डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।
जीवन के कुछ अनमोल क्षण

- तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
- मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
- ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
- बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
- विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना इंसानियत का दिवाला।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६१ – इंसानियत का दिवाला ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
शहर के उस चमकते, कांच और स्टील के जंगल में, जिस दिन उसका आगमन हुआ, सुबह-सुबह अपनी ‘ई-बाइक’ पर ऑफिस के लिए निकलते समय मैंने उसे देखा था. दानीश अरोड़ा के ‘पेंटहाउस’ के सामने, सड़क की दूसरी ओर स्थित एक पुराने, जर्जर हो चुके ‘द अनटच्ड मॉल’ के खाली पड़े ‘फूड कोर्ट’ में, एक दुबला-पतला, धूल-धूसरित आदमी, फटी हुई ‘टी-शर्ट’ और ‘जींस’ में लिपटा पड़ा था, जैसे रात में ‘साइबर स्पेस’ से कोई ‘एरर 404’ होकर ‘क्रैश’ हो गया हो, या फिर कोई ‘स्टार्टअप गुरु’ नए ‘बिजनेस मॉडल’ की तलाश में ‘डेटा एनालिटिक्स’ करते-करते ‘ध्यान मुद्रा’ में लेटा हो. उसकी सूरत देखकर दिल में अजीब-सी गुदगुदी हुई थी – कहीं ये कोई ‘डिजिटल डिटॉक्स’ पर निकला ‘इन्फ्लुएंसर’ तो नहीं, जो गलत ‘वाई-फाई ज़ोन’ में उतर गया हो? या शायद कोई भटका हुआ ‘कोडमास्टर’, जिसने ‘बग फिक्सिंग’ के नाम पर खुद को ‘स्ट्रीट लेवल’ पर फेंक दिया हो! फिर मैंने उसे एक-दो बार और देखा, कभी ‘स्कैभेन्जर’ की तरह ‘ई-कचरा’ बीनते हुए सड़क पार करते, कभी नए बने ‘शॉपिंग कॉम्प्लेक्स’ के सामने ‘फ्री वाई-फाई’ ढूंढते हुए चक्कर लगाते, और कभी हांफते हुए. उस बेचारे की चाल ऐसी थी, जैसे उसके ‘सिस्टम’ में ‘वायरस’ घुस गया हो और वो ‘रिबूट’ होने की कोशिश कर रहा हो, पर ‘बूटलोडर’ करप्ट हो गया हो. लोग कहते थे, “देखो, बेचारा! बेचारा भी ऐसा, जिसे ‘भगवान’ ने सिर्फ ‘गरीबी’ का ही ‘प्रीमियम प्लान’ दिया हो, वो भी ‘नो-रिफंड’ पॉलिसी के साथ.” उस समय मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानता था, सिवाय इसके कि वो चलता-फिरता एक ‘सॉफ्टवेयर ग्लिच’ था, जिसका ‘सॉल्यूशन’ किसी के पास नहीं था, और कोई ‘टेक सपोर्ट’ उसे लेने को तैयार नहीं था. देर रात, जब ‘नेटफ्लिक्स’ पर ‘वेब सीरीज’ देखने के बाद मैं बालकनी में लेटा, चैत की हवा तेज चल रही थी, चारों ओर ‘स्मॉग’ का घना अँधेरा. बस झपकियां ही ले रहा था कि ‘मारो-मारो’ का शोरगुल सुनकर चौंक गया. ऐसा लगा मानो किसी ने ‘सोसाइटी’ में ‘क्राउडफंडेड एक्शन मूवी’ का ‘लाइव प्रीमियर’ कर दिया हो. शोर दानीश अरोड़ा के ‘पेंटहाउस’ की ओर से आ रहा था. ‘स्लिपर्स’ में पाँव डाले ही मैं उधर चल पड़ा, क्योंकि शहर में किसी भी ‘लाइव ड्रामा’ में शामिल होना एक ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ थी, खासकर जब ‘एंट्री फीस’ न हो. मेरा अनुमान ठीक था. दानीश अरोड़ा के ‘पेंटहाउस’ के सामने भीड़ लगी थी, जैसे कोई ‘फ्री का इवेंट’ चल रहा हो, और ‘टिकट काउंटर’ पर लंबी लाइन लगी हो. ‘सोसाइटी’ के लोग भी शोर सुनकर अपने ‘फ्लेट्स’ से भागे चले आ रहे थे, क्योंकि ‘फ्री के तमाशे’ का मौका कौन छोड़ता है, खासकर जब ‘पॉपकॉर्न’ साथ न हो! मैंने भीतर घुसकर देखा और कुछ चकित रह गया. वो ‘फूड कोर्ट’ का वही बेघर आदमी था, जिसकी ‘एंट्री’ इतनी ‘लो-फाई’ हुई थी. दानीश अरोड़ा का बेटा, आर्यन, उस बेघर आदमी की दोनों बाँहों को पीछे से पकड़े हुए था और दो-तीन ‘सिक्योरिटी गार्ड’ आँख मूँद कर बेतहाशा पीट रहे थे. दानीश अरोड़ा और अन्य ‘एलीट क्लास’ के लोग उसे भय और क्रोध से आँखें फाड़-फाड़कर घूर रहे थे, मानो वे उसकी ‘पार्क करने की फीस’ वसूल कर रहे हों, वो भी ‘लेट फाइन’ के साथ. उस बेचारे की हालत देखकर हंसी नहीं, बल्कि एक अजीब-सी ‘अमानवीय’ खुशी हो रही थी, जैसे किसी ‘रोड शो’ में ‘एक्स्ट्रा’ मिल गया हो, वो भी ‘नो-पेमेंट’ पर.
बेघर आदमी दुबला-पतला था, गाल पिचके हुए, आँखें धँसी हुई और छाती की हड्डियां साफ ‘रिफ्यूजी कैंप’ के ‘टेंट’ की तरह दिखायी दे रही थीं, मानो किसी ने उसे ‘3डी प्रिंट’ किया हो और ‘मॉडलिंग’ में ‘फंडिंग’ की कमी पड़ गई हो, और ‘रेंडरिंग’ अधूरी रह गई हो. पेट फूला हुआ, ऐसा लगता था जैसे उसने अपने सारे ‘डिजिटल लोन’ पेट में समेट रखे हों, वो भी ‘हाई इंटरेस्ट’ पर. मार पड़ने पर वह बेतहाशा चिल्ला रहा था, “मैं ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ हूँ, ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ हूँ…” मानो उसकी ‘प्रोफेशनल डिग्री’ ही उसका ‘आपातकालीन बटन’ हो, जो ‘पैनिक मोड’ में ‘एक्टिवेट’ हो गया हो. दानीश अरोड़ा मेरे पास सरक आये थे, जैसे कोई ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ दे रहे हों, “साला ‘अनऑथराइज़्ड घुसपैठिया’ है, साहब! पर यह हमारा-आपका दोष है कि ‘बैकग्राउंड चेक’ नहीं करते. ‘गरीब’ को देखकर हमारा-आपका दिल पसीज जाता है और मौका-बे-मौका ‘बचे हुए पिज़्ज़ा’, ‘पुरानी शर्ट’ दे ही दी जाती है. आपने तो इसको देखा ही होगा, मालूम होता था महीनों से ‘नेटवर्क कवरेज’ नहीं मिला है, पर कौन जानता था कि साला ऐसा निकलेगा. ‘वायरस’ का पिल्ला…!” उनके चेहरे पर ऐसा भाव था, मानो ‘सीएसआर’ (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के नाम पर किसी ‘साइबर क्रिमिनल’ को पाल लिया हो, और अब वो ‘डेटा ब्रीच’ कर रहा हो. फिर बेघर आदमी की ओर मुड़कर गरज पड़े, “बता साले, ‘मैकबुक प्रो’ कहाँ रखा है? नहीं तो वह मार पड़ेगी कि ‘ब्लैक स्क्रीन ऑफ डेथ’ याद आ जाएगी.” उनका गला जोर से चिल्लाने के कारण किंचित बैठ गया था, इसलिए संभवतः थककर वह चुप हो गए. पीटने वालों ने भी इस समय पीटना बंद कर दिया था, जैसे ‘सर्वर डाउन’ हो गया हो, और ‘कनेक्शन लॉस्ट’ हो गया हो. लेकिन दानीश अरोड़ा के वक्तव्य से ‘जिम’ का ‘ट्रेनिंग मैनेजर’ टाइगर अत्यधिक प्रभावित मालूम पड़ा. वह अभी-अभी आया था, और दानीश अरोड़ा का बयान समाप्त होते ही आव देखा न ताव, भीड़ में से आगे लपक, ‘डंबल’ हाथ में ले, गंदी गालियां देते हुए बेघर आदमी को पीटना शुरू कर दिया, मानो उसने ‘बॉडी बिल्डिंग कॉम्पिटिशन’ में भाग लिया हो और ‘गोल्ड मेडल’ जीतने की कोशिश कर रहा हो, वो भी ‘नो-रूल्स’ गेम में. “एक-दो हफ्ते से ‘सोसाइटी’ में आया हुआ है,” दानीश अरोड़ा जैसे निश्चिंत होकर फिर बोले, “‘डेटा माइनिंग’ की तरह इधर-उधर घूमा करता था, सो हमारे घर में दया आ गई. एक रोज उसे बुलाकर उन्होंने ‘बचे हुए सैंडविच’ और ‘कॉफी’ खाने को दे दी. बस क्या था, ‘सिस्टम’ में घुस गया. रोज आने लगा. खैर, कोई बात नहीं थी, आपकी दया से ऐसे दो-तीन ‘बेघर सॉफ्टवेयर’ रोज ही ‘अपडेट’ होकर ‘दुआ’ दे जाते हैं. यह घर में आने लगा तो मौका पड़ने पर एकाध ‘टेक्निकल ग्लिच’ भी ठीक कर देता था, अब यह किसको पता था कि आज यह घर से नई ‘स्मार्ट वॉच’ चुरा लेगा, वो भी ‘एप्पल वॉच अल्ट्रा’!” दानीश अरोड़ा का स्वर ऐसा था, मानो वे किसी ‘टेक गुरु’ का रोल निभा रहे हों, जिसे बदले में ‘साइबर थेफ्ट’ मिल गई हो, और अब वो ‘पब्लिक स्टेटमेंट’ दे रहे हों.
“आपको ठीक से पता है कि ‘स्मार्ट वॉच’ इसी ने चुराई है?” मेरे इस प्रश्न से वे बिगड़ गए. उनके चेहरे पर ऐसा भाव आया, जैसे मैंने कोई ‘डेटा प्राइवेसी’ पर सवाल पूछ लिया हो, वो भी ‘जीडीपीआर’ के उल्लंघन का. बोले, “आप भी खूब बात करते हैं! यही पता लग गया तो ‘हैकर’ कैसा? मैं तो खूब जानता हूँ कि ये सब ‘चोरी का डेटा’ होशियारी से ‘एनक्रिप्ट’ कर देते हैं और जब तक इनकी बड़ी ‘फॉर्मेटिंग’ न की जाए, कुछ नहीं बताते. अब यही समझिए कि करीब नौ बजे ‘स्मार्ट वॉच’ गायब हुई. मिसेज चावला का कहना है कि उसी समय उसने इसको किसी ‘सामान’ के साथ घर से निकलते हुए देखा. फिर मैं यह पूछता हूँ कि आज दस वर्ष से मेरे घर का ‘स्मार्ट डोर’ इसी तरह ‘ओपन’ रहता है, लेकिन कभी ‘डेटा ब्रीच’ नहीं हुई. आज ही कौन-सी नई बात हो गई कि वह आया नहीं और ‘सोसाइटी’ में ‘चोरी-हैकिंग’ शुरू हो गई! अरे, मैं इन सालों को खूब जानता हूँ, ये ‘बग्स’ हैं, ‘फिक्स’ करने पड़ते हैं!” उनके शब्दों में ‘निश्चितता’ इतनी थी, मानो वे ‘साइबर सिक्योरिटी’ के ‘डीन’ रहे हों, और ‘एंटी-वायरस’ सॉफ्टवेयर के ‘आविष्कारक’ भी. वह बेघर आदमी अब भी तेज मार पड़ने पर चिल्ला उठता, “मैं ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ हूँ, ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ हूँ, ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ हूँ…” मानो उसने ‘अपनी डिग्री’ को अपना ‘अंतिम पासवर्ड’ बना लिया हो, जो ‘बार-बार’ गलत हो रहा हो. स्पष्ट था कि इतने लोगों को देखकर वह काफी भयभीत हो गया था और अपने समर्थन में कुछ न पाकर बेतहाशा अपनी ‘पहचान’ का नाम ले रहा था, जैसे हर ‘प्रोफेशनल’ चोर हो सकता है, लेकिन ‘सॉफ्टवेयर इंजीनियर’ कतई नहीं हो सकता, खासकर जब वो ‘अनएम्प्लॉयड’ हो. नए लोग अब भी आ रहे थे, जैसे ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ देखने आए हों, और ‘व्यूअर्स’ बढ़ रहे हों. वे क्रोध और उत्तेजना में आकर उसे पीटते और फिर भीड़ में मिल जाते, जैसे किसी ‘ऑनलाइन ट्रोलिंग’ में शामिल हुए हों, और ‘कमेंट्स’ कर रहे हों. और जब लगातार मार पड़ने पर भी उसने कुछ नहीं बताया तो लोग खामखा थक गए, मानो ‘बैटरी’ खत्म हो गई हो, और ‘चार्जिंग पॉइंट’ न मिल रहा हो. कुछ लोग वहाँ से सरकने भी लगे. किसी ने उसे ‘पोल’ से बाँधने और किसी ने ‘साइबर पुलिस’ के सुपुर्द करने की सलाह दी, मानो वे ‘जस्टिस लीग’ के ‘फाउंडिंग मेंबर्स’ हों, और ‘सुपरहीरो’ बनने का सपना देख रहे हों. मैं भी कुछ ऐसी ही सलाह देकर खिसकना चाहता था कि दानीश अरोड़ा का मँझला लड़का, अंश, दौड़ता हुआ आया और अपने पिताजी को अलग ले जाते हुए फुस-फुस कुछ बातें कीं, मानो कोई ‘सिक्योर चैट’ चल रही हो, वो भी ‘एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन’ के साथ. कुछ देर बाद दानीश अरोड़ा जब वापस आए तो उनके चेहरे पर हवाईयाँ-सी उड़ रही थीं, जैसे किसी ‘बड़ी डील्स’ में ‘डेटा लॉस’ हो गया हो, और ‘रिकवरी’ संभव न हो. एक-दो क्षण इधर-उधर तथा मेरी ओर बेचारे की तरह देखने के बाद वह बोले, “अच्छा, इस बार ‘माफ’ कर देते हैं. साला काफी ‘अपडेट’ हो चुका है, आइंदा ऐसा करते ‘चेतेगा’.” उनका स्वर ऐसा था, मानो उन्होंने ‘दया’ का ‘नया सॉफ्टवेयर’ लॉन्च कर दिया हो, वो भी ‘फ्री ट्रायल’ के साथ. लोग दानीश अरोड़ा को बुरा-भला कहकर रास्ता नापने लगे, मानो वे ‘नैतिकता’ के खिलाफ ‘वॉकआउट’ कर रहे हों, और ‘सोशल मीडिया’ पर ‘हैशटैग’ चला रहे हों. मैंने उनकी ओर मुस्कुराकर देखा तो मेरे पास आकर झेंपते हुए बोले, “इस बार तो ‘स्मार्ट वॉच’ घर में ही मिल गई है, पर कोई बात नहीं. ‘चोर-हैकर’ तो रात-रातभर ‘पिटाई’ खाते हैं और कुछ भी नहीं बताते.” फिर बायीं आँख को खूबी से दबाते हुए दाँत खोलकर हँस पड़े, “चलिए साहब, ‘नीच’ और ‘नींबू’ को दबाने से ही ‘रस’ निकलता है!” उनका यह वाक्य सुनकर लगा, जैसे वे ‘गांधी जी’ के ‘अहिंसा सिद्धांत’ का ‘खुला उल्लंघन’ कर रहे हों, लेकिन ‘डिजिटल युग’ के ‘एडिशन’ में, वो भी ‘बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन’ के साथ.
कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि उस दिन की ‘डिजिटल पिटाई’ के बाद भी ‘फूड कोर्ट’ का वह बेघर आदमी ‘सोसाइटी’ में टिके रहने की हिम्मत कैसे कर सका? शायद उसने सोचा हो कि ‘निर्दोष’ छूट जाने के बाद ‘सोसाइटी’ के लोगों का ‘विश्वास’ और ‘सहानुभूति’ उसको प्राप्त हो जाएगी और दूसरी जगह उसी ‘अनिश्चितता’ का सामना करना पड़ेगा. या शायद उसे लगा हो, “भाई, इतनी ‘ऑनलाइन बदनामी’ के बाद तो मैं इस ‘सोसाइटी’ का ‘एंथम सॉन्ग’ बन गया हूँ, अब जाऊँ तो जाऊँ कहाँ? ‘गूगल मैप्स’ पर भी मेरी लोकेशन ‘अननोन’ दिखाएगा!” चाहे जो हो, उसके प्रति मेरी दिलचस्पी अब और बढ़ गई थी. मैं उसको ‘फूड कोर्ट’ में बैठकर कुछ खाते या चुपचाप सोते या ‘सोसाइटी’ से ‘धीमे-धीमे’ सरकते हुए देखता, जैसे कोई ‘डेटा एनालिस्ट’ किसी ‘दुर्लभ एल्गोरिदम’ का अध्ययन कर रहा हो, वो भी ‘बिग डेटा’ के बीच. लोग अब उसको कुछ-न-कुछ दे देते. बचा हुआ बासी या जूठा ‘फास्ट फूड’ पहले ‘स्ट्रीट डॉग्स’ या ‘फूड वेस्ट डिस्पोजल’ को दे दिया जाता, परंतु अब ‘मॉडर्न मॉम्स’ बच्चों को दौड़ा देतीं कि जाकर बेघर आदमी को दे आयें, मानो वो ‘सोसाइटी का नया ‘पेट प्रोजेक्ट’ बन गया हो, वो भी ‘जीरो-कॉस्ट’ पर. कुछ लोगों ने तो उसको कोई ‘आत्मज्ञानी फकीर’ तक कह डाला, जैसे ‘बेघर’ से ‘भगवान’ बनने का उसका ‘क्विक प्रमोशन’ हो गया हो, वो भी ‘वीआईपी पैकेज’ के साथ. और धीरे-धीरे उसने ‘फूड कोर्ट’ का परित्याग कर दिया और आम सहानुभूति एवं ‘सोशल मीडिया’ के ‘आश्चर्यजनक लाभ’ उठाते हुए, जब वह किसी-न-किसी ‘लॉबी’ या ‘कम्युनिटी हॉल’ में जमीन पर सोने-बैठने लगा तो लोग उससे हल्के-फुल्के ‘डिजिटल टास्क’ भी लेने लगे, जैसे कोई ‘फ्री का ‘टास्क रैबिट’ मिल गया हो, वो भी ‘अनलिमिटेड यूसेज’ के साथ. ‘दया-माया’ के मामले में दानीश अरोड़ा से पार पाना टेढ़ी खीर है, किंतु बेघर आदमी उनके दरवाजे पर जाता ही न था, मानो उसने दानीश अरोड़ा को ‘अनटचेबल’ घोषित कर दिया हो, वो भी ‘ब्लॉक लिस्ट’ में डालकर. लेकिन एक दिन उन्होंने किसी ‘शुभ मुहूर्त’ में उसे सड़क से गुजरते समय संकेत से अपने पास बुलाया और तिरछी नजर से देखते हुए, मुस्कुराकर बोले, “देख बे, तूने चाहे जो भी किया, हमसे तो यह सब नहीं देखा जाता. ‘स्ट्रीट’ पर भटकता रहता है. ‘स्ट्रीट डॉट्स’ का जीवन जीता है. आज से इधर-उधर भटकना छोड़, आराम से यहीं रह और दोनों ‘शिफ्ट’ भरपेट खा, वो भी ‘बफे सिस्टम’ में.” उनका स्वर ऐसा था, मानो वे कोई ‘कॉर्पोरेट सीएसआर हेड’ का रोल निभा रहे हों, और बदले में ‘बेघर को घर में रखने’ का ‘पब्लिसिटी स्टंट’ कर रहे हों, वो भी ‘प्रेस रिलीज’ के साथ. पता नहीं, यह दानीश अरोड़ा के ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ से संभव हुआ या डर से, पर बेघर आदमी उनके यहाँ स्थायी रूप से रहने लगा. उन्हीं के यहाँ उसका नाम-करण भी हुआ. उसका नाम ‘भोलानाथ’ था, लेकिन दानीश अरोड़ा के दादा का नाम ‘नरेंद्र सिंह’ था, इसलिए घर की औरतों की ज़बान से वह नाम उतरता ही न था. उन्होंने उसको ‘राजू’ कहना आरंभ किया और धीरे-धीरे यही नाम सारे ‘सोसाइटी’ में प्रसिद्ध हो गया, मानो उसे कोई ‘ब्रांड नेम’ मिल गया हो, वो भी ‘वायरल मार्केटिंग’ के साथ.
किंतु राजू के भाग्य में बहुत दिनों तक दानीश अरोड़ा के यहाँ टिकना न लिखा था. बात यह है कि ‘सोसाइटी’ के लोगों को यह कतई पसंद न था कि केवल दोनों ‘शिफ्ट’ भोजन पर राजू दानीश अरोड़ा की सेवा करे. जब ‘ईश्वर’ ने उनके बीच एक ‘अनपेड इंटर्न’ भेज ही दिया था तो उस पर उनका भी उतना ही अधिकार था, मानो राजू कोई ‘सरकारी संपत्ति’ हो, वो भी ‘पब्लिक डोमेन’ में. उन्होंने मौका देखकर उसको अपनी ‘सेवाएं’ देने का अवसर देना आरंभ कर दिया. वह दानीश अरोड़ा के किसी काम से जाता तो रास्ते में कोई न कोई उसको ‘डिजिटल पेमेंट’ देकर किसी काम की ‘फरमाइश’ कर देता और यदि वह आनाकानी करता तो संबंधित व्यक्ति बिगड़कर कहता, “साला, तू दानीश अरोड़ा का ‘गुलाम’ है? वह क्या कर सकते हैं? मेरे यहाँ बैठकर ‘कंटेंट’ खाया कर, वह क्या खिलाएंगे, ‘बचे हुए डेटा’ ही तो देते होंगे, वो भी ‘लो-रेजोल्यूशन’ में!” ‘सोसाइटी’ वालों की ऐसी ‘दया’ देखकर राजू सोचता होगा, “ये लोग मुझे ‘सर्वेंट’ बनाएँगे या ‘शेयरहोल्डर’?” राजू दानीश अरोड़ा से अब भी डरता था, इसीलिए उनसे छिपाकर ही वह अन्य लोगों का काम करता. किंतु उसको ‘डांटने’ का और व्यक्तियों को भी उतना ही अधिकार था, जैसे ‘ऑनलाइन ट्रोलिंग’ का ‘लाइसेंस’ सबको मिल गया हो, वो भी ‘अनलिमिटेड’ एक्सेस के साथ. एक बार मिस्टर गुप्ता के बेटे, ‘गेमर’ जय ने राजू से ‘तीन-चार जीबी डेटा’ लाने के लिए कहा और राजू फौरन आने का वायदा करके चला गया. पर वह शीघ्र न आ सका, क्योंकि दानीश अरोड़ा के घर की औरतों ने उसे इस या उस ‘टेक्निकल टास्क’ में बाँध रखा, मानो राजू कोई ‘मल्टीटास्किंग सॉफ्टवेयर’ हो, जो ‘क्रैश’ हो रहा हो. बाद में वह जब मिस्टर गुप्ता के यहाँ पहुँचा तो जय ने पहला काम यह किया कि दो ‘थप्पड़’ उसके गाल पर जड़ दिये, फिर गरजकर बोला, “‘बग’, ‘धोखा’ देता है? कह देता ‘लॉगआउट’ हो जाऊँगा. अब आज मैं तुझसे दिन-भर ‘गेमिंग’ कराऊँगा, देखें कौन साला रोकता है! आखिर हम भी ‘सोसाइटी’ में रहते हैं कि नहीं?” जय का स्वर ऐसा था, मानो वो ‘गेमिंग वर्ल्ड’ का ‘डॉन’ हो, वो भी ‘लाइव स्ट्रीम’ पर. और सचमुच जय ने उससे दिन-भर ‘गेमिंग’ कराई. दानीश अरोड़ा को सब पता लग गया, लेकिन उनकी ‘उदार व्यावहारिक बुद्धि’ की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जाता, क्योंकि उन्होंने ‘चूँ तक नहीं की’, मानो उन्होंने ‘न्यूट्रल’ का ‘बटन’ दबा दिया हो, और ‘ऑब्जर्वर मोड’ में चले गए हों. ऐसी ही कई घटनाएँ हुईं, पर राजू पर किसी का स्थायी अधिकार निश्चित न हो सका. उसकी ‘सेवाओं’ की ‘उपयोग-संबंधी खींचातानी’ से उसका ‘समाजीकरण’ हो गया. ‘सोसाइटी’ का कोई भी व्यक्ति उसे ‘दस-बीस हजार’ रुपये देकर स्थायी रूप से ‘नौकर’ रखने को तैयार न हुआ, क्योंकि वह इतना ‘एनर्जी एफिशिएंट’ कतई न था कि चौबीस घंटे ‘नौकर’ की महान जिम्मेदारियां संभल सके. वह तेजी के साथ ‘पच्चीस-पचास लीटर पानी’ न भर सकता था, ‘ऑनलाइन’ दौड़कर भारी ‘सामान-सौदा’ न ला सकता था, अतएव लोग उससे छोटा-मोटा ‘डिजिटल वर्क’ ले लेते और इच्छानुसार उसे कुछ-न-कुछ दे देते, मानो राजू कोई ‘फ्रीलांसर’ हो, जिसे ‘पार्ट-टाइम’ काम मिलता हो, वो भी ‘पे-पर-टास्क’ बेसिस पर. अब न वह दानीश अरोड़ा के यहाँ टिकता और न मिस्टर गुप्ता के यहाँ, क्योंकि उसको कोई टिकने ही न देता. इसको राजू ने भी समझ लिया और ‘सोसाइटी’ के लोगों ने भी. वह अब किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं, बल्कि सारे ‘सोसाइटी’ का ‘सर्विस प्रोवाइडर’ हो गया, मानो उसे ‘सोसाइटी का सरकारी कर्मचारी’ घोषित कर दिया गया हो, वो भी ‘कॉन्ट्रैक्ट बेसिस’ पर.
राजू के लिए छोटे-मोटे कामों की कमी न थी, मानो उसने ‘गरीबी में अवसर’ का ‘ऐप’ ढूंढ लिया हो, वो भी ‘प्ले स्टोर’ पर. किसी के यहाँ खा-पीकर वह बाहर की ‘गार्ड रूम की कुर्सी’ या ‘फुटपाथ’ पर सो रहता और सवेरे उठता तो ‘सोसाइटी’ के लोग उसका ‘मुँह जोहते’, जैसे वो ‘सुबह का न्यूज़लेटर’ हो, वो भी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के साथ. ‘हाउस हेल्प’ किसी के यहाँ बहुत दिनों तक टिकते नहीं थे और वे भाग-भागकर ‘कैब’ चलाने लगते या किसी ‘ई-कॉमर्स वेयरहाउस’ में काम करने लगते, मानो ‘नौकरी छोड़कर अपना ‘राइड-शेयरिंग बिजनेस’ शुरू कर रहे हों, वो भी ‘नो-कमीशन’ पर. दो-चार व्यक्तियों के यहाँ ही ‘फुल-टाइम हेल्प’ थे, अन्य घरों में ‘वॉटर सप्लायर’ पानी भर देता, लेकिन वह ‘कैन’ के हिसाब से पानी देता और यदि एक ‘कैन’ भी अधिक दे देता तो उसका ‘मेहनताना’ पाई-पाई वसूल कर लेता, मानो वो ‘कॉन्ट्रैक्ट’ पर काम करता हो, वो भी ‘टीडीएस’ काटकर. इस स्थिति में राजू का आगमन जैसे ‘ईश्वर’ का ‘वरदान’ था, मानो ‘सोसाइटी का संकटमोचक’ आ गया हो, वो भी ‘फ्री डिलीवरी’ के साथ. लोग उससे छोटा-बड़ा काम लेकर इच्छानुसार उसकी ‘मजदूरी’ चुका देते. यदि उसने कोई छोटा काम किया तो उसे ‘बचे हुए पिज़्ज़ा स्लाइस’ या ‘पुरानी बर्गर’ या ‘भुना हुआ कॉर्न’ या ‘प्रोटीन बार’ दे दिया जाता और वह एक कोने में बैठकर चापुड़-चापुड़ खा-फाँक लेता, मानो उसे ‘लंच पैकेज’ मिल गया हो, वो भी ‘कॉम्प्लिमेंट्री’. अगर कोई बड़ा काम कर देता तो एक ‘शिफ्ट’ का खाना मिल जाता, पर उसमें अनिवार्य रूप से एकाध चीज ‘बासी’ रहती और कभी-कभी ‘वेजिटेबल करी’ या ‘दाल’ नदारत होती, मानो उसे ‘डिस्काउंटेड मील’ मिलता हो, वो भी ‘एक्सपायरी डेट’ के साथ. कभी ‘चावल-नमक’ मिल जाता, जिसे वह पानी के साथ खा जाता. कभी-कभी ‘रोटी-अचार’ और कभी-कभी तो सिर्फ़ ‘वेजिटेबल करी’ ही खाने या ‘दाल सूप’ पीने को मिलती. कभी खाना न होने पर ‘सौ-दो सौ रुपये’ मिल जाते या मोटा-पुराना ‘राशन’ या ‘दाल’ या ‘चार-छः आलू’. कभी ‘क्रेडिट’ भी चलता, मानो वो ‘डिजिटल वॉलेट’ यूज करता हो, वो भी ‘नो-केवाईसी’ पर. वह काम कर देता और उसके एवज में फिर किसी दिन कुछ-न-कुछ पा जाता, मानो उसे ‘ईएमआई’ पर पेमेंट मिलती हो, वो भी ‘जीरो इंटरेस्ट’ पर. इसी बीच वह मेरे घर भी आने लगा था, क्योंकि मेरी श्रीमतीजी ‘बुद्धि’ के मामले में किसी से पीछे न थीं, मानो उन्होंने ‘एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी ‘आइक्यू’ का सर्टिफिकेट ले रखा हो, वो भी ‘गोल्ड मेडल’ के साथ. राजू आता और काम करके चला जाता. एक-दो बार मुझसे भी ‘इंटरेक्शन’ हुआ, पर कुछ बोला नहीं. कोई ‘वीकेंड’ का दिन था. मैं बाहर बैठा एक ‘ई-बुक’ पढ़ रहा था कि इतने में राजू भीतर आया और कोने में बैठकर कुछ खाने लगा. मैंने घूमकर एक निगाह उस पर डाली. उसके हाथ में एक ‘रोटी’ और थोड़ा-सा ‘पिकल’ था और वह ‘भूखे भेड़िये’ की भाँति चापुड़-चापुड़ खा रहा था, मानो उसे ‘फाइव स्टार होटल’ का खाना मिल गया हो, वो भी ‘फ्री ऑफ कॉस्ट’. बीच-बीच में वह मुस्कुरा पड़ता, जैसे कोई बड़ी ‘सक्सेस’ हासिल करके बैठा हो, मानो उसने ‘जीवन की दौड़’ में ‘गोल्ड मेडल’ जीत लिया हो, वो भी ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ के साथ.
मैं उसकी ओर देखता रहा और मुझे वह दिन याद आ गया, जब ‘साइबर चोरी’ के अभियोग में उसकी पिटाई हुई थी. उस दिन की पिटाई से उसके चेहरे पर जो ‘डार्क सर्कल्स’ थे, वे आज भी ‘अनमोल’ लग रहे थे, मानो वो ‘ब्लैक होल’ हों. जब वह खाकर उठा तो मैंने पूछा, “क्यों रे राजू, तेरा ‘नेटिव प्लेस’ कहाँ है?” वह सकपकाकर खड़ा हो गया, फिर मुँह टेढ़ा करके बोला, “सर, ‘रिमोट विलेज’ का रहनेवाला हूँ!” और उसने दाँत निपोर दिये, मानो उसने कोई ‘राष्ट्रीय रहस्य’ बता दिया हो, वो भी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के साथ. “‘गांव’ छोड़कर यहाँ क्यों चला आया?” मैंने पुनः प्रश्न किया. क्षण-भर वह असमंजस में मुझे खड़ा ताकता रहा, फिर बोला, “‘पहले’ ‘टियर 2 सिटी’ में था, सर!” जैसे ‘रिमोट विलेज’ से सीधे ‘मेट्रो सिटी’ आना कोई अपराध हो. उसके लिए संभवतः ‘क्यों’ का कोई महत्व नहीं था, जैसे ‘गांव छोड़ने’ का जो भी कारण हो, वह अत्यंत सामान्य एवं स्वाभाविक था और वह न उसके बताने की चीज थी और न किसी के समझने की, मानो उसने ‘जीवन का दर्शन’ हमें ‘कोड’ में समझा दिया हो, वो भी ‘ओपन सोर्स’ में. “‘रिमोट विलेज’ में कोई है तेरा?” मैंने एक-दो क्षण उसको ग़ौर से देखने के बाद दूसरा सवाल किया. “नहीं सर, ‘पैरेंट्स’ और दो ‘सिस्टर्स’ थीं, ‘महामारी’ में मर गईं.” वह फिर दाँत निपोरकर हँस पड़ा, मानो उसने ‘दुख’ को भी ‘मीम’ में बदल दिया हो, वो भी ‘वायरल मीम’ में. उसके बाद मैंने कोई प्रश्न नहीं किया. हिम्मत नहीं हुई. वह फौरन वहाँ से सरक गया और मेरा हृदय कुछ अजीब-सी घृणा से भर उठा. उसकी खोपड़ी किसी ‘पुराने कंप्यूटर’ के ‘कूलिंग फैन’ की भाँति हिल-डुल रही थी, जो ‘ओवरहीट’ हो रहा हो. हाथ-पैर पतले, पेट अब भी ‘खाली हार्ड ड्राइव’ की तरह फूला हुआ और सारा शरीर निहायत गंदा एवं घृणित… मेरी इच्छा हुई, जाकर बीवी से कह दूँ कि इससे काम न लिया करो, यह ‘संक्रमित’… फिर टाल गया, क्योंकि इसमें मेरा ही घाटा था. मैं जानता था कि ‘हाउस हेल्प’ की कितनी किल्लत थी और राजू के रहने से इतना आराम हो गया था कि मैं हर पहली या दूसरी तारीख को ‘ऑनलाइन ग्रोसरी’ खरीदकर महीने-भर के लिए निश्चिंत हो जाता, मानो राजू कोई ‘फ्री का ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ हो जो मेरे सारे काम कर देता हो, वो भी ‘नो-चार्ज’ पर. “‘जस्टिस फॉर ऑल’! ‘ह्यूमन राइट्स जिंदाबाद’!” कुछ महीने बाद एक दिन जब मैं अपने कमरे में बैठा था कि मुझे राजू के नारे लगाने और फिर ‘ही-ही’ हँसने की आवाज सुनाई दी, मानो उसने ‘सामाजिक क्रांति’ का ‘नया अपडेट’ लॉन्च कर दिया हो, वो भी ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ पर. मैं चौंका और मैंने सुना, आँगन में पहुँचकर वह जोर से कह रहा है, “‘मैम’, थोड़ा ‘नमक’ होगा, ‘फूड बैंक’ से ‘रोटियाँ’ मिल गई हैं, ‘दाल’ बनाऊँगा.” मेरी पत्नी ‘किचन’ में लगी हुई थी. उसने कुछ देर बाद उसको ‘नमक’ देते हुए पूछा, “राजू, सच बताना, तुझे ‘नहाये’ हुए कितने दिन हो गए?” “‘फेस्टिवल’ की ‘फेस्टिवल’ नहाता हूँ न, ‘मैम’!” वह ‘नमक’ लेकर बोला और हँसते हुए भाग गया, मानो उसने ‘स्वच्छता के सारे प्रोटोकॉल’ तोड़ दिये हों, वो भी ‘रिकॉर्ड टाइम’ में.
मैं कमरे में बैठा यह सब सुन रहा था. संभवतः उसको मेरी ‘उपस्थिति’ का ज्ञान न था, अन्यथा वह ऐसी बातें न करता. लेकिन यह बात साफ थी कि अब वह ‘सोसाइटी’ में जम गया है. उसको खाने-पीने की चिंता नहीं है, मानो उसने ‘जीवन बीमा’ का ‘प्रीमियम’ भर दिया हो, वो भी ‘लाइफटाइम’ के लिए. इतना ही नहीं, अब वह ‘सोसाइटी’-भर से ‘शह’ पा रहा है. लोग अब उससे हँसी-मजाक भी करने लगे हैं और उसे ‘पीट-पाट’ जाने का किंचित मात्र भी भय नहीं, मानो उसे ‘इम्युनिटी बूस्टर’ का ‘लेटेस्ट वर्जन’ मिल गया हो, वो भी ‘फ्री ऑफ कॉस्ट’. अवश्य यही बात थी और वह स्थिति में परिवर्तन से लाभ उठाते हुए ढीठ हो गया था. इसीलिए उसने अपने आगमन की सूचना देने के लिए ‘राजनीतिक नारे’ लगाए थे, जैसे वह कहना चाहता हो कि मैं हँसी-मजाक का विषय हूँ, लोग मुझसे मजाक करें, जिससे मेरे हृदय में हिम्मत और ढाढ़स बँधे, मानो वो कोई ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ बन गया हो, वो भी ‘मिलियन फॉलोअर्स’ के साथ. मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ. लेकिन कुछ ही दिन बाद मैंने उसकी एक और हरकत देखी, जिससे मेरे अनुमान की पुष्टि होती थी. सायंकाल दफ्तर से आ रहा था कि ‘कम्युनिटी गार्डन’ के पास मैंने राजू की आवाज सुनी. ‘रेहाना’ की स्त्री ‘बर्तन माँज’ रही थी और उसके पास खड़ा राजू टेढ़ा मुँह करके बोल रहा था, “‘सलाम’ हो ‘भाभी’, ‘अपडेट’ है न!” अंत में बेमतलब ‘ही-ही’ हँसने लगा, मानो उसने ‘नया वायरल जोक’ मार दिया हो, वो भी ‘ट्रेंडिंग’ में. ‘रेहाना’ की बहू ने थोड़ी मुस्की काटते हुए सुनाया, “दूर हो ‘वायरस’, ‘समाचार’ पूछने का तेरा ही मुँह है? चला जा, नहीं तो ‘साइबर बुलीइंग’ का ‘केस’ चलाकर वह ‘मारूँगी’ कि सारी ‘लफंगई’…” यहाँ उसने एक ‘मॉडर्न मुहावरे’ का इस्तेमाल किया. लेकिन, मालूम पड़ता है कि राजू इतने ही से खुश हो गया, क्योंकि वह मुँह फैलाकर हँस पड़ा और फिर तुरंत उसने दो-तीन बार सिर को ऊपर झटका देते हुए ऐसी किलकारियां लगाईं जैसे ‘घास चरता हुआ गदहा’ अचानक सिर उठाकर ‘ढीचूँ-ढीचूँ’ कर उठता है, मानो उसने ‘ऑस्कर’ जीत लिया हो, वो भी ‘बेस्ट कॉमेडी’ के लिए. फिर तो यह उसकी आदत हो गई. सारे ‘सोसाइटी’ की ‘सर्विस क्लास’ की औरतों से उसने ‘भाभी’ का संबंध जोड़ लिया था, मानो वो ‘रिलेशनशिप मैनेजर’ हो, वो भी ‘ह्यूमन रिसोर्स’ में. उनको देखकर वह कुछ हल्की-फुल्की ‘छेड़खानी’ कर देता और तब वह ‘गधे’ की भाँति ‘ढीचूँ-ढीचूँ’ कर उठता, मानो ये उसका ‘सिग्नेचर ट्यून’ हो, वो भी ‘रिंगटोन’ के लिए. ‘जिम’ में पहुँचकर वह किसी औरत को ‘कनखी’ से निहारता और अंत में पूछ बैठता, “यह कौन है? अच्छा, ‘बड़ी भाभी’ हैं? ‘सलाम’, ‘भाभी’. ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड मॉर्निंग’, ‘पैसा कमाना अपना, बाकी सब पराया’.” इतना कह वह दुष्टतापूर्वक हँस पड़ता, मानो वो कोई ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ हो, वो भी ‘सेल्फ-हेल्प गुरु’. वह किसी काम से जा रहा होता, पर रास्ते में किसी औरत को ‘बर्तन माँजते’ या अपने दरवाजे पर बैठे हुए या कोई काम करते हुए देख लेता तो एक-दो मिनट के लिए वहाँ पहुँच जाता, ‘बेहया’ की तरह हँसकर ‘कुशल-क्षेम’ पूछता और अंत में ‘झिड़की-गाली’ सुनकर किलकारियां मारता हुआ वापस चला जाता, मानो उसे ‘पब्लिक का अटेंशन’ मिल गया हो, वो भी ‘फ्री पब्लिसिटी’ के साथ. धीरे-धीरे वह इतना ‘ढीठ’ हो गया कि ‘सर्विस क्लास’ की किसी ‘जवान स्त्री’ को देखकर, चाहे वह जान-पहचान की हो या न हो, दूर से ही हिचकी दे-देकर किलकने लगता, मानो वो ‘सोसाइटी का चिढ़ाने वाला’ बन गया हो, वो भी ‘प्रोफेशनल चिढ़ाने वाला’.
मेरी तरह ‘सोसाइटी’ के अन्य लोगों ने भी उसके इस परिवर्तन पर ग़ौर किया था और संभवतः इसी कारण लोग उसे राजू से ‘राजू साला’ कहने लगे, मानो उसका ‘ब्रांड नेम’ बदल गया हो, वो भी ‘अनऑफिशियल’ तरीके से. अब कोई बात कहनी होती, कितने गंभीर काम के लिए पुकारना होता, लोग उसे ‘राजू साला’ कहकर बुलाते और अपने काम की ‘फरमाइश’ करके हँस पड़ते. उनकी देखा-देखी ‘टीनेजर्स’ भी ऐसा ही करने लगे, जैसे ‘साला’ कहे बिना राजू का कोई ‘अस्तित्व’ ही न हो और इससे राजू भी बड़ा प्रसन्न था, जैसे इससे उसके जीवन की ‘अनिश्चितता’ कम हो रही हो और उस पर अचानक कोई ‘संकट’ आने की संभावना संकुचित होती जा रही हो, मानो ‘साला’ शब्द उसके लिए ‘लकी चार्म’ हो, वो भी ‘सुपर-लकी’. और अब लोग उसे ‘चिढ़ाने’ भी लगे. “क्यों बे राजू साला, ‘मैरिज’ करेगा?” लोग उसे छेड़ते. राजू उनकी बातों पर ‘खी-खी’ हँस पड़ता और फिर अपनी आदत के अनुसार सिर को ऊपर की ओर दो-तीन बार झटके देता हुआ तथा मुँह से ऐसी हिचकी की आवाज निकालता हुआ, जो अधिक कड़वी चीज खाने पर निकलती है, चलता बनता, मानो वो ‘कॉमेडी सर्कस’ का ‘स्टार परफॉर्मर’ हो, वो भी ‘स्टैंडिंग ओवेशन’ के साथ. वह समझ गया था कि लोग उसे देखकर खुश होते हैं और अब वह सड़क पर चलते, ‘लेन’ से गुजरते, घर में घुसते, काम की ‘फरमाइश’ लेकर घर से निकलते और ‘स्मार्ट वॉटर स्टेशन’ पर पानी भरते समय जोरों से चिल्लाकर उस समय के प्रचलित ‘राजनीतिक नारे’ लगाता या ‘मोटिवेशनल कोड्स’ बोलता या किसी सुनी हुई ‘रैप सॉन्ग’ या ‘वायरल वीडियो’ की एक-दो पंक्तियाँ गाता, मानो वो कोई ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ हो, वो भी ‘मिलियन व्यूज’ के साथ. ऐसा करते समय वह किसी की ओर देखता नहीं, बल्कि टेढ़ा मुँह करके जमीन की ओर देखता मुँह फैलाकर हँसे जाता, जैसे वह ‘दिमाग की आँखों’ से देख रहा हो कि उसकी हरकतों को बहुत-से लोग देख-सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं, मानो वो ‘पब्लिक का एंटरटेनर’ हो, वो भी ‘लाइव ऑडियंस’ के साथ.
सायंकाल दफ्तर से आने और ‘स्नैक्स’ करने के बाद मैं ‘वॉक’ पर निकल जाता हूँ. ‘मेट्रो स्टेशन’ पकड़कर ‘आईटी पार्क’ की ओर जाना मुझे सबसे अच्छा लगता है. ‘लेक’ पार करके ‘मॉल’ के किनारे घूमना-टहलना कम आनंददायी नहीं है, लेकिन उसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि बरसात में दोनों ‘पानी’ से बढ़कर ‘बाढ़’ का रूप ले लेती हैं और जाड़े में इतने ‘पॉटहोल्स’ मिलते हैं कि जाने की हिम्मत नहीं होती. लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मुझे देर हो जाती है या अधिक चलने-फिरने की कोई इच्छा नहीं होती और ‘मेट्रो स्टेशन’ के ‘प्लेटफार्म’ का चक्कर लगाकर वापस लौट आता हूँ, मानो मैं ‘मौसम का गुलाम’ हो, वो भी ‘फोरकास्ट’ के बिना. पंद्रह-बीस दिन के बाद एक दिन सायंकाल ‘मेट्रो स्टेशन’ के ‘प्लेटफार्म’ पर टहलने लगा. ‘मेट्रो स्टेशन’ के ‘गेट’ से ‘प्लेटफार्म’ पर आने के बाद मैं बायीं तरफ ‘मेट्रो पुलिस’ की चौकी की ओर बढ़ चला किंतु कुछ क़दम ही चला था कि मेरा ध्यान राजू की ओर गया, जो मुझसे कुछ दूर आगे था. वह भी उधर ही जा रहा था. मुझे कुछ आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि शहर के काफी लोग ‘पब्लिक टॉयलेट्स’ के लिए ‘अंडरपास’ जाते थे, जो ‘मेट्रो स्टेशन’ के पास ही बहता है, मानो वो ‘खुले शौचालय’ का ‘सरकारी टूरिस्ट स्पॉट’ हो, वो भी ‘गाइड’ के साथ. मैं धीरे-धीरे चलने लगा. पर राजू ‘अंडरपास’ नहीं गया, बल्कि ‘मेट्रो पुलिस’ की चौकी के पास कुछ ठिठककर खड़ा हो गया. अब मुझे कुछ आश्चर्य हुआ. क्या वह किसी मामले में ‘पुलिसवालों’ के चक्कर में आ गया है? मेरी समझ में कुछ न आया और उत्सुकतावश मैं तेज चलने लगा. आगे बढ़ने पर स्थिति कुछ-कुछ समझ में आने लगी. चौकी के सामने एक बेंच पर बैठे पुलिस के दो-तीन ‘सिक्योरिटी गार्ड’ कोई हँसी-मजाक कर रहे थे और उनसे थोड़ी ही दूरी पर नीचे एक नंगी ‘महिला’ बैठी हुई थी. वह ‘महिला’ और कोई नहीं, एक ‘डिजिटल देवी’ थी, जो कई दिनों से शहर का चक्कर काट रही थी, मानो वो ‘मानसिक स्वास्थ्य’ का ‘चलचित्र’ हो, वो भी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में. उसको मैंने कई बार ‘मार्केट’ में तथा एक बार ‘लेक’ के किनारे देखा था. उसकी उम्र लगभग तीस वर्ष होगी और वह ‘बदसूरत’, ‘काली’ तथा निहायत ‘गंदी’ थी, मानो ‘प्रकृति’ ने उसे ‘श्राप’ दिया हो, वो भी ‘हाई-डेफिनिशन’ में. वह जहाँ जाती, कुछ ‘लफंगे’ ‘हा-हू’ करते उसके पीछे हो जाते. वे उसको चिढ़ाते, उस पर ‘प्लास्टिक की बोतलें’ फेंकते और जब वह तंग आकर चीखती-चिल्लाती भागती तो लड़के उसके पीछे दौड़ते, मानो वो कोई ‘सरकारी टारगेट’ हो, वो भी ‘लाइव चेज़’ में. राजू उस ‘डिजिटल देवी’ के पास ही खड़ा था. वह कभी शंकित आँखों से पुलिसवालों को देखता, फिर मुँह फैलाकर हँस पड़ता और ‘टकटकी’ लगाकर ‘डिजिटल देवी’ को ताकने लगता. परंतु पुलिसवाले संभवतः उसकी ओर ध्यान न दे रहे थे, मानो उन्होंने ‘एंटरटेनमेंट टैक्स’ माफ कर दिया हो, वो भी ‘लाइफटाइम’ के लिए. मुझे बड़ी शर्म मालूम हुई, किंतु मैं इतना समीप पहुँच गया था कि अचानक घूमकर लौटना संभव न हो सका. असली बात जानने की उत्सुकता भी थी. मैं ‘शून्य’ की ओर देखता हुआ आगे बढ़ा, लेकिन लाख कोशिश करने पर भी दृष्टि उधर चली ही जाती, मानो ‘मन’ ने ‘आँखों’ को ‘कब्जे’ में ले लिया हो, वो भी ‘रिमोट कंट्रोल’ से. राजू शायद पुलिसवालों की लापरवाही का फायदा उठाते हुए आगे बढ़ गया था और सिर नीचे झुकाकर अत्यंत ही प्रसन्न होकर हँसते हुए पुचकारती आवाज में पूछ रहा था, “क्या है ‘मैडम’, ‘बिरयानी’ खाओगी?” इतने में पुलिसवालों में से एक ने कड़ककर प्रश्न किया, “कौन है बे साला, चलता बन, नहीं तो ‘मारते-मारते’ ‘सूप’ बना दूँगा.” राजू वहाँ से थोड़ा हट गया और हँसते हुए बोला, “सर, मैं राजू हूँ.” “भाग जा साले, ‘गिद्ध’ की तरह न मालूम कहाँ से आ पहुँचा.” संभवतः दूसरे सिपाही ने कहा और फिर वे सभी ठहाका मारकर हँस पड़े, मानो उन्होंने ‘कॉमेडी शो’ देख लिया हो, वो भी ‘फ्री पास’ पर. मैं अब काफी आगे निकल गया था और इससे अधिक मुझे कुछ सुनाई न पड़ा. मैं जल्दी-जल्दी ‘प्लेटफार्म’ से बाहर निकल गया. किंतु, मामला यहीं समाप्त नहीं हो गया. घर आकर मैंने आँगन में ‘योगा मैट’ डाल, बड़ी मुश्किल से आधा घंटा आराम किया होगा कि मेरी पत्नी भागती हुई आई और कुछ मुस्कुराती हुई तेजी से बोली, “अरे, जरा जल्दी से बाहर आइए तो, एक ‘तमाशा’ दिखाती हूँ. हमारी कसम, जरा जल्दी उठिए.” मैं अनिच्छापूर्वक उठा और बाहर आकर जो दृश्य देखा उससे मेरे हृदय में एक ही साथ आश्चर्य एवं घृणा के ऐसे भाव उठे जिन्हें मैं व्यक्त नहीं कर सकता, मानो मेरे ‘अंदर’ कोई ‘भूत’ घुस गया हो, वो भी ‘हाई-स्पीड’ में. राजू ‘मेट्रो स्टेशन’ की नंगी ‘डिजिटल देवी’ के आगे-आगे आ रहा था. ‘डिजिटल देवी’ कभी इधर-उधर देखने लगती या खड़ी हो जाती तो राजू पीछे होकर ‘डिजिटल देवी’ की अँगुली पकड़कर थोड़ा आगे ले आता और फिर उसे छोड़कर थोड़ा आगे चलने लगता तथा पीछे घूम-घूमकर ‘डिजिटल देवी’ से कुछ कहता जाता. इसी तरह वह ‘डिजिटल देवी’ को सड़क की दूसरी ओर स्थित ‘स्टाफ क्वार्टरों’ की छत पर ले गया, मानो राजू कोई ‘गाइड’ हो और ‘डिजिटल देवी’ उसकी ‘टूरिस्ट’, वो भी ‘वीआईपी टूर’ पर. वे ‘क्वार्टर’ मेरे मकान के सामने दूसरी ‘लाइन’ पर बने थे और वे एक-दूसरे से सटे थे. उनकी छतें खुली थीं और उन पर ‘सोसाइटी’ के लोग जाड़े में धूप लिया करते और गर्मी में रात को ‘लावारिस’ ‘स्ट्रीट आर्टिस्ट्स’ सोया करते थे, मानो वो ‘खुला स्टूडियो’ हो, वो भी ’24/7′ एक्सेस के साथ. तभी राजू नीचे उतरा, किंतु ‘डिजिटल देवी’ उसके साथ न थी. हम लोगों की उत्सुकता बढ़ गई थी कि देखें, वह आगे क्या करता है, मानो कोई ‘सस्पेंस थ्रिलर’ चल रहा हो, वो भी ‘क्लाइमेक्स’ के साथ. हम लोग वहीं खड़े रहे और राजू तेजी से ‘मेट्रो स्टेशन’ की ओर गया तथा कुछ ही देर में वापस भी आ गया. इस बार उसके हाथ में एक ‘फूड पैकेज’ था. ‘फूड पैकेज’ लेकर वह ऊपर चढ़ गया और हम समझ गए कि वह ‘डिजिटल देवी’ को खिलाने के लिए ‘फूड आउटलेट’ से कुछ लाया है, मानो वो ‘भूखों का मसीहा’ हो, वो भी ‘फूड डिलीवरी ऐप’ के साथ. इसके बाद दो-तीन दिन तक राजू को मैंने ‘सोसाइटी’ में नहीं देखा. उस दिन की घटना से हृदय में एक उत्सुकता बनी हुई थी, इसलिए एक दिन मैंने अपनी पत्नी से पूछा, “क्या बात है, राजू आजकल दिखायी नहीं देता. अब यहाँ नहीं आता क्या?” पत्नी ने थोड़ा चौककर उत्तर दिया, “अरे, आपको नहीं मालूम, उसको किसी ने बुरी तरह ‘पीट’ दिया है और वह ‘अस्पताल’ में पड़ा हुआ है.” मानो उसे ‘पुरस्कार’ मिल गया हो, वो भी ‘इमरजेंसी वार्ड’ में. “क्यों, क्या बात है?” मैंने अपनी उत्सुकता प्रकट किये बिना धीमे स्वर में पूछा. पत्नी ने मुस्कुराकर बताया, “अरे, वही बात है. राजू उस ‘डिजिटल देवी’ को छत पर छोड़ ‘नरेश बाबू’ के यहाँ काम करने लगा. ‘नरेश बाबू’ की स्त्री बताती हैं कि वह उस दिन बड़ा गंभीर था और काम करते-करते चहककर जैसे किलकारी मारता है, वैसे नहीं करता था. उसकी तबीयत काम में नहीं लगती थी. वह एक काम करता और मौका देख कोई बहाना बनाकर ‘क्वार्टर’ की छत पर जाकर ‘डिजिटल देवी’ का समाचार ले आता, मानो वो ‘डबल एजेंट’ हो, वो भी ‘सीक्रेट मिशन’ पर. ‘नरेश बाबू’ की स्त्री ने जब उसे खाना दिया तो उसने वहाँ भोजन नहीं किया, बल्कि खाने को एक ‘कागज’ में लपेटकर अपने साथ लेता गया. उसने वह खाना खुद थोड़े खाया, बल्कि उसको वह ऊपर छत पर ले गया. रात के करीब ग्यारह बजे की बात है. राजू जब ऊपर पहुँचा तो देखा कि ‘डिजिटल देवी’ के पास कोई दूसरा सोया है. उसने आपत्ति की तो उसको उस ‘लफंगे’ ने खूब पीटा और ‘डिजिटल देवी’ को लेकर कहीं दूसरी जगह चला गया.” मानो ‘प्यार में धोखा’ मिल गया हो, वो भी ‘ऑनलाइन डेटिंग’ में.
“तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ?” मेरा हृदय एक अनजान क्रोध से भरा आ रहा था, मानो कोई ‘जालसाजी’ का पर्दाफाश हुआ हो, वो भी ‘लाइव टीवी’ पर. “मिसेज चावला बता रही थी.” पत्नी ने उत्तर दिया और अकारण ही हँस पड़ी, मानो उसे ‘गॉसिप’ का ‘नया मसाला’ मिल गया हो, वो भी ‘एक्सक्लूसिव’. बहुत दिन हो गए थे. गर्मी का मौसम था और भयंकर ‘हीटवेव’ चलना शुरू हो गई थी. छत पर मार खाने के चार-पाँच दिन बाद राजू फिर ‘सोसाइटी’ में आकर काम करने लगा था. लेकिन उसमें एक जबरदस्त परिवर्तन यह हुआ कि उसका ‘महिलाओं’ के साथ ‘छेड़खानी’ करके ‘गधे’ की भाँति हिचकना-किलकना बंद हो गया, मानो उसने ‘सभ्यता का पाठ’ पढ़ लिया हो, वो भी ‘कंपलसरी कोर्स’ में. “राजू ने आजकल दाढ़ी क्यों रख छोड़ी है?” मैंने पत्नी से पूछा. राजू की बात छिड़ने पर मेरी बीवी अवश्य हँस देती. मुस्कुराकर उसने उत्तर दिया, “आजकल वह ‘भगत’ हो गया है. मिसेज चावला को उसके ‘कृत्य’ की सजा देने को उसने दाढ़ी बढ़ा ली है और रोजाना ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ पर ‘जल’ चढ़ाता है”, मानो उसने ‘धर्म’ का ‘नया रास्ता’ ढूंढ लिया हो, वो भी ‘शॉर्टकट’ में. मेरे प्रश्नसूचक दृष्टि से देखने पर पत्नी ने अपनी बात स्पष्ट की, “बात यह है कि राजू पिछले महीनों से रात को मिसेज चावला के यहाँ ही सोता था और उससे ‘बुआ’ का रिश्ता भी उसने जोड़ लिया था. राजू ‘दो-चार सौ रुपये’ जो कुछ कमाता, वह अपनी ‘बुआ’ के यहाँ जमा करता जाता. वह बताता है कि इस तरह करते-करते ‘दस हजार रुपये’ तक इकट्ठे हो गए हैं. एक बार उसने मिसेज चावला से अपने रुपये माँगे तो वह इनकार कर गई कि उसके पास राजू की एक पाई भी नहीं. राजू के दिल को इतनी चोट लगी कि उसने दाढ़ी रख ली. वह कहता है कि जब तक मिसेज चावला को ‘कोढ़’ न फूटेगा, वह दाढ़ी न मुड़ायेगा. इसी काम के लिए वह ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ पर रोज ‘जल’ भी चढ़ाता है”, मानो वो ‘बदले की आग’ में जल रहा हो, वो भी ‘हाई फ्लेम’ पर. ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ का जहाँ तक संबंध है, मुझे अब ख्याल आया. ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ अपने जमाने के एक ‘प्रचंड सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ थे. ‘ताड़का’ की तरह ‘लंबे-तगड़े’ और ‘ऑनलाइन डिबेट’ में उस्ताद. वह किसी से भी नहीं डरते थे और नित्य ही किसी-न-किसी से ‘मोर्चा’ लेते थे. एक बार किसी ‘ऑनलाइन लड़ाई’ में एक ‘ट्रोल’ ने ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ की ‘प्रोफाइल’ पर एक ‘रिपोर्ट’ जमा दी, जिससे उनका ‘अकाउंट’ ‘सस्पेंड’ हो गया. लेकिन एक-डेढ़ हफ्ते बाद ही उस ‘ट्रोल’ के ‘कंप्यूटर’ में ‘वायरस’ निकल आया और वह ‘क्रैश’ हो गया. लोगों ने उसकी ‘मृत्यु’ का कारण ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ का प्रकोप समझा. ‘फॉलोअर्स’ ने श्रद्धा में उनका ‘ऑनलाइन टेंपल’ बना दिया और तब से वह ‘निचले तबके’ में ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ या ‘महागुरु’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे, मानो उसे ‘भगवान’ का ‘स्टेटस’ मिल गया हो, वो भी ‘डिजिटल’ तरीके से. मैं कुछ नहीं बोला, लेकिन पत्नी ने संभवतः कुछ उदास स्वर में कहा, “उसको आजकल थोड़ा ‘बुखार’ रहता है. उसका विश्वास है कि मिसेज चावला ने उस पर ‘ब्लैक मैजिक’ कर दिया है. वह कहता है कि ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ बहुत ‘चलती देवी’ हैं. अरे, एक महीने में ही मिसेज चावला ‘कोढ़’ से फूट-फूटकर मरेगी.” मानो राजू ‘अंधविश्वास का शिकार’ हो गया हो, वो भी ‘मॉडर्न वर्जन’ में.
पता नहीं, उसका ‘ज्वर’ टूटा कि नहीं, मैंने जानने की कोशिश भी नहीं की. बीमार तो वह सदा ही का था. सोचा, शायद उतर गया हो, क्योंकि काम तो वह उसी तरह कर रहा था. हाँ, बीच में उसके चेहरे पर जो चुस्ती और खुशी चमक-चमक उठती, वह तिरोहित हो गई थी. न वह उतना चहकता था, न उतना बोलता था. अपेक्षाकृत वह अधिक गंभीर और सुस्त हो गया, मानो उसकी ‘जिंदगी की बैटरी’ डिस्चार्ज हो गई हो, वो भी ‘परमानेंटली’. उसकी रुचि ‘धर्म’ की ओर मुड़ गई और ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ की मन्नत मानते वह अच्छा-भला ‘भगत’ बन बैठा, मानो उसे ‘अध्यात्म’ में ‘मोक्ष’ मिल गया हो, वो भी ‘इंस्टेंट’ तरीके से. मेरे घर के सामने, सड़क की दूसरी ओर ‘क्वार्टर’ में एक ‘ऑनलाइन पंडितजी’ रहते हैं. यों तो वह ‘सेकंड हैंड गैजेट्स’ बेचते हैं, लेकिन साथ-साथ ‘सत्तू-नमक-तेल’ वगैरह भी रखते हैं. फलस्वरूप उनके यहाँ ‘कैब ड्राइवर्स’ और ‘डिलीवरी बॉयज’ की भीड़ लगी रहती है, जो ‘पंडितजी’ के यहाँ से ‘सत्तू’ लेकर अपनी भूख मिटाते हैं और उनकी दुकान के छायादार ‘वाई-फाई’ के नीचे पाँच-दस मिनट विश्राम करते हुए ‘ठट्ठा-मजाक’ भी करते हैं. रात को वहीं उनकी ‘मजलिस’ लगती है, मानो वो ‘मोहल्ले का सोशल क्लब’ हो, वो भी ‘फ्री वाई-फाई’ के साथ. उस रात गर्मी इतनी थी कि आँगन में दम घुटा जा रहा था. मैं खाने के पश्चात् ‘योगा मैट’ को घसीटते हुए लगभग सड़क के किनारे ले गया. उमस तो यहाँ भी थी, पर अपेक्षाकृत शांति मिली, मानो मैंने ‘एसी’ में ‘ठंडी हवा’ ले ली हो, वो भी ‘फुल स्पीड’ पर. मुझे लेटे हुए अभी दो-चार मिनट ही बीते होंगे कि ‘पंडितजी’ की दुकान से आती हुई आवाज सुनाई पड़ी, “तो का हो राजू ‘भगत’, ‘गुरुजी’ का कह गए हैं? ‘बजरंगबली’ ‘इंटरनेट’ में कूदते हैं तो ‘डिजिटल देवी’ का कहती हैं?” “सुनो-सुनो,” प्रश्नकर्ता कि बात के उत्तर में राजू (शायद वह ‘भगत’ कहलाने लगा था) तत्काल जोश से ऐसे बोला, जैसे आशंका हो कि यदि वह देर कर देगा तो कोई दूसरा ही बता देगा-“‘बजरंगबली’ बड़े ‘जबर’ थे. वह ‘इंटरनेट’ में कुछ दूर तक ‘सर्फ’ कर लेते हैं तो उनको ‘डिजिटल देवी’ मिलती हैं. ‘डिजिटल देवी’ अपना ‘वायरस’ दिखाती हैं तो ‘बजरंगबली’ किससे कम हैं? ये ‘मियां एढ़े’ तो हम तुमसे ‘ड्यौढ़े’, ‘बजरंगबली’ भी उतने ही बड़े हो जाते हैं. इसके बाद ‘डिजिटल देवी’ के ‘कान’ से बाहर निकल आते हैं.” मानो राजू ‘पौराणिक कथाओं का एक्सपर्ट’ हो, वो भी ‘मॉडर्न ट्विस्ट’ के साथ. “तो ए राजू ‘भगत’, ‘गांधी महात्मा’ भी तो ‘जेल’ से निकल आते हैं?” किसी दूसरे ने पूछा. राजू ने और जोर से बताया, “सुनो-सुनो, ‘गांधी महात्मा’ को ‘सरकार’ जब ‘जेल’ में डाल देती है तो एक दिन क्या होता है कि सभी ‘सिपाही-प्यादा’ के होते हुए भी ‘गांधी महात्मा’ ‘जेल’ से निकल आते हैं और सबकी आँखों पर पट्टी बँधी रह जाती है. ‘गांधी महात्मा’ सात ‘समुंदर’ पार करके जब ‘दिल्ली’ पहुँचते हैं तो ‘सरकार’ उन पर ‘गोली’ चलाती है. ‘गोली’ ‘गांधी महात्मा’ कि छाती पर लगकर सौ टुकड़े हो जाती है और ‘गांधी महात्मा’ आसमान में उड़कर गायब हो जाते हैं.” इसके पूर्व ‘महात्मा गाँधी’ की मृत्यु का ऐसा दिलचस्प किस्सा मैंने कभी नहीं सुना था, यद्यपि गाँधी की हत्या हुए चार वर्ष गुजर गए थे, मानो राजू ‘इतिहास को फिर से लिख’ रहा हो, वो भी ‘फिक्शन’ के साथ.
उसकी दाढ़ी जैसे-जैसे बढ़ती गई, राजू के ‘धर्म-प्रेम’ का समाचार भी फैलता गया. ‘निचले तबके’ के लोगों में अब वह ‘रज्जू भगत’ के नाम से पुकारा जाने लगा. बड़े लोगों में भी कोई-कोई हँसी-मजाक में उसको इस नाम से संबोधित करता, लेकिन उनके कहने पर वह शरमाकर हँसते हुए चला जाता. पर ‘छोटी जातियों’ के समाज में वह कुछ-न-कुछ ऐसी कह गुजरता जो सबसे अलग होती. अक्सर उनकी ‘मजलिसें’ रात को ‘ऑर्गेनिक कॉर्नर’ के आगे जमतीं और राजू उनसे ‘राम-सीताजी’ की चर्चा करता, ‘भूत-प्रेत’, ‘बरम-डीह’ के महत्व पर प्रकाश डालता और ‘झाड़-फूँक’, ‘मंत्र-जप’ की महत्ता समझाता. वे नाना प्रकार की शंकाएं प्रकट करते और राजू उनका समाधान करता, मानो वो कोई ‘आध्यात्मिक गुरु’ हो, वो भी ‘ऑनलाइन कंसल्टेशन’ के साथ. लेकिन इतनी धार्मिक चर्चाएं करने, ‘गुरुजी ज्ञानप्रकाश’ पर ‘जल’ चढ़ाने तथा दाढ़ी रखने के बावजूद उसकी मनोकामना पूरी न हुई. शाम को दफ्तर से लौटा ही था कि बीवी ने चिंतातुर स्वर में सूचना दी, “अरे, जानते नहीं, राजू को ‘डेंगू’ हो गया है.” उन दिनों गर्मी अपनी चरम सीमा पर थी और ‘झुग्गी-झोपड़ी’ तथा ‘गंदी नालियों’ की गली में, जो शहर के अत्यधिक गंदे स्थान थे, ‘डेंगू’ की कई घटनाएँ हो गई थीं. मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि राजू को ‘डेंगू’ न होता तो और किसको होता! मानो उसे ‘बीमारियों का चुंबक’ मिल गया हो, वो भी ‘लाइफटाइम वारंटी’ के साथ. “जिंदा है या मर गया?” मैंने उदासीन स्वर में पूछा. मेरी पत्नी ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा, “क्या बतायें, मेरा दिल छटपटाकर रह गया. वहीं ‘द अनटच्ड मॉल’ में पड़ा हुआ है. ‘उल्टी-दस्त’ से पस्त हो गया है. लोग बताते हैं कि आध-एक घंटे में मर जाएगा.” मानो उसे ‘मौत का टिकट’ मिल गया हो, वो भी ‘वन-वे’. “कोई दवा-दारू नहीं हुई?” “कौन उसका सगा बैठा है जो दवा-दारू करता? दानीश अरोड़ा के यहाँ काम कर रहा था, पर जहाँ उसको एक ‘उल्टी’ हुई कि उन लोगों ने उसको अपने यहाँ से खदेड़ दिया. फिर वह मिस्टर गुप्ता के ‘लॉबी’ में जाकर बैठ गया, लेकिन जब उन लोगों को पता लगा तो उन्होंने भी उसको भगा दिया. उसके बाद वह किसी के यहाँ नहीं गया, ‘द अनटच्ड मॉल’ में ‘पेड़’ के नीचे पड़ गया.” मानो उसे ‘अछूत’ घोषित कर दिया गया हो, वो भी ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के नाम पर. मैंने जैसे व्यंग्य किया, “तुमने अपने यहाँ क्यों न बुला लिया?” पत्नी को यह आशा नहीं थी कि मैं ऐसा प्रश्न करूँगा, इसलिए स्तंभित होकर मुझे देखते लगी. अंत में बिगड़कर बोली, “मैं उसे यहाँ बुलाती, कैसी बात करते हैं आप? मेरे भी बाल-बच्चे हैं, भगवान न करे, उनको कुछ हो गया तो?” मानो उसने ‘वायरस’ को ‘घर में बुलाने’ का ‘आरोप’ लगा दिया हो, वो भी ‘बायो-वेपन’ के नाम पर. मैं हँस पड़ा, फिर उठ खड़ा हुआ. “जरा देख आऊँ,” दरवाजे की ओर बढ़ता हुआ बोला. “आपके पैरों पड़ती हूँ, उसको छुइएगा नहीं और झटपट चले आइएगा.” पत्नी गिड़गिड़ाने लगी, मानो वो ‘छूत की बीमारी’ का ‘विज्ञापन’ कर रही हो, वो भी ‘पब्लिक सर्विस अनाउंसमेंट’ के तौर पर. जब मैं ‘द अनटच्ड मॉल’ में पहुँचा तो दो-तीन व्यक्ति सड़क के किनारे खड़े होकर राजू को निहार रहे थे. वे ‘सोसाइटी’ के नहीं, बल्कि रास्ते चलते ‘मुसाफिर’ थे, जो राजू की दशा देखकर अकर्मण्य दया एवं उत्सुकता से वहाँ खड़े हो गए थे, मानो वो कोई ‘फ्री का सर्कस’ देख रहे हों, वो भी ‘थ्री-रिंग’ वाला. “राजू?” मैंने निकट पहुँचकर पूछा. लेकिन उसको किसी बात की सुध-बुध न थी. वह ‘पेड़’ के नीचे एक गंदे ‘अंगोछे’ पर पड़ा हुआ था और उसका शरीर ‘उल्टी-दस्त’ से लथपथ था. उसकी छाती की हड्डियां और उभर आई थीं, पेट तथा आँखें धँस गई थीं और गालों में गड़हे बन गए थे. उसकी आँखों के नीचे भी गहरे काले गड़हे दिखायी दे रहे थे और उसका मुँह कुछ खुला हुआ था. पहले देखने से ऐसा मालूम होता था कि वह मर गया है, लेकिन उसकी साँस धीमे-धीमे चल रही थी, मानो ‘जिंदगी’ और ‘मौत’ के बीच ‘फुटबॉल मैच’ चल रहा हो, वो भी ‘एक्स्ट्रा टाइम’ में.
मैं कुछ निश्चय न कर पा रहा था, क्या किया जाए कि मालूम नहीं कहाँ से दानीश अरोड़ा मेरी बगल में आकर खड़े हो गए और धीरे-से उन्होंने अपनी सम्मति भी प्रकट की, “ही कान्ट सरवाइव-यह बच नहीं सकता.” मानो वो कोई ‘चिकित्सा विशेषज्ञ’ हों, वो भी ‘डेथ सर्टिफिकेट’ जारी करने वाले. मैंने तेज दृष्टि से उनको देखा. दानीश अरोड़ा पर तो मुझे गुस्सा आ ही रहा था, लेकिन अपने ऊपर भी कम झुँझलाहट न थी. कभी जी होता था कि जाकर घर बैठ रहूँ, जब और लोगों को मतलब नहीं तो मुझे ही क्या पड़ी है! लेकिन उसे यों अपनी आँखों के सामने मरते हुए नहीं देखा जाता था. पर मैं उसका इलाज भी क्या करवा सकता था? मैं लगभग ‘पचास हजार’ रुपये वेतन पाता था, इसके अलावा महीने का अंतिम सप्ताह था, मेरे पास एक भी पाई नहीं थी. पर उसे ‘सरकारी अस्पताल’ भी तो भिजवाया जा सकता है? अचानक मन में विचार कौंधा, मेरी झुँझलाहट जैसे अचानक दूर हो गई और मैं घूमकर तेजी से ‘सरकारी अस्पताल’ रवाना हो गया, मानो मैंने ‘परमार्थ’ का ‘एग्जाम’ पास कर लिया हो, वो भी ‘डिस्टिंक्शन’ के साथ. अस्पताल पहुँचकर मैंने संबंधित अधिकारियों को सूचित किया. वहाँ से अस्पताल की ‘एम्बुलेंस’ पर बैठकर मैं स्वयं साथ आया. राजू की साँस अब भी चल रही थी. अस्पताल के दो ‘वार्ड बॉयज’ ने, जो साथ आये थे उसको खींचकर गाड़ी पर लाद दिया. जब गाड़ी चली गई तो मैंने संतोष की साँस ली, जैसे मेरे सिर से कोई बड़ा बोझ हट गया हो, मानो मैंने ‘लोक कल्याण’ का ‘तीर्थ’ कर लिया हो, वो भी ‘वन-डे ट्रिप’ में. सबकी यही राय थी कि राजू बच नहीं सकता, परंतु वह मरा नहीं. यदि अस्पताल पहुँचने में थोड़ा भी विलंब हो गया होता तो बेशक काल के गाल से उसकी रक्षा न हो पाती. अस्पताल में वह चार-पाँच दिन रहा फिर वहाँ से ‘डिस्चार्ज’ कर दिया गया, मानो उसे ‘बीमारी से छुट्टी’ मिल गई हो, वो भी ‘नो-पेमेंट’ पर. किंतु उसकी हालत बेहद खराब थी. वह एकदम दुबला-पतला हो गया था. मुश्किल से चल पाता और जब बोलता तो हाँफने लगता, मानो वो ‘जीवन का अंतिम चरण’ जी रहा हो, वो भी ‘स्लो मोशन’ में. न मालूम क्यों, वह अस्पताल से सीधे मेरे घर ही आया. यद्यपि मेरी पत्नी को उसका आना बहुत बुरा लगा, लेकिन मैंने उससे कह दिया कि दो-चार दिन उसे पड़ा रहने दे, फिर वह अपने-आप ही इधर-उधर आने-जाने तथा काम करने लगेगा, मानो वो ‘कोई अतिथि’ हो, वो भी ‘अनइनवाइटेड’. वह चार-पाँच दिन रहा, खाने को कुछ-न-कुछ पा ही जाता. वह कोई-न-कोई काम करने की कोशिश करता, पर उससे होता नहीं. किसी को घर में बैठकर मुफ्त खिलाना मेरी श्रीमतीजी को बहुत बुरा लगता था, परंतु सबसे बड़ा भय उनको यह था कि उसके रहने से घर में किसी को ‘डेंगू’ न हो जाये! मानो वो ‘महामारी’ का ‘वाहक’ हो, वो भी ‘सुपर-स्प्रेडर’. और एक दिन घर आने पर राजू नहीं दिखायी पड़ा. पूछने पर बीवी ने बताया कि वह अपनी तबीयत से पता नहीं कब कहीं चला गया, मानो वो ‘गायब’ हो गया हो, वो भी ‘बिना बताए’. वह कहीं गया न था, बल्कि ‘सोसाइटी’ ही में था. लेकिन अब वह बहुत कम दिखायी पड़ता. मैंने उसको एक-दो बार सड़क पर पैर घिसट-घिसटकर जाते हुए देखा. संभवतः वह अपना पेट भरने के लिए कुछ-न-कुछ करने का प्रयत्न कर रहा था और फिर एक दिन मैंने उसे ‘द अनटच्ड मॉल’ में पुनः पड़ा पाया, मानो वो ‘जीवन के आखिरी पड़ाव’ पर आ गया हो, वो भी ‘डेस्टिनेशन’ के बिना.
दानीश अरोड़ा अपने दरवाजे पर बैठकर अपने शरीर में ‘मसाज’ करा रहे थे, मानो वो कोई ‘शाही स्पा’ कर रहे हों, वो भी ‘पर्सनल थेरेपिस्ट’ के साथ. मैंने उनसे जाकर ‘नमस्कार’ करते हुए प्रश्न किया, “राजू ‘द अनटच्ड मॉल’ में क्यों पड़ा हुआ है? उसे फिर ‘डेंगू’ हुआ है क्या?” दानीश अरोड़ा बिगड़ गए, “गोली मारिए साहब, आखिर कोई कहाँ तक करे? अब साले को ‘स्किन एलर्जी’ हुई. जहाँ जाता है, खुजलाने लगता है. कौन उससे काम कराये! फिर काम भी तो वह नहीं कर सकता. साहब, अभी दो-तीन रोज की बात है, मैंने कहा एक ‘वॉटर कैन’ ला दो. गया जरूर, लेकिन ‘स्मार्ट वॉटर स्टेशन’ से उतरने समय गिर गए बच्चू. पानी तो खराब हुआ ही, ‘कैन’ भी टूट-पिचक गया. मैंने तो साफ-साफ कह दिया कि मेरे घर के अंदर पैर न रखना, नहीं पैर तोड़ दूँगा. ‘गरीबों’ को देखकर मुझे भी ‘दया-माया’ सताती है, पर अपना भी तो देखना है!” मानो वो ‘सफाई अभियान’ चला रहे हों, वो भी ‘जीरो-टॉलरेंस’ पॉलिसी के साथ. मैं कुछ नहीं बोला और चुपचाप घर लौट आया. इस बार मेरी हिम्मत नहीं हुई कि जाकर उसे देखूँ या उससे हाल-चाल पूछूँ, मानो मैंने ‘हार मान ली’ हो, वो भी ‘वॉकओवर’ देकर. घर आकर मैंने पत्नी से पूछा, “तुमने राजू से कुछ कहा-सुना तो नहीं था?” मुझे शक था कि बीवी ने ही उसको भगा दिया होगा और इसीलिए वह मेरे घर नहीं आता. मेरी बात सुनकर श्रीमतीजी अचकचाकर मुझे देखने लगीं, फिर तिनककर बोलीं, “क्या करती, रोगी को पालती? कोई मेरा भाई-बंधु तो नहीं!” मानो उसने ‘जिम्मेदारी’ से ‘पल्ला झाड़ लिया’ हो, वो भी ‘लीगल डिस्क्लेमर’ के साथ. मैं क्या कहता? राजू को भयंकर ‘स्किन एलर्जी’ हो गई थी, लेकिन उसने ‘सोसाइटी’ नहीं छोड़ा. वह अक्सर ‘द अनटच्ड मॉल’ में बैठकर अपने शरीर को खुजलाता रहता. खाने की आशा में वह इधर-उधर चक्कर भी लगाता. कभी-कभी वह मेरे घर के सामने ‘ऑर्गेनिक कॉर्नर’ वाले ‘पंडित’ के यहाँ आता और ‘पंडितजी’ थोड़ा ‘सत्तू’ दे देते. मैंने भी एक-दो बार अपने लड़के के हाथ खाना भिजवा दिया. इस तरह उसके पेट का पालन होता रहा. उसका चेहरा भयंकर हो गया था-एकदम पीला और हाथ-पैर जली हुई रस्सी की तरह ऐंठे हुए. वह बाहर कम ही निकलता और जब निकलता तो उसको देखकर एक अजीब दहशत-सी लगती, जैसे कोई ‘नर-कंकाल’ चल रहा हो, मानो वो ‘भय का प्रतीक’ बन गया हो, वो भी ‘थ्री-डी मॉडल’ में. आषाढ़ चढ़ गया और बरसात का पहला पानी पड़ चुका था. शनिवार का दिन, सवेरे लगभग आठ बजे मैं दफ्तर का काम लेकर बैठ गया. लेकिन तबीयत लगी नहीं. बाहर नाली में वर्षा का पानी पूरे वेग से दौड़ रहा था और शरीर पर पुरवाई के झोंके आ लगते, जिससे मैं एक मधुर सुस्ती का अनुभव कर रहा था. मैंने कलम मेज पर रख दी और कुर्सी पर सिर टेककर ऊँघने लगा, मानो मैं ‘नितारा’ हो गया हो, वो भी ‘एनर्जी सेविंग मोड’ में. यदि एक आहट ने चौंका न दिया होता तो मैं सो भी जाता. मैंने आँखें खोलकर बाहर झाँका. बाहर ओसारे में खड़ा एक तेरह-चौदह वर्ष का लड़का कमरे में झाँक रहा था. लड़के के शरीर पर एक गंदी धोती थी और चेहरा मैला था. मुझे संदेह हुआ कि वह कोई ‘चोर-चाई’ है, इसलिए मैंने डपटकर पूछा, “कौन है रे, क्या चाहता है?” लड़का दुबककर कमरे में घुस आया और निधड़क बोला, “सर, राजू मर गया. उसी के लिए आया हूँ.” मैंने आश्चर्य से मुँह बाकर एक ही साथ उससे कई प्रश्न किये. लड़के ने फिर हँसते हुए कहा, “हाँ, सर, मर गया. मालिक, इस ‘ई-कार्ड’ पर उसके गाँव एक ‘ई-मेल’ लिख दीजिए.” मैंने इसके आगे राजू के संबंध में कुछ न पूछा. मैं अचानक डर गया कि यदि मैंने मामले में अधिक दिलचस्पी दिखायी तो हो सकता है कि मुझे उसकी लाश ‘डिस्पोज’ करने का भी प्रबंध करना पड़े, मानो मुझे ‘लाश का ठेकेदार’ बना दिया जाएगा, वो भी ‘अनपेड’. लड़के के हाथ में एक ‘पोस्टकार्ड’ था, जिसको लेते हुए मैंने सवाल किया, “इस पर क्या लिखना होगा? उसके गाँव का क्या पता है?” “मालिक, ‘चाचाजी रामप्रसाद’ के यहाँ लिखना होगा. लिख दीजिए कि भोलानाथ मर गया.” लड़के की आवाज कुछ ढीठ हो गई थी. “भोलानाथ!” “जी, वहाँ तो उसका यही नाम है.” मैंने ‘पोस्टकार्ड’ पर तेजी से मजमून तथा पता लिखा और पत्र को लड़के के हवाले कर दिया. मैं लड़के से पूछना चाहता था कि तू कौन है? राजू कहाँ मरा? उसकी लाश कहाँ है? परंतु मैं कुछ नहीं पूछ सका, जैसे मुझे काठ मार गया हो, वो भी ‘इलेक्ट्रिक शॉक’ से.
सच कहता हूँ, राजू की मृत्यु का समाचार सुनकर मेरे हृदय को अपूर्व शांति मिली जैसे दिमाग पर पड़ा हुआ बहुत बड़ा बोझ हट गया हो, मानो मैंने ‘जीवन की सबसे बड़ी समस्या’ से ‘छुटकारा’ पा लिया हो, वो भी ‘परमानेंट डिलीट’ करके. उसको देखकर मुझे सदा घृणा होती थी और कभी-कभी सोचकर कष्ट होता था कि इस व्यक्ति ने सदा ऐसे प्रयास किये, जिससे इसको भीख न माँगनी पड़े और उसको भीख माँगनी भी पड़ी है तो इसमें उसका दोष कतई नहीं रहा है. मैंने उसकी दशा देखकर कई बार क्रोधवश सोचा है कि यह कंबख्त एक ही ‘सोसाइटी’ में क्यों चिपका हुआ है? घूम-घूमकर शहर में भीख क्यों नहीं माँगता? मुझे कभी-कभी लगता है कि वह किसी का ‘मुहताज’ न होना चाहता था और इसके लिए उसने कोशिश भी की, जिसमें वह असफल रहा. चूँकि वह मरना न चाहता था, इसलिए जोंक की तरह जिंदगी से चिमटा रहा. लेकिन लगता है, जिंदगी स्वयं जोंक-सरीखी उससे चिमटी थी और धीरे-धीरे उसके रक्त की अंतिम बूँद तक पी गई. राजू को मरे तीन-चार दिन हो गए थे. सारे ‘सोसाइटी’ में यह समाचार उसी दिन फैल गया था. ‘सोसाइटी’ वालों ने अफसोस प्रकट किया और दानीश अरोड़ा ने तो यहाँ तक कह डाला कि जो हो, आदमी वह ईमानदार था! मानो ‘मरने के बाद’ ही ‘ईमानदारी’ का ‘सर्टिफिकेट’ मिलता हो, वो भी ‘पोस्ट-मॉरटम’ के बाद. रात के करीब आठ बजे थे और मैं अपने बाहरी ‘बालकनी’ में बैठा था. आसमान में बादल छाये थे और सारा वातावरण इतना शांत था जैसे किसी षड्यंत्र में लीन हो! बगल की ‘टेबल’ पर रखी धुँधली ‘एलईडी लैंप’ कभी-कभी चकमक कर उठती और उसके चारों ओर उड़ते ‘कीड़े’ कभी कमीज के अंदर घुस जाते, जिससे तबीयत एक असह्य खीझ से भर उठती, मानो मैं ‘प्रकृति के जाल’ में फँस गया हो, वो भी ‘स्पाइडर वेब’ में. मैं भीतर जाने के उद्देश्य से उठा कि सामने एक छाया देखकर एकदम डर गया. राजू की शक्ल का ‘नर-कंकाल’ भीतर चला आ रहा था. सच कहता हूँ, यदि मैं भूत-प्रेत में विश्वास करता तो चिल्ला उठता, ‘भूत-भूत!’ मैं आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था. ‘नर-कंकाल’ धीरे-धीरे घिसटता बढ़ा आ रहा था. यह तो राजू ही था-‘ठठरी’ मात्र! क्या वह जिंदा है? वह मेरे निकट आ गया. संभवतः मेरी परेशानी भाँपकर बोला, “सर, मैं मरा नहीं हूँ, जिंदा हूँ.” अंत में वह सूखे होंठों से हँसने लगा, मानो उसने ‘मौत’ को भी ‘धोखा’ दे दिया हो, वो भी ‘लाइव टेलीकास्ट’ पर. “तब वह लड़का क्यों आया था?” मैंने गंभीरतापूर्वक प्रश्न किया. उसने पहले दाँत निपोर दिये, फिर बोला, “सर, वह ‘टैक्सीवाला टीनू’ का लड़का है. मैंने ही उसको भेजा था. बात यह हुई सर कि मेरे सिर पर एक ‘कौवा’ बैठ गया था. ‘हजूर’ ‘कौवे’ का सिर पर बैठना बहुत ‘अनशुभ’ माना जाता है. उससे ‘मौत’ आ जाती है!” मानो वो ‘अंधविश्वास का जीता जागता उदाहरण’ हो, वो भी ‘लेटेस्ट वर्जन’ में. “फिर गाँव पर ‘ई-मेल’ लिखने का क्या मतलब?” मेरी समझ में अब भी कुछ न आया था. उसने समझाया, “सर, यह ‘मौतवाली बात’ किसी ‘सगे-संबंधी’ के यहाँ ‘ई-मेल’ कर देने से ‘मौत’ टल जाती है. ‘चाचाजी रामप्रसाद’ मेरे चाचा होते हैं. मालिक, एक और ‘ई-कार्ड’ है, इस पर लिख दें ‘सरकार’ कि भोलानाथ जिंदा है, मरा नहीं.” मानो उसने ‘मौत को टालने का जुगाड़’ कर लिया हो, वो भी ‘डिजिटल’ तरीके से. मैंने पूछना चाहा कि तू क्यों नहीं आया, लड़के को क्यों भेज दिया? लेकिन यह सब व्यर्थ था. संभवतः उसने सोचा हो कि उसका मतलब कोई न समझे और लोग बात को मजाक समझकर कहीं दुरदुरा न दें. आज भी जब मैं राजू को याद करता हूँ, तो मेरे होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आ जाती है, और आँखों में नमी. उसकी जिंदगी एक व्यंग्य थी, एक ऐसी कहानी जो हंसाती भी है और रुलाती भी है.
© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈