(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक संस्मरणात्मक आलेख – “स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर” ।)
लंदन से –
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२५ ☆
स्मृति संस्मरण – नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मंडला का नाम लेते ही मेरे मन में सबसे पहले मां नर्मदा की स्मृति आती है। इस शहर को नर्मदा ने जैसे अपनी बांहों में ले रखा है। नदी यहां तीन ओर से अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर की तरह मंडला को घेरती हुई बहती है। इसलिए मंडला को केवल एक शहर कहना शायद उसके भूगोल और उसके स्वभाव, दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। यहां नर्मदा जीवन का हिस्सा नहीं, जीवन की धड़कन है। जीवन रेखा है। हमारा पुश्तैनी घर “महलात” यही नर्मदा जी वार्ड में था।
इन दिनों जब नर्मदा फिर उफान पर है और वहां से सुदूर लंदन में बैठे , मैंने बाढ़ के दृश्य तो टी वी पर देखे तो , बचपन चित्रवत याद हो आया ।
मंडला की सड़कों तथा निचले इलाकों में नर्मदा का पानी पहुंच गया है, मेरी स्मृतियां लगभग एक सदी पीछे की घटनाओं में लौट जाती हैं, सन 1926 में ।
मंडला में हमारा पुश्तैनी घर ‘महलात’ कहलाता है। वह आसपास के सामान्य घरों से लगभग एक मंजिल ऊंचे मिट्टी के टीले पर बना है। आज उस ऊंचाई को देखकर लगता है कि हमारे पूर्वजों ने शायद नर्मदा के स्वभाव को हमसे बेहतर समझा था।
नदी के किनारे रहने वाले लोग नदी को केवल देखते नहीं थे, उसके मिजाज को पढ़ते भी हैं।
सन 1926 में मंडला में नर्मदा की भयंकर बाढ़ आई थी। उसी वर्ष मेरे पिताजी का जन्म हुआ था। मेरे बचपन में मेरी दादी (स्व श्रीमती सरस्वती देवी) उस बाढ़ की कहानी सुनाया करती थीं। उनके लिए 1926 कोई पुरानी तारीख मात्र नहीं थी, बल्कि परिवार की स्मृति में जीवित एक घटना थी।
वह बाढ़ इतनी विकराल थी कि चारों ओर पानी फैल गया था। बहुत से लोग अपने घरों में फंस गए थे। तब महलात का ऊंचा टीला उनके लिए आश्रय बन गया। दादी बताया करती थीं कि आसपास के घरों की दीवारें तोड़कर (खासकर असगर वकील साहब का घर, जिसमें उनके पार्टिशन के दौरान पाकिस्तान चले जाने के बाद अब जसवानी परिवार रहता है) रास्ते बनाए गए, ताकि पानी से घिरे लोगों को हमारे महलात तक सुरक्षित लाया जा सके। जहां कोई हाथ मदद के लिए उठा, उसे थाम लिया गया।
मैं कल्पना करता हूं कि उस समय हमारा घर केवल हमारा घर नहीं रहा । वह संकट में घिरे लोगों का उनका घर बन गया था।
दादी बताती थीं कि हजारों लोगों ने वहां शरण ली थी। पानी कब उतरेगा, इसका किसी को पता नहीं था। हमारे पूर्वजों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था की। नर्मदा का पानी धीरे-धीरे उतरता रहा और महलात का टीला उन दिनों न जाने कितने परिवारों के लिए जीवन का सहारा बना रहा।
हमारे पास उस समय के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर द्वारा दी गई सनद भी सुरक्षित है। वह पुराना कागज मेरे लिए किसी सरकारी दस्तावेज से अधिक है। उसमें एक बीते समय की छाया है और उस छाया में उन लोगों की कहानी भी, जिन्होंने विपत्ति के समय अपने घर की सीमाएं दूसरों के लिए खोल दी थीं।
आज जब हम बाढ़ को जलस्तर, खतरे के निशान और सरकारी चेतावनियों के आंकड़ों में समझते हैं, तब उस समय की कल्पना करना कठिन लगता है। न मोबाइल था, न मौसम की तत्काल सूचना, न आधुनिक बचाव दल। फिर भी लोगों के पास एक ऐसी व्यवस्था थी जिसे किसी सरकारी पुस्तिका में दर्ज नहीं किया जा सकता , एक-दूसरे के लिए खुला हुआ मन और घर।
इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि 1926 नर्मदा की बड़ी ऐतिहासिक बाढ़ों में थी। मंडला के उपलब्ध आधिकारिक जलस्तर अभिलेखों में उसके बाद 1974 का बाढ़ स्तर सर्वाधिक दर्ज है।मेरे लिए 1926 का महत्व किसी आंकड़े से तय नहीं होता। वह मेरे परिवार की स्मृति में उस बाढ़ का वर्ष है, जब महलात ने अपने दरवाजे हजारों लोगों के लिए खोल दिए थे। मेरे स्व पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जो वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए,का जन्म उसी दौरान हुआ था।
यही स्मृति आज की बाढ़ को देखते हुए और गहरी हो जाती है।
लगभग सौ वर्ष बाद नर्मदा फिर उसी शहर में अपने रौद्र रूप में है। घाटों और निचले इलाकों में पानी पहुंच रहा है। कुछ परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। प्रशासन और बचाव दल सतर्क हैं। नदी फिर अपने पुराने अधिकार का स्मरण करा रही है।
समय बदल गया है। घर बदल गए हैं। बचाव के साधन बदल गए हैं। नदी को मापने के हमारे तरीके बदल गए हैं। लेकिन नदी का स्वभाव नहीं बदला।
और शायद मनुष्य की असली परीक्षा भी नहीं बदली।
बाढ़ जब आती है तो वह यह नहीं पूछती कि किसका घर कितना बड़ा है। कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है, पानी सब दीवारों को एक ही भाषा में पढ़ता है। ऐसे समय में किसी ऊंचे घर की उपयोगिता उसकी ऊंचाई में नहीं, उसके खुले दरवाजे में होती है।
महलात का वह टीला आज भी है। उसके आसपास बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन उसकी मिट्टी में जैसे 1926 की स्मृति अब भी बसी हुई है। मुझे लगता है, उस मिट्टी ने केवल पानी नहीं देखा होगा , उसने भय देखा होगा, प्रतीक्षा देखी होगी, लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनते देखा होगा।
इतिहास हमें बताता है कि बाढ़ कितनी ऊंची थी। स्मृति बताती है कि उस बाढ़ में कितने हाथ एक-दूसरे को थामे हुए थे।
इसीलिए आज जब नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे तक आई है, मेरी आंखों के सामने महलात का वही ऊंचा टीला उभर आता है। दादी की आवाज जैसे फिर सुनाई देती है , पानी बढ़ रहा था, लोग आते जा रहे थे, दीवारें तोड़ी जा रही थीं और महलात सबके लिए खुला था।
नर्मदा जीवनरेखा है। कभी वह जीवन देती है, कभी जीवन की नश्वरता का बोध कराती है। मंडला ने उसके दोनों रूप देखे हैं।
और महलात ने भी।
शायद किसी घर की सबसे बड़ी विरासत उसकी दीवारें नहीं होतीं। उसकी असली विरासत वह स्मृति होती है कि किसी कठिन समय में उसके दरवाजे कितने लोगों के लिए खुले थे।
मुझे लगता है, महलात आज भी उसी ऊंचाई पर खड़ा होकर नदी को देख रहा है, जैसे एक बूढ़ा घर अपनी पुरानी नदी से कह रहा हो, तुम्हें अपना स्वभाव याद है, मुझे अपना।
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
दादी एक शिक्षक की पत्नी थीं, पर उनका स्वभाव बिल्कुल माटी जैसा सरल था। बाबा जब भी उनके किस्से सुनाते, तो उनकी आँखें छलक उठतीं। वे अक्सर बताया करते थे कि कैसे दादी महुआ बिनने, सुखाने और पीसने से लेकर लकड़ी के चूल्हे पर रसोई बनाने तक का सारा काम अकेले हंसते-हंसते कर लेती थीं। उन दिनों पापा पटना में रहकर पढ़ाई भी करते थे और नौकरी भी; तब रात्रि पाठशालाएं (नाइट स्कूल) हुआ करती थीं। हमारा गाँव पटना से कोसों दूर था। उस दौर में आज जैसे सुख-साधन भले न रहे हों, पर मुश्किलों के समाधान ज़रूर थे और सबसे बढ़कर था — आपसी विश्वास की एक मजबूत नाव।
बाबा के परिवार की पृष्ठभूमि अम्मा के मायके से बिल्कुल उलट थी। जहाँ पापा एक साधारण शिक्षक और किसान के बेटे थे, वहीं अम्मा दरभंगा के एक संभ्रांत जमींदार परिवार की हंसमुख बेटी थीं। नियति ने दोनों का गठबंधन तो करा दिया, लेकिन बदले में अम्मा से उनका ऐश्वर्य और बहुत कुछ छीन लिया।
अम्मा अक्सर एक बात याद करती थीं कि एक बार नानी ने उनसे कहा था — “पति के चरण या ज़मीन के नीचे ही स्त्रियों का असली स्थान होता है।”
अम्मा ने अपनी माँ की इस सीख को गाँठ बांध लिया। वे अपनी सास (दादी) और बड़की माई के पदचिह्नों पर चुपचाप चल पड़ीं। वह ऐसा दौर था जब चावल बाज़ारों में पैकेटों में नहीं मिलते थे; धान को उबालना, सुखाना, कूटना और फटकना पड़ता था, तब कहीं जाकर थाली में भात सजता था। आटा और दाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही मशक्कत भरी थी। घर कच्चे थे, जिन्हें संवारने के लिए मिट्टी और गोबर की ज़रूरत होती थी। द्वार पर बंधे मवेशियों से गोबर मिल जाता था। गृहस्थी के इन कामों को सहेजते-सहेजते जमींदार की वह बेटी न जाने कब सीधा पल्लू रखना भूल गई और सिर पर उल्टा पल्लू रखे कब इस गाँव की संस्कारी बहू बन गई, उसे खुद भी पता न चला।
मर्यादा ऐसी थी कि बड़े बाबूजी (जेठ जी) के सामने अम्मा कभी नहीं गईं और न ही बड़े बाबूजी कभी अम्मा के समक्ष आए। दादी की मृत्यु के बाद घर का नेतृत्व बड़की माई ने संभाला। उनके साए में पूरा परिवार हमेशा ‘संयुक्त‘ रहा। गाहे-बगाहे सब मिलते रहे।
तीज-त्योहार हो, शादी-ब्याह हो, या जीवन-मृत्यु का कोई अवसर—इन सब सामाजिक ताने-बाने को उन्हीं तथाकथित ‘गंवार‘ स्त्रियों ने मिलकर बखूबी चलाया। और तब तक चलाया, जब तक कि उस परिवार में ‘पढ़े-लिखे‘ लोगों का आगमन और हस्तक्षेप नहीं हुआ। जैसे ही आधुनिकता और शिक्षा का अहंकार घुसा, धीरे-धीरे गाँव का वह भरा-पूरा घर खाली होता चला गया। पुराने बुजुर्ग रहे नहीं और नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में रम गई।
अब आलम यह है कि आज के बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं—
“पापा, क्या यह आटे का पेड़ है?”
तो पिता झेंपते हुए कहते हैं— “नहीं बेटा, यह गेहूँ का पौधा है।”
यह आधुनिक काल है या हमारी समझ का पतन, यह तो समझ से परे है। लेकिन इतना तो तय है कि आज के इन ‘समझदार‘ और पढ़े-लिखे लोगों से कहीं बेहतर वे ‘गंवार‘ लोग थे। वे चाहे जैसे भी थे, अपने भरे-पूरे कुनबे को एक डोर में बांधकर रखते तो थे! तीज-त्योहारों और गर्मियों की छुट्टियों में बेटियाँ और बुआ मायके की राह ताकती तो थीं!
परन्तु अब… अब अपनों के इंतज़ार की वह राह और वह गाँव का घर, दोनों ही बेनूर हो चुके हैं। अब कुछ नहीं बचा।
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
कोरिया में रहते हम भारतीयों को एक भारत प्रेमी कोरियाई मित्र मिलें….ली यंग ची! जो भी नया भारतीय प्रोफेसर विश्वविद्यालय में आता वह उनसे मिलने अवश्य आ जाते। वैसे ही वे मुझे भी मिलने आए। फिर ड़ॉ. रवीन्द्र गर्गेश, ड़ॉ. राजीव खन्ना, डॉ. रमेश शर्मा और फिर डॉ. एम. पी शर्मा इन सबसे वे मिले। फिर हम सबका एक अच्छा ग्रूप ही बना। कोरियाई संस्कृति की बहुत सी जानकारी उनसे ही हमें मिली थी। वे हमें वीक येंड पर कभी कोरिया क कुछ खास जगहों पर घूमाने ले जाते फिर वह स्प्रींग फेस्टीवल हो या,पहाडी पर बना कोई बौद्ध विहार हो, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमारेखा हो या फिर घर का कोरियन भोजन हो वे हमें ले जातें, साथ आतें और कभी कभी मेरे घर आकर भारतीय भोजन भी करते। कोरिया की परिवार- व्यवस्था, वहाँ के पारिवारिक संबंध, मान-सम्मान आदि की जानकारी उनसे तथा अन्य दोस्तों से मिली। श्रीमान यंग ची ली से आज भी मैं सोशल मीडिया के ज़रिए जुडी हुई हूँ। मैं जब कोरियाई लोकोक्तियों पर यूँ ही काम कर रही थीं तो उन्होंने मुझे कई लोकोक्तियों की जानकारी दी थीं। कोरियाई संस्कृति को समझने के लिए कुछ अंग्रेजी पुस्तकें भी ला दी थीं। उनकी वजह से कोरियाई भाषा और संस्कृति को समझने में भी आसानी हो रही थी।
कोरिया मेरे लिए केवल एक विदेश में जाकर अपनी सेवाएं देना नहीं था। वह एक प्रवास भी था.. एक सांस्कृतिक प्रवास!… जिसमें मैंने आधुनिकता और परंपरा को एक साथ चलते हुए देखा। जब मैं सियोल पहुँची थी, तब मेरी आँखों के सामने एक अत्यंत आधुनिक, विकसित देश था..ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, अत्याधुनिक मेट्रो, हर हाथ में मोबाइल और भागती हुई ज़िंदगी। मुझे लगा था कि इतने आधुनिक समाज में शायद पारिवारिक जीवन केवल औपचारिकता भर रह गया होगा.. किंतु धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि इस चमकदार आधुनिकता के भीतर एक अत्यंत गहरी पारिवारिक चेतना जीवित है।
कोरिया को समझने के लिए वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था को समझना आवश्यक है। वहाँ परिवार केवल माता-पिता और बच्चों का छोटा-सा समूह नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा, पूर्वजों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ी एक जीवित संस्था है। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था पर कन्फ्यूशियस विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है। चीन से आए कन्फ्यूशियस दर्शन ने सदियों तक कोरिया के सामाजिक और नैतिक जीवन को दिशा दी। विशेषकर जोसॉन राजवंश के समय परिवार को समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया। कन्फ्यूशियस सिद्धांतों के अनुसार माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रकि आज्ञाकारिता, परिवार की प्रतिष्ठा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य माने जाते थे। यही कारण है कि कोरिया में बच्चों को बचपन से ही विनम्रता, अनुशासन और पारिवारिक मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता रहा।
पुराने समय में कोरिया में तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं। परिवार का मुखिया सबसे वरिष्ठ पुरुष होता था और उसका निर्णय पूरे परिवार के लिए अंतिम माना जाता था। बहुएँ सास-ससुर की सेवा को अपना धर्म समझती थीं और पुत्र अपने माता-पिता की अनुमति के बिना कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते थे। यह सब सुनते-पढ़ते मुझे अपने भारतीय संयुक्त परिवारों की याद आती रहती थी। मुझे अक्सर लगता कि एशिया की संस्कृतियों में भले ही भाषाएँ भिन्न भिन्न हों, पर परिवार के प्रति भाव लगभग समान हैं।
मुझे आज भी वह दिन याद है जब मुझे और डॉ. गर्गेश जी को हमारे एक कोरियाई छात्र आलाम (कोरियन व्यक्तिवाचक नाम) ने अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके घर में उनके बुज़ुर्ग पिता भी थे। सबसे मिलने और बातें करने के बाद मेज़ पर भोजन लगाया गया… और कहा गया कि भोजन के लिए चलें…भारतीय सहजता में हम जाकर खाने की मेज़ के पास बैठने लगें, पर बाकी सब वहीं रुके रहें मेरी समझ में नहीं ?..तभी आलाम ने मुस्कुराते हुए पर हौले से कहा, “पहले अप्पा…” हम तुरंत सँभल गएं। यही बात मैंने प्रो. ली हो जंग के घर में भी महसूस की थी। कुछ ही क्षणों में उसके पिता कमरे में आए। घर के सभी सदस्यों ने हल्का झुककर उनका अभिवादन किया और उनके बैठने के बाद ही बाकी लोग बैठें। उस दृश्य में एक शांत गरिमा थी। अचानक मुझे अपना घर याद आ गया जहाँ बचपन में दादा जी के बैठने के बाद ही भोजन आरंभ होता था। भारत और कोरिया के बीच हज़ारों किलोमीटर की दूरी अवश्य है, पर संस्कारों की धरती कहीं बहुत निकट है। केवल घरों में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में भी बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता था। मेट्रो में युवा तुरंत अपनी सीट वृद्ध लोगों के लिए छोड़ देते थे। किसी बड़े व्यक्ति को वस्तु देते समय दोनों हाथों का प्रयोग करना सामान्य शिष्टाचार माना जाता था। भले ही पेन ही क्यों न देना हो दोनों हाथों से पकड़कर ही दिया जाता था। अभिवादन करते समय हल्का झुकना वहाँ के व्यवहार का सहज हिस्सा था। इन छोटी-छोटी बातों में मुझे संस्कारों की वह निरंतरता दिखाई देती थी जो आधुनिक जीवन की तीव्र गति के बीच भी जीवित थी। भोजन के दौरान हमने देखा कि घर का युवा बेटा अत्यंत संयम से बैठा था। वह अपने पिता के सामने ऊँची आवाज़ में बोल नहीं रहा था और न ही किसी प्रकार की असावधानी दिखा रहा था। मेरे छात्र ने बताया कि माता-पिता के सामने धूम्रपान या शराब पीना आज भी असभ्यता माना जाता है। मैंने हल्के मज़ाक में कहा, “तो फिर यहाँ के युवाओं को दो व्यक्तित्व रखने पड़ते होंगे, एक दोस्तों के साथ और एक घर में!” मेरी बात सुनकर वह झेंप गया।
कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था की सबसे अद्भुत बात मुझे यह लगी कि वहाँ दूर-दूर के रक्त-संबंधी भी स्वयं को एक ही परिवार का सदस्य मानते हैं। यदि किसी व्यक्ति का पूर्वज समान है, तो वे स्वयं को “इल्गा” अर्थात् “एक ही घराने/ परिवार/वंश” का सदस्य कहते हैं। कोरिया में बसी एक अमेरिकन प्रोफेसर मिस. एलिना जो वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और सालों से वहीं कोरिया में थी, उसने एक दिन अपने कोरियाई मित्र को घर बुलाया था, उस समय उसने मुझे और मोशा को भी आमंत्रित किया थ…स्ट्रॉबेरी और योगहर्ट खाने के लिए। तब बातों ही बातों में उस कोरियाई महिला ने हमें अपने परिवार की वंशावली हमें दिखायी थी.. बिलकुल वंशवृक्ष बनाकर। वह बता रही थी ऐसे वंशवृक्ष में कई पीढ़ियों के नाम, जन्म, विवाह, मृत्यु, सरकारी पद और यहाँ तक कि कब्रों के स्थान तक दर्ज होते हैं। मैं आश्चर्य से उसे देखती रही। मुझे लगा जैसे मैं किसी परिवार का इतिहास नहीं, बल्कि किसी छोटे राज्य का अभिलेख ही देख रही हूँ। मोशा और मैं दंग रह गए इतनी बारीकी से विवरण दिया जाता है। वैसे अपने यहाँ भी कुछ कुछ समुदायों में ऐसी जानकारी मिलती हैं। मुझे याद है हमारे गली में कुछ खास समुदाय ( विशेषकर लिंगायत समुदाय के कोष्टि (जाडरु) समुदाय) के लोग आते थे और घर-परिवार की जानकारी अपने बही खाते में दर्ज कर जाते थे… कौन-कौन अब नहीं रहें, कौन नया सदस्य परिवार में जन्मा है इसकी जानकारी वे लेते हैं। ये सरकारी लोग नहीं होते.. ये उस खास कम्युनीटि के स्वामी जैसे लगते थे.. जिन्हें ‘हेळव’ कहा जाता था.. अर्थात सुमदाय के बारे में जानकारी देनावेला या रखनेवाला.. जो हर साल आकर घर घर जाकर जानकारी इकट्ठा कर अपने बही खाते में दर्ज कर देते थे।
दरअसल कोरिया में वंशावली केवल दस्तावेज़ नहीं बल्कि वह सम्मान, पहचान और पारिवारिक स्मृति का प्रतीक होती है। परिवार के लोग उसे लगभग किसी पवित्र ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखते हैं। कोरिया में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुई। उसने बताया कि विशेष अवसरों पर वे अपने पूर्वजों की स्मृति में भोजन अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करते हैं। विशेष रूप से “चुसोक” जैसे पारिवारिक त्योहारों के समय पूरा कोरिया जैसे अपने मूल की ओर लौटता दिखाई देता है। लोग महानगरों से अपने गाँव जाते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर श्रद्धा अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ पारंपरिक भोजन करते हैं। उस समय मुझे बार-बार भारतीय पर्वों की याद आती थी, ऐसे पर्वों और उत्सवों के समय घर से दूर रहने वाले लोग अपने घर लौटने का प्रयास करते हैं। मुझे लगा कि एशिया की संस्कृतियों में भी परिवार केवल साथ रहने भर की व्यवस्था नहीं है, बल्कि स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। उस आधुनिक महानगर में यह दृश्य देखकर मुझे लगा कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य अपनी जड़ों से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।
कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को समझने में वहाँ के पारिवारिक संबोधनों ने मेरी बहुत सहायता की। वहाँ हर रिश्ते के लिए अलग शब्द है और यह भी महत्वपूर्ण है कि बोलने वाला लड़का है या लड़की। लड़की अपने बड़े भाई को “ओप्पा” कहती है, जबकि लड़का अपने बड़े भाई को “ह्योंग” कहता है। बड़ी बहन के लिए “ओन्नी” और “नूना” जैसे अलग संबोधन हैं। शुरू-शुरू में मैं इन शब्दों में बहुत उलझ जाती थी। एक बार मैंने गलती से किसी महिला को “ह्योंग” कह दिया। साथ में बैठे छात्र हँसने लगे और मैं संकोच से भर उठी। बाद में वही घटना हमारी मित्र-मंडली का प्रिय हास्य प्रसंग बन गई। पर धीरे-धीरे समझ आने लगा कि ये संबोधन केवल शब्द नहीं हैं, इनके भीतर पूरा सामाजिक अनुशासन और आत्मीयता छिपी हुई है। एक और बात वहाँ संबंधों के भीतर एक विशेष भावनात्मक आत्मीयता है, जिसे कोरिया में “जोंग” (Jeong) कहा जाता है। यह ऐसा लगाव है जो केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मित्रों, पड़ोसियों और सहकर्मियों तक फैल जाता है। शायद यही कारण था कि मि.ली यंग ची, या मि. जून जैसे लोग हमारे लिए केवल परिचित नहीं रहे, बल्कि परिवार जैसे बन गए थे। मुझे कई बार लगा कि कोरियाई समाज की आत्मा इसी “जोंग” में बसती है।
ओप्पा, अम्मा जैसे संबोधनों को सुनते हुए मैं बार-बार मराठी और कन्नड भाषा से रिलेट कर करती थी। दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक की पारिवारिक संस्कृति में भी रिश्तों के लिए अत्यंत आत्मीय और सूक्ष्म संबोधन हैं, अण्णा, अक्का, अम्मा, अप्पा, अज्जी, अज्जा, चिकप्पा, माव आदि। ऐसे ही मराठी में भी हैं दादा, भाऊ, आई, बाबा, आजी, आजा, काका, मामा आदि आदि हिंदी में भी है। हमारी तरह ही कोरिया में भी किसी बड़े व्यक्ति को केवल नाम से पुकारना असभ्यता माना जाता है। बस अंग्रेजी ने सारे संबंधों को ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा दिया है। कोरिया में “ओप्पा” सुनते ही मेरे मन में “अण्णा” गूँज उठता था। “अम्मा” और “अप्पा” जैसे शब्द तो इतने परिचित लगे कि कई बार मुझे लगता था जैसे मैं किसी दूर देश में नहीं, बल्कि अपने ही सांस्कृतिक परिवेश के किसी दूसरे रूप में हूँ। इन्हीं समानताओं ने मेरे भीतर कोरियाई भाषा और वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। मुझे लगा कि एशियाई संस्कृतियों में परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक संसार का केंद्र है।
कोरिया में नामों की परंपरा भी अत्यंत रोचक है। वहाँ पहले पारिवारिक नाम और बाद में व्यक्तिगत नाम बोला जाता है, जैसे किम, यी, पाक, जून आदि। (वैसे वहाँ इतने अधिक ‘किम’ नाम वाले हैं कि वे ही लोग हँसी मज़ाक में कहते हैं कि पहाड़ से यदि एकाध पत्थर उछाला जाय तो निश्चित ही वह किसी ‘किम’ के सिर पर आकर गिरेगा) मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि विवाह के बाद भी महिलाएँ अपना पारिवारिक नाम नहीं बदलतीं। यह बात मुझे बहुत भायी, क्योंकि इससे स्त्री की मूल पहचान बनी रहती है। कोरिया में यह भी माना जाता था कि व्यक्ति का नाम उसके भाग्य को प्रभावित करता है। इसलिए बच्चों के नाम ऐसे रखे जाते थे जिनका अर्थ समृद्धि, दीर्घायु, सौभाग्य या सुंदरता से जुड़ा हो।
पुराने कोरिया में समाज कई वर्गों में विभाजित था। “यांगबान” उच्च वर्ग माना जाता था जिसमें कुलीन, विद्वान और अधिकारी आते थे। निम्न वर्गों पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध थे। मैंने कही पढ़ा था कि पुराने ज़माने में उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों को “सांगनोम” (नीच लोग) कहकर पुकारते थे और उनके साथ अत्यंत तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते थे। प्रत्येक वर्ग के बीच पहनावे, रहन-सहन और भाषा के मामलों में और विशेष रूप से विवाह तथा अंतिम संस्कार की रस्मों में स्पष्ट भेदभाव और प्रतिबंध लागू थे। जो लोग इन नियमों का उल्लंघन करते थे, उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। निम्न वर्ग के लोगों को खपरैल की छत वाले घर बनाने की मनाही थी, और सामान्य वर्ग के लोगों को अपने घरों के प्रवेश द्वार पर कोई फाटक लगाने या पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाने की अनुमति नहीं थी। यह पढ़ते हुए मुझे भारतीय समाज की वर्गीय और जातीय संरचना की शिद्दत से याद आई। मनुष्य ने लगभग हर समाज में ऊँच-नीच की दीवारें बनाई हैं। हालाँकि आधुनिक कोरिया इन विभाजनों से बहुत आगे निकल चुका है, फिर भी पुराने शब्द और सामाजिक स्मृतियाँ कहीं-कहीं आज भी जीवित हैं।
आज का कोरिया बदल रहा है। हालाँकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने कोरिया में भी कई सामाजिक परिवर्तन ला दिए हैं। छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवाओं में अकेले रहने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है और विवाह तथा जन्म-दर को लेकर वहाँ गंभीर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं। फिर भी मैंने अनुभव किया कि इन परिवर्तनों के बीच परिवार आज भी लोगों के भावनात्मक जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। आधुनिकता के बीच भी वे अपनी जड़ों को पूरी तरह छोड़ नहीं पाए हैं। महानगरों में छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवा पीढ़ी अधिक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है और जीवन की गति पहले से कहीं अधिक तेज़ हो गई है। फिर भी मैंने महसूस किया कि परिवार आज भी वहाँ भावनात्मक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। त्योहारों पर लोग अपने गाँव लौटते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर जाते हैं और पूरे परिवार के साथ समय बिताते हैं।
मि. ली यंग ची ने एक दिन कहा था कि “हम कोरियन आधुनिक हो सकते हैं, लेकिन परिवार को नहीं छोड़ सकते।” उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई थी। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को देखकर यही लगा कि संस्कृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं रहती, वह लोगों के व्यवहार, संबोधनों, भोजन की मेज़, पूर्वजों की स्मृतियों और बुज़ुर्गों के प्रति आदर में जीवित रहती है। सियोल की चमचमाती सड़कों और आधुनिक जीवन के बीच मैंने जो सबसे सुंदर चीज़ देखी, वह थी परिवार के प्रति उनका गहरा सम्मान, शायद इसलिए भी कि मैं भी संयुक्त परिवार में ही पली बढ़ी हूँ। बात तो आखिर यही है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। सच्ची आधुनिकता शायद वही है जहाँ मनुष्य आगे बढ़ते हुए भी अपने पूर्वजों, अपने परिवार और अपनी स्मृतियों का हाथ थामे रहता है।
कोरिया से लौटते समय मेरे साथ केवल कुछ तस्वीरें या वहाँ के मेरे वास की स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि संबंधों को देखने की एक नई दृष्टि भी थी। सियोल की चमकती रोशनियों के पीछे मैंने एक ऐसा समाज देखा जो आज भी अपने पूर्वजों की स्मृतियों, पारिवारिक संबोधनों और बुज़ुर्गों के सम्मान में अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है। मुझे बार-बार लगा कि एशिया की संस्कृतियाँ भले ही अलग भाषाओं में बोलती हों, पर उनके हृदय की धड़कन कहीं समान है..परिवार, स्मृति और आत्मीयता से परिपूर्ण!
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण “आम और खास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ ☆
🌻संस्मरण 🌻 आम और खास ☆
बचपन की घटना याद हो आई। गर्मी का मौसम, तपती दुपहरी और भरे पूरे परिवार में एक कमरे में लगा हुआ एक तीन बाँहों वाला पंखा।
जो बहुत खास था। कुछ खास मौके पर चलता था और जब चले तब बड़े थोड़े ऊंचे जगह पर बैठे जैसे तखत, पलंग, जो मध्यम थे वह स्टूल, बेंच, छोटी चौपाई। और हम बच्चे दरी या चटाई बिछा है तो भी ठीक, नहीं तो लिपा- पुता घर का सुंदर महकता हुआ वह कमरा, जानते हैं इसकी कीमत क्यों थी क्योंकि वह खास था जहाँ पर बड़े बुजुर्गों का साया था, भोजन कक्ष जहाँ से दादी और माँ की चूड़ियों की आवाज, रुतबे से बाबा और चाचा बाबा की आवाज, पिताजी अपनी सादगी और कुशल वाकपटुता से पूरे परिवार के लिए एक रामलाल की भांति प्यारे।
जाने कहाँ गए वो दिन अब न वह जगह बची और न लोग। कहते हैं 80- 100 वर्षों के बाद घर बदल जाता है, गाँव बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं, बोली बदल जाती है, और संस्कार संस्कृति भी बदल जाती है और तो और जो खास होता है वह आम होते देर नहीं लगती।
वैसा ही हाल कुछ पंखे का हो गया। गर्मी पहले से और बेहतर हो गई है। और पंखे खास से आम हो गए हैं। न उनमें परिवार है और न वह ठंडक वाली हवा।
आज हर कमरे में एक पंखा और ए सी लगा हुआ है। देखा जाए सब कहते हैं यह वह खास वाला है परंतु मुझे लगता है यह खास नहीं यह तो आम हो गया है। जो हर कमरे पर है परंतु कमरे में वह नहीं है जो खास होते हैं।
बस मन की बातें थी। जो थोड़ी सी बात आप सभी के साथ साँझा कर ली। हृदय के साथ उन सभी बीती बातों को गर्मी में आम से खास और खास से आम होते देखा गया। आप सभी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बहुत-बहुत अभिनंदन। खास बने रहियेगा– शीतल, ठंडक, धीरज, श्रद्धा, निष्ठा और संस्कार को लिए। ममता, सेवा पूजन, परहित, जनहित, दया, करुणा संस्कृति को लेकर आम बने रहियेगा।
सदैव प्रभु कृपा बरसती रहेगी। जिसमें मै, मेरा को जगह न मिले, हमारे- अपने को खास बनाते रहियेगा।
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. इन्द्र बहादुर खरे
☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ ☆
☆ “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(73 वी पुण्य तिथि 13 अप्रैल पर शत शत नमन)
बड़ी भली है अम्मा मेरी
ताजा दूध पिलाती है।
मीठे मीठे फल लेकर
मुझको रोज खिलाती है।
अपने समय में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल उपरोक्त मनमोहक काव्य पंक्तियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविदस्व श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपनी साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया था। खरे जीने अपने साहित्यिक जीवन में गद्य और पद्य में जो कुछ भी साहित्य सृजन किया उसने उनके समय में तो अपार लोकप्रियता अर्जित की ही बल्कि वह आज भी चर्चित, पठनीय और प्रभावी है।
हितकारणी कालेज के प्रारंभिक काल के प्रसिद्ध प्राध्यापक, जबलपुर के माडल हाई स्कूल के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विजन के फूल और भोर के गीत जैसी अनेक काव्य कृतियों के रचियता स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपने समय में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के प्रतिष्ठित लेखकों के रुप में चर्चित रहे हैं लेकिन यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने समय में ऐसी पाठ्य पुस्तकों की रचना की जो कि उनके समय में पाठ्यक्रम में न केवल शामिल की गई बल्कि उपयोगी और ज्ञानवर्धक भी सिद्ध हुईं। शिक्षा जगत के लिए काफी पहले भारत के गौरवशाली इतिहास से छात्रों को परिचित कराने के लिए भारत वैभव के नाम से 3 भागों में विभक्त पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की गई थीं जिसमें भारत वैभव के भाग 3 की रचना स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे नेकी थी।
सुभाष प्रिटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक में 21 अध्याय शामिल किये गए थे जिसमें हमारा देश, भारतीय स्वतंत्रता, 1857 की जनक्रांति, गांधीजी और असहयोग आंदोलन, हमारी राजनीतिक प्रगति, बारडोली सत्याग्रह और सरकारी दमन, 1934 से 1941 और 1942 से 1947 तक का कालखंड, आजादी के बाद का घटना चक्र इत्यादि प्रमुख विषयों से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण बातें समझाईं गयी थी।
आज अगर हम इस पुस्तक की विभिन्न बातों पर ध्यान दें तो हम आज भी ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से इस पुस्तक को शिक्षा जगत के लिए प्रासंगिक और उपयोगी पाते हैं। इस सबंध में स्व. श्री खरे जी के सुपुत्र आदरणीय श्री अमित रंजन जी ने भी पुस्तक में लिखा है कि आदरणीय पाठक स्वयं तय करें कि 150 में लिखी पुस्तक आज भी कहाँ तक उपयोगी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्व श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की अन्य पठनीय और लोकप्रिय कविताओं को पूर्व में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनमें बड़ी भली है अम्मा मेरी, ताजा दूध पिलाती है, शिक्षा जगत में काफी लोकप्रिय और प्रभावी मानी जाती थी।
भोपाल के संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन खरे परिवार के सहयोग से किया गया है। इस पुस्तक का आवरण पृष्ठ भारत के नक्शे में महात्मा गॉंधी के चित्र के साथ काफी आकर्षक लग रहा है। इस पुस्तक के प्रकाशन से आदरणीय स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी का प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व और भारत के ऐतिहासिक महत्व की बातें दोनों ही दिल और दिमाग में ताजी हो गईं।
साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के ऐसे श्रद्धेय और प्रेरणा स्रोत पितृ पुरुष स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण के साथ शत शत प्रणाम।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण – “साइकिल वाले सर… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६१ ☆
संस्मरण – साइकिल वाले सर… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बात 1994-95 की है। लवलेश सोलापुर में तैनात थे, दो चार महीने ही हुए थे। हिंदी कार्यशाला का आयोजन था। पैंसठ सत्तर वर्ष के एक वृद्ध करीब साढ़े छह फुट लंबे चोडा सीना, रंग गोरा ऑफिस में प्रविष्ट हुए। हिंदी कार्यशाला में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। वे डी.ए.वी. कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल थे और एन.सी.सी. के कमांडेंट। हालांकि अंग्रेजी के विद्वान थे पर हिंदी ऐसी बोलते थे कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए। पंजाबी थे और उनके संभाषण में पंजाबी टोन और अधिक रस घोल देती।
उन्हें देखते ही मिलने की एक सहज उत्कंठा जागृत हो जाती। व्याख्यान समाप्त होने के बाद लवलेश उनके सामने हाजिर हुआ और जैसे दृष्टि मिली तो वह एक विद्यार्थी की तरह उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने उसे बाँह पकड़ कर उठाया और खाली पड़ी कुर्सी पर बिठाया तथा स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए। लवलेश का परिचय पूछा, कहाँ के निवासी हो, रुचियाँ क्या क्या हैं, सोलापुर में कहाँ रहते हो। वे पूछते गए और वहउत्तर देता गया।
वे भसीन सर के नाम से विख्यात थे। पूरा नाम पुराने लोग ही जानते होंगे। साइकिल पर हमेशा चलते और साइकिल पर एक झोला टंगा रहता। साइकिल वाले सर। रविवार का दिन था। लवलेश परिवार के साथ नाश्ता करने वाला था । घर के नाम पर एक ही कमरा था और उससे अटैच टॉयलेट बाथरूम। बेटे ने बताया कोई वृद्ध अंकल हैं साइकिल लिए हुए। लवलेश बाहर निकला और उन्हें प्रणाम करके अंदर ले आया। चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनके सामने नाश्ते की प्लेट रखी, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। बातचीत में बताया कि उनकी दो बेटियाँ हैं। एक बेटी मुंबई में डॉक्टर है दामाद भी डॉक्टर हैं। छोटी बेटी डॉक्टरी पढ़ रही थी कि अचानक बीमार पड़ी तो आज तक पड़ी है। उसके इलाज पर सब कुछ चला गया। पैंशन से जैसे तैसे खर्च चल जाता है। ट्यूशन भी कर लेता हूँ। फिर मुस्कुरा कर तनाव झटक दिया और बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। चलते चलते बोले कि मैं यहाँ से गुजर रहा था तो सहज ही साइकिल आपकी ओर मुड़ गई। वैसे मैं किसी के घर बहुत कम जाता हूँ।
कई बार बाजार में मिले तो उसी साइकिल पर। बाजार में भी लोग उनकी बहुत इज्जत करते। वे सबसे उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई की बात करते और कोई कठिनाई होती तो उसे दूर करने के लिए साइकिल पर ही उस बच्चे के स्कूल या कॉलेज में पहुंच जाते। प्राचार्य से बात करके समस्या सुलझा देते। सभी प्राचार्य उनका बहुत सम्मान करते क्योंकि अधिकांश उनके विद्यार्थी रहे थे या एनसीसी कैडेट्स।
उनके बहुत सारे विद्यार्थी आईएएस करके उच्च पदों पर आसीन थे। लवलेश के एक मित्र ओबीसी कैडर के थे और उनके बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए कास्ट वेलीडिटी सर्टिफिकेट चाहिए था। बहुत भागा दौड़ की पर सफलता नहीं मिली। वे दोनों घर पर हताश बैठे थे कि भसीन सर आ गए। हमारी चिंता सुनकर बोले कि मैं एक पत्र लिखता हूँ। आप उसे भेज दीजिए। उनकी हैंड राइटिंग इतनी सुंदर थी बिल्कुल मोती जैसी। टाइपिंग की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनकी हैंड राइटिंग उनकी पहचान थी। उनके पत्र का यह असर हुआ कि बच्चे का प्रोवीजनल एडमिशन हो गया और कॉलेज को अनुदेश प्राप्त हुए कि इस प्रमाण पत्र के लिए योग्य विद्यार्थियों का एडमिशन रोका न जाए और उनसे लिखित ले लिया जाए कि भविष्य में वे प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देंगे।
एक बार सुबह-सुबह आए। अब उनका लवलेश के घर पर आना आम बात हो गई थी। आकर कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर बहुत चिंता के भाव थे। लवलेश ने चाय का प्याला हाथ में दिया तो कांपते हाथों ले लिया, बोले कुछ नहीं। फिर लवलेश ने व्यग्रता से पूछा कि सर क्या बात है। उनकी आंखों में आँसू छलक आए। बोले, “घर की अंदरूनी बातें किसी से नहीं कहता, आपसे भी नहीं कहूंगा। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, न उधार मांगा। ट्यूशन करता रहा। पर आज ऐसी नौबत आ गई है कि उधार मांगना पड़ेगा। बिजली का बिल छह हजार का आ गया है। बिजली वाले कहते हैं कि पहले बिल भरिए, फिर देखेंगे। फिर लवलेश से सीधे बोले, “मुझे छह हजार उधार दे दीजिए, मैं वापस कर दूंगा। ” लवलेश ने कहा कि सर उधार तो नहीं दे पाऊंगा पर आपका बिल अवश्य भर दूंगा। उनके चेहरे पर संतोष के भाव देखकर लवलेश को बहुत खुशी हुई।
लवलेश को कुछ पुस्तकें व एक शब्दकोश चाहिए था। सोलापुर में कहीं मिल नहीं रहे थे। एक पुस्तक तो भसीन सर की ही लिखी हुई थी पर उनके पास उसकी प्रति नहीं थी। सारी पुस्तकें चाँद प्रकाशन की थी। मुंबई वीटी (अब सीएसएमटी) के सामने चाँद प्रकाशन का बोर्ड लगा देखता था। भसीन सर बोले, “जब भी मुंबई जाओ तो चाँद प्रकाशन में जाना और मेरा नाम लेकर बोलना कि ये पुस्तकें मैंने मंगाई हैं।” दो लाइन शायद लिख कर भी दी थीं। खैर लवलेश चाँद प्रकाशन में गया और उनका लिखा कागज देते हुए पुस्तकें बता दीं। वह व्यक्ति अंदर केबिन में गया और लौटकर आया तो लवलेश के हाथ में पुस्तकें थमा दीं। पैसे पूछने पर मना कर दिया कि आप ले जाकर उन्हें दे दीजिए। लवलेश आश्चर्य में था कि इतने बड़े प्रकाशक ने बिना मूल्य लिए कैसे दे दीं। बाद में पता चला कि चाँद वाले और भसीन सर पंजाब के प्रसिद्ध आनंद परिवार से ताल्लुक रखते थे। पर किसी को बताते नहीं थे।
ऐसे थे भसीन सर। लवलेश के मन मस्तिष्क पर आज भी छाए हुए हैं।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ संस्मरण – “बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
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प्रसिद्ध कथाकार व पहल पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का जाना, हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति है। संयोग देखिये कि व्यावसायिक पत्रिकाओं को पहल ने कड़ी टक्कर दी और जनपक्षीय रचनाओं को प्रमुख तौर पर स्थान दिया। मात्र पैंतीस कहानियां लिखकर कथा का नया स्वरूप सामने ला दिया।
नैनीताल के जिस अशोका होटल नयी नवेली शादी पर भाग कर पहुंचे, वह होटल मालिक राजीव लोचन साह थे और नैनीताल में उनसे मिलने पर इंटरव्यू की उसी होटल में, तब यह बात सामने आई थी। अंतिम दिनों में एक इंटरव्यू में लेकर बहुत चर्चा में भी रहे।
बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना और पहल जैसी आंदोलित करने वाली पत्रिका निकाल पाना। एक बार तो ज्ञानरंजन को पूरा पढ़ने की कोशिश की, इलाहाबाद के अमरूदों की मिठास जैसी, बहुत कुछ नयी दुनिया खोल तीस कहानियां पढ़कर बहुत कुछ सीखा। ज्ञानरंजन नहीं रहे पर कहानियों में, पहल के अंकों में मिलते रहेंगे।
ज्ञानरंजन को सुनने का मौका शिमला में मिला था जब उन्होंने दूर की बात कही कि जल्दी ही कलम का स्थान कम्प्यूटर का माउस लेने वाला है। यह थी दूरदर्शिता ज्ञानरंजन की। आज सबसे ज्यादा उनकी कहानी पिता के साथ साथ उनकी प्रेमकथा को याद करते नमन् करता हूं।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ संस्मरण – “भगवान् का कितना अंश बचा डाॅक्टर में?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने रोहतक पीजीआई के दीक्षांत समारोह में कहा कि- “डाॅक्टर को जनता भगवान् मानती है। ऐसे में डाॅक्टर को अपने पेशे को समाजसेवा का माध्यम बना लेना चाहिए। सेवाभाव से किये हर कार्य से परिवार में समृद्धि आती है।” इस तरह महामना राज्यपाल ने डाॅक्टर के रूप में उन्हें भगवान् के बहुत करीब माना। पर आजकल आप जो स्थिति बड़े या छोटे अस्पतालों में देखते हैं, क्या वह डाॅक्टर को इसी रूप में, इसी छवि में प्रस्तुत करती है? मुझे याद है वह सन् 1999 का तेइस सितम्बर, जब मेरी बेटी के जीवन में भयंकर तूफान आया था और मैं उसे एम्बुलेंस में पीजीआई रोहतक में लेकर पहुंचा था। बेटी का छह घंटे लम्बा ऑपरेशन चला और वह ज़िंदगी की लड़ाई जीत गयी। डाॅक्टर एन के शर्मा ने पूछा कि क्या आपको विश्वास था कि बेटी का ऑपरेशन सफल होगा ? मैंने जवाब दिया कि डाॅक्टर शर्मा आप भी नहीं जानते, जब आप मेरी बेटी का ऑपरेशन कर रहे थे तब आपके नहीं वे हाथ भगवान् के हाथ थे, उस समय आप भगवान् के बिल्कुल करीब थे, जिससे मेरी बेटी को भगवान् ज़िंदगी लौटा गये। डाॅक्टर शर्मा की आंखों में भी खुशी के आंसू थे और मेरी आँखों में भी ! इसमें उन दिनों मंत्री और मेरे मित्र प्रो सम्पत सि़ह का भी योगदान रहा, जो पता चलते ही दूसरे दिन वे पीजीआई, रोहतक के डायरेक्टर के पास पहुंचे और मुझे भी बुला लिया ! इस तरह हम तीन माह के बाद पीजीआई से मुक्त हुए लेकिन सचमुच भगवान् के दर्शन हो गये।
आजकल क्या ऐसे भगवान् बच रहे हैं? प्राइवेट अस्पताल अब पांच सितारा होटल जैसे हो गये हैं और इनका सारा खर्च मरीज के परिजनों से ही वसूला जाता है। बड़े बड़े अस्पतालों की खबरें आती हैं कि लाखों लाखों रुपये का बिल बना दिया और परिजन परेशान हो रहे हैं घर तक बिकने की नौबत आ जाती है, बैंक बेलेंस खाली हो जाते हैं। एक घटना और याद आ रही है! बेटी डेंगू से पीड़ित थी और डाॅक्टर अजय चौधरी ने उसका इलाज करना शुरू किया और बड़े विश्वास से कहा, कि मैं इसे ठीक कर दूंगा और उपचार शुरू किया। एक दिन बेटी के प्लेटलेट्स चढ़ाये जा रहे थे कि मुझे अज्ञात नम्बर से फोन आया और कहा गया कि आप फलाने अस्पताल पहु़ंच जाइये ! हम तोशाम के निकट खानक के मज़दूर हैं और हमारे एक साथी की मृत्यु इलाज के दौरान हो गयी है, डाॅक्टर हमें शव ले जाने नहीं दे रहे। मैं चलने लगा तो पत्नी ने रोकने की कोशिश की कि आपकी बेटी ज़िंदगी से लड़ रही है और आप दूसरों के लिए भाग रहे हो ? मैंने कहा कि क्या पता उनकी दुआ मेरी बेटी को लग जाये और मैंं उस अस्पताल गया, जहां वे लोग मेरी राह देख रहे थे, डाॅक्टर के चैम्बर में उनके साथ गया और विनती की कि आप इनके साथी का पार्थिव शरीर दे दीजिए लेकिन डाॅक्टर का कहना था कि ये हमारे पैसे नहीं दे रहे, इस पर मजदूरों ने बताया कि हमारी यूनियन ने चंदा इकट्ठा किया है और वही हमारे पास है, इससे ज्यादा की हमारी हिम्मत नहीं। डाॅक्टर ने कहा कि मैं तो अपनी फीस छोड़ दूंगा लेकिन मेरे सहयोगी डाॅक्टर नहीं मानेंगे। मैंने कहा कि फिर ठीक है, मेरे सहयोगी पत्रकार मेरी बात मान जायेंगे और अभी आकर लाइव चला देंगे, फिर आपका क्या होगा, यह विचार कर लीजिए ! बस, वे सयाने और अनुभवी थे, उन्होंने बिना एक रुपया लिए उन्हें उनके साथी का शव सौंप दिया लेकिन ऐसी नौबत अनेक अस्पतालों में आती है और आये दिन ऐसी शर्मसार करने वाली खबरें भी पढ़ने को मिलती हैं ! कृपया भगवान् का रूप बने रहिये !
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी की दूसरी पुण्यतिथि पर संस्मरण – मेरी स्मृतियों में- मेरे पिता।)
☆ संस्मरण – मेरी स्मृतियों में – मेरे पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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द्वितीय पुण्यतिथि पर शत-शत नमन🙏🙏
पिता केवल एक संबंध नहीं होते, वे जीवन की वह दृढ़ पहचान होते हैं जिन पर व्यक्तित्व की पूरी इमारत खड़ी रहती है। मेरे पिता मेरी जान थे, मेरी पहचान थे और वो मेरे जीवन का अभिमान थे । उनका अस्तित्व मेरे लिए केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी सदा जीवित रहेगा।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रखर था-बिना शोर किए, बिना स्वयं को सामने रखे। वे उस वटवृक्ष की भाँति थे जिसकी जड़ें गहराई में छिपी रहती हैं, पर छाया सबको मिलती है। जीवन की आँधियाँ, तपन और बारिश वे स्वयं झेलते रहे, किंतु संतान को उसका आभास तक नहीं होने दिया। अंतर्मन की पीड़ा, अनगिनत आहें और असह्य मौन—सब कुछ उन्होंने अपने भीतर समेट लिया। पिता का यही मौन उनका सबसे बड़ा त्याग था।
मेरे जीवन की शान, आत्मविश्वास और संस्कार पिता से ही बढ़े। वे हर समय तट पर खड़े उस प्रहरी की तरह थे, जो भले ही दिखाई न दे, पर उसकी उपस्थिति से ही यात्रा सुरक्षित हो जाती है। आज वे भौतिक रूप से पास नहीं हैं, किंतु उनकी स्मृति हर क्षण दिलासा देती है-
“बेटा, हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं. हमने तुम्हारा हाथ पकड़ा है।”
मेरे पिता का साहित्य से गहरा नाता था। घर में साहित्यकारों का आना-जाना, विचारों की चर्चा, कविताओं में रस का बस जाना-यह सब मेरे संस्कार का हिस्सा बना। उन्होंने शब्दों के प्रति सम्मान सिखाया, विचारों को उड़ान दी और अभिव्यक्ति को पहचान। उनके सान्निध्य में कविता केवल रचना नहीं रही, वह जीवन का स्वभाव बन गई। जो पहचान मुझे साहित्य में मिली, वह माता- पिता के दिए संस्कारों की ही देन है।
पिता ने कभी उपदेश नहीं दिए, उन्होंने जीवन जिया-और वही जीवन मेरी सबसे बड़ी शिक्षा बना। उनका प्यार आशीर्वाद की तरह था, जो बिना कहे, बिना जताए हर क्षण साथ रहा। आज उनकी पुण्यतिथि पर मन पीड़ा से भरा है, पर साथ ही गर्व से भी-कि ऐसे पिता मिले, जो जीवन भर खजाने की तरह संजोए जाने योग्य रहा।
पिता नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनकी स्मृतियाँ आलोक की तरह हमारे साथ सदा रहेगा यह शाश्वत है –
☆ संस्मरण ☆ गाँव से शहर तक☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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तब मैं गाँव के स्कूल से पढ़कर नया-नया शहर कालेज की पढ़ाई करने पहुँचा था। चूंकि मुझे कविताएं लिखने का शौक था, इसलिए मैं शहर आने के बाद विभिन्न अवसरों पर कविताएँ लिखकर अखबारों -पत्रिकाओं में छपने भेजने लगा। ऐसे ही क्रिसमस पर मैंने ईसामसीह पर कविता लिखकर “करुणा के मसीहा- ईसामसीह” अखबारों को छपने भेज दी। जो ठीक क्रिसमस के दिन प्रकाशित हुई, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
शाम को मुझे उसी शहर के चर्च के फादर का अर्जेंट बुलावा आया। इस पर मैं चिंतित हुआ कि कहीं मुझसे कोई मिस्टेक तो नहीं हो गई। तो मैं डरता-झिझकता शाम को चर्च के फादर से मिलने पहुंचा। वहां मेरे पहुंचते ही फादर ने पूछा कि तुम मिस्टर खरे हो। मेरे हां करते ही वे बोले आपने ही ईसा मसीह जी पर कविता लिखी है। मेरे हां कहते ही वे बोले वेरी नाइस। आपने बहुत ही शानदार कविता लिखी है। आपको यहाँ अभी होने जा रहे कार्यक्रम में सम्मानित करने बुलाया गया है। आपको अपनी कविता स्टेज से सबके सामने पढ़ना है, और सम्मान भी लेना है।
स्टेज से मैंने कविता सबको तरन्नुम में सुनाई, सबसे खूब वाहवाही मिली, और बुके के साथ मोमेंटो भी मिला, जो ईसा की कांच के शो-केस में मढ़े ईसा मसीह की फायबर की मूर्ति थी।
यह सम्मान पाकर मैं हर्ष में भर गया। आज भी उस क्रिसमस की याद आने पर मैं झूम उठता हूं। इस तरह मेरा गाँव से शहर आना मेरे लिए बहुत बड़ा वरदान बन गया।