हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें… ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता

आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से किसी भी रूप में जुड़ना एक रिश्ता बन जाने जैसा है। एक अनजान रिश्ता। मुझे यह सौभाग्य मिला डॉ मधुसूदन पाटिल सर के माध्यम से। उनके संस्मरण हमें स्मृतियों के उस संसार में ले जाते हैं जहाँ जाना अब संभव नहीं है। हम उस संस्मरण के एक तटस्थ पात्र बन जाते हैं। बिलकुल आर के लक्ष्मण के पात्र ‘कॉमन मैन’ की तरह। इस रिश्ते से कोई भी पाठक या मैँ स्वयं उनके रचना संसार में तटस्थ पात्र ‘कॉमन मैन’ ही हूँ। प्रस्तुत है आदरणीय कमलेश भारतीय जी संस्मरण – हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें )

☆ संस्मरण ☆ हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें… ☆

(इस लेख को दिव्य हिमाचल के संपादक व मेरे मित्र अनिल सोनी ने और बाद में उर्मि कृष्ण ने शुभतारिका के हिमाचल विशेषांक में प्रकाशित किया था। इसे फिर संशोधित किया है  – – कमलेश भारतीय)

हिमाचल से मेरा प्रेम है और जब-जब समय मिलता है मैं इसकी ओर उमड़ पड़ता हूं । बचपन में मेरी दादी किसी धार्मिक संग के साथ बाबा बालकनाथ की यात्रा पैदल करती थी और दो वर्ष मैं भी उनके साथ इस यात्रा में शामिल रहा । इतना याद है कि नवांशहर से गढशंकर तक रेल से जाते । रात वहां किसी सराय में रुकते और दूसरी सुबह पदयात्रा शुरू होती जय जयकार करते । रास्ते में संतोखगढ़ आता और पानी के स्त्रोत भी । ठंडा शीतल जल । रास्ते में गरूने के फल तोड़कर खाते ।

बाबा बालकनाथ की कहानी भी बहुत मजेदार । बारह साल गाय चराई और फिर एकमुश्त ही पेड़ पर चिमटा मार कर माई रत्नो को सारी रोटियां वापस कर दीं । ऐसा कुछ वाक्या मेरे साथ खटकड़ कलां में हुआ । मैं लगभग बारह वर्ष ही वहां प्राध्यापक और प्रिंसिपल रहा । पड़ोस की छात्रा तरसेम कौर की मां मेरे लिए मक्खन रोटी रखती ।  जब बारह साल बाद शिक्षण को विदा दी तब आंसुओं के बीच मैंने कहा कि वे बाबा बालकनाथ ही ऐसा कर सकते थे कि सब कुछ लौटा दें । मैं एक साधारण मनुष्य हूं । मैं आपका प्यार लौटा नहीं सकता ।

फिर मेरा रिश्ता हिमाचल से जुड़ा जब मैं बीएड की क्लास फैलो कांता की शादी में बिलासपुर गया । वहां की झील के बारे में रोचक बात पता चली कि पुराने शहर को लील लिया और पानी कम होने पर लोग वहां अपने घर तलाशने और  देखने जाते हैं । अभी कुछ मंदिर दिखते हैं । विवाह सुंदरनगर में चितरोखड़ी में था । इसलिए राजा का महल भी देखा । यह सन् 1973 की बात है ।

सुंदरनगर में ही तब गीतकार सुरेश ओबराय नमन् नौकरी करते थे । उनके पास रुका । उन्होंने दूरवर्ती पाठ्यक्रम से एम ए हिंदी करने की सलाह दी और देर होने के कारण दूसरी सुबह रोटी की पोटली बांध कर मुझे शिमला की बस पर चढा दिया और साथ में आकाशवाणी के बी आर मेहता के नाम चिट्ठी दे दी । वैसे यादवेंद्र शर्मा से भी मिला । वे अब शायद वकालत करते हैं । यदा कदा उनकी कविताएं पढने को मिल जाती हैं । सशक्त कवि हैं ।

इस तरह शिमला आकाशवाणी पहुंच कर मैंने गूंजती घाटियां के संपादक बी आर मेहता से भेंट कर नमन् की चिट्ठी सौंप दी । वे शाम को फागली स्थित अपने घर ले गये । उस दिन उनके पड़ोस में शादी थी सो पहली बार पहाड़ी  भात खाने का मजा भी लिया । दूसरे दिन मेहता जी ने फोटोग्राफर ढूंढा और बीच सड़क खड़ा कर मेरा तुरत फुरत फोटो करवाया और समरहिल ले जाकर प्रोविजनली मेरा एम ए का फाॅर्म भरवा दिया ।

इस तरह दो वर्ष तक शिमला मेरा आना जाना बना रहा और मेरा लगाव बढ़ता गया । मुझे तो बस शिमला जाने का बहाना चाहिए होता था । चीड़ और देवदार के घने पेड़ मानो मुझे आमंत्रित करते । खूब चहल पहल । शिमला में बहुत सी साहित्यिक पुस्तकें भी खरीदता रहा जिन पर आज भी शिमला और तिथि लिखी देखकर सब याद आ जाता है । हंसराज भारती बेशक अमृतसर नौकरी करते थे पर हिमाचल के थे । संपर्क बना रहा । अब वे जंजैहली से बराबर जुड़े हुए हैं ।

फिर दैनिक ट्रिब्यून में आ गया । तब एक बार कथा कहानी समारोह का आयोजन करने  गेयटी थियेटर में संपादक विजय सहगल के साथ आया और हमें स्टेट गेस्ट बनाया गया । शांता कुमार मुख्यमंत्री थे और शिक्षामंत्री राधारमण हमें अपनी सरकारी गाडी में अगवानी कर गेयटी थियेटर तक लेकर गये । वह याद आज भी खुशी देती है । आयोजन बहुत सफल रहा । वर्तिका नंदा और प्रतिभा कुमार को पुरस्कृत करना याद है । आज वे लेखन व सामाजिक काम में अपना मुकाम बना चुकी हैं ।

इसके बाद राजेंद्र राजन ने ज्ञानरंजन के आगमन पर विजय सहगल को आग्रह कर कवरेज के लिए मेरी ड्यूटी लगवाई थी । जहां तक मुझे याद पड़ता है मेरा रहने का प्रबंध कथाकार बद्रीनाथ भाटिया के आवास पर किया था । नंदिता तब बहुत छोटी थी ।

दूसरे दिन ज्ञानरंजन का प्रारंभिक संबोधन दिल को छू गया था । बहुत लम्बे समय बाद ऐसा व्याख्यान सुना था । जो बात कही वह बहुत दूरदर्शी लेखक ही कह सकता था और बात यह थी कि कलम की जगह जल्द ही माउस लेने वाला हैं । तब कम्प्यूटर इतने प्रचलन में भी नहीं थे पर आज देखिए ज्ञानरंजन की बात कितनी सच हो चुकी है । ज्ञानरंजन को चंडीगढ़ में भी सुनने का मौका मिला । ज्ञानरंजन ऐसे ही ज्ञानरंजन नहीं हैं। मैने उनकी पैंतीस कहानियों वाली पुस्तक भी पढ़ी हैं ।

हां । एक प्यारी सी याद धर्मशाला से भी जुड़ी है । मैं परिवार के साथ लेखक गृह में रुका था । वहां चौकीदार ने प्रसिद्ध लेखक उपेंद्रनाथ अश्क के प्रवास की कहानी भी सुनाई थी कि कैसे कभी-कभी गुस्सा हो जाते थे । प्रत्यूष गुलेरी अपनी गाड़ी में हमें रात का खाना खिलाने दाढ़ी अपने घर ले गये । रात ग्यारह बजे तक उनकी बेटी अदिति और मेरी बेटी रश्मि ने धमाल मचाया । वह शाम कभी नहीं भूल सकता । प्रत्यूष जब एम ए कर रहे थे तो जालंधर से पाठ्यक्रम की पुस्तकें लेने आते तो मेरे पास नवांशहर भी जरूर आते । वह प्रेम आज तक चला आ रहा है ।

खैर । अब फिर से मेरा रिश्ता शिमला से एस आर हरनोट विनोद प्रकाश गुप्ता ने जोड़ दिया है नवल प्रयास के कार्यक्रमों में आमंत्रित कर । बहुत अच्छा लगा हिमाचल के दूरदराज से आए नवलेखकों  व कुछ चर्चित लेखकों से मिलने का और उन्हें सुनने का अवसर पाकर । प्रियंवदा शर्माकंचन शर्मासुमित राज वाशिष्ठ, आत्मारंजन, प्रोमिला ठाकुर, शिल्पा भाटिया, मृदुला श्रीवास्तवपूनम तिवारीसाक्षी मेहता , गंगाराम राजी, कुल राजीव पंत  और न जाने कितने लेखक मिले। मृदुला का पहला कहानी संग्रह काश पंचोली न होती और हरनोट की प्रतिनिधि कहानियां विमोचन पर मिले और पढे । खूब सार्थक ।

हिमाचली टोपी जो सम्मान में मिली मैं उसे सर्दियों में हिसार में बडे चाव से पहनता हूं और लोग मुझे हिमाचली समझते हैं। बडा मज़ा आता हैंं । कंचन शर्मा ने अपने आवास पर हिमाचली नाश्ता भी करवाया जिसकी सुगंध याद आती रहती है और प्रमोद जी से मिलवाया । वे तब चुनाव की तैयारी कर रहे थे । वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य को चुनौती दी । बेशक हार गये । आर डी शर्मा ने भी मुझसे पंजाब,  हरियाणा और हिमाचल की कहानी पर लेख लिखवाया और परिवर्तन पत्रिका में प्रकाशित भी किया । दो बार उन्होंने  भी आमंत्रित किया । हि प्र विश्वशिद्यालय गेस्ट हाउस मेरे दूसरे घर जैसा है । दिनेश कुक ऐसे स्वागत् सत्कार में लग जाता है मानो हम उसके ही अतिथि और परिवार के सदस्य हों । देर तक खाना खिलाने का इंतजार करता है । अपने दैनिक ट्रिब्यून के सहयोगी और शिमला से रिपोर्टर रहे शशिकांत शर्मा जो आजकल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के मीडिया विभाग में प्राध्यापक हैं, उन्हें भी स्मरण कर रहा हूं। अपनी गाड़ी में जाखू मंदिर घुमाने ले गये और जिन दिनों राज्यपाल देवव्रत के मीडिया सलाहकार रहे तब हमें राज्यपाल भवन का अतिथि बना कर सम्मान दिया । वाह रविकांत बहुत प्यारे हो । मेरे एक फोन पर तुरंत सारी व्यवस्था बना देते हो । क्या कहूँ?

एक याद नाहन और राजेंद्र राजन से खासतौर पर याद आ रही है । तब राजेंन्द्र राजन वहां जनसंपर्क अधिकारी के तौर पर तैनात थे और किसान भवन में कार्यक्रम आयोजित किया था । नाहन के बारे में सुना था

नाहन शहर नगीना

आए एक दिन रुके महीना ।

मैं पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के उस समय अध्यक्ष व प्रसिद्ध कथाकार डाॅ वीरेंद्र मेहंदीरत्ता के साथ नाहन तक उनकी कार में गया था । उनकी उम्र कुछ हावी हो रही थी कि वे पूछ रहे थे कि कमलेश, तुम्हें कार ड्राइव करनी आती है ?  मैंने कहा कि नहीं । कहने लगे आती तो कम से कम मुझे कुछ आराम मिल जाता पर वे हिम्मत कर कार ड्राइव कर नाहन ले ही गये । पिंजौर के यादवेंद्रा  गार्डन में बांसुरी बजाने वाले प्रेमी फकीर को भी बुलाया गया था । उसका बांसुरी वादन आज भो कानों में कभी कभी गूंज जाता है और राजेंद्र राजन भी याद आते रहते हैं ।

इसके बावजूद जब चंडीगढ़ से हिमाचल की यात्रा शुरू होती है तो सड़क को चौड़ा करने की कवायद यह अहसास ही नहीं होने देती कि हम शिमला की ओर जा रहे हैं । देवदार के पेड़ कटते जा रहे हैं और कंक्रीट सड़कें बनती जा रही हैं । प्राकृतिक सौंदर्य कम होता जा रहा है । दिल दुखी होता है । पहाड़ों की कांट छांट की जा रही है । हरियाली घटती जा रही है । पहाड़ सूखते व वीरान से होते जा रहे हैं । प्लाॅस्टिक की थैलियां सैलानी फेंकते जाते हैं ।

एक बार बिलासपुर में हिमाचल के प्रथम लघुकथा सम्मेलन में रत्नचंद निर्झर ने मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया । तब मैं हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष था । चंडीगढ से मैं जीतेंद्र अवस्थी और रत्नचंद रत्नेश के साथ पहुंचा और वहां सुदर्शन वाशिष्ठ और कृष्ण महादेविया, प्रदीप गुप्ता, अरूण डोगरा रीतू सहित अनेक रचनाकारों से भेंट हुई । तब दूसरी बार एक पंगत में बैठ कर भात व क कढी खाई । जिसका स्वाद आज तक याद है । मुझे खुशी हुई कि लघुकथा में दूरदराज याद किया गया । हिमाचल की श्रेष्ठ लघुकथाएं पुस्तक की भूमिका भी रत्नेश ने मुझसे लिखवाई । यह बता कर कि ये सारी लघुकथाएं मैंने ही दैनिक ट्रिब्यून के कथा कहानी में छाप कर हिमाचल को प्रमुखता दी । इसी प्रकार मंडी में मुझे नरेश पंडित ने एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था जिससे दीनू कश्यप और नाटक निर्देशक इंदु से मेरा परिचय बना हुआ है । यह कार्यक्रम भी किसान भवन में हुआ था ।

शिमला जाते समय व्यंग्यकार अशोक गौतम को मिलना नहीं भूलता । सोलन में भी कुछ समय बिता ही लेता हूं । अशोक की गर्मजोशी बहुत भाती है । वह स्वागत् के लिए तैयार मिलता है । एक बार प्रसिद्ध लेखक केशव नारायण के घर भी अतिथि बनने का सौभाग्य मिला तो एक बार पालमपुर में सुशील फुल्ल से भी उनके आवास पर मिला । तब अंगूरा खरगोश रखे थे । मेरी बेटियां बहुत खेलीं । तब अर्चना भी थी । फिर वह चंडीगढ इंडियन एक्सप्रेस में आई तब ज्यादा मिलना हुआ । इतने वर्षों बाद नवल प्रयास के सम्मान समारोह में शिमला में केशव व सुशील कुमार फुल्ल से मिलना हुआ । अब शिमला जाता हूं तो जरूर समय निकाल कर सम्मान से मिलने आती है बेटी की तरह अर्चना फुल्ल । इसी तरह राजेंद्र राजन की बेटी नंदिता दिल्ली में नवल प्रयास की काव्य गोष्ठी में मिली । खुद ही फेसबुक फोटो से पहचाना । अच्छा लगा । उससे भी निरंतर संपर्क में हूं । कविताएं अच्छी लिखती है । इसी प्रकार कुमार कृष्ण के शोघी स्थित निवास पर भी आतिथ्य का सौभाग्य मिला । वे भी निरंतर संपर्क में हैं । सुंदर लोहिया से समरहिल में यूनिवर्सिटी में छोटी सी मुलाकात हुई थी । तब हम दोनों की कहानियां श्रीपत राय की कहानी पत्रिका में आती थीं । सुना है आजकल वे अस्वस्थ हैं ।

अब शिमला और हिमाचल में मेरे अनेक मित्र हैं । सबको यादों की धरोहर पहुंचाने की कोशिश की ।

पुनीत सहगल को भी याद कर रहा हूं । वह नवांशहर में ही रहा और शिमला दूरदर्शन का डायरेक्टर भी रहा । उसने एख बार शिमला दूरदर्शन पर मेरा लाइव इंटरव्यू प्रसारित किया । सेन्नी अशैष के जिक्र के बिना भी क्या हिमाचल? सैन्नी अशेष से पहली मुलाकात सपरिवार तो अम्बाला छावनी में कहानी लेखन महाविद्यालय के प्रांगण में हुई लेकिन सन् 2019 सितम्बर में मनाली में कहानी लेखन महाविद्यालय के लेखक शिविर में हुई । तीन दिन । खूबु मुलाकात और अपने घर भी ले गये । ओशो की झलक भी दिखाई । एक घंटे के कार्यक्रम में। जाने कितने लेख /चर्चायें ओशो पर और स्नोबा बार्नो का रहस्यमयी चरित्र। डाॅ गौतम शर्मा व्यथितडाॅ चंद्रशेखर के पास जब पीएचडी कर रहे थे और जालंधर उनसे निर्देश लेने आते गाइड के तौर पर तब मुलाकात होती रही जो सम्पर्क आज तक बना है ।

सबसे अच्छी बात शिमला के रिज की । पिछले वर्ष की आखिरी शाम यानी 31 दिसम्बर को हम शिमला में ही थे । रिज पर । खूब भीड़ । खूब नये साल का जश्न । ऐसे में मुख्यमंत्री जय ठाकुर कुछ अंगरक्षकों के साथ अभिवादन करते चले जा रहे थे । वाह । न कोई धक्का मुक्की । न कोई रास्ता ब्लाक । न कोई घेराबंदी । जिसे मिलना हो । आगे आए और हाथ मिला ले । सच कोई वीआईपी कल्चर नहीं । भीड़ को यह भी मालूम नहीं कि मुख्यमंत्री हमारे बीच जा रहा है जबकि मैदानी क्षेत्रों में मुख्यमंत्री के आने पर रास्ते तक बदल दिए जाते हैं और जनता परेशान होती हैं । काश । यह बात दूसरे राज्यों के नेता भी समझें ।

बहुत मीठी मीठी यादें हैं मेरी हिमाचल के साथ ।

दिल ढूंढता हैंं फिर वही

फुर्सत के रात दिन…

© श्री कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम को सदर नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। अमेज़न किंडल पर डॉ. सलपनाथ यादव ”प्रेम“ द्वारा स्थापित ‘पूर्णिका’ नाम से डिजिटल पुस्तक (eBook) भी उपलब्ध है, जिसमें इस विधा की बारीकियों और कविताओं का संकलन किया गया है।

ई-अभिव्यक्ति द्वारा समय समय पर पूर्णिका से सम्बंधित विशेष रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं जिन्हें आप निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं👉

☆ पुण्य स्मरण ☆

स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

0

आज पूर्णिका हुई प्रतिष्ठित

हिन्दी के रंग मंच पर

हिन्दी से यह प्रेम तुम्हारा

वंदन का अधिकारी है

0

हिन्दी साहित्य में पूर्णिका के प्रणेता श्रद्धेय डा.सलपनाथ जी यादव प्रेम के वियोग को उनके शोकाकुल मित्रों ने बड़े दिल दिमाग से महसूस किया। वास्तव में साहित्यिक क्षेत्र समेत हम सभी के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य के मंच पर पूर्णिका को प्रतिष्ठित कराने में जिस संघर्षशील भूमिका का निर्वाह किया उसने उनको पूर्णिकाकारों के मध्य हमेशा के लिए अभिनंदनीय वंदनीय सिद्ध कर दिया।

पूर्णिका के जनक आदरणीय डा . सलपनाथ यादव प्रेम जी पर आधारित और अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच के लिए समर्पित पं. अंशुल विशंभर मिश्र कदम जबलपुरी द्वारा संपादित और देश के विभिन्न अंचलों से ९३ पूर्णिकाकारों द्वारा डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी के जन्म दिवस पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर सृजित पूर्णिकाओ के इस अद्भुत संकलन की जब प्रस्तुति की गई तो पाठकों के बीच इसकी काफी चर्चा की गई। किसी साहित्य साधक की रचना धर्मिता को लेकर इतने रचनाकारों के द्वारा श्रद्धापूर्वक पूर्णिका की रचना करना अपने आप में साहित्यिक क्षेत्र में एक सराहनीय कीर्तिमान है। यहां महत्वपूर्ण है कि पूर्णिका के इस संग्रह को देश की चार साहित्य अकादमी और दो विश्वविद्यालयों ने भी अपनी प्रभावी प्रतिक्रियाओं और सहमति से लोकप्रिय निरूपित किया।

पूर्णिका के सृजन की शुरुआत में इसके जनक डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी को काफी कोशिशें करना पड़ी। बाधायें भी आईं लेकिन प्रेम जी की सक्रियता और संकल्पबद्धता ने आखिरकार पूर्णिका को कविता के क्षेत्र में एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित और स्थापित करने में सफलता अर्जित कर ली। आज प्रेम जी के संरक्षण और मार्गदर्शन में देश भर से अधिक से अधिक पूर्णिकाकार सफलता पूर्वक पूर्णिका लिख रहे हैं और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। पूर्णिका के पक्ष में यह आज गौरव की बात है कि आज विभिन्न अंचलों से रचनाकारों के अधिकांश पूर्णिका संग्रह प्रकाश में आ रहे हैं और उनकी सर्वत्र असरकारक ढंग से चर्चा भी हो रही है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच ने गत वर्ष भी अपने गरिमामय आयोजन में देश के साहित्यकारों की पूर्णिका कृतियों का काफी संख्या में विमोचन किया था जिसकी साहित्यिक क्षेत्र में सर्वत्र काफी चर्चा हुई थी। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक डा सलपनाथ यादव प्रेम जी की कोशिशों से आज पूर्णिका राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और विकसित हो चुकी है।

सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में डा. सलपनाथ जी यादव सभी के सुख दुख के साथी थे। प्रेम उपनाम से उन्होंने लेखन के क्षेत्र में अपनी सक्रिय पहचान बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की और केवल उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं की बल्कि वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। एक सफल अधिवक्ता, यादव समाज में एक प्रसिद्ध समाजसेवी और मार्गदर्शक, आयुर्वेद रत्न के रूप में एक जानकार चिकित्सक ये सब उनके प्रभावी व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने मिलनसारित और जुझारूपन के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अनोखी छाप छोड़ी और लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया।

आज डा.सलपनाथ जी यादव हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संघर्ष और उनका प्रेम सदा हमारे साथ रहेगा और हम उनके सपनों को पूरा करेंगे जो कि उन्होंने पूर्णिका के विकास के संबंध में देखा था। आज कविवर श्री नरेन्द्र की ये पंक्तियां याद आ रही हैं जो कि उनके सक्रिय और संघर्षशील व्यक्तित्व पर खरी उतरती हैं –

 0

आदमी के, प्यार के, संघर्ष के

जो गीत गाए,

जियेंगी सदियां उन्हें दिन रात

छाती से लगाए।

 0

सादर स्मरण –  विनम्र श्रद्धांजलि🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२९ ☆ संस्मरण – प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२९ ☆

?  संस्मरण – प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

International Siddhashram Shakti centre

हैरो, लंदन का इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर एक स्थान, जिस भवन में आज आरती होती है, मंत्र गूँजते हैं, दीप जलते हैं और भारतीय संस्कृति से जुड़े आयोजन होते हैं, वहाँ कभी Baptist चर्च था, बाद में वह भवन Salvation Army का आराधना स्थल भी रहा। आज यही स्थान सिद्धाश्रम का मंदिर और सामुदायिक केंद्र है।

इस धार्मिक वैभिन्य के इतिहास में कोई धार्मिक टकराव नहीं दिखाई दिया। लगा प्रार्थना कक्ष की दीवारों का धर्म मानवीयता ही होता है। धर्म मनुष्य के मन में होता है, ईंट पत्थर में नहीं।

एक ही छत ने अलग-अलग समय में अलग-अलग आस्था के लोगों की प्रार्थनाएँ सुनीं। भाषा बदली, पूजा की विधि बदली, आस्था की अभिव्यक्ति बदली, लेकिन प्रार्थना में उस अदृश्य परम शक्ति से तादात्म्य स्थापित करने की मनुष्य की वही तलाश बनी रही।

यही बात भारत के संदर्भ में भी सोचने को विवश करती है। हम कभी-कभी धर्मस्थलों की दीवारों के नीचे दबे इतिहास को खोजते-खोजते वर्तमान की शांति से बहुत दूर निकल जाते हैं। कौन-सा भवन पहले क्या था, किसका था और किसने क्या बनाया, ये प्रश्न इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें वर्तमान के वैमनस्य का कारण बनना चाहिए? हमें इन्हें अदालतों में हल करना पड़ रहा है!

लंदन में यह भवन उसी तरह के इतिहास का एक शांत उत्तर देता दिखाई देता है। किसी ने अतीत को मिटाकर वर्तमान नहीं बनाया , वर्तमान ने अतीत को अपने भीतर समेट लिया।

लंदन की बहुधार्मिक समभावी संस्कृति का यह पक्ष मुझे विशेष रूप से आत्मीय लगा। अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा से जीना और दूसरे की आस्था के लिए भी स्थान छोड़ना।

सिद्धाश्रम की गतिविधियाँ भी पूजा तक सीमित नहीं, समुदाय और मानवता की सेवा से जुड़ी हुई हैं।

हमारे यहाँ भी तो प्रार्थना का मूल भाव है, सर्वे भवन्तु सुखिनः। फिर धर्म की आत्मा से अधिक उसकी जमीन, दीवार और इतिहास के स्वामित्व को लेकर, प्रतिक्रिया में लोग इतने बेचैन क्यों हो जाते हैं?

जिस स्थान पर आज कोई आरती कर रहा है, वहाँ कल किसी और ने प्रार्थना की थी, तो क्या ईश्वर कल वहाँ कम थे और आज अधिक हैं? शायद नहीं।

ईश्वर नहीं , केवल भक्तों के उन्हें पूजने के रास्ते बदलते है।

सिद्धाश्रम के इस भवन के इतिहास ने यही छोटी-सी, लेकिन गहरी बात सिखाई। आस्था को मन में रखिए, इतिहास को इतिहास में और वर्तमान को प्रेम से जीना ही पूजा है। इसी को सह-अस्तित्व कहते हैं।

22 Palmerston Road, मंदिर से लौटते हुए लगा कि इस भवन में आज दैदीप्य भारतीय संस्कृति का दीप केवल सनातन आस्था का दीप नहीं है। वह उन तमाम प्रार्थनाओं की निरंतरता का दीप है, जिन्हें इन दीवारों ने वर्षों से अपने भीतर सँजोया है।

मंदिर-मस्जिद-गिरजे बदलते रहते हैं,

प्रार्थना करने वाला मन वही रहता है।

इस इतिहास को समझने के उपरांत हैरो , लंदन के इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर में 5 सितंबर की शाम कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए वह शाम मेरे लिए लंदन में इतिहास, आस्था और सह-अस्तित्व को एक ही छत के नीचे देखने की शाम थी।

फिर मिलूँगा, लंदन की किसी ऐसी ही कहानी के साथ, जिसे सबने देखा है, पर शायद अनदेखा कर दिया है।

 

#लंदन_डायरी

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ साहित्य निकुज – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – माँ की पुण्यतिथि पर शत शत नमन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  आपका संस्मरणात्मक आलेख – माँ की पुण्यतिथि पर शत शत नमन)

☆ – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष –  माँ की पुण्यतिथि पर शत शत नमन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

वो  दिन हम भूले नहीं, छोड़ा माँ ने साथ।

लहर-लहर आंचल उड़ा, उठता सिर से हाथ।।

माँ, आप भले ही आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, पर आपकी ममता, आपकी कहानियाँ, आपकी लेखनी और आपके दिए संस्कार आज भी हमारे जीवन में साँस लेते हैं। अंतर्मन  को यह सोचकर पीड़ा होती है कि साथ का समय कुछ और मिलता, तो आपसे बहुत कुछ कहना था, बहुत कुछ सुनना था। माँ का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, वह घर से एक पूरी दुनिया, एक छाँव और एक आवाज़ का चले जाना होता है।

समय बीतता जाता है, जीवन अपनी गति से चलता रहता है, लेकिन माँ की स्मृतियाँ मन के उस कोने में हमेशा जीवित रहती हैं, जहाँ समय भी पहुँचकर उन्हें धुँधला नहीं कर पाता।

आपने साहित्य को केवल लिखा नहीं, जिया है। एक श्रेष्ठ कहानीकार और वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में आपकी रचनाएँ आपकी संवेदना की पहचान हैं। लेकिन, हमारे लिए आपकी सबसे बड़ी विरासत आपकी रचनाएँ ही नहीं, बल्कि वे संस्कार और जीवन-मूल्य हैं जो आपने हमें दिए।

  माँ, आपकी यादों में ये पुष्प सादर अर्पित हैं।

🌸

आई माँ की  याद है, भर आये  हैं नैन.

मिले मुझे माँ हर जनम, तभी मिलेगा चैन॥

 *

माँ की ममता की छुअन, मन में मेरे पास।

संस्कार अच्छे दिए, है जीवन  मधुमास।।

 *

कहानी के हर शब्द में, माँ की है मुस्कान।

देती लेखनी उनकी, जीवन-पथ को जान।।

 *

जल्दी हमसे दूर हुईं, रह गई मन में पीर।

कहना-सुनना रह गया, बहे आँखों से नीर  ॥

 *

उनसे सीखा प्रेम को, शब्दों का आधार ।

उनने हमको दे दिया, जीने का संस्कार ॥

🌸

शत-शत नमन।

शत-शत विनम्र श्रद्धांजलि।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ गांव की यादें ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण ☆

☆  गांव की यादें श्री कमलेश भारतीय

गांव की यादें मेरे आसपास मंडराती रहती हैं ।

बचपन में पिता नहीं रहे थे । सिर्फ तेरह साल का था और ज़मीन इकतीस एकड़ । नन्हे पांव और सारे खेतों की देखभाल मेरे जिम्मे । खेती की कोई जानकारी नहीं । छोटे तीन भाई बहन । गेहूं की कटाई के दिनों में रातें भी खेत में ही गुजारनी पड़तीं । हवेली का नौकर भगत राम लालटेन जलवा कर पास रखवा देता । ऐसे में मैं साहित्यिक उपन्यास पढ़ता रहता । मक्खी की रोटी, मक्खन और लस्सी बना कर लाता । गेहूं की कटाई के बाद बैलों की मदद से गेहूं निकाला जाता और फिर इसको बांटने की शुरूआत होती । खेतों में कोई तोलने वाली मशीन न होती । टीन के कनस्तर को मापने के लिए देसी माणक माना जाता । शुरूआत में जो मजदूर लगे होते उनके निर्धारित पीपे दिए जाते । फिर भगत राम के लिए गेहूं छोड़ी जाती । उसके बाद हम दोनों का आधा आधा होता । फिर अनाज मंडी और वहां बहीखातों मे हिसाब किताब । काफी साइन उस बही-खाते पर किए होंगे । छह माह का राशन बैलगाड़ी पर लाद कर घर लाते । ताकि अगली फसल आने तक चल सके ।

फिर गन्ने का सीजन आता और बेलना खेत में लगाया जाता । सर्दियों की हल्की हल्की धूप में फिर बेलने के पास मेरी चारपाई लगा दी जाती । गर्म गर्म गुड़ और फिर आसपास के खेतों में काम करने वाले आ जाते अपनी अपनी रोटियां लेकर कि इनके ऊपर थोड़ा गुड़ डाल दो । रस भी पीते और खूब मूंछें संवारते । वे मज़े ले लेकर खाते तो भगत राम हंसता -लाला जी का बेलना क्या पंजाबी ढाबा हो गया ? चले आए जब दिल चाहा । मैं रोक देता ऐसा कहने से । उबलती हुई रस के  कड़ाहे में मेरे लिए आलू उखाड़ कर डाले जाते और बाहर निकाल कर ठंडे कर खाते । ऐसा लगता जैसे आलू शकरकंदी बन गये । बहुत स्वाद से खाते सब ।

अब गांवों के किसी खेत में शायद ही बेलना चलता दिखाई  देता हो । हां , सड़क किनारे यूपी से आकर लोग गन्ने का ठेका लेकर बेलना लगाते हैं और नवांशहर से जालंधर व चंडीगढ़ के बीच सड़क पर ऐसे कितने बेलने मिल जाते हैं । कभी कभी गाड़ी रोकर गुड़ शक्कर खरीदता हूं तो आंखें भीग जाती हैं अपने गांव के खेतों में चलते बेलने को याद करके । हर साल बादाम, किशमिश और खरबूजे के बीज डाल कर गुड़ बनवाया जाता जो घर आए मेहमान को खाने के बाद स्वीट डिश की तरह परोसा जाता । आह । वे दिन और कैसे बाजार बनता जा रहा गांव । मक्की के भुट्टे सारे मुहल्ले में दादी बंटवाती थी और लोहड़ी के दिन बड़ी बल्टोही रस से भरी मंगवाती गांव से और सारे घरों में देतीं । अब रस की रेहड़ियां आतीं हैं घरों के आसपास आवाज़ लगती है रस ले लो । सब बाजार में । भुट्टे गर्मा गर्म बाजार में । कुछ दिल नहीं करता । गांव जाता हूं तो बच्चों के लिए खूब सारे भुट्टे लाता हूं । उन्हें वे भूनना भी नहीं जानते । रसोई गैस पर भूनते हैं और जला देते हैं । हमारी हवेली के सामने दाने भूनने वाली बैठती थी और भगत राम मेरे लिए मक्की के दाने भिगो कर बनवाता जिसे खाते । या चने जिनको बाद में पीस कर शक्कर मिला कर कूटते और उन जैसा स्वाद किसी स्वीट डिश में आज तक नहीं मिला । बड़े बड़े होटल्स में भी नहीं ।

यों ही गांव मेरे पास आया और अपनी कहानी सुना गया । सुबह सैर के बीच कितनी बार गांव मेरे पास आया । आखिर वह अपनी व्यथा कथा लिखवाते में सफल रहा ।

© श्री कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆🌼 ओणम की महक और बचपन की एक दुनिया ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌼 ओणम की महक और बचपन की एक दुनिया🌷

कुछ रिश्ते दूरियों से नहीं, यादों की गर्माहट से जीवित रहते हैं… 💛

ओणम का पर्व आते ही मेरे भीतर एक गहरी-सी उदासी में लिपटी, मीठी-सी खुशी जाग उठती है।

नॉस्टैल्जिया तो हम हर त्योहार पर ओढ़ लेते हैं—बचपन याद आया, पुराने दिन याद आए, और बस! लेकिन यह वाली याद कुछ अलग है। यह बहुत गहरी है—भावनाओं, रिश्तों और जाने कितनी परतों में फैली हुई। इसमें एक पूरा घर है, एक परिवार है, एक दोस्ती है और बचपन से लेकर आज तक की एक लम्बी यात्रा है। ❤️

मुझे आज भी वह पुराना-सा घर याद है—प्रवेश द्वार पर लकड़ी की जालियाँ, ऊपर ब्रिटिश ज़माने की छत की खपरैल और नीचे पत्थर का फर्श। सादगी में लिपटा हुआ, मगर अपने भीतर अपार अपनापन समेटे वह घर मेरे बचपन का एक बहुत प्रिय हिस्सा था।

वह मेरे बचपन के मित्र मुकुंदन का घर था।

हमने किंडरगार्टन से लेकर विश्वविद्यालय तक साथ पढ़ाई की। उसके घर में उसकी छोटी बहन, माँ और अच्छन थे—और न जाने कब मैं उस घर का मेहमान भर न रहकर परिवार की आत्मीयता का हिस्सा बन गया था। 🏡❤️

और फिर आता था ओणम।

उस दिन वह घर जैसे अचानक किसी मंदिर में बदल जाता। सजावट, फूल, पूजा की तैयारी और केरल की पारम्परिक वेशभूषा में सजे परिवार के सदस्य—सब कुछ देखते ही बनता था। घर में दिन भर मेहमानों का आना-जाना लगा रहता।

और मैं?

मैं अक्सर एक कुर्सी के कोने में बैठा, चुपचाप इस पूरे उत्सव का home witness बना रहता। 😊

बचपन से किशोरावस्था, फिर युवावस्था और देखते-देखते हमारे जीवन के मध्य वर्षों तक—हर साल ओणम आता रहा और अपने साथ वही आत्मीयता लेकर आता रहा।

फिर आती थी सद्या। 🍃

केले के पत्ते पर सजा वह भोजन अपने आप में रंगों, सुगन्धों और स्वादों का उत्सव होता था। मुझे उसका हर व्यंजन पसन्द था, लेकिन मेरा सबसे प्रिय था पायसम—विशेषकर वह मीठा व्यंजन जिसे मैं आज भी अपने बचपन की सबसे स्वादिष्ट स्मृतियों में गिनता हूँ।

माँ को मालूम था कि मुझे वह कितना पसन्द है।

वह प्यार से मेरे केले के पत्ते पर दूसरी बार डालतीं… फिर तीसरी बार।

और यह सिलसिला किसी एक-दो ओणम का नहीं था। वर्षों तक चलता रहा।

उस अतिरिक्त कटोरी में सिर्फ मिठास नहीं थी—उसमें एक माँ का स्नेह था। ऐसा स्नेह जिसका स्वाद उम्र बढ़ने के साथ कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है। ❤️

कैसे उड़ जाते हैं अच्छे दिन!

तब हम बच्चे थे। फिर किशोर हुए, जवान हुए और अब देखते-देखते बालों में सफेदी उतर आई है। हम दोनों वरिष्ठ नागरिकों की कतार में आ खड़े हुए हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया, लेकिन एक चीज़ नहीं बदल पाई—एक-दूसरे के प्रति वह अपनापन।

मुकुंदन अब अपने मूल स्थान, God’s Own Country—केरल, लौट चुका है। इस ओणम पर वह अपने परिवार के साथ वहीं सद्या का आनन्द लेगा।

और मैं?

मैं यहाँ इन्दौर में अपने पुराने साथी के साथ, केरल की ही जड़ों से निकले Indian Coffee House में सद्या का स्वाद लूँगा। 🍃🥥

भौगोलिक दूरी आज बहुत है।

लेकिन मुझे लगता है, इस ओणम पर हम दोनों के दिल उसी दूरी को नकार देंगे।

वहाँ केले के पत्ते पर सजी सद्या होगी… यहाँ उसकी याद।

वहाँ केरल की हवा में ओणम की खुशबू होगी… यहाँ स्मृतियों में वही सुगन्ध।

और शायद किसी क्षण, जब हम दोनों अपने-अपने पत्ते पर रखे किसी मीठे व्यंजन का स्वाद लेंगे, तो हमारे भीतर बचपन का वही पुराना घर फिर से जीवित हो उठेगा—लकड़ी की जालियों वाला, खपरैल की छत वाला, पत्थर के फर्श वाला…

और उस घर के किसी कोने में मैं अब भी बैठा रहूँगा—एक कुर्सी पर चुपचाप—मुकुंदन के घर की रौनक देखता हुआ और माँ के हाथों से तीसरी बार परोसे गए पायसम का आनन्द लेता हुआ। 😊❤️

कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं होते।

वे बस यादों में और खूबसूरत होते जाते हैं।

इस ओणम पर शायद हम दूर हों, मगर हमारे दिल वही पुरानी लय में धड़केंगे—

उसी स्नेह, उसी आत्मीयता और उसी बचपन की सद्या की खुशबू के साथ। 🌼🍃❤️

शुभ ओणम मुकुंदन! 🌸

Happy Onam Everyone! 🌺

कुछ त्योहार कैलेंडर पर आते हैं।

कुछ सीधे दिल में उतर जाते हैं। ❤️

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट 🥰

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२५ ☆ स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

लंदन से –

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२५ ☆

?  स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मंडला का नाम लेते ही मेरे मन में सबसे पहले मां नर्मदा की स्मृति आती है। इस शहर को नर्मदा ने जैसे अपनी बांहों में ले रखा है। नदी यहां तीन ओर से अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर की तरह मंडला को घेरती हुई बहती है। इसलिए मंडला को केवल एक शहर कहना शायद उसके भूगोल और उसके स्वभाव, दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। यहां नर्मदा जीवन का हिस्सा नहीं, जीवन की धड़कन है। जीवन रेखा है। हमारा पुश्तैनी घर “महलात” यही नर्मदा जी वार्ड में था।

इन दिनों जब नर्मदा फिर उफान पर है और वहां से सुदूर लंदन में बैठे , मैंने बाढ़ के दृश्य तो टी वी पर देखे तो , बचपन चित्रवत याद हो आया ।

मंडला की सड़कों तथा निचले इलाकों में नर्मदा का पानी पहुंच गया है, मेरी स्मृतियां लगभग एक सदी पीछे की घटनाओं में लौट जाती हैं, सन 1926 में ।

मंडला में हमारा पुश्तैनी घर ‘महलात’ कहलाता है। वह आसपास के सामान्य घरों से लगभग एक मंजिल ऊंचे मिट्टी के टीले पर बना है। आज उस ऊंचाई को देखकर लगता है कि हमारे पूर्वजों ने शायद नर्मदा के स्वभाव को हमसे बेहतर समझा था।

 नदी के किनारे रहने वाले लोग नदी को केवल देखते नहीं थे, उसके मिजाज को पढ़ते भी हैं।

सन 1926 में मंडला में नर्मदा की भयंकर बाढ़ आई थी। उसी वर्ष मेरे पिताजी का जन्म हुआ था। मेरे बचपन में मेरी दादी (स्व श्रीमती सरस्वती देवी) उस बाढ़ की कहानी सुनाया करती थीं। उनके लिए 1926 कोई पुरानी तारीख मात्र नहीं थी, बल्कि परिवार की स्मृति में जीवित एक घटना थी।

वह बाढ़ इतनी विकराल थी कि चारों ओर पानी फैल गया था। बहुत से लोग अपने घरों में फंस गए थे। तब महलात का ऊंचा टीला उनके लिए आश्रय बन गया। दादी बताया करती थीं कि आसपास के घरों की दीवारें तोड़कर (खासकर असगर वकील साहब का घर, जिसमें उनके पार्टिशन के दौरान पाकिस्तान चले जाने के बाद अब जसवानी परिवार रहता है) रास्ते बनाए गए, ताकि पानी से घिरे लोगों को हमारे महलात तक सुरक्षित लाया जा सके। जहां कोई हाथ मदद के लिए उठा, उसे थाम लिया गया।

मैं कल्पना करता हूं कि उस समय हमारा घर केवल हमारा घर नहीं रहा । वह संकट में घिरे लोगों का उनका घर बन गया था।

दादी बताती थीं कि हजारों लोगों ने वहां शरण ली थी। पानी कब उतरेगा, इसका किसी को पता नहीं था। हमारे पूर्वजों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था की। नर्मदा का पानी धीरे-धीरे उतरता रहा और महलात का टीला उन दिनों न जाने कितने परिवारों के लिए जीवन का सहारा बना रहा। 

हमारे पास उस समय के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर द्वारा दी गई सनद भी सुरक्षित है। वह पुराना कागज मेरे लिए किसी सरकारी दस्तावेज से अधिक है। उसमें एक बीते समय की छाया है और उस छाया में उन लोगों की कहानी भी, जिन्होंने विपत्ति के समय अपने घर की सीमाएं दूसरों के लिए खोल दी थीं।

आज जब हम बाढ़ को जलस्तर, खतरे के निशान और सरकारी चेतावनियों के आंकड़ों में समझते हैं, तब उस समय की कल्पना करना कठिन लगता है। न मोबाइल था, न मौसम की तत्काल सूचना, न आधुनिक बचाव दल। फिर भी लोगों के पास एक ऐसी व्यवस्था थी जिसे किसी सरकारी पुस्तिका में दर्ज नहीं किया जा सकता , एक-दूसरे के लिए खुला हुआ मन और घर।

इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि 1926  नर्मदा की बड़ी ऐतिहासिक बाढ़ों में थी। मंडला के उपलब्ध आधिकारिक जलस्तर अभिलेखों में उसके बाद 1974 का बाढ़ स्तर सर्वाधिक दर्ज है।मेरे लिए 1926 का महत्व किसी आंकड़े से तय नहीं होता। वह मेरे परिवार की स्मृति में उस बाढ़ का वर्ष है, जब महलात ने अपने दरवाजे हजारों लोगों के लिए खोल दिए थे। मेरे स्व पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जो वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए,का जन्म उसी दौरान हुआ था।

यही स्मृति आज की बाढ़ को देखते हुए और गहरी हो जाती है।

लगभग सौ वर्ष बाद नर्मदा फिर उसी शहर में अपने रौद्र रूप में है। घाटों और निचले इलाकों में पानी पहुंच रहा है। कुछ परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। प्रशासन और बचाव दल सतर्क हैं। नदी फिर अपने पुराने अधिकार का स्मरण करा रही है।

समय बदल गया है। घर बदल गए हैं। बचाव के साधन बदल गए हैं। नदी को मापने के हमारे तरीके बदल गए हैं। लेकिन नदी का स्वभाव नहीं बदला।

और शायद मनुष्य की असली परीक्षा भी नहीं बदली।

बाढ़ जब आती है तो वह यह नहीं पूछती कि किसका घर कितना बड़ा है। कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है, पानी सब दीवारों को एक ही भाषा में पढ़ता है। ऐसे समय में किसी ऊंचे घर की उपयोगिता उसकी ऊंचाई में नहीं, उसके खुले दरवाजे में होती है।

महलात का वह टीला आज भी है। उसके आसपास बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन उसकी मिट्टी में जैसे 1926 की स्मृति अब भी बसी हुई है। मुझे लगता है, उस मिट्टी ने केवल पानी नहीं देखा होगा , उसने भय देखा होगा, प्रतीक्षा देखी होगी, लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनते देखा होगा।

इतिहास हमें बताता है कि बाढ़ कितनी ऊंची थी। स्मृति बताती है कि उस बाढ़ में कितने हाथ एक-दूसरे को थामे हुए थे।

इसीलिए आज जब नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे तक आई है, मेरी आंखों के सामने महलात का वही ऊंचा टीला उभर आता है। दादी की आवाज जैसे फिर सुनाई देती है , पानी बढ़ रहा था, लोग आते जा रहे थे, दीवारें तोड़ी जा रही थीं और महलात सबके लिए खुला था।

नर्मदा जीवनरेखा है। कभी वह जीवन देती है, कभी जीवन की नश्वरता का बोध कराती है। मंडला ने उसके दोनों रूप देखे हैं।

और महलात ने भी।

शायद किसी घर की सबसे बड़ी विरासत उसकी दीवारें नहीं होतीं। उसकी असली विरासत वह स्मृति होती है कि किसी कठिन समय में उसके दरवाजे कितने लोगों के लिए खुले थे।

 मुझे लगता है, महलात आज भी उसी ऊंचाई पर खड़ा होकर नदी को देख रहा है, जैसे एक बूढ़ा घर अपनी पुरानी नदी से कह रहा हो, तुम्हें अपना स्वभाव याद है, मुझे अपना।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ गंवार सी स्त्री ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ संस्मरण ☆ गंवार सी स्त्री ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

दादी एक शिक्षक की पत्नी थीं, पर उनका स्वभाव बिल्कुल माटी जैसा सरल था। बाबा जब भी उनके किस्से सुनाते, तो उनकी आँखें छलक उठतीं। वे अक्सर बताया करते थे कि कैसे दादी महुआ बिनने, सुखाने और पीसने से लेकर लकड़ी के चूल्हे पर रसोई बनाने तक का सारा काम अकेले हंसते-हंसते कर लेती थीं। उन दिनों पापा पटना में रहकर पढ़ाई भी करते थे और नौकरी भी; तब रात्रि पाठशालाएं (नाइट स्कूल) हुआ करती थीं। हमारा गाँव पटना से कोसों दूर था। उस दौर में आज जैसे सुख-साधन भले न रहे हों, पर मुश्किलों के समाधान ज़रूर थे और सबसे बढ़कर था — आपसी विश्वास की एक मजबूत नाव।

बाबा के परिवार की पृष्ठभूमि अम्मा के मायके से बिल्कुल उलट थी। जहाँ पापा एक साधारण शिक्षक और किसान के बेटे थे, वहीं अम्मा दरभंगा के एक संभ्रांत जमींदार परिवार की हंसमुख बेटी थीं। नियति ने दोनों का गठबंधन तो करा दिया, लेकिन बदले में अम्मा से उनका ऐश्वर्य और बहुत कुछ छीन लिया।

अम्मा अक्सर एक बात याद करती थीं कि एक बार नानी ने उनसे कहा था — “पति के चरण या ज़मीन के नीचे ही स्त्रियों का असली स्थान होता है।”

अम्मा ने अपनी माँ की इस सीख को गाँठ बांध लिया। वे अपनी सास (दादी) और बड़की माई के पदचिह्नों पर चुपचाप चल पड़ीं। वह ऐसा दौर था जब चावल बाज़ारों में पैकेटों में नहीं मिलते थे; धान को उबालना, सुखाना, कूटना और फटकना पड़ता था, तब कहीं जाकर थाली में भात सजता था। आटा और दाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही मशक्कत भरी थी। घर कच्चे थे, जिन्हें संवारने के लिए मिट्टी और गोबर की ज़रूरत होती थी। द्वार पर बंधे मवेशियों से गोबर मिल जाता था। गृहस्थी के इन कामों को सहेजते-सहेजते जमींदार की वह बेटी न जाने कब सीधा पल्लू रखना भूल गई और सिर पर उल्टा पल्लू रखे कब इस गाँव की संस्कारी बहू बन गई, उसे खुद भी पता न चला।

मर्यादा ऐसी थी कि बड़े बाबूजी (जेठ जी) के सामने अम्मा कभी नहीं गईं और न ही बड़े बाबूजी कभी अम्मा के समक्ष आए। दादी की मृत्यु के बाद घर का नेतृत्व बड़की माई ने संभाला। उनके साए में पूरा परिवार हमेशा संयुक्तरहा। गाहे-बगाहे सब मिलते रहे।

तीज-त्योहार हो, शादी-ब्याह हो, या जीवन-मृत्यु का कोई अवसर—इन सब सामाजिक ताने-बाने को उन्हीं तथाकथित गंवारस्त्रियों ने मिलकर बखूबी चलाया। और तब तक चलाया, जब तक कि उस परिवार में पढ़े-लिखेलोगों का आगमन और हस्तक्षेप नहीं हुआ। जैसे ही आधुनिकता और शिक्षा का अहंकार घुसा, धीरे-धीरे गाँव का वह भरा-पूरा घर खाली होता चला गया। पुराने बुजुर्ग रहे नहीं और नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में रम गई।

अब आलम यह है कि आज के बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं—

“पापा, क्या यह आटे का पेड़ है?”

तो पिता झेंपते हुए कहते हैं— “नहीं बेटा, यह गेहूँ का पौधा है।”

यह आधुनिक काल है या हमारी समझ का पतन, यह तो समझ से परे है। लेकिन इतना तो तय है कि आज के इन समझदारऔर पढ़े-लिखे लोगों से कहीं बेहतर वे गंवारलोग थे। वे चाहे जैसे भी थे, अपने भरे-पूरे कुनबे को एक डोर में बांधकर रखते तो थे! तीज-त्योहारों और गर्मियों की छुट्टियों में बेटियाँ और बुआ मायके की राह ताकती तो थीं!

परन्तु अब… अब अपनों के इंतज़ार की वह राह और वह गाँव का घर, दोनों ही बेनूर हो चुके हैं। अब कुछ नहीं बचा।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

कोरिया में रहते हम भारतीयों को एक भारत प्रेमी कोरियाई मित्र मिलें….ली यंग ची! जो भी नया भारतीय प्रोफेसर विश्वविद्यालय में आता वह उनसे मिलने अवश्य आ जाते। वैसे ही वे मुझे भी मिलने आए। फिर ड़ॉ. रवीन्द्र गर्गेश, ड़ॉ. राजीव खन्ना, डॉ. रमेश शर्मा और फिर डॉ. एम. पी शर्मा इन सबसे वे मिले। फिर हम सबका एक अच्छा ग्रूप ही बना। कोरियाई संस्कृति की बहुत सी जानकारी उनसे ही हमें मिली थी। वे हमें वीक येंड पर कभी कोरिया क कुछ खास जगहों पर घूमाने ले जाते फिर वह स्प्रींग फेस्टीवल हो या,पहाडी पर बना कोई बौद्ध विहार हो, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमारेखा हो या फिर घर का कोरियन भोजन हो वे हमें ले जातें, साथ आतें और कभी कभी मेरे घर आकर भारतीय भोजन भी करते। कोरिया की परिवार- व्यवस्था, वहाँ के पारिवारिक संबंध, मान-सम्मान आदि की जानकारी उनसे तथा अन्य दोस्तों से मिली। श्रीमान यंग ची ली से आज भी मैं सोशल मीडिया के ज़रिए जुडी हुई हूँ। मैं जब कोरियाई लोकोक्तियों पर यूँ ही काम कर रही थीं तो उन्होंने मुझे कई लोकोक्तियों की जानकारी दी थीं। कोरियाई संस्कृति को समझने के लिए कुछ अंग्रेजी पुस्तकें भी ला दी थीं। उनकी वजह से कोरियाई भाषा और संस्कृति को समझने में भी आसानी हो रही थी।

कोरिया मेरे लिए केवल एक विदेश में जाकर अपनी सेवाएं देना नहीं था। वह एक प्रवास भी था.. एक सांस्कृतिक प्रवास!… जिसमें मैंने आधुनिकता और परंपरा को एक साथ चलते हुए देखा। जब मैं सियोल पहुँची थी, तब मेरी आँखों के सामने एक अत्यंत आधुनिक, विकसित देश था..ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, अत्याधुनिक मेट्रो, हर हाथ में मोबाइल और भागती हुई ज़िंदगी। मुझे लगा था कि इतने आधुनिक समाज में शायद पारिवारिक जीवन केवल औपचारिकता भर रह गया होगा.. किंतु धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि इस चमकदार आधुनिकता के भीतर एक अत्यंत गहरी पारिवारिक चेतना जीवित है।

कोरिया को समझने के लिए वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था को समझना आवश्यक है। वहाँ परिवार केवल माता-पिता और बच्चों का छोटा-सा समूह नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा, पूर्वजों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ी एक जीवित संस्था है। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था पर कन्फ्यूशियस विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है। चीन से आए कन्फ्यूशियस दर्शन ने सदियों तक कोरिया के सामाजिक और नैतिक जीवन को दिशा दी। विशेषकर जोसॉन राजवंश के समय परिवार को समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया। कन्फ्यूशियस सिद्धांतों के अनुसार माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रकि आज्ञाकारिता, परिवार की प्रतिष्ठा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य माने जाते थे। यही कारण है कि कोरिया में बच्चों को बचपन से ही विनम्रता, अनुशासन और पारिवारिक मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता रहा।

पुराने समय में कोरिया में तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं। परिवार का मुखिया सबसे वरिष्ठ पुरुष होता था और उसका निर्णय पूरे परिवार के लिए अंतिम माना जाता था। बहुएँ सास-ससुर की सेवा को अपना धर्म समझती थीं और पुत्र अपने माता-पिता की अनुमति के बिना कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते थे। यह सब सुनते-पढ़ते मुझे अपने भारतीय संयुक्त परिवारों की याद आती रहती थी। मुझे अक्सर लगता कि एशिया की संस्कृतियों में भले ही भाषाएँ भिन्न भिन्न हों, पर परिवार के प्रति भाव लगभग समान हैं।

मुझे आज भी वह दिन याद है जब मुझे और डॉ. गर्गेश जी को हमारे एक कोरियाई छात्र आलाम (कोरियन व्यक्तिवाचक नाम) ने अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके घर में उनके बुज़ुर्ग पिता भी थे। सबसे मिलने और बातें करने के बाद मेज़ पर भोजन लगाया गया… और कहा गया कि भोजन के लिए चलें…भारतीय सहजता में हम जाकर खाने की मेज़ के पास बैठने लगें, पर बाकी सब वहीं रुके रहें मेरी समझ में नहीं ?..तभी आलाम ने मुस्कुराते हुए पर हौले से कहा, “पहले अप्पा…” हम तुरंत सँभल गएं। यही बात मैंने प्रो. ली हो जंग के घर में भी महसूस की थी। कुछ ही क्षणों में उसके पिता कमरे में आए। घर के सभी सदस्यों ने हल्का झुककर उनका अभिवादन किया और उनके बैठने के बाद ही बाकी लोग बैठें। उस दृश्य में एक शांत गरिमा थी।  अचानक मुझे अपना घर याद आ गया जहाँ बचपन में दादा जी के बैठने के बाद ही भोजन आरंभ होता था। भारत और कोरिया के बीच  हज़ारों किलोमीटर की दूरी अवश्य है, पर संस्कारों की धरती कहीं बहुत निकट है। केवल घरों में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में भी बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता था। मेट्रो में युवा तुरंत अपनी सीट वृद्ध लोगों के लिए छोड़ देते थे। किसी बड़े व्यक्ति को वस्तु देते समय दोनों हाथों का प्रयोग करना सामान्य शिष्टाचार माना जाता था। भले ही पेन ही क्यों न देना हो दोनों हाथों से पकड़कर ही दिया जाता था। अभिवादन करते समय हल्का झुकना वहाँ के व्यवहार का सहज हिस्सा था। इन छोटी-छोटी बातों में मुझे संस्कारों की वह निरंतरता दिखाई देती थी जो आधुनिक जीवन की तीव्र गति के बीच भी जीवित थी। भोजन के दौरान हमने देखा कि घर का युवा बेटा अत्यंत संयम से बैठा था। वह अपने पिता के सामने ऊँची आवाज़ में बोल नहीं रहा था और न ही किसी प्रकार की असावधानी दिखा रहा था। मेरे छात्र ने बताया कि माता-पिता के सामने धूम्रपान या शराब पीना आज भी असभ्यता माना जाता है। मैंने हल्के मज़ाक में कहा, “तो फिर यहाँ के युवाओं को दो व्यक्तित्व रखने पड़ते होंगे, एक दोस्तों के साथ और एक घर में!” मेरी बात सुनकर वह झेंप गया।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था की सबसे अद्भुत बात मुझे यह लगी कि वहाँ दूर-दूर के रक्त-संबंधी भी स्वयं को एक ही परिवार का सदस्य मानते हैं। यदि किसी व्यक्ति का पूर्वज समान है, तो वे स्वयं को “इल्गा” अर्थात् “एक ही घराने/ परिवार/वंश” का सदस्य कहते हैं। कोरिया में बसी एक अमेरिकन प्रोफेसर मिस. एलिना जो वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और सालों से वहीं कोरिया में थी, उसने एक दिन अपने कोरियाई मित्र को घर बुलाया था, उस समय उसने मुझे और मोशा को भी आमंत्रित किया थ…स्ट्रॉबेरी और योगहर्ट खाने के लिए। तब बातों ही बातों में उस कोरियाई महिला ने हमें अपने परिवार की वंशावली हमें दिखायी थी.. बिलकुल वंशवृक्ष बनाकर। वह बता रही थी ऐसे वंशवृक्ष में कई पीढ़ियों के नाम, जन्म, विवाह, मृत्यु, सरकारी पद और यहाँ तक कि कब्रों के स्थान तक दर्ज होते हैं। मैं आश्चर्य से उसे देखती रही। मुझे लगा जैसे मैं किसी परिवार का इतिहास नहीं, बल्कि किसी छोटे राज्य का अभिलेख ही देख रही हूँ। मोशा और मैं दंग रह गए इतनी बारीकी से विवरण दिया जाता है। वैसे अपने यहाँ भी कुछ कुछ समुदायों में ऐसी जानकारी मिलती हैं। मुझे याद है हमारे गली में कुछ खास समुदाय ( विशेषकर लिंगायत समुदाय के कोष्टि (जाडरु) समुदाय) के लोग आते थे और घर-परिवार की जानकारी अपने बही खाते में दर्ज कर जाते थे… कौन-कौन अब नहीं रहें, कौन नया सदस्य परिवार में जन्मा है इसकी जानकारी वे लेते हैं। ये सरकारी लोग नहीं होते.. ये उस खास कम्युनीटि के स्वामी जैसे लगते थे.. जिन्हें ‘हेळव’ कहा जाता था.. अर्थात सुमदाय के बारे में जानकारी देनावेला या रखनेवाला.. जो हर साल आकर घर घर जाकर जानकारी इकट्ठा कर अपने बही खाते में दर्ज कर देते थे।

दरअसल कोरिया में वंशावली केवल दस्तावेज़ नहीं बल्कि वह सम्मान, पहचान और पारिवारिक स्मृति का प्रतीक होती है। परिवार के लोग उसे लगभग किसी पवित्र ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखते हैं। कोरिया में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुई। उसने बताया कि विशेष अवसरों पर वे अपने पूर्वजों की स्मृति में भोजन अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करते हैं। विशेष रूप से “चुसोक” जैसे पारिवारिक त्योहारों के समय पूरा कोरिया जैसे अपने मूल की ओर लौटता दिखाई देता है। लोग महानगरों से अपने गाँव जाते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर श्रद्धा अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ पारंपरिक भोजन करते हैं। उस समय मुझे बार-बार भारतीय पर्वों की याद आती थी,  ऐसे पर्वों और उत्सवों के समय घर से दूर रहने वाले लोग अपने घर लौटने का प्रयास करते हैं। मुझे लगा कि एशिया की संस्कृतियों में भी परिवार केवल साथ रहने भर की व्यवस्था नहीं है, बल्कि स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। उस आधुनिक महानगर में यह दृश्य देखकर मुझे लगा कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य अपनी जड़ों से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को समझने में वहाँ के पारिवारिक संबोधनों ने मेरी बहुत सहायता की। वहाँ हर रिश्ते के लिए अलग शब्द है और यह भी महत्वपूर्ण है कि बोलने वाला लड़का है या लड़की। लड़की अपने बड़े भाई को “ओप्पा” कहती है, जबकि लड़का अपने बड़े भाई को “ह्योंग” कहता है। बड़ी बहन के लिए “ओन्नी” और “नूना” जैसे अलग संबोधन हैं। शुरू-शुरू में मैं इन शब्दों में बहुत उलझ जाती थी। एक बार मैंने गलती से किसी महिला को “ह्योंग” कह दिया। साथ में बैठे छात्र हँसने लगे और मैं संकोच से भर उठी। बाद में वही घटना हमारी मित्र-मंडली का प्रिय हास्य प्रसंग बन गई। पर धीरे-धीरे समझ आने लगा कि ये संबोधन केवल शब्द नहीं हैं, इनके भीतर पूरा सामाजिक अनुशासन और आत्मीयता छिपी हुई है। एक और बात वहाँ संबंधों के भीतर एक विशेष भावनात्मक आत्मीयता है, जिसे कोरिया में “जोंग” (Jeong) कहा जाता है। यह ऐसा लगाव है जो केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मित्रों, पड़ोसियों और सहकर्मियों तक फैल जाता है। शायद यही कारण था कि मि.ली यंग ची, या मि. जून जैसे लोग हमारे लिए केवल परिचित नहीं रहे, बल्कि परिवार जैसे बन गए थे। मुझे कई बार लगा कि कोरियाई समाज की आत्मा इसी “जोंग” में बसती है।

ओप्पा, अम्मा जैसे संबोधनों को सुनते हुए मैं बार-बार मराठी और कन्नड भाषा से रिलेट कर करती थी। दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक की पारिवारिक संस्कृति में भी रिश्तों के लिए अत्यंत आत्मीय और सूक्ष्म संबोधन हैं, अण्णा, अक्का, अम्मा, अप्पा, अज्जी, अज्जा, चिकप्पा, माव आदि। ऐसे ही मराठी में भी हैं दादा, भाऊ, आई, बाबा, आजी, आजा, काका, मामा आदि आदि हिंदी में भी है। हमारी तरह ही कोरिया में भी किसी बड़े व्यक्ति को केवल नाम से पुकारना असभ्यता माना जाता है। बस अंग्रेजी ने सारे संबंधों को ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा दिया है। कोरिया में “ओप्पा” सुनते ही मेरे मन में “अण्णा” गूँज उठता था। “अम्मा” और “अप्पा” जैसे शब्द तो इतने परिचित लगे कि कई बार मुझे लगता था जैसे मैं किसी दूर देश में नहीं, बल्कि अपने ही सांस्कृतिक परिवेश के किसी दूसरे रूप में हूँ। इन्हीं समानताओं ने मेरे भीतर कोरियाई भाषा और वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। मुझे लगा कि एशियाई संस्कृतियों में परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक संसार का केंद्र है।

कोरिया में नामों की परंपरा भी अत्यंत रोचक है। वहाँ पहले पारिवारिक नाम और बाद में व्यक्तिगत नाम बोला जाता है, जैसे किम, यी, पाक, जून आदि। (वैसे वहाँ इतने अधिक ‘किम’ नाम वाले हैं कि वे ही लोग हँसी मज़ाक में कहते हैं कि पहाड़ से यदि एकाध पत्थर उछाला जाय तो निश्चित ही वह किसी ‘किम’ के सिर पर आकर गिरेगा) मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि विवाह के बाद भी महिलाएँ अपना पारिवारिक नाम नहीं बदलतीं। यह बात मुझे बहुत भायी, क्योंकि इससे स्त्री की मूल पहचान बनी रहती है। कोरिया में यह भी माना जाता था कि व्यक्ति का नाम उसके भाग्य को प्रभावित करता है। इसलिए बच्चों के नाम ऐसे रखे जाते थे जिनका अर्थ समृद्धि, दीर्घायु, सौभाग्य या सुंदरता से जुड़ा हो।

पुराने कोरिया में समाज कई वर्गों में विभाजित था। “यांगबान” उच्च वर्ग माना जाता था जिसमें कुलीन, विद्वान और अधिकारी आते थे। निम्न वर्गों पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध थे। मैंने कही पढ़ा था कि पुराने ज़माने में उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों को “सांगनोम” (नीच लोग) कहकर पुकारते थे और उनके साथ अत्यंत तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते थे। प्रत्येक वर्ग के बीच पहनावे, रहन-सहन और भाषा के मामलों में और विशेष रूप से विवाह तथा अंतिम संस्कार की रस्मों में स्पष्ट भेदभाव और प्रतिबंध लागू थे। जो लोग इन नियमों का उल्लंघन करते थे, उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। निम्न वर्ग के लोगों को खपरैल की छत वाले घर बनाने की मनाही थी, और सामान्य वर्ग के लोगों को अपने घरों के प्रवेश द्वार पर कोई फाटक लगाने या पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाने की अनुमति नहीं थी। यह पढ़ते हुए मुझे भारतीय समाज की वर्गीय और जातीय संरचना की शिद्दत से याद आई। मनुष्य ने लगभग हर समाज में ऊँच-नीच की दीवारें बनाई हैं। हालाँकि आधुनिक कोरिया इन विभाजनों से बहुत आगे निकल चुका है, फिर भी पुराने शब्द और सामाजिक स्मृतियाँ कहीं-कहीं आज भी जीवित हैं।

आज का कोरिया बदल रहा है। हालाँकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने कोरिया में भी कई सामाजिक परिवर्तन ला दिए हैं। छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवाओं में अकेले रहने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है और विवाह तथा जन्म-दर को लेकर वहाँ गंभीर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं। फिर भी मैंने अनुभव किया कि इन परिवर्तनों के बीच परिवार आज भी लोगों के भावनात्मक जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। आधुनिकता के बीच भी वे अपनी जड़ों को पूरी तरह छोड़ नहीं पाए हैं। महानगरों में छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवा पीढ़ी अधिक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है और जीवन की गति पहले से कहीं अधिक तेज़ हो गई है। फिर भी मैंने महसूस किया कि परिवार आज भी वहाँ भावनात्मक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। त्योहारों पर लोग अपने गाँव लौटते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर जाते हैं और पूरे परिवार के साथ समय बिताते हैं।

मि. ली यंग ची ने एक दिन कहा था कि “हम कोरियन आधुनिक हो सकते हैं, लेकिन परिवार को नहीं छोड़ सकते।” उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई थी। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को देखकर यही लगा कि संस्कृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं रहती, वह लोगों के व्यवहार, संबोधनों, भोजन की मेज़, पूर्वजों की स्मृतियों और बुज़ुर्गों के प्रति आदर में जीवित रहती है। सियोल की चमचमाती सड़कों और आधुनिक जीवन के बीच मैंने जो सबसे सुंदर चीज़ देखी, वह थी परिवार के प्रति उनका गहरा सम्मान, शायद इसलिए भी कि मैं भी संयुक्त परिवार में ही पली बढ़ी हूँ। बात तो आखिर यही है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। सच्ची आधुनिकता शायद वही है जहाँ मनुष्य आगे बढ़ते हुए भी अपने पूर्वजों, अपने परिवार और अपनी स्मृतियों का हाथ थामे रहता है।

कोरिया से लौटते समय मेरे साथ केवल कुछ तस्वीरें या वहाँ के मेरे वास की स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि संबंधों को देखने की एक नई दृष्टि भी थी। सियोल की चमकती रोशनियों के पीछे मैंने एक ऐसा समाज देखा जो आज भी अपने पूर्वजों की स्मृतियों, पारिवारिक संबोधनों और बुज़ुर्गों के सम्मान में अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है। मुझे बार-बार लगा कि एशिया की संस्कृतियाँ भले ही अलग भाषाओं में बोलती हों, पर उनके हृदय की धड़कन कहीं समान है..परिवार, स्मृति और आत्मीयता से परिपूर्ण!

*********

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ – संस्मरण – आम और खास ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण  “आम और खास”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ ☆

🌻संस्मरण 🌻 आम और खास

बचपन की घटना याद हो आई। गर्मी का मौसम, तपती दुपहरी और भरे पूरे परिवार में एक कमरे में लगा हुआ एक तीन बाँहों वाला पंखा।

जो बहुत खास था। कुछ खास मौके पर चलता था और जब चले तब बड़े थोड़े ऊंचे जगह पर बैठे जैसे तखत, पलंग, जो मध्यम थे वह स्टूल, बेंच, छोटी चौपाई। और हम बच्चे दरी या चटाई बिछा है तो भी ठीक, नहीं तो लिपा- पुता घर का सुंदर महकता हुआ वह कमरा, जानते हैं इसकी कीमत क्यों थी क्योंकि वह खास था जहाँ पर बड़े बुजुर्गों का साया था, भोजन कक्ष जहाँ से दादी और माँ की चूड़ियों की आवाज, रुतबे से बाबा और चाचा बाबा की आवाज, पिताजी अपनी सादगी और कुशल वाकपटुता से पूरे परिवार के लिए एक रामलाल की  भांति प्यारे।

जाने कहाँ गए वो दिन अब न वह जगह बची और न लोग। कहते हैं 80- 100 वर्षों के बाद घर बदल जाता है, गाँव बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं, बोली बदल जाती है, और संस्कार संस्कृति भी बदल जाती है और तो और जो खास होता है वह आम होते देर नहीं लगती।

वैसा ही हाल कुछ पंखे का हो गया। गर्मी पहले से और बेहतर हो गई है। और पंखे खास से आम हो गए हैं। न उनमें परिवार है और न वह  ठंडक वाली हवा।

आज हर कमरे में एक पंखा और ए सी  लगा हुआ है। देखा जाए सब कहते हैं यह वह खास वाला है परंतु मुझे लगता है यह खास नहीं यह तो आम हो गया है। जो हर कमरे पर है परंतु कमरे में वह नहीं है जो खास होते हैं।

बस मन की बातें थी। जो थोड़ी सी बात आप सभी के साथ साँझा कर ली। हृदय के साथ उन सभी बीती बातों को गर्मी में आम से खास और खास से आम होते देखा गया। आप सभी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बहुत-बहुत अभिनंदन। खास बने रहियेगा– शीतल, ठंडक, धीरज, श्रद्धा, निष्ठा और संस्कार को लिए। ममता, सेवा पूजन, परहित, जनहित, दया, करुणा संस्कृति को लेकर आम बने रहियेगा।

सदैव प्रभु कृपा बरसती रहेगी। जिसमें मै, मेरा को जगह न मिले, हमारे- अपने को खास बनाते रहियेगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares