हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४६ – ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ख़ला की जानिब चल पडती है  …।)

✍ ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “इस्तेमाल… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆

✍ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आदमी को आदमी

इस्तेमाल कर रहा

तरह तरह के

रिश्ते बना कर

एक दूसरे को

ठग रहा।

 

भरोसा करने वालों का

हर रोज

भरोसा टूट रहा

भरोसा तोड़ने वाला

ऐश कर रहा।

 

सत्य की खोज

करने वाला

खोज करता रहा

झूठ अपने आप में

पलता रहा।

 

ओ दुनिया बनाने वाले

सब कुछ बना कर

तुझे क्या मिल रहा

आदमी को क्यों

इस तरह

परेशान कर रहा।

 

बता दे तू भला

अक्ल देकर क्यों

अक्ल हर रहा

आदमी को क्यों

सिखाया जाल बुनना

जो बुन कर

उसी में फँस रहा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)

☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

कमला  अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।

साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल  का परम मित्र था।

उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।

कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?

अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।

मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।

कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।

कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”

 वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर  सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में  क्या जानती हो?”

“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”

कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”

“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”

आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।

 इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?

कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”

कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा  लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।

लड़की खुशी ने कहा-  अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी  बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।

अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”

उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।

कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”

अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”

कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे  तो?”

अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”

“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।

कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-

“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”

“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”

सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।

क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?

अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”

कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०३ ☆ रंग… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०३ ?

☆ रंग… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

आजकाल माझ्याशी बोलतात रंग

आपल्याच मार्गाने चालतात रंग

* 

केशरी फुलासाठी शोधते गुलाब

त्याच त्या कहाण्या मग सांगतात रंग

 *

मोग-यास  माळूनी होता गंधधुंद

एक गोष्ट  बेरंगी  मांडतात रंग

 *

सप्तरंग सृष्टीचे वेढती मलाच

चार बोल बोलूनी रंगतात रंग

 *

झाड झाड प्रेमाने  साद घालतेच

सावलीत  हिर्वाई दावतात रंग

 *

भांडतात आकाशी नील शाम श्वेत

 वेगळेच आताशा वागतात रंग

 *

 रंगताच रंगाचा सोहळा नभात

सागरात जोशाने सांडतात रंग

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १२ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १२ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

रवींद्रनाथांचा जन्म उच्चवर्णीय, गर्भश्रीमंत, जमीनदार व उच्चशिक्षित घराण्यातला. त्यांच्या व्यापक विचारांना जाती धर्माची, वर्ण पंथांची, देश वा राज्याच्या सीमांची बंधनं मान्य नव्हती. ते अखिल मानव जातीच्या भल्याचा विचार करीत. कदाचित् त्यामुळेच समकालीन विचारवंतांच्या मनात त्याच्या विषयी नेहमीच संशयाचे धुके असत असे. परंतु त्यांचं आपल्या देशावर, या वसुंधरेवर निरतिशय प्रेम होतं. त्यांचे विचार प्रगल्भ होते. बुद्धिमत्ता अलौकिक होती. आरशासारखं स्वच्छ मन होतं.

त्यांच्या मते प्रत्येकाला शिक्षणातून स्वतःचा उत्कर्ष घडवण्याचं स्वातंत्र्य मिळायला हवं. ज्ञान प्राप्त करण्याचा अधिकार व समान संधी मिळायला हवी. त्यासाठी देश, प्रांत अशा सीमारेषा नसाव्यात. त्या काळातही ते जागतिकीकरणाचे ध्येय बाळगून होते.

गीतांजलीतील आपल्या ३५ व्या कवितेत त्यांनी अत्यंत सकारात्मक असे हे विचार मांडले आहेत. जेथे जात, पंथ, वर्ण, रूढी, भाषा अशा कोणत्याही भेदभावाच्या भिंती नाहीत, समानता आहे, परस्परांबद्दल आदर आहे, नैतिकता, विवेक, सत्यवचन यांचा अंगिकार करणारं मन आहे अशा विश्वाची, मानवजातीची आस त्यांनी इथे व्यक्त केली आहे.

समाजात भयमुक्त, संघर्ष मुक्त वातावरण असावे. दडपशाहीच्या निंदनीय वास्तवातून बाहेर पडले पाहिजे अन्यथा वाळवंटातील रेती मध्ये रुतल्याप्रमाणे बसावे लागेल. ते ओलांडून गेलो तरच प्रगतीशील भविष्याचा, राष्ट्रीय एकात्मतेचा स्वच्छ प्रवाह निर्माण होईल, जो कधीच थांबणार नाही. एकसंध, निष्पक्ष असा परिपूर्ण भारत, परिपूर्ण जग निर्माण केले पाहिजे.

ते ह्या काव्यातून प्रत्येक मानवासाठी नैतिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक स्वातंत्र्याची मागणी करतात. तसेच वसाहतवादी मानसिकतेविरुद्ध भाष्य करतात. वैयक्तिक, राष्ट्रीय, आंतरराष्ट्रीय, सर्व बंधनांना तोडून जे स्वातंत्र्य लाभेल ते स्वर्गासम असेल. त्या स्वातंत्र्याच्या स्वर्गात माझ्या देशाला जागे कर, अशी ते विधात्याकडे प्रार्थना करतात.

त्यांचे हे काव्य म्हणजे जणू सगळ्या मानवतेला आवाहन आहे. विचारही इतके दूरदर्शी, सार्वकालिक आणि व्यापक आहेत की आजही ते सर्वांना मार्गदर्शक ठरतील. या कवितेने स्वातंत्र्यलढ्याला एक वेगळीच मिती प्राप्त करून दिली. स्वातंत्र्य म्हणजे फक्त सत्ता बदल नाही. तर भयमुक्त समाज निर्माण करणे जेथे परस्परांबद्दल आदरभाव असेल, समानता असेल.

हे काव्य संपूर्ण विश्वात गाजले कारण यातील विचार वैश्विक आहे. यात सामूहिक प्रबोधनाचे आवाहन आहे. न्याय्य, खुल्या भयमुक्त मानवी जगाच्या निर्मितीचं आवाहन आहे. ही कविता फक्त भारतातच नाही तर बांगलादेशातही पाठ्यपुस्तकातून शिकवली जाते.

सन १९१७ च्या कलकत्ता येथे झालेल्या इंडियन नॅशनल काँग्रेसच्या अधिवेशनात स्वतः रविंद्रनाथांनी ही कविता ‘इंडियन प्रेअर’ म्हणून प्रस्तुत केली होती. तिचं सिंहीली भाषेतही भाषांतर झालं आहे. सन १९१० च्या आधी त्यांनी ही कविता बंगाली भाषेत लिहिली होती. नंतर त्यांच्या ‘नैवेद्यम्’ या कवितासंग्रहातून ‘प्रार्थना’ या शीर्षकाखाली ती प्रसिद्ध झाली. ही मूळ कविता क्रांतिकारी वळणाची व अधिक आवेशपूर्ण होती. तिचे इंग्लिश मध्ये भाषांतर करताना टागोरांनी त्यात

काही बदल करून ती बरीच

सौम्य केली आहे.

—–

☆ गीत ३४ ☆

LET only that little be left of me whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will whereby I may feel thee on every side, and come to

thee in everything and offer to thee my love every moment.

Let only that little be left of me whereby I may never hide thee.

Let only that little of my fetters be left whereby I am bound with thy will, and thy purpose

is carried out in my life ⎯ and that is the fetter of thy love.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ३४ ☆

☆ 

सायुज्य मुक्ती नकोच देऊ

जरा विलगता आपण ठेऊ

असेल जर का थोडे अंतर

पाहिन रुपडे तुझे निरंतर

घडोघडी तव चरण सेवा

माझ्या हातून घडेल देवा

असशील जर तू आजुबाजूला

तू माझा, मी दाविन सकला

क्षणोक्षणी तुज अर्पिन प्रीती

म्हणून करतो ही तुज विनती

एकरूपता नकोच मजला

थोडे अस्तित्व दे गोपाला

☆ 

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत ३५ ☆ 

WHERE the mind is without fear and the head is held high;

Where knowledge is free; Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls; Where words come out from the depth of truth; Where tireless striving stretches its arms towards perfection;

Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit; Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action ⎯

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ३५ ☆ 

☆

जेथे मनी भिती नाही

मान सदा ताठ राही

जेथे ज्ञान असेल मुक्त 

संकुचित भिंती होती लुप्त

*

असं विश्व माझं घर असेल

सत्याच्या गर्भातून शब्द बरसेल

कर्तव्यनिष्ठा, चिकाटी न् अचूकता

असेल आचार विचारांची प्रगल्भता

*

वाट दाखवणारा जर तू असशील

तर धरतीवर असा स्वर्ग वसवशील

तुझ्या कृपेचा असेल वरदहस्त

तर असाच असेल माझा भारत

☆

भावानुवाद ©️ मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆  गीत ३६ ☆ 

THIS is my prayer to thee, my lord ⎯ strike, strike at the root of penury in my heart.

Give me the strength lightly to bear my joys and sorrows.

Give me the strength to make my love fruitful in service. Give me the strength never to disown the poor or bend my knees before insolent might.

Give me the strength to raise my mind high above daily trifles. And give me the strength to surrender my strength to thy will with love.

—–

☆  मराठी भावानुवाद : गीत ३६ ☆ 

☆  हे देवा! ☆ 

☆ 

घाव एक तो असा घाल की 

दारिद्र्य मनाचे समूळ जाऊ दे

दीन दुबळ्यांची सेवा आणिक

परोपकार हातून घडू दे

*

असोच इतके बळ मनाचे

सुखदुःखाच्या पार जाऊ दे

सत्तेच्या या माजापुढती

कधी न मजला नत होऊ दे

*

तुच्छ गोष्टींना महत्व देऊन

मन कोते ना कधी वाटू दे

इच्छा तुझिया पूर्ण कराया

शक्ती माझी खर्ची पडू दे

☆ 

– क्रमशः भाग १२.

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” – ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

नौके बेइ वकील भये हैं

कइ नोट्स तामील भये हैं

*

बढ़तड़ जा रइ है आबादी

बड़े गाँव तैसील भये हैं

*

पैलउँ बड़ी दॉँतकाटी रइ

अंतर बीसों मील भये हैं

*

ओके घर में छापा पर गव

घर-दफ्तर सब सील भये हैं

*

हिलबिलान हो गये कहाँ पै

गायब सारे चील भये हैं

*

रय जंगल में ठौर-ठिकाने

भटकन बारे भील भये हैं

*

‘भगवत’ पोल खुलत जा  रइ है

मनो फिलम की रील भये हैं

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९८ ☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९८ ☆

☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक – “व्यंग्य का मनोविज्ञान”

लेखक – डॉ संजीव कुमार

प्रकाशक – इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

एक सर्वथा नए अनछुए विषय पर और विश्वसनीय कृति के रूप में डा संजीव कुमार की नई किताब “व्यंग्य का मनोविज्ञान”लिखी गई है।  व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा न मानकर उसे मनुष्य और समाज के अंतर्मन से जोड़कर देखती यह पुस्तक व्यंग्य को हँसी का साधन नहीं बल्कि सामाजिक आत्मावलोकन और मनोवैज्ञानिक फीडबैक मैकेनिज्म के रूप में स्थापित करती है ।

पुस्तक की संरचना पहचानने योग्य अकादमिक अनुशासन के साथ रची गई है। भूमिका के बाद आरम्भिक अध्यायों में लेखक ने व्यंग्य का स्वरूप उसकी परिभाषा और उसके मूल तत्त्वों जैसे विडंबना अतिशयोक्ति प्रतीक न्यूनोक्ति उपहास और व्यंग्यात्मक भाषा का विस्तार से विवेचन किया है।

व्यंग्य को वह ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं जो किसी व्यक्ति विचार संस्था या समूचे समाज पर प्रहार करती हुई भी मूलतः सामाजिक सुधार की दिशा में उकसाने का काम करती है।

इस दृष्टि से व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना का सक्रिय माध्यम बन जाता है जो मनोरंजन के परदे के पीछे छिपे असुविधाजनक सत्य को पाठक के सामने लाता है।

ग्रंथ का दूसरा बड़ा आयाम व्यंग्यकार के मनोविश्लेषण से जुड़ा है। डॉ संजीव कुमार व्यंग्यकार की एक मानसिक संरचना की रूपरेखा खींचते हैं जिसमें समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता भीतर जमा असंतोष नैतिक आग्रह विद्रोही वृत्ति हास्यबुद्धि और न्याय बोध ये सभी तत्व सम्मिलित हैं। यही कारण है कि अपनी अनुभूति के अनुरूप हर व्यंग्यकार एक ही विषय पर अलग अलग तरह से व्यंग्य लिखता है।

व्यंग्यकार  केवल चुटकुला रचयिता नहीं बल्कि एक सजग और विश्लेषक व्यक्तित्व है जो सत्ता संरचनाओं रूढ़ मान्यताओं और ढोंग के साथ स्वयं अपनी कमजोरियों तक को व्यंग्य के दायरे में रखता है।

व्यंग्यकार की इस आत्म समावेशी दृष्टि को लेखक व्यंग्य का एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक गुण मानते हैं जो उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

एक अलग खण्ड में संजीव जी व्यंग्य और पाठक के मनोविज्ञान के संबंध पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनके अनुसार व्यंग्य पाठक या दर्शक में एक साथ तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है पहली हँसी और मनोरंजन जो भावनात्मक तनाव को ढीला करते हैं दूसरी अपराध बोध और आत्म चिंतन जो व्यक्ति को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करते हैं और तीसरी परिवर्तन की आकांक्षा जो समाज के स्तर पर प्रतिरोध प्रश्नाकुलता और सुधार की इच्छा को जन्म देती है।

इस त्रिस्तरीय प्रभाव के कारण व्यंग्य उनकी दृष्टि में बड़ी ताकत से अपनी भूमिका निभाता है।

पुस्तक की एक विशेष शक्ति यह है कि व्यंग्य को वह अलग थलग साहित्यिक कोष्ठक में नहीं रखते बल्कि उसे सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं के बीच रखकर पढ़ते हैं। धर्म परम्परा जाति वर्ग आर्थिक असमानताएँ और पितृसत्ता इन सबके साथ व्यंग्य का जटिल संबंध लेखक की निगाह से छूटा नहीं है।वे दिखाते हैं कि कैसे संस्कार रीति रिवाज पारिवारिक ढाँचे लैंगिक भूमिकाएँ और भाषिक परिस्थितियाँ व्यंग्य की दिशा और लक्ष्य तय करती हैं और इसके उलट व्यंग्य इन संरचनाओं की कमजोर कड़ियों पर चोट करके नए प्रश्न और नई दृष्टि  निर्मित करता है।

इस द्वंद्वात्मक पाठ के कारण पुस्तक केवल थ्योरी ऑफ सैटायर नहीं रह जाती बल्कि सोशल साइकोलॉजी ऑफ सैटायर का रूप ले लेती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में लेखक विशेष रूप से डिजिटल युग के व्यंग्य पर लिखते हैं। सोशल मीडिया मीम संस्कृति स्टैंड अप कॉमेडी और ऑनलाइन कार्टूनों की तेज़ी से बदलती दुनिया के बीच व्यंग्य का स्वर गति और पहुँच किस प्रकार बदल गई है यह पुस्तक का एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेखक मानते हैं कि इन माध्यमों ने व्यंग्य को जनतांत्रिक और त्वरित जरूर बनाया है लेकिन साथ साथ इसने सतहीपन ट्रोलिंग समूह घृणा और नैतिक असंवेदनशीलता जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ाई हैं।

वे जिम्मेदार व्यंग्य के पक्ष में खड़े होकर यह ज़रूरत रेखांकित करते हैं कि हास्य और आलोचना दोनों के प्रयोग में मानवीय गरिमा संवेदनशीलता और निष्पक्षता के मूल्यों को न छोड़ा जाए।

पुस्तक का एक पूरा खण्ड व्यंग्य और नैतिकता के बीच नाज़ुक संतुलन पर केंद्रित है। यहाँ लेखक व्यंग्यकार के नैतिक दायित्वों की सूची तैयार करते हुए उसे सत्यनिष्ठ संवेदनशील निष्पक्ष और सुधारोन्मुख रहने की सलाह देते हैं। व्यंग्य के प्रहार का लक्ष्य व्यक्ति की गरिमा नहीं उसके असंगत आचरण और शोषक भूमिका हो यह पुस्तक बार बार स्पष्ट करती है।व्यंग्यकार को वे आक्रामक मनोरंजनकर्ता नहीं बल्कि उत्तरदायी सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखने का आग्रह करते हैं जो हास्य का सहारा लेकर भी अंततः न्याय समानता और मानवीयता की तरफ खड़ा होता है।

लेखन शैली की दृष्टि से पुस्तक मानक हिन्दी में लिखी गई है जिसमें अकादमिक अनुशासन के साथ साथ उदाहरणों और उपमानों का संयमित प्रयोग है। भाषा प्रभावी और स्पष्ट है ।  यह ग्रंथ सामान्य मनोरंजक पाठ से अधिक शोधार्थियों अध्यापकों तथा गंभीर लेखकों पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। विषय सूची से लेकर अंतिम अध्याय तक एक क्रमबद्धता बनी रहती है पहले व्यंग्य की परिभाषा और स्वरूप फिर व्यंग्यकार की मानसिकता उसके बाद पाठक समाज पर प्रभाव और अंत में डिजिटल युग नैतिकता तथा भविष्य की चुनौतियाँ यह क्रमिक विन्यास अध्ययन को सुगठित बनाता है।

पुस्तक में कुछ संभावित सीमाएँ भी संकेतित की जा सकती हैं। विश्लेषण का जोर लगभग पूरा सैद्धांतिक विमर्श पर है यदि समकालीन हिन्दी व्यंग्य कृतियों के अधिक विशिष्ट और विस्तृत पाठ विश्लेषण उदाहरण और उद्धरण यहाँ जोड़े जाते तो यह पुस्तक पाठ्य स्तर पर और भी प्रभावी हो सकती थी।

इसी तरह लेखक मनोविज्ञान की अवधारणाओं का व्याख्यात्मक उपयोग  करते हैं । प्रयोगात्मक या क्षेत्रीय अध्ययन पाठक सर्वे या केस स्टडी जैसी अनुसंधान विधियाँ जोड़ी जा सकती हैं । अभी यह मनोविज्ञान की व्याख्यात्मक शाखा पर ही अधिक आश्रित किताब बन गई है।

व्यंग्य का मनोविज्ञान हिन्दी व्यंग्य चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक ग्रंथ की तरह अपनी तरह की पहली किताब है। यह व्यंग्य को हँसी आलोचना मनोविज्ञान समाजशास्त्र और नैतिक दर्शन के संगम बिन्दु पर रखकर प्रस्तुत करती है । 

व्यंग्य लिखने वाले रचनाकारों के लिए यह पुस्तक अपने शिल्प और अपनी जिम्मेदारी को समझने का मार्गदर्शक बन सकती है आलोचकों और शोधार्थियों के लिए यह एक ठोस सैद्धांतिक आधार और गंभीर पाठकों के लिए व्यंग्य पठन के नए कोण खोलने वाला पाठ है।

यह कृति केवल व्यंग्य का मनोविज्ञान नहीं बल्कि व्यंग्य की समग्र मानसिक सामाजिक और नैतिक संरचना का सुविचारित मानचित्र प्रस्तुत करती है ।  हिन्दी साहित्य में दीर्घकालीन संदर्भ ग्रंथ बनने की क्षमता रखती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नारी तेरी अजब कहानी”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆

☆

नारी तेरी अजब कहानी,

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

बचपन में तो उछल कूदती,

घर आँगन में दौड़ लगाती।

देहरी के बाहर जाते ही-

अविरल आँसू रोज बहाती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अगनी में जब चाहे जलती,

तेजाबों से रोज नहाती।

सदियों से तू भोग रही है,

प्रतिक्षण हिंसक नई कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अग्नि परीक्षा देते देते,

सदियाँ बीत गयी हैं तुझको।

अंगारों पर फिर भी चलती,

अपने मुख से उफ् न करती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

हर समाज है शोषण करता,

अधिकारों से वंचित रखता।

कर्तव्यों का पाठ बताकर,

तोते सा पिंजड़े में रखता।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

धर्म के आगे तू हलाल है,

मानवता भी शर्मसार है।

आजादी अभिव्यक्ति नाम पर,

अब भी बुर्कों में जकड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

कुछ बोला तो तीन शब्द में,

जब चाहे बनवास घड़ी है।

परिवर्तन की हर आँधी से

कब से कोसों दूर खड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

चीर हरण अब भी होते हैं,

भीष्म द्रोण दुबके बैठे हैं।

भोग्या बनकर भोग रही है,

आदम युग से वही कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ – ख्वाहिशों की होली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆

🌻लघु कथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻

शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।

कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।

वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।

अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।

जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।

सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।

वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।

गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –

ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६७ – देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६७ ☆ देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

डोकरी की चाय हो या डोकरे की चाय, इस को बेचने वाले फुटकर दुकानों ने भी नए से नए नाम रख लिए हैं। गुलाबी नगर जयपुर में एक चाय की दुकान “आर ए एस चाय वाला” लिखा हुआ था, हमने उसके मालिक से पूछा इस का क्या तात्पर्य होता है ?

वो तुनक कर बोला “आई ए एस” चाय वाले  से जाकर पूछो ? उसकी दुकान पर अपनी मित्र मंडली के साथ चाय पीने का कार्यक्रम था। दुकानदार ने एक और बाण छोड़ दिया। कि ये “एम बी ए” चाय वाला ब्रांड अपनी फ्रेंचाइजी पूरे देश में खोल रहा हैं, हमारे नाम पर प्रश्न क्यों ?

चाय की छोटी छोटी दुकानों को भी अब नाम की क्यों आन पड़ी ? समय ही ऐसा चल पड़ा है, खाद्य वस्तुएं जैसे आटा, बेसन, चावल, सत्तू इत्यादि भी अब ब्रांड के टैग से विक्रय किए जा रहें हैं।

दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग पर एक दशक पूर्व तक अनेक चाय की गुमटियां हुआ करती थी, अब सब बंद हो चुकी हैं। एक कप चाय के लिए भी किसी बड़े ढाबे जो अब विशाल रूप लेकर बड़े बड़े होटलों को मात दे रहें है, से ही आपकी च्यास (चाय की तलब) पूरी हो सकती हैं।

स्पष्ट है, साधारण खाद्य वस्तुएं भी बड़े और कॉरपोरेट सेक्टर की झोली में जा चुकी हैं। इसी चक्कर में हमारी दो रुपए की चाय दस रुपए से पंद्रह की हो जाएगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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