हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आग ? ?

दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।

बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।

वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।

लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।

वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९८ ☆ लघुकथा – “जानूमेट” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९८ ☆

?  आलेख – लघुकथा – जानूमेट ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।

तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।

पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।

नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।

डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।

जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।

अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।

धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।

कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।

एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।

शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७ – बाल कहानी – जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बाल कहानी — जबान फिसली की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप  मुझे जानते हो? मैं कौन हूं?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ”  आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को  जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो , ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि  मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं  कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे  शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या  ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ”  जबान ने कहा, ”  आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहीं नहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा,  ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है ,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया . उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९१ – सिकंदर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– सिकंदर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — सिकंदर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैं सिकंदर को कहानियों से जानता हूँ। आज उसके लिए लिख रहा हूँ। तुम पराजित योद्धा के रूप में पीछे लौटे हो सिकंदर। तुम जहाँ खड़े हो यह तुम्हारी विजय की जमीन नहीं है। इस जमीन को पता नहीं था तुम किस इरादे से आगे बढ़े थे। अब पता है तुम क्यों वापस आए हो। फिर भी यह तुम्हें स्वीकार करेगी। जमीन होती ही ऐसी है। तुम हो, कोई और हो, हर किसी के लिए यह दो गज की जमीन सुरक्षित रखती है।
रामदेव धुरंधर

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 – 01 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?

एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।

-कहिए।

-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?

-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।

-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?

-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।

-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।

-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।

इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४२ – लघुकथा – ए.सी. बस ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४२ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।

आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।

अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।

बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।

नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।

अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।

हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।

आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।

रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९६ ☆ कथा कहानी – “बर्फ में धूप” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९६ ☆

?  कथा – कहानी – बर्फ में धूप ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था, एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।

उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव ‘चमकपुर’ की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार, उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था, नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।

पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं, एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।

लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक ‘यूथ क्लब’ ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता “कनाडा में तो बहुत पैसा है न?”, “हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो। ” उस ‘अपनेपन’ की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।

एक दिन, स्थानीय ‘शब्द साधना साहित्य परिषद’ के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।

ओमप्रकाश ने कहा “डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक ‘राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान’ शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है। “

राजिंदर ने खुश होकर कहा, “ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?”

ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले “बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है… तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है। “

राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया। यह पहला झटका नहीं था। कई ‘संस्थाओं’ के फोन आ चुके थे। उनके ‘विदेशी’ होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक ‘लेन-देन’ में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।

और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।

अनजान आवाज़, “नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं ‘काव्य भारती’ से बोल रहा हूँ। आपको ‘वैश्विक पंजाबी रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च…”

राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक ‘विभक्ति’ उनके भीतर घर कर गई।

कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। “प्रारब्ध, ” उन्होंने धीरे से कहा, “यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है। “

उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर… उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है। उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।

और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, ‘डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद’ नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।

डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी, वे वसीयत कर चुके थे।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मेहनत की रोटी – भाग – २ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

☆ मेहनत की रोटी – भाग – २ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

श्री सचिन वसंत पाटील

‘हमें आप जैसे पढ़े लिखे उम्दा व्यक्ति की ही आवश्यकता थी। हम आपको खुशी-खुशी नौकरी पर रख लेते। लेकिन हमने अभी-अभी दो नए लोगों को नियुक्त किया है। देखते हैं, आगे चलकर जैसे ही हमें आप जैसे व्यक्ति की जरुरत महसूस होगी तो हम आपको तुरन्त सूचित कर देंगे’…… ऐसे ही कई मीठे शहद में घुले चिकने-चुपडे जवाब सुनकर विनायक बौखला गया। कितनों के नकारते शब्दों को पचना लिखा था किस्मत में कौन जाने! 

उसके बचपन के लँगोटी-यार और कॉलेज के ज़माने के शहर एवं दूसरे गांवों के दोस्त, सब उससे कब के दूर हो गए थे। मुश्किल समय में और जरुरत के वक्त कोई उसे अपने पास खड़ा तक नहीं करता था। उसके जिन दोस्तों विश्वास था कि अंगूर का बाग लगाने के बाद विनायक को बहुत धन मिलेगा और वे उसे स्वार्थवश खाना खिलाते रहते थे, अब वे भी उससे कतराने लगे थे और दूरी बनाए रखने लगे थे। एक दिन विनायक की घरवाली ने उससे कहा,

“यह सब यूँ ही कितने दिन चलेगा?” 

“मैं भी क्या करूँ, देख तो रहा हूँ।” 

“ऐसा महज देखने से नहीं चलेगा। बच्चों की परीक्षाएं सर पर हैं| उनकी फीस भरनी है। रसोई का नमक मिर्च मसाला सब कुछ खत्म हो गया है …”

“जैसे मुझे यह सब मालूम ही नहीं!…..”

“पड़ोस के राजमिस्त्री चचा कहा रहे थे, ‘मेरे साथ, मिस्त्री के हाथ के नीचे काम करने को तैयार हो तो बता! तीन सौ रुपये रोजनदारी मिलेगी’।

“बड़ी सयानी बन गई हो! बी.कॉम. किया है मैंने…… राजमिस्त्री के हाथ के नीचे काम करूँ, यह कह रही हो?”

“तो फिर क्या करना ऐसे आड़े वक्त पर? आए वक्त के मुताबिक अपना ब्योहार नहीं बदलोगे क्या? जैसी जैसी हवा बहे, वैसे वैसे अपना रुख पलटते आना चाहिए……”

“अरी भागवान! मेरी शिक्षा तो देख! कहाँ तक पढ़ा हूँ!”

“आग लगे ऐसी शिक्षा को, क्या करूँ उसका? क्या मेरा चूल्हा जल पाएगा उस डिगरी के कागज से? पैसे के आगे आपकी शिक्षा की क्या खाक कीमत है?”  

विनायक के पास इस सटीक सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसे राजमिस्त्री के अधीन काम करना अपनी बेइज्जती लगती, और फिर खुद की शिक्षा देखते हुए यह काम बड़ा ही शर्मनाक लगता! कभी-कभी वह ताव में आकर कहता रहता, “शेर भूख से मर जाता है, लेकिन क्या कभी घास को मुंह लगाता है?”

विनायक की घरवाली रोज़मर्रा की पैसों की तंगी से बेहद क्लांत हो चुकी थी। उसने आजतक किसी तरह हर विपदा झेलते हुए यहाँ तक गृहस्थी धक्का मार मार कर खींचने का यथाशक्ति प्रयास किया है! लेकिन अब यहाँ से आगे घसीटना असंभव लग रहा है। उसका मानना ​​है कि अब घर परिवार के वास्ते उसके पति को जो भी काम मिले, उसे कर लेना चाहिए।

नौकरी की तलाश में विनायक कई कारखानों, फाउंड्री (ढलाईघर), शोरूम, गोदाम एवं पुराने यारों के घरों के चक्कर लगाते लगाते थका हारा सांझ को घर लौटता था। हर शाम, उसकी पत्नी और बच्चे उदास चेहरों के साथ दरवाजे के चौखट से टिककर उसका इंतजार करते थे। आज की शाम हमारे जीवन में आशा की किरण लेकर आएगी। बाबा ने कहीं से पैसे लाए होंगे, हमारे लिए कुछ खाने की चीजें लाए होंगे, इसी उम्मीद से बच्चे उसकी बाट जोहते रहते। लेकिन हताशा में डूबकर पैरों को घसीटते आते विनायक गली के छोर पर देखकर पत्नी और बच्चे समझ जाते कि उसके पास अभी भी उनका पेट पालने के लिए कोई नौकरी नहीं है। पैसों का भी कोई ठिकाना नहीं है। पर उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकलता था। जो भी छोटा बड़ा निवाला रसोई में होता उसे मिल बांट कर पानी के साथ पेट में धकेलते।

इस विपन्नावस्था में विनायक को एक भयानक लत लग गई। वह हर सुबह-शाम टपरी पर जाने लगा। उसने टपरीवाले मालिक से दोस्ती करते हुए उसके साथ मटका जुआ खेलना शुरू कर दिया। उसकी सोच अब पक्की हो चुकी थी कि झटपट पैसा कमाने का यही एकमात्र तरीका था। खेती और नौकरी से तो यह कई गुना बेहतर था। आज की महंगाई के दौर में, एक रुपये के बदले साठ रुपये मटके के सिवाय ऐसे झटपट मिलने वाले और कोई सौदेबाज हैं ही नहीं। और तिसपर इसमें जोखिम भी कम है। अगर मैं दस रुपये दांव पर लगाऊँ, तो उसमें से छह तो निश्चित रूप से वापस मिल ही जाएंगे। अब तो विनायक का दृढ़ मत हो गया कि, मटका जुए के आलावा उसके पास अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालने का कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन विनायक को इस बात का रत्ती भर भी एहसास नहीं हुआ कि, यह तो अमीर बनने की उम्मीद में धीरे-धीरे गरीब होने का एक खतरनाक और गलत रास्ता था। हताशा के घेरे से बाहर निकलने की आशा में वह आंकड़ों के जाल में उलझ कर दांव पर दांव लगाए जा रहा था, इस उम्मीद में कि उसे चार पैसे मिल जाएंगे।

पहले दिन जब उसने मटके के आंकड़ों पर पैसे लगाए तब उसे दस रुपये की लागत पर सवा सौ रुपये मिले। यह देखकर उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। आई हुई सारी धनराशि उसने फिर आंकड़ों पर लगा दी। अब तो दिन रात वह आंकड़ों के बारे में ही सोचता रहता। उसके दिलो-दिमाग में आंकड़े इस कदर धूम मचाने लगे कि उनके आलावा उसे कुछ और नजर ही नहीं आता। सुबह सुबह उठते ही एक ही विचार का भूत उसपर सवार रहता कि आज ओपन क्या आएगा? शाम के ढलते ही क्लोज क्या आया यह देखकर ही वह निद्राधीन होता। उसकी जिंदगी अब इस ‘ओपन’ और ‘क्लोज’ के छोटेसे दायरे में कैद हो कर रह गई थी।      

आजकल वह घर पर कभी कभार ही आता था। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा था। बुरी संगत के चक्कर में आकर अब तो उसने शराब पीना भी शुरू कर दिया था। वह घर में कभी कभार ही किसी से बातचीत करता; जब पत्नी की किचकिच शुरू हो जाती तो चुपचाप टपरी की ओर भागता। जब आंकड़ों पर लगाने के लिए यहाँ -वहाँ से पैसे मिलना बंद हो जाते, तो वह घर की चीजें चुराकर बेच देता था। इस कारण घर का सामान हौले हौले कम होता चला गया। पत्नी को शक के घेरे ने जकड लिया। घर में भी बात-बात पर कहा-सुनी होने लगी। नतीजन उसने घर आना ही बंद कर दिया। बस, फटी जेब के पैसे खत्म हो जाते, तभी वह घर आने लगा, पत्नी से झगड़ते हुए पैसे मांगने लगा। बच्चे मुंह लटकाए हैरान होकर अपने बाप की यह घिनौनी बहादुरी देखने पर मजबूर हो जाते। उसकी पत्नी के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया। पड़ोसी भी देते-देते थक चुके थे। रोज के मरे पर कौन आंसू बहाए?

बालों का जंगल बिखरा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई! इस दयनीय अवस्था में विनायक गाँव में निरुद्देश भटकने लगा। उसके दिमाग में आंकड़ों के सिवा कोई अन्य विचार घुस नहीं पा रहा था। मानों वह बाढ़ के गहरे पानी में गोते लगा रहा था। वह एक ऐसे विकराल बवंडर में फँस गया था, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था। तेज तूफान उसके चारों ओर घूम रहा था। वह अपने होशोहवास पूरी तरह खो चुका था। आंकड़ों की मजबूत श्रृंखलाओं की भारी पकड़ में वह कैद हो गया था।   

आंकड़ा निश्चित रूप से लगने के बारे में एकाध सही और अधिकतर गलत अनुमान लगाए जाते। सुबह उठते ही नाई का चेहरा देखना, या फिर किसी अखबार में छपे कार्टून की चौखट के अंदर एक गुप्त आंकड़ा दिखाई देना, जो अधिकांश रूप से सही बैठने का अंदेशा होता। बारम्बार हिसाब में आनेवाला एक ही आंकड़ा, सड़क पर दिखाई देनेवाले कारों के नम्बर, उन्हें जोड़कर आने वाला भाग्यशाली अंक, और ऐसे कितने ही आंकड़ा लगाने वालों के बेहिसाब तर्क-वितर्क लगते रहते।

विनायक का लगाया आंकड़ा कभी-कभी सही नहीं बैठता था। इस हार के ग़म को भुलाने हेतु वह खूब छककर शराब पीता था और कभी कभार नंबर लग जाने पर जश्न मनाने के लिए भी शराब ही पीता था। मतलब यह कि, शराब उसके हर मर्ज की दवा थी। अधिकतर मौकों पर उसका आंकड़ा ठीक बैठता नहीं था। फिर पिछले दिन की हार की भरपाई करने हेतु वह दोबारा ही नहीं बल्कि बारम्बार खेलता और उतनी ही बार हारता। आंकड़ों के मायाजाल ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया था।

घरवाली उसके व्यवहार से बेहद तंग आ चुकी थी। बच्चे बेचैन और व्याकुल थे। कौन जाने उनकी सुचारु रूप से चलती सुन्दर गृहस्थी को किस मनहूस की नजर लग गई थी। कुछ ही दिनों में, काम से गए हुए एक बेकार, व्यसनी शराबी के रूप में उसकी बदनामी पूरे गाँव में फैल गई। कोई भी उसे अपने जूतों के पास तक फटकने नहीं देता था।

बीच-बीच में कभी कभार जब उसे होश आता, तो वह काम ढूंढने लगता। लेकिन एक पक्के शराबी और जुआरी आदमी को कौन काम देगा? जिसकी फूटी कौड़ी की भी आमदनी न हो, और तो और, जिसके मटके का और दारू का खर्चा सर पर चढ़ा हो! आखिरकार, उसने अपना खुद का घर बेचने का फैसला किया। सोचा, रहेंगे किसी सस्ते किराये के घर में या फिर गांव के बाहर की झोपड़पट्टी में। परन्तु यहाँ भी उसकी किस्मत रूठी हुई थी। घर बेचने में कई दिक्कतें आने लगीं। उसके चचेरे चचा ने होशियारी दिखाते हुए खेत के साथ साथ उसका घर तक अपने नाम करवा लिया था। 

एक दिन उसके चचेरे चचा ने उसे घर से भगा दिया। उसने विनायक को धमकाते हुए कहा, “यह घर मेरा है। फिर कभी इस घर में कदम रखने की हिम्मत की, तो टाँग तोड़ कर रख दूंगा”; ऐसा कहते हुए उसके टूटे फूटे बर्तन बाहर फेंक दिए। अब तो विनायक बीवी-बच्चों समेत सड़क पर आ गया। उसने इस पर विरोध जताने की कोशिश की, लेकिन उसकी ताकत काफी कम थी। अपने चचेरे चचा के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करना जरुरी था। लेकिन उसके पास पैसे थे ही नहीं। गांव का सरपंच भी चचा के पक्ष में हो गया था। ग्रामसेवक (‘ग्राम विकास अधिकारी’) भी उसकी बात तक सुनने को तैयार नहीं था। उसे गांव का कोई आदमी दरवाजे पर खड़े रहने नहीं दे रहा था। भला एक शराबी की बात कौन सुनता? कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने के लिए पैसा नहीं, ऊपर से अदालती मामले में बहुत समय लगना तय था। घर बेचकर पैसे जुटाने दूर रहे, उससे अधिक तो मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही थी। जितना सरदर्द बढ़ रहा था, उतनी शराब की लत भी बढ़ती जा रही थी।

घर हाथ से निकल गया, इसलिए बीवी-बच्चे बेघर हो गए। हताशा की पराकाष्ठा हो गई थी। उसकी पत्नी ने अपना सर फोड़ फोड़ कर लहू लुहान कर लिया। बच्चों ने रो रो कर बवाल मचाया। आखिर विनायक ने गांव के बाहर एक बड़ी ही गलिच्छ झुग्गी बस्ती में एक कमरा किराए पर लिया। पत्नी ने टूटे फूटे बर्तनों को जोड़कर किसी तरह अपनी गृहस्थी जोड़ी।

लेकिन इतनी बर्बादी होने पर भी विनायक का सिर अभी भी ठिकाने पर नहीं था। एक दिन वह अपनी पत्नी के गले का हार खींच कर ले गया। उसे सुनार को बेचने पर कुछ पैसे मिले। ‘आर या पार’ इस अंतिम विचार के साथ उसने वे सारे पैसे मटके में लगा दिए। उसे पूरा यकीन था कि आज मेरा आंकड़ा जरूर लगेगा। उसके एक ‘मटकेबाज’ दोस्त ने उसे यह ‘सलाह’ जो दी थी! अब वह नतीजे का इंतजार करने लगा।

दरअसल, आज वह बिलकुल ही नशे में नहीं था। उसकी बेचैनी चरमसीमा पर थी। उसने अपनी पत्नी के सुहाग का अंतिम गहना तक तुड़वा कर जुए में लगा दिया था। अगर आज आंकड़ा लगा तो लाखों रुपये मिलेंगे। अपनी सम्पूर्ण निर्धनता दूर हो जावेगी। बच्चों की परीक्षा की फीस, उनके कपड़े-लत्ते, घर का बाजार-हाट, घरवाली को साडी, और मैं भी टकाटक बनकर रहूँगा। ऐसा लिबास पहनूंगा कि, गांव वाले मुझे पहचान तक नहीं पाएंगे। कमीज पर नए फैशन का जैकेट, पैरों में चमकीले पॉलिश से दमकते चमड़े के भारी जूते……..  ऐसा बहुत कुछ तय कर रखा था विनायक ने! अब तो बस जेब गर्म होने की देरी थी! …..लेकिन ये तमाम सपने तब सच होंगे, जब आंकड़ा ठीक से बैठेगा……..  और अगर न लगा तो? उसका दिमाग ठंडा पड गया। उस डरावनी अवस्था के बारे में वह सोचना तक नहीं चाहता था…….. उसकी समूची दुनिया का विध्वंस हो जायेगा।  

दूसरे दिन की सुबह का उजाला कुछ मटमैला ही लग रहा था……

वह पूरी रात करवटें बदलता रहा। सुबह होते ही बिना एक भी मिनट गंवाए सबसे पहले वह टपरी पर चला गया। बेक़रार दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं। मानों उनकी गिनती लगाते लगाते उसने ललचाई नज़रों से आंकड़े को देखा। वह पूरी तरह से सदमे से हिल गया, जैसे तेजी से बहते पानी के भंवर में उसकी जान फँस गई हो। उसे ऐसा लग रहा था मानों उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही है। उसने लागत का पैसा पूरी तरह खो दिया था। उसके सारे अनुमान बुरी तरह गलत साबित हो गए थे। एक एक पाई आंकड़े के चक्कर में डूब गई थी। उसका पूरा भरोसा आज के आंकडे पर टिका था, वहीं ध्वस्त हो गया। वह गलितगात्र होकर जमीन में धंसता जा रहा था। वह कुछ भी सोचने की स्थिति में नहीं था। उसका दिलोदिमाग सुन्न पड गया। कितने सुनहरे सपने देखे थे, वे सब चुटकी भर में चूर चूर हो गए थे… सोच सोच कर माथा घूमने लगा, अब घरवाली और बच्चों को कैसे मुंह दिखाऊं? उनका भरण-पोषण कैसे करूँ?

वह तंद्रा से जागा। नाक की सीध में दिखने वाली सड़क पर चलने लगा। उसे अपने गाँव से कहीं दूर भाग जाने की इच्छा थी। अनमनासा होकर वह काफी देर तक अकेला चलता रहा। नंगे पैर…

दोपहर बीत गई। शाम तक ढलने लगी। एक के बाद एक गाँव पीछे छूटते गए। लेकिन रास्ता खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। उसके पेट में खाने का एक दाना तक नहीं था। यूँ ही निरुद्देश चलते-चलते उसके हाथ-पैर थकावट के मारे चूर चूर हो गए थे। उससे एक भी कदम चला नहीं जा रहा था, सो वह सड़क के किनारे बैठ गया। दूर कहीं से ट्रेन की आवाज़ आ रही थी। अनायास ही उसके मन में बिजली की तरह एक विचार कौंधा! अभी, इसी वक्त रेल की पटरी पर अपने आप को झोंक दूँ और इस बदकिस्मत जीवन का अंत कर दूँ।  आखिरकार ऐसे जीते जी मरने का क्या फायदा? रोज रोज तिल-तिल से मरने की बजाय एक ही बार मरना कहीं बेहतर है। हाय री मेरी फूटी किस्मत, जो मुझे ढंग से अपनी गृहस्थी चलानी नहीं आती, बच्चों की परीक्षा की फीस तक मैं भर नहीं पाता! और तो और बीवी के सामने अब यह मनहूस चेहरा लेकर कैसे जाऊँ? इससे तो बेहतर है कि इस व्यर्थ जीवन का अंत ही कर दूँ…….

उसके मन में छाया अँधेरा चहुँ ओर फैले अंधःकार को और भी गहराई प्रदान कर रहा था। दसों दिशाओं को आगोश में लेते अंधियारे में सर्प के समान सोयी रेल की पटरियों पर वह लेट गया। दिनभर सूरज की गर्मी और रेल गाड़ियों के आवागमन की तपिश को झेलती रेल की पटरियाँ अच्छी खासी गर्म हो गई थीं। उसे अपनी गर्दन पर उन पटरियों का गर्म स्पर्श महसूस हो रहा था। तभी एक विशालकाय रेलगाड़ी अपने विस्तीर्ण बाहु फैलाती उसीकी दिशा में बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। रेलगाड़ी की आवाज़ एकदम नज़दीक आती जा रही थी। उसकी छाती की धड़कन उसी रफ़्तार से बढ़ती जा रही थी। एक पल के लिए मानों समूचा विश्व स्तब्ध हो उठा। उसका सम्पूर्ण शरीर उसे एक खोखले कंकाल की भांति प्रतीत हो रहा था। ….. रेलगाड़ी का धड़धड़ करता कम्पन……… बस कुछ पल और…… मृत्युदूत के पाश उसकी गर्दन को जकड़ने ही वाले थे…… भयग्रस्त होकर उसने अपनी आँखें मूँद लीं और एक ही क्षण में, उसकी आँखों के सामने चीथड़ों में लिपटी तस्वीरें कौंध गईं…हमारा घर…मेरी सोने जैसी अनमोल गृहस्थी…घरवाली और मेरे दो नन्हे-नन्हे लाडले बच्चे… मेरे जाने के बाद लावारिस होकर रह जाएंगे। वे गली-गली भटकते भीख मांगने पर मजबूर हो जाएंगे।     

अचानक घबराकर वह रेल की पटरियों से एक तरफ हट गया मानों बिजली का जोरदार झटका लगा हो! कुछ ही क्षणों में, उस विकराल रेलगाड़ी का ढाँचा कर्णकर्कश सीटी बजाकर खड़खड़ाता हुआ उसके नजदीक से गुज़र गया। 

वह कुछ देर तक यूँ ही आंखें मूँदकर सर को हाथों में थामे बैठा रहा। ट्रेन की धड़धड़ाती गूँज तो धीरे धीरे धीमी हो कर थम गई, लेकिन उसकी दिल की तेज धड़कन अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी…….. अपने घुटनों के बीच गर्दन दबाकर वह काफी देर तक अंधियारे में ख़ामोशी से बैठा रहा… मन के कोने में आशा का दीपक जलाए वह कुछ दृढ़ निश्चय करते हुए उठ खड़ा हुआ। अब वह घर की ओर चल पड़ा……. उसकी चाल में आत्मविश्वास था… वह हर कदम के साथ अपने सुनहरे भविष्य की दशा और दिशा माप रहा था।

वह सुबह जल्दी उठ गया। उसने घर के छत पर रखी कुदाल ढूंढकर निकाली। नहाते समय ही उसने उसे पानी में सलीक़े से धोकर साफ किया। आज उसने जो रास्ता चुना था, वह मेहनत से भरपूर था, उसके हर कदम पर कांटे बिछे थे। लेकिन वह ऐसा रास्ता था जिसपर चलने से उसके पसीने की एक एक बून्द में मोती जैसा निखार आने वाला था। लोग उपहास करेंगे तो क्या? चार दिन हंसेंगे, लेकिन ईमानदारी से कष्ट झेलने वाले हाथों को किसका डर होगा भला?

विनायक अपनी कुदाल कंधे पर रखकर राजमिस्त्री चचा के घर की ओर चल पड़ा। अब वह अपनी मेहनत से कमाई रूखी सूखी रोटी का मीठा स्वाद चखना चाहता था। उसकी पत्नी उसमें आए इस बदलाव से मन ही मन आनंदित होकर दूर जाती हुई उसकी स्वाभिमान से तनी हुई सुघड़ आकृति को अपलक निहारते जा रही थी। उसे भी बड़ी बेसब्री से इंतजार था आज की सुहानी रंगभरी शाम का!   

– समाप्त –

मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील

संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ? ?

ये सीढ़ियाँ जादुई हैं पर खड़ी, सपाट, ऊँची, अनेक जगह ख़तरनाक ढंग से टूटी-फूटी। इन पर चढ़ना आसान नहीं है। कुल जमा सौ के लगभग हैं। सारी सीढ़ियों का तो पता नहीं पर प्राचीन ग्रंथों, साधना और अब तक के अनुसंधानों से पता चला है कि 11वीं से 20वीं सीढ़ी के बीच एक दरवाज़ा है। यह दरवाज़ा एक गलियारे में खुलता है जो धन-संपदा से भरा है। इसे ठेलकर भीतर जानेवाले की कई पीढ़ियाँ अकूत संपदा की स्वामी बनी रहती हैं।

20वीं से  35वीं सीढ़ी के बीच कोई दरवाज़ा है जो सत्ता के गलियारे में खुलता है। इसे खोलनेवाला सत्ता काबिज करता है और टिकाये रखता है।

साधना के परिणाम बताते हैं कि 35वीं से 50वीं सीढ़ी के बीच भी एक दरवाज़ा है जो मान- सम्मान के गलियारे में पहुँचाता है। यहाँ आने के लिए त्याग, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम अनिवार्य हैं। यदा-कदा कोई बिरला ही पहुँचा है यहाँ तक”…, नियति ने मनुष्यों से अपना संवाद समाप्त किया और सीढ़ियों की ओर बढ़ चली। मनुष्यों में सीढियाँ चढ़ने की होड़ लग गई।

आँकड़े बताते हैं कि 91प्रतिशत मनुष्य 11वीं से 20वीं सीढ़ी के बीच भटक रहे हैं। ज़्यादातर दम तोड़ चुके। अलबत्ता कुछ को दरवाज़ा मिल चुका, कुछ का भटकाव जारी है। कुबेर का दरवाज़ा उत्सव मना रहा है।

8 प्रतिशत अधिक महत्वाकांक्षी निकले। वे 20वीं से 35वीं सीढ़ी के बीच अपनी नियति तलाश रहे हैं। दरवाज़े की खोज में वे लोक-लाज, नीति सब तज चुके। सत्ता की दहलीज़ श्रृंगार कर रही है। शिकार के पहले सत्ता, श्रृंगार करती है। 

1 प्रतिशत लोग 35 से  50 के बीच की सीढ़ियों पर आ पहुँचे हैं। वे उजले लोग हैं। उनके मन का एक हिस्सा उजला है, याने एक हिस्सा स्याह भी है। उजले के साथ इस अपूर्व ऊँचाई पर आकर स्याह गदगद है।

संख्या पूरी हो चुकी। 101वीं सीढ़ी पर सदियों से उपेक्षित पड़े मोक्षद्वार को इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

*

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मेहनत की रोटी – भाग – १ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

☆ मेहनत की रोटी – भाग – १ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

श्री सचिन वसंत पाटील

पिछले दो-तीन वर्षों की तरह इस साल भी अंगूर के बाग ने धोखा दिया। ऐन मौके पर उसपर डाउनी रोग (एक फफूंद जनित गंभीर बीमारी) की बुरी नजर पड़ी और उस कारण बाग का आधा हिस्सा पूरी तरह बर्बाद हो गया। सोचा था, किसी भी हालत में प्रकार कम से कम लग लागत का ही खर्चा वसूल होगा, पर वह भी होने से रहा। तीन हज़ार बक्से अंगूर बनने की आशा थी, लेकिन घटकर आधे से भी कम हाथ में आये, बस हज़ार बारह सौ! फसल कटाई के मौसम में घनघोर बारिश ने घेर लिया। वहीं बेमौसम बरसाती बादलों का जमावड़ा किसी बिन बुलाए मेहमान की भांति आ टपका। फिर फसल की कीमतें गिर गईं। सारा कारोबार मुसीबतों के कीचड़ में धंस गया। बस इसमें व्यापारियों की चांदी हो गई, और क्या कहें!

संपन्न पाटील घराने में पले बड़े विनायक ने चार साल पहले अंगूर का बाग लगाया था। पहला वर्ष तो बाग के सयानी होने में बीत गया। दूसरे साल कुछ खास ज्यादा विकास नहीं हो पाया। सोचा बेलें तो अभी छोटी ही हैं, उनकी जड़ें अभी जमीन में ठीक से जमी नहीं होंगी। तीसरे साल बेमौसम बरसात के चलते छंटाई पर कुठाराघात हो गया। मौसम का मिजाज गर्म हो गया। तिसपर किसी बीमारी ने वायरस के रूप में बेलों को जकड लिया। देखते ही देखते सारा बाग-बगीचा हाथ से निकल गया। ऊपर रोग के लिए इस्तेमाल की गई दवाइयों के पचास हज़ार रुपये का खर्चा सर पर सवार हो गया। विडम्बना यह है कि बगीचा लगाने के लिए उठाया बैंक का कर्ज वैसे का वैसा बना हुआ है……

लेकिन अब बैंकवालों ने भी तकाजा लगा रखा है। वे भी कब तक चुप रहेंगे? यह चौथा वर्ष है, बैंक का कर्ज गले तक पहुँच गया है। उम्मीद थी कि इस वर्ष कुछ तो हाथ में आएगा। लेकिन यह डाउनी रोग कराल काल का रूप लेकर आ धमका! आशा की किरणें निराशा के गहन अंधकार में लुप्त हो गईं। मेरी सारी उम्मीदों पर पर पानी फेर गईं। अग्नि चक्र के फेरे में जल रहा हूँ, हर साल यहीं विपदा झेलते हुए। बारम्बार उसी अग्निदाह का सामना करता हूँ, न तो मरता हूँ, न ही इस दुष्ट चक्र से छुटकारा पा रहा हूँ। बस झुलसना है। मेरा छोड़ दूँ, पर इस तपन में बिना कारण घरवाले झुलस रहे हैं। मेरे उन नन्हे नन्हे मासूम बच्चों क्या दोष है? क्या एक गरीब किसान के परिवार में पैदा होना उनकी गलती है? 

अब तो बाग को निकाल बाहर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं नजर आ रहा है। लेकिन इस बाग को हटाकर क्या करूँगा? बैंक का ढाई-तीन लाख का कर्ज बाकी है, वे उसे ऐसे ही थोड़े न छोड़ेंगे! दूसरी फसल उगाऊं भी तो इतनी आमदनी आएगी नहीं, जो कर्ज से मुक्ति दिलाएगी| कर्ज तो चुकाना दूर रहा, पहले नयी फसल बोने के लिए मेरे पास पैसा कहाँ से आएगा? तिसपर पापी पेट का रोजमर्रा का सवाल भी तो है। काश ईश्वर ने हम गरीबों को यह पेट ही नहीं दिया होता, तो कितना ही अच्छा होता। इस पेट के कुँए में जितना भी डालो, दुष्ट की भूख ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती। हर सुबह भूख की बेचैनी के साथ ही उगती है। यह क्षुधा-शांति कैसे की जाय? और फिर इस पहाड़ जैसे चढ़े कर्ज का क्या? इस भीषण अग्निचक्र से छुटकारा पाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा, कोई उपाय ढूंढना ही होगा…

देखा जाए तो करीबन चार साल पहले विनायक की आर्थिक स्थिति ठीक ठाक थी। दो ढाई एकड़ सिंचित जमीन। हर वर्ष कारखाने तक जाती हुई एक-डेढ़ एकड़ गन्ने की उम्दा फसल और दो दुधारू जनावर। घरखर्चे के बाद भी हाथ में पर्याप्त धन बचता था। जिंदगी टकाटक चल रही थी। लेकिन न जाने उसके दिमाग में कहाँ से सनक पैदा हुई और उसने अंगूर का बाग लगाने का फैसला किया। उसने तासगांव मणेराजुरी का चक्कर लगाया और वहाँ एक अंगूर के बाग का मुआयना करके आया। वहाँ उगे अंगूरों की गुणवत्ता तो निर्यात करने योग्य थी और आने वाली आय भरपूर थी। उसके आंकड़े सुनते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सोचा बस एक साल ऐसी फसल पैदा हो, तो सारी विपदा मिट जावेगी। और पांच दस साल की आय में अगली पीढ़ी घर बैठे खा पी लेगी। इसी आस के रंगीन सपने को बुनने हुए उसने अंगूर की बाग़ लगाने का फैसला किया। घर की दुधारू गायें बेच दीं, और तो और बैंक से कर्ज लिया, यहाँ-वहाँ से थोड़े बहुत पैसे उधार लिए और विनायक अंगूर के बगीचे का मालिक बन बैठा!    

पहले दो वर्षों तक, उसे कर्ज का मामला मामूली लगा। उसे उम्मीद थी कि अगर अंगूर की फसल एकाध साल भी अच्छे से पक गई, तो पूरा ऋण चुकता हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे, राई के पहाड़ की तरह, ब्याज दर बढ़ती गई और अब महीने दर महीने चक्रवृद्धि ब्याज को अपने अंदर समाहित करता कर्ज का आंकड़ा एक पहाड़ की भांति उसकी छाती पर जम कर बैठ गया। कर्ज़ जम कर बढ़ता रहा, परन्तु बाग-बगीचे का ताल-मेल बिलकुल भी नहीं जम रहा था। तीन साल बीत गए, पर एक भी फसल हाथ नहीं लगी। वह हाथ पर हाथ धरे ख़ामोशी से घर पर बैठा रहता| उसकी पत्नी उसे धीरज देते हुए समझाने की कोशिश करती रहती थी।

“कुछ न कुछ तो होगा, आप चिंता मत कीजिये।”

“चिंता न करूँ तो क्या करूँ? सब के बाग़ बगीचे देखो कैसे फल -फूल रहे हैं! हमारे ही गले में यह भारीभरकम पत्थर क्यों लटका है भला बताओ?”

“होता है ऐसा कभी कभी … हमारे ही भाग फूटे हैं तो हालात कैसे सुधरेंगे?”

इस प्रकार पति-पत्नी में बातचीत होती रहती थी।

लेकिन इस साल घर का पूरा सफाया हो गया। उसने बची खुची पाई पाई बगीचे में छिड़कने वाली कीटनाशक दवाइयों पर खर्च कर दी। लगा था कि ऐसा करने से कम से कम इस साल तो बगीचा अच्छा उगेगा और वह बैंक के कर्ज से मुक्त हो जाएगा। लेकिन इस साल भी अंगूर के बाग ने पूरी तरह धोखा दिया। बैंक वाले उसकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ज़ब्ती का नोटिस जारी कर दिया। इसके पहले भी दो-तीन बार उनको समझा बुझाकर उसने गाड़ी वापस भिजवा दी थी। लेकिन अब उसके सामने अंतिम विकल्प बचा था। विनायक ने बहुत सोचविचार कर चचेरे चचा को १२ वर्ष के लिए पट्टेदारी के नियमानुसार खेती करने के लिए देने का फैसला किया। अग्रिम भुगतान मिलने पर खेत में उगाए अनाज पर उसका कोई हक़ नहीं होगा, ऐसा समझौता हुआ। चचा से मिले पैसों से उसने बैंक का सारा कर्ज चुका दिया। तब कहीं जाकर कर्जे से मुक्ति मिली।

अस्थायी रूप से कर्ज़ का भुगतान तो हो गया था। लेकिन वक्त बेवक्त के लिए संजोयी जमा-पूंजी खत्म होती जा रही थी। मल्कियत की जमीन और जनावर अब नहीं रहे सो, एक पाई तक की आमदनी की गुंजाईश कहाँ थी? बारह साल बीत गए थे, जमीन से किसी भी प्रकार अब नाता टूट चूका था। दुधारू जानवरों को बेच अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी। अब आगे चलकर क्या किया जाए, यह एक ही प्रश्न विनायक के समक्ष राक्षस का रूप धारण किये मुंह फाड़ कर खड़ा था।

अगर दिहाड़ी (दैनिक) मजदूरी पर कुदाल-फावड़ा लेकर काम करूँ तो वह मुझे मुझसे बाप-जनम में असंभव है, और तिसपर लोग क्या कहेंगे? कल का अंगूरबाग का मालिक आज किसी और का गुलाम! विनायक के दिमाग में यह बात बैठ ही नहीं सकती थी। वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिस के कारण कोई उसपर उंगली उठाता और भरे चौराहे पर वह उपहास का विषय बनता। वह पहले से ही घोर निराशा की गर्त में डूबा हुआ था। और अब उसके मन को एक प्रश्न ही कुरेदता जा रहा था कि, अब आगे क्या करे। धीरे-धीरे घर में खाने-पीने की सारी चीजों का संचय खत्म होने लगा। बेचारी पत्नी किसी तरह कमसे कम खर्चे में गुजारा कर रही थी। लेकिन अगर एक पैसे की भी आमदनी न हो तो यह कंजूसी कितने दिनों तक गृहस्थी का बोझ उठा पायेगी? अगर किसी पानी की टंकी में हमने पानी इकठ्ठा कर रखा है, और उसमें बिना एक भी बून्द पानी जोड़े, उस संचयित पानी को पंप से रोज ही निकालते चले गए, तो वह एक न एक दिन खाली होकर रहेगी।

किसी ज़माने में स्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके विनायक ने सोचा, “अगर खेती नहीं चलती, तो चलो नौकरी में किस्मत आजमाकर देखूं। यानि, नौकरी बाग-बगीचे जैसी बिना भरोसे की नहीं। बारिश हुई, नहीं हुई, फसल को कीड़ा लगा, दाम गिरे बाजार में… ऐसी कोई तनावगस्त परिस्थिति उभरेगी नहीं। पहली तारीख हुई नहीं कि मैं मालिक से कहूंगा, “भैया, मेरी तनखा दे दो!” और काम हो जावेगा। भले ही आय थोड़ी कम होगी, परन्तु यह लेन १०० प्रतिशत गारंटीशुदा रहेगा। इसी सोचविचार के साथ विनायक ने नौकरी करने का फैसला किया।

फिर शुरू हुआ शहर के चक्कर काटने का सिलसिला। कहीं न कहीं से पुरानी पहचान के जरिये सिफारिश की वह भरसक कोशिश करता रहता। उसने कार्यालयों, ऋण संस्थानों, स्कूलों, आदि में क्लर्क (लिपिक) या चपरासी तक की नौकरी पाने के अथक प्रयास जारी रखे। परन्तु यहाँ भी उसका दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। हर जगह मानों पहले से ही तय की गई अस्वीकृति और अनावश्यक तथा अप्रिय अपमानजनक व्यवहार उसके झोले में अनायास ही गिरता। 

क्रमशः

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मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील

संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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