( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “बदलता है…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – तरुणों का दायित्व…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५८ ☆
☆ तरुणों का दायित्व… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख स्वार्थ-नि:स्वार्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०८ ☆
☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ… ☆
‘बिना स्वार्थ आप किसी का भला करके देखिए; आपकी तमाम उलझनें ऊपर वाला सुलझा देगा।’ इस संसार में जो भी आप करते हैं; लौटकर आपके पास आता है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दी जाती है। परन्तु आजकल हर इंसान स्वार्थी हो गया है। वह अपने व अपने परिवार से इतर सोचता ही नहीं तथा परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक ही सीमित नहीं रहे; पति-पत्नी तक सिमट कर रह गये हैं। उनके अहम् परस्पर टकराते हैं, जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ की बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने व प्रतिशोध लेने हेतु कटघरे में खड़ा करने का भरसक प्रयास करते हैं। विवाह नामक संस्था चरमरा रही है और युवा पीढ़ी ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास करने लगी हैं, जिसका मूल कारण है अत्यधिक व्यस्तता। वैसे तो लड़के आजकल विवाह के नाम से भी कतराने लगे हैं, क्योंकि लड़कियों की बढ़ती लालसा व आकांक्षाओं के कारण वे दहेज के घिनौने इल्ज़ाम लगा पूरे परिवार को जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं। कई बार तो वे अपने माता-पिता की पैसे की बढ़ती हवस के कारण वह सब करने को विवश होती हैं।
स्वार्थ रक्तबीज की भांति समाज में सुरसा के मुख की भांति बढ़ता चला जा रहा है और समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है। इसका मूल कारण है हमारी बढ़ती हुई आकांक्षाएं, जिन की पूर्ति हेतु मानव उचित-अनुचित के भेद को नकार देता है। सिसरो के मतानुसार ‘इच्छा की प्यास कभी नहीं बझती, ना पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है और उसका पेट भी आज तक कोई नहीं भर पाया।’ हमारी इच्छाएं ही समस्याओं के रूप में मुंह बाये खड़ी रहती हैं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है तथा समस्याओं का यह सिलसिला जीवन के समानांतर सतत् रूप से चलता रहता है और मानव आजीवन इनके अंत होने की प्रतीक्षा करता रहता है; उनसे लड़ता रहता है। परंतु जब वह समस्या का सामना करने पर स्वयं को पराजित व असमर्थ अनुभव करता है, तो नैराश्य भाव का जन्म होता है। ऐसी स्थिति में विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता होती है तथा समस्याओं को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर चलना ही वास्तव में जीवन है।
समस्याएं जीवन की दशा व दिशा को तय करती हैं और वे तो जीवन भर बनी रहती है। सो! उनके बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखना कारग़र है। वास्तव में कुछ समस्याएं समय के अनुसार स्वयं समाप्त हो जाती हैं; कुछ को मानव अपने प्रयास से हल कर लेता है और कुछ समस्याएं कोशिश करने के बाद भी हल नहीं हो पातीं। ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ देना ही बेहतर है। उचित समय पर वे स्वत: समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उनके बारे में सोचो मत और जीवन का आनंद लो। चैन की नींद सो जाओ; यथासमय उनका समाधान अवश्य निकल आएगा। इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हूं कि जब तक हृदय में स्वार्थ भाव विद्यमान रहेगा; आप निश्चिंत जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते और कामना रूपी भंवर से कभी बाहर नहीं आ सकते। स्वार्थ व आत्मकेंद्रिता दोनों पर्यायवाची हैं। जो व्यक्ति केवल अपने सुखों के बारे में सोचता है, कभी दूसरे का हित नहीं कर सकता और उस व्यूह से मुक्त नहीं हो पाता। परंतु जो सुख देने में है, वह पाने में नहीं। इसलिए कहा जाता है कि जब आपका एक हाथ दान देने को उठे, तो दूसरे हाथ को उसकी खबर नहीं होनी चाहिए। ‘नेकी कर और कुएं में डाल’ यह सार्थक संदेश है, जिसका अनुसरण प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। यह प्रकृति का नियम है कि आप जितने बीज धरती में रोपते हैं; वे कई गुना होकर फसल के रूप में आपके पास आते हैं। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से किए गये कर्म असंख्य दुआओं के रूप में आपकी झोली में आ जाते हैं। सो! परमात्मा स्वयं सभी समस्याओं व उलझनों को सुलझा देता है। इसलिए हमें समीक्षा नहीं, प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानता है तथा वही करता है; जो हमारे लिए बेहतर होता है।
‘अच्छे विचारों को यदि आचरण में न लाया जाए, तो वे सपनों से अधिक कुछ नहीं हैं’ एमर्सन की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। स्वीकारोक्ति अथवा प्रायश्चित सर्वोत्तम गुण है। हमें अपने दुष्कर्मों को मात्र स्वीकारना ही नहीं चाहिए; प्रायश्चित करते हुए जीवन में दोबारा ना करने का मन बनाना चाहिए। वाल्मीकि जी के मतानुसार संत दूसरों को दु:ख से बचाने के लिए कष्ट सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने के लिए।’ सो! जिस व्यक्ति का आचरण अच्छा होता है, उसका तन व मन दोनों सुंदर होते हैं और वे संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
दूसरी ओर दुष्ट लोग दूसरों को कष्ट में डालकर सुक़ून पाते हैं। परंतु हमें उनके सम्मुख झुकना अथवा पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वीर पुरुष युद्ध के मैदान को पीठ दिखा कर नहीं भागते, बल्कि सीने पर गोली खाकर अपनी वीरता का प्रमाण देते हैं। सो! मानव को हर विषम परिस्थिति का सामना साहस-पूर्वक करना चाहिए। ‘चलना ही ज़िंदगी है और निष्काम कर्म का फल सदैव मीठा होता है। ‘सहज पके, सो मीठा होय’ और ‘ऋतु आय फल होय’ पंक्तियां उक्त भाव की पोषक हैं। वैसे ‘हमारी वर्तमान प्रवृत्तियां हमारे पिछले विचार- पूर्वक किए गए कर्मों का परिणाम होती हैं।’ स्वामी विवेकानंद जन्म-जन्मांतर के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। सो! झूठ आत्मा के खेत में जंगली घास की तरह है। अगर उसे वक्त रहते उखाड़ न फेंका जाए, तो वह सारे खेत में फैल जाएगी और अच्छे बीज उगने की जगह भी ना रहेगी। इसलिए कहा जाता है कि बुराई को प्रारंभ में ही दबा दें। यदि आपने तनिक भी ढील छोड़ी, तो वह खरपतवार की भांति बढ़ती रहेगी और आपको उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देगी; जहां से लौटने का कोई मार्ग शेष नहीं दिखाई पड़ेगा।
प्यार व सम्मान दो ऐसे तोहफ़े हैं, अगर देने लग जाओ तो बेज़ुबान भी झुक जाते हैं। सो! लफ़्ज़ों को सदैव चख कर व शब्द संभाल कर बोलिए। ‘शब्द के हाथ ना पांव/ एक शब्द करे औषधि/ एक शब्द करे घाव।’ कबीर जी की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। शब्द यदि सार्थक हैं, तो प्राणवायु की तरह आपके हृदय को ऊर्जस्वित कर सकते हैं। यदि आप अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरों के हृदय को आहत करते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए। यह आप्त मन में आशा का संचरण करती है। निगाहें भी व्यक्ति को घायल करने का सामर्थ्य रखती हैं। दूसरी ओर जब कोई अनदेखा कर देता है, तो बहुत चोट लगती है। अक्सर रिश्ते इसलिए नहीं सुलझ पाते, क्योंकि लोग ग़ैरों की बातों में आकर अपनों से उलझ जाते हैं और जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो बहुत तकलीफ़ होती है। परंतु जब कोई अपना पास रहकर भी दूरियां बना लेता है, तो उससे भी अधिक तकलीफ़ होती है। इसलिए जो जैसा है; उसी रूप में स्वीकारें; संबंध लंबे समय तक बने रहेंगे। अपने दिल में जो है; उसे कहने का साहस और दूसरे के दिल में जो है; उसे समझने की कला यदि आप में है, तो रिश्ते टूटेंगे नहीं। हां इसके लिए आवश्यकता है कि आप वॉकिंग डिस्टेंस भले रखें, टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें, क्योंकि ‘ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम/ वे फिर नहीं आते।’ इसलिए किसी से अपेक्षा मत करें, बल्कि यह भाव मन में रहे कि हमने किसी के लिए किया क्या है? ‘सो! जीवन में देना सीखें; केवल तेरा ही तेरा का जाप करें– जीवन में आपको कभी कोई अभाव नहीं खलेगा।’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन धारा… ।
रचना संसार # ८० – गीत – जीवन धारा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – हमराज।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९० ☆
☆ कविता – अँखियाँ प्यासी की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रेरणा…’।)
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ६ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆
सगुण भक्ती
परमेश्वर चराचरात व्याप्त असून तो निर्गुण निराकार आहे असे म्हटले जाते, परंतु सर्वसामान्य माणसाला परमेश्वराच्या रूपात काहीतरी वस्तूची आवश्यकता असते. तुकाराम महाराज हे पांडुरंगाचे वेड लागलेला एक सर्वसामान्य प्रापंचिक माणूस. त्यामुळे त्यांची भक्ती सगुण भक्ती होती. त्यांचे परमेश्वराच्या रूपाचे वर्णन करणारे कितीतरी अभंग आपल्याला त्यांच्या गाथेत वाचावयास मिळतात.
सुंदरते ध्यान/ उभे विटेवरी/
कर कटावरी/ ठेवोनिया//
तुळशीहार गळा/ कासे पितांबर/
आवडे निरंतर /हेचि ध्यान//
मकर कुंडले /तळपती श्रवणी/
कंठी कौस्तुभ मणी/ विराजित//
तुका म्हणे माझे/ हेचि सर्व सुख/
पाहिन श्रीमुख/आवडीने//
या ओळी वाचल्या की प्रत्येकाच्या डोळ्यासमोर विठोबाचे एक काल्पनिक रूप उभे राहते व आपोआपच हात जोडले जातात.
सदा माझे डोळा/ जडो तुझी मूर्ती/
रखुमाईच्या पती सोयरिया//
गोड तुझे रूप/गोड तुझे नाम/
देई मज प्रेम/ सर्वकाळ//
विठू माऊलीये /हाचि वर देई/
संचरोनी राही/ हृदयामाजि//
तुका म्हणे काही/ न मागे आणिक/
तुझे पायी सुख/सर्व आहे//
मनाची अशी अवस्था केवळ तुकारामांचीच नव्हे तर सर्व भक्तांची होते.
वेगवेगळ्या शब्दात महाराज विठ्ठलाचे वर्णन करतात.
राजस सुकुमार /मदनाचा पुतळा/
रवी शशीकळा/लोपलिया//
कस्तुरी मळवट /चंदनाची उटी//
रुळे माळकंठी/ वैजयंती/
मुगुट कुंडले /श्रीमुख शोभले/
सुखाचे ओतीले/ सकळही//
कासे सोनसळा/ पांघरे पाटोळा/
घननिळ सावळा/ बाईयानो//
कर कटावरी / तुळशीच्या माळा/
ऐसे रूप डोळा/ दावी हरी//
*गरुड पारावरी/ उभा राहिलासी/७
आठवी मानसी/ तेची रूप//
झुरोनी पांझरा/ होऊ पाहे आता/
येई पंढरीनाथा /भेटावया//
तुका म्हणे माझी/ पुरवावी आस/
विनंती उदास/ करू नये//
विठोबाची अशी मूर्ती तुकाराम महाराजांच्या कल्पनेत आहे आणि ते रूप पाहण्यासाठी ते अतिशय उतावीळ झाले आहेत. ते गोपींच्या भूमिकेतून आपल्याबरोबरच्या गोपींना (भक्तांना) श्रीकृष्णाच्या(विठ्ठलाच्या) रूपाचे वर्णन करतात. येथे मूळ गोपी म्हणजे त्यांचे मन
आणि सख्या म्हणजे इंद्रियांच्या प्रवृत्ती असे रूपक या वर्णनात आहे.
संत तुकाराम महाराजांनी परमेश्वराचे कनवाळू रूप वर्णन केले आहे. जो खरा भक्त परमेश्वराची सेवा करतो, त्या भक्ताचा परमेश्वर कायम ऋणी असतो, भक्ताचे ऋण परमेश्वर सदा फेडतोच. कसे ते या खालील अभंगातून पहा.
भक्तऋणी देव/ बोलती पुराणे/
निर्धार वचने/ साच करी//
मागे काय जाणो/आईकिली वार्ता/
कबीरासाते जाता/घड्या वाटी//
माघारीया धन/ आणिले घरासी/
मेघे केला त्यासी/ त्याग तेणे//
नामदेवाचीया /घरासी आणिले/
तेणे लुटीयेले/ द्विजा हाती//
प्रत्यक्षासी काय /द्यावे हे प्रमाण/
एकोबाचे ऋण /फेडियेले//
बीज दळूनिया/ केली आराधना/
लागे नारायणा/ परणे ते//
कबीराने जेव्हा ब्राह्मणाच्या रूपात वस्त्रासाठी भीक मागत असलेल्या माणसाला(देव) अर्धे वस्त्र दिले, तेव्हा देवाने कबीराच्या घरी जाऊन ऋण फेडले. नामदेवाने जेव्हा त्याच्या जवळची कापडे उघड्या दगडांवर पांघरली, तेव्हा त्याची किंमत देवाने त्याच्या घरी आणून दिली. एकनाथाचे कर्ज भगवंताने स्वतः फेडले.
या ठिकाणी तुकाराम महाराज म्हणतात, परमेश्वर निर्गुण, अव्यक्त असला तरी हातात चक्र, गदा घेऊन तो भक्तांना स्वतःच्या हृदयाशी ठेवतो आणि दुर्जनांचा संहार करतो.
अव्यक्त ते आकारले/ रूपा आले गुणवंत/
तुका म्हणे पुरवी इच्छा/ जया तैसा विठ्ठल//
सगुणाची पूजा म्हणजे, सगुण रूप हे माध्यम आहे. त्या माध्यमाद्वारे भक्त परमेश्वराची पूजा, सेवा करू शकतो.
गाथेतील हा अभंग पहा.
केला मातीचा पशुपती/
परी मातीसी काय महती? //
शिवपुजा सिवासी पावे/
माती मातीमाजि सामावे//
तैसे पूजिती आम्हासी संत/
पूजा घेतो भगवंत//
केला पाषाणाचा विष्णू/
परि पाषाण नव्हे विष्णू//
विष्णु पूजा विष्णूसी अर्पे/
पाषाण राहे पाषाण रूपे//
केली काशाची जगदंबा/
परी कासे नवे अंबा//
पूजा अंबेची अंबेला घेणे/
कासे राहे कासेपणे//
तुकाराम संत आहेत. शास्त्र पंडित नव्हेत. म्हणून ते सगुण पूजा मानतात. ते प्रश्न विचारतात की जर अवघे विश्व ब्रह्मरूप आहे, मग प्रतिमेतही ब्रह्म असायलाच हवे. प्रतिमाही देवच आहे. ब्रह्मा वाचून रिक्त असे काहीच नाही, मग दगडाच्या किंवा धातूच्या मूर्तीत ब्रह्म कसे नसेल.
ते असेही म्हणतात की त्यांना परमेश्वराची खूप स्तुती करायची आहे, परंतु स्तुती करण्यास त्यांची वाणी कमी पडते. कारण परमेश्वराच्या स्वरूपाच्या एकेका केसावर हजारो ब्रम्हांडाची घडामोड होत आहे.
स्तुती करू तरी/ नवे ची या वेदा/
तेथे माझा धंदा /कोणीकडे//
परी हे वैखरी /गोडाली सुखे/
रसना रसमुखे/ इच्छितसे//
परमेश्वराच्या रूपाचे वर्णन करणे अशक्यप्राय आहे. त्याची अनंत रुपे आहेत परंतु ज्याचा जसा भाव असेल तसे त्याच्या इच्छेनुरूप भगवंत सगुण रूप धारण करतो.
तुज वर्णी ऐसा तुजविण नाही/
दुजा कोणी तीही त्रिभुवनी//
सहस्त्रमुखे शेष शिणला बापुडा/
चिरल्या धडा जिंव्हा त्याच्या//
अव्यक्ता अलक्षा अपारा आनंदा/
निर्गुणा सच्चिदानंदा नारायणा//
रूप नाम घेसी आपल्या स्वइच्छा/*
होसी भाव तैसा त्या कारणे//
तुका म्हणे जरी दावीसी आपणा/
तरीच नारायणा कळो येसी//
तुकाराम महाराजांच्या परमेश्वर प्राप्तीच्या तळमळीतून पांडुरंगाचे सगुण रूप त्यांच्यासमोर… साकार झाले आहे.