए कहा।

आप ही तो कहती है मां की साफ-सुथरे घर में लक्ष्मी का वास होता है और पितृपक्ष चल रहे हैं तो वह भगवान के रूप में हमारा घर देखने आए हैं बाबूजी बिखरा घर देखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा?

मां आज सफाई करते हुए मुझे बाबूजी की डायरी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें साफ सुथरा और फूलों से सजा घर बहुत अच्छा लगता है एकदम आप ही की तरह मैंने भी आज घर को सजाया है आज उनके श्राद्ध की तिथि है, पंडितों को बुलाया है और बाबूजी की पसंद का सारा खाना बना रही हूं मिठाई बस बाहर से आर्डर करती हूँ अभी थोड़ी देर में आ जाएगी आप एक बार देख लो कोई कमी तो नहीं है?

बाबूजी के साथ तो मुझे ज्यादा दिन रहने को नहीं हुआ क्योंकि मेरी शादी कम उम्र में हो गई थी लेकिन अब यह लग रहा है माँ कि बाद में यह श्राद्ध करने से तो अच्छा है कि आपको हम जीते जी खुशी दे दें।

क्या बात है बहू आजकल किसकी संगत में रह रही हो जो इतनी अच्छी बातें कर रही हो?

मां आपको मेरी हर बात मजाक क्यों लगती है?

नहीं तुम आजकल की बहुएं नौकरी करने वाली हो हमारी तरह कहां?

मैं पढ़ी-लिखी ज़रूर हूँ और अपने संस्कार समझती हूँ, आपको पता है मां सच बात तो यह है कि मैं जब अपने घर गई थी अपनी मां को देखा और पिताजी को देखा और भाभी का उनके साथ बर्ताव देखा तब मेरा मन रोने लगा। वहां से लौटी और तुरंत अपने घर को सजाने लग गई कि जो मेरे पास है उसे तो मैं ठीक कर सकती हूँ, सास कमल की ऑंखों में आंसू भर गए?

तू बहु नहीं बेटी है । पापा जी का श्राद्ध है, माँ ने बुलाया है। ऐसा फोन करके अपने मम्मी पापा को बोलो। फिर मैं उन्हें रोक लूंगी कुछ दिन हम सब साथ रहेंगे सब ठीक हो जाएगा।

जब इंसान नहीं रहता तब उसकी कीमत समझ में आती है।

कहाँ मैं तेरी बातों में लग गई पंडित जी आ रहे होंगे ।

चल पागली रोना छोड़? जीवन तो चलने का नाम है।

बस मेरी एक बात याद रखना जीवन में हमेशा खुशियाँ बांटना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मनीप्लांट , मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मनीप्लांट , मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है , उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है , उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।

 वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।

अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में , धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।

अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।

तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं ,,,आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Short Stories ☆ “एकदा नैमिषारण्ये ” श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘Naimisharanya — The Forest…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Short Stories “एकदा नैमिषारण्ये”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

?~ Naimisharanya — The Forest… ~??
☆

In the revered land of Naimisharanya, a sage once recounted a tale that held the devotees spellbound.

“There existed a land of unparalleled beauty,” he began, “where lush greenery stretched as far as the eye could see.”

Curiosity sparkled on every face, and in unison, they implored,

“Guru ji, tell us more of this enchanting land!”

The sage smiled, his words weaving a tapestry of wonder.

“This land was alive with gardens blooming in radiant hues, and rivers flowing with waters as pure as nectar. Its inhabitants revered these rivers as nurturing mothers, offering aarti with heartfelt devotion. They cherished cows as their own mothers, and tended the land with care. Only half of it was cultivated; the rest remained untamed, a sanctuary for grazing animals. Trees were protected with reverence, and the five elements of nature were honored in all their glory. In every leaf, every gust of wind, they perceived the divine. Such was the land’s splendor that even the gods looked upon it with envy.”

Generations passed, and the story was retold, filling hearts with longing and wonder.

Years later, a new generation—familiar with the tale only through hearsay—gathered around the sage. Seated in air-conditioned rooms, sipping mineral water from plastic bottles, they asked,

“Tell us once more of that wondrous land!”

The sage’s eyes twinkled as he began anew,

“There once was a land in Naimisharanya…”

~ Pravin Raghuvanshi

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ? ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

♥ ♥ ♥ ♥

© संजय भारद्वाज  

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ? ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा वक्त सबका बाप है।

☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

गली, मोहल्ले, गाँव से लेकर शहर, शहर से लेकर देश, और देश से लेकर दुनिया भर में चौधरियों की भरमार है। यह परम्परा भिन्न-भिन्न नामों और उपाधियों से आदिम काल से चली आ रही है और आगत में भी अनवरत रूप से गतिमान रहेगी।

चौधरी अपने को सर्व शक्तिमान मानता है और कई मायनों में होता भी है। उसके चारों ओर चमचों की फ़ौज लगी रहती है। वह प्रशंसा का भूखा होता है। बड़ी-बड़ी डींगें हाँकना उसकी आदत में शुमार होता है। अपनी ताकत और दौलत के बूते पर ज़रूरतमंद और कमजोर व्यक्तियों पर अपनी हुकूमत क़ायम रखता है। अपने जायज़-नाजायज फ़ैसलों को थोपकर अपना रौब गाँठता है। अपने अधीनों पर जुल्म और ज़्यादतियाँ ढहाता है और बेचारे अधीनस्थ चुपचाप बर्दाश्त करते रहते है।

इधर पिछली सदी में दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली चौधरी के समक्ष छोटे, पर खुद्दार और मजबूत इरादों के धनी चौधरी ने चुनौती पेश कर दी है। उनके बीच ऐसी ज़बरदस्त भिड़ंत हुई कि उसकी बड़े चौधरी की हेकड़ी निकल गई। वह पगला कर गली के गुंडों की तरह धमकियों पर उतर आया। कल तक जो दुनिया में लगी युद्धाग्नि को बुझाने के हवाई दावे किया करता था, आज वही दुनिया को आग के हवाले करने की बातें कर रहा है।

पर इन दिनों हवा में ग़ज़ब का शोर है। लोगों का कहना है कि बड़बोले चौधरी का भेजा फिर गया है। दुनिया को अपनी उँगली पर नचाना चाहता है, पर वह भूल गया कि वक्त के दरिए का ढेर सारा पानी बह चुका है। वह जिन देशों के लोगों को गँवार और जंगली समझा करता था उनमें आत्म स्वाभिमान जाग उठा है। वे अपने पैरों पर उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने सहमति में सिर हिलाने, हाथ ऊपर उठाने और जी-हजूरी करने से साफ़-साफ मना कर दिया है।

कदाचित मद में अँधा चौधरी भूल गया कि दुनिया में किसी भी महाबली की चौधाराहट हमेशा के लिए नहीं रही है। वक्त का कोई बाप नहीं है। वक्त सबका बाप है। और जब वक्त अपने पर आता है, तो बड़े से बड़े राजे-महाराजे, अर्जुन जैसे धनुर्धरों, भीम जैसे महाबाहो, सिकंदरों, बादशाहों की पलक झपकते खटिया खड़ी कर देता है।… तो सुनो! मिस्टर चौधरी फिर तुम किस देश की मूली हो।

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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जाने कब बदला जमाना?)

☆ लघुकथा # ८५ – जाने कब बदला जमाना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“हमारे जमाने में कितना अच्छा था, सबको एक दूसरे के लिए फुर्सत थी। सब अपने आरुषि पड़ोसी तो छोड़ो पूरे मोहल्ले का हाल-चाल बता देते थे एक दूसरे के दुख- सुख में खड़े भी रहते थे।

चूल्हे में खाना बनाते थे और हर त्यौहार को एक साथ   मिलजुल कर मानते थे।

क्या हो गया माँजी आज फिर अपने जमाने की यादें ताजा हो गई क्या?

नहीं बहू बस यूं ही याद आ गई थी पता नहीं तुम्हारी बाई कब आएगी? खाना बनाएगी कि नहीं? तो तुम लोग मोबाइल से आर्डर कर देते हो।

माँ जी आपके जमाने में इतनी सुविधा कहां थी?

मां-बाप लड़कियों को पढ़ाते कहां थे. अब हम तो लड़कों से आगे निकल गए हैं। आप थोड़ा बाहर निकलो दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है मां. बहुत खूबसूरत यह दुनिया है और अगर जमाना ना बदला होता तो आपको हम लोग यहाँ इसी मोबाइल में बाबा जी के घर बैठे प्रवचन जो आप सुनते हो यह सब कैसे सुनाते? पुराने जमाने में तो आपको भी काम करना पड़ता और मुझे भी अब हम दोनों आराम से है ना।

हां बहु तुम ठीक कह रही हो. यह जमाना ज्यादा अच्छा है हम तो तुम्हारे बाबूजी के सामने कुछ कह भी नहीं पाते थे. बदलाव हमेशा अच्छा होता है जाने कब जमाना बदल गया और जमाने के साथ हम भी बदल गये।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७७ – ऋचाएँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ऋचाएँ…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७७ — ऋचाएँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

किसी शब्द — स्रष्टा ने पेड़ों की छालों में सहस्रों ऋचाएँ लिखी थीं। एक ऋषि ने उन सारी ऋचाओं का अर्थ समझ लिया। वह जानता था भविष्य में मनुष्य के हाथों पेड़ कटेंगे। पेड़ कटने से ऋचाएँ नष्ट हो जातीं। ऋषि इन ऋचाओं को नष्ट होने नहीं देता। उसने इन्हें कंठाग्र करना शुरु किया। वह साधना से वर्षों जी कर लोगों को यह अभ्यास करवाता। ये ऋचाएँ जन – जन के कंठ में पहुँच कर अनंत हो जातीं।

 © श्री रामदेव धुरंधर
20 – 09 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह साहब सुबह उठा। नहा धोकर , नाश्ता कर ऑफिस के लिए तैयार होने लगा कि अचानक एक जूते का तस्मा कसते कसते टूट गया। इतना समय नहीं बचा था कि बाज़ार जाकर नये तस्मे खरीद लाता। गाड़ी आकर गेट पर लग गयी थी। ड्राइवर हार्न बजाए जा रहा था। जैसे तैसे जूतों के पुराने तस्मे कसे और यह सोचकर रवाना हुआ कि शाम को लौटते वक्त नये तस्मे खरीद लेगा।

दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे उसका ध्यान बार बार अपने एक टूटे तस्मे पर जाता रहा। वह मेज़ के पीछे जूतों को ज्यादा से ज्यादा छिपाने में लगा रहा। दूसरे कर्मचारी देखेंगे तो क्या सोचेंगे? फिर वह अपने पर मुस्कुराया भी कि हम ज़िंदगी भर यही सोचते रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे? दूसरे हमारी कोई कमी या कमज़ोरी देख लेंगे तो कैसा लगेगा? इस बात पर गौर किया उसने।

ऑफिस से छुट्टी हुई। साहब गाड़ी में सवार सीधे एक बढ़िया मार्केट में पहुंचे। बड़े बड़े शो रूम। चमचमातीं , दूधिया लाइट्स। बाहर मज़ेदार पकवान की रेहड़ियां। खूब भीड़। साहब एक शो रूम में घुसा। सेल्समैन भागा आया -कहिए साहब? कौन से ब्रांड के नये डिजायन के जूते दिखाऊं?

-मुझे जूते नहीं , सिर्फ तस्मे चाहिएं। अभी सोफे पर बैठते बैठते कहा साहब ने।

सेल्समैन ने चौंक कर देखा -साहब। यहां सिर्फ नये जूते बिकते हैं। साॅरी। आप अगले शो रूम में पता कीजिए।

दूसरे शो रूम वाले सेल्समैन ने सोफे पर बैठने का अवसर भी नहीं दिया।

तुरंत कहा -आप भी कमाल करते हो? जाइए। यहां कोई तस्मे एक्स्ट्रा नहीं बेचे जाते। आप चाहो तो नये जूते खरीदने के लिए बैठ सकते हो। नहीं तो समय खराब मत कीजिए।

शो रूम और भी थे। चमचमाते पर बिना पुराने जूतों के। वहां पुराने का कोई काम नहीं। एक शो रूम के सेल्समैन ने सबसे ज्यादा होशियारी दिखाई -क्या रखा है इन पुराने डिजाइन के जूतों में जिसके तस्मे ढूंढते फिर रहे हो? नये दिखाता हूं। खरीदिए और सारी प्राॅब्ल्म साल्व। न रहेंगे पुराने जूते न ढूंढेंगे तस्मे।

बाहर आया। देखा कि रेहड़ियों पर लोग पेपर ग्लास या पेपर प्लेट्स में मज़े में खा पी कर डस्टबिन में फेंक पैसे चुकता कर जा रहे हैं। अचानक तस्मों ने जैसे मुंह चिढ़ा कर कहा -बाबू मोशाॅय , समझे नहीं क्या? यह है नया कल्चर। यानी -यूज एंड थ्रो। ओल्ड से नो मोह। समझे क्या?

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© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २४ – कथा-कहानी – राघव और विश्वास ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

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सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।

मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।

जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।

जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।

राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।

सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।

इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।

तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।

हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।

क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।

डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।

यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।

आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।

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♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #२९४ – लघुकथा – ☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  “प्रभाव…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #२९४ ☆

☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

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“सार्वजनिक मंचों पर तो औपचारिकता के नाते किसी की प्रशंसा करना बनता है पर ऐसी क्या विशेषता है उनके लेखन में जो हरदम, हर कहीं मुक्त कंठ से उनका गुणगान करते रहते हो तुम?”

शेखर दत्त ने कुछ उबाऊ अंदाज में प्रश्न किया अपने साथी विनय अनुरागी से।

“विशेषता उनके लेखन में तो है ही मित्रवर, पर इससे कहीं अधिक प्रभावित हूँ मैं उनके सहज सरल व सौम्य व्यक्तित्व से। उनके गंभीर, शांत व निर्मल निश्छल व्यक्तित्व का ही असर है कि उनकी सभी रचनाओं को मैं किसी तपोनिष्ठ ऋषि मुख से निःसृत मंत्र समझ कर पढ़ता हूँ, और मित्रों के बीच उनका गुणगान करते हुए उन्हें अपनी स्मृति में बनाये रखता हूँ।”

“अरे वाह, सचमुच में धन्य हो मित्र! जो तुम्हें आज के समय में ऐसे सतोगुणी सत्य निष्ठ साधक का सानिध्य मिला है।”

“और मुझे तुम्हारे जैसा आत्मीय अनुरागी सरलमना पारखी मित्र।”

व्यक्तित्व और कृतित्व की एकरूपता ही किसी के प्रति श्रद्धा भाव जगाती है।

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© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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