(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆
सोने के भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़ते आ रहे हैं। इस प्रकार की चर्चा सुनते सुनते कई दशक बीत गए। बचपन से आरंभ सफर से बुढ़ापे की दहलीज तक पहुंचते सोने के लिए ये ही सब सुनते आ रहे हैं।
विगत कुछ समय से लोग कह रहे है, सोने के तो अब पंख लग गए हैं। पंख लगे पक्षियों के लिए ऊंचाई मायने नहीं रखती हैं। असमान से भी ऊपर पहुंचने की दम रखते हैं।
तिजोरियों में बंद सुरक्षित सोना भी क्या सोचता होगा, कि वो तो सौ तालों में बंद रहता है, दुनिया झूठी है, और कहती है, कि सोने के तो अब पंख लग गए हैं।
राजस्थान के छोटे से कस्बे डेगाना जिला नागौर में एक सुनार की दुकान से एक कबूतर ने सोने की एक चेन लेकर उड़ान भर ली थी। फिर क्या था ? पूरे कस्बे के लोग कबूतरों के पीछे पीछे दौड़ने लग गए, क्या पता कौन सा कबूतर उड़ा कर ले गया हो। जब कोई व्यक्ति कीमती वस्तु को उठा कर भागता है, तो भी तो सब उसके पीछे भागने लग जाते हैं।
कस्बे के बुजुर्ग कहने लगे, किसी ने कबूतरों को ट्रेनिंग करवा कर ये काम करवाया होगा। इतिहास में भी ये जानकारी है, कि राजकुमारियों के प्रेम पत्र का आदान प्रदान कबूतर ही करते थे।
हमारे समय में तो गली मोहल्ले के आशिकों को भी कबूतर का दर्जा मिला हुआ था। वो तो पंजाबी के प्रसिद्ध गायक दलेर मेहंदी ने “कबूतरबाजी” में गैर कानूनी कमाई करी तब से कबूतर शब्द से ही लोग गुरेज करने लग गए हैं।
डेगाना कस्बे के भोले भाले कबूतर ने सोने की चेन उसके मालिक को जल्दी लौटा कर, पक्षियों की ईमानदारी प्रमाणित कर दी है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आम के बीच राम”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ ☆
🌻लघुकथा🌻आम के बीच राम🌻
वार्षिकोत्सव कार्यक्रम चल रहा था। सभी अपनी-अपनी कार्य कुशलता मंच के मध्य रखना चाह रहे थे। चमचमाता मंच, सजावट, तिलक रोली चंदन वंदन अभिनंदन, मन आनंदित और उमंगों से भरा ।
सभी की निगाहें तो बस वहाँ क्या हो रहा? क्या होने वाला है? इसकी जानकारी लेते नजर आए।
किसी ने मन की बात, कोई व्यंग, कोई परियंत, कोई प्रियवर, कोई हँसी ठिठोली, कोई ज्ञान की बात, संत ध्यान की बात, न चाहते भी तालियाँ बजाते रहिए। कुल मिलाकर गीत संगीत भरपूर मनोरंजन।
अंग्रेजी परवरिश में पलते आज के बच्चों को ये सब नही भाता।अथर्व अपनी दादी के साथ आया था। बीच-बीच में तंग करने लगा – – घर चलो यहाँ तो आम लोग बैठे है।
दादी प्यार से सिर पर हाथ फेरते बच्चे से बोली — जहाँ आम लोग होते है। वहीं राम होते है। तुम्हें भी श्री राम बनना है न??
बच्चे ने धीरे से कहा — तो फिर ठीक है। थोड़ी देर बैठ जाता हूँ।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – रिश्ता…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७१ – रिश्ता
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “सौख्य के समंदर में...”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “सौख्य के समंदर में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तुम जो मिली…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘त्यौहार…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ९४ ☆ तुम्हारे साथ ही हूँ मैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘ये इश्क़ नहीं आसां‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ ये इश्क़ नहीं आसां ☆
कुछ समय पहले मैंने महाराष्ट्र के एक स्कूल के प्राचार्य के बारे में लिखा था, जिन्होंने छात्राओं को शपथ दिलायी थी कि वे प्रेम-विवाह नहीं करेंगीं। अभी टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के एक गांव में गांववालों ने लड़कियों के भाग कर शादी कर लेने से त्रस्त होकर ऐसे लड़कों-लड़कियों और उनके परिवार वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।
गांव के एक प्रवक्ता ने घोषणा की है कि भाग कर शादी करने वाले लड़के लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। उनके परिवार को कोई मज़दूरी नहीं देगा, दूध और किराने का सामान, पंडित-नाई उन्हें मुहैया नहीं होंगे। इसके अलावा कोई ऐसे परिवारों की ज़मीन को लीज़ पर नहीं लेगा। गनीमत है कि प्रेमियों को सबक सिखाने के लिए गांव वालों ने कोई और बड़ा नुस्खा नहीं निकाला। गांव के एक पिताजी ने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई छुड़ा कर उन्हें घर में बैठा लिया है ताकि वे प्रेम के प्रदूषण से बची रहें। सुनकर बेगम अख़्तर की ग़ज़ल याद आ गयी— ‘अय मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया।’
चचा ‘ग़ालिब’ ने नाहक ही लिखा— ‘इश्क पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाये न लगे और बुझाये न बने।’ अब इंतज़ाम हो रहा है कि यह मनहूस आग लग ही न पाये और अगर लग ही जाए तो तुरन्त ‘फ़ायर एक्सटिंग्विशर’ का इस्तेमाल किया जाए। कबीर भी फालतू ही लिख गये कि ‘जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान; जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।’ उधर मरहूम मेंहदी हसन व्यर्थ की टेर लगाये हैं— ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं।’ बुल्ले शाह भी अरण्य रॊदन कर रहे हैं— ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो।’
हमारे देश के कानून के हिसाब से लड़का लड़की 18 की उम्र पर पहुंचने पर ख़ुद मुख़्तार हो जाते हैं, यानी वे खुद निर्णय लेने और अपने निर्णय की जवाबदारी लेने में सक्षम हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में युवा अपनी शादी होने पर अपना अलग घर बसा लेते हैं। वे अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेते हैं। लेकिन हमारे यहां नाक का सवाल ज़िन्दगी भर बना रहता है। लड़का-लड़की को वही काम करना पड़ता है जिसमें ख़ानदान की नाक सलामत रहे। नाक की रक्षा में ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं होती रहती हैं। परिवार के साथ-साथ समाज की नाक का भी ख़याल रखना पड़ता है। इसीलिए कई प्रेमी शादी के बाद अपनी जान बचाते फिरते हैं।
मुश्किल यह है कि प्रकृति ने सिर्फ नर- मादा पैदा किये, परिवार और विवाह संस्थाएं आदमी ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनायीं। अब संस्थाएं आदमी के ऊपर हावी हैं। प्रकृति का संदेश स्पष्ट है कि नर-मादा मिलें और अपनी प्रजाति को जीवित रखें। इसीलिए प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच में आकर्षण पैदा किया है।
हम लैला-मजनूं, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट के प्रेम की गाथाओं पर झूमने वाले लोग हैं। राजस्थान में श्रीगंगानगर के पास लैला मजनूं के मज़ार हैं जहां हर साल जून में मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर मन्नत मानते हैं। लेकिन जब अपने घर में कोई लैला,शीरीं या सोहनी पैदा हो जाती है तो संकट खड़ा हो जाता है।
प्रेम आदमी को कैसा मजबूर और बेबस करता है इसके संबंध में मुझे दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित ‘महाराजा’ पुस्तक का एक प्रसंग याद आता है। पंजाब की एक रियासत की राजकुमारी अपने राज्य के एक अधिकारी के प्रेम में पड़ गयी थी। राजकुमारी के महल के पीछे की चारदीवारी से सटा एक कुआं था। राजकुमारी के प्रेमी ने दीवार में एक सूराख बना लिया था जिसके द्वारा वह कुएं में उतरता था और फिर दूसरी ओर से राजकुमारी की परिचारिकाएं उसे ऊपर खींच लेती थींं। यह प्रेम प्रसंग बहुत दिनों तक चला, फिर प्रेमी के एक शत्रु ने भांडा फोड़ दिया और प्रेमियों की पकड़-धकड़ की कार्यवाही होने लगी। राजकुमारी प्रेमी के साथ कुएं में उतरकर महल से बाहर निकल गयी और वे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गये। अंत में इन प्रेमियों की ज़िन्दगी बहुत अभावों और कष्टों में गुज़री।
इन प्रेमियों की कथा पढ़कर सोहनी- महिवाल की कथा याद आती है। फ़र्क यही है कि राजकुमारी की कथा में प्रेमी कुएं में उतरता था जबकि सोहनी अपने प्रेमी से मिलने के लिए घड़े के सहारे चिनाब नदी पार करती थी। मशहूर शायर ‘जिगर’ ने इश्क़ के बारे में लिखा, ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इन दोनों कथाओं में आग की जगह पानी ने ले ली है।
इसी सिलसिले में इंग्लैंड के सम्राट एडवर्ड अष्टम याद आते हैं जिन्होंने अपनी तलाकशुदा प्रेमिका वालिस सिंपसन से शादी करने के लिए इंग्लैंड की गद्दी छोड़ दी थी।
प्रेमियों से हमदर्दी रखने वाले भी बहुत से लोग होते हैं। मेरे एक मित्र शादी से पहले अपनी पत्नी के बॉयफ्रेंड हुआ करते थे। पत्नी तब एक स्कूल में अध्यापिका थीं और प्रेमी जी रोज़ सड़क के किनारे धूप में खड़े होकर उनका इंतज़ार करते थे। जिस मकान के सामने वे खड़े रहते थे उसके मालिक ने द्रवित होकर एक दिन उनके लिए कुर्सी भेज दी थी।
परसाई जी ने ‘सुशीला’ उस लड़की को कहा था जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पी.एफ. का पैसा उनके बुढ़ापे के लिए बचा लेती है। लेकिन ज़ाहिर है बहुत से बापों को परसाई जी यह परिभाषा रास नहीं आती। अभी तो लगता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति बनेगी जहां बिना वालदैन के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के शादी मुकम्मल नहीं मानी जाएगी। शादी कराने वाले पंडित जी को भी दोनों पक्ष के मां-बाप की सहमति के बिना शादी कराने की मुमानियत होगी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघु कथा “– मेला …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ — मेला —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
आठों पहर वहाँ एक स्थायी मेला बना रहता था। लोग अपनी व्यस्तता से थक जाएँ तो एक वही मेला होता था जहाँ जाने पर उनका मन बहलता था। धारणा इस तरह से बनी होती थी कि अपना कोई घर में खो जाए तो वहाँ मेले में ढूँढने पर उसे पा लेंगे। पर एक प्रेमी के साथ कुछ और हुआ। उसने खोने को तो अपनी प्रेमिका को इस मेले में ही खोया, लेकिन उसे पाया नहीं। बात होती थी सब का कहीं खोया मेले में मिल जाता है तो उसका क्यों नहीं मिलता? रही प्रेमी की बात, वर्षों प्रेमिका को ढूँढते थका – हारा हो जाने से वह खत्म हो गया। अब वह कब्रस्तान में होता। प्रेमिका वहीं थी।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२३ ☆ दरवाज़े…
एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।
एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।” धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।” इस बार गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”
ध्यान देनेवाली बात है कि दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।
दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।
…अंतिम बात, घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈