हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१८ ⇒ बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े भाग, बैंक जॉब पायो।)

?अभी अभी # ८१८ ⇒ आलेख – बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जहाँ शिक्षण ग्रहण करते हैं, उस स्थान को alma mater कहते हैं ! संसार एक विश्व-विद्यालय है, मुझे वास्तविक व्यावहारिक ज्ञान तो तब ही प्राप्त हुआ, जब मेरी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नियुक्ति हो गई। अतः मैं उसे ही alma mater मानता हूँ। जब शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं, तो मुहावरे भी क्यों पीछे रहें।

वैसे मुझे कोई खास खुशी नहीं हुई थी, इस नियुक्ति से ! पढ़ने-पढ़ाने और लिखने का शौक तब से ही लग गया था, जब पिताजी के लिए, अहिल्या लाइब्रेरी से, पढ़ने के लिए किताबें लाता था। गुरुदत्त को छोड़ शरद, बंकिम, आचार्य चतुरसेन, बिमल मित्र और रेणु, प्रेमचंद के साहित्य से अच्छा लगाव हो गया था। शौकत थानवी, फिक्र तौंसवी, और जी पी श्रीवास्तव तो मानो सराफे के चाट हो गए थे। मुझे खेद है कि जासूसी उपन्यास तो ठीक गुलशन नंदा तक कभी मेरी नज़रों में चढ़ ना सके। बहुत कोशिश की पढ़ने की, बस पन्ने पलटकर रह गया। हां ! चंद्रकांता संतति न जाने कैसे, पूरी पढ़ गया।।

करेला और नीम चढ़ा ! बचपन से ही मेरी आँखों पर चश्मा चढ़ा था। छोटा मोटा नहीं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल वाला, बिल्लोरी काँच वाला। माँ बताती थी, किसी मंदिर के घंटे की निशानी थी, जिसने नज़र और याददाश्त दोनों कमज़ोर कर दी।

मेरी नज़र भले ही कमज़ोर थी, नीयत ठीकठाक थी। स्कूल कॉलेज में कभी किसी कन्या को नज़र उठाकर नहीं देखा, नज़र नीची रखकर ही देखा। जिनकी नज़र नीची होती है, वे नज़र कम ही मिलाते हैं। ज़िन्दगी के नजारे देखना हो तो, नज़र उठानी भी पड़ती है, किसी से मिलानी भी पड़ती है। वर्ना खयाली पुलाव बनाते रहिये, कोई निगाह आप पर नज़र नहीं उठाएगी।।

हम यूँ ही बैंक-कर्मी नहीं बन गए ! बड़े अरमान थे डॉक्टर, इंजीनियर बनने के। पर क्या करें, गणित कमज़ोर था। गणित छोड़ बायोलॉजी का दामन पकड़ा। वहाँ भी फिजिक्स, केमिस्ट्री ने साथ नहीं दिया। बीएससी रिटर्न हुए, कला-वाणिज्य महाविद्यालय की ओर रुख किया। तब और विकल्प था ही क्या हमारे पास ? कोई बीबीए, एमबीए का कोर्स नहीं, शहर में कोई कोचिंग इंस्टीटूट नहीं। ले देकर बीए, बीकॉम कर लो।

तब कॉमर्स विषय को हम हीन दृष्टि से देखते थे। जो हमारे साथ के छात्र ढंग से बीए नहीं कर पाए, एलएलबी पास करके वकील बन गए और हम आयएएस बनने के चक्कर में ना घर के रहे ना घाट के। और तब का हमारा पूरा घान का घान बैंकों और एलआयसी की ओर दौड़ पड़ा। बीए, बीकॉम, बीएससी हो या एमएससी ! चलो बुलावा आया है, बैंक, एलआईसी ने बुलाया है।।

वह आज ही का दिन तो था, 22 अक्टूबर 1971, जब मुख्य प्रबंधक अमेरिकन मेहता की साँटा बाजार, इंदौर शाखा में मेरी नियुक्ति हुई थी। समय कैसे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। आज लगता है, मानो एक फ़िल्म चल रही हो। खट्टे-मीठे अनुभव, सहयोगियों का प्रेम और अपनापन और ग्राहकों के रूप में कुछ विलक्षण व्यक्तित्वों से प्रगाढ़ परिचय, किसी की दुआ और किसी का आशीर्वाद शायद जीवन की सबसे बड़ी कमाई रही।

तब बैंक और एलआईसी वालों की शादी बड़ी आसानी से हो जाती थी। डॉक्टर, इंजीनियर न सही, बैंक वाला तो है। लड़का लोन भी ले लेगा, और हर तीन साल में बीवी बच्चों को एलटीसी पर घुमाने भी ले जाएगा। शुरू शुरू में तो सैलरी फ़ॉर सविंग और ओ टी फ़ॉर रोटी का रिवाज था। लेकिन हमारे जैसे संतों के पाँव पड़ते ही सब बंटा-धार हो गया। अब तो बैंकें ही मर्ज़ हो रही हैं और आदमी मशीन होता जा रहा है।।

एक नौकरीपेशा इंसान को कभी तो रिटायर होना ही है। मनोरंजन के लिए टीवी तो था ही, अब तो 4-G एंड्रॉइड फ़ोन भी मुट्ठी में आ गया है। फेसबुक के जरिये नये नये मित्र सम्पर्क में आते हैं। बड़ा आश्चर्य हुआ जब अधिकतर फेसबुक मित्रों को बैंक से जुड़ा देखा। जब तक सेवारत रहे, केवल काम-धंधे, पे- रिवीजन और डीए की बातें ही होती रहीं। अब रिटायरमेंट के बाद उनकी असली प्रतिभा का पता चला।

कितने कवि, लेखक, चिंतक, साहित्यकार और व्यंग्यकार कभी बैंककर्मी रहे हैं, जानकर मन प्रसन्न हो गया। विश्व में, यत्र तत्र सर्वत्र कभी बैंक से जुड़े लोग, छाए हुए हैं। ब से बँक वाले सुरेश कांत जी भी कभी रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अमोल पालेकर भी कभी हमारी बैंक से ही जुड़े थे, लेकिन उनकी कला और प्रतिभा उन्हें कहां से कहां ले गई। हम सबके प्रिय प्रतिभाशाली फेसबुक मित्र श्री सुरेंद्र मोहन, भी स्टेट बैंक से जुड़े थे। हमारे परम मित्र और सहयोगी, व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर श्री धर्मपाल महेंद्र जैन तब भी हमारे साथ थे, और आज भी हमारे साथ ही हैं। उनकी अध्य्यनशीलता, साहित्यिक ज्ञान, और सृजनशीलता से आज कौन परिचित नहीं।।

हम भाग्यशाली हैं कि फेसबुक के माध्यम से ही सही, आज भी हम एक दूसरे के इतने करीब हैं। लोग टाटा का नमक खाते हैं, आज अगर पीछे मुड़कर देखें तो लगभग ५५ बरसों से हम बैंक का ही तो नमक खा रहे हैं। तब यह हमारी रोजी रोटी थी, और आज भी इसके ही बदौलत हम दाल रोटी खा रहे हैं, और बैंक के गुण गा रहे हैं। आज बस यही मन में आता है, बड़े भाग, बैंक जॉब पायो, और उन्हीं साथियों को पुनः फेसबुक पर पायो। सभी बैंक के वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व फेसबुक मित्रों, सहयोगियों का सादर अभिवादन।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें। ।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला। ।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी  की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय  (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१७ ⇒ दूसरी पारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूसरी पारी।)

?अभी अभी # ८१७ ⇒ आलेख – दूसरी पारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा जीवन भी किसी क्रिकेट के मैदान से कम नहीं ! चार दिन की चांदनी ही यहाँ कभी फाइव डे क्रिकेट है तो 50-50 ओवर वाला एक दिवसीय क्रिकेट भी। फटाफट जिंदगी जिंदगी जीने वाले तो आजकल टी-20 में ही पूरे जीवन का आनंद ले लेना चाहते हैं। काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

यह जिंदगी भले ही दोबारा ना मिले, एक क्रिकेट के टेस्ट मैच की तरह यहाँ भी दूसरी पारी का प्रावधान है। हमारे जीवन के दो भाग होते हैं, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, कुछ लोग इन दोनों ही पारियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, तो कुछ एक पारी में शून्य में आउट हो जाते हैं, तो दूसरी पारी में कमाल दिखा जाते हैं। होते हैं कुछ बदनसीब, जो दोनों पारियों में शून्य पर पेवेलियन लौट आते हैं। ईश्वर बड़ा दयालु है, वह फिर भी उन्हें मौका देता है, क्षेत्ररक्षण का और गेंदबाजी का। वे चाहे तो वहां भी अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।।

जिन्होंने अभी जीवन में पदार्पण ही किया है, उनके लिए सभी रास्ते खुले हैं, उनके हाथ खुले हैं, उनके बाजू खुले हैं, वे कितने चाहें, चौके छक्के, अर्ध शतक, शतक, दोहरा शतक और तिहरा शतक मार सकते हैं। बल्लेबाजी नहीं तो गेंदबाजी ही सही, तेज़ नहीं तो स्पिन ही सही। फिरकी, यॉर्कर और फुलटॉस का कमाल ही सही। जीवन में फेंकना और झेलना भी एक कला है। गेंद को मैदान से बाहर भेजना भी कला है और बाउंड्रीलाइन पर जाते शॉट को कैच करना और रोकना भी क्षेत्ररक्षण का ही हिस्सा है।

हमने कितनी पारियां खेली हैं, यह हम ही जानते हैं। कोई आज अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में है तो कोई उत्तरार्द्ध में। जीवन में जितनी उपलब्धियां जरूरी हैं उतनी ही खिलाड़ी भावना भी। हमारे ग्रंथ तो हमारी औसत, सौ बरस की जिंदगी को चार बराबर बराबर पारियों में बांटकर चले गए और इन्हें उन्होंने आश्रम का नाम दे दिया। लेकिन एक भारतीय नारी की केवल दो ही पारियां। शादी के पहले मायका और शादी के बाद ससुराल। एक पारी दूसरी पारी के बिना अधूरी।।

आजकल स्त्री पुरुष में ज्यादा भेद नहीं। पुरुषों की तरह महिलाएं भी क्रिकेट खेलने लग गई हैं। घरेलू जीवन हो या किसी दफ्तर का जीवन, जीवन की दोनों पारियों को हंसते हंसते ही तो खेलना है। जरूरी नहीं कि सबके हाथ में बल्ला अथवा गेंद ही हो। जिस पुरुष के हाथ में कभी तलवार थी, आज उसके हाथ में कलम भी हो सकती है और जिस नारी के हाथ में कभी बेलन था, उसके हाथों में कभी देश की बागडोर भी हो सकती है।

हर व्यक्ति अपनी दूसरी पारी शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। इतिहास गवाह है, अधिकांश लोगों की दूसरी पारी ही पहली पारी से बेहतर साबित हुई है। जीवन का संघर्ष, कांटों भरी राह, कदम कदम पर चुनौतियाँ ही तो रास्ता सुगम बनाती हैं। इनके अनुभव से ही इंसान की दूसरी पारी रंग लाती है। अक्सर महान लोगों की दूसरी पारी ही उनकी उपलब्धि बन जाती है। हाथ कंगन को आरसी क्या। मोदीजी की दूसरी पारी को ही देख लीजिए।।

जीवन का क्या भरोसा। मुसीबत के वक्त यह पहाड़ जैसा नज़र आता है और सुख के आते ही क्षणभंगुर हो जाता है। हाय यही तो मेरे दिन थे सिंगार के, दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के। इन्हीं रास्तों से गुजर कर ही हम दूसरी पारी तक पहुंच पाए हैं। कुछ साथ छोड़ गए, कुछ साथ रह पाए हैं। कुछ हमारे सहारे हैं, कुछ को हमारा सहारा है।

एक उम्र के बाद जीवन में ठहराव, सुरक्षा और सुकून आ जाता है। हम इसे रिटायरमेंट, सेवानिवृत्ति अथवा निवृत्ति का नाम दे देते हैं। बस यही हमारी दूसरी पारी है, जब हम अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। अपने लिए जी सकते हैं। यह उम्र आदेश पालन करने की नहीं, अपने आपको आदेश देने की उम्र है। अपनों को साथ लेकर चलने की उम्र है।।

यह उम्र खामियों की नहीं, खूबियों की उम्र है। कमजोरी और मजबूरी के स्थान पर मजबूती और दृढ़ संकल्प के रास्ते पर चलने का समय है। अपने आपको जानने और समझने का मौका तो हमें कभी मिला ही नहीं। कर गुजरें, जो करना चाहते हैं। आपका जीवन कोरा काग़ज़ नहीं ! यह कुछ खोने का नहीं, पाने का वक्त है। आपकी यह दूसरी पारी व्यर्थ ना जावे। जीवन का सूरज तो अब खिला है, जीवन की शाम में सुबह की धूप का आनंद लें। हम सबकी दूसरी पारी, पहली पारी से बेहतर हो। आमीन !

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१६ ⇒ अमर बेल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८१६ ⇒ आलेख – अमर बेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(CUSCATA)

जड़ नहीं, तना नहीं, फल, फूल, पत्ती नहीं, अमरवल्लवी लता हूं, मैं अमर बेल। हां, आत्म निर्भर नहीं, परजीवी, पैरासाइट हूं मैं, छा जाती हूं मैं पौधों पर, लेकिन औषधीय गुणों की खान हूं मैं।

हर लता, बेल नहीं होती, हर बेल अमर बेल नहीं होती।

लौकी, गिलकी, कद्दू और तो और करेले की भी बेल होती है, लेकिन ये सब अपने पांव पर खड़ी, आत्म निर्भर होती हैं। अपनी तो हींग फिटकरी भी नहीं लगती, फिर भी ठाठ हैं मुझ अमर बेल के।।

यूं ही नाम नहीं पड़ा मेरा अमर बेल, अमृत मंथन में निकली अमृत की बूंदों से उत्पत्ति के कारण ही तो मुझे अमर बेल कहा जाने लगा। आप मुझे बेर और बबूल की बांहों में उलझा देख सकते हैं। लेकिन मैं खुद नहीं उलझती, जिसका खाती हूं, उसे ही उलझा लेती हूं। वह बेचारा सूखता रहता है और मैं फलती फूलती रहती हूं।

परजीवी सिर्फ वनस्पति में ही नहीं पाए जाते, जूं, डैंड्रफ, और खटमल जैसा जीव तो ठीक, किसी का खून चूसने वाले सूदखोर, स्वार्थी, और लालची, दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाले लोग भी इसी श्रेणी में आते हैं, जो समाज को खोखला करते रहते हैं।।

अमर बेल होते हुए भी मैं आत्मा की तरह अमर नहीं। आत्मा तो सभी तरह के बंधनों से मुक्त है लेकिन मैं तो स्वयं ही अपने आप में एक ऐसा बंधन हूं, जो जन्मदाता और आश्रयदाता को ही जकड़ लेती है, जिस थाली में खाती हूं, उसी में छेद करती हूं।

मेरी भी मुक्ति तभी संभव है, जब मेरी यह परजीवी देह, मानवता के कुछ काम आए। ईश्वर ने भी शायद मुझे गिलोय की तरह आयुर्वेदिक उपचार हेतु ही अमर रहने का वरदान दिया है। ऐसा सौभाग्य कहां हर परजीवी को नसीब होता है। बीमार दुखी और अस्वस्थ मानवों की सेवा ही मेरी अमरता का मुख्य रहस्य है।।

एक पुण्यात्मा कई जीवों के बंधनों को काट उन्हें मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर करती है, इस अमर बेल की भी यही आस है, उसका जीवन भी किसी के काम आए, ताकि एक परजीवी होते हुए भी, वह अपने आश्रयदाता का कर्ज तो उतार सके। मैं अमरबेल, एक परजीवी समाजसेवी ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१५ ⇒ हाय मैं मर जावां ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हाय मैं मर जावां ।)

?अभी अभी # ८१५ ⇒ आलेख – हाय मैं मर जावां ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुबह सुबह मरने की बात ? कतई नहीं ! यह एक पंजाबी तकिया कलाम है, जिसे हिंदी में हाय मै मर जाऊं कहते हैं। किसी की तारीफ़ करने का यह अजीबो गरीब अंदाज़ है, ठीक उसी तरह, जैसे तुझ पे कुर्बान मेरी जान।

यह मरने का बड़ा अजीब ज़िंदादिल अंदाज़ है, जिसमें किसी की जान नहीं जाती।

हमारे बीच ऐसे कई लोग मौजूद हैं, जो यह कहते नहीं थकते, जब वे कॉलेज में थे, तब उन पर कई लड़कियां मरती थीं। अब उन्हें कौन बताए, कि वे सब लड़कियां आज भी जिंदा हैं, और अपना सुखी जीवन गुज़ार रही हैं।।

जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर हमारा दिल आ जाता है, तो हम उस पर मरने लगते हैं। विश्वास नहीं होता न ! होते हैं कुछ जाबांज़ देशभक्त, जो सर पर कफ़न बांधे निकल पड़ते हैं मातृभूमि पर कुर्बान होने, मां, मेरा रंग दे बसंती चोला गीत गाते हुए। उनके लिए मौत ज़िन्दगी से बड़ी है, क्योंकि उनका मक़सद बड़ा है। वे सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़ते हैं, और देश के लिए शहीद हो जाते हैं। दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।

देशभक्ति की तरह भक्ति में भी जान की परवाह नहीं की जाती ! कबीर साहब तो साफ कह गए हैं ;

सर कटाए, घर जलाए,

वो हमारे साथ आए।

हम ऐसी शर्तों के ख़िलाफ़ हैं। इन सूफ़ी संतों ने ईश्वर को अपनी प्रेमिका बना रखा है, और खुद आशिक बने घूमते रहते हैं। ये हमेशा मरने मारने की ही बात करते हैं। आशिक का ज़नाजा है, बड़ी धूम से निकले।

और हमारे ये शायर !

महफ़िल में जल उठी शमां परवाने के लिए,

प्रीत बनी है दुनिया में, मर जाने के लिए।

अब यह क्या बात हुई ;

जान चली जाए, जिया नहीं जाए

जिया चला जाए, तो जीया नहीं जाए। और ;

वो देखो मुझसे रूठकर

मेरी जान जा रही है।।

दूसरे की जान को अपनी जान कहना कहां की समझदारी है। और दलील देखिए ! जब दो दिल एक हो जाते हैं, तो दोनों एक जान हो जाते हैं। यारी दोस्ती में भी बात बात पर, तेरे लिए जान हाज़िर है, बोल कर के तो देख, तो कहने वाले बहुत हैं, लेकिन एक पांच सौ का गांधी छाप मांगो तो मिमियाने लगते हैं। यार जान ले ले, पर पैसे की बात मत कर।

हमारे जीवन में जब भी हमारी जान बची है, हम यही कहते पाए गए हैं, जान बची और लाखों पाए। आखिर वो लाखों फिर गए कहां, कोई नहीं बताता। लगता है स्विस बैंक में पैसा लोगों ने जान पर खेलकर ही जमा किया है।

यह अलग बात है, जान किसी और की भी हो सकती है।।

कई बार हमारी जान मुट्ठी में आ जाती है। डर के मारे लोग मुट्ठी नहीं खोलते। इधर मुट्ठी खोली, उधर प्राण पखेरू बन उड़ते नजर आए। जी और जान का भी चोली दामन का रिश्ता है। जब हम जी जान एक कर देते हैं, तो क्या बच रह जाता है।

बच्चा जब मां को ज़्यादा परेशान करता है, तो मां भी यही कहती है, जान मत खा ! ये ले पांच रुपए। जा Kit kat ले आ। बचपन में जब मां पिताजी के साथ मेला देखने जाते थे, तो पिताजी उंगली नहीं छोड़ते थे। एक बार मेले में सब गुमते हैं और जब बड़ी मुश्किल और मन्नतों के बाद मिलते हैं, तब मां की जान में जान आती है।।

रेडियो पर फरीदा आपा कह रही हैं, आज जाने की ज़िद ना करो।

हाय मर जाएंगे, हाय लुट जाएंगे, ऐसी बातें किया ना करो।

चलो ! हम भी ऐसी बातें नहीं करते। जान है तो जहान है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०८ ☆ आलेख – ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – ‘‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०८ ☆

☆ आलेख ☆ ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी)

मनुष्य को सब जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। गोसाईं जी कह गये हैं— ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुरलभ सदग्रंथन गावा।’ यानी मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है और मनुष्य की योनि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

वानर की प्रजाति में जन्म लेकर मनुष्य ने अभूतपूर्व प्रगति की। हाथों को चलने की क्रिया से मुक्त किया, पत्थर और लोहे के औज़ार बनाये, परिवार बनाया, खेती-किसानी सीखी। मनुष्य की प्रतिभा और उसके श्रम ने दुनिया की सूरत बदल दी। मनुष्य के लिए नैतिकता के मानदंड बने, नियम बने, कानून बने। नतीजतन मनुष्य को सभी जीवों में सबसे बुद्धिमान,सबसे ताकतवर, सबसे सभ्य और  नैतिकता का अनुसरण करने वाला माना जाने लगा। सभी देशों को परस्पर जोड़ने और उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्तर पर संस्थान स्थापित हुए।

लेकिन कुल मिलाकर समझ में आया कि मनुष्य की झगड़ालू प्रवृत्ति  यथावत है। हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में आदमी आदमी से जूझता रहता है। आदमी ने ऐसे घातक उपकरण विकसित कर लिये हैं कि मिनटों में लाखों जीवन को समाप्त किया जा सकता है। हिरोशिमा और नागासाकी उदाहरण हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण दो विश्वयुद्ध हुए और लाखों जानें गयीं। नेपोलियन ने 1812 में रूस पर आक्रमण किया। उसके छः लाख सैनिक इस अभियान में गये, सिर्फ एक लाख ही वापस लौट पाये। पांच लाख रूस की मिट्टी में दफ़न हो गये। इसका विशद वर्णन टाल्सटाय के महान उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ में मिलता है। इतने जीवन नष्ट होने के बाद भी हिटलर जैसे राष्ट्राध्यक्षों के दिमाग़ से युद्ध का भूत नहीं उतरा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया। युद्ध में दोनों पक्षों के करीब अस्सी लाख सैनिक और नागरिक मारे गये।

फिलहाल फिलिस्तीन की ज़मीन पर इज़रायल और हमास का युद्ध चल रहा है जिसमें 68000 निर्दोष लोग बलि चढ़ चुके हैं, जिनमें से 20- 25 हज़ार बच्चे थे जो दुनिया को आंख भर देखे बिना ही विदा हो गये। बड़ी-बड़ी इमारतें  मलबे में बदल गयीं, पूरी बस्ती श्मशान में तब्दील हो गयी, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। भोजन के लिए बर्तन लेकर लाइन में लगे भूखे बच्चों पर गोलियां चलीं। परिवार के परिवार साफ हो गये। इन मौतों पर रोने वाला कोई नहीं। उधर रूस और यूक्रेन के युद्ध में भी लोग रोज़ मर रहे हैं। दोनों तरफ तर्क दिया जाता है कि भविष्य में उनके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, इसलिए मारना जायज़ है।इन प्रकरणों में दुनिया का चौधरी, संयुक्त राष्ट्र संघ, लाचार बना बैठा है।

शेर को प्रकृति ने मांसाहारी बनाया है, हम उसे हिंसक कहते हैं। लेकिन वह दूसरे जीवों की हत्या तभी करता है जब उसे क्षुधा सताती है। पेट भरा होने पर वह अन्य जीवों की तरफ देखता भी नहीं। लेकिन आदमी की हिंसा की भूख के लिए कोई कारण ढूंढ़ पाना मुश्किल है। कई बार आदमी को मनोरंजन के लिए भी मार दिया जाता है। पुराने ज़माने में कुछ देशों में अपराधियों को शेर का सामना करने के लिए छोड़ दिया जाता था। इससे दंड की प्रक्रिया भी पूरी होती थी और तमाशबीनों का पर्याप्त मनोरंजन भी होता था।

आदमी ने अपनी हरकतों से सिद्ध किया है कि वह सभ्य, सुशिक्षित, संवेदनशील होने का कितना भी ढिंढोरा पीट ले, भीतर से वह वही है जो  वह लाखों साल पहले था, जब रक्त-प्रवाह देखकर वह आनंदित होता था।

ऐसा लगता है कि त्रिदेव में से शिव की संहारक वाली भूमिका को मनुष्य अपने हाथ में लेने के लिए आतुर है। ज्ञानी कहते हैं कि जो जान नहीं देता उसे जान लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन मनुष्य की नज़र में ये बातें निरर्थक हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०८ – ताला ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०८ ☆ ताला… ?

दीपावली संपन्न हो चुकी है। त्योहार का ख़ुमार उतर रहा है। जीवन रोज़ के ढर्रे पर लौट रहा है।

लगभग पाँच दिन बाद आज संध्या भ्रमण के लिए निकला हूँ। बहुधा मैं लिफ्ट का प्रयोग नहीं करता। अपने फ्लैट से सीढ़ियों द्वारा नीचे की मंज़िलें उतरते हुए देखता हूँ कि अधिकांश फ्लैटों के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है। कामकाजी दिनों में सुबह से शाम तक ताला दिखता है। आज शाम को दिख रहा है। संभव है कि लोग अपने परिजनों या परिचितों से दीपावली मिलने गए हों। यह भी हो सकता है कि पिछले चार-पाँच रोज़ से घर में होने से उकताकर आज आउटिंग या बाहर भोजन के लिए चले गए हों। अलबत्ता घरों के दरवाज़े पर ताला अब ‘न्यू नॉर्मल’ है।

स्मरण हो आता है कि माँ ने हमेशा प्रयास किया कि घर पर ताला न लगे। घर वही जो सदा खुला रहे, अपनों के लिए और अतिथियों के लिए भी।

उनकी पीढ़ी ने वह समय देखा था जब दरवाज़े भोर के समय खुलते और रात को ही बंद होते। पथिक, पंछी, पशु सबके लिए घर में भोजन बनता। चींटियों को आटा डाला जाता। बिल्ली को प्रसव पर हलवा बनाकर खिलाया जाता। कुत्तों के लिए रोटी बनती। पंछियों को दाना चुगाया जाता। गौ-ग्रास तो सदैव प्रथम स्थान पर था ही।

सामूहिक परिवार, समय के साथ एकल हुए। गाँव के बड़े, खुले, हवादार मकान छूटे। आदमी फ्लैटों के दड़बे में घुसा। बदली हुई परिस्थितियों और घटते मानव संसाधन के बीच ताला घर के दरवाज़े पर अपना स्थान मजबूती से बनाता चला गया।

निर्विवाद सत्य है कि वर्तमान जीवन शैली में दरवाज़े पर ताला अपरिहार्य है। दरवाज़े पर लटका स्थूल ताला सामान्यत: भीतर कुछ आने नहीं देता। स्थूल का सूक्ष्म विश्लेषण करें कि ताला कहीं जड़ता की ओर तो नहीं ले जा रहा? हमारी सोच और मन पर जो ताला जड़ता जा रहा है, उससे बाहर कैसे आया जाए? इसे भावुक चिंतन कहकर खारिज़ किया जा सकता है। तथापि मनुष्य चिंतन नहीं करेगा तो कौन करेगा? इसी चिंतन के चलते आदमी ने आदिम से आधुनिक की यात्रा की है। फिर कोई किसी क्षेत्र में कितना ही अग्रगण्य हो जाए, परिष्कार और परिमार्जन की संभावना सदा बनी रहती है।

चिंतन का निष्कर्ष है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन भी अब ‘न्यू नॉर्मल’ की सूची में शामिल हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए आज कौंसिलर के पास जाना पड़ता है। सहज संवाद छूट चला है, केवल एकालाप ही बचा है। मानसिक विरेचन के लिए आवश्यक रिश्तों पर ताला लगा है।

इन तालों पर ‘बंदीगृह’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो,

कारागार अप्रासंगिक हो चुके।

मजबूत फाटकों पर टंगे विशाल ताले

जड़े जा चुके हैं मनुष्य के मन पर,

हथकड़ियॉं, हाथों में बेमानी लगती हैं,

वे, उग, जम, और कस, रही हैं नसों में,

पैरों की बेड़ियॉं गर्भस्थ शिशु के साथ ही

जन्मती और बढ़ती हैं, क्षण-प्रतिक्षण

…..बस बुढ़ाती नहीं।

विसंगतियों के फंदे

फॉंसी बनकर कसते जा रहे हैं,

यहॉं-वहॉं टहलते जानवर

रुपये के खूँटे से बंधे

आदमी पर तरस खा रहे हैं।

भूमंडलीकरण के दायरे में

सारा विश्व बड़े से बंदीगृह में

तब्दील हो चुका, इसलिए कहता हूँ-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो

कारागार अप्रासंगिक हो चुका।

मन पर जड़ते इन तालों को हथौड़े से तोड़ने की नहीं अपितु स्नेह, सामंजस्य और विश्वास की चाबी से खोलने की आवश्यकता है। माना कि एक आलेख भर से ताला टूटेगा नहीं, पर बीच-बीच में कुछ समय के लिए ही क्यों ना सही, दरवाज़ा खुला रखने का भाव भी जाग जाए तो चिंतन और लेखन सार्थक है।

इस वर्ष हम अपने-अपने, मन पर जड़े ताले खोलने की दिशा कुछ कदम भी आगे में बढ़ सकें तो चिरंजीव प्रकाश-उत्सव की आभा कई गुना बढ़ जाएगी।

शुभं अस्तु।

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 5:34 बजे, 25 अक्टूबर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१४ ⇒ सुर की गति मैं क्या जानूं ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुर की गति मैं क्या जानूं ।)

?अभी अभी # ८१४ ⇒ आलेख – सुर की गति मैं क्या जानूं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक दुनिया गीत, संगीत की होती है, जहां सुर, ताल और लय की बात होती है, कभी कानों में शहनाई गूंजती है तो कभी बांसुरी की धुन।

धुन एक मन की दशा भी है, कुछ लोग धुन के पक्के होते हैं तो कुछ रियाज के।

हमारे कान हमेशा कुछ अच्छा सुनने के लिए लालायित रहते हैं। दूर कोई गाए, धुन ये सुनाए। हमारे आसपास इतनी आवाजें होती हैं, लेकिन हमारे कान उधर ही लगे रहते हैं, जहां हमारा ध्यान होता है। धुन और ध्यान के बिना कोई भी साधना संभव नहीं।

हर व्यक्ति सुर का जानकार नहीं होता, लेकिन कर्णप्रिय शब्द क्या है और कर्कश स्वर क्या है, यह वह अच्छी तरह जानता है। कानों को भी मीठे बोल ही सुहाते हैं, कड़वे वचन तो सिर्फ आचार्य तरुण सागर जी के ही भाते हैं। सुन साइबा सुन, प्यार की धुन।।

मुकेश का एक प्यारे गीत का मुखड़ा, आज के अभी अभी का शीर्षक है, सुर की गति मैं क्या जानूं, बस एक भजन करना जानूं। बस, बिल्कुल यही हाल मेरा भी है, मुझे सुर का पता नहीं, सरगम मुझे नहीं आती, अच्छा सुन लेता हूं, लेकिन गा नहीं पता, टेबल पर थाप देता रहता हूं, तबला बजाना मुझे नहीं आता, लेकिन जब यह पता चला कि मुकेश का यह प्रिय भजन राग हमीर पर आधारित है, तो अचानक मुझे फिल्म कोहिनूर का वह गीत याद आ गया, गिरधर की मुरलिया बाजे रे, मधुबन में राधिका नाचे रे। संगीत के रसिक और जानकार राग हमीर पर आधारित ऐसे कई गीत जानते होंगे, लेकिन मेरी स्थिति तो बस यही है, सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं। फिर भी बस इतना जरूर मुझे पता है कि सुर के बिना जीवन सुना है।

ईश्वर को पाने के कई साधन हैं, कई रास्ते हैं, लेकिन सभी रास्ते प्रेम के मार्ग से ही होकर जाते हैं। जहां प्रेम है, वहां गीत है, संगीत है, सुर है, कहीं लता है तो कहीं जगजीत है। आने से उसके आए बहार, जाने से उसके जाए बहार। कहीं कोयल की कूक है, तो कहीं पपीहे की पीहू पीहू। जब शोर वाले किशोर गा उठते हैं, पायल वाली देखना, यहीं तो कहीं दिल है, पग तले आए ना, तो दांतों तले उंगली दबाने का मन करता है।।

मन्ना डे और किशोर कुमार का जबर्दस्त संघर्ष हमें एक चतुर नार में देखने को मिलता है। बेचारे मास्टर जी सुर ढूंढते ही रह जाते हैं और भोला बिंदु को ले उड़ता है। मनोरंजन से भरपूर, एक हास्य गीत होते हुए भी मन्ना डे, किशोर कुमार और पंचम अपना कमाल बता ही जाते हैं।

तुम नाचो, रस बरसे। बस यही सुर है, यही साधना है। मन मोर हुआ मतवाला, ये किसने जादू डाला। संगीत कान खोलकर और आंख मूंदकर सुनने की चीज है। मतवाली नार, ठुमक ठुमक चली जाए। रोक सको तो, रोक लो अपनी पायल की झंकार। साज हो तुम, आवाज हूं मैं। सुर सधे तो गाएं, साज बजे, तो बजाएं, बाकी हमारे साथ प्रेम की बांसुरी बजाएं, ईश्वरीय संगीत में खो जाएं। मेरे संग गा, गुनगुना। कोई गीत सुहाना, मेरे संग गा।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – “पूज्य एवं प्रेरणास्रोत साहित्य साधक – डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  पूज्य एवं प्रेरणास्रोत साहित्य साधक – डा. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ? श्री यशोवर्धन पाठक

 

मरण,

आया शरण।

मैंने कहा-

जा अमर हो।

उपरोक्त काव्य पंक्तियों के रचयिता श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करते हुए साहित्यिक क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था।

आज जब मैं अपने अजातशत्रु अग्रज सुमित्र जी को शब्दों के माध्यम से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं तो मेरे मानस पटल पर मेरी पांच दशक की साहित्यिक यात्रा की वे सारी मधुर स्मृतियां जीवंत हो उठीं हैं जो मेरे स्मृति कोष में अमूल्य धरोहर बन गई हैं। इस सुदीर्घ यात्रा में वे हमेशा मेरा संबल बने रहे। संरक्षक, दिशा दर्शक और मार्ग दर्शक के ‌रूप में मुझे हमेशा अपने सिर पर उनका वरदहस्त होने का अहसास होता रहा। उन्होंने मुझे न तो कभी थकने दिया और रुकने दिया, निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं नहीं है कि मैं अपनी पांच दशक की साहित्यिक यात्रा में आज जिस मुकाम पर पहुंच सका हूं, सुमित्रजी के आशीर्वाद के बिना मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था। मेरे स्मृति कोष की किताब के हर पृष्ठ पर सुमित्रजी के अमिट हस्ताक्षर हैं।

सुमित्रजी मेरे पूज्य पिताजी स्व. पं.भगवती प्रसाद पाठक के बहुत बड़े प्रशंसक थे। पिताजी के साथ शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्रों में पिताजी के योगदान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था। कालांतर में स्थानीय नवीन दुनिया समाचार पत्र में साहित्य संपादक के रूप में सुमित्रजी ने मेरे अग्रज हर्षवर्धन, सर्वदमन और प्रियदर्शन जी के मार्गदर्शक सहयोगी की भूमिका का निर्वाह किया। इसी अवधि में मेरे जीवन में वह दुर्लभ क्षण आया जब मुझे उन्होंने जीवन भर के लिए अपने मोहपाश में जकड़ लिया। 1977 में अपने अनुजवत् मित्र राजेश पाठक प्रवीण के साथ मिलकर जब मैंने। उदित लेखक संघ संस्था की नींव रखी तो सुमित्रजी जी ही मुख्य परामर्शदाता और मार्गदर्शक थे। इस संस्था का प्रथम आयोजन स्थानीय जानकीरमण महाविद्यालय के सभागार में हुआ था जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में हम लोगों ने स्व हरिकृष्ण त्रिपाठी और सुमित्रजी को आमंत्रित किया था। उस अविस्मरणीय ऐतिहासिक आयोजन से ही राजेश पाठक प्रवीण ने कार्यक्रम संचालन के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा और आज एक कुशल संचालक के रूप में उनकी ख्याति इस महादेश की सीमाओं को भी पार कर चुकी है। राजेश पाठक का कुशल मंच संचालन आज हर साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजन की सफलता की गारंटी बन चुका है। मेरे समान ही राजेश पाठक प्रवीण भी यह मानते हैं कि आज वे जिस मुकाम पर हैं वहां तक पहुंचने में सुमित्रजी का प्रोत्साहन और मार्गदर्शन हमेशा उनका संबल बना है।

सुमित्रजी तपस्वी, मनस्वी, यशस्वी साहित्यकार थे। उन्होंने चालीस से अधिक कालजयी कृतियों का सृजन किया। उन्हें उनकी सुदीर्घ साहित्य साधना के लिए देश विदेश में अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित किया गया। संस्कारधानी के बहुसंख्य साहित्यकारों की कृतियों के लिए आशीर्वचन और भूमिकाएं लिखकर सुमित्रजी ने उन्हें गौरवान्वित किया। किसी भी पुस्तक के लिए सुमित्रजी की कलम से लिखी गई भूमिका उस पुस्तक पर सुमित्रजी की मुहर मानी जाती थी। सुमित्रजी की मुहर मतलब उस पुस्तक की सफलता की गारंटी। लगभग दो दशक पूर्व प्रकाशित मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह ‘ जांच पड़ताल ‘ की सफलता भी सुमित्रजी की मुहर ने पहले ही सुनिश्चित कर दी थी। सुमित्रजी लंबे समय तक हिंदी पत्रकारिता से जुड़े रहे। संस्कारधानी से प्रकाशित सांध्य दैनिक जयलोक के संपादक के रूप में सुमित्रजी ने हिंदी पत्रकारिता को नयी दिशा प्रदान की। जबलपुर जिला पत्रकार संघ में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का हुए कुशलता पूर्वक निर्वहन किया। वास्तविक अर्थों में सुमित्रजी अपने आप में एक संपूर्ण संस्था थे जिसके अंदर संवेदनशील कवि, विद्वान लेखक, सजग पत्रकार, शिक्षाविद, प्रखर वक्ता आदि सब एक साथ समाए हुए थे।

सुमित्रजी सैकड़ों साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षण और मार्गदर्शक और नयी पीढ़ी के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत थे। संस्कारधानी में कला साहित्य की अनूठी संस्था पाथेय कला अकादमी के संस्थापक थे। सुमित्रजी साहित्य जगत का वट वृक्ष थे जिसकी शाखाएं दूर दूर तक फैली हुई थीं। उनका अपना एक युग था। सुमित्रजी के देहावसान ने उस युग का अवसान कर दिया है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि सुमित्रजी साहित्य जगत में एक ऐसा शून्य छोड़कर गए हैं जिसे सुमित्रजी ही पुनर्जन्म लेकर भर सकते हैं।

जयंती पर शत शत नमन🙏

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – “सुमित्र जी की समावेशी साहित्यिक दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

?  आलेख – सुमित्र जी की समावेशी साहित्यिक दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

जबलपुर के साहित्यिक परिदृश्य में  डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ एक ऐसे सृजनधर्मी साहित्यकार के रूप में उभरे जिनकी उदार साहित्य दृष्टि ने न केवल साहित्य जगत बल्कि समस्त सांस्कृतिक परिवेश को गहराई तक प्रभावित किया। छह दशकों से अधिक समय तक फैले उनके साहित्यिक जीवन ने हिंदी साहित्य को चालीस से अधिक कृतियाँ प्रदान कीं, जिनमें कविता, निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना और समालोचना जैसी विविध विधाओं में उनकी रचनात्मकता की छाप अंकित है। उनकी लेखनी पर सवार यात्रा में निरंतर विकास और प्रयोगशीलता देखने को मिलती है, जहाँ 1960 के दशक में ही उनकी कविताओं ने प्रतीक, भावबोध, बिम्ब विधान और शब्दावली के स्तर पर परिपक्वता का परिचय दिया था।

डॉ सुमित्र की साहित्यिक दृष्टि की सबसे विशिष्ट बात थी नवोदित रचनाकारों के प्रति उनका उदार और प्रोत्साहनपूर्ण रवैया। वे दूसरों के सृजन को अपने सृजन से ज्यादा महत्व देते थे, इसी भावना के तहत उन्होंने ‘पाथेय प्रकाशन’ की स्थापना की जिसके माध्यम से अनेक युवा रचनाकारों की कृतियाँ प्रकाश में आईं। डॉ शिव कुमार सिंह ठाकुर के शब्दों में, “उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना, समालोचना आदि के विविध क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास भी किया है।” हेमन्त बावनकर को 42 वर्ष पूर्व लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था – “तुम्हारा लेखन पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि तुम नौसिखिये हो… सबसे बड़ी बात यह है कि संवेदना की शक्ति और जीवन की दृष्टि तुम्हारे पास है।” यह पत्र उनकी उदार समावेशी साहित्यिक दृष्टि का परिचायक उदाहरण है।

उनकी साहित्य दृष्टि की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी साहित्य को समाज से जोड़ने का प्रयास। डॉ सुमित्र ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम समझा। उनकी रचनाओं में समाज के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया। उनके लेखन में भावदीप्त यथार्थ की अभिव्यक्ति मिलती है, जो पाठकों के मन में गहरी अनुभूति जगाती है।

डॉ सुमित्र की प्रमुख कृतियों में ‘संभावना की फसल’, ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द’, ‘आदमी तोता नहीं’, ‘यादों के नागपाश’, ‘खूंटे से बंधी गाय-गाय से बंधी स्त्री’ और बुंदेली काव्य ‘बढ़त जात उजियारो’ हैं।

साहित्य सृजन के साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाई। वे जबलपुर की साहित्य सांस्कृतिक संस्था ‘मित्रसंघ’ के संस्थापक सदस्य रहे। इसके अलावा वे ‘पाथेय साहित्य कला अकादमी’ के संस्थापक भी रहे, जिसके माध्यम से उन्होंने अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय और कोयला व खान मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समितियों में भी सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने हिंदी भाषा के विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण सुझाव दिये।

27 फरवरी 2024 को उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य जगत ने एक ऐसे साहित्य स्तंभ को खो दिया जिसने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। किन्तु उनकी साहित्यिक दृष्टि और रचनात्मक विरासत आने वाली पीढ़ियों को साहित्य साधना के लिए प्रेरित करती रहेगी। डॉ सुमित्र का मानना था कि “लेखन ही जीवन का धर्म कर्म और अध्यात्म है”, और इसी आस्था को उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। उनकी उदार साहित्य दृष्टि ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई चेतना का संचार किया और नव रचनाकारों को मंच व प्रोत्साहन देकर साहित्यिक लोक का समावेशी विस्तार किया है। उनकी साहित्यिक साधना, संगठन और संपादन हर कसौटी पर नवोन्मेषी और प्रेरणादायक बनी रहेगी।

उनकी पुण्य स्मृति को नमन🙏

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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