हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा वक्त सबका बाप है।
गली, मोहल्ले, गाँव से लेकर शहर, शहर से लेकर देश, और देश से लेकर दुनिया भर में चौधरियों की भरमार है। यह परम्परा भिन्न-भिन्न नामों और उपाधियों से आदिम काल से चली आ रही है और आगत में भी अनवरत रूप से गतिमान रहेगी।
चौधरी अपने को सर्व शक्तिमान मानता है और कई मायनों में होता भी है। उसके चारों ओर चमचों की फ़ौज लगी रहती है। वह प्रशंसा का भूखा होता है। बड़ी-बड़ी डींगें हाँकना उसकी आदत में शुमार होता है। अपनी ताकत और दौलत के बूते पर ज़रूरतमंद और कमजोर व्यक्तियों पर अपनी हुकूमत क़ायम रखता है। अपने जायज़-नाजायज फ़ैसलों को थोपकर अपना रौब गाँठता है। अपने अधीनों पर जुल्म और ज़्यादतियाँ ढहाता है और बेचारे अधीनस्थ चुपचाप बर्दाश्त करते रहते है।
इधर पिछली सदी में दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली चौधरी के समक्ष छोटे, पर खुद्दार और मजबूत इरादों के धनी चौधरी ने चुनौती पेश कर दी है। उनके बीच ऐसी ज़बरदस्त भिड़ंत हुई कि उसकी बड़े चौधरी की हेकड़ी निकल गई। वह पगला कर गली के गुंडों की तरह धमकियों पर उतर आया। कल तक जो दुनिया में लगी युद्धाग्नि को बुझाने के हवाई दावे किया करता था, आज वही दुनिया को आग के हवाले करने की बातें कर रहा है।
पर इन दिनों हवा में ग़ज़ब का शोर है। लोगों का कहना है कि बड़बोले चौधरी का भेजा फिर गया है। दुनिया को अपनी उँगली पर नचाना चाहता है, पर वह भूल गया कि वक्त के दरिए का ढेर सारा पानी बह चुका है। वह जिन देशों के लोगों को गँवार और जंगली समझा करता था उनमें आत्म स्वाभिमान जाग उठा है। वे अपने पैरों पर उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने सहमति में सिर हिलाने, हाथ ऊपर उठाने और जी-हजूरी करने से साफ़-साफ मना कर दिया है।
कदाचित मद में अँधा चौधरी भूल गया कि दुनिया में किसी भी महाबली की चौधाराहट हमेशा के लिए नहीं रही है। वक्त का कोई बाप नहीं है। वक्त सबका बाप है। और जब वक्त अपने पर आता है, तो बड़े से बड़े राजे-महाराजे, अर्जुन जैसे धनुर्धरों, भीम जैसे महाबाहो, सिकंदरों, बादशाहों की पलक झपकते खटिया खड़ी कर देता है।… तो सुनो! मिस्टर चौधरी फिर तुम किस देश की मूली हो।
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला “सबसे खास: हमारे बॉस”)
☆ कथा-कहानी # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
शीर्षक भ्रमित करता है क्योंकि हमारे माइंडसेट इस तरह बन गये हैं कि व्यक्ति या पद के हमारे आकलन हमारे अनुभवों और अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि हमें जो मिला, शायद योग्यता से कम मिला है या फिर ज़रूरत से ज्यादा पा लिया है।कम मिलने पर तो हम निष्पक्षता की गुहार लगाते हुये उत्तरदायित्व रूपी टोपी से उस सर (Head) को सुशोभित करने में रत्ती भर संकोच नहीं करते जो हमारा हेड या बॉस होता है पर अपेक्षा और योग्यता से अधिक मिलने का पूरा श्रेय खुद ही हड़पने में संकोच नहीं करते।पर मान लीजिए कि बॉस की जगह ईश्वर हो तो फिर क्या होता है।जीवन, सिर्फ ऑफिस की चारदीवारों से घिरा नहीं होता, पाना और खोना, कम या ज्यादा, जैकपॉट या सेट बेक सब कुछ ही तो जीवन के अंग ही हैं जिसमें शैशव काल से लेकर वृद्धावस्था तक हर पायदान के परिणाम ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है।
अगर मिल गया तो बहुत अच्छा और अगर नहीं मिला तो ये ईश्वर की इच्छा। “जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए “हमारी सनातन काल से चली आ रही जीवनशैली है जो शायद बदलते समय के साथ धूमिल पड़ रही है क्योंकि अधिकांश परिवारों का अपने नौनिहालों के लिए लक्ष्य 95% से शुरू हो रहा है।हम लोगों के सेवाकाल में भी वार्षिक मूल्यांकन में 95% पाना, याने “पदोन्नत” होने का अवसर गंवाना माना जाता रहा था।पर ये नंबर गेम बहुत कुछ छीन लेता है और शुरु हो जाती है रेटरेस। शुक्र है कि ये नंबर गेम हम सभी के जीवनकाल के लिए ईश्वरीय विधान नहीं है। प्रकृति ने सभी को सुनहले पल के उपहार दिये हैं।बहुत कुछ देख पाते हैं पर बहुत कुछ छूट भी जाता है, जो छूट जाता है वो शायद फोकस कहीं और होने से या फिर सर के ऊपर से गुजर जाने जैसा ही होता है।हर पल अपने आप में महत्वपूर्ण होता है जिसमें जीवन पाने से लेकर जीवन खोने तक की संभावनाएं छुपी रहती हैं, “जिंदगी का सफर है ये ऐसा सफर, कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं।है ये ऐसी डगर, चलते हैं सब मगर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं”।
जीवन चलने का नाम है तो इसी तरह हम सभी और हम सभी के बॉस और उनकी भी बॉस भी इसी परंपरा का पालन करते रहेंगे याने यह श्रंखला जारी रहेगी।
☆ कथा-कहानी – पहाड़ों में बसा एक परिवार☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
पहाड़ों की गोद में बसा, एक गुमनाम गाँव, जहाँ सुबह की किरणें सबसे पहले पेड़ों की चोटियों को छूती थीं और शाम को सूरज क्षितिज के पीछे धीरे-धीरे ओझल हो जाता था। यहाँ की हवा में एक अनूठी मिठास थी, और मिट्टी में मेहनत की सौंधी सुगंध।
इसी गाँव में, नरपत का परिवार रहता था, जिसकी जड़ें जमीन में गहरी थीं। नरपत के चार बच्चे थे—हीरा, शेर, बाग, और रूप। चारों अपनी-अपनी खूबियों के साथ, मानो एक ही पेड़ की चार मज़बूत शाखाएँ थीं।
सबसे बड़ी, हीरा, का विवाह रूप के साथ हुआ। उनके घर में हँसी-खुशी का माहौल तब और बढ़ गया, जब उनके तीन बच्चे—इंदर, गोपाल, और कुंती—आँगन में खेलने लगे।
हमारी कहानी नरपत के बड़े बेटे शेर की है, जिनकी आँखें सपनों से भरी थीं और कंधों पर परिवार की ज़िम्मेदारी थी। शेर ने अपनी जीवन संगिनी, नंदी का हाथ थामा।
नंदी, दीवान और खिमूली की बेटी थीं, और उनके परिवार में सात भाई-बहन थे—प्रेम, मोहन, चतुर, चंदन, स्वरूप, और चना। नंदी ने इस नए घर में आकर, अपने सरल स्वभाव और स्नेह से एक नई रोशनी भर दी।
🌱नंदी का मायका
नंदी के मायके की कहानी भी कम रोचक नहीं थी। उनके बड़े भाई प्रेम ने गोविंदी से विवाह किया, और उनके यहाँ तीन बेटियों ने जन्म लिया—महेशी, उमा, और उषा।
दूसरे भाई, मोहन, की पत्नी सरस्वती हैं, और उनके चार बच्चे हैं—गोदावरी, सुकुमार, शिव नारायण, और हरेंद्र।
तीसरे भाई, चतुर, ने प्रतिमा के साथ घर बसाया, और उनके पाँच बच्चे हैं—प्रकाश, देवी, लक्ष्मण, धरम पाल, और नर्मदा।
चौथे भाई, चंदन, का विवाह मधुलिका से हुआ, और उनके यहाँ देवेंद्र, इंदिरा, रेखा और अजय ने जन्म लिया।
पाँचवे भाई, स्वरूप, की पत्नी राधा हैं, और उनके तीन बच्चे हैं—संजीव, मंजू, और नरेश। नंदी की बहन चना का विवाह कुंदन के साथ हुआ, और उनके पाँच बच्चे हैं—मधी, चंदन, गोविंदी, सुरेंद्र, और नंदन।
🌱शेर की गृहस्थी
समय के साथ, शेर और नंदी की गृहस्थी बढ़ती गई। उनके घर में हँसी-ठिठोली और चहल-पहल रहने लगी। उनके सात बच्चे हुए—जसवंत, जगत, महेंद्र, गोविंदी, लीला, सरस्वती, और दान। हर बच्चा अपनी अनूठी पहचान के साथ आया, मानो जीवन के अलग-अलग रंग हों।
सबसे बड़े जसवंत ने उम्मेद की बेटी शोभा से विवाह किया। दोनों के जीवन में खुशियों का आगमन हुआ जब उन्हें नितिन और नितेश का आशीर्वाद मिला।
दूसरे बेटे, जगत, ने राधिका को अपना जीवनसाथी बनाया। राधिका के पिता बाग और माता सरस्वती हैं। जगत और राधिका के यहाँ अनुराग ने जन्म लिया, जो उनके परिवार की आँखों का तारा बना।
🌱राधिका का मायका
राधिका का मायका भी रिश्तों से भरा हुआ है। उनके तीन भाई-बहन हैं—रजनी, कुलदीप, और प्रदीप।
सबसे बड़ी, रजनी, का विवाह गजेंद्र के साथ हुआ और उनके दो बच्चे हैं—भानु और श्रृष्टि।
उनके भाई कुलदीप की पत्नी का नाम ज्योति है, जिनके माता-पिता राम और भगवती थे। कुलदीप और ज्योति के दो बच्चे हुए—प्रियंका और गौरव।
राधिका की बहन दीपा का विवाह महेंद्र के साथ हुआ, और उनके तीन बच्चे थे—मेघना, अभिनव और करण।
🌱अनुराग और स्नेहा
अनुराग की जीवन संगिनी स्नेहा बनीं, जो कमल और अंजू की बेटी हैं। स्नेहा का एक भाई भी है, जिसका नाम है रोहन।
उनके पिता कमल का परिवार भी भरा-पूरा है। उनके माता-पिता शिवरतन और सीता थे, और उनके चार भाई-बहन हैं—बिनोद, नरेश, बबीता, और दिनेश।
स्नेहा की माँ अंजू के माता-पिता ओम प्रकाश और लक्ष्मी थे, और उनके भी चार भाई-बहन हैं—पवन, आशा, वेद, और शशि।
🌱शेर की गृहस्थी का विस्तार
तीसरे बेटे, महेंद्र, ने जयश्री के साथ घर बसाया। उनके यहाँ रितु के रूप में एक नन्ही परी आई, जिसने घर के आँगन में किलकारियों की गूँज भर दी।
शेर की तीन बेटियाँ हैं—गोविंदी, लीला, और सरस्वती। तीनों का विवाह बड़े ही धूमधाम से हुआ।
गोविंदी का विवाह प्रह्लाद के साथ हुआ। प्रह्लाद नंदन के बेटे थे। इनके तीन बच्चे हुए—नीरज, दिवस, और विभा।
लीला ने आनंद का हाथ थामा, जो गंगा के बेटे हैं। उनके घर दो बेटियों ने जन्म लिया—भाग्यश्री और तनुश्री।
सरस्वती का विवाह रजत से हुआ, जिनके माता-पिता खीम और भागीरथी थे। सरस्वती और रजत की भी दो बेटियां हैं—गीतिका और युथिका।
सबसे छोटे बेटे, दान, ने भगवती देवी को अपना हमसफ़र बनाया। भगवती, धर्म और लक्ष्मी की बेटी हैं। उनके यहाँ वीरेंद्र ने जन्म लिया, जो इस पीढ़ी की सबसे छोटी कड़ी बनकर आया।
🌱बाग और रूप
नरपत के सबसे छोटे बेटे रूप ने देबुली देवी से विवाह किया। उनके यहाँ बच्चों की किलकारियाँ गूँजती रहती थीं, और उनके दस बच्चे हैं—कौशल्या, चंदन, राधा, शंकर, महेंद्र, लीला, कुसुम, लक्ष्मी, पुष्पा, और गुड़िया।
तीसरे बेटे बाग ने खिमूली देवी को अपनी जीवनसंगिनी बनाया। उनके घर पाँच बच्चों ने जन्म लिया—भूपाल, बहादुर, इंदर, जोगुली, और नंदन।
इस प्रकार, नरपत का परिवार एक विशाल वटवृक्ष की तरह बढ़ता गया, जिसकी जड़ें तो पहाड़ों की मिट्टी में थीं, पर शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं। हर शादी, हर नया जन्म, और हर रिश्ता इस कहानी में एक नया अध्याय जोड़ता गया, जो आज भी सुनाया जाता है।
यह कहानी सिर्फ नामों और रिश्तों की नहीं है, बल्कि उस प्रेम, त्याग और आपसी सहयोग की है, जिसने इस परिवार को एक मजबूत धागे में बाँध रखा है। यह बताती है कि कैसे एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ सफर, पीढ़ियों तक अपनी कहानियों की मिठास फैला सकता है।
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ऋचाएँ…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ७७ — ऋचाएँ —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
किसी शब्द — स्रष्टा ने पेड़ों की छालों में सहस्रों ऋचाएँ लिखी थीं। एक ऋषि ने उन सारी ऋचाओं का अर्थ समझ लिया। वह जानता था भविष्य में मनुष्य के हाथों पेड़ कटेंगे। पेड़ कटने से ऋचाएँ नष्ट हो जातीं। ऋषि इन ऋचाओं को नष्ट होने नहीं देता। उसने इन्हें कंठाग्र करना शुरु किया। वह साधना से वर्षों जी कर लोगों को यह अभ्यास करवाता। ये ऋचाएँ जन – जन के कंठ में पहुँच कर अनंत हो जातीं।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “डर”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
वह साहब सुबह उठा। नहा धोकर , नाश्ता कर ऑफिस के लिए तैयार होने लगा कि अचानक एक जूते का तस्मा कसते कसते टूट गया। इतना समय नहीं बचा था कि बाज़ार जाकर नये तस्मे खरीद लाता। गाड़ी आकर गेट पर लग गयी थी। ड्राइवर हार्न बजाए जा रहा था। जैसे तैसे जूतों के पुराने तस्मे कसे और यह सोचकर रवाना हुआ कि शाम को लौटते वक्त नये तस्मे खरीद लेगा।
दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे उसका ध्यान बार बार अपने एक टूटे तस्मे पर जाता रहा। वह मेज़ के पीछे जूतों को ज्यादा से ज्यादा छिपाने में लगा रहा। दूसरे कर्मचारी देखेंगे तो क्या सोचेंगे? फिर वह अपने पर मुस्कुराया भी कि हम ज़िंदगी भर यही सोचते रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे? दूसरे हमारी कोई कमी या कमज़ोरी देख लेंगे तो कैसा लगेगा? इस बात पर गौर किया उसने।
ऑफिस से छुट्टी हुई। साहब गाड़ी में सवार सीधे एक बढ़िया मार्केट में पहुंचे। बड़े बड़े शो रूम। चमचमातीं , दूधिया लाइट्स। बाहर मज़ेदार पकवान की रेहड़ियां। खूब भीड़। साहब एक शो रूम में घुसा। सेल्समैन भागा आया -कहिए साहब? कौन से ब्रांड के नये डिजायन के जूते दिखाऊं?
-मुझे जूते नहीं , सिर्फ तस्मे चाहिएं। अभी सोफे पर बैठते बैठते कहा साहब ने।
सेल्समैन ने चौंक कर देखा -साहब। यहां सिर्फ नये जूते बिकते हैं। साॅरी। आप अगले शो रूम में पता कीजिए।
दूसरे शो रूम वाले सेल्समैन ने सोफे पर बैठने का अवसर भी नहीं दिया।
तुरंत कहा -आप भी कमाल करते हो? जाइए। यहां कोई तस्मे एक्स्ट्रा नहीं बेचे जाते। आप चाहो तो नये जूते खरीदने के लिए बैठ सकते हो। नहीं तो समय खराब मत कीजिए।
शो रूम और भी थे। चमचमाते पर बिना पुराने जूतों के। वहां पुराने का कोई काम नहीं। एक शो रूम के सेल्समैन ने सबसे ज्यादा होशियारी दिखाई -क्या रखा है इन पुराने डिजाइन के जूतों में जिसके तस्मे ढूंढते फिर रहे हो? नये दिखाता हूं। खरीदिए और सारी प्राॅब्ल्म साल्व। न रहेंगे पुराने जूते न ढूंढेंगे तस्मे।
बाहर आया। देखा कि रेहड़ियों पर लोग पेपर ग्लास या पेपर प्लेट्स में मज़े में खा पी कर डस्टबिन में फेंक पैसे चुकता कर जा रहे हैं। अचानक तस्मों ने जैसे मुंह चिढ़ा कर कहा -बाबू मोशाॅय , समझे नहीं क्या? यह है नया कल्चर। यानी -यूज एंड थ्रो। ओल्ड से नो मोह। समझे क्या?
☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।
मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।
जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।
जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।
राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।
सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।
इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।
तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।
हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।
क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।
डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।
यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।
आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं एक विचारणीय कथा – प्रायश्चित।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ – साहित्य निकुंज ☆
☆ कथा कहानी – प्रायश्चित ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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रात का समय मूसलाधार बारिश जोरों पर थी। हवा में नमी और सन्नाटा घुला हुआ था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं सोच में पड़ गया- इतनी रात को कौन आया होगा? मम्मी-पापा तो दो हफ्ते बाद लौटकर आने वाले हैं फिर भी दरवाजे की दस्तक की ओर चलता चला गया। दरवाज़ा डबल डोर का है, पहला डोर खोला सामने बारिश में भीगी हुई लड़की खड़ी थी।
उसने झिझकते हुए पूछा-“माफ कीजिएगा, मैंने आपको इतनी देर रात तकलीफ दी, मेरी गाड़ी रास्ते में खराब हो गई है, क्या यहाँ मैं थोड़ी देर रुक सकती हूँ? तेज बारिश हो रही है, बारिश रुकते ही मैं यहाँ से चली जाऊंगी। “
मेरा मन सोचने लगा- किसी अजनबी को भीतर बुलाना ठीक है या नहीं, फिर मन विचार करने लगा कि किसी की मदद करना ही इंसानियत है अगर इनकी जगह कहीं मेरी बहन और बेटी ऐसी स्थिति में होगी तो, अचानक यह सोचकर चेहरे में नरमी आ गई।
मेरे मन में मानवता के बीज कूट-कूटकर भरे थे, दरवाज़ा खोलते हुए मैंने कहा-“आइए, अंदर आ जाइए; बाहर तो सचमुच तेज बारिश हो रही है।
आते ही उसने पूछा, ‘वॉशरूम कहाँ है’?
मैंने उसे वॉशरूम का रास्ता बताया…, वह अपना बैग लेकर के वॉशरूम चली गई। जब वह लौट कर आई तब उसने साड़ी की जगह सूट पहन रखा था।
मैंने तुरंत ही उसके लिए गरमा-गरम चाय बनाई और कहा- इसे पीकर आपको राहत मिलेगी।
इस पर उसने-थैंक्स कहा।
कुछ देर हम लोग यूं ही चुपचाप बैठे रहे, थोड़ी देर बाद मैंने पूछा- “आप कहां से आ रही हैं, कहां जा रही हैं? “
उसने जवाब में कहा- “मैं कानपुर से लखनऊ जा रहीहूँ। “
“इतनी रात को आप अकेली कार ड्राइव कर रही हैं? ”
“नहीं, मेरे साथ मेरा ड्राइवर है, जो गाड़ी में ही है। “
अनायास ही मैंने पूछ लिया- “आपका नाम क्या है? “
वहाँ से आवाज आई- “जी, मेरा नाम नेहा है। और आपका…? ”
“जी, मेरा नाम शांतनु है। “
नेहा नाम सुनते ही मन में एक भूचाल-सा आ गया, सारे पन्ने पलटने लगे, तब मैंने दोहरया- “नेहा नाम है आपका। “
वह बोली- “क्या बात है? नेहा नाम से आपका कोई पुराना रिश्ता है क्या? “
“जी… ऐअस अहि कुछ समझ लीजिये। “
उसने कहा- “शांतनुजी! क्या बात है आप कुछ सोच में पड़ गए। “
“नेहा का मतलब स्नेह होता है नेह करना होता है, इतना बुरा भी मतलब नहीं है। “ …हा…हा…हा…। “
चाय का घूँट “पीते-पीते नेहा ने कहा-” आप ठीक तो है शांतनु जी, अनायास आपके चेहरे में उदासी आ गई जैसे कोई दर्द दबा हो आपके सीने में… कोई और बात जहन में हो और उस बात को शेयर करने से आपका मन हल्का हो सकता हो तो मैं सुनना चाहूंगी। “
चाय की भाप, मिट्टी की सौंधी खुशबू और बारिश की रिमझिम फुहार के बीच मैंने गहरी सांस ली और कहा– “नेहा जी, अब अतीत में जाने का साहस नहीं होता, मन घबरा जाता है। अतीत को मैं पीछे छोड़ आया हूँ। अतीत अब बहुत परे है लेकिन आज आपके इस नाम ने मेरे जीवन में फिर हलचल मचा दी। पता नहीं क्यों आपको सब कुछ बताने को मन हो रहा है।
उसने कहा- “आप मुझे एक दोस्त की तरह समझिए। “
“मेरे जीवन की कहानी का पहला पन्ना उस दिन प्रारंभ हुआ यानी 12 साल पहले, मेरी मामी मौसी जी के साथ शॉपिंग करने गई थे। वहीँ वे लोग एक चाट के ठेले पर चाट खाने के लिए रुक गए।
तभी वहाँ पर एक बहुत ही प्यारी खूबसूरत लड़की और उसकी माँ भी उसी ठेले पर चाट खाने आई, उसकी खूबसूरती देखकर मामी से रहा नहीं गया और उन्होंने पूछ लिया- “बेटी, क्या नाम क्या है तुम्हारा? “
उसने जवाब दिया- “नेहा। “
मामी ने कहा…”अरे वाह! बहुत ही प्यारा नाम है। “
मामी ने उसकी मम्मी से पूछा- “बिटिया की पढ़ाई-लिखाई हो गई? अब शादी भी करनी होगी। “
उसकी मम्मी ने कहा- “हाँ ज़रूर, कोई ब्राह्मण परिवार का अच्छा लड़का मिले तो सही। “
मामी ने जैसे ही यह सुना उनकी आँखों में चमक आ गई, तुरंत उनकी आँखों के सामने मेरा चेहरा झूलने लगा होगा, तभी उन्होंने कहा- “दीदी का कितना प्यारा बेटा है, जोड़ी कितनी सुंदर लगेगी? ”
तुरंत मामी ने उनसे कहा- “आप हमें अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए, हमारी नजर में कोई लड़का होगा तो आपको फोन करेंगे, वैसे हम भी ब्राह्मण हैं। “
उन्होंने धन्यवाद कहा और बोला- “हम आपके फोन का इंतजार करेंगे। “
मामी का मन इतना खुश था, सोचा- जल्दी-जल्दी यहाँ से सीधे दीदी के घर जाते हैं और उन्हें सारी बातें बताते हैं। वह कितनी खुश होंगी, कितने दिनों से शांतनु के लिए लड़की ढूंढ रही हैं, शायद किस्मत में यही लड़की हो।
घर पहुंचकर मामी ने सारी बातें माँ को बताई तोवे बहुत खुश हुई।
उन्होंने कहा- “अब तुम लोग ही समझो, तुम्हें ही करना है। तुम ही इसके मामा-मामी हो, जो करोगे अच्छा ही करोगे। “
मामी ने कहा- “ठीक है दीदी, एक बार अभी फोन कर लेते हैं। फिर कल उनसे मिल कर बात करते हैं। “
माँ ने कहा-‘जैसा तुम ठीक समझो। ‘
मामी ने उन्हें कॉल लगाया, उन्होंने बड़ी ही विनम्रता के साथ बातचीत की, आगे मिलने का प्रोग्राम बनाया।
अगले दिन वेलोग हमारे घर आये, सारी बातें हो गई। लड़की की फोटो भी लेकर आयेथे। कुंडली के विषय में विचार किया कि अब उम्र 30 के पार हो चुकी है तो कुंडली मिलाने का कोई मतलब नहीं।
शीघ्र ही सगाई की तारीख निकाली गई।
मुझे लड़की की फोटो दिखा दी गई। मैंने लड़की को देखने या मिलने की इच्छा प्रकट नहीं की, बस इतना कहा- “जब आप लोगों को पसंद है, मामी ने देख ही रखी है तो मेरे देखने का क्या मतलब? सगाई वाले दिन ही देख लेंगे। “
मामी ने माँ से कहा- ”शांतनु का शादी से मन उचट चुका था क्योंकि इसके पहले एक जगह शांतनु की शादी तय हो चुकी थी, सगाई भी हो गयी थी। शादी वाले दिन ही शांतनु बारात लेकर गए और लड़की पीछे के दरवाजे से घर से गायब थी। बाद में पता चला कि उसके माता-पिता जबरदस्ती उसकी शादी कर रहे थे जबकि वह किसी और को प्यार करती थी। तब से शांतनु के मन में शादी करने की इच्छा नहीं थी फिर भी माता पिता की खुशी के लिए उसने हाँ कर दी है। “
एक दिन हम लोगों ने लड़की वाले के यहाँ जाने का दिन निश्चित किया दीदी को लड़की दिखाई। दीदी को लड़की बहुत पसंद आई। लड़की की माँ ने अच्छे से स्वागत-सत्कार किया। पता चला- लड़की के पिताजी नहीं हैं। एक भाई है और माँ ही सब फर्ज अदा कर रही है।
दीदी ने कहा- “आप चिंता मत करिए, सगाई और शादी का इंतजाम हम लोग करेंगे, आप तो सिर्फ़ विदाई की तैयारी रखिये। हम लोगों को दहेज में भी कुछ नहीं चाहिए, इतनी प्यारी लड़की हमें मिल रही है हमें और क्या चाहिए? ”
वह दिन भी आ गया जब सगाई होनी थी। सगाई का कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया, हम सभी लड़की देख कर, मिलकर प्रसन्न हो गए।
शादी को अभी एक माह था। हम दोनों ने एक-दूसरे का फोन नंबर ले लिया।
दिन भर में रोज एक बार फ्री होकर एक-दूसरे से बात करते, एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश कर रहे थे। फोन पर बात करते-करते दोनों में इतनी प्रगाढ़ता हो गई कि लगने लगा- हमको अब जल्दी ही शादी हो जाए।
एक दिन मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ घूमने जारहा था, तभी नेहा से कहा-“अगर संभव हो तो तुम भी आ जाओ, साथ में कुछ देर रह लेंगे। “
नेहा तुरंत तैयार हो गई और हम एक गार्डन में पहुंच गए। मैंने अपने दोस्तों से नेहा को मिलवाया और आपस में बातचीत की, घूमे-फिरे, वहीं खाना खाया, मौज-मस्ती की। जब चलने का समय आया तबनेहा ने मुझसे कहा- “क्यों न हम दोनों आज की रात यहीं रुक जाए, यहाँ रुकने के लिए होटल भी है। “
यह सुनकर मैं आश्चर्य चकित रहा गया, मैंने कहा- “नहीं… नहीं…, शादी के पहले यह सही नहीं है। “
तब नेहा ने कहा, “इसमें ग़लत ही क्या है, हम दोनों की सगाई हो चुकी है, 10 दिन बाद शादी होने वाली है, क्या फर्क पड़ता है? “
इतना कहने के साथ ही वह मेरे नजदीक आने लगी। तभी मैंने उसे धक्का देकर रोकनाचाहा, और कहा- “क्या कर रही हो, यह अच्छा नहीं लगता, थोड़ा सब्र करो। सब्र का फल मीठा होता है। “
फिर मैंने अपने दोस्तों से कहा- “अब हमें चलना चाहिए, रात होने वाली है। “ रास्ते में नेहा को उसके घर के नजदीकी छोड़ दिया। नेहा भी भारी मन से बाय कह कर चली गई।
रात भर नींद नहीं आई, मैं यही सोचता रहा- यह लड़की अपने आप को रोक क्यों नहीं पा रही थी। फिर सोचा पहली बार मिले हैं, उसको मुझसे बात करते-करते इतना लगाव हो गया कि उससे रहा नहीं जा रहा। नहीं-नहीं उसकी कोई गलती नहीं है। अपने आप को दोषी ठहराते हुए अपने मन में कहा- “मैंने बहुत ग़लत तरीके से नेहा को डांटा, पता नहीं बेचारी क्या सोचती होगी। अब मैं सुबह होने का इंतजार कर रहा था, कब सुबह हो औरनेहा को कॉलकरूँ…।
आँखों ही आँखों में सुबह हो गई, सुबह होते ही नेहा को फोन किया। नेहा ने अनमने भाव से बात की। मैंने माफी मांगते हुए कहा- “बस नेहा! थोड़े ही दिन की बात और है, थोडा और इंतजार करो।
वह दिन आ ही गया जब जिसका सभी को इंतजार था। धूमधाम से बाजे-गाजे के साथ बरात गयी।
सभी ने बहुत आनंद लिया। जयमाला के समय बहुत ही आनंद आया। मेरी हाइट बहुत ज़्यादा थी और नेहा की अपेक्षाकृत कम। चार-छह लोग लड़की को उठाने में लगे। तभी दोस्तों ने मुझे और ऊपर उठा लिया। जैसे-तैसे जयमाला का कार्यक्रम हंसी-खुशी संपन्न हुआ।
रात भर शादी की रस्में चली, विदा का कार्यक्रम हुआ, सभी का मन दु:खी हो गया लेकिन मैं बहुत खुश था कि आज नेहा के रूप में कोई प्यार करने वाला मिला है, कोई समझने वाला मिला है।
घर पर बहू के आने पर सारी वैवाहिक विधियाँ संपन्न हुई और अब वह समय आ गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था। दोस्तों ने मिलकर कमरा बहुत अच्छी तरह से सजाया और ऑल द बेस्ट कहकर मुझे कमरे में धक्का दे दिया। कमरे में पहुंचते ही मैंने देखा- नेहा घूंघट में बैठी हुई है। मुझे देखते ही वह खड़ी हो गई। मैंने कहा- “अरे नेहा, तुम बैठो। “
नेहा बहुत निरीह भाव से मेरी ओर देखती रही।
मैंने कहा-“क्या हुआ इस तरह क्यों देख रही हो, अब तो मैं तुम्हारा हो गया। जिसका तुम्हें बेसब्री से इंतजार था…। “
नेहा उठी और मेरे पैर छुए, मैंने उसे उठाया तो उसका चेहरा देखते ही हैरान हो गया। वह रो रही थी।
मैंने पूछा-“नेहा! तुम रो क्यों रही हो? ”
नेहा ने कहा, “शांतनु! मैं सही कर रही हूँ या नहीं यह मैं नहीं जानती, पर मेरा मन ऐसा करने को कह रहा है…। “
“क्या हुआ, क्या कहना चाहती हो? ”
नेहा ने कहा- “उस दिन जब हम लोग घूमने गए थे तब तुमने मेरे आग्रह को ठुकरा दिया था। घर आकर मैंने खूब विचार किया, तब मैंने सोचा, तुम इतने अच्छे इंसान हो तो अच्छे इंसान को अच्छा ही इंसान मिलना चाहिए। “
मैंने कहा- “तुम कहना क्या चाहती हो नेहा? “
नेहा ने कहा- “आज मैं तुम्हें ऐसी बात बताना चाहती हूँ जो तुम्हारे हित में होगा। मैंने सोचा- मेरे सिर पर बचपन से बोझ है, जिसे मैं उतारना चाहती हूँ, अब मैं थक चुकी हूँ। अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे लगा तुम समझदार इंसान हो अगर तुम मुझे समझोगे तो बहुत अच्छा है। “
बचपन से मैंने देखा हमारे घर में पिताजी की मृत्यु के बाद माँ घर का भार उठा रही थी। हम जब छोटे थे तो मुझे पता नहीं चला लेकिन जब मैं बड़ी हुई, एक दिन घर पर एक आंटी आई, उन्होंने कहा- “तुम्हारी बिटिया भी अब बड़ी हो गई है, वह भी अब काम करने लायक हो गई है, तुम्हारा बोझ भी उठा सकेगी। बहुत प्यारी बहुत सुंदर है, तुम्हारी बिटिया किसी की नजर न लगे। ”
तब हम समझे नहीं लेकिन एक दिन मेरी माँ मुझे अपने साथ काम कर ले गई. वहाँ जाकर हमने जाना कि काम क्या है, माँ ने तब बताया-“बेटा, आज हम बरसों से तुम सब का पेट पाल रहे हैं, मैं ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूँ लेकिन शारीरिक सौंदर्य हमारे पास है जिसके लिए हमें मोटे-मोटे ग्राहक मिल जाते हैं और हमारा घर चल जाता है, मैं सोचती हूँ अगर तुम भी हमारा साथ दो-चारसाल तक दो तो तुम्हारी शादी के लिए काफी पैसा इकट्ठा हो जाएगा और फिर हम तुम्हारी शादी अच्छी जगह कर देंगे। ”
मेरी बड़ी बहन की शादी पिताजी कर गए थे, वह आज सुख से है। माँ की आदतों को जानते हुए वह हमारे घर नहीं आती।
माँ की बातें सुनकर मैं अवाक रह गई लेकिन काम की अवहेलना नहीं कर पाई, मन मारकर उस दलदल में उतरना पड़ा, मैंने माँ को इस सौदे के लिए हाँ कर दी।
तभी माँ ने मुझे एक कमरे में भेज दिया, कमरे के अंदर जाकर देखा तो एक हट्टा कट्टा आदमी था। जिसने मुझे पहली बार अपना शिकार बनाया। करीब 2 घंटे तक वह अपनी हवस मिटाता रहा। मैं कुछ बोल न पाई, उसके बाद उसने एक मोटी रकम दी और एक हफ्ते बाद आने के लिए फिर कहा। इसी तरह सिलसिला चलता रहा करीब 2 वर्षों से मैं इस कार्य में माँ के साथ संलग्न हूँ। लेकिन उस दिन जब मैं तुमसे मिली तब मुझे एहसास हुआ कि शारीरिक सम्बंध से भी बढ़कर भी कुछ और होता है। क्योंकि मुझे माँ ने बड़े होकर देह समर्पण का पाठ पढ़ाया है।
उस दिन मैंने यह निश्चय कर लिया था चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनी आपबीती आपको ज़रूर बताएंगे। मेरी देह आपके लिए पवित्र नहीं है। माँ से शादी से पहले ही कहा था कि हम उनसे मिलकर सारी बात बता देते हैं, उन्हें धोखे में नहीं रख सकते। लेकिन मेरी माँ ने मुझे कसम दे दी और कहा अगर तूने ऐसा किया तो हम अपने आप को खत्म कर लेंगे। इस घर में जब मैंने कदम रखा तब मुझे लगा कि मैंने बहुत ग़लत किया है, अब मैं अपने आप को रोक नहीं पाई, माँ की कसम की परवाह किए बिना मैंने आपको सच बता डाला। मुझे पता है इसका अंजाम क्या होगा लेकिन अब मुझे अंजाम की परवाह नहीं, परवाह मुझे आप जैसे इंसान की है जिन्हें मैं धोखा नहीं दे सकती। अब फैसला आपके ऊपर है आपको जो उचित लगे वह आप करिए। शांतनु आप कुछ बोलिए इतने खामोश मत रहिए रात काफी हो चुकी है। “
मैंने कहा- “नेहा, अब बोलने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। मेरी ज़िन्दगी में पहले एक भूचाल आ चुका था, मैं शादी करने को तैयार नहीं था। लेकिन दूसरा झटका मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। नेहा मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मेरी आत्मा इस बात को हजम करने के लिए तैयार नहीं। “
नेहा ने कहा- “अंजाम मुझे मालूम था लेकिन मैं आपके सामने वचन देती हूँ अब कभी भी किसी को भी अपनी देह समर्पित नहीं करूंगी। क्योंकि मैंने अग्नि के सात फेरे आपकी अर्धांगिनी के रूप में लिए हैं। जीवन भर आपके साथ रहूँ या न रहूँ इसका निर्वाह करूंगीक्योंकि आप ही की वजह से मैंने सही रास्ते पर चलने का निश्चय किया है या यूं कहिए कि भटके हुए राही को रास्ता मिला है। “
मैंने कहा- “नेहा! तुम यहीं कमरे में आराम करो मैं बाहर जाता हूँ। क्या करना है सुबह निश्चिय करूंगा। “
इतना कहकर मैं कमरे से बाहर निकल आया रात के 2:00 बज रहे थे मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा था। बाहर हॉल में आकर सोफे पर लेट गया।
सुबह जब माँ की नींद खुली तब उन्होंने देखा मैं सोफे पर सो रहा हूँ तो उन्हें हैरानी हुई, उन्होंने पूछा- “बेटा यहाँ क्यों सो रहे हो? ”
मैं उठा, मैंने कहा- “माँ, बस यूँ ही। “ और फ्रेश होने चला गया।
थोड़ी देर के बाद जब सभी लोग नाश्ता-चाय करके फुर्सत हुए तब हमने मम्मी से कहा-“मामा-मामी को फोन करके बुला लीजिए, कुछबातें करनी है। “
मेरी इस बात से मम्मी बहुत परेशान हो गई और उन्होंने फोन करके मामी को बोला-“रीता! तुम भैया के साथ जल्दी आ जाओ, पता नहीं शांतनु क्या कहना चाहता है? ”
सभी के आने के बाद हमने नेहा से कहा- “नेहा, तुम भी यहीं बैठो और माँ से कहा इनकी मम्मी को भी फोन करो वह भी यहाँ आए। “
थोड़ी देर बाद सभी लोग एकत्र हो गए। मैंने नेहा के द्वारा बताई गई सारी बातें सबके सम्मुख रख दी। इसके तुरंत बाद नेहा की मम्मी उठी और दौड़कर अपनी बेटी को मारने लगी और कहा कितना तेरे को समझाया था चुप रहना, तुम्हें सही ज़िन्दगी मिल रही है लेकिन तुम सत्यवादी हरिश्चंद्र बन गई और आज अपनी ज़िन्दगी नरक बना डाली, चुप रहती तो क्या बिगड़ जाता तेरा और इसके साथ ही दो-तीन थप्पड़ लगा दिए।
तभी मैंने कहा- “आंटी, नेहा ने सच के रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया है, वह अपना आज सुधारना चाहती है और आप कैसी माँ हो जो उसको ग़लत राह पर चलने का संदेश दे रही हो, नेहा ने जो किया वह सही किया लेकिन हम पति-पत्नी की तरह जीवन निर्वाह नहीं कर सकते। हाँ, ज़रूरत पड़ने पर हम उसकी मदद अवश्य करेंगे। “
तभी मामी ने कहा- “आप लोगों को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि दिखने में चेहरा अलग और चेहरे के पीछे दूसरा चेहरा अलग है। कितना घटिया लिबास पहना है आपने, हमारे लड़के की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी। किसपर विश्वास करें किसपर न करें, हमने तो आपको और आपकी बेटी को देखकर सम्बंध तय किया था। “
तभी नेहा की मम्मी ने कहा- “चल अब यहाँ से अभी कुछ और सुनना बाकी है। “
नेहा ने अपने सास-ससुर के पैर छुए और कहा, “मुझे माफ कर देना मेरी माँ ने अगर कसम न दी होती तो हम शादी के पहले ही यह खुलासा कर देते। लेकिन मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही थी इसलिए मैंने शादी की रात को ही शांतनु को यह सब बताना उचित समझा आप सबको और अपने आप को धोखा नहीं देना चाहती है। “
नेहा ने शांतनु से कहा- “मैं जा रही हूँ, पत्नी न सही अगर एक दोस्त का दर्जा दे सको तो कभी-कभार फोन पर सलाह देते रहना जिससे मैं कभी रास्ता न भटक जाऊँ। मैं जल्दी ही आपको तलाक के पेपर भिजवा दूंगी, जिससे आप अपना जीवन पुनः प्रारंभ कर सकें है। “
नेहा के जाने के बाद मैं फूट-फूट कर रोया और कहा- “माँ, मेरी किस्मत में शादी नहीं है, मैं अब जीवन भर शादी नहीं करूंगा, आप सब की सेवा और अपना काम संभालूँगा। अब आप लोग कभी भी मुझे शादी के लिए बाध्य नहीं करिएगा। “
मेरी नजर मामी पर पड़ी, मैंने उन्हें रोते हुए देखा और कहा- “मामी, आप अपने आप को दोष मत दीजिए दोष मेरी किस्मत का है, आपने तो मेरा भला चाहा था। “
तभी मैंने अपने घर के नौकर को आदेश दिया- “जल्दी ही पूरे घर से लाइटिंग और सारे बंदनवार उतर जाने चाहिए, अब आप सब लोग भी शादी के माहौल से बाहर आ जाइए और अपना जीवन अलग ढंग से शुरू कीजिए। ” इतना कहकर मैं घर से निकल गया।
दिन-महीने गुजरते गए बहुत दिन बाद मामी-मामा ने सोचा जाकर हालचाल ले लिया जाए, घर पहुँचकर देखते हैं कि मेरी बहुत बड़ी दाढ़ी बढ़ चुकी है ऐसा लग रहा था कि मैं बिल्कुल देवदास बन चुका हूँ। मेरे से बात की तो मैंने कहा- “मामी, अब शादी के विषय में बिल्कुल भी बात मत कीजिए, मैंने नेहा को देखकर नेहा से शादी करने का निश्चय किया था उसे ही अपना माना था मेरी किस्मत में उसका सुख नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन मैं किसी और से शादी नहीं करूंगा। “
नेहा जी यही है मेरी आपबीती जो आपके नेहा नाम ने मुझे अतीत के पृष्ठों को पुनः खोलने के लिए बाध्य कर दिया।
नेहा ने कहा- “मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ इस दौरान आपकी कभी नेहा से बात नहीं हुई। “
मैंने कहा- “जी, तीन-चार बार हुई, वह पत्थर हो चुकी है उसकी माँ का वही हाल है। माँ के बार-बार कहने पर भी वह अब कहीं नहीं जाती, न ही किसी को घर में आने देती है। उसका कहना है कि एक बार मेरी ज़िन्दगी में खुशियों का झोंका आया, मैं उसकी महक हूँ अब अपवित्र नहीं करना चाहती। आपके साथ मैं शादी के बंधन में बंधी थी। आपके नाम का सिंदूर और मंगलसूत्र अब भी मेरे शरीर पर सुशोभित है, उसे कलंकित नहीं करना चाहती। भले ही आप मेरे साथ नहीं है पर मैं कल्पना मैं आपको वरण कर चुकी हूँ। “
नेहा ने कहा- “शांतनु जी, एक बात आपसे कहना चाहती हूँ, जिस लड़की ने आपको मन से अपना मान लिया है, आपके कारण वह दलदल से निकलकर बाहर आ गई है, क्या अभी भी वह अपवित्र है, सारा जीवन उसने आपके नाम कर दिया, क्या कभी उसे अतीत से निकलने का अधिकार मिलेगा, कौन देगा उसे अधिकार, आप भी उसी की यादों में खोए रहते हैं। क्या अब भी आप उसे माफ नहीं कर सकते, गलती करने के बाद सुधरने का मौका सभी को होता है, मेरे हिसाब से तो एक मौका आप नेहा को भी दे दीजिए, आपकी और उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी। “
“नेहा जी, बारिश थम चुकी है, चाँद बादलों के बीच से झाँक रहा था आज ऐसा लग रहा है कि बरसों पुराने दर्द के बाद पहली बार सुकून आया है। “
“नेहा जी, आपकी बातों ने मेरे तन-बदन में हलचल-सी मचा दी, दिमाग में प्रेरणा का संचार किया है। इस विषय पर मैं विचार अवश्य करूंगा क्योंकि देवदास बनकर जीवन बर्बाद नहीं किया जा सकता। “
मैंने तुरंत फोन उठाया और नेहा को फोन लगाया। नेहा ने तुरंत फोन उठाया और कहा-“शांतनु! बहुत दिनों बाद आपको मेरी याद आई? ‘’
मैंने कहा- “नेहा! यह जीवन दोबारा नहीं मिलता, तुमने अपना प्रायश्चित कर लिया है। शायद तुम और मैं एक-दूसरे के लिए ही बने हैं, मैं तुम्हें अपना नाम देना चाहता हूँ। मैं आ रहा हूँ। “
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “प्रभाव…” ।)
☆ तन्मय साहित्य #२९४ ☆
☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
☆
“सार्वजनिक मंचों पर तो औपचारिकता के नाते किसी की प्रशंसा करना बनता है पर ऐसी क्या विशेषता है उनके लेखन में जो हरदम, हर कहीं मुक्त कंठ से उनका गुणगान करते रहते हो तुम?”
शेखर दत्त ने कुछ उबाऊ अंदाज में प्रश्न किया अपने साथी विनय अनुरागी से।
“विशेषता उनके लेखन में तो है ही मित्रवर, पर इससे कहीं अधिक प्रभावित हूँ मैं उनके सहज सरल व सौम्य व्यक्तित्व से। उनके गंभीर, शांत व निर्मल निश्छल व्यक्तित्व का ही असर है कि उनकी सभी रचनाओं को मैं किसी तपोनिष्ठ ऋषि मुख से निःसृत मंत्र समझ कर पढ़ता हूँ, और मित्रों के बीच उनका गुणगान करते हुए उन्हें अपनी स्मृति में बनाये रखता हूँ।”
“अरे वाह, सचमुच में धन्य हो मित्र! जो तुम्हें आज के समय में ऐसे सतोगुणी सत्य निष्ठ साधक का सानिध्य मिला है।”
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “कब्जा… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३५ ☆
लघुकथा – कब्जा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
राम बिहारी त्रिपाठी जब से अधिकारी वर्ग में प्रमोट हुए तभी से वे और अधिक विनम्र हो गए। उनमें लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आया। साथ के लोग कहते कि त्रिपाठी जी अब अधिकारी बन गए हो तो उसी हिसाब से रहा कीजिए। वे कहते, रहने का कौन सा हिसाब किताब होता है। ईश्वर ने काम करने का अवसर प्रदान किया है तो पूरे मन से काम करना चाहिए, यही मेरा हिसाब किताब है और कुछ नहीं। वैसे सभी उनकी ईमानदारी, मेहनत और व्यवहार को पसंद करते थे। हर जगह और हर वर्ग में कुछ न कुछ संगठन के नाम पर भी कुछ होता रहता है। वहां भी एक अधिकारी एसोसिएशन था। एसोसिएशन के अध्यक्ष उपाध्यक्ष सचिव सहायक सचिव जैसे पदों पर अधिकारी लोग आसीन थे पर कोई काम नहीं करता था। एक दिन लंच के समय कुछ अधिकारी बैठे हुए थे जिनमें त्रिपाठी जी भी थे। एसोसिएशन के अध्यक्ष चौधरी साहब ने कहा, त्रिपाठी जी अब आप अधिकारी बन गए हैं तो एसोसिएशन में भी थोड़ी रुचि रखा कीजिए। उन्होंने कहा कि जी कहिए क्या करना है। चौधरी साहब ने कहा कि आप एसोसिएशन के सचिव का काम संभाल लीजिए। बस हर महीने की आखरी तारीख को सभी अधिकारियों को फोन करके मीटिंग करना है।
त्रिपाठी जी एसोसिएशन के सचिव के रूप में काम देखने लगे। उच्च अधिकारियों के साथ बैठक में उपस्थित रहते और हैडक्वार्टर स्तर पर भी बैठकों में रहते। समयानुसार अपनी राय देते। वे सभी अधिकारियों के संपर्क में रहते और बैठकों के निर्णय सभी से साझा करते। सब ठीक चल रहा था। अध्यक्ष चौधरी साहब रिटायर होने वाले थे। कई अधिकारी अध्यक्ष बनना चाहते थे पर उनके पास एसोसिएशन के लिए समय नहीं था। एक अधिकारी त्रिपाठी जी के प्रति कुछ अधिक ही अच्छा व्यवहार करने लगे और उनके हर काम में सहयोग का वादा करने लगे। दोनों साथ साथ चाय पीते। त्रिपाठी जी उनसे बहुत प्रभावित हो गए और सोचने लगे कि अध्यक्ष के चुनाव में उनके नाम का प्रस्ताव रखेंगे तो ठीक रहेगा।
महीने के आखिरी दिन बैठक के साथ साथ एसोसिएशन का वार्षिक अधिवेशन भी हुआ जिसमें त्रिपाठी जी ने चौधरी साहब की जगह अध्यक्ष पद के लिए उक्त अधिकारी के नाम का प्रस्ताव रखा और सभी ने उनके प्रस्ताव का समर्थन किया और अध्यक्ष का मनोनयन हो गया। महीने की आखरी तारीख को त्रिपाठी जी महाप्रबंधक के चैंबर के आगे से निकल रहे थे तो उन्होंने चैंबर से निकलते हुए नवनिर्वाचित अध्यक्ष को देखा तो वे बोले कि आज आखिरी तारीख है शाम को एसोसिएशन की बैठक के लिए सभी को फोन कर दिया है। नवनिर्वाचित अध्यक्ष थोडे मुस्कुराए और बोले, काहे की बैठक। मैं महाप्रबंधक के साथ बैठक करके ही आ रहा हूँ। सबको क्यों परेशान करते हैं। यह सुनकर त्रिपाठी जी स्तब्ध रह गए और एक संस्था पर एक व्यक्ति का कब्जा होते हुए देखते रहे।
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला “सबसे खास: हमारे बॉस”।)
☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – २ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
(मेरी यह लेखन श्रंखला किसी “विशेष व्यक्तिनुमा बॉस”की आलोचना के उद्देश्य से नहीं लिखी जा रही है, बल्कि इस पद से जुड़ी भ्रांतियों के उल्लेख से जुड़ी हैं।”समालोचना”ही सही जीवनशैली होती है, अभी यह श्रंखला लंबी चलेगी और इसमें हर तरह के रंग मिलेंगे, क्योंकि लोग शौक से, ध्यान से पढ़ रहे हैं और चाहते हैं कि ये सिलसिला जल्दी समाप्त न हो। उनकी राय मुझे व्यक्तिगत रूप से भी मिल रही है। अगर इन पोस्ट को पढ़कर हम सभी आनंदित हों तो समझिए कि गाड़ी सही दिशा में चल रही है और हम सेवाकाल रूपी नदी को पार कर दूसरे किनारे पर उतरकर खड़े हैं। हमारे सामाजिक जीवन में घटित या घट रही विसंगतियों पर चुटकी लेना, हर ईमानदार व्यंग्य लेखन का धर्म होता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की कलम की धार ने कभी समझौता नहीं किया, साहित्यिक संस्थाओं का सम्मान तो स्वीकारा पर शासकीय पुरस्कारों को हमेशा ही ठुकराया। इसलिए ही उनका स्थान साहित्य जगत और उनके पाठकों के दिलों में अविस्मरणीय बन गया है।)
इंग्लिश ग्रामर पढ़ाई जाती रही उस वक्त जब अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई शुरु होती थी, और यह पुण्य कार्य वे किया करते थे जिनका दिवस हम प्रतिवर्ष पांच सितंबर को मनाते हैं अर्थात शिक्षक दिवस। छात्र इस विधा में कितना प्रवीण हो पाये ये उनकी छड़ी,डांट,कलम बतलाती थी,पढ़ाना उनका दायित्व तो था पर एंड रिजल्ट उनके बस में नहीं था। उनके छात्र साल दर साल इस शिक्षण में क्या याद रख पाये और कितना भूल पाये ये उस वक्त उनके सामने आता है जब उनका पारा अपने बॉस से पड़ता है और ग्रामर सुधारने के नाम पर उनके बॉस का कर्तव्य बोध अक्सर जाग जाता है।
To change ‘has to have, may be to might be, will be to would be’ or vice versa is the favorite task of many Bosses however there are some good examples where some minor changes and rearrangement of sentences have glorified the draft letter. This talent should be compulsory to be a good Boss.
ड्राफ्टिंग ऐसा विषय है जिसकी कोई पढ़ाई नहीं होती, डिग्री नहीं होती,अत: यह एक जन्मजात प्रतिभा ही मान ली जाती है।लोग ये मान लेते हैं कि भाई ये तो इस काम में या सिर्फ इसी काम में मास्टर है तो क्यों न इसको काम पर लगाया जाये।लीव एप्लिकेशन ही ऐसी विधा है जो अपनी जरूरतों के कारण अपने आप सीखी जाती है। बैंक ने अपने सैनिकों की ड्राफ्टिंग के इस वीक पाइंट को समझते हुए ,और उनकी रणनीतिक क्षमता को वरीयता प्रदान बहुत से “फिल अप द ब्लेंक” वाले फार्मेट प्रचलन में लायें जिन्हें लोग आसानी से भरकर अपना और बैंक का भी काम कर सकें। “ऑब्जेक्टिव टेस्ट” जैसे खूबसूरत प्रतियोगिता प्रश्न पत्र अस्तित्व में आये जहां परीक्षार्थी को ए,बी, सी डी और none of the above में से किसी एक पर टिक लगा कर अपना ज्ञान कसौटी पर कसना पड़ता है।उनके लिये ये युद्ध क्षेत्र उनके मनमुताबिक बना जो लीव एप्लिकेशन के अलावा हर पत्र लिखने के दुरूह कार्य से कन्नी काटते रहे।
वाट्स एप की ईज़ाद भी ऐसे ही किसी सिद्धहस्त “वैज्ञानिक संत” ने की जो यह अच्छी तरह जानता था कि जिम्मेदारियां खिसकाने में हम लोगों का कोई मुकाबला नहीं है।”फारवर्डेड मैसेज” के दम पर दुकान सजाने और प्राप्त ज्ञान को जल्द से जल्द “खुद से दूर कर सही या सभी मित्रों और कलीग्स, रिश्तेदारों को भेजने की” जन्मजात प्रतिभा ने वाट्स अप को ऐसी ख्याति दी जिसका पृथ्वी के अस्तित्व में आने के बाद कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।
आज बस इतना ही क्योंकि मेरे मित्रों कलीग्स और रिश्तेदारों से अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं ये मेरी वाट या क्लास न लगा दें।अगली किश्त, स्थितियां तनावपूर्ण पर शांत होने पर आयेगी। अंतराल लंबा नहीं होगा यह पक्का है।