हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८५ ⇒ खाली स्थान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खाली स्थान।)

?अभी अभी # ९८५ ⇒ आलेख – खाली स्थान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भरा हुआ है, वह तो हमें दिखाई दे जाता है, लेकिन क्या जो खाली है, वह भी हम देख सकते हैं। हमें बैठना है, और सभी कुर्सियां जब भरी होती हैं, तब हमें एक खाली कुर्सी की तलाश होती है। जब हॉल में कोई नहीं होता, सभी कुर्सियां खाली ही होती हैं।

जब हम पढ़ते थे, तब खाली स्थानों को हमें भरना होता था। एक वाक्य के बीच में कुछ शब्दों की जगह खाली स्थान होता था, जिसे हमें अर्थपूर्ण शब्दों से भरना होता था।।

अर्थ और व्यर्थ की तरह खाली और भरा हुआ दोनों का अपना अपना महत्व है। पहले जो खाली होता है, उसको भरने की कोशिश की जाती है, और बाद में उसे ही खाली करने का प्रयास किया जाता है।

अगर हमें प्यास लगी है, तो एक खाली ग्लास हमारे किसी काम का नहीं। एक भरा हुआ पानी का ग्लास ही हमारी प्यास बुझा सकता है। हम पानी पी जाते हैं, ग्लास फिर खाली हो जाता है।

ग्लास कभी भरकर नहीं रखा जाता। खाली रहना ही उसकी नियति है। अगर वह भरेगा तो खाली होने के लिए ही। हमारे लिए एक खाली ग्लास का कोई महत्व नहीं। जब कि ग्लास को पीकर खाली हमने ही किया है। हम बड़े चतुर हैं, हम खाली स्थान का उपयोग अपने लिए ही करते हैं। बस, उसे भरते रहते हैं, खाली करते रहते हैं।।

हम जब भीड़ में होते हैं, तो एकांत ढूंढते हैं, और जब अकेले होते हैं, तो किसी का साथ तलाशते हैं। पेट खाली है, भूख लग रही है, पेट में फिर भी चूहे दौड़ रहे हैं। पेट को पहले भरा जा रहा है। भूख शांत हुई, हम संतुष्ट हुए। लेकिन कब तक ! बहुत हुआ, सुबह हो गई, अब पेट खाली करना है। सोचते रहिए अन्न का अर्थ और व्यर्थ का अर्थ।

खाली दिमाग शैतान का घर ! क्या किया जाए, कुछ सकारात्मक सोचा जाए, चिंतन मनन किया जाए। एक दिल सौ अफसाने। किस किसकी सुनें, किस किसकी मानें।

सोच सोचकर, चिंतन कर करकर, व्यर्थ की चिंता और बढ़ा ली। बहुत सोचते हो आप। अगर इसी तरह सोचते रहे तो अवसादग्रस्त हो जाओगे। ध्यान करो, चित्त को शांत करो, विचार शून्य रहने की कोशिश करो।।

इस धरती पर दो तिहाई पानी है, फिर भी इंसान की प्यास नहीं बुझती। कहीं वह जरूरत से अधिक भरा हुआ है तो कहीं अंदर से पूरा खाली है। जहां पैसा है, वहां चैन नहीं और जहां पैसा नहीं, वहां भी बैचेनी है। हर जगह एक खाली स्थान अभाव का है, जिसे हर प्राणी भरने की कोशिश करता है।

हम शून्य को भरने की कोशिश करते हैं। खाई में भी शून्य होता है। अमीरी गरीबी की खाई तो हम भर नहीं सकते, अपने अंक के आगे तो कई शून्य लगा सकते हैं। अपना अभाव दूर होते ही हमारा भाव भी बदल जाता है। एक संपन्न, भरा पूरा, सुखी परिवार।।

राजनीति में बहुत खाली स्थान है और हर खाली स्थान एक शैतान का घर है। हमारा मन भी एक चतुर, चंचल राजनीतिज्ञ ही है, उसके चुनाव पर किसी आयोग का कोई अंकुश नहीं। उसे विवेक के अधीन कर दीजिए, वह शांत हो जाएगा।

हमारे आसपास का शून्य तो हमें दिखाई नहीं देता, और हम अंदर से भरे भरे रहते हैं। शून्य खालीपन नहीं, अवसाद नहीं, असफलता नहीं, शून्य में सभी संभावनाएं हैं।

ग्लास अगर आधा खाली है तो आधा भरा भी है। सबके ग्लास भरे रहें, बूंद बूंद ही सही प्रेम और करुणा रस रिसता रहे।

कोई स्थान खाली ना हो, अमृत रस बरसता रहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आजाद देश की पहचान। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।

☆ आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

अलग परवरिश और बढ़ता अहंकार, क्यों टूट रहे हैं आज के रिश्ते

आज के समय में महानगरों में रहने वाले युवाओं और नवविवाहित जोड़ों के बीच रिश्तों में बढ़ती खटास एक गंभीर सामाजिक चिंता बनती जा रही है। आए दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मनमुटाव, फिर दूरी और अंततः तलाक जैसे मामलों में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि समस्या कहीं गहरी है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

सबसे बड़ा कारण है कि आज के युवा यह समझने में असफल हो रहे हैं कि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग परिवारों और संस्कृतियों में पले-बढ़े होते हैं। उनकी सोच, आदतें, जीवनशैली और अपेक्षाएं अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने की बजाय यह साबित करने में लग जाता है कि “मैं सही हूं” और “तुम गलत हो”।

पहले के समय में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। माता-पिता और बुजुर्ग घर में मौजूद रहते थे और वे रिश्तों को संभालने, समझाने और संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वे अनुभव के आधार पर छोटी-छोटी बातों को बढ़ने नहीं देते थे और समय रहते समाधान निकाल लेते थे। लेकिन आज के समय में अधिकांश युवा अपने माता-पिता से दूर, महानगरों में अकेले रह रहे हैं। ऐसे में जब कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने वाला कोई नहीं होता, और छोटी बात भी बड़ा रूप ले लेती है।

एक और बड़ी समस्या है अहम (ego) और हावी होने की प्रवृत्ति। आज के कई रिश्तों में यह देखने को मिलता है कि दोनों ही अपने-अपने तरीके से चीजों को चलाना चाहते हैं। कोई झुकना नहीं चाहता, कोई समझौता नहीं करना चाहता। हर दिन किसी न किसी बात पर बहस होना, एक-दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश करना, धीरे-धीरे रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। नतीजा यह होता है कि घर में बातचीत कम होती जाती है, सन्नाटा बढ़ता है और अंततः रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

रिश्ते कोई प्रतिस्पर्धा (competition) नहीं होते, जहां जीत-हार तय करनी हो। यह एक साझेदारी (partnership) है, जहां दोनों को मिलकर चलना होता है। अगर हर दिन लड़ाई ही “जीवन का हिस्सा” बन जाए, तो वह रिश्ता टिक नहीं सकता।

आज जरूरत इस बात की है कि युवा यह समझें कि रिश्ते समझ और सहयोग से चलते हैं, न कि अहंकार और जिद से। एक-दूसरे की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उनके नजरिए को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। हर बात पर प्रतिक्रिया देने की बजाय कई बार चुप रहना और स्थिति को शांत होने देना भी एक समझदारी है।

इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम यह स्वीकार करें कि पुरुष और महिला दोनों अलग-अलग सोच रखते हैं। उनकी भावनाएं व्यक्त करने का तरीका अलग होता है। यही बात प्रसिद्ध पुस्तक “Men Are from Mars, Women Are from Venus” भी बताती है कि दोनों के बीच अंतर स्वाभाविक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि सामने वाला व्यक्ति बिल्कुल हमारे जैसा सोचने लगे, न तो सही है और न ही संभव।

समाधान बहुत कठिन नहीं है।

सबसे पहले, एक-दूसरे को बदलने की कोशिश बंद करनी होगी।

दूसरा, खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना होगा।

तीसरा, छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखना होगा। और

सबसे महत्वपूर्ण, रिश्ते को “जीतने” की जगह “बचाने” की सोच अपनानी होगी।

अंततः, यह समझना जरूरी है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और सहयोग देने का वादा है। अगर आज के युवा इस सच्चाई को समय रहते समझ लें तो रिश्तों में बढ़ती दूरियों को रोका जा सकता है और एक खुशहाल जीवन की ओर बढ़ा जा सकता है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८४ ⇒ दिहाड़ी श्रमिक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिहाड़ी श्रमिक।)

?अभी अभी # ९८४ ⇒ आलेख – दिहाड़ी श्रमिक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(1 मई पर विशेष)

मज़दूर और श्रमिक में वही अंतर है जो एक आदिवासी और वनवासी में है, या कि जो अंतर एक विकलांग और दिव्यांग में है। मज़दूर के पसीने से कम्युनिज्म की बू आती है। वह कभी सीधे मुँह बात नहीं करता। हमेशा हल्ला ही बोला करता है। श्रमिक शब्द बड़ा शालीन और सुसंस्कृत लगता है।

जब तक मेरे शहर में कपड़ा मिलों का बोलबाला था, मज़दूर एकता ज़िंदाबाद थी। हमारी सरकार ने मज़दूर को श्रमिक बनाकर पदोन्नत किया, दैनिक को दिहाड़ी किया। 70 साल में जो नहीं हुआ, हमने कर दिखाया।।

मेरे पास के चौराहे पर प्रशासन ने दिहाड़ी श्रमिकों के लिए एक शेड बनाया है जो सुनसान पड़ा रहता है और दिहाड़ी श्रमिकों का जमावड़ा सड़क पर एक भीड़ का स्वरूप अख्तयार कर लेता है। श्रमिक का मेहनती, स्वस्थ और तंदुरुस्त होना ज़रूरी है। कारीगर तो अपने हुनर का पारंगत होता है, उसका सेहत से क्या लेना देना।

‌ये दिहाड़ी श्रमिक साईकल पर नहीं, मोटर साईकल पर आते हैं। कोई दोस्त इन्हें छोड़ जाता है। एंड्राइड फ़ोन होना आजकल सम्पन्नता की निशानी नहीं, समझदारी की निशानी है। आप जब किसी कारण इनकी सेवाएँ प्राप्त करना चाहेंगे, तो ये पहले आपको ऊपर से नीचे तक निहारेंगे। मानो आपकी औकात पता कर रहे हों।

जब उन्हें खात्री हो जाती है कि आप श्रमिक नहीं, श्रमिक की ‌सेवाएँ लेने आए हो, तो सम्मान से पूछते हैं, बाबूजी ! काम क्या है। आप काम समझाएं, उसके पहले वे आपको समस्या बता देंगे। एक आदमी के बस का काम नहीं है, अथवा एक दिन में जितना होगा कर देंगे।।

वैसे ‌सरकार की न्यूनतम दर एक दिन की 873 ₹ है, आपको जो देना हो, दे देना। हर काम के विशेषज्ञ होते हैं यहाँ। रंग रोगन अथवा सुतारी का काम ठेके पर भी किया जाता है।

आपकी तक़दीर अच्छी हो तो दिहाड़ी मजदूर भी अच्छा ही मिल जाता है।

‌श्रम की महत्ता कभी कम नहीं होने वाली। सुतारी, बिजली का काम, प्लम्बर और रंग-रोगन जैसा काम आजकल कामकाजी नौकरीपेशा इंसान के बस का नहीं। कुछ काम श्रम में नहीं शर्म में आते हैं।

जब कभी घर की सीवेज लाइन चोक हो जाती है, विशेषज्ञ को ढूंढा जाता है। जो मिलता है, मुँह फाड़ता है। ‌यह काम सबके बस का नहीं। मरता क्या न करता, मुंहमांगे दाम पर समस्या का निदान करवाया जाता है। व्हाट ए रिलीफ ?

इधर काम निकला, उधर प्रलाप शुरू ! छोटे से काम के इतने पैसे ? श्रम की महत्ता तब समझ में आती है, जब हम अपना देश छोड़ विदेश जाते हैं। वहाँ श्रम को केवल सम्मान ही नहीं, उचित मानदेय भी है।

एक छुट्टी मजदूरी वाले का कोई भविष्य नहीं ! जब ये संगठित होते हैं तो शोषक नज़र आते हैं। शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना बग़ावत है, इसलिए समय रहते इन्हें कुचलना भी पड़ता है। इनके नेताओं के साथ समझौते भी करना पड़ते हैं। कभी ये सरकारें बनाते-गिराते थे, आजकल खुद ही गिरे हुए हैं।।

श्रम दिवस पर श्रम को सम्मान दीजिए, कल से जैसा चल रहा है, चलते रहने दीजिए। मज़दूर एकता ज़िंदाबाद..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२० ☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मोहे चिन्ता न होय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – अब तो आन बचाओ कन्हाई / स्वर- आरिफ & रूख़्सार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२० ☆

☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है, लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है– फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता।’ यही है ज़िंदगी का सत्य व हमारे दु:खों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता। वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब ग़लत है और वे लोग  दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते। वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है। जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते; हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता। वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते। हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर ज़ंग लग जाता है और हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं। हम  जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते। हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं। सो! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, सदैव चीखते -चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है। यह सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, संशय, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता। वे अंतर्मन की शक्तियों को संचित कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं; कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते। वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती।

परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है; सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है। वह अंधेरे में गलत दिशा में तीर चलाता रहता है। इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर उस घर को बदलता है; नये-नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों तक को नकार देता है; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता। वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं; हमारे ही पास होता है। दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है; आपकी मन:स्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा?

रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल-ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है। सो! आवश्यकता है,– सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की;  हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की; सत्य को स्वीकारने की। जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते; हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन-शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता।

‘कुछ हंसकर बोल दो/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है। जीवन में सुख-दु:ख, खशी-ग़म आते-जाते रहते हैं। सो! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं। जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सबसे हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय परिवर्तनशील है और  यथासमय दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन अवश्यंभावी है। कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है। लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मन:स्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं; जीवन में नई उमंग-तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िंदगी उसी रफ़्तार से पुन: दौड़ने लगती है।

चेहरा मन का आईना है, दर्पण है। जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं। वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाती प्रतीत होती है; समुद्र की लहरें चीत्कार करने भासती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं। इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है  कि इंसान को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। आखिर कौन बच पाया है…कालचक्र की गति से? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा। कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन ब्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन-भर मुसीबतों का सामना करते रहे। राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास; सीता-हरण; रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक; धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग; विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण; सीता का अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना; राम की सीता से मुलाकात; अग्नि-परीक्षा और अयोध्या की ओर गमन। पुनः अग्नि परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे। यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो ज़िंदगी कैसे गुज़र जाती है– पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दु:ख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है। अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है। आइए! समस्त ऊर्जा को दु:ख निवारण में लगाएं। खुद भी हंसें और संसार के प्राणी-मात्र के प्रति संवेदनशील बनें; आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें। समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें। अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें। गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दु:ख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि-नियंता को भूलें नहीं… यही है दु:खों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद-नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वह प्राणी-मात्र में परमात्मा-सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं। अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी, ‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय।’ चिंता किसी रोग का निदान नहीं है। इसलिए चिंता करना व्यर्थ है। परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानते हैं, तो हम चिंता क्यों करें? सो! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१९ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१९ ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८२ ⇒ बंटी और बबली ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बंटी और बबली।)

?अभी अभी # ९८२ ⇒ आलेख – बंटी और बबली ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कितना प्यारा नाम है बंटी और बबली ! बंटी है जहां, बबली है वहां। वैसे जरूरी नहीं कि हर बालक का नाम बंटी ही हो, और भी बहुत नाम हैं लाड़ प्यार वाले। कहीं उसे प्यार से बण्डू कहते हैं तो कहीं बिट्टू। जहां बिट्टू है, वहां फिर बिट्टी भी होगी। कहीं उसे बाबू कहते हैं तो कहीं बाबा। हमारा बाबा ही मराठी भाषियों का बाला अथवा बाळा है। बड़े होकर ये ही बाला साहेब ठाकरे और बाला साहेब देवरस कहलाते हैं। कौन जानता था बचपन का बाबू, बड़ा होकर बाबू जगजीवनराम निकलेगा।

जब बंटी की बात चली है तो क्यों न सबसे पहले “आपका बंटी” की ही बात कर ली जाए। जिन्होंने मन्नू भंडारी की कालजयी कृति आपका बंटी पढ़ी है, वे उसके बारे में मुझसे अधिक ही जानते होंगे, लेकिन जिन पाठकों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा, वे मेरा अभी अभी छोड़कर, पहले आपका बंटी पढ़ें।।

कोई भी उपन्यास हाथों हाथ नहीं पढ़ा जाता, लेकिन सन् १९७० में प्रकाशित यह उपन्यास आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है, यह तो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है। इस उपन्यास के दो पक्ष हैं, एक स्त्री पुरुष के टूटते संबंध और बंटी की मनोव्यथा। बाल मनोविज्ञान पर हिंदी साहित्य में यह उपन्यास एक मील का पत्थर है।

फिल्म बंटी और बबली का, मन्नू भंडारी के आपका बंटी से कोई संबंध नहीं होते हुए भी समाज में बढ़ते तनाव, असुरक्षा और अपराध की पृष्ठभूमि में इन पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। माता पिता का अपना व्यवहार किसी बच्चे की जिंदगी अगर बना सकता है, तो तबाह भी कर सकता है।।

एक लेखक कभी अपनी कहानी नहीं कहता। उसके आसपास बिखरी घटनाएं, दास्तान, लोगों की आपबीती, उनके कन्फेशन्स उसे अपनी कलम चलाने के लिए बाध्य कर देते हैं। हर लेखक मसीहा नहीं होता। या तो आवारा मसीहा होता है अथवा स्वदेश दीपक की तरह जिंदा ही किसी सलीब पर टंगा पड़ा होता है।

मन्नू भंडारी इतनी अकेली भी नहीं थी उस समय। राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश और कमलेश्वर एक परिवार की तरह ही तो थे। कहानियां लिखी जाती थीं, गर्मागर्म बहस चलती रहती थी और पकौड़ियां भी तली जाती थी। ममता और रवींद्र कालिया भी तब कहां अलग थे, इस लेखक समुदाय से।।

यही सच है, पर तो फिल्म रजनीगंधा बन भी गई, लेकिन आपका बंटी आज भी वहीं अकेला खड़ा है। और फिल्म में भी उसका साथ दिया भी तो किसने बबली ने। लेकिन दोनों मिलकर केवल एक मनोरंजक फिल्म ही बना पाए, इसके अलावा और कुछ नहीं।

धर्मवीर भारती भी एक समय इसी स्कूल के थे। लेकिन बाद में उन्होंने धर्मयुग में इतिहास रचा, तो कमलेश्वर सारिका में जा बैठे और राजेन्द्र यादव ने हंस का दामन थाम लिया। यह भी बुरा नहीं। जब चुक जाओ, तो संपादक बन जाओ। लेकिन यह जरूरी तो नहीं ! मनोहर श्याम जोशी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान छोड़ने के बाद ही तो कसप, कुरू कुरू स्वाहा और हरिया हरक्यूलिस जैसी रचनाएं दी हैं।।

धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनी थी ” एक था चंदर, एक थी सुधा”। यह फिल्म बनी जरूर, लेकिन दर्शकों को देखने को मिली मनोज कुमार की गुनाहों का देवता, जिसका भारती जी के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था।।

एक अच्छे लेखक का सृजन कभी सुख का सृजन नहीं हो सकता। क्योंकि लेखकीय सृजन में भोगा हुआ यथार्थ है, पीड़ा है, संत्रास है। लेखकीय पात्र बार बार अवचेतन में चिल्लाते हैं, कराहते हैं, लेखक को विचलित भी कर देते हैं। फेयरवेल टू आर्म्स जैसे उपन्यास का नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे यूं ही खुद को गोली मारकर आत्म हत्या नहीं कर लेता।

किसी ने सही कहा है ;

बहुत कठिन है

डगर पनघट की।

आपका बंटी की कहानी है

हर परिवार की,

घट घट की।

लेकिन क्या करे बेचारी बबली।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८१ ⇒ संपादक मेहरबान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संपादक मेहरबान।)

?अभी अभी # ९८१ ⇒ आलेख – संपादक मेहरबान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो लिखता है, वह लेखक नहीं कहलाता, जो छपता है, वही लेखक कहलाता है। अगर संपादक मेहरबान तो लेखक पहलवान। आप कहीं भी छपें, अखबार में अथवा किसी पत्रिका में, या फिर आपकी कोई किताब प्रकाशित हो, तब ही तो आप लेखक कहलाएंगे।

गए वे दिन, जब लेखक वही कहलाता था, जिसकी

कोई किताब प्रकाशित होती थी। तब स्थिति यह थी, प्रकाशक मेहरबान, तो लेखक पहलवान। लेकिन आज समय ने लेखक को इतना आर्थिक और बौद्धिक रूप से संपन्न कर दिया है कि उसे किसी प्रकाशक की मिन्नत ही नहीं करनी पड़ती। किताब लिख, अमेजान पर डाल।।

कलयुग में जो छप जाए, वही साहित्य कहलाता है। अखबारों के संपादक लेखक के लिए भगवान होते हैं। अखबार का क्या है, वह तो विज्ञापन से ही चल जाएगा, लेकिन लेखक की कोई रचना, तब ही रचना कहलाएगी, जब वह कहीं छप जाएगी।

किसी अखबार के संपादक को पत्रकार कहा जाता है, साहित्यकार नहीं। होगा सबका मालिक एक, लेकिन संपादक का असली मालिक तो अखबार का मालिक ही होता है। मालिक खुश, तो संपादक खुश।।

कभी लेखन भी एक विधा थी, लोग लिख लिखकर ही लेखक बना करते थे। अगर प्यार किया, तो कविता लिखी, दिल टूटा तो ग़ज़ल लिखी। संपादक के नाम पत्र लिखे, जब छपने लगे, तो कॉन्फिडेंस बढ़ा। अखबारों और संपादकों से भी पहचान बढ़ी। प्रतिभा कुछ सीढ़ी और चढ़ी और उनकी भी अखबार में रचना छपी।

उधर अखबारों और पत्रिकाओं का भी अपना एक स्तर होता था। जो स्थापित मंजे हुए लेखक होते थे, उनसे तो रचना के लिए आग्रह किया जाता था, लेकिन किसी नए लेखक को कई पापड़ बेलने होते थे। रचना अस्वीकृत होना आम बात थी। जो नर निराश नहीं होते थे, उनकी किस्मत का ताला आखिर खुल ही जाता था।।

शुरू शुरू में एक लेखक के लिए हर संपादक भगवान होता है। अगर संपादक मेहरबान तो लेखक पहलवान, लेकिन अगर एक बार ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया, तो फिर लेखक भी संपादकी पर उतर आता है। याद कीजिए दिनमान के रघुवीर सहाय को, धर्मयुग के धर्मयुग भारती और साप्ताहिक हिंदुस्तान के मनोहर श्याम जोशी को।

जब लेखक ही संपादक हो, तो चर्चित लेखकों की तो पौ बारह।

साहित्यिक पत्रिकाओं की बात अलग है। ज्ञानोदय, सारिका, नई कहानियां, हंस और कथादेश तो लेखकों की अपनी ही जमीन रही है।।

इंदौर में एक अखबार ऐसा भी था, जो पत्रकारों और नवोदित लेखकों के लिए गुरुकुल और सांदीपनि आश्रम से कम नहीं था।

जहां राहुल बारपुते जैसे विद्वान और राजेंद्र माथुर जैसे जुझारू संपादक मौजूद हों, वह किसी नालंदा और तक्षशिला से कम नहीं।।

केवल एक पारखी को ही हीरे की पहचान होती है।

हर चमकती चीज सोना नहीं होती। एक कुशल संपादक ही किसी रचना की गुणवत्ता को परख सकता है। फिर भी कहीं कहीं ऊंची दुकान और फीके पकवान परोसे जा रहे हैं, और लोग चाव से खा भी रहे हैं। बस संपादक मेहरबान तो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१२ ☆ विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१२ ☆

?  आलेख – विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

🌳माटी से मानुष तक इस हरियाली की रक्षा करें। विश्व पृथ्वी दिवस की एक दिन देर से शुभकामनाएँ।🌳

धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस।  उन्नीस सौ सत्तर की वह सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फिक्रमंद सुबह में वर्ल्ड अर्थ डे सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह सब महज एक प्रदर्शन नहीं था । आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने  का पहला सामूहिक संकल्प था जिसे आज पूरी दुनिया २२ अप्रैल के कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेज कर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है।  संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं बल्कि अपनी उस मां से माफी मांगना है जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं। विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर , हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिए पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के  फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

 यह दिन हमें ठिठक कर सोचने का मौका देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ कभी समाप्त न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और जहरीली प्रदूषित नदियां ही सौंप कर जाएंगे।

भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर जमीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा कि जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है।आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाए। कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना वह छोटी सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाए।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाए, यही विकल्प है जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८६ ☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८६ ☆

वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भीषण गर्मी जब अपने चरम पर होती है, तब केवल शरीर ही नहीं, मन और समाज भी तपने लगते हैं। आज हम एयर कंडीशनर और कूलर की ओर भागते हैं, लेकिन कभी ठहरकर सोचें—हमारे पूर्वजों ने इस तपती ऋतु के लिए क्या उपाय बनाए थे?

वैसाख मास की परंपराएँ इसी प्रश्न का सजीव उत्तर हैं। जलदान, सत्तू का दान और मौसमी फलों का वितरण—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थे, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और वैज्ञानिक व्यवस्था थी। गाँव-गाँव में मटके रखना, राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करना—यह समाज को निर्जलीकरण और लू से बचाने का सामूहिक उपाय था।

सत्तू ( चने का चूर्ण) वास्तव में गर्मी के विरुद्ध शरीर का प्राकृतिक कवच है। यह ठंडक देता है, ऊर्जा बनाए रखता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखता है। मौसमी फल—तरबूज, खीरा, आम—ये शरीर को जल और पोषण दोनों देते हैं। जब इन्हें दान के रूप में बाँटा जाता है, तो यह संदेश भी जाता है कि जो हमारे लिए उपयोगी है, वही समाज के लिए भी आवश्यक है।

इसी परंपरा का एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक रूप हमें जीव-जंतुओं के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में बड़े-बड़े पात्र, नाद और टंकियाँ रखी जाती हैं, जिनमें पानी भरा जाता है ताकि पशु-पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सकें। साल भर जिन पात्रों पर शायद ध्यान नहीं जाता, वे इस समय साफ किए जाते हैं, उनमें ताज़ा पानी भरा जाता है। यह केवल एक कार्य नहीं, बल्कि करुणा का विस्तार है।

दरअसल, जब इन कार्यों को धर्म और पुण्य से जोड़ा गया, तभी वे व्यापक रूप से समाज में स्वीकार्य हो पाए। यही कारण है कि हम न केवल स्वयं इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। बचपन में जो दृश्य हमने सहज रूप से देखे—आज उन्हें करते हुए समझ में आता है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था थी।

वैसाख हमें सिखाता है कि प्रकृति, समाज और समस्त जीवों के साथ संतुलन बनाकर ही हम इस भीषण गर्मी से लड़ सकते हैं। यही हमारे संस्कारों की सच्ची ठंडक है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ? श्री यशोवर्धन पाठक

(जन्म दिवस पर आत्मीय बधाई)

आगे बढ़ते चलो, सफलता पीछे आयेगी,

कर्म करो वह आकर तुम्हें स्वयं रिझायेगी।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण सरल की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध की है जबलपुर के ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा. हर्ष कुमार तिवारी ने ‌जिन्हें संस्कार, संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता की विशेषताएं विरासत में मिलीं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और आध्यात्मविद परम आदरणीय ‌पं. दीनानाथ जी तिवारी के प्रपौत्र, सम्माननीय पं . ब्रह्मदत्त जी तिवारी के पौत्र एवं स्वनामधन्य साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षाविद श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी के यशस्वी पुत्र डा. हर्ष कुमार तिवारी ने प्रतिष्ठित विरासत और उच्च स्तरीय संबंधों पर सदा गर्व जरूर महसूस किया है लेकिन आगे बढ़ने के लिए कभी उनका उपयोग नहीं किया। श्रद्धेय सुमित्र जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से डा. हर्ष कुमार तिवारी ने अपने जीवन की विकास यात्रा में अपनी जमीन खुद तैयार की। शिक्षा, लेखन और पत्रकारिता में उन्होंने पूरी सक्रियता एवं दक्षता के साथ सराहनीय सफलताएं अर्जित की है। जबलपुर के दैनिक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण विषयों पर उनके सोचनीय लेख अत्यंत पठनीय और प्रशंसनीय होते हैं। दैनिक जयलोक में प्रकाशित मन‌ की बात और सुनो एक बात शीर्षक से उनका कालम काफी चर्चा में रहा। पत्रकारिता में अपनी उल्लेखनीय गतिविधियों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं में संपादन कार्य भी किया और बाद में डायमीनिक संवाद टी.. वी… का संचालन करते हुए असरदार समाचारों की प्रस्तुति के साथ ही साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाओं के‌ प्रसारण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैंजो कि काफी चर्चित हो रहा है। श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी द्वारा साहित्यिक गतिविधियों और प्रकाशन को प्रोत्साहित करने के लिए डा. हर्ष कुमार तिवारी और श्री राजेश पाठक प्रवीण के सक्रिय सहयोग से पाथेय प्रकाशन सहित पाथेय समूह की जो स्थापना की थी, वह आज भी प्रगति के सोपान की कहानी लिखते हुए सुमित्र जी के स्वर्गवास के बाद भी संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित कर रही है।

ऐसे व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने गरिमामय व्यक्तित्व और कृतित्व से अपने परिवार की विरासत को गौरवान्वित करते हैं। डा हर्ष कुमार तिवारी भी ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने पिता सहित अपने पूर्वजों की प्रेरणा दायक विरासत के अनुरूप सराहनीय कीर्तिमान स्थापित किया है यहां तक कि अपनी बिटिया प्रियम को भी ऐसे संस्कार और मार्गदर्शन दिये ‌कि‌वह भी बाल्यावस्था में ही बाल पत्रकार के रूप में पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो‌ चुकी है और संस्कारधानी आज उसकी प्रतिभा से गौरवान्वित है।

आज 23 अप्रैल को डा . हर्ष कुमार तिवारी जी का जन्म दिवस है और हमारी मंगलकामना है कि मीडिया पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी सक्रिय गतिविधियों से हम सभी सदा गौरवान्वित होते रहें।

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ हर्ष कुमार तिवारी जी को उनके जन्मदिवस के अवसर पर अशेष हार्दिक शुभकामनाएं 💐

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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