हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९० ☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रतिशोध नहीं परिवर्तन। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९० ☆

☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆

‘ऊंचाई पर पहुँचते हैं वे, जो प्रतिशोध के बजाय परिवर्तन की सोच रखते हैं।’ प्रतिशोध उन्नति के पथ में अवरोधक का कार्य करता है तथा मानसिक उद्वेलन व क्रोध को बढ़ाता है; मन की शांति को मगर की भांति लील जाता है… ऐसे व्यक्ति को कहीं भी कल अथवा चैन नहीं पड़ती। उसका सारा ध्यान विरोधी पक्ष की गतिविधियों पर ही केंद्रित नहीं होता, वह उन्हें नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में मग्न रहता है। उसका मन अनावश्यक उधेड़बुन में उलझा रहता है, क्योंकि उसे अपने दोष व अवगुण नज़र नहीं आते और अन्य सब उसे दोषों व बुराइयों की खान नज़र आते हैं। फलत: उसके लिए उन्नति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं। उन विषम परिस्थितियों में अनायास सिर उठाए कुकुरमुत्ते, हर दिन सिर उठाए उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आते हैं और हर इंसान उसे उपहास अथवा व्यंग्य करता-सा दिखाई पड़ता है।

ऊंचा उठने के लिए पंखों की ज़रूरत पक्षियों को पड़ती है। परंतु मानव जितना विनम्रता से झुकता है; उतना ही ऊपर उठता है। सो! विनम्र व्यक्ति सदैव झुकता है; फूल-फल लगे वृक्षों की डालियों की तरह… और वह सदैव ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर के भाव से मुक्त रहता है। उसे सब मित्र-सम भासते हैं और वह दूसरों में दोष-दर्शन न कर आत्मावलोकन करता है… अपने दोष व गुणों का चिंतन कर वह ख़ुद को बदलने में प्रयासरत रहता है। प्रतिशोध की बजाय परिवर्तन की सोच रखने वाला व्यक्ति सदैव उन्नति के अंतिम शिखर पर पहुंचता है। परंतु इसके लिए आवश्यकता है– अपनी सोच व रुचि बदलने की; नकारात्मकता से मुक्ति पाने की; स्नेह, प्रेम व सौहार्द के दैवीय गुणों को जीवन में धारण करने की; प्राणी-मात्र के हित की कामना करने की; अहं को कोटि शत्रुओं-सम त्यागने की; विनम्रता को जीवन में धारण करने की; संग्रह की प्रवृत्ति को त्याग परमार्थ व परोपकार को अपनाने की; सबके प्रति दया, करुणा और सहानुभूति भाव जाग्रत करने की। यदि मानव उपरोक्त दुष्प्रवृत्तियों को त्याग, सात्विक वृत्तियों को जीवन में धारण कर लेता है, तो संसार की कोई शक्ति उसे पथ-विचलित व परास्त नहीं कर सकती।

इंसान, इंसान को धोखा नहीं देता, बल्कि उम्मीदें धोखा देती हैं; जो वह दूसरों से करता है। इससे  संदेश मिलता है कि हमें दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इंसान ही नहीं, हमारी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं ही हमें धोखा देतीं हैं, जो इंसान दूसरों से करता है। वैसे यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘पैसा उधार दीजिए; आपका पक्का दोस्त भी आपका कट्टर निंदक अर्थात् दुश्मन बन जाएगा।’ सो! उधार देने के पश्चात् भूल जाइए, क्योंकि वह पैसा लौट कर कभी भी नहीं आने वाला है। यदि आप वापसी की उम्मीद रखते हैं, तो यह आपकी ग़लती ही नहीं, मूर्खता है। जिस प्रकार दुनिया से जाने वाले लौट कर नहीं आते; वही स्थिति ऋण के रूप में दिये गये धन की है। यदि वह लौट कर आता भी है, तो वह आपके सबसे प्रिय मित्र भी शत्रु के रूप में सीना ताने खड़ा दिखाई पड़ता है। सो! प्रतिशोध की भावना को त्याग, अपनी सोच व विचारों को बदलें– जैसे एक हाथ से दिए गए दान की खबर, दूसरे हाथ को कदापि नहीं लगनी चाहिए। उसी प्रकार उधार देने के पश्चात् उसे भुला देने में ही सबका मंगल है। सो! जो इंसान अपने हित के बारे में ही नहीं सोचता; वह दूसरों के लिए क्या ख़ाक सोचेगा?

समय परिवर्तनशील है और प्रकृति भी पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी यथा-समय बदलते रहते हैं। सो! मानव को श्रेष्ठ संबंधों को कायम रखने के लिए स्वयं को बदलना होगा। जैसे अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है; उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी मानव के लिए कष्टकारी

होता है। सो! अपनी ‘इच्छाओं पर अंकुश लगाएं और तनाव को दूर भगाएं…दूसरों से उम्मीद मत रखें, क्योंकि वह तनाव का कारण होती हैं।’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है कि ‘आवश्यकता से अधिक सोचना, संचय करना व सेवन करना– दु:ख और अप्रसन्नता का कारण है, जो हमें सोचने पर विवश करता है कि मानव को व्यर्थ के चिंतन से दूर रहना चाहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब वह आत्मचिंतन करता है और दुनियादारी व दोस्तों की भीड़ से दूरी बनाकर रखता है।

वास्तव में दूसरों से अपेक्षा करना हमें अंध-कूप में धकेल देता है, जिससे मानव चाह कर भी बाहर निकल नहीं पाता। वह आजीवन ‘तेरी-मेरी’ में उलझा रहता है तथा ‘लोग क्या कहेंगे’–यह सोचकर अपने हंसते-खेलते जीवन को अग्नि में झोंक देता है। यदि इच्छाएं पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढ़ता है और पूरी होती हैं तो लोभ। सो! उसके लिए हर स्थिति में धैर्य बनाए रखना अपेक्षित है। ‘इच्छाओं को हृदय में अंकुरित मत होने दें, अन्यथा आपके जीवन की खुशियों को ग्रहण लग जाएगा और आप क्रोध व लोभ के भंवर से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। कठिनाई की  स्थिति में केवल आत्मविश्वास ही आपका साथ देता है, इसलिए सदैव उसका दामन थामे रखिए। ‘तुलना के खेल में स्वयं को मत झोंकिए, क्योंकि जहां इसकी शुरुआत होती है, वहां अपनत्व व आनंद समाप्त हो जाता है और कोसों दूर चला जाता है।’ इसलिए जो मिला है, उससे संतोष कीजिए। स्पर्द्धा भाव रखिए, ईर्ष्या भाव नहीं। ख़ुद को बदलिए, क्योंकि जिसने संसार को बदलने की कोशिश की, वह हार गया और जिसने ख़ुद को बदल लिया, वह जीत गया। दूसरों से उम्मीद रखने के भाव का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। सो! उस राह को त्याग दीजिए, जो कांटों से भरी है, क्योंकि दुनिया भर के कांटों को चुनना व दु:खों को मिटाना संभव नहीं। इसलिए उस विचार को समूल नष्ट करने में सबका कल्याण है। इसके साथ ही बीती बातों को भुला देना कारग़र है, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए वर्तमान में जीना सीखिए। अतीत अनुभव है। उससे शिक्षा लीजिए तथा उन ग़लतियों को वर्तमान में मत दोहराएं, अन्यथा आपके भविष्य का अंधकारमय होना निश्चित है।

वैसे तो आजकल लोग अपने सिवाय किसी के बारे में सोचते ही नहीं, क्योंकि वे अपने अहं में इस क़दर मदमस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों का अस्तित्व नगण्य प्रतीत होती है। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘यदि आप किसी से सच्चे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो आप उसके बारे में जो जानते हैं; उस पर विश्वास रखें… न कि जो उसके बारे में सुना है’…  यह कथन कोटिश: सत्य है। आंखों-देखी पर सदैव विश्वास करें, कानों-सुनी पर नहीं, क्योंकि लोगों का काम तो होता है कहना व आलोचना करना; संबंधों में कटुता उत्पन्न करने के लिए इल्ज़ाम लगाना; भला-बुरा कहना व अकारण दोषारोपण करना। इसलिए मानव को व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने, बाह्य आकर्षणों व ऐसे लोगों से सचेत रहने की सीख दी गयी है, क्योंकि ‘बाहर रिश्तों का मेला है/ भीतर हर शख्स अकेला है/ यही ज़िंदगी का झमेला है।’ इसलिए ज़रा संभल कर चलें, क्योंकि तारीफ़ के पुल के नीचे सदैव मतलब की नदी बहती है अर्थात् यह दुनिया पल-पल गिरगिट की भांति रंग बदलती है। लोग आपके सामने तो प्रशंसा के पुल बांधते हैं, परंतु पीछे से फब्तियां कसते हैं; भरपूर निंदा करते हैं और पीठ में छुरा घोंपने से तनिक भी गुरेज़ नहीं करते।

‘इसलिए सच्चे दोस्तों को ढूंढना/ बहुत मुश्किल होता है/ छोड़ना और भी मुश्किल/ और भूल जाना नामुमक़िन।’ सो! मित्रों के प्रति शंका भाव कभी मत रखिए, क्योंकि वे सदैव तुम्हारा हित चाहते हैं। आपको गिरता हुआ देख, आगे बढ़ कर थाम लेते हैं। वास्तव में सच्चा दोस्त वही है, जिससे बात करने में खुशी दोगुनी व दु:ख आधा हो जाए…केवल वो ही अपना है, शेष तो बस दुनिया है अर्थात् दोस्तों पर शक़ करने से बेहतर है… ‘वक्त पर छोड़ दीजिए/ कुछ उलझनों के हल/ बेशक जवाब देर से मिलेंगे/ मगर लाजवाब मिलेंगे।’ समय अपनी गति से चलता है और समय के साथ मुखौटों के पीछे छिपे लोगों का असली चेहरा उजागर अवश्य हो जाता है। सो! यह कथन कोटिश: सत्य है कि ख़ुदा की अदालत में देर है, अंधेर नहीं। अपने विश्वास को डगमगाने मत दें और निराशा का दामन कभी मत थामें। इसलिए ‘यदि सपने सच न हों/ तो रास्ते बदलो/ मुक़ाम नहीं/ पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं/ जड़ नहीं।’ सो! लोगों की बातों पर विश्वास न करें, क्योंकि आजकल लोग समझते कम और समझाते ज़्यादा हैं। तभी तो मामले सुलझते कम, उलझते ज़यादा हैं। दुनिया में कोई भी दूसरे को उन्नति करते देख प्रसन्न नहीं होता। सो! वे उस सीढ़ी को खींचने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं तथा उसे सही राह दर्शाने की मंगल कामना नहीं करते।

इसलिए मानव को अहंनिष्ठ व स्वार्थी लोगों से सचेत व सावधान रहने का संदेश देते हुए कहा गया है, कि ‘घमंड मत कर ऐ!दोस्त!/  सुना ही होगा/ अंगारे राख ही बनते हैं’…जीवन को समझने से पहले मन को समझना आवश्यक है, क्योंकि जीवन और कुछ नहीं, हमारी सोच का साकार रूप है…’जैसी सोच, वैसी क़ायनात और वैसा ही जीवन।’ सो! मानव को प्रतिशोध के भाव को जीवन में दस्तक देने की कभी भी अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि आत्म-परिवर्तन को अपनाना श्रेयस्कर है। सो! मानव को अपनी सोच, अपना व्यवहार, अपना दृष्टिकोण, अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि नज़र का इलाज तो दुनिया में है, नज़रिए का नहीं। ‘नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। नज़रिया बदलो/ दुनिया के लोग ही नहीं/ वक्त के धारे भी बदल जाएंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६८ ⇒ कुबेर खैनी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुबेर खैनी…“।)

?अभी अभी # ७६८ ⇒ आलेख – कुबेर खैनी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुबेर न तो खैनी खाता था, और न ही उसका खैनी का कारखाना था, वह तो स्वयं ही धन का देवता था। जिसे रावण ने अपने यहां बंदी बना लिया हो, उस रावण की लंका, अगर सोने की हो, तो इसमें आश्चर्य कैसा।

आज स्विस बैंक को हम कुबेर का खजाना कह सकते हैं। लेकिन ऐसे कई कुबेर के खजाने हमारे देश में मौजूद हैं। देश के विकास में कुबेर ग्रुप के विकास मालू और किंगफिशर के विजय माल्या के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।।

विजय माल्या को रावण की तरह आप एक आवश्यक बुराई मानकर भुला भी सकते हैं, लेकिन कुबेर खैनी को आप नहीं भुला सकते। खैनी किसी को कुबेर नहीं बनाती, लेकिन जो खैनी बनाते और बेचते हैं, वे किसी धन कुबेर से कम नहीं होते। टीम इंडिया की तरह ही खैनी निर्माताओं की भी एक टीम है, जिसमें मानकचंद, विमल, पान पराग, कमलापसंद, सिमला, गोआ गुटका और रजनीगंधा भी शामिल हैं।

खैनी एक धुआं रहित तम्बाकू उत्पाद है और १०४ मिलियन वयस्कों द्वारा इसका सेवन किया जाता है। वैसे खैनी और कुछ नहीं, तम्बाकू और जलयोजित चूना है। आप चाहें तो इसे तम्बाकू के पान का विकल्प भी कह सकते हैं। जब चूना और तंबाकू को हथेली के बीच रखकर मसला जाता है, तो खैनी तैयार हो जाती है।

भूल जाइए पान बनारस वाला, जब पाउच में ही उपलब्ध है, पान मसाला।।

धूम्रपान निषेध एवं स्वच्छ भारत अभियान का जितना असर सिगरेट और पान की दुकानों पर पड़ा है, उतना असर पान मसाला, गुटका और खैनी पर नहीं पड़ा है। शराब की तुलना में यह कम अधिक बदनाम और सात्विक, शाकाहारी नशा है, जो एक इंसान को दूसरे इंसान के करीब लाता है।

जल्दी पुड़िया निकलती है, और दो अजनबियों के बीच संवाद शुरू हो जाता है।

पान, सुपारी, कत्था चूना और तम्बाकू की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहरी हैं।

जो मजदूर दिन भर मेहनत कर पसीना बहाता है, उसके पसीने में पान, बीड़ी और तम्बाकू की गंध भी शामिल होती है।

हमारे देश में उपभोक्ता नहीं, इन उत्पादों का उत्पादक ही धन कुबेर कहलाता है। कितने भी छापे पड़ जाएं, इनके ठिकानों पर, इनका नोट छापना बंद नहीं हो सकता।।

धर्म और राजनीति के नशे के आगे तो यह नशा फिर भी कुछ नहीं, फिर भी बद अच्छा, बदनाम बुरा। पैसे की बर्बादी और सेहत के साथ खिलवाड़। लेकिन इस उद्योग में जितनी जान है उतनी और कहीं नहीं।

आप नहीं जानते, आज के धन कुबेरों की उड़ान कहां कहां तक है।

आपने कल्याण का नाम तो सुना होगा लेकिन शायद कल्याण मटके का नहीं। अगर अमीरों के लिए शेयर बाजार है तो गरीबों के लिए भी कुबेर २२० मटका सट्टे की व्यवस्था है। जहां सरकारी शराब के ठेके कानूनी हैं, उस देश में नशाबंदी और सस्ते नशों के खिलाफ लोगों को जागरुक करना इतना आसान भी नहीं।

फिल्म स्टार हों या क्रिकेट स्टार, जब करोड़ों रुपए लेकर पान पराग और रजनीगंधा के पाउच खोलते हैं, तो गरीब तो गरीब ही रहता है, लेकिन घी तो धन कुबेरों की थाली में ही जाता है। फिर भी, सही को सही और गलत को गलत तो कहना ही पड़ेगा। बुरी है लत बीड़ी, सिगरेट, शराब, गुटका और खैनी तम्बाकू की, क्योंकि यह राह है बर्बादी की। अगर देश का और अपना विकास चाहते हैं, तो इनसे दूर रहें बिकास बाबू।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६९ ⇒ प्यार और परवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और परवाह…“।)

?अभी अभी # ७६९ ⇒ आलेख – प्यार और परवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार में आह भी है और वाह भी। प्यार भले ही बेपरवाह हो, लेकिन बिना परवाह के भी कभी प्यार पनपा है, पल्लवित हुआ है। परवाह का दूसरा नाम ही प्यार है।

एक मां अपने बच्चे की देखभाल और चिंता करती है, क्या परवरिश शब्द आपको परवाह का करीबी नहीं लगता। परवाह शब्द में क्या कुछ कुछ अपनत्व, ममत्व और जिम्मेदारी का बोध नहीं होता ? प्यार में अपनापन होता है, परायापन नहीं।।

प्यार में जितनी अपेक्षा होती है, उतनी ही शिकायत भी। जहां अपेक्षा होती है, वहीं ना जाने कहां से उपेक्षा भी दबे पांव प्रवेश कर ही जाती है। प्यार उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकता और लापरवाही तो कतई नहीं। देखिए प्यार में शिकायत का अंदाज ;

जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में

जाने तुझको खबर कब होगी …

चोरी डकैती जैसा इल्ज़ाम भी लगा दिया जाता है, जब कोई किसी का दिल लूट ले जाता है। चोर, लुटेरे, डाकू

जैसे विशेषण तो ठीक है, निष्ठुर, ज़ालिम और ना जाने क्या क्या सुनना पड़ता है, प्यार में गिरफ्त एक इंसान को ;

चोरी चोरी आग सी

दिल में लगा के चल दिए

हम तड़फते रह गए

वो मुस्कुराकर चल दिए।।

लेकिन प्यार की कोई हद नहीं होती, प्यार की कोई सीमा नहीं होती। प्यार और परवाह का मूल स्रोत एक ही जगह है। हम सब जानते हैं, महसूस करते हैं, जब हमारे ऊपर उस करुणानिधान की अहैतुक कृपा की वर्षा होती है और

हम सिर्फ इतना ही कह पाते हैं ;

तू प्यार का सागर है

तेरी एक बूंद के प्यासे हम ..

बस यही एक बूंद है जो प्यार को कभी परवाह में बदल देती है तो कभी बलिदान में। प्यार में कोई दुनिया छोड़ देता है तो कोई पूरी दुनिया को कृष्ण की तरह प्यार का संदेश देता नजर आता है। प्यार में जान ली भी जाती है, और दी भी जाती है।

मातृभूमि के लिए जान देने से बढ़कर कोई कुर्बानी नहीं। प्यार में परवाह का यह एक उत्कृष्ट तरीका है।

प्यार शब्द एक है, लेकिन इसके कई अर्थ हैं। एक प्रेमी के लिए अगर यह इश्क है तो मीरा के लिए विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम। प्रकृति हो या पुरुष, नर हो या नारी, सभी प्रेम के आभारी। कहीं प्रेम का स्वरूप उदात्त है तो कहीं जरूरत से अधिक विनम्र और शालीन ;

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा

पर लेकिन फिर भी

ये बता दे के तुझे

प्यार करूं या ना करूं।।

प्यार में अगर आसक्ति है तो देहासक्ति भी, जहां भक्ति है वहीं देशभक्ति भी। जितना प्यार करना जरूरी है, उतना ही जरूरी प्यार बांटना भी। गुलजार प्यार को प्यार ही रहने देना चाहते हैं, कोई नाम नहीं देना चाहते। पर प्यार को परवाह का नाम तो आसानी से दिया जा सकता है। प्यार में बेपरवाही चल सकती है, लापरवाही नहीं। जिसने नहीं की कभी प्यार की परवाह, उसके मुंह से न कभी निकली आह, और न ही कभी वाह। आप प्यार करें या ना करें, लेकिन प्यार की परवाह अवश्य करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३६७ ☆ आलेख – “व्यंग्य साहित्य में जोशी,  परसाई और त्यागी की त्रयी के साम्य” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६७ ☆

?  आलेख – व्यंग्य साहित्य में जोशी,  परसाई और त्यागी की त्रयी के साम्य ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य साहित्य के तीन ऐसे समकालीन प्रारंभिक लेखक हैं जिन्होंने अपनी कलम से समाज की विसंगतियों, राजनीति की धूर्तताओं और व्यक्ति की कमजोरियों को पकड़कर इस ढंग से प्रस्तुत किया कि पाठक हंसते हुए भी भीतर से कटु यथार्थ का अनुभव कर सके। तीनों के लेखन में विषय  लगभग समानांतर हैं, अंतर केवल शैली और प्रस्तुति का है।

कोई समाज की नसों पर उस्तरे की धार रख देता है, तो कोई उसकी चोट को मुस्कान में लपेट देता है। यही कारण है कि जब इनकी कृतियों को साथ पढ़ा जाए तो लगता है मानो अलग-अलग नदी की धाराएं शाश्वत विसंगति के एक ही सागर की ओर बढ़ रही हों।

शरद जोशी की लेखनी व्यंग्य में भाषा की सरलता और आम आदमी के अनुभव से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने एक जगह लिखा कि गांव का आदमी अब शहर को इस तरह देखता है जैसे किसी बड़े रिश्तेदार का घर हो, जहां हमेशा कुछ न कुछ मुफ्त में मिल सकता है। यह टिप्पणी न केवल गांव-शहर के बीच बढ़ते अंतर को उजागर करती है, बल्कि उस मानसिकता पर भी करारा व्यंग्य है जिसमें हम निरंतर सुविधा पाने की आस में जीते हैं। इसी तरह परसाई जब लिखते हैं कि लोकतंत्र का असली खेल चुनाव जीतने के बाद शुरू होता है, तो उनकी दृष्टि सीधे सत्ता और समाज के बीच मौजूद उस फरेब को उजागर करती है जिसे सामान्य जनता अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देती है। रवींद्र त्यागी की शैली यहां भिन्न है, वे आम आदमी की असहायता को हल्की फुल्की हंसी में बांधते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने एक जगह कहा कि आज का आदमी बिजली बिल देखकर इस तरह कांपता है जैसे प्रेम पत्र पत्नी के हाथ में आ गया हो। यह तुलना हास्य से भरपूर है लेकिन साथ ही उस भयावह आर्थिक बोझ पर भी तीखी टिप्पणी है जो आज भी हर घर में मौजूद है।

तीनों लेखकों की सामूहिक समानता यह है कि ये सीधी भाषा में गहरे सच बोल जाते हैं। शरद जोशी के व्यंग्य में अक्सर रोजमर्रा की घटनाएं मिलती हैं। वे जब कहते हैं कि आदमी अब आदमी कम और पद अधिक हो गया है, तो इसमें हमारे समाज की पद-पूजा की विडंबना स्पष्ट होती है। यही बात परसाई और त्यागी भी अलग अंदाज में कहते हैं। परसाई इसे राजनीतिक दृष्टि से खोलते हैं कि नेता के पास नाम कम, पद अधिक होता है और त्यागी इसे पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में दिखाते हैं कि घर के बड़े बूढ़े भी अब केवल अपने पदनाम से सम्मानित होते हैं, उनकी वास्तविकता को कोई याद नहीं करता।

परसाई की धार सबसे तीखी तब दिखती है जब वे कहते हैं कि जो समाज ईमानदार आदमी को मूर्ख मानने लगे वहां की नैतिकता का अंत हो चुका है। यह कथन हमें चौंकाता है और सोचने पर विवश करता है। इसके बरक्स शरद जोशी जब यह लिखते हैं कि आदमी आज इतना समझदार हो गया है कि मूर्ख बनने से डरने लगा है, तो वह भी समाज की इसी मानसिकता का दूसरा पहलू प्रस्तुत करते हैं। वहीं रवींद्र त्यागी इस विडंबना को हल्का कर देते हैं और लिखते हैं कि ईमानदार आदमी अपने जीवन में वही है जो जूते बिना बारिश में चल रहा हो, सब तरफ कीचड़ है और उसे बार-बार पैर धोना पड़ता है। तीनों की दृष्टि एक ही तथ्य को अलग-अलग लेंस से उनके अपने शब्द परिप्रेक्ष्य से पकड़ती है।

व्यंग्यकारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी समयानुकूलता होती है। चुनावी राजनीति हो या भ्रष्टाचार, परिवार की टूटती संरचना हो या विज्ञान और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता, हर विषय पर इन लेखकों ने अपना व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण दिया। शरद जोशी ने जब कहा कि आदमी अब अखबारों के शीर्षकों में ही जीने लगा है, तो उन्होंने मीडिया पर भी तीखा व्यंग्य किया। परसाई ने अखबारों की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए लिखा कि ये वही दर्पण हैं जिनमें चेहरा असली नहीं दिखता बल्कि सजाया हुआ दिखता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने समाचार की बेतुकी प्रवृत्ति पर लिखा कि अब अखबार का सबसे अच्छा हिस्सा विज्ञापन रह गया है, क्योंकि बाकी खबरें तो आदमी का मूड ही बिगाड़ देती हैं।

भ्रष्टाचार पर तीनों की कलम लगभग एक स्वर में उठी। शरद जोशी ने टिप्पणी की कि अब तो रिश्वत लेना भी कला हो गई है, ठीक वैसे जैसे कोई कलाकार ब्रश से चित्र बनाता है। परसाई ने सीधे कहा कि भ्रष्टाचार अब भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है और ईमानदारी इतिहास की वस्तु है। रवींद्र त्यागी ने इसे व्यंग्य में हल्का बनाते हुए लिखा कि ईमानदार अफसर वही है जिसकी नौकरी बस पेंशन तक पहुंच जाए, बाकी सब तो रास्ते में मिलते हुए स्टेशनों पर टिकट कलेक्टर की तरह कुछ न कुछ वसूलते जाते हैं।

व्यक्तिगत जीवन और परिवार पर भी इन तीनों की दृष्टि महत्वपूर्ण है। शरद जोशी ने लिखा कि पति-पत्नी का रिश्ता आजकल बिजली और पंखे जैसा है, दोनों साथ हों तो हवा मिलती है और न हों तो घुटन। परसाई ने परिवार की विडंबना इस रूप में रखी कि हर घर में लोकतंत्र की बातें होती हैं लेकिन घर का बजट तानाशाही से ही चलता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने परिवार की स्थिति का मजाक उड़ाते हुए लिखा कि आजकल घर का सबसे शांत सदस्य टीवी है, बाकी सब तो शोर मचाने में लगे रहते हैं।

इन सब उद्धरणों से स्पष्ट है कि शरद जोशी, परसाई और रवींद्र त्यागी तीनों की रचनात्मक दृष्टि समाज की गहराइयों तक उतरती है। कोई उसे तीखे शब्दों में प्रस्तुत करता है, कोई मुस्कान के पीछे छिपा देता है। तीनों की लेखनी पाठक को हंसाती भी है, चुभोती भी है और सोचने पर मजबूर करती है। विसंगति पर कटाक्ष से प्रहार की यही साहित्यिक समानता उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब हम इन्हें पढ़ते हैं तो लगता है कि तीनों ने मिलकर हमारी सामाजिक चेतना का एक विशाल दर्पण तैयार किया है, जिसमें हम अपनी ही विडंबनाओं को देख सकते हैं।

इस प्रकार शरद जोशी के सहज और चुटीले व्यंग्य, परसाई की गहरी सामाजिक दृष्टि और रवींद्र त्यागी की हल्की फुल्की हास्यपूर्ण शैली मिलकर हिंदी व्यंग्य साहित्य को ऐसी ऊंचाई पर ले गए हैं जहां हंसी और गहराई साथ-साथ बहती है। उनके रचनाओं से उद्धृत साहित्यिक उदाहरण यह दिखाते हैं कि भाषा, शैली और दृष्टिकोण चाहे अलग-अलग क्यों न हों, पर उनका लक्ष्य एक ही है कि समाज आईने में अपना असली चेहरा देख सके। यह साहित्यिक समानता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके लेखन काल में थी और शायद यही उनकी रचनाओं की स्थायित्व की शक्ति है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६७ ⇒ कुछ तो बोलो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुछ तो बोलो…“।)

?अभी अभी # ७६७ ⇒ आलेख – कुछ तो बोलो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ हमसे बात करो !

कुछ लोग बोलने को, बातें करने को तरस जाते हैं।

वे बोलते हैं, तो उन्हें कोई सुनने वाला नहीं होता, वे चाहते हैं, कोई उनसे सुख दुख की बात करें, लेकिन उन्हें कोई बात करने वाला ही नहीं मिलता।

बातों से हमारे जज्बात जुड़े रहते हैं। किसी की बात समझने के लिए, उसके दिल की गहराइयों तक जाना पड़ता है, लेकिन हम इतने खुदगर्ज होते हैं कि जब तक किसी से कोई फायदा मतलब ना हो, हम किसी को घास नहीं डालते। होती है एक उम्र बेफिक्री और नादानी की, जिसमें सब अपने ही नजर आते हैं। किसी से भी दिल खोलकर बातें करने की। ।

बच्चा जब छोटे से बड़ा होने लगता है, तो सबसे पहले चलना और बोलना सीखता है। वह लगातार चलते ही रहना चाहता है, बिना रुके बोलते रहना चाहता है। वह सुनता है, समझता है और छोटे छोटे वाक्य बनाकर अपनी बातें समझाना चाहता है, कभी तुतलाता है, तो कभी हकलाता है।

कितनी प्यारी लगती है, बच्चों की बोली ! है न, है न, है न, के बिना गाड़ी ही स्टार्ट नहीं होती। और एक बार गाड़ी स्टार्ट हुई तो फिर जिंदगी भर रुकने का नाम नहीं लेती। बातों से पेट नहीं भरता, लेकिन बात है कि हजम भी नहीं होती। ।

लेकिन अचानक क्या बात हो जाती है, कि कभी कभी बात ही नहीं बन पाती। कुछ बातें कही नहीं जाती, और कुछ बातें, कहे बिना रहा नहीं जाता। इंसान समझ ही नहीं पाता, जाएं तो जाएं कहां ! समझेगा, कौन यहां, दिल की जुबां।

कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो, हर बात पे रोना आया !

अचानक उसे लगता है, वह बहुत अकेला है। ।

उनको ये शिकायत है कि,

हम कुछ नहीं कहते।

अपनी तो ये आदत है कि

हम कुछ नहीं कहते।

लेकिन ऐसा होता क्यों है, क्योंकि कुछ कहने पे, तूफान उठा लेती है ये दुनिया। अब इस पे कयामत है कि, हम कुछ नहीं कहते।

यूं हसरतों के दाग, मुहब्बत में धो लिए। खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिए। होठों को सी चुके तो जमाने ने यूं कहा, यूं चुप सी क्यूं लगी है, अजी कुछ तो बोलिए। ।

बोलने से इंसान हल्का होता है, जब कोई नहीं सुनता, तो इंसान खुद को ही सुनाता है, कभी खुद से बात करता है, कभी आईने से। कभी रूमाल गीले करता है तो कभी कागज़ रंग देता है। कभी गज़ल, रुबाई, कविता, तो कभी महाकाव्य प्रकट हो जाता है।

हम वही सुनना चाहते हैं जो कर्णप्रिय हो। बच्चों की मीठी बातें, कोयल की कूक, सुर संगीत की तान, किसी का दुखड़ा, किसी की कर्कश आवाज, क्रोध और अपमान भरे शब्द कौन सुनना चाहेगा। ।

और आखिरकार उम्र का एक पड़ाव ऐसा भी आ जाता है कि आदमी अकेला पड़ जाता है ;

साथी ना कोई मंजिल

दीया है न कोई महफिल

चला मुझे लेके ऐ दिल

अकेला कहां …

और वह बेचारा कहता रह जाता है, बीती बातों का कुछ खयाल करो। कुछ तो बोलो, कुछ हमसे बात करो। तुम मुझे यूं भुला न पाओगे। ।

अपनी अपनी सभी कहना चाहते हैं, दूसरों की कोई सुनना नहीं चाहता, फिर भी एक अदृश्य श्रोता है, जो सबकी सुनता भी है, और सबको समझता भी है, बस उसे ही सुनाएं अपना हाले दिल, करें अपनी दास्तान बयान, वह सुनेगा, मन लगाकर सुनेगा, आपके अंदर बैठकर सुनेगा। उसके रहते कभी आप अकेले नहीं, असहाय नहीं, बेचारे नहीं।

सुनता है गुरु ज्ञानी ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४४ – देश-परदेश – ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबन्ध : एक चर्चा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४४ ☆ देश-परदेश – ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबन्ध : एक चर्चा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

“हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है” विज्ञान कहता हैं। हमारे देश में ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगा दी गई हैं। जब से समाचार आया है, हमारे कुछ क्रिकेट के खिलाड़ी, टीवी आर्टिस्ट, फिल्मी हीरो इस के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाने की सोच रहें हैं। उनकी तो रोज़ी रोटी की बात बन आई हैं। कपिल सिब्बल जैसे नामी वकील बिना फीस के उनका केस लड़ने की तैयार हैं। उनको सिर्फ ऑनलाइन गेम्स के मुफ्त वाले पॉइंट्स मिलने चाहिए, ताकि वो भी इस प्रकार के खेलों में भाग ले सकें।

खाद्यदूत स्विगी, जोमैटो आदि के कार्यों में लगे हुए लोगों का काम भी बहुत कम हो जाएगा। ऑनलाइन खेलने वाले गेम में इतने व्यस्त रहते है, कि बेचारे खाना बना ही नहीं पाते हैं। अब ऐसे लोग खुद ही खाना बना कर खा लेंगे। देश की आर्थिक प्रगति तक रुक जाएगी।

टीवी चैनल्स के ऑनलाइन विज्ञापन कम हो जाने से चैनल वालों की आय में गिरावट आना तय हैं। इसकी पूर्ति वो दर्शकों से लिए जाने वाले शुल्क में वृद्धि कर सकते हैं। मोबाइल की बिक्री में बहुत बड़ी गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता हैं।

हमारे एक मित्र ने एक मकान में एयर बी एन बी ( किराए पर कमरा सुविधा) बनाई थी। पूर्व में कुछ लोग उसके कमरे में जुआ खेलते थे, जब से ऑनलाइन खेलों ने गति पकड़ी थी, उसकी किराए की आय बहुत कम हो गई थी, अब वो बहुत खुश है, लोग वापिस उसके कमरों में आकर जुआ खेलेंगे।

शहर के कुछ होटल आसानी से जुआ खेलने के लिए सस्ते कमरे उपलब्ध करवा देते थे, वो लोग भी अब बहुत खुश हैं। पुलिस वालों की परेशानी अवश्य बढ़ जाएगी, क्योंकि इन जुआ खेलने वालों को पकड़ना पड़ेगा, ऑनलाइन खेलने वालों से उनको कोई परेशानी नहीं थी। सरकारी कार्यालयों की वर्किंग में भी जबरदस्त सुधार होने की पूरी संभावना बन रही हैं।

बैंकों को भी अब अधिक नगद राशि हमेशा तैयार रखनी पड़ेगी, ताकि जुआरियों को सप्लाई बनाई रखी जाय। बैंक स्टाफ भी अब फ्रॉड कम कर देगा, क्योंकि उनका स्टाफ भी तो अब ऑनलाइन गेम से वंचित हो जाएगा।

ऑनलाइन गेम में बैंक खाते से ही राशि निकलती थी, जिससे एक नंबर की पूंजी भी कम हो रही थी। जुआ तो दो नंबर की राशि से ही खेला जा सकता है।

उपयोग किया हुआ, घरेलू सामान अब सस्ते में बिका करेगा। जूए में जब पैसे खत्म हो जाते है तो सबसे पहले घर का सामान ही तो बिकता हैं।

मोहल्ले के सुने या आधे बने हुए मकानों में फिर रौनक लौट आएगी। छोटे जुआरी वही बैठ कर जुआ खेल सकेंगे।

आप सबके मन में भी बहुत सारे विचार इस बाबत आ रहें होंगे। यदि उचित समझें तो सांझा कर देवें, इंतजार रहेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६६ ⇒ अक्षर जगत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अक्षर जगत…“।)

?अभी अभी # ७६६ ⇒ आलेख – अक्षर जगत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

“अ” से ही शुरू होती अक्षरों की दुनिया ! अम्बर, अवनि, अग्नि, अखिलेश, अमर, अटल, असीम, अनंत, अक्षत, अनिमेष।

शब्द पहले अक्षर था, शब्द ब्रह्म, और जिसका क्षरण न हो वह कहलाया अक्षर।

ब्रह्म की तरह शब्द सब तरफ व्याप्त है, क्योंकि शब्द अपने आप में अक्षरों का समूह है, अक्षर भी सभी ओर व्याप्त है, लेकिन ब्रह्म की तरह दृष्टिगोचर नहीं होता। ।

ब्रह्म ने अपने आप को व्यक्त किया ! पहले श्रुति, स्मृति और तत्पश्चात पुराण। वेदों की रचना ईश्वर ने की होगी, लेकिन हमारे अक्षर का तो कोई अतीत ही नहीं। एक ॐ से सृष्टि का निर्माण हो जाता है। शब्दातीत अक्षर तो फिर सनातन ही हुआ।

वाणी में वाक्, शब्द अवाक !

अक्षर में बीज, बीजाक्षर मंत्र।

बगुलामुखी, त्रिपुरा-सुंदरी, सौन्दर्य-लहरी, कुंडलिनी माँ जगदम्बे। कहीं भैरव तंत्र तो कहीं जन जन का गायत्री-मंत्र। और सभी मंत्रों में श्रेष्ठ सद्गुरु का गुरु-मंत्र। ।

कितनी संस्कृति, कितनी भाषाएँ, कितने ग्रंथ ! अक्षर ही अक्षर। सौरमंडल में व्याप्त शब्द और गुरुवाणी का सबद। हमने-आपने बोला, वह शब्द, और एक नन्हे अबोध बालक में, परोक्ष रूप से विराजमान परम पिता, लीला रूप धारण कर, कोरे कागद पर छोटी छोटी उँगलियों में कलम पकड़े, मुश्किल से अक्षर- ज्ञान प्राप्त करता हुआ, जगत को यह संदेश देता हुआ, कि ज्ञान की परिणति अज्ञान ही है।

आज वही अक्षर कागज़ कलम का मोहताज नहीं ! एक नया संसार आज हमारी मुट्ठी में है। यह गूगल की अक्षरों की दुनिया है। शब्दों का भंडार है उसके पास ! पर प्रज्ञा नहीं, वाक् नहीं !

यहाँ श्रुति, स्मृति नहीं, सिर्फ मेमोरी है। कोई किसी का गुरु नहीं, कोई किसी का शिष्य नहीं !

केवल गूगल गुरु को दक्षिणा,

डेटा रिचार्ज।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०३ – शिवोऽहम्… (6) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०३ ☆ शिवोऽहम्… (6) ?

आत्मषटकम् के छठे और अंतिम श्लोक में आदिगुरु शंकराचार्य महाराज आत्मपरिचय को पराकाष्ठा पर ले जाते हैं।

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो

विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।

न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं किसी भिन्नता के बिना, किसी रूप अथवा आकार के बिना, हर वस्तु के अंतर्निहित आधार के रूप में हर स्थान पर उपस्थित हूँ। सभी इंद्रियों की पृष्ठभूमि में मैं ही हूँ। न मैं किसी वस्तु से जुड़ा हूँ, न किसी से मुक्त हूँ। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

विचार करें, विवेचन करें तो इन चार पंक्तियों में अनेक विलक्षण आयाम दृष्टिगोचर होते हैं। आत्मरूप स्वयं को समस्त संदेहों से परे घोषित करता है। आत्मरूप एक जैसा और एक समान है। वह निश्चल है, हर स्थिति में अविचल है।

आत्मरूप निराकार है अर्थात  जिसका कोई आकार नहीं है। सिक्के का दूसरा पहलू है कि आत्मरूप किसी भी आकार में ढल सकता है। आत्मरूप सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित है, सर्वव्यापी है। आत्मरूप में न  मुक्ति है, न ही बंधन। वह सदा समता में स्थित है। आत्मरूप किसी वस्तु से जुड़ा नहीं है, साथ ही किसी वस्तु से परे भी नहीं है। वह कहीं नहीं है पर वह है तभी सबकुछ यहीं है।

वस्तुतः मनुष्य स्वयं के आत्मरूप को नहीं जानता और परमात्म को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जगत की इकाई है आत्म। इकाई के बिना दहाई का अस्तित्व नहीं हो सकता। अतः जगत के नियंता से परिचय करने से पूर्व स्वयं से परिचय करना आवश्यक और अनिवार्य है।

मार्ग पर जाते एक साधु ने अपनी परछाई से खेलता बालक देखा। बालक हिलता तो उसकी परछाई हिलती। बालक दौड़ता तो परछाई दौड़ती। बालक उठता-बैठता, जैसा करता स्वाभाविक था कि परछाई की प्रतिक्रिया भी वैसी होती। बालक को आनंद तो आया पर अब वह परछाई को प्राप्त करना का प्रयास करने लगा। वह बार-बार परछाई को पकड़ने का प्रयास करता पर परछाई पकड़ में नहीं आती। हताश बालक रोने लगा। फिर एकाएक जाने क्या हुआ कि बालक ने अपना हाथ अपने सिर पर रख दिया। परछाई का सिर पकड़ में आ गया। बालक तो हँसने लगा पर साधु महाराज रोने लगे।

जाकर बालक के चरणों में अपना माथा टेक दिया। कहा, “गुरुवर, आज तक मैं परमात्म को बाहर खोजता रहा पर आज आत्मरूप का दर्शन करा अपने मुझे मार्ग दिखा दिया।”

आत्मषटकम् मनुष्य को संभ्रम के पार ले जाता है, भीतर के अपरंपार से मिलाता है। अपने प्रकाश का, अपनी ज्योति की साक्षी में दर्शन कराता है।

इसी दर्शन द्वारा आत्मषटकम् से निर्वाणषटकम् की यात्रा पूरी होती है। निर्वाण का अर्थ है, शून्य, निश्चल, शांत, समापन। हरेक स्थान पर स्वयं को पाना पर स्वयं कहीं न होना। मृत्यु तो हरेक की होती है, निर्वाण बिरले ही पाते हैं।

षटकम् के शब्दों को पढ़ना सरल है। इसके शाब्दिक अर्थ को जानना तुलनात्मक रूप से   कठिन। भावार्थ को जानना इससे आगे की यात्रा है,  मीमांसा कर पाने का साहस उससे आगे की कठिन सीढ़ी है पर इन सब से बहुत आगे है आत्मषट्कम् को निर्वाणषटकम् के रूप में अपना लेना। अपना निर्वाण प्राप्त कर लेना। यदि निर्वाण तक पहुँच गए तो शेष जीवन में अशेष क्या रह जाएगा? ब्रह्मांड के अशेष तक पहुँचने का एक ही माध्यम है, दृष्टि में शिव को उतारना, सृष्टि में शिव को निहारना और कह उठना, शिवोऽहम्…!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६५ ⇒ अंगड़ाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगड़ाई…“।)

?अभी अभी # ७६५ ⇒ आलेख – अंगड़ाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°°π Pandiculation π°°°

करवट बदली,

अंगड़ाई ली

सोया हिंदुस्तान उठा ….

हिंदुस्तान तो कब का उठकर और जागकर विकास के रास्ते विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है, और इधर हम एक सूर्यवंशी हैं, जो सूरज से आँखें मिलाने के बजाय बिस्तर पर पड़े पड़े अंगड़ाई ले रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हम इतने आलसी हैं कि अंगड़ाई लेने में भी हमें जोर आता हैं। काश, हमारी अंगड़ाई भी कोई और ले लेता, तो हम तो हाथ पाँव भी नहीं हिलाते।

लेकिन वह कहावत है न, “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”, इसलिए उबासी लेने से अंगड़ाई लेने तक का काम भी हमें खुद ही करना पड़ता है। वह भी अगर पत्नी गर्मागर्म चाय का प्याला लेकर, सर पर खड़ी नहीं हो जाती, तो हमारे अंग का कोई भी भाग अंगड़ाई में भाग नहीं लेता। ।

हमारी पत्नी की आंख हम पर गड़ी हुई है और हमारी आँखें उनके कोमल हाथों में मौजूद चाय के प्याले पर टिकी हुई है। सुबह सुबह जो चाय के लिए नटे, उसका पुण्य घटे। हमने भी आखिर प्याला उनके हाथों से लेकर मुंह को लगा ही लिया। चाय की चुस्की में ऐसा क्या है, कि बदन की सुस्ती तुरंत हवा हो जाती है। रात भर के अलसाए अंग का एकाएक कायाकल्प हो जाता है।

शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया है अंगड़ाई जो आलस्य या थकावट के कारण होती है और जिसके फलस्वरूप सारा शरीर कुछ पलों के लिए ऐंठ, तन या फैल जाता है।

अंग्रेजी में इसके लिए सही शब्द “पैंडिक्यूलेशन” है। इसके साथ जम्हाई भी आ सकती है और नहीं भी। इसे “विशेष रूप से धड़ और हाथ-पैरों में खिंचाव और अकड़न (जैसे थकान और नींद आने पर या नींद से जागने के बाद)” के रूप में परिभाषित किया गया है। ।

शरीर सबका टूटता है, अंगड़ाई सब लेते हैं।

हमने तो कुत्ते बिल्लियों तक को अंगड़ाई लेते देखा है। बच्चे जब तक पूरी तरह खेलकर थकते नहीं, सोते नहीं और एक बार सो गए, तो पूरी नींद लेने के बाद ही उठते हैं।

वे इतनी जल्दी बिस्तर नहीं छोड़ सकते।

वैसे शायर लोग अंगड़ाई को हुस्न और जवानी से जोड़ देते हैं। बिना अंगड़ाई के कोई हसीना जवान नहीं होती। उम्र की एक दहलीज पर अंगड़ाई ली जाती है, और जवानी की ओर कदम उठ जाता है। अंगड़ाई, शायरों की जुबानी ;

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की

तुम क्या समझो,

तुम क्या जानो

बात मेरी तन्हाई की

– क़तील शिफ़ाई

अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

-निज़ाम रामपुरी

सितारे सो गए अंगड़ाई लेकर

कि अफ़्साने का अंजाम आ रहा था

– अब्दुल हमीद ‘अदम’

कौन अंगड़ाई ले रहा है ‘अदम’

दो जहाँ लड़खड़ाए जाते हैं

-अब्दुल हमीद ‘अदम’

सुना गईं थीं जिन्हें तेरी मुल्तफ़ित नज़रें

वो दर्द जाग उठे फिर से

ले के अंगड़ाई

-साहिर लुधियानवी

सुबह का वक्त है,

हमने अपने अलसाए

बदन पर आँख गड़ाई

देखा, वह भी ले रहा है

पहले जम्हाई

और फिर अंगड़ाई। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६४ ⇒ पेट पालना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेट पालना…“।)

?अभी अभी # ७६४  ⇒ आलेख – पेट पालना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°°° •• Pet Parenting •• °°°

एक आम आदमी केवल अपना ही पेट पाल सकता है और अपने परिवार का ही भरण पोषण कर सकता है। हम चार भाई, चार बहन और माता पिता समेत कुल १० प्राणी थे, यानी इलेवन में सिर्फ एक कम। लेकिन वह हमारा जमाना था। हम दो हमारे दो, से जो परिवार कल्याण शुरू हुआ है, वह आज लिव इन रिलेशन पर भी जाकर शायद ही रुके।

हमने तो अपने आपको सिंगल चाइल्ड तक ही सीमित कर लिया, लेकिन फिर भी हमारे आम और खास परिचित इतने उदारवादी निकले कि उनका आंकड़ा तीन चार तक तो पहुंच ही गया।

दो लगातार कन्याओं के जन्म के पश्चात् एक वंश चलाने वाले तीसरे पुत्र की चाह किसे नहीं होती, लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे क्या किया जा सकता है, जब तीसरी बार भी उनके घर जुड़वा कन्या रत्न ही किलकारी मार रहे हों।।

जो पैदा करता है, वही दाने पानी की भी व्यवस्था करता है। हम अपने पेट को पापी नहीं कहते, फिर भी यह भी कड़वा सच है कि आज की इस दुनिया में पेट पालना इतना आसान भी नहीं। होते हैं कुछ विरले, जो अपने साथ अन्य लोगों के भी पेट का ख्याल रखते हैं। जिन्हें अपना पेट पालने में कठिनाई होती है, उनके लिए सरकार मुफ्त राशन, मुफ्त चिकित्सा और मुफ्त रसोई गैस की भी व्यवस्था कर रही है। हद होती है इंसानियत की। अब क्या आप भगवान से मिलोगे।

एक समय वह भी था, जब लोग अपने सदस्य साथ अन्य पशु पक्षियों को भी पाल लेते थे। भारत कृषि प्रधान देश रहा है। जहां खेती बाड़ी होगी, वहां गाय ढोर भी होंगे ही। खेती के लिए बैल और घर के दूध घी के लिए गाय भैंस भी पाले जाते थे, जिनके रहने के लिए घर के पास ही मवेशियों के लिए बाड़े बनाए जाते थे जहां कटी फसल और कृषि संबंधित उपकरण भी सुरक्षित रखे जाते थे।।

वैसे तो इस पेट को पापी पेट भी कहा गया है, क्योंकि यह कभी तृप्त होता ही नहीं। रोज भरो और रोज खाली, आखिर पापी ही हुआ ना। हम तो सिर्फ अपना ही पेट पालते हैं, होते हैं कुछ लोग ऐसे भी सज्जन जो अपने साथ अन्य मूक प्राणियों का पेट भी पालते हैं।

इन प्राणियों में जलचर, थलचर और नभचर भी हो सकते हैं।

एक शब्द पेट (pet) अंग्रेजी का भी होता है, जिसका भी अर्थ पालतू ही होता है। यह पेट, पालतू कुत्ता, बिल्ली, भी हो सकता है और तोता मैना, कबूतर अथवा लव बर्ड्स भी। वैसे पालने वाले तो घोड़ा, हाथी और आस्तीन में सांप भी पाल सकते हैं। आप इन सबको पशु प्रेमी कह सकते हैं। ये अपने पेट पालने के साथ पेट्स (pets) का भी पालन पोषण करते हैं।।

वैसे तो मेरी बिल्ली कभी मुझसे म्याऊँ नहीं करती, फिर भी इंसान के टुकड़ों पर पलने वाले कुछ कुत्ते भौंकने के साथ साथ काटने भी लगते हैं। शायद या तो उन्हें अंग्रेजी नहीं आती, अथवा उन्होंने अंग्रेजी की यह कहावत नहीं सुनी;

“Barking dogs soldem bite.” अजी solden छोड़िए, ये जंगली कुत्ते तो इतना सॉलिड काटते हैं, कि खुद तो इधर पहले पागल हो जाते हैं, और उधर जिसे काटा, वह पानी भी नहीं मांगता।

दिल्ली के कुत्तों की दहशत की आवाज तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई, और अब प्रशासन कुत्तों के पीछे पड़ा है, और जन आक्रोश पशु प्रेमियों के खिलाफ। मैने कभी किसी मूक प्राणी को नहीं पाला। होते हैं कुछ लोग, जो बकरी को तो पाल लेते हैं, और बकरे की बली चढ़ा देते हैं। मुर्गी पालते हैं और उसका अंडा ही नहीं, मुर्गा भी खा जाते हैं।

मछली पालन तो किसी का व्यवसाय है, रोजी रोटी है। वाह रे इंसान, तू कितना महान। वाकई, तू pet भी पालता है, और इस पापी पेट को भी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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