हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख वो भी क्या दिन थे।)

☆ आलेख – राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

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राष्ट्रीय प्रसारण दिवस का इतिहास:

भारत में पहला रेडियो प्रसारण बॉम्बे स्टेशन से 23 जुलाई 1927 को किया गया था। तब स्टेशन का स्वामित्व इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी नामक एक निजी कंपनी के पास था।

सरकार ने 1 अप्रैल 1930 को प्रसारण का कार्यभार संभाला और इसका नाम बदलकर भारतीय राज्य प्रसारण सेवा (आईएसबीएस) कर दिया ।

यह शुरू में प्रायोगिक आधार पर था।  बाद में यह स्थायी रूप से 1932 में सरकारी नियंत्रण में आ गया।

8 जून, 1936 को भारतीय राज्य प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो बन गई । 1956 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया।

वर्तमान में, आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है।

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(प्रसारण दिवस की सभी साथियों को बधाई। मुझे अपने स्कूल समय की एक रोचक घटना याद आ रही है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। – श्री अजीत सिंह)

एक रेडियो उद्घोषक ने रेलवे स्टेशन मंज़ूर करवा लिया… 

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर, मुझे उस समय की याद आती है जब एक रेडियो उद्घोषक अपने गांव के लिए एक रेलवे स्टेशन मंजूर करवा सकता था । यह साल 1956 या 57 के आसपास की बात है।जब मैं छठी या सातवीं क्लास का स्कूल छात्र था ।

उस समय हरियाणा पंजाब राज्य का हिस्सा था। जिला करनाल  में सरकारी हाई स्कूल कैमला में हमारे शिक्षक ने हमें एक दिन पास के गांव कोहंड तक पैदल मार्च करने के लिए कहा, जहां एक मंत्री को एक जनसभा को संबोधित करना था।  हम यात्रा का आनंद लेने के लिए बहुत खुश थे और लगभग तीन किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं थी।

रेल राज्य मंत्री श्री शाहनवाज कुछ समय बाद पंडित हिरदे राम के साथ आए, जो कि कोहंड गांव के रहने वाले आकाशवाणी दिल्ली के देहाती कार्यक्रम के एक लोकप्रिय कंपीयर थे।

अपने स्वागत भाषण में हिरदे राम ने रेलवे स्टेशन की मांग की और बदले में मंत्री ने मांग स्वीकार कर ली।  हम सभी ने ताली बजाई।  ऐसा लग रहा था कि हिरदे राम पहले से ही दिल्ली में मंत्री के साथ डील कर चुके थे।

एक दो महीने के बाद, हम फिर से कोहंड के लिए मार्च कर रहे थे जब पहली ट्रेन वहां रुकी थी। यह एक उत्सव का समय था। इसमें ग्रामीण बैंड बाजे के साथ शामिल हुए।  सरपंच और उसके आदमियों ने मिठाई से भरी  टोकरियां हर डिब्बे में डाली।  बर्फी का एक डब्बा स्टेशन मास्टर के लिए और दूसरा इंजन ड्राइवर के लिए था। पतासों के साथ हमने भी अपनी जेबें भरी थीं।

ट्रेन उस दिन करीब दस मिनट के लिए रुकी। स्टेशन मास्टर ने घोषणा की कि आगे से रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक मिनट के लिए होगा ।

असल में, स्टेशन को ट्रैफिक की मात्रा के आधार पर परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया था।  ट्रैफिक ज्यादा नहीं था।  स्थानीय पंचायत ने एक रास्ता तैयार किया: पहला, कोई भी बिना टिकट यात्रा नहीं करेगा और दूसरा, पंचायत निर्धारित न्यूनतम कोटा पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन रेलवे टिकट खरीदेगी।

कोहंड रेलवे स्टेशन अभी भी एक छोटा स्टेशन है।  जाहिर है, अब टिकटों की आवश्यक बिक्री को पूरा करने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है।   मुश्किल से एक या दो ट्रेनें वहां रुकती हैं।  पानीपत और करनाल के लिए यात्री यहां से ट्रेनें लेते हैं।

हमारे गांव में एक सामुदायिक रेडियो सेट था और लोग हर्षोल्लास के साथ देहाती कार्यक्रम सुनते थे। कभी कभी  कोई कहता सुनाई पड़ता कि साहब  के रूप में बोल रहा आदमी वही व्यक्ति है जिसने अपने गांव कोहंड के लिए रेलवे स्टेशन  मंजूर करा लिया था।

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जब मैं अस्सी के दशक में आकाशवाणी जम्मू में संवाददाता के तौर पर काम कर रहा था तो  एक सहयोगी ने मुझे एक श्रोता से मिली चिट्ठी दिखाई जिस पर पता लिखा था, “स्टेशन मास्टर, रेडियो कश्मीर, जम्मू” । अक्सर पत्र डायरेक्टर के नाम से आते थे। मैंने कहा इसमें श्रोता की कोई खास गलती नहीं है। अगर रेलवे स्टेशन  का मुखिया स्टेशन मास्टर हो सकता है तो रेडियो स्टेशन का मुखिया भी स्टेशन मास्टर क्यों नहीं हो सकता ?

हा हा!

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 737 ⇒ घोड़ा, घास और यारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घोड़ा, घास और यारी।)

?अभी अभी # 737 ⇒ आलेख – घोड़ा, घास और यारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घोड़ा घास से यारी नहीं करता ! घोड़े पर अक्सर सवारी की जाती है। आप गाय और कुत्ते की तरह घोड़े को नहीं पाल सकते। घोड़ा बिना घुड़सवार के शोभा नहीं देता। गाय और कुत्ता तो कोई भी रहम दिल इंसान पाल सकता है, घोड़े को पालने के लिए शारीरक बल के अलावा एक अस्तबल की भी आवश्यकता होती है।

युद्ध की कलाओं में घोड़े का विशिष्ट स्थान है। अश्वारोही सेना के बिना कोई भी युद्ध अधूरा होता था। महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी हों या फिर रानी लक्ष्मीबाई, घोड़ा ही इनकी पहचान थी। अश्व – विश्व में चेतक का नाम अमर है।।

फ़ौज में आज भी कैवेलरी यूनिट, अश्ववाहिनी सेना होती है। कर्फ्यू के वक्त कुछ बीएसएफ के जवान सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं। कभी इंदौर शहर भी ताँगों का शहर हुआ करता था। आज शहर से घोड़ा और घास दोनों गायब हैं।।

घुड़सवारी अगर एक शौक है, तो घुड़दौड़ एक जुनून। मुम्बई का महालक्ष्मी रेस कोर्स घुड़दौड़ के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ घोड़ों पर दाँव लगाया जाता है। यह एक तरह का जुआ है, जिसमें कई रईस अपनी दौलत लुटा बैठते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई राय साहब बने चरित्र अभिनेता किसी नंबर के घोड़े पर दाँव लगाकर अपना सब कुछ हार जाते हैं, और दिल के दौरे में अपनी जान गँवा बैठते हैं। तब हीरो रायसाहब की लड़की और माँ को सहारा देता है। अंग्रेजों का यह एक प्रिय खेल था, इसलिए हर छोटे-बड़े शहर में रेस कोर्स रोड और पोलोग्राउंड आज भी देखे जा सकते हैं।

कभी घोड़े तांगा और बग्घी में जोते जाते थे। महाभारत काल में कृष्ण जिस अर्जुन के रथ के सारथी बने थे, उसमें भी घोड़े ही शोभायमान होते थे। जब घोड़े को घास मिलनी बंद हो गई, तो ताँगों का स्थान सायकल रिक्शा और ऑटो रिक्शा ने ले लिया। एक आम इंसान ने भले ही ज़िन्दगी में कभी कोई घोड़ा न खरीदा हो, सोते वक्त वह अक्सर घोड़े बेचकर ही सोता है।।

जो लोग धंधे-व्यवसाय को यारी से अधिक महत्व देते हैं, वे दोस्ती के लिहाज में एक पैसा नहीं छोड़ते। उनका यह तकिया कलाम होता है, भैया ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? उन्हें यारी से ज़्यादा घास प्यारी है। उसूल अपना अपना।

अब तो घोड़ा बस बारात में देखा जा सकता है। माफ़ कीजिये, वह भी शायद घोड़ी ही होती है। घोड़ी पे हो के सवार … गाना चला करता है। दूल्हे राजा घोड़े पर बैठे हैं। एक रस्म में घोड़े को आग्रहपूर्वक एक पात्र में भीगी हुई चने की दाल खिलाई जाती है। बस शायद यही एक मौका होता है, जब घोड़ा घास से नहीं, चने की दाल से भी यारी कर लेता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

साइकोलोजी की पढ़ाई करते हुए कभी सोचा ही नहींं, बस मुट्ठी भर ख्वाब लिए तरक्की के लिए बढती रही। उम्र  के साथ साथ माँ की थपकी ना जाने कब हिदायत में बदल गई और कपड़ों का पहनावा समाजिक सम्मान से जुड़ गया मालूम ना चला।

गणित कमज़ोर रहा अतः दुनियाँदारी में हमेशा ठगी गई फिर भी साइकोलोजी की पढ़ाई पूरी हूई और  नाते रिश्तेदारों में फुसफुसाहट होने लगा बिटिया सयानी हो गई फिर देरी कहाँ हुई और पिता जी ने थमा दिया हाथ पिया के देहरी से।

अजीब है न ! स्त्री अर्धांगिनी बनते ही पूर्णता दर्शाने की कोशिश करने के लिए कदम ताल मिलाने की भरपूर कोशिश करतीं हैं और पुरुष समाज यह समझ लेता है कि स्त्री उसका अधिपत्य है।

मकान से घर और घर से पिहर – माया का के बीचों बीच फंसी स्त्री मन हमेशा कोशिश करता रहा कि उसके घर की खिड़की दरवाजे भले लकड़ी के हो लेकिन उसके जीवन साथी का हृदय विस्थापित जंगल हो जहाँ उसके लिए कोई रोक टोक ना हो बिल्कुल माता पार्वती जी के जैसे वह केवल अपने शिव रुपी पति की संगनी रहना चाहतीं है उसके लिए सम्पति तो केवल उसका पति होता है।

अनगिनत भ्रम में जीवित रहतीं स्त्रियाँ केवल ऊपरी सतह के परतों में लिप्त हाथों में  हरी – हरी चुड़ियाँ डालकर कहती है –

शिव का सावन आ गया जबकि सच्चाई तो यह है कि उनके मन के अंदर एक घुटन ढूढ़ती हैं एक विस्थापित जंगल जिस जंगल में वह अपने शिव के साथ बैठीं केवल शिवमय होकर अनंत में मिलने से पहले खिल खिलाकर बोले –

“देखो शिव सावन आ गया”

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 736 ⇒ भूरि भूरि प्रशंसा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भूरि भूरि प्रशंसा।)

?अभी अभी # 736 ⇒ आलेख – भूरि भूरि प्रशंसा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Panegyrize)

जब हम किसी की तारीफ करते हैं, तो खुलकर करते हैं, और जब बुराई करते हैं तो जमकर। याने जो भी काम करते हैं, तबीयत से करते हैं। इन दोनों के मिले जुले स्वरूप को ही निंदा स्तुति भी कहते हैं। राजनीति में कड़ी निंदा की जाती है और ईश्वर की स्तुति आंख बंद करके की जाती है। वह स्तुति, जिसे चापलूसी कहते हैं, वह तो जी खोलकर की जाती है।

तारीफ शब्द थोड़ा उर्दू और थोड़ा फिल्मी है, जब कि प्रशंसा शब्द शुद्ध और सात्विक रूप से हिंदी शब्द है। इतना सात्विक कि इस प्रशंसा को भूरि भूरि प्रशंसा भी कहा जाता है। यानी किसी की जब बुराई करने का मन हो, तो उसे खरी खोटी सुनाना, और प्रशंसा करने का मन किया तो भूरि भूरि प्रशंसा।।

निंदा स्तुति अथवा बुराई और भूरि भूरि प्रशंसा एक ही मुंह से की जाती है। लेकिन प्रशंसा में चाशनी घोलने के लिए यह जरूर कहा जाता है, आपकी प्रशंसा किस मुंह से करूं ! अरे भाई, उसी मुंह से करो, जिस मुंह से कल बुराई कर रहे थे। कल जो कलमुंहा था, आज उसका चेहरा चांद सा कैसे हो गया।

चलिए, हमें इससे क्या, हमारा मन तो आज भूरि भूरि प्रशंसा करने का हो रहा है, इसलिए आज हम गुस्से से लाल पीले नहीं होने वाले। प्रशंसा लाल नहीं होती, नीली, पीली, हरी नहीं होती यह भूरि ही क्यों होती है।

स्तुति और प्रशस्ति के करीब, भूरि’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बहुत, प्रचुर मात्रा में और बार-बार। जैसे भूरि दान =प्रचुर मात्रा में दिया गया दान। भूरि-भूरि प्रशंसा का अर्थ है बहुत-बहुत प्रशंसा, बारम्बार प्रशंसा।।

अंग्रजी भाषा इतनी संपन्न नहीं। आप किसी की अंग्रेजी में brown brown praise नहीं कर सकते, उसके लिए उनके पास एकमात्र शब्द पेनिगराइज़ (panegyrize) है। यह शब्द हमें अपोलोज़ाइज

(apologize) का करीबी लगता है, , लेकिन इसका और panegyrize का छत्तीस का आंकड़ा है, जहां भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती, उल्टे माफी मांगी जाती है।

ईश्वर की प्रशंसा नहीं की जाती, गुणगान किया जाता है। हमें तो भूरि भूरि प्रशंसा में चापलूसी अथवा चाटुकारिता की कतई बू नहीं आती। सज्जनों, मनीषियों, अथवा विद्वत्जनों की भूरि भूरि प्रशंसा करने में कोई दोष नहीं, अतिशयोक्ति नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 735 ⇒ सूर सूर, तुलसी शशि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूर सूर, तुलसी शशि।)

?अभी अभी # 735 ⇒ आलेख – सूर सूर, तुलसी शशि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आगे क्या लिखूँ, आप खुद समझदार हो। केशव दास को उड़गन यानी तारा बता दिया, और आज के कवियों के बारे में तो मत पूछिए, क्या क्या कह डाला, कहने वाले ने। बेचारों को जुगनू बनाकर रख दिया। हिंदी में इस उक्ति पर हमें निबंध भी लिखना पड़ता था। निबंध क्या, हम तो बस अर्थ कर देते थे, सूर तुलसी तो हम आज तक पढ़ते आ रहे हैं। केशवदास को हमने स्कूल के बाद कभी हाथ नहीं लगाया, बस बच्चन की मधुशाला और नीरज के कारवां गुजर गया, में ही अटके रहे।

जब पढ़ने की उम्र थी, तब तो बस जो कोर्स में था, वही पढ़ लेते थे। वह भी इसलिए, क्योंकि वह परीक्षा में आता था। उसी दौरान हमने तोते की तरह गिरधर की कुंडलियां, मीरा के भजन, कबीर की साखी और संस्कृत के कुछ श्लोक रट लिए थे। लेकिन असली पढ़ाई तो तब शुरू हुई, जब हमारे कॉलेज की पढ़ाई खत्म हुई।।

उसके बाद, हम अपनी मर्जी के मालिक थे, जो मर्जी हुई पढ़ा, जो पसंद नहीं आया, वह नहीं पढ़ा।

हिंदी तो खैर हमारी मातृभाषा भी रही है और घर में बोलचाल की भाषा भी, लेकिन अंग्रेजी से हमारा वास्ता तब पड़ा, जब हमें छठी का दूध याद आया, यानी छठी कक्षा से ही हमें अंग्रेजी का अक्षर ज्ञान हुआ।

जब हमें ज्ञात हुआ कि ये विचार तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हैं, तो उनका व्यक्तित्व हमारी आंखों के समक्ष आ गया। उनके आगे कोई बड़ी लकीर नहीं खींची जा सकती। आप किसी आलोचक की आलोचना नहीं कर सकते, हां, उस पर विमर्श अवश्य कर सकते हैं।।

सूरदास अष्ट छाप के कवि थे और वैष्णव सम्प्रदाय के होकर कृष्ण भक्त थे, जब कि आचार्य तुलसीदास राम भक्त थे, और उनके द्वारा रचित रामचरितमानस का आज भी घर घर पाठ होता है। कई को सुन्दरकाण्ड कंठस्थ है तो कुछ को पूरी की पूरी रामायण। सूरदास के कुछ पद और रामायण की कुछ चौपाई तो खैर हमें भी याद है, लेकिन मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो सुनकर अनूप जलोटा का ही खयाल आता है, ना कि सूरदास जी का।

सही बात बोलें तो जितनी श्रद्धा जन मानस की तुलसीदास जी में है, उतनी सूरदास जी में नहीं। केवल ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी लिखने से तुलसीदास जी का महत्व कुछ कम नहीं हो जाता। हमने तो “सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ” का भावार्थ यह भी सुना है, तब सूरदास जी ने हंसते हुए, यशोदा जी को गले लगा लिया।।

सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, रहीम और जायसी, सभी भक्तिकाल के कवि थे, और शायद इसीलिए इस काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना गया है।

राजनीति की तरह इन पर कीचड़ नहीं उछाला जाता, इन पर शोध ग्रंथ लिखे जाते हैं।

इसी संदर्भ ने मानस पीयूष, Gita Press, Gorakhpur द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस पर एक विस्तृत टीका है। इसे “रामचरितमानस की सबसे बड़ी टीका” के रूप में जाना जाता है, जिसे संत विद्वान श्री अंजनी नंदन शरण जी ने संपादित किया है. यह सात खंडों में उपलब्ध है, और इसमें रामकथा के विभिन्न विद्वानों, विचारकों और संतों की व्याख्याओं का संग्रह है।।

कवि और आलोचक अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन सूरदास जी को सूर्य बताना और तुलसीदास जी की तुलना चंद्रमा से करना, हमें कुछ हजम नहीं हुआ। हमारे समकालीन पंत, निराला, और महादेवी जैसे कई कवि क्या कवल साहित्यकाश में टिमटिमा रहे हैं। आचार्य शुक्ल स्वयं धुरंधर विद्वान एवं विचारक थे। हम तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित सभी आलोचकों और संत कवियों को सादर नमन करते हुए अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

वैष्णव कृष्ण भक्तों को जय श्री कृष्ण और तुलसी के राम भक्तों को जय राम जी की..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 140 – देश-परदेश – विश्व आइसक्रीम दिवस: तीसरा रविवार, जुलाई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 140 ☆ देश-परदेश – 🧁 विश्व आइसक्रीम दिवस: तीसरा रविवार, जुलाई 🍦 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गूगल ने आज ये जानकारी प्रदान करी, कि आज “आइसक्रीम दिवस” है। मन को बड़ी ठंडक मिली, गर्मी से बहुत बुरा हाल हो रहा हैं। तभी मन के भीतर से आवाज़ आई, कि हमारा तो गला बहुत खराब है। आइसक्रीम ग्रहण करने से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता हैं। इसलिए मन की,ये ठंडक तो मात्र कुछ क्षण की थी।

बचपन में हमारे घर पर जब फ्रिज नहीं था,हाथ की मशीन से आइसक्रीम बनती थी। बर्फ और नमक के उपयोग से दूध को इतना ठंडा किया जाता था,और बहुत अधिक मेहनत के बाद ही वो आइस क्रीम का आकार ले पाता था। मेहनत का फल मीठा होता है,शायद आइस क्रीम बनाने की क्रिया से ही बना होगा।

परिचित अमीरों के विवाह में आइस क्रीम भी सीमित मात्रा में खाने को मिलती थी। एक छोटा सा क्वालिटी ब्रांड का कप प्रचलन में हुआ करता था। समय के अनुसार ईंट (ब्रिक्स ) आकर की आइसक्रीम विवाह आदि कार्यक्रमों में भी खूब खाई थी।

युवावस्था में परिवार के विवाह कार्यक्रमों में आइसक्रीम के स्टॉल पर ड्यूटी लगती थी। एक बार विवाह में ब्रिक्स को काटकर हम आइसक्रीम का वितरण कर रहे थे। एक परिचित को जब हमने ब्रिक्स को काट कर उनको दिया, तो वो बोले मैं बाद में ले लूंगा। अंतिम टुकड़े को जब काट रहे थे, तो वो परिचित बोले, अब और कितने टुकड़े करोगे, इस प्रकार से उन्होंने दो व्यक्तियों के बराबर की आइसक्रीम डकार ली थी।

विवाह आदि में आज भी मीठे के स्टॉल भर सबसे अधिक भीड़ मिल जाती हैं। घर में जिन व्यक्तियों को शुगर की बीमारी के कारण मीठा प्रतिबंधित रहता है, ऐसे व्यक्ति मौक़े पर चौके लगा लेते हैं।

बाजार में तो शुगर रोगियों के लिए “शुगर फ्री” आइसक्रीम भी उपलब्ध हो गई है, आने वाले समय में खांसी/गले के रोगियों के लिए भी शायद” खांसी फ्री ” आइसक्रीम आ सकती हैं। हमें तो तब तक इंतजार ही करना पड़ेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 12 – आलेख – “डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 12 ☆

☆ आलेख ☆ “डॉ. रंजीत की स्मृति-सामग्री पर चिंतन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

(संदर्भ : श्री हेमन्त बावनकर की लघुकथा इस लिंक पर क्लिक कर अथवा आलेख के अंत में पढ़ें सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें“**)

संवेदनशील साहित्यकार – कथाकार भाई हेमन्त बावनकर की लघुकथा “सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह और पुस्तकें” सोचने को विवश करती है कि क्या हमारी अगली पीढ़ी के लिए हमारे द्वारा अर्जित, संग्रहित धन – संपत्ति के अतिरिक्त बाकी सब व्यर्थ है ? कथाकार या तो रंगीन कल्पना की उड़ान भरता है या दुनिया – समाज में देखी, अनुभव की गई वास्तविक घटनाओं को अपने द्वारा रचित पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है । हेमन्त जी की यह कथा समाज की नई पीढ़ी के रचनात्मकता से दूर सिर्फ आवश्यकता की पूर्ति वाले जीवन दर्शन का चित्र भी है जिसमें उन्होंने अपनी कथा में दिवंगत हो चुके साहित्यकार डॉ. रंजीत के पुत्र सुजीत और रंजीत के मित्र सेवकराम के माध्यम से लोगों के सामने एक समस्या रखी है ।

कथा में डॉ. रंजीत स्मृति शेष साहित्यकार बताए गए हैं । उनके जीवन काल में उन्हें अनेक सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह मिले साहित्यिक रुचि के कारण धीरे –  धीरे उनके पास पुस्तकों का भंडार भी एकत्रित हो गया । लोग सच ही कहते हैं कि सबको एक दिन सब यहीं छोड़कर जाना पड़ता है । दुनियां में शेष रहता है व्यक्ति का यश – अपयश, उसके द्वारा संग्रहित चल – अचल संपत्ति । सम्पत्ति तो परिजनों को बहुत अच्छी लगती है किंतु यदि अगली पीढ़ी में कोई उसकी रुचि का, अपनी विरासत का सम्मान करने वाला नहीं है तो व्यक्ति द्वारा छोड़े गए ढेरों फोटो, सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह पुस्तकें, गिटार – सितार, रंग – ब्रश अथवा उसकी रुचि या पेशे से संबंधित सभी वस्तुएं घर के लोगों को व्यर्थ जगह घेरने वाली लगने लगती हैं और वे स्मृति शेष व्यक्ति की अत्यंत प्रिय वस्तुओं को भी अल्प दामों में अथवा मुफ्त ही कबाड़ी को देने में भी नहीं हिचकते । मैं अनेक ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्हें अपने पिता के दुनिया से जाने के बाद उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुएं कचरा नजर आने लगीं । डॉ. रंजीत का बेटा सुजीत भी इसी तरह का पुत्र है । सुजीत अपने पिता के मित्र सेवकराम से कहता है कि उनके पिता के सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह और पुस्तकें लेने कोई तैयार नहीं अब इन्हें कैसे ठिकाने लगाया जाए । सेवकराम सोच में पड़ जाती हैं और सलाह देने के लिए कुछ समय मांग लेते हैं ।

मुझे लगता है कि जहां पुत्र ने अपने पिता का ही पेशा और रुचि अपनाई है वहीं पिता की रुचिकर सामग्री व उपलब्धियों का सम्मान है उसे उपयोगी धरोहर माना जाता है क्योंकि उससे पुत्र को अपना मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिलती है । साहित्यकार पिता के साहित्य समझने वाले पुत्र, डॉक्टर के डॉक्टर पुत्र, वकील के वकील पुत्र, व्यवसायी के व्यवसायी पुत्र को पिता के विरासत व नाम से लाभ मिलता है किंतु जहां पुत्र का पेशा अलग हुआ उसकी रुचियां व आवश्यकताएं भी अलग हो जाती हैं और विरासत नष्ट हो जाती है । ऐसी स्थिति में किसी भी पिता को मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि उसके द्वारा संग्रहित सामग्री का विनिष्टीकरण तय है । किसी भी नगर – कस्बे में इतनी बड़ी संख्या में ऐसे संग्रहालय भी नहीं हैं जो आम साहित्य अथवा कला साधकों की “स्मृति – सामग्री” को अपने संग्रहालय में स्थान दे सकें । सामान्यतः तो बहुसंख्यक साहित्य – कला साधक आर्थिक रूप से कमजोर ही होते हैं और जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं उनमें अधिकांश कृपण । इस स्थिति के चलते इनके संयुक्त चंदे से भी किसी ऐसे स्थल का निर्माण संभव नहीं है जहां स्मृतिशेष साहित्य – कला साधकों की सामग्री को सुरक्षित रखा जा सके । बिरले ही सम्पन्न और स्वयं के लिए उदार रचनाधर्मी या तो स्वयं जीवित रहते अपने नाम का संग्रहालय बनवाने की व्यवस्था कर जाते हैं अथवा लाखों में किसी भाग्यशाली का पुत्र ऐसा होता है जो पिता की स्मृतियों को सम्हालने के लिए कुछ करता है ।

सेवकराम जी डॉ. रंजीत के पुत्र सुजीत से रंजीत जी की पुस्तकों, सम्मान पत्रों आदि की व्यवस्था पर सोच – विचार के लिए समय तो ले आए हैं पर मुझे विश्वास नहीं है कि वे कोई समाधान लेकर उसके पास लौटेंगे । रंजीत जी की सामग्री के साथ वही होगा जो आमतौर पर होता आया है ।

☆ ☆ ☆ ☆

** हेमन्त बावनकर की मूल कथा ⇒ ☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मु -झे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

(श्री प्रतुल जी का हृदय से आभार. ऐसी कई सकारात्मक एवं तटस्थ प्रतिक्रियाएं आईं हैं जिन्हें शीघ्र ही साझा करने का मानस है. – हेमन्त बावनकर )

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© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 734 ⇒ सावन को आने दो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सावन को आने दो।)

?अभी अभी # 734 ⇒ आलेख – सावन को आने दो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सावन आए, न आए, जिया जब झूमे सावन है ! सुना है, सावन के महीने में पवन सोर करता है ! इस बार पवन का कोई ज़ोर नहीं चल रहा, पवन सोर नहीं कर रहा।

आषाढ़ चला गया, फिर क्यों सावन रूठ रहा ! सावन के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह गरजता, बरसता आता है। कुछ का कहना है वह झूमकर आता है। सब बकवास है। यहाँ तो सावन सूखा जा रहा है।।

मुझे धीरज रखने को कहा जा रहा है। इस बार सावन मास का आगाज़ गुरु पूर्णिमा से हुआ ! आसमान से गुरु कृपा तो बरस गई, बारिश नहीं हुई। ग्रहण तो चाँद को लगा था, बारिश को तो नहीं। इधर की तरह उधर भी इम्-बैलेंस है। मुम्बई में मानसून आ गया। मुम्बई ने समय पर उसे इंदौर की ओर रि-डायरेक्ट भी कर दिया। अब कोई डंडा लेकर बारिश तो नहीं करवा सकता। कहीं बाढ़ है कहीं सूखा ! वही बात हुई, कहीं भोजन फेंका जा रहा, तो कहीं कोई भूखा सो रहा।

विविध भारती के अनुसार, पड़ गए झूले, सावन ऋतु आई रे ! कुछ शायराना तबीयत के लोग इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं। सावन के महीने में, एक आग सी सीने में, लगती है तो, पी लेता हूँ, दो चार घड़ी जी लेता हूँ।।

यह आग कब बुझेगी ! हम सीने की नहीं, धरती की आग की बात कर रहे हैं। एक हमारे कुमार गंधर्व साहब नहीं मान रहे ! अवधूता, गगन घटा गहरानी रे। किसान को खेत में पानी देना है, खेत सूख रहे हैं। अभी ऐसी नौबत नहीं आई है कि राग मेघ मल्हार गाया जाए।

यहां तक तो ठीक है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती, सावन के आते ही, ये देव क्यों सो जाते हैं ! ऐसा प्रतीत होता है, देव अपना चार्ज, हरी भरी वसुंधरा को सौंप निश्चिंत हो सो जाते हैं। दो जून की रोटी पानी की व्यवस्था हो गई। शादी ब्याह सब ठप पड़े हैं। करने वाले फिर भी कर ही रहे हैं। सावन तो समझदार है, समय पर आ गया ! अब देवों से नहीं, देवराज इंद्र से ही उम्मीद है। समय पर आ ही जाएँगे ! अगर नहीं आए, तो आखिर हम कहाँ जाएँगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 298 – शिवोऽहम् ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 298 शिवोऽहम्… ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

गुरु द्वारा परिचय पूछे जाने पर बाल्यावस्था में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा दिया गया उत्तर निर्वाण षटकम् कहलाया। वेद और वेदांतों का मानो सार है निर्वाण षटकम्। इसका पहला श्लोक कहता है,

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।

न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न ही अहंकार। मैं न श्रवणेंद्रिय (कान) हूँ, न स्वादेंद्रिय (जीभ), न घ्राणेंद्रिय (नाक) न ही दृश्येंद्रिय (आँखें)। मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि, न ही वायु। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

मनुष्य का अपेक्षित अस्तित्व शुद्ध आनंदमय चेतन ही है। आनंद से परमानंद की ओर जाने के लिए, चिदानंद से सच्चिदानंद की ओर जाने के लिए साधन है मनुष्य जीवन।

सर्वसामान्य मान्यता है कि यह यात्रा कठिन है। असामान्य यथार्थ यह  कि यही यात्रा सरल  है।

इस यात्रा को समझने के लिए वेदांतसार का सहारा लेते हैं जो कहता है कि अंत:करण और बहि:करण, इंद्रिय निग्रह के दो प्रकार हैं।  मन, बुद्धि और अहंकार अंत:करण में समाहित हैं। स्वाभाविक है कि अंत:करण की इंद्रियाँ देखी नहीं जा सकतीं, केवल अनुभव की जा सकती हैं। संकल्प- विकल्प की वृत्ति अर्थात मन, निश्चय-निर्णय की वृत्ति अर्थात बुद्धि एवं स्वार्थ-संकुचित भाव की वृत्ति अर्थात अंहकार। इच्छित का हठ करनेवाले मन, संशय निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली बुद्धि और अपने तक सीमित रहनेवाले अहंकार की परिधि में मनुष्य के अस्तित्व को समेटने का प्रयास हास्यास्पद है।

बहि:करण की दस इंद्रियाँ हैं। इनमें से चार इंद्रियों आँख, नाक, कान, जीभ तक मनुष्य जीवन को बांध देना और अधिक हास्यास्पद है।

सनातन दर्शन में जिसे अपरा चेतना कहा गया है, उसमें निर्वाण षटकम् के पहले श्लोक में निर्दिष्ट आकाश, भूमि, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि, अहंकार जैसे स्थूल और सूक्ष्म दोनों तत्व सम्मिलित हैं। अपरा प्रकृति केवल जड़ पदार्थ या शव ही जन सकती है। परा चेतना या परम तत्व या चेतन तत्व या आत्मा का साथ ही उसे चैतन्य कर सकता है, चित्त में आनंद उपजा सकता है, चिदानंद कर सकता है।

आनंद प्राप्ति में दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। दृष्टिकोण में थोड़ा-सा परिवर्तन, जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है। मनुष्य का अहंकार जब उसे भास कराने लगता है कि उसमें सब हैं, तो यह भास, उसे घमंड से चूर कर देता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाए तो वह धन, पद, कीर्ति पाता तो है पर उसके अहंकार से बचा रहता है। वह सबमें खुद को देखने लगता है। सबका दुख, उसका दुख होता है। सबका सुख, उसका सुख होता है। वह ‘मैं’ से ऊपर उठ जाता है।

यूँ विचार करें करें कि जब कोई कहता है ‘मैं’ तो किसे सम्बोधित कर रहा होता है? स्वाभाविक है कि यह यह ‘मैं’ स्थूल रूप से दिखती देह है। तथापि यदि आत्मा न हो, चेतन स्वरूप न हो तो देह तो शव है। शव तो स्वयं को सम्बोधित नहीं कर सकता। चिदानंद चैतन्य, शव को शिव करता है  और जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शब्द सृष्टि में चेतनस्वरूप की उपस्थिति का सत्य, सनातन प्रमाण बन जाते हैं।

इसीलिए कहा गया है, ‘शिवोहम्’,..मैं शिव हूँ..’मैं’ से शव का नहीं शिव का बोध होना चाहिए। यह बोध मानसपटल पर उतर आए तो यात्रा बहुत सरल हो जाती है।

यात्रा सरल हो या जटिल, इसमें अभ्यास की बड़ी भूमिका है। अभ्यास के पहले चरण में निरंतर बोलते, सुनते, गुनते रहिए, ‘शिवोऽहम्।’

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 733 ⇒ भुट्टा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 733 ⇒ आलेख – भुट्टा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

C O R N

फिल्म श्री 420 की यह पहेली तो आपने भी सुनी होगी ;

इचक दाना बिचक दाना,

दाने ऊपर दाना

छज्जे ऊपर लड़की नाचे

लड़का है दीवाना ..

द ग्रेट छलिया, आवारा राजकपूर इसी गीत में आगे फरमाते हैं ;

हरी थी, मन भरी थी

लाख मोती जड़ी थी,

राजा जी के बाग में

दुशाला ओढ़े खड़ी थी।

कच्चे पक्के बाल हैं उसके,

मुखड़ा है सुहाना

बोलो बोलो क्या ?

बुड्ढी, नहीं भुट्टा …

इचक दाना …!!

हमें भी दुशाला ओढ़े यह जीव भुट्टा नहीं भुट्टो नजर आता है, और हमारा देशभक्त दुशासन जाग जाता है। हम इसका चीरहरण शुरू कर देते हैं, दुष्ट हो अथवा दुश्मन उसके चीरहरण के वक्त तो द्वारकाधीश भी लाज बचाने नहीं आते। जब इसका वस्त्र तार तार हो जाता है, तो अंदर से बेनजीर नहीं, जुल्फिकार अली भुट्टो निकल आते हैं, हम उनकी दाढ़ी मूंछ भी नोच लेते हैं, लेकिन उसे कच्चा नहीं चबाते। हमारे भी कुछ संस्कार हैं, हम उसे भूनकर खाते हैं।

पहले तो हिंदुस्तान पाकिस्तान भी एक ही था और भुट्टे की फसल यहां से वहां तक लहराती थी। बाद में भुट्टा हमने रख लिया और भुट्टो पाकिस्तान में चला गया। आज बिलावल भुट्टो का कोई नाम लेने वाला नहीं और हम इस मौसम में हमारे भुट्टे को छोड़ने वाले नहीं।।

पता नहीं, यह देसी भुट्टा कब अमेरिका चला गया और वहां से पढ़ लिखकर अमरीकन भुट्टा बनकर भारत आ गया। हम तो बचपन से ही देसी भुट्टा खाते चले आ रहे हैं, और इधर सुना है, भुट्टे के बच्चे भी पैदा होने लग गए हैं, जिन्हें बेबी कॉर्न कहा जाने लगा है।

सब बड़े घरों के चोंचले हैं।

हमने ना तो कभी बचपन में कॉर्न फ्लेक्स खाया और ना ही स्वीट कॉर्न। हां भुट्टे के कई व्यंजन खाए हैं, मसलन भुट्टे का कीस, भुट्टे की कचोरी और भुट्टे के पकौड़े। भुट्टे के तो खैर लड्डू भी बनते हैं।।

यही दाने सूखने पर मक्का कहलाते हैं। मक्के की रोटी और सरसों का साग में अगर पंजाब की खुशबू है तो मक्के के ढोकलों में गुजरात का स्वाद। जिसे हम मक्के की धानी कहते हैं, उसे अंग्रेजी में पॉपकॉर्न कहते हैं। अगर आईनॉक्स

(INOX) मॉल में फिल्म देखने जाएं, तो नाश्ते के कॉम्बो की कीमत तीन अंकों में होती है। फिर भी लोग पॉपकॉर्न खाते हुए पॉर्न देखना पसंद करते हैं। शरीफ लोग घर पर ही हॉट कॉफी पीते हुए हॉट स्टार और नेटफ्लिक्स से काम चला लेते हैं।

इस बार पानी बाबा सावन में नहीं आए, अब भादो में ककड़ी भुट्टा साथ लाए हैं।

दाने दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है। दांत अगर अच्छे हैं, तो भुट्टे को सेंककर मुंह से खाइए और अगर दांत जवाब देने लग गए हैं तो भुट्टे का कीस, प्रेम से खाइए खिलाइए। अधिक नाजुक मिजाज लोगों के लिए कॉर्न सूप और बेबी कार्न है न।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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