हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६७ – “कथ्यों का अन्तर्मन…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत कथ्यों का अन्तर्मन...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “कथ्यों का अन्तर्मन...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

आकर्षण दिन का

खरोंच के ।

संध्या के गई धूप

पोंछ के ॥

 

गोष्ठियाँ दिशाओं

की छिन्न भिन्न ।

परिवर्तित मुद्रायें

हुई खिन्न ।

 

बतलाती अनगिनत

प्रकारों को –

मुई हवा लँगड़ाकर

मोंच के ॥

 

अपनी जो निगाहें

किये  नीची ।

आम की होती

प्रमुदित बगीची ।

 

मार रही ताने

मुँह चिढ़ाती –

भाभियों सरीखा

दिल कोंच के ॥

 

यह सधी परछाईं

शुष्क गाछ की ।

दुखिया प्रतीक्षारत है

छाछ  की ।

 

क्या कह दें दिन

के कथानक को –

कथ्यों का अन्तर्मन

नोंच के ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-01-2026

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४८ ☆ # “टूटते रिश्ते…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “टूटते रिश्ते…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४८ ☆

☆ # “टूटते रिश्ते…” # ☆

टूटते रिश्ते हैं टूटते परिवार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

बचपन से जिसे संभाला

वह रूठ गया

सांसों से बंधा रिश्ता

अचानक टूट गया

उम्मीद थी जिसे

वह सब कुछ लुट गया

हमारा दर्द अंदर ही अंदर

घुट गया

अब रिश्ते नहीं बस व्यापार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

कहां जाएं हम

छोड़कर यह दुनिया

हमें रास नहीं आ रही

यह दुनिया

कितनी बेरहम हो गई है

यह दुनिया

रोज नए-नए जख्म

दे रही है यह दुनिया

दुनिया में प्रेम नहीं दुखों की भरमार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

हवाओं में कड़वाहट

ईर्ष्या की गंध है

आपस में बेरूखी

प्रचंड द्वंद है

नफरत फैलाते समाज में

कुछ लोग चंद है

सत्य और समझदारी की बातें करना बंद है

सांप्रदायिकता करना अब तो कारोबार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

आजकल संवेदनाएं मर गई है

स्वार्थ की लालसा भर गई है

सच्चाई झूठ से डर गई है

रिश्तो को निरर्थक कर गई है

रिश्ते सांसों पर बोझ और भार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१९ ☆ व्यंग्य – क्रान्तिकारी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘क्रान्तिकारी‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ क्रान्तिकारी

राशन की दूकान के सामने धक्कम धक्का और चीख पुकार मची हुई थी। कतार खूब लंबी थी। खुली धूप में खड़े लोगों के मुंह और कपड़े पसीने से गीले हो रहे थे।

लाइन में से एक मूंछों वाला युवक चिल्लाया, ‘अबे, इतनी देर क्यों हो रही है? जल्दी हाथ नहीं चला सकते क्या? एक आदमी पन्द्रह मिनट में निबट रहा है।’

अंदर से विक्रेता ने अपना चेहरा भीड़ से ऊपर उठाया, आंखें सिकोड़ कर बोला, ‘काम ही तो कर रहे हैं। मशीन बन जाएं क्या?’

मूंछों वाला फिर चिल्लाया, ‘यहां धूप में दो घंटे से सिंक रहे हैं। तुमको क्या है, तुम तो आराम से अंदर बैठे हो।’

जवाब मिला, ‘माल लेना है तो धूप पानी सब सहना पड़ेगा। यहां बहस करने की जरूरत नहीं है, जो कहना है जाकर अफसरों से कहो।’

मूंछों वाला ताव खाकर लाइन से बाहर आ या, हाथ नचा कर बोला, ‘अरे हम सब समझते हैं। बड़े बगुला भगत बनते हो। सब माल पीछे के दरवाजे से बाहर जाता है और जनता को बेवकूफ बनाया जाता है। भूल गये बेटा, जब सात दिन बड़ी हवेली में रहे थे।’

दूकान वाला आगबबूला हो गया, बोला, ‘यहां फालतू बातों की जरूरत नहीं है। माल लेना है तो चुपचाप लो, नहीं तो जाओ।’

बाकी लोग प्रशंसा के भाव से इस क्रांतिकारी को देख रहे थे जो दूकान वाले की बखिया उधेड़ रहा था।

मूंछों वाला फिर बोला, ‘देखूंगा बेटा, मैं फूड ऑफिसर के पास जाकर तेरी एक-एक पोल खोलूंगा। मैं तेरी रग-रग जानता हूं।’

तभी दूकान के भीतर से एक दूसरा आदमी आया और क्रांतिकारी की बांह थाम कर उसे अलग ले गया। दूर ले जाकर उसने क्रांतिकारी से रुपये, कार्ड और थैला ले लिये। फिर क्रांतिकारी को वहीं खड़ा छोड़कर वह दूकान में आया और रजिस्टर में उसका नाम चढ़ा कर उसका राशन तौलवाया। फिर उसने जाकर चुपचाप थैला, लोगों की ओर पीठ करके खड़े क्रांतिकारी को थमा दिया।

क्रांतिकारी ने शरीर की ओट में थैला छिपा लिया और फिर कनखियों से ‘क्यू’ में खड़ी जनता की ओर देखता हुआ वहां से खिसक गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९१ – दिल की खातिर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– दिल की खातिर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — दिल की खातिर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

चोर ने एक ऐसा आईना चुराया जो आंतरिक दुनिया दिखाता था। उसने आईने में अपना दिल देखा। बड़ा प्यारा दिल था, लेकिन वह चोर होने से उसका दिल रोता था। उसने अपने दिल की खातिर चोरी छोड़ दी। अब उसे अपने दिल का हाल जानने के लिए आईने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पर ऐसा भी था उसने अपना दिल देखने के लिए कहीं से आईना चुराया नहीं था। बस अपने दिल की खातिर एक कल्पना ने उसे बांध लिया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

13 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२० – सोना और सोना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२० सोना और सोना… ?

‘समय बलवान, समय का करो सम्मान’, बचपन में इस तरह की अनेक कहावतें सुनते थे। बाल मन कच्ची मिट्टी होता है, जल्दी ग्रहण करता है। जो ग्रहण करता है, वही अंकुरित होता है। जीवनमूल्यों के बीज, जीवनमूल्यों के वृक्ष खड़े करते हैं।

अब अनेक बार  किशोरों और युवाओं को मोबाइल पर बात करते सुनते हैं,- क्या चल रहा है?… कुछ खास नहीं, बस टीपी।.. टीपी अर्थात टाइमपास। आश्चर्य तो तब होता है जब अनेक पत्र-पत्रिकाओं के नाम भी टाइमपास, फुल टाइमपास, ऑनली टाइमपास, हँड्रेड परसेंट टाइमपास देखते-सुनते हैं। वैचारिक दिशा और दशा के संदर्भ में ये शीर्षक बहुत कुछ कह देते हैं।

वस्तुतः व्यक्ति अपनी दिशा और दशा का निर्धारक स्वयं ही होता है। गोस्वामी जी ने लिखा है- “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।” मनुष्य तन पाना सौभाग्य की बात है। देवताओं के लिए भी यह मनुष्य योनि पाना दुर्लभ है। वस्तुत: ईश्वर से साक्षात्कार की सारी संभावनाएँ इसी योनि में हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यह योनि नश्वर है।

योनि नश्वर है, अर्थात कुछ समय के लिए ही मिली है। यह समय भी अनिश्चित है। किसका समय कब पूरा होगा, यह केवल समय ही जानता है। ऐसे में क्षण-क्षण का अपितु क्षणांश का भी जीवन में बहुत महत्व है। जिसने समय का मान किया, उसने जीवन का सदुपयोग किया। जिसने समय का भान नहीं रखा, उसे जीवन ने कहीं का नहीं रखा। अपनी कविता ‘क्षण-क्षण’ का स्मरण हो आता है। कविता कहती है,  “मेरे इर्द-गिर्द / बिखरे पड़े हज़ारों क्षण / हर क्षण खिलते/ हर क्षण बुढ़ाते क्षण/ मैं उठा/ हर क्षण को तह कर / करीने से समेटने लगा / कई जोड़ी आँखों में / प्रश्न भी उतरने लगा / क्षण समेटने का / दुस्साहस कर रहा हूँ /मैं यह क्या कर रहा हूँ?..अजेय भाव से मुस्कराता / मैं निशब्द / कुछ कह न सका/ समय साक्षी है / परास्त वही हुआ जो/ अपने समय को सहेज न सका।”

एक प्रसंग के माध्यम से इसे बेहतर समझने का प्रयास करते हैं। साधु महाराज के गुरुकुल में एक अत्यंत आलसी विद्यार्थी था। हमेशा टीपी में लगा रहता। गुरुजी ने उसका आलस्य दूर करने के अनेक प्रयास किए पर सब व्यर्थ। एक दिन गुरुजी ने एक पत्थर उसके हाथ में देकर कहा,” वत्स मैं तुझ से बहुत प्रसन्न हूँ। यह पारस पत्थर है। इसके द्वारा लोहे से सोना बनाया जा सकता है। मैं दो दिन के लिए आश्रम से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन में चाहे उतना सोना बना लेना। कल सूर्यास्त के समय लौट कर पारस वापस ले लूँगा।” गुरु जी चले गए। आलसी चेले ने सोचा, दो दिन का समय है। गुरु जी नहीं हैं, सो आज का दिन तो सो लेते हैं, कल बाजार से लोहा ले आएँगे और उसके बाद चाहिए उतना सोना बना कर लेंगे। पहले दिन तो सोने पर उसका उसका सोना भारी पड़ा। अगले दिन सुबह नाश्ते, दोपहर का भोजन, बाजार जाने का लक्ष्य इस सबके नाम पर टीपी करते सूर्यास्त हो गया। हाथ में आया सोना, सोने के चलते खोना पड़ा।

स्मरण रहे, यह पारस कुछ समय के लिए हरेक को मिलता है। उस समय सोना और सोना में से अपना विकल्प भी हरेक को चुनना पड़ता है। इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६३ – ज्ञान दादा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – भावप्रवण कविता – ज्ञान दादा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६३ ☆

☆ कविता – ज्ञान दादा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जड़ जमीं में जमी जिसकी

वट वही थे ज्ञान दादा।

उड़ न पाए पतंगों से

इसलिए कट भी न पाए।

दे सके थे छाँव सबको

बन सके थे गाँव सबका।

पहल करते आप ही थे

टहल कर वे कहानी में।

मन रमा करता हमेशा

काव्य में या जवानी में।

बुढ़ा पाए थे नहीं वे

यदपि था वार्धक्य साथी।

जन्मना परिपक्व थे वे

सच कहूँ अंधों के हाथी।

थाह किसने कभी पाई

नापने जो भी चले थे।

अंत में यह ही बताया

सभी नापों से परे थे।

वाग्देवी सदय थीं पर

तोलकर वे बोलते थे।

मन न सबके सामने वे

छले जाने खोलते थे।

विचारों के धनी थे पर

थोपते उनको न देखा।

जिंदगी जी भर जिए वे

व्यर्थ करते थे न लेखा।

क्या मिला, क्या दिया

पाया-खो दिया से मुक्त थे वे।

चित्रगुप्ती सभ्यता से

बिन कहे संयुक्त थे वे।

मौज-मस्ती, नेह निर्मल 

जिया था उनमें कबीरा।  

बिन लबादा, बिना चोगा

मन मिला उनको फकीरा।

गए जाकर भी नहीं वे

जी रहे हैं साथियों में।

जी रहे रचनाओं में वे

जी रहे अनुगामियों में।

मैं न मैं, मुझमें बसे थे,

हैं, रहेंगे ज्ञान दादा।

जड़ जमीं में जमी जिसकी

वट वही थे ज्ञान दादा।  

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ जन्मदिवस विशेष – “कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़  अवश्य ही होंगे…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ जीवन यात्रा – कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़  अवश्य ही होंगे☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(कथा बिम्ब में छः वर्ष पूर्व प्रकाशित मेरी आत्मकथा)

बहुत वर्ष पहले ‘कथा बिम्ब’ के भाई अरविंद  ने आत्मकथ्य लिखने का प्रेमपूर्वक आग्रह किया था । तब लिख नहीं पाया । पत्रकारिता ने बहुत कुछ पीछे ठेल रखा था । अब पूरी तरह सेवानिवृत्त और स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन का समय मिला तो अपने बारे में लिखने का अवसर भी मिल गया ।

मैं मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा जिले से हूं । इसमें शहीद भगतसिंह का पैतृक गांव खटकड  कलां भी शामिल होने के कारण पंजाब सरकार ने अब इस जिले का नाम शहीद भगतसिंह नगर कर दिया है । मुझे बहुत गर्व है कि शहीद भगतसिंह की स्मृति में पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा खोले गये गवर्नमेंट आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सन् 1979 में मुझे हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला । सन् 1985 में मुझे कार्यवाहक प्रिंसिपल बना दिया गया । इस तरह शहीद के परिवार सदस्यों से मुलाकातें भी होती रहीं । मेरा लेख ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ : शहीद भगतसिंह के पुरखों का गांव ।

खैर । पढाई से बात शुरू करता हूं । जो लडका बड़ा होकर स्कूल प्रिंसिपल बना और स्कूल को सर्वश्रेष्ठ स्कूल का पुरस्कार दिलाया , वही लड़का कभी पांचवीं कक्षा तक स्कूल का भगौड़ा लड़का था । पिता जी छोड़ कर जाते और कुछ समय बाद बेटे को देखने आते तो पता चलता कि बरखुरदार फट्टी बस्ता रख कर भाग चुके हैं । पिताजी का माथा ठनकता और उनकी छठी इंद्री बताती कि हो न हो , यह लड़का छोटी जाति के नौकर के घर जा छिपा है । वे वहां पहुंचते और थप्पडों से मुंह लाल कर घर ले आते । फिर ठिकाना बदलता और फिर खोजते । फिर वहीं थप्पडों से बेहाल । पिता जी , दादी और घर के लोग यह मानते कि यह बच्चा नहीं पढ़ेगा । दादा जी कहते कोई बात नहीं । गांव में तीन तीन भैंसे हैं । बस । कोई गम नहीं । खेतों में चराने चले जाना । मैं मन ही मन इस काम से भी कांप जाता । भैंस चराने का गुण आया ही नहीं।

थोड़ा बड़ा हुआ तो दादी को हमारे चचा के लडके शाम ने बताया कि दादी, एक बह्मीबूटी आती है । इसे रोज सुबह पिला दो । उसने पंसारी की दुकान से ला दी । दादी ने खूब घोट कर पिलाई । साथ में वृहस्पतिवार के व्रत ताकि देवता की कृपा हो जाए । पता नहीं , देवता खुश हुए या बूटी असर कर गयी कि मैं मिडल क्लास में सेकेंड डिवीजन में पास हो गया । दादी ने परात में लड्डू रखे और खुशी में मोहल्ले भर में बांटे ।

यह है मेरी पढ़ाई का हाल । ग्यारहवीं तक मेरे पिता,  दादा और दादी का निधन हो चुका था जो मुझे पढाई में सफल देखना चाहते थे । मैं इतना सफल हुआ कि तीनों वर्ष कॉलेज में प्रथम रहा । पर अफसोस अब कोई परात भर कर लडडू बांटने वाला नहीं था । मैं कमरा बंद कर खूब रोता अपनी ऐसी सफलता पर जिसे कोई देखने वाला नहीं था । महाविद्यालय की पत्रिका का छात्र संपादक भी रहा । यहीं से संपादन में रूचि बढ़ी । फिर बीएड में भी छात्र संपादक । इसी प्रकार गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की प्रभाकर परीक्षा में स्वर्ण पदक पाया । हिंदी एम ए की हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में ।

बात साहित्य की करें । मेरे परिवार का साहित्य से दूर दूर तक नाता नहीं था लेकिन ‘हिंदी मिलाप’ अखबार प्रतिदिन घर में आता था , जिसे मैं जरूर पढता था । उसमें फिक्र तौंसवीं का व्यंग्य काॅलम ‘प्याज के छिलके’  बहुत पसंद आता । ‘वीर प्रताप’ अखबार ने मुझे नवांशहर का बालोद्यान का संयोजक बना रखा था । यह अखबार इस नाते फ्री घर में डाला जाता था । इस तरह दो अखबार पढने को मिलते । रेडियो खूब सुनता । बाल कहानियों को जरूर सुनता । दादी भी सर्दियों में अंगीठी के आसपास बिठा कर कहानियां सुनाती । वही राजकुमार,  राजकुमारियों के किस्से । पर हर राजकुमार किसी न किसी राजकुमारी को राक्षस की चंगुल से छुडाकर लाता । बस  । ‘दरवाजा कौन खोलेगा’ कथा संग्रह में मैंने भूमिका में यही लिखा कि हर जगह राक्षस है । राजकुमारी कैद है । राजकुमार का संघर्ष है । यही जीवन है ।

मेरी पहली रचना ‘नयी कमीज’ जनप्रदीप समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई । पिता जी मेरी पुरानी कमीज नौकर के बेटे के लिए ले गये थे । वह गांव भर में नाचता फिरा और मन ही मन शर्मिंदा होकर सोचता रहा कि हमारी उतरन भी नौकर के बेटे की खुशी का कारण बन सकती है ? समाजसेवा का भाव जगा । मैं सन् 1979 से लेकर 1990 तक खटकड कलां में प्रिंसिपल रहा । साथ में चंडीगढ से प्रकाशित ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का आंशिक संवाददाता भी । मेरी रूचि साहित्य के साथ साथ पत्रकारिता में जुनून की हद तक बढती चली गयी । मेरे पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर लिखी : एक संवाददाता की डायरी कहानी को सारिका में तो नीले घोडे वाले सवारों के नाम’, कहानी को धर्मयुग ने जुलाई,  1982 के अंकों में प्रकाशित किया । पहली बार पता चला कि लेखक की फैन मेल क्या होती है । प्रतिदिन औसतन दो तीन पत्र इन कहानियों पर मिलते । तब मैंने सोचा कि कम लिखो और कोशिश कर अच्छा लिखो । इसी प्रकार ‘कथा बिम्ब’ में प्रकाशित कहानी : सूनी मांग का गीत पर भी अनेक पत्र मिले । कमलेश्वर, धर्मवीर भारती,   अज्ञेय व श्रीपत राय के संपादन में कहानियां प्रकाशित होने का सुख मिला । श्रीपत राय ने तो एक वर्ष में मेरी आठ कहानियां प्रकाशित कीं । मुलाकात के दौरान उलाहना दिया कि बारह कहानियां क्यों नहीं लिखीं ? इस प्रोत्साहन से ज्यादा क्या चाहिए ? ज्यादा लेखन का कोई तुक नहीं । मेरे कथा संग्रह बडे़ रचनाकारों के सुझावों पर प्रकाशित हुए । बिना कुछ रकम दिए ।

सन् 1975 में मैं केंद्रीय हिंदी निदेशालय की ओर से अहिंदी भाषी लेखकों के अहमदाबाद में एक सप्ताह के लिए लगने वाले लेखक शिविर के लिए चुना गया । तब राजी सेठ वहीं रहती थीं और उन्होने भी इस शिविर में भाग लिया और उनकी पहली कहानी ‘क्योंकर’ कहानी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । राजन सेठ के नाम के नाम से । लड़कों जैसा नाम होने के कारण उन्होंने अपना नाम राजी सेठ कर लिया । विष्णु प्रभाकर  हमारी कहानी की क्लास लेते थे । इन दोनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब से चला आ रहा है । विष्णु जी के बाद उनके परिवार से जुड़ा हुआ हूं । विष्णु जी के अनेक इंटरव्यूज प्रकाशित किए । तीन बार आमंत्रित भी किया क्योंकि संयोगवश हिसार पोस्टिंग हो जाने पर पता चला कि हिसार में अपने मामा के पास विष्णु जी ने पढ़ाई की । नौकरी की और साहित्यिक यात्रा शुरू की । बीस वर्ष यहीं गुजारे पर सीआईडी के पीछे लग जाने से दिल्ली चले गये और फिर नहीं लौटे । हां , हिसार के प्रति लगाव बहुत अधिक । आमंत्रण पर नंगे पाँव दौड़े आते । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के कथा समारोह में आए । जब उन्हें मान सम्मान की राशि का लिफाफा सौंपा तो स्नेह से भावुक होकर बोले -तेरे जैसा शिष्य भी सौभाग्य से मिलता है ।

मेरे जीवन में कहानी लेखन में रमेश बतरा का बहुत बडा योगदान है । चंडीगढ हम लोग इकट्ठे होते और रमेश का कहना था कि यदि एक माह में एक कहानी नहीं लिखी तो मुंह मत दिखाना । लगातार नयी कहानी। फिर वह ‘सारिका’ में उपसंपादक बन कर चला गया । जहां भी संपादन किया मेरी रचनाएं आमंत्रित कीं ।  ‘कायर’ लघुकथा उसके दिल के बहुत करीब थी । वह कहता था कि यदि मैं विशव की श्रेषठ लघुकथाओं को भी चुनने लगूं तो भी इसे रखूंगा । वरिष्ठ कथाकार राकेश वत्स की चुनौती भी बडी काम आई । वे एक ही बार नवांशहर आए और  देर रात शराब के हल्के हल्के सरूर में जब चहलकदमी के लिए निकले तब वत्स ने मुझे और मुकेश सेठी को  कहा कि मैं आपको कहानीकार कैसे मान लूं ? आपकी कहानियां न सारिका में , न धर्मयुग और हिंदुस्तान में आई हैं । फिर रमेश को बताया । उसने भी कहा कि वत्स की इस बात को और  चुनौती को स्वीकार करो । फिर क्या था ? सारिका, नया प्रतीक,  कहानी में स्थान मिला । अनेक अन्य भाषाओं में कहानियां अनुवादित हुईं  । रमेश असमय चला गया । अब कोई दबाव नहीं । कोई चुनौती भी नहीं । कहानी भी नहीं । पहला कथा संग्रह ‘महक से ऊपर’ राजी सेठ के स्नेह से डाॅ महीप सिंह ने प्रकाशित किया : अभिव्यंजना प्रकाशन से । ‘महक से ऊपर’ । रॉयल्टी भी मिली और पंजाब भाषा विभाग से सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार भी । पहली कृति पर पुरस्कार और रॉयल्टी । नये कथाकार को और क्या चाहिए ?

सन् 1990 में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक राधेश्याम शर्मा और समाचार संपादक सत्यानंद शाकिर दैनिक ट्रिब्यून में मुझे पूर्णकालिक चाहते थे । मार्च माह की पहली तारीख को प्रिंसिपल,  शिक्षण व अध्यापन को अलविदा कहने के बाद पत्रकारिता में आ गया । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का कथा कहानी पन्ना संपादित करने का अवसर मिला । कश्मीर से दिल्ली तक के कथाकारों से काफी जानने और मिलने का मौका मिला । कथा व लघुकथा को विशेष स्थान दिया । इस बीच मेरे लघुकथा संग्रह मस्तराम जिंदाबाद,  इस बार तो कथा संग्रह मां और मिट्टी,  जादूगरनी , शो विंडो की गुडिया आदि प्रकाशित हुए । मजेदार बात है कि साहित्य में मुझे लघुकथाकार ही समझा जा रहा है जबकि मेरे छह कथा संग्रह हैं । जहां तक कि ग्रंथ अकादमी के लिए कथा संकलन संपादित करने वाले ज्ञान प्रकाश विवेक मेरा कथा संग्रह दरवाजा कौन खोलेगा पढ कर हैरान रह गये और फोन पर कहा कि यार , मुझे बहुत हैरानी हुई कि लोग आपको लघुथाकार ही क्यों मानते हैं ?

मुझे हिसार में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के स्टाफ रिपोर्टर के रूप में अवसर मिला एक नये प्रदेश और संस्कृति को जानने का । इस दौरान डाॅ नरेंद्र कोहली के सुझाव पर मेरा कथा संग्रह ‘एक संवाददाता की डायरी’ तो डाॅ वीरेंद्र मेंहदीरता के सुझाव पर जादूगरनी , ‘शो विंडो की गुडिया’ कथा संग्रह चंडीगढ के अभिषेक प्रकाशन से आए । ऐसे थे तुम , इतनी सी बात , मां और मिट्टी,  दरवाजा कौन खोलेगा जैसे संकलन भी पाठकों तक पहुंचे ।

इस तरह अब तक मेरे सात कथा संग्रह और पांच लघुकथा संग्रह हैं । ‘एक संवाददाता की डायरी’ को अहिंदी भाषी लेखन पुरस्कार योजना में प्रथम पुरस्कार मिला और सबसे सुखद क्षण जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों यह पुरस्कार मिला । किसी रचनाकार के हाथों पुरस्कार मिलना आज भी पुलक से भर देता है । अटल जी ने वह संग्रह पढ़ने के लिए मंगवाया भी ।

काॅलेज छात्र के रूप में खुद की पत्रिकाएं प्रयास,  पूर्वा और प्रस्तुत प्रकाशित कीं । दैनिक ट्रिब्यून से त्यागपत्र दिलवा कर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुझे नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना कर ले गये । नयी अकादमी की कथा पत्रिका ‘कथा समय’ का संपादन किया । नये रचनाकारों को स्थान देना सदैव मुझे अच्छा लगता है । वरिष्ठ रचनाकारों की कहानियां भी दीं । नेहा शरद,  शेखर जोशी , अमरकांत,  नरेंद्र कोहली, राजी सेठ, वीरेंद्र मेंहदीरता,  निर्मल वर्मा, रविंद्र कालिया, ममता कालिया की चुनी हुई कहानियां दीं ।

अब अकादमी के पद से मुक्त हूं । हिसार के एक प्रतिष्ठित सांध्य दैनिक नभछोर में प्रतिदिन संपादकीय आलेख और साहित्य हिसार का देखता हूं । अनेक यात्राएं करता हूं । साहित्यिक संस्थाओं के आमंत्रण पर अलग अलग मित्र बनते हैं । सीखने की कोशिश करता हूं । पुरस्कारों की सूची से कोई लाभ नहीं होगा । जो मुझे पढ़ते हैं , वही मेरा पुरस्कार हैंं । मेरे लघुकथा संग्रह ‘इतनी सी बात’ का फगवाड़ा के कमला नेहरू काॅलेज की प्रिंसिपल डाॅ किरण वालिया ने ‘ऐनी कु गल्ल’ के रूप में पंजाबी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित करवाया ।  इसी प्रकार मेरा कथा संग्रह ‘मां और मिट्टी’ नेपाली में अनुवाद हुआ । यह सुखद अनुभूति किसी पुरस्कार से कम नहीं । मैं एक बात महसूस करता हूं और कहता भी हूं कि मैंने कम लिखा क्योंकि सन् 1982 में मंत्र मिल गया लेकिन मुझे उससे ज्यादा सम्मान मिला ।  मेरी इंटरवयूज की पुस्तक : यादों की धरोहर जालंधर के आस्था प्रकाशन से आने के बिल तीन तीन संस्करण आ चुके हैं । इसमें एक पत्रकार के रूप में अच्छे , नामवर साहितयकारों , रंगकर्मियों , पत्रकारों व संस्कृति कर्मियों के इंटरव्यूज शामिल हैं जो समय समय पर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के लिए किए गए थे । शीघ्र ही इंडियानेटबुक्स से महक से ऊपर का दूसरा संस्करण आयेगा । पत्रकारिता में भी ग्रामीण पत्रकारिता पर हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से तो साहित्यिक पत्रकारिता पर हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिले । रामदरश मिश्र की ये पंक्तियां बहुत प्रिय हैं :

मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी

मोहब्बत मिली है मगर धीरे-धीरे

जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर

वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे, ,,

इसी प्रकार अज्ञेय जी की ये पंक्तियां भी बहुत हौंसला देती हैं :

कहीं न कहीं

हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे

नहीं तो थका हारा बटोही

अपनी यात्रा जारी क्यों रखता ,,,,,

सच साहित्य ने क्या नहीं दिया ? जब मेरी बडी बेटी रश्मि रोहतक के पीजीआई में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी तब पुस्तक मेले से पुस्तकें लाकर उसके पास बैठ कर पढ़ता था । जब छोटी बेटी प्राची चंडीगढ़ के पीजीआई में तेइस दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही थी तब मैने तीन कहानियां लिखी थीं । यह साहित्य ही है जो दुख के समय मेरे काम आता रहा है । जब पिता , दादा और दादी नहीं रहे थे तब एक चौदह वर्ष के बालक को साहित्य ने सहारा दिया ।

सच अज्ञेय जी सही लिखते हैं : दुख सबको मांझता है । अमोघ शक्ति है साहित्य । साहित्यकार का सपना होता है कि कुछ लिखकर समाज को संदेश दे ।

मुंशी प्रेमचंद का मंत्र है कि साहित्यकार सुलाने के लिए नहीं , समाज को जगाने के लिए है ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क : 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४१ – आलेख – रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४१ ☆

☆ आलेख ☆ ~ रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

फेसबुक पर वायरल हो रहे इस वीडियो को देखकर मुझे अतीत की याद आ रही है। एक पिता का अपने पुत्री के के लिए सर पर चूड़ा एवं हाथ में दही का कमंडल लेकर जा रहा है। व वास्तव में यह भाउक कर देने वाली और अतीत को याद करने वाली आज के जमाने में विरले ही देखी जाने वाली तस्वीर है। यूट्यूब से जुड़े लोग इस तस्वीर के अलग मायने निकालते हुए, इसमें संभवत: कहीं कुछ देखते हैं, लेकिन मैं तो समझता हूं कि उन्होंने इस भावुक करने वाली तस्वीर को खींच कर, युवकों के लिए एक नई चीज और हम सबके लिए एक पुरानी याद जरूर ताज की है। एक पिता का पुत्री के प्रति कितना प्रेम हो सकता है और किस स्तर का हो सकता है यह इसमें स्पष्ट रूप से झलकता है। पुत्री के प्रति उसका स्नेह और श्रम साफ साफ देखा जा सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि आज के युग में यह प्रेम कही से भी कमतर है। लेकिन इस चित्र दिख रहा प्रेम, प्रेम की पराकाष्ठा है।

जैसा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अँचल में बेटी के यहां यहाँ तीज और खिचड़ी, भेजने की प्रथा है लेकिन दही और चूड़ा जो कि पूर्वांचल और बिहार में खिचड़ी का खास व्यंजन है इसे पहुचाने का सीधा-साधा अर्थ यह है कि हर पिता का या परिवार का उद्देश्य होता है कि यदि हमारे घर में दूध दही की प्रचुर मात्रा में है और कोई तीज त्यौहार है तो यह घर पर बनाए जाने वाला व्यंजन, अपने प्रियजन के पास तो जरूर पहुंचे।

यहां तक कि इसके अंदर जो प्रेम भाव होता है उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। उस व्यंजन को ले जाने का खर्च बाजार से खरीद कर देने से कहीं ज्यादा हो जाएगा, लेकिन जो आनंद उसको लेकर पहुंचने में और उसे देने में है वह शायद रुपए पैसा या खरीद कर देने में तो बिल्कुल ही नहीं है।

पूर्व के काल में पिता अपने पुत्री के घर कुछ लेकर ही जाता था, वह कभी खाली हाथ जाता ही नहीं था। उसकी मंशा यह होती थी कि मैं वहां सिर्फ दूंगा ही दूंगा। मैं बेटी के यहाँ से कुछ भी नहीं लाऊंगा। यहां तक कि वह अपने बेटी के घर में भोजन भी नहीं करता था और अक्सर देखा जाता था कि यदि पिता बेटी के घर में एक रात ठहर गया तो बेटी या उसके ससुराल वाले किसी दूसरे के घर से भोजन – पानी मंगा कर भोजन कराते थी

हमारे तीज त्योहारों की मौलिकता कैसी है, जिसमें की एक पिता खाने पीने की चीज लेकर बिना शर्म किये सिर पर बोरी और हाथ में दही का कमंडल लेकर निकल जाता ही जाता है। यह प्राचीन परंपरा यद्यपि समाप्त की ओर बढ़ चली है, या यूँ कहें कि लगभग समाप्त ही हो चुकी है। पिता का बेटी के घर आना जाना बेटी का पिता के घर आना जाना किसी समय या किसी त्योहार पर आधारित नहीं है।

अब मैं आगे का जो दृष्टांत बताने जा रहा हूं इसे ध्यान से पढियेगा ओर समझिएगा। विगत दिनों में अपने गांव बलिया गया था और जब लौटने लगा तो मेरे ससुराल के लोगों ने घर का चुरा तिलवा लिया अच्छा आदि पैक करके हमारे साथ रखवा दिया। यानी मेरे घर इसी खिचड़ी परंपरा के अनुसार कुछ खाने पीने की चीज आ गयीं थी, जोकि पूर्ण रूप से घर की बनी थी, और इसमें गांव की खुशबू साफ-साफ देखी जा रही थी। पिछले 15 जनवरी को मकर संक्रांति यानी खिचड़ी का त्यौहार था। मेरे कार्यालय में भी अवकाश था। मेरी दो बेटियां हैं और दोनों बेटी दामाद लखनऊ में ही रहते हैं।

यद्यपि वायरल हो रहे इस चित्र को मकर संक्रांति के दिन तो मैंने फेसबुक पर नहीं देखा था, लेकिन न जाने क्या हुआ मेरे मन में इस बार आया, कि चलूँ, आज मकर संक्रांति के दिन है, थोड़ा चूड़ा, तिलवा ओर गुड़ दोनों बेटियों के लिए, लिए चलते हैं। इन्हीं विचारों के साथ दो छोटे-छोटे झोलों में यह सामग्रियां रखवाया और कार्य पर रखकर चल दिया। मैंने अपने पहुंचने की सूचना अपने बेटियों को नहीं दी थी। मैं उन्हें सरप्राइज रूप से यह गांव का बना हुआ उपहार देना चाहता था। यह वही प्रेम था जो प्रेम इस वायरस चित्र में उस वृद्ध व्यक्ति के अंदर अपने पुत्री के प्रति प्रदर्शित हो रहा है।

अब आपको सच बताऊँ, जिस समय मैं इस झोले को लेकर जा रहा था। उस झोले में रखें रसद का मूल्य तो कुछ नहीं था, लेकिन मेरा स्नेह अपरंपार था जिसे मैं अपनी कर से लेकर बेटी के घर जा रहा था। लखनऊ के इस पॉस एरिया में रह रही मेरी बेटी जहां ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के बीच जहां रह रही थी, जहां आधुनिकता के पैमाने पार हो रहे थे। वहां जब मैं पहुंचा तो मेरी बेटी मुझे गले लगा कर, अपना स्नेह लूट रही थी, या मैं उसको स्नेह दे रहा था, मेरे सामने वही दृश्य उपस्थित हो रहा है, जो आज एक आप अपनी बेटी के लिए पैदल चूड़ा दही लेकर जा रहा है। जब मैंने अपनी बेटी को ये थोड़ा स्नेह देकर गले लगाया, तो मैंने महसूस किया कि आखिरकार बाप बेटी के बीच का स्नेह क्या होता है।   

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२१ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़े स्तर पर हत्याकांड हुआ। यही नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको कई बार बर्बाद किया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इसे हर बार बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अकबर ने गुरु रामदास को उस ज़मीन का पट्टा दिया था, जिस पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ है।

हमने टैक्सी नियत पार्किंग में खड़ी कर दी। जूतों की उतराई-पहनाई और रखने-उठाने की मुश्किल से बचने के लिए, जूते वाहन में ही छोड़ दिए। पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक़रीबन डेढ़-दो किलोमीटर रहा होगा। धूप तेज होने से पाँव जलने लगे। बाज़ार के बीच से होकर रास्ता था। छाया देखकर ठंडी जगह पर पैर रख कर चलते रहे। दुकानों पर लस्सी और सिकंजी की बहार थी। अधिकतर दुकाने कपड़ों की और कुछ जूते-चप्पल की दुकाने भी थीं। आधा घंटा में मंदिर परिसर पहुँच गये। परिसर में चोकोर परकोटा है। बीच में स्वर्णमंदिर चमचमाता नज़र आ रहा है। जिसकी प्रतिच्छाया सरोवर में झिलमिला रही है। मंदिर के दाहिने और बाएँ तरफ़ से परकोटा में प्रवेश द्वार हैं। हम बाएँ दरवाज़े से अंदर घुसे। हरमंदिर साहब का इतिहास याद आने लगा।

गुरुनानक, गुरु अंगददेव और गुरु अमरदास के बाद चौथे सिख गुरु रामदास ने अमृतसर में दरबार साहिब के नाम से मशहूर मंदिर बनाने की  शुरुआत 1577 में की थी और पांचवें गुरु अर्जन ने मंदिर की स्थापना का कार्य पूरा किया था। मंदिर को पूरा करने में आठ साल लगे थे। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। आदि ग्रंथ, सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रूप माना जाता है। इसमें 1,430 पृष्ठ हैं, जिनमें से अधिकांश को 31 रागों में विभाजित किया गया है।

सिखों और मुस्लिमों के बीच लंबे समय से चले विवाद से 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था। 1776 में एक नया मुख्य प्रवेश द्वार, मार्ग और गर्भगृह का निर्माण पूरा हुआ, जबकि सरोवर  के चारों ओर पूल का काम 1784 में समाप्त हो गया।

रणजीत सिंह ने घोषणा की कि वह संगमरमर और सोने के साथ इसका पुनर्निर्माण करेंगे। मंदिर को 1809 में संगमरमर और मिश्रित सोना-तांबे में पुनर्निर्मित किया था, और 1830 में रणजीत सिंह ने सोने की पर्त के साथ गर्भगृह को सुसज्जित करने के लिए सोना दान किया।

मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। छठे गुरु हरगोबिंद द्वारा इसे बनवाया गया था। यह सिखों के लिए सत्ता के  पांच तख़्तों में से एक है। अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और ऐसी जगह है जहां सिख लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सरोकारों को संबोधित किया जाता है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सिक्ख गुरूग्रंथ साहिब में आस्था रखते हैं। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है। हमने परकोटा से मंदिर की परिक्रमा करके लंगर में प्रसादी ग्रहण की और परिसर से वापस निकले।  

अमृतसर एक भयानक जलियांवाला बाग हत्याकांड का गवाह रहा है। 13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दूसरा स्मारक अमर ज्योति है।

बारह बजे अमृतसर से पठानकोट होते हुए धर्मशाला के लिए रवानगी डाली। पंजाब की उर्वरा ज़मीन पर बासमती चावल की खेती लहरा रही है। सफ़ेद बगुले कुलाँचे भरते मटरगश्ती में संलग्न हैं। अमृतसर से पठानकोट तक छै लेन की मज़बूत सड़क बन गई है। सबसे पहले बटाला आया। बटाला पंजाब राज्य के गुरदासपुर ज़िले का एक शहर है। बटाला एक मुख्य औद्योगिक केन्द्र है और पंजाब के महत्वपूर्ण माझा सांस्कृतिक क्षेत्र का एक केन्द्रबिन्दु माना जाता है। फिर धारीवाल आया। धारीवाल गुरदासपुर जिले में पंजाब का 5 वां सबसे बड़ा शहर और अपनी ऊनी मिल के लिए सबसे प्रसिद्ध है। यह शहर अपर बारी दूबा नदी के तट पर स्थित है जो व्यास नदी में मिलती है। वहाँ से गुरदासपुर 13 किमी दूर है।  

गुरदासपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पनियार गांव के एक ब्राह्मण गुरिया जी ने की थी। उन्होंने गुरदासपुर के लिए सांगी गोत्र के जाट समुदाय से जमीन खरीदी थी। उन्ही के नाम पर गुरदासपुर नाम पड़ा। गुरिया जी के दो पुत्र थे-नवल राय और पाला जी। नवल राय के वंशज गुरदासपुर में बस गए। गुरु नानक देव की पत्नी का मायका गुरदासपुर में था।

भारत के विभाजन से पहले, गुरदासपुर जिले का भविष्य लंबे समय तक तय नहीं किया गया, क्योंकि यह मुसलमान बहुल था। सीमा सीमांकन समिति द्वारा प्रारंभिक योजना पठानकोट (उस समय गुरदासपुर जिले का हिस्सा) को पाकिस्तान और शकरगढ़ को भारत में रखने की बात थी। हालांकि, बाद में निर्णय की बारीक ट्यूनिंग के रूप में इसके विपरीत किया गया। यानी शकरगढ़ पाकिस्तान को दिया गया था और गुरदासपुर जिला (पठानकोट के साथ) भारत को दिया गया। गुरदासपुर ब्यास और रावी नदियों के बीच एक शहर है। इसमें गुरदासपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, जो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है।

अंत में, रैडक्लिफ अवार्ड के तहत, केवल एक तहसील शकरगढ़- को पाकिस्तान में स्थानांतरित कर दिया गया, और शेष जिला भारत के साथ रख दिया। गुरदासपुर जिले से कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए; सिख और हिंदू सीमा पार कर भारत आ गए। भारी मात्रा में हिंसक वारदातें हुईं। गुरदासपुर भारत को देने का दबाव नेहरू-पटेल का था। पाकिस्तान को भरोसा था कि मुस्लिम बहुल होने से और सीमा पर होने से गुरदासपुर उन्हें मिलेगा तो जम्मू-कश्मीर भारत से पूरी तरह कट जाएगा। वह उसे अधिग्रहण कर लेगा। जब पाकिस्तान ने देखा कि गुरदासपुर उन्हें पूरा नहीं मिला तो उन्होंने कश्मीर में क़बायली हमला शुरू करवा दिए। गुरदासपुर ज़िले में गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर – सबसे प्रसिद्ध सिख गुरुद्वारों में से एक, जहाँ सिख गुरु नानक देव ने अपने अंतिम दिन बिताए थे।

धारीवाल के बाद पठानकोट आया। पठानकोट ऐतिहासिक महत्व वाला एक प्राचीन शहर है। पठानकोट में पाए गए पुराने सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि यह पंजाब के सबसे पुराने स्थलों में से एक है। यह हमेशा से बहुत महत्व का स्थान रहा होगा क्योंकि यह पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। पठानकोट हिमाचल में स्थित नूरपुर राज्य की राजधानी थी और अकबर के शासनकाल में इसका नाम बदलकर धमेरी (नूरपुर) कर दिया गया था। राजपूत के पठानिया कबीले ने अपना नाम पठानकोट से लिया है।

पठानकोट को कांगड़ा और डलहौजी की सुरम्य तलहटी में चक्की नदी पर स्थित होने के कारण जम्मू, कश्मीर, डलहौजी, चंबा, कांगड़ा, धर्मशाला, मैकलोडगंज, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी और आगे हिमालय पहाड़ों में जाने से पहले एक विश्राम स्थल के रूप में उपयोग किया जाता है। पठानकोट जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इन राज्यों के कई ग्रामीण छात्र शिक्षा के लिए पठानकोट आते हैं। पठानकोट में हल्का नाश्ता किया और गाढ़ी चाय पी। अब शिवालिक पहाड़ियाँ शुरू हो गईं। सबसे पहले काँगड़ा ज़िले का नूरपुर आया।

काँगड़ा क्षेत्र में ब्रिटिश राज के आगमन से पहले धर्मशाला और इसके आसपास के क्षेत्रों में दो सहस्राब्दियों तक कटोच राजवंश का शासन था। 1810 में सिख राजवंश के महाराज रणजीत सिंह और राजा संसार सिंह कटोच के मध्य हुई ज्वालामुखी की संधि के बाद कटोच केवल काँगड़ा क्षेत्र में स्थानीय जागीरदार रह गए। 1848 में अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया था। 1849 में कांगड़ा जिले के अंदर एक फौजी छावनी के लिए धौलाधार पर्वत की ढलानों पर एक स्थान को चुना गया, जहां एक हिन्दू धर्मशाला स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि धर्मशाला नगर का नाम धर्मशाला शब्द से उत्पन्न हुआ है।

धर्मशाला वर्ष 1849 में कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया। वर्ष 1855 में धर्मशाला को कांगड़ा जिले का मुख्यालय घोषित किया गया था। धर्मशाला में सिविलियन और छावनी क्षेत्र की बढ़ती चहल-पहल को देखते हुए, सुविधाएं लोगों को मुहैया करवाने के लिए नगर परिषद बनाने का विचार बना था। पांच मई 1867 को यहां नगर परिषद अस्तित्व में आई थी। उस समय बनी नगर परिषद की पहली बैठक भी 6 मई 1867 को तत्कालीन जिलाधीश एल्फिनस्टोन की अध्यक्षता में हुई थी।

धर्मशाला के 1867 में नगर परिषद बनने के बाद यहां सुविधाओं में इजाफा हुआ। 1896 में धर्मशाला में लोगों को बिजली भी मिलनी शुरू हुई थी। तत्पश्चात नगर में कार्यालयों के विकास के अतिरिक्त व्यापार व वाणिज्य, सार्वजनिक संस्थान, पर्यटन सुविधाओं तथा परिवहन गतिविधयों में भी उन्नति हई। वर्ष 1905 व 1986 के भूकम्पों से नगर का बहुत नुकसान हुआ। 1926 से 1948 के बीच यहां पर इंटर कॉलेज सहित महाविद्यालय खुला तो वर्ष 1935 में सिनेमा हाल भी यहां खुला। बढ़ते समय के साथ-साथ सामाजिक सुधारों के साथ संगीत, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह क्षेत्र कहीं पीछे नहीं रहा। 1960 से महामहिम दलाई लामा का मुख्यालय भी धर्मशाला में स्थित है।

धर्मशाला राज्य की शीतकालीन राजधानी है। यह कांगड़ा नगर से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला के मैक्लॉडगंज उपनगर में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुख्यालय हैं, और इस कारण यह दलाई लामा का निवास स्थल तथा निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। दो घंटे बौद्ध मंदिर में गुज़ारे। धर्मशाला को भारत सरकार के स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत एक स्मार्ट नगर के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय नगरों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

12 जुलाई 2022 को पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर पंजाब की जम्मू-कश्मीर सीमा पर करके कठुआ, बरनोटी, जसरोटा, छन्नी और सम्बा जो कि चिकन नेक बिंदु पर स्थित हैं, को पार करके जम्मू शहर में दाखिल हुए। जम्मू शहर ऐतिहासिक नगर है और पूर्व जम्मू प्रांत की राजधानी रह चुका है और बाद में भी भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी रह चुका है। राय जम्बुलोचन राजा बाहुलोचन का छोटा भाई था। बाहुलोचन ने तवी नदी के तट पर बाहु किला बनवाया था और जम्बुलोचन ने जम्बुपुरा नगर बसवाया था। नगर के नाम का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। जम्मू शहर से 32 किलोमीटर दूर अखनूर में पुरातात्त्विक खुदाई के बाद इस जम्मू नगर के हड़प्पा सभ्यता के एक भाग होने के साक्ष्य भी मिले हैं। जम्मू में मौर्य, कुशाण और गुप्त वंश काल के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 480 ई. के बाद इस क्षेत्र पर एफ्थलाइटिस का अधिकार हो गया था और यहां कपीस और काबुल से भी शासन हुआ था। इनके उत्तराधिकारी कुशानो-हेफ्थालाइट वंश के थे, जिनका अधिकार 565 से 670 ई. तक रहा। तदोपरांत 670 ई. से लेकर 11वीं शताब्दी तक शाही राजवंश का राज रहा जिसे गजनी के अधीनस्थों ने छीन लिया। जम्मू का उल्लेख तैमूर के विजय अभियानों के अभिलेखों में भी मिलता है। इस क्षेत्र ने सिखों एवं मुगलों के आक्रमणों के साथ एक बार फिर से शक्ति-परिवर्तन देखा और अन्ततः ब्रिटिश राज का नियंत्रण हो गया। यहां 840 ई. से 1869 ई. तक देव वंश का शासन भी रहा था। तब नगर अन्य भारतीय नगरों से अलग-थलग पड़ गया और उनसे पिछड़ गया था। उसके उपरांत डोगरा शासक आये और जम्मू शहर को अपनी खोई हुई आभा व शान वापस मिली। उन्होंने यहां बड़े बड़े मन्दिरों व तीर्थों का निर्माण किया व पुराने स्थानों का जीर्णोद्धार करवाया, साथ ही कई शैक्षिक संस्थान भी बनवाये। उस काल में नगर ने काफ़ी उन्नति की। 1817 में 43 कि.मी लम्बी रेल लाइन द्वारा जम्मू को सियालकोट से जोड़ा गया था, किन्तु 1947 में भारत के विभाजन के बाद यह रेल लाइन बंद कर दी गयी क्योंकि सियालकोट से आवाजाही की कड़ी टूट गयी थी। उसके बाद जम्मू शहर में 1971 तक कोई रेल सेवा नहीं थी। तभी भारतीय रेल ने पठानकोट-जम्मू तवी ब्रॉड गेज रेल लाइन डाली और अन्ततः 1975 में एक बार फ़िरसे नये जम्मू-तवी रेलवे स्टेशन के साथ जम्मू शेष भारत से रेल द्वारा जुड़ गया। वर्ष 2,000 में पुराने रेलवे स्टेशन का अधिकांश भाग ध्वस्त कर वहां एक कला केन्द्र बनाया गया।

जम्मू में बहुत तेज गर्मी है। न धरती पर बारिश है और न आसमान में बादल दिख रहे हैं। तभी दूसरे चौराहे पर अमरनाथ यात्रियों के लिए संचालित भंडारे में भोजन किया। उसके बाद दस मिनट में जम्मू विमानतल पहुँच गये। इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर Go first की फ़्लाइट नम्बर G-196 दोपहर बाद तीन बजे का प्रस्थान प्रदर्शित हो रहा है।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९२ ☆ गीत – ।। मामूली से ऊपर उठ लोगों को खास बनते देखा है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९२ ☆

☆ गीत ।। मामूली से ऊपर उठ लोगों को खास बनते देखा है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

आपके कर्म एक दिनआपकी, पहचान बना जाते हैं।

आपके बोल हर दिल पर एक, यूटी निशान बना जातें हैं।।

जो मुश्किल में हार नहीं, मानते जीवन में कभी भी।

वह जमीन से ऊपर उठ खुद, कोआसमान बना जाते हैं।।

=2=

जीने को तो यहाँ जिंदगी, हर कोई जी ही लेता है।

हार से घबरा कर बस घूंट, गम के पी ही लेता है।।

लेकिन जो जिंदगी के, इम्तिहान को रहते तैयार।

वह अपनी  किश्ती   तूफानों, में निकाल लेता है।।

=3=

आत्म  विश्वास   मानव की, सर्वोत्तम पूंजी होती है।

निरंतर अभ्यास लगन, सफलता की कुंजी होती है।।

परिश्रम से राह के काटें भी, फूल बन खिलते हैं जाते।

नीचे रह फिर भी उनकी, अंतिम छलांग ऊंची होती है।।

=4=

इन आँखों ने   लोगों को, इतिहास बनते देखा है।

अपने कर्मों   से सफल, बेहिसाब बनते देखा है।।

मंजिल आँखों से   ओझल, देखा है उसको पाते।

मामूली से ऊपर उठकर, उनको खास बनते देखा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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