सूचनाएँ/Information ☆ ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित ☆ साभार – डॉ. जवाहर कर्नावट ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित🌹

आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोगी 17 देश 455 एकड़ का विशाल परिसर प्राचीन और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत संगम ।

नव स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा आयोजित ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार (28-29 मार्च) में वक्ता के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस विश्वविद्यालय को 17 देशों के सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। भारत सरकार ने 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया और बिहार में राजगीर के पास ही 2014 में इसका शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का नवीन परिसर 455 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है जो प्राचीन नालंदा और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण है । भारत सहित विभिन्न देशों के लगभग 700 विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास पांचवीं शताब्दी में शुरू होता है जब गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बिहार के राजगीर में 427 ई के लगभग इसकी स्थापना की थी और इसे बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था ।यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जिसमें 10, 000 से अधिक छात्र और लगभग 2000 शिक्षक थे। चीन, तिब्बत, जावा, जापान कोरिया, म्यांमार, कंबोडिया श्रीलंका आदि देशों से यहां छात्र अध्ययन के लिए आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने यहां कई साल रहकर अध्ययन किया और नालंदा के वैभव को दुनिया तक पहुंचाया। विश्वविद्यालय का 9 मंजिला पुस्तकालय जिसे धर्मगंज कहा जाता था, में ज्ञान का विपुल भंडार था। यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक शिक्षा और शोध का वैश्विक केंद्र बना रहा ।ज्ञान की इस विशाल ज्योति को 1193 इस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बुझा दिया किंतु नालंदा विश्वविद्यालय अब पुनः अपने वैभव को अर्जित करने के लिए कुलपति प्रो. सतीश चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे, सचिन श्री गोपाल अरोड़ा और निदेशक श्री नारायण कुमार को इस सफल आयोजन के लिए बधाई और धन्यवाद।

साभार – डॉ जवाहर कर्णावट

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ – इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम – मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का आयोजन – ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव – ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹– इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम – मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी – ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव –🌹

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आगामी 30 और 31 मार्च को इंदौर में आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ देशभर की साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े संपादकों, लेखकों, शोधार्थियों और प्रकाशन विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के समक्ष बदलते समय में उत्पन्न हो रही चुनौतियों, उनके स्वरूप, सामग्री और भविष्य की दिशा पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से आयोजित यह समागम साहित्यिक जगत में विशेष उत्सुकता का केंद्र बना हुआ है। अकादमी के अनुसार, इस आयोजन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित आर्थिक, तकनीकी और पाठकीय संकटों पर न केवल चर्चा होगी, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी खोजने का प्रयास किया जाएगा।

समागम का उद्घाटन 30 मार्च को प्रातः 11 बजे से होगा, जिसमें ‘देश और समाज के प्रति साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का दायित्व बोध : वीणा का शताब्दी संदर्भ’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित किया जाएगा। इस सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े विद्वान तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ के संपादक अपने विचार व्यक्त करेंगे। उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण में उनका योगदान तथा बदलते मीडिया परिवेश में उनकी जिम्मेदारियों पर विशेष चर्चा अपेक्षित है। इसके बाद आयोजित प्रथम सत्र में पत्रिकाओं के स्वरूप और प्रस्तुति को केंद्र में रखते हुए ‘जो दिखता है वही बिकता है’ विषय पर विमर्श किया जाएगा, जिसमें यह विचार किया जाएगा कि साहित्यिक पत्रिकाओं के कलेवर और लेआउट में आकर्षण की कमी किस प्रकार पाठकों को उनसे दूर कर रही है और उन्हें अधिक पठनीय के साथ-साथ दर्शनीय बनाने की आवश्यकता क्यों है।

दोपहर बाद के सत्रों में समागम का स्वर और अधिक व्यावहारिक तथा बहुआयामी हो जाएगा। ‘थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी’ विषयक सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग्य चित्रों के प्रयोग पर चर्चा होगी, जबकि अगले सत्र में पत्रिका प्रकाशन से जुड़ी प्रशासनिक और आर्थिक प्रक्रियाओं पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया जाएगा। इसमें आर.एन.आई. पंजीयन, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क, डाक पंजीयन और वितरण व्यवस्था से संबंधित जटिलताओं को सरल भाषा में समझाया जाएगा। इसी क्रम में सरकारी अनुदान और विज्ञापन प्राप्त करने की प्रक्रियाओं पर भी विशेषज्ञ जानकारी साझा की जाएगी, जो विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर की पत्रिकाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दिन के अंतिम चरण में साहित्यिक पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और वैश्विक स्तर पर उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट पर चर्चा करते हुए संभावित समाधान तलाशे जाएंगे, जिसके बाद सायंकालीन विशेष सत्र में देशभर से आए संपादक अपनी-अपनी पत्रिकाओं के अब तक के योगदान और अनुभव साझा करेंगे।

समागम के दूसरे दिन, 31 मार्च को, विमर्श का केंद्र साहित्यिक सामग्री की गुणवत्ता, कलात्मक प्रस्तुति और आधुनिक मुद्रण तकनीक पर रहेगा। ‘छपास की भूख के बीच संपादक धर्म का चीरहरण’ विषय पर आयोजित सत्र में पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही रचनाओं के स्तर में गिरावट और संपादकीय मानकों पर पड़ रहे प्रभावों पर गंभीर चर्चा की जाएगी। इसके पश्चात आयोजित सत्र में साहित्य और चित्रांकन के संबंधों पर विचार करते हुए यह देखा जाएगा कि चित्र और कलात्मक प्रस्तुति किस प्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं की सौंदर्यात्मकता और पठनीयता को बढ़ा सकते हैं। दोपहर बाद का सत्र आधुनिक मुद्रण तकनीकों और प्रकाशन के बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहेगा, जिसमें नई तकनीकों के माध्यम से पत्रिकाओं की गुणवत्ता, प्रसार और लागत प्रबंधन पर प्रकाश डाला जाएगा।

दो दिवसीय इस समागम का समापन ‘पाथेय’ विषयक उद्यापन सत्र से होगा, जिसमें समागम के निष्कर्षों और भविष्य की दिशा पर समग्र विचार प्रस्तुत किए जाएंगे। आयोजन समिति के अनुसार, इस समागम से प्राप्त सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर साहित्यिक पत्रिकाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज तैयार करने की भी योजना है। साहित्यिक पत्रकारिता के समकालीन परिदृश्य में यह आयोजन न केवल संवाद का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के भविष्य को लेकर ठोस रणनीति बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 – साहित्य अकादमी , भोपाल

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ – हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह  सम्पन्न – ☆ साभार – श्री संजय भारद्वाज ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹– हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह  सम्पन्न – ☆ साभार – श्री संजय भारद्वाज –🌹

हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह शनि. दि.21 मार्च 2026 को सम्पन्न हुआ। विश्व कविता दिवस के परिप्रेक्ष्य में इसी समारोह में संस्था की 314वीं साहित्यिक गोष्ठी भी हुई। यह संस्था की होली विशेष गोष्ठी थी। संस्था के सदस्य विगत तीन दशकों से होली गोष्ठी में फूलों से होली खेलते हैं।

इस आयोजन में दूरदर्शन के भूतपूर्व कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अश्विनी कुमार को भाषा एवं संगीत के क्षेत्र में उनके महती योगदान के लिए ‘हिंदीभूषण’ सम्मान से अलंकृत किया गया।

श्रीमती अमीता शाह को समाजसेवा एवं डॉ पुष्पा गुजराथी को साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘हिंदीश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया।

श्री संजय भारद्वाज

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद एवं लोकसाहित्य मर्मज्ञ प्रा. महेंद्र ठाकुरदास ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि विश्व की रचना ही कविता से हुई है। जिस दिन पहली कविता जन्मी, उसी दिन विश्व भी जन्मा। अपने भीतर के रूप को देखने और प्रकट करने के लिए मनुष्य साहित्य और कला की प्रस्तुति करता है। जब तलवारें टूट जाती हैं, तब साहित्य सीमाओं की रक्षा करता है।

डॉ अश्विनी कुमार ने  कहा कि मैंने आज तक जो भी किया, कभी उसका आकलन नहीं किया किंतु ललक बहुत है कि अपना श्रेष्ठतम दे सकूंँ। हिंदी आंदोलन परिवार से अपने वर्षों पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस परिवार से जो जुड़ता है, कभी विलग नहीं होता है।

श्रीमती अमीता शाह ने कहा कि समाज के प्रति  कुछ सकारात्मक करने के विचार ने मुझे सामाजिक कार्यों से जोड़ा। प्रकृति में आप जो देते हैं, वही पाते हैं, समाज से सम्मान पाना संभवतः ऐसी ही क्रिया- प्रतिक्रिया का उदाहरण है।

डॉ. पुष्पा गुजराथी ने कहा कि जब वह कैंसर से जूझ रही थीं, भारद्वाज युगल संजीवनी बनकर उनके साथ खड़ा रहा, उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता रहा। यह आत्महंता के क्षणों में मेरे हाथों में कलम थमाकर एक सूरज को प्रशस्त करने जैसा था।

अपनी प्रस्तावना में हिंआंप के अध्यक्ष संजय भारद्वाज ने संस्था की अब तक की यात्रा की संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्था को सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी, डॉ. विजय भटकर, डॉ. विश्वनाथ कराड, डॉ. दामोदर खडसे जैसी विभूतियों को सम्मानित करने का अवसर मिला है।

आयोजन में उपस्थित प्रमुख रचनाकारों एवं अतिथियों में मेजर सरजूप्रसाद, वीनु जमुआर, आराधना कुमार, डॉ. अनिता जठार , दीप्ति सिंह, नेहा म्हस्के, डॉ ज्योति कृष्ण,श्री कृष्ण चंद्र मिश्रा, डॉ मंजु चोपड़ा, मनमोहन चड्ढा, आदर्शिनी श्रीवास्तव, अभय श्रीवास्तव,अवनीश कुमार, रीतिका कुमार, नरेंद्र कौर छाबड़ा,वेदस्मृति ‘कृती’, अभिषेक पाण्डेय, जिज्ञासा ठाकुरदास, मिश्रा परिवार आदि सम्मिलित थे।

समारोह का संचालन श्रीमती गौतमी चतुर्वेदी पांडेय ने किया। श्री सुधीर कुमार मिश्रा ने गोष्ठी का प्रायोजन किया।

उल्लेखनीय है कि हिंदी आंदोलन परिवार विगत 31 वर्षों से भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में अखंड कार्यरत है।

साभार – श्री संजय भारद्वाज, अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार 

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ ​राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल का आयोजन ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल का आयोजन ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बाल साहित्य की बहुरंगी धारा: 20+ नई कृतियों का भव्य विमोचन

राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026 का आयोजन मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा एन.आई.टी.टी.टी.आर. (श्यामला हिल्स), भोपाल में 13-14 मार्च 2026 को दो दिवसीय भव्य रूप में संपन्न हुआ। यह संगोष्ठी भारत के प्रथम बाल साहित्य सृजन पीठ के निदेशक, ‘देवपुत्र’ बाल मासिक के पूर्व संपादक तथा बाल साहित्य के पुरोधा कीर्तिशेष श्रद्धेय कृष्ण कुमार अष्ठाना जी की स्मृति को समर्पित थी।

आदरणीय डॉ. विकास दवे (मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक) के आदेशानुसार और मार्गदर्शन में आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर से बाल साहित्यकार, शोधार्थी, शिक्षक और बाल-साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। संगोष्ठी के दौरान कुल 10 सत्रों में क्रमवार पुस्तक विमोचन का विशेष आयोजन किया गया, जिसमें 11 रचनाकारों की 20 से अधिक नई कृतियाँ बच्चों के समक्ष प्रस्तुत की गईं।

ये कृतियाँ बाल साहित्य की विविध विधाओं—कविता, कहानी, बालगीत, पत्र-लेखन, व्यंग्य, संस्कृति-आधारित गद्य—को समेटती हैं। ये पुस्तकें बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, मूल्य-शिक्षा, राष्ट्रप्रेम, पर्यावरण चेतना तथा सांस्कृतिक जड़ों से गहरा जुड़ाव पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। विमोचन समारोह ने बाल साहित्य की समृद्धि को नई ऊर्जा प्रदान की तथा रचनाकारों को पाठकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना।

विमोचित प्रमुख कृतियाँ का विवरण निम्न अनुसार है –

सर्वप्रथम डॉ. मीनाक्षी दुबे, भोपाल की पाती लेखन विद्या की पुस्तक— नौनिहालों के: पाती वीर सपूतों की, का विमोचन किया गया। इस पाती संग्रह की पुस्तक की प्रत्येक रचना बच्चों को संबोधित करते हुए काल्पनिक पत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे बच्चे महान विभूतियों जैसे भगत सिंह के साहस, रानी लक्ष्मीबाई की निर्भयता आदि को व्यक्तिगत रूप से निकट महसूस करें। पुस्तक में राष्ट्रप्रेम, साहस, सत्य, त्याग और अनुशासन के मूल्यों को हृदयंगम करने का उद्देश्य है, ताकि प्रत्येक बच्चा बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा प्राप्त करे।

दूसरे सत्र में किशोर श्रीवास्तव, ग्रेटर नोएडा, उ.प्र. की पुस्तकों का विमोचन किया गया। लेखक की अब तक लगभग 15 बाल पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये बाल कलाकारों पर लघु फिल्में बनाते हैं। इस सत्र में इनकी तीन पुस्तकें का विमोचन किया गया। पहली – विश्वास की रक्षा (चित्रमय 7 कहानियाँ, 48 पृष्ठ), घर, परिवार और रिश्तों की प्रेरक बाल कहानियाँ और दूसरी – मेहनत का फल (चित्रमय 4 कहानियाँ, 32 पृष्ठ)— पारिवारिक एवं सामाजिक प्रेरक कहानियाँ संकलित की गई हैं। सभी कहानियाँ पूर्व में लोटपोट, नंदन, बाल किलकारी, बच्चों का देश, दैनिक जागरण, दैनिक सन्मार्ग, बालवाणी आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक तीसरी पुस्तक- खुशियों की वापसी, जिसमें चित्रमय 5 कहानियाँ, 32 पृष्ठ हैं जिसमें राजा-महाराजा युग की शिक्षाप्रद कहानियाँ सम्मिलित की गई है का विमोचन हुआ।

तीसरे सत्र में डॉ. भैरूँलाल गर्ग, भीलवाड़ा, राजस्थान; संपादक- बालवाटिका की पुस्तक — चलो चलें नानी के गाँव (बालकाव्य संग्रह) का विमोचन किया गया। यह बहुरंगी पुस्तक (40 पृष्ठ) में 20 कविताएँ हैं, जो बालक एवं किशोरों के परिवेश, ऋतु, पर्व, पर्यावरण, प्रकृति और मनोरंजन से जुड़ी हैं। चयन-संपादन एवं भूमिका डॉ. प्रकाश मनु जी की है, जो कविताओं की गुणवत्ता को और निखारती है।

चौथा विमोचन श्रीमती समीक्षा तैलंग, ग्वालियर/पुणे, की पुस्तक, जो व्यंग्य विधा पर आधारित है जिसका नाम — बेड़ा गर्क है, का विमोचन किया गया। इस व्यंग्य निबंध में समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य व प्रहार किया गया है। वरिष्ठ समालोचक सुभाष चंदर जी के अनुसार, नये विषय, ट्रीटमेंट और शिल्प से यह पुस्तक अंदर तक झकझोर देगी।

अगले सत्र में पांचवा विमोचन शिवम सिंह, कानपुर देहात के गीतकार की बाल गीत पुस्तक — नन्हे मुन्ने गीत का विमोचन किया गया। यह उनकी पहली प्रकाशित कृति है जो 2023 में प्रकाशित हुई थीं। जिसका विमोचन अब हुआ। इसमें संगृहीत शिशुगीत की सहजता से सरल भावनाओं, जिज्ञासा और कल्पना को छूते हैं, जो छोटे बच्चों के लिए आदर्श है।

अगला विमोचन, सत्र के समापन में डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’, कटनी, म.प्र. की दो पुस्तकें का किया गया। इसमें उनकी पहली पुस्तक – बुंदेली संस्कृति के रंग, जिसकी विधा: गद्य है। यह मध्यप्रदेश की आंचलिक बोलियों में बाल गीत एवं खेल गीत, लोक संस्कृति से परिचय करती है। मध्य प्रदेश आदिवासी लोक भाषा विभाग, भोपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक आंचलिकता से भरपूर है, जो साहित्य को समृद्ध करती है।  उनकी दूसरी पुस्तक जो कल विधा पर आधारित है- छई छपाक छपर छपर, जिसमें 22 बाल कविताएं संग्रहित है। जो बच्चों को छह ऋतुओं से रूबरू करवाती हैं ।

अगली पुस्तक सुषमा सिंह, दिल्ली की  पहली पुस्तक— नन्हा पाखी और दूसरी पुस्तक – कच्चा पापड़ हैं। इसमें छन्द मुक्त बाल कविताएँ सम्मिलित की गई है। ये कविताएँ बच्चों की कल्पना, भावनाओं और दैनिक जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को पंख लगा कर कल्पना को उड़ान देती हैं। यह सरल भाषा में गहन संदेश देती हैं। वही माधुरी व्यास “नवपमा”, इंदौर के कविता संग्रह— अनुभति, का विमोचन किया गया। इसमें 64 नई कविताओं का संकलन किया गया है। जिसमें आत्मानुभूति से उपजी प्रबल भावपक्ष की रचनाएँ सम्मिलित हैं। मानवीय संवेदना, वेदना, रिश्तों में प्रेम, यादें, प्रकृति, मौसम और पर्यावरण जैसे विषय सम्मिलित हैं, जो पाठक को गहराई से छूते हैं।

प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. मंजरी शुक्ला के कहानी संग्रह — उड़ चले जादुई बर्तन, का विमोचन किया गया है। इसमें जादुई और मनोरंजक कहानी, जिसमें उड़ने वाले जादुई बर्तन, अन्न के सम्मान की शिक्षा देते हैं। भोजन बर्बादी रोकने और अन्न की महत्ता समझाने का संदेश—बच्चे पढ़ने के बाद अन्न के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार नीलम राकेश, लखनऊ, के बाल कहानी संग्रह की पुस्तक  – सतरंगी दुनिया, जिसमें नौ प्रेरक कहानियाँ, जो बच्चों के लिए चुनिंदा विषयों पर आधारित हैं, का विमोचन किया गया।  इनकी दूसरी पुस्तक – The Rainbow World — जिसका अंग्रेजी अनुवाद डॉ. राकेश चंद्रा द्वारा किया गया है, का विमोचन किया गया।

प्रोफेसर प्रभा पंत, हल्द्वानी, उत्तराखण्ड किसी परिचय की मोहताज नहीं है कि बाल साहित्य की 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी तीन पुस्तकें , जिसमें पहली – मुझको सूरज बनना है, (कविता संग्रह) जिसमें प्रेरणा और ऊर्जा से भरपूर कविताएँ सम्मिलित हैं।  दूसरी पुस्तक – डिबिया में बंद चींटी (कहानी संग्रह) — जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं से बड़े सबक सिखाती कहानियाँ संकलित है।  तीसरी पुस्तक – मेरी प्रिय बाल कहानियाँ— जिसमें उनकी चयनित प्रिय कहानियों का संग्रह है। का विमोचन किया गया।

डॉ अशोक व्यास जी के निबंध, जिसका नाम, “स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला”, का लोकार्पण किया गया। इसी के अंत में नीमच से प्रकाशित- राष्ट्र समर्पण, मासिक पत्रिका विमोचन किया गया जो पिछले 21 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहा है। जिसके संपादक शारदा संजय शर्मा है।

यह विमोचन बाल साहित्य की बहुरंगी विविधता को दर्शाता है तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा। डॉ. विकास दवे जी के मार्गदर्शन में यह आयोजन बाल साहित्य के उत्थान का एक ऐतिहासिक पड़ाव सिद्ध हुआ।

सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं उनके भावी सृजन के लिए शुभकामनाएँ!

——–

साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

25/03/2026

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ यूपी व सीबीएसई पाठ्यपुस्तकों में शामिल हुए डॉ. निशा अग्रवाल के निबंध एवं रचनाएं – अभिनंदन☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. निशा अग्रवाल

🌹 यूपी व सीबीएसई पाठ्यपुस्तकों में शामिल हुए डॉ. निशा अग्रवाल के निबंध एवं रचनाएं – अभिनंदन 🌹

शिक्षा जगत में गौरव का क्षण

नई शिक्षा नीति व समकालीन विषयों पर आधारित लेखन को मिला व्यापक स्थान

शिक्षा जगत के लिए यह गौरव का विषय है कि जयपुर की प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पाठ्यपुस्तक लेखिका डॉ. निशा अग्रवाल की रचनाओं को माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश द्वारा निर्धारित नवीन पाठ्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 9 से 12 की सामान्य हिंदी पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया गया है। इन रचनाओं में निबंध, गद्यांश, पद्यांश, संस्मरण एवं अन्य शैक्षणिक विषयवस्तु को स्थान मिला है। नगीन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों का संपादन वरिष्ठ लेखक सर्वेश कांत वर्मा ने किया है। इसके अतिरिक्त, सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 9 एवं 10 की हिंदी व्याकरण की पुस्तकों में भी उनकी विषयवस्तु को सम्मिलित किया गया है।

डॉ. निशा अग्रवाल के चर्चित निबंध ‘नई शिक्षा नीति’ तथा ‘शिक्षित बेरोजगारी’ समकालीन शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण पक्षों को सरल, सटीक एवं प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करते हैं। इन रचनाओं में नई शिक्षा नीति के उद्देश्य, प्रमुख तत्व, प्रभाव एवं चुनौतियों का समग्र विश्लेषण किया गया है, वहीं शिक्षित बेरोजगारी की समस्या के कारणों एवं संभावित समाधानों पर भी सारगर्भित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। उनकी यह लेखनी विद्यार्थियों के लिए न केवल ज्ञानवर्धक, बल्कि प्रेरणादायक भी सिद्ध हो रही है।

उल्लेखनीय है कि डॉ. अग्रवाल अब तक 30 से अधिक पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। उनकी कृतियों में सीबीएसई बोर्ड की कक्षा 3 से 5 तक की अंग्रेज़ी एवं विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त ‘इवोल्यूशन ऑफ इंडियन एजुकेशन’, ‘समावेशी शिक्षा’, ‘शिक्षा का बदलता स्वरूप’, ‘कला शिक्षा’, योग शिक्षा, बाल शिक्षा में नवाचार तथा योग एवं आत्मबोध जैसे विविध विषयों पर आधारित उनकी पुस्तकें शिक्षा जगत में विशेष स्थान रखती हैं।

डॉ. निशा अग्रवाल द्वारा एक शोध ग्रंथ भी तैयार किया गया है, जिसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात के सामाजिक विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. जनक सिंह मीणा के निर्देशन में विकसित किया गया। साथ ही उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति ‘सौहार्द शिरोमणि संत सौरभ पांडेय’ के जीवन, विचारों एवं समाजसेवा पर आधारित एक प्रेरक पुस्तक है, जो उनकी बहुआयामी लेखन क्षमता को दर्शाती है।

धौलपुर जिले के बाड़ी (पिपरेट) निवासी जगदीश प्रसाद मंगल की सुपुत्री डॉ. निशा अग्रवाल शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत प्रारंभ किए गए इंटीग्रेटेड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ITEP) पर भी उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. निशा अग्रवाल का योगदान अत्यंत अनुकरणीय एवं सराहनीय है। उनकी रचनाएँ न केवल विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान कर रही हैं, बल्कि उन्हें सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक करते हुए नई दिशा भी दे रही हैं।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ पत्र लेखन + अभिनंदन – सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🌺  अ भि नं द न  🌺

कर्मयोगिनी महिला संस्था, पुणे यांनी ‘पत्रलेखन स्पर्धा’ आयोजित केली होती. या स्पर्धेत आपल्या समुहातील साहित्यिका विभावरी कुलकर्णी यांच्या पत्रलेखनास प्रथम पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

ई-अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे विभावरी कुलकर्णी यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐💐

आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे प्रथम पुरस्कार प्राप्त रचना – “पत्रलेखन…”

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

☆ ☆ ☆ ☆

🔅 विविधा 🔅

☆ पत्रलेखन ☆ विभावरी कुलकर्णी

(प्रथम पुरस्कार प्राप्त)

****

आदरणीय मॅडम,

सप्रेम नमस्कार.

आज तुम्ही आमच्यात देहरूपाने नसलात, तरी तुमची आठवण आल्याशिवाय एकही दिवस जात नाही. आपली पहिली भेट झाली तेव्हा जणू काही जन्मांतरीचे ऋणानुबंध असावेत, असा भास झाला होता. तुमच्या भेटीमुळे कोड्यासारखे गुंतागुंतीचे वाटणारे माझे आयुष्य एखाद्या सुंदर फुलासारखे उलगडत गेले. तुम्ही मला आयुष्याचा खरा उद्देश समजावून सांगितलात आणि त्यामुळेच मला जीवनाची एक नवी दिशा सापडली.

आज मी जी काही यशस्वी ‘रेकी मास्टर’ आहे, ते केवळ तुमच्यामुळेच. तुम्ही दिलेली दीक्षा, तुमची शिकवण आणि तुम्ही करून घेतलेली प्रात्यक्षिके माझ्या यशाचा पाया ठरली. तुमच्या मार्गदर्शनाखाली मी विविध ध्यानाचे (Meditation) प्रकार शिकले. तुमच्या सान्निध्यात आल्यावरच मला जाणीव झाली की माझी ज्ञानाची झोळी किती रिकामी होती. प्रत्येक शिष्याला समान वागणूक आणि समान ज्ञान देण्याची तुमची वृत्ती आम्हा सर्वांसाठी प्रेरणादायी होती.

रेकीचा खरा अर्थ आणि या पवित्र प्राणशक्तीचा उपयोग कसा करावा, याचे पूर्ण ज्ञान तुम्ही मला दिलेत. पंचमहाभूते, त्यांची उपयुक्तता आणि त्यांची ऊर्जा कशी प्राप्त करावी, हे तुम्ही आम्हाला प्रत्यक्ष अनुभवातून शिकवलेत. रेकीचा उगम आणि त्यामागचे शास्त्र तुम्ही इतक्या सोप्या पद्धतीने समजावून सांगितले की, त्यामुळेच मला आज समाजसेवेची संधी प्राप्त झाली आहे. तुम्ही दिलेल्या शिकवणीचा उपयोग मी आज लोकांसाठी करत आहे आणि त्याचे सकारात्मक परिणामही दिसून येत आहेत.

कृतज्ञतेत कसे राहावे, आभार मानण्याचे महत्त्व काय असते, चराचर सृष्टीशी स्वतःला कसे जोडून घ्यावे आणि भूतदया कशी असावी, सर्वात राहून अलिप्त कसे असावे, लोभ – मोह दूर कसे ठेवावेत, निरपेक्ष वृत्तीने सेवा कशी करावी.

हे संस्कार तुम्ही माझ्यावर बिंबवलेत. आजही एखादा कठीण प्रसंग समोर उभा ठाकला की, तुमच्या नोट्स आणि तुमची शिकवण मला मार्ग दाखवते. आजही मनातल्या प्रश्नांची उत्तरे तुमच्या आठवणींतून मिळतात. आपल्यात गुरु-शिष्या पलीकडचे एक अतूट नाते निर्माण झाले होते. आपण दोघींनी मिळून मेडिटेशनवर एक पुस्तक लिहायचे ठरवले होते, पण काळाने ती इच्छा अपूर्णच ठेवली.

तुमची शिकवण आणि तुमचे आशीर्वाद सदैव माझ्या पाठीशी आहेत, याची मला खात्री आहे. ते आशीर्वाद असेच कायम लाभोत, हीच ईश्वरचरणी प्रार्थना.

सदैव आपल्या कृतज्ञतेत,

तुमची शिष्या,

विभावरी

—–

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ संपादकीय निवेदन – सुश्री सुरेखा चिखलकर – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री सुरेखा चिखलकर

💐 अ भि नं द न ! अ भि नं द न !! त्रिवार अभिनंदन!!!💐

आपल्या समूहातील लेखिका / कवयित्री सुश्री सुरेखा चिखलकर यांना नाशिक येथील ‘दर्पणकार बाळशास्त्री जांभेकर पत्रकार संघा’च्या वतीने जागतिक महिला दिनानिमित्त ‘दामिनी राष्ट्रीय पुरस्कार‘ प्रदान करण्यात आलेला आहे. विविध क्षेत्रात उल्लेखनीय कार्य करणाऱ्या कर्तृत्ववान महिलांचा या पुरस्काराने सन्मान केला जातो. सुरेखाताईंना त्यांच्या साहित्यिक आणि सामाजिक क्षेत्रातील उत्कृष्ट कार्याबद्दल हा पुरस्कार देण्यात आलेला आहे. दोन्ही पायांनी 80% दिव्यांग असलेल्या सुरेखाताई सातत्याने करत असलेल्या या कार्याबद्दल त्यांचे विशेष कौतुक वाटते. 

तसेच – – 

१) सामाजिक कार्यासाठी महाराष्ट्र शासनाचा पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर पुरस्कार, आणि

२) प्रतिष्ठा फाउंडेशन कडून त्यांच्या अंकुरित आभाळ या काव्यसंग्रहास ‘ग्रंथरत्न पुरस्कार‘– – असे आणखी दोन पुरस्कार त्यांना प्राप्त झालेले आहेत.

आपल्या समूहातर्फे सुरेखाताईंचे अतिशय मनःपूर्वक अभिनंदन आणि त्यांच्या यापुढील अशाच यशस्वी वाटचालीसाठी असंख्य हार्दिक शुभेच्छा.

शनिवार दि. ७/३/२६ रोजी ‘ पुस्तकावर बोलू काही ‘ या सदरात त्यांच्या “अंकुरित आभाळ“ या पुरस्कारप्राप्त काव्यसंग्रहाचा परिचय आपण करून घेतलेलाच आहे.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ ​म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ जहाँ गिरता है पसीना, वहाँ चाँद उगता ही है ! – मुकुटबिहारी “सरोज” ☆

म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित

सतपुड़ा की उपत्यका में फैले नीलाभ अंधेरे, महुआ, आम, नीम, बाँस और पलाश के दहकते फूलों की सुंदरता तथा उष्मा से अनुप्राणित अगर कोई कार्यक्रम हो, वह भी काव्यांजलि का तो उसके मोहक स्वरूप की कल्पना सहजतः की जा सकती है।

मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।

सुख्यात बुन्देलखण्डी कवि महेश कटारे सुगम की अध्यक्षता में संपन्न इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ मानवीय समाज रचना के संकल्प से हुआ। प्रथम वक्ता हेमेन्द्र राय ने सरोज जी की पंक्ति से आह्वान किया—“इन हवाओं पर कभी विश्वास कर लेना न तुम”

“तब तलक मत लिख, जब तलक आँख पानी से न भर जाए”–कवि की इन पंक्तियों के साथ प्रसिद्ध गीतकार कवयित्री डाॅ मालिनी गौतम ने कहा–समय की धड़कनों को गहराई से सुनती हैं उनकी रचनाएं। जागरण के आग्रह की कविता है उनकी।

सरोज जी का काव्यपाठ का अनूठा अंदाज़ श्रोताओं को बाँधे रखता था। पिता श्री से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं से साझा करते हुये पुत्री मान्यता सरोज ने कहा कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया तो डी डी और रेडियों से ब्लैकलिस्ट कर दिये गए।

वे जैसा जीते थे वैसा लिखते थे। वे एक डेमोक्रेटिक पिता थे। अपने बच्चों पर पिता होने का भार नहीं ढोया।

डॉ मनीषा जैन ने उनके दो काव्य-संग्रह किनारे के पेड़ और पानी के बीज के हवाले से उनके विद्रोही व्यक्तित्व को रेखांकित किया–“जहां गिरता है पसीना। वहाँ चाँद उगता ही है। “सरोज की कविता जीवन का आसव है। “जिसमें मानव मन की पीड़ा है, आक्रोश है और कश्मकश है।

प्रो लक्ष्मीकांत ने उन्हें पूर्ण कवि निरूपित किया। उन्होंने कम लिखा पर पूरी ईमानदारी से जनमन तक पहुँच जाए ऐसी भाषा में लिखा। “जिसने सहा नहीं उसने कहा नहीं। “उनके कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं।

अध्यक्ष महेश कटारे सुगम की दृष्टि में वे किसान कवि थे। सर्वथा एवं सर्वदा अनुकरणीय।

मुख्य अतिथि इन्दिरा किसलय ने कहा कि समय के विशाल अंतराल के बावजूद उनकी कविताएं उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कभी थीं। जिनमें दहक और महक दोनों हैं। यही उनके सृजन को कालजयी बनाती है। उनमें संघर्ष का शंखनाद तो है पर आशावाद भी उतना ही प्रबल है। व्यवस्थागत दिद्रूपताओं ने उनकी कविता को उर्वरक प्रदान किया– ” सृजन कभी मंजूर नहीं करता पहरे तलवार के”। “वे निष्कपट अभिव्यक्ति के बादशाह हैं। “

इस अवसर पर “यादों में सरोज” इस जन्मशती विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया।

द्वितीय सत्र में सर्व श्री महेश कटारे सुगम, इन्दिरा किसलय, मालिनी गौतम, अभिषेक वर्मा, लक्ष्मणप्रसाद डेहरिया, ओमप्रकाश नयन, हेमेंद्र राय, विनयप्रकाश जैन, अंजुमन आरजू, श्रृति कुशवाहा, महेश दुबे, प्रभात कटारे, अवधेश तिवारी, आशीष मोहन, तथा राकेश राज ने बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत कीं। नन्ही बच्ची आन्या ठाकुर ने सरोज जी की कविताओं की धारासार प्रस्तुति दी।

चित्रकार कवि रोहित रूसिया ने सरोज जी के गीतों का सस्वर सरस पाठ किया। कार्यक्रम का प्रारंभ ही ओशिन धारे की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ जिसने वातावरण को सुरों की बारिश में भिगो दिया।

चित्रकार ध्रुव के, सरोज के काव्यांशों पर आधारित पोस्टरों की धूम रही।

सचिव शेफाली शर्मा का सधा हुआ सहज संचालन मंत्रमुग्ध कर गया।

बीना, भोपाल, छिंदवाड़ा आदि स्थानों से पधारे कवियों ने भावपूर्ण कविताएं पेश कीं।

प्रबुद्ध गंभीर एवं जिन्दादिल साहित्यजीवी मान्यवरों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊँचाई एवं अपूर्व गरिमा प्रदान की। सर्व श्री– गोवर्द्धन यादव, पवन शर्मा, रणजीतसिंह परिहार, डाॅ उर्मिला खरपुसे, डॉ अमर सिंह, अशोक जैन, शैलेन्द्र तिवारी, मोहिता जगदेव, हेमंत झा, राजकुमार चौहान, पद्मा जैन, दीप विश्वकर्मा, शरद मिश्रा, अंकुर वाल्मीकि, रामलाल सराठे, रश्मि, राजेन्द्र यादव, अनुराग श्रीवास्तव, अभिनव श्रीवास्तव, संजय औरंगाबादकर आदि प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति ने आयोजन को प्रकाम्य ऊँचाई प्रदान की।

“मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के अध्यक्ष एवं देशबंधु पत्र समूह के संपादक आदरणीय “पलाश सुरजन सर” इस महनीय आयोजन के श्रेयार्थी रहे।

दिनेश भट्ट के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

 साभार – सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ ​बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बच्चों के संवेगात्मक विकास में कहानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं – ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश’

भोपाल। बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् द्वारा आयोजित बाल साहित्य लेखन कार्यशाला बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुई। इस एक दिवसीय कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और अभिभावकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बच्चों के लिए रोचक, मनोरंजक, उपदेशात्मक और ज्ञानवर्धक साहित्य सृजन को प्रोत्साहित करना था।

मुख्य अतिथि शासकीय कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. मंगलेश्वरी नेशी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बच्चों का साहित्य रोचकता से भरपूर, मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक होना चाहिए, ताकि बच्चे स्वाभाविक रूप से पढ़ने और सीखने की ओर आकर्षित हों।

बीज वक्तव्य देते हुए बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने कहा कि बाल साहित्य में कहानी, कविता, लोरी, पहेलियाँ, गीत आदि सभी विधाएँ शामिल हैं। इसमें बच्चों की बाल-सुलभ जिज्ञासाओं, कल्पनाओं और अभिव्यक्ति का स्थान होना चाहिए। यह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ उनके संवेगात्मक विकास में सहायक होना चाहिए।

प्रथम सत्र कहानी लेखन कार्यशाला पर केंद्रित रहा है। वरिष्ठ बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ने कहा कि कहानी बच्चों के संवेगात्मक विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने रोचक ढंग से दो-तीन कहानियाँ सुनाकर समझाया कि कहानी कैसे लिखी जाती है। बाल मन की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बच्चों से विविध विषयों पर कहानी लेखन करवाया। बच्चों ने मंच पर आकर अपनी रचनाएँ पढ़ीं। उनकी प्रेरणा से हिंदी की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अर्चना भट्ट ने भी एक बाल कहानी सुनाकर सभी को चकित कर दिया।

द्वितीय सत्र कविता और बाल गीतों पर आधारित था। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेक्षा सक्सेना ने बाल गीतों पर दिशा-निर्देश दिए और क्षेत्रीय बोलियों के गीतों के माध्यम से बच्चों से सीधा संवाद किया। बच्चों ने विविध विषयों पर कविताएँ लिखकर मंच पर उत्साह से पाठ किया।

कार्यक्रम के संचालनकर्ता डॉ. शोभना तिवारी ने कहा कि बच्चों का साहित्य ज्ञानवर्धक होने के साथ उपदेशात्मक भी होना चाहिए, जिससे जीवन की नींव मजबूत हो और संस्कारों की अभिवृद्धि हो। रहीम और कबीर के दोहे इसके सशक्त उदाहरण हैं, जो प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक जीवन की संचित निधि बने रहते हैं।

वैदेही कोठारी ने पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति संरक्षण पर जोर देते हुए प्रकृति-परक रचनाओं के लेखन को रेखांकित किया। श्वेता नागर ने पढ़ने की अभिरुचि बढ़ाने के लिए पुस्तकालय सृजन उत्सव आयोजित करने और डायरी लेखन के दिशा-निर्देश दिए। रश्मि पंडित ने मुहावरे और लोकोक्तियों की कार्यशाला चलाई तथा कहा कि ये शिक्षाप्रद, रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होते हैं।

कार्यशाला में शहर के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों के 55 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता की। सभी प्रतिभागियों का स्वागत हिंदी पंचांग से समन्वित पॉकेट डायरी और कलम भेंट करके किया गया। प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए। अर्थ दशोत्तर प्रतिष्ठा तिवारी और हार्दिक अग्रवाल ने डॉ. मीनू पांडे को शाल, स्मृति चिन्ह और साहित्य भेंट कर स्वागत किया। सरस्वती वंदना प्रिया उपाध्याय ने प्रस्तुत की।

विभिन्न विद्यालयों के पचपन से अधिक छात्र-छात्राएं, उनके अभिभावक, माता -पिता, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, महाविद्यालय के प्राध्यापक आदि सौ से भी अधिक सहभागी उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन डॉ. मीनू पांडे ने किया। यह कार्यशाला बाल साहित्य सृजन में नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाली सिद्ध हुई।

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कविता ☆ संसार दोघांचा + संपादकीय निवेदन – डॉ. सोनिया कस्तुरे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ डॉ. सोनिया कस्तुरे ☆

🎇अ भि नं द न 🎇

दक्षिण महाराष्ट्र साहित्य सभा, कोल्हापूर आणि शब्दांगण साहित्यिक सांस्कृतिक व्यासपीठ, मिरज यांच्या संयुक्त विद्यमाने साहित्य संमेलन मिरज येथे संपन्न झाले. या संमेलनात आपल्या समुहातील कवयित्री डॉ. सोनिया कस्तुरे यांना,  नाही उमगत ‘ ती ‘ अजूनही या त्यांच्या काव्यसंग्रहाला ‘ऋतुजा माने साहित्य पुरस्कार’ देऊन गौरविण्यात आले आहे.

ई अभिव्यक्ती परिवारातर्फे डॉ सोनिया कस्तुरे यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐🌹💐

– संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

पुरस्कार प्राप्त काव्य संग्रहातील कविता

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “संसार दोघांचा” ☆ डॉ सोनिया कस्तुरे

तू म्हणतोस संसार दोघांचा,

मग दोघ मिळून करु या ना…

*

तू चूल पेटवं, मी भाकरी करते,

तू भाजी चीर मी फोडणी देते,

मी कपडे धुते, तू वाळत टाक;

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघं मिळून करु या ना..!

*

भातुकलीत मी स्वयंपाक केला,

आता ही मीच सगळं करते ;

झोपडीत तर मी खूप राबते,

महालात ही मीच…

मी कोणत्याही पदावर असूदे

घर कामातून माझी सुटका नाही

तू म्हणतोस घर दोघांचं,

घर काम ही मिळून करु या ना,

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघ मिळून करु या ना..!

*

मी आई हे “सत्य”,

तू बाप हा “विश्वास”

मी जन्म देणं निसर्ग नियम,

तू संगोपनाला हातभार लाव ना,

 सत्य आणि विश्वास पेरत

मिळून मुलांना घडवूया ना…

तू म्हणतोस कुटुंब सर्वस्व तर

टी. व्ही, मोबाईल बाजूला ठेवून

पालक सभेला मिळून जाऊया ना…

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघ मिळून करु या ना..!

*

तुझ्या सुखदुःखाची मी सोबती

घराच घरपण मी, म्हणतोस,

मी थोडी “बाप” होते

तू थोडा “आई” हो ना…

मी तुझी आर्धांगिनी

तू माझं अर्धांग हो ना…

तू म्हणतोस संसार दोघांचा

मग दोघं मिळून करु या ना..!

*

© डॉ.सोनिया कस्तुरे

विश्रामबाग, जि. सांगली

भ्रमणध्वनी:- 9326818354

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares