हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “फागुन के दिन आ गये…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆

फागुन के दिन आ गये, मन में उठे तरंग।

हँसी-ठहा के गूँजते, नगर गाँव हुड़दंग ।।

कि होली आई है, रंगों को लाई है ।।

बसंती ऋतु छाई, सभी के मन-भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

अरहर झूमे खेत में, पहन आम सिरमौर।

मधुमासी मस्ती लिये, नाचे मन का मोर।

गाँव की किस्मत चमकी, घरों में खुशियाँ दमकीं।

ये बालें पक आईं, खेत में लहराईं

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जंगल में टेसू खिले, प्रकृति करे शृंगार।

चम्पा महके बाग में, गाँव शहर गुलजार।।

वो कोयल कूक रही है, मधुरिमा घोल रही है।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

प्रेम रंग में डूब कर, कृष्ण बजावें चंग ।

राधा पिचकारी लिये, डाल रही है रंग।।

कृष्ण-राधे की जोड़ी, खेलती बृज में होली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

लट्ठ मार होली हुई, लड्डू की बौछार।

रंग डालते प्यार से, पहनाएं गल-हार।।

नाचती रसिया टोली, करें मिल हँसी ठिठोली।।

यही मथुरा की होली, यही वृज की है होली।।

 *

दाऊ पहने झूमरो, झूमें मस्त मलंग।

होरी गा-गा झूमते, टिमकी और मृदंग।।

ग्वाले सब घर हैं जाते, नाच गा धूम मचाते।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

महिलाओं की टोलियाँ, हम जोली के संग।

बैर बुराई भूलकर, खेल रहीं हैं रंग ।।

यही संस्कृती हमारी, रही दुनिया से न्यारी

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

फाग-ईसुरी गा रहे, गाँव शहर के लोग।

बासंति पुरवाई में, मिटें दिलों के रोग।।

चलो जी हँसलो भाई, भुला दो सभी लड़ाई।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जीवन में हर रंग का, अपना है सुरताल ।

पर होली में रंग सब, मिलें गले हर साल ।।

सहिष्णुता हमें लुभाई, सभी हम भाई भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

दहन करें मिल होलिका, मन के जलें मलाल ।

गले मिलें हम प्रेम से, घर-घर उड़े गुलाल ।।

कि एकता हर्षाई, प्रगति की डगर दिखाई

सुनो प्रिय श्रोता भाई,बजाओ मिलकर ताली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – वन्देमातरम्।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रतिध्वनि टकराती है कानों से

झंकार उठती है प्राणों से

वन्देमातरम्! वन्देमातरम्!

और मैं

कुछ जागा सा,

कुछ

सोया सा

अतीत में खोया सा- देखता हूँ

मानवों का महासागर

उत्ताल तरंगों से नक्कारे और नारे

तरह तरह की बोलियाँ

चलती हुई गोलियाँ

और

पूरे जोश से उच्चरित होता- वन्देमातरम्।

आज लगता है

हम तुम ये वे सब

वन्देमातरम् का मर्म भूल गये

वे कौन थे. कैसे थे

जो वन्देमातरम् गाकर

फाँसी पर झूल गये?

वे भारत माँ की संतानें

हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख

या नहीं ईसाई थे

वे तो राष्ट्रभक्त इंसान थे

भाई-भाई थे।

उन्होनें जीवन में उतारा था

जननी जन्भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

का महामन्त्र

और विफल किये थे

अंग्रेजी सल्तनत के षड्यन्त्र ।

हम

मन्त्ररहित होकर

षडयन्त्रों में घिर गये हैं

गिर गये हैं- दलों के दलदल में

बहुत नीचे

और आँख मींचे

बैठे हैं शुतुरमुर्ग की मुद्रा

हमें दिखाई नहीं देती

में।

कृ

प्रपा

पूर्वोत्तर की आग

या केसर क्यारी के नाग

हम तो

छाती से चिपटाये हैं

जाति-धर्म-भाषा और प्रदेश

हमें कैसे याद रहेगा

वन्देमातरम् का सन्देश ।

है

एक ओर है हमारा क्षुद्र अहम्

ओर दूसरी ओर है

वन्देमातरम्!

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७३ – “गाती है राग यमन…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत गाती है राग यमन...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “गाती है राग यमन...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

आहिस्ता सुना कल

जब रात तुम्हे फोन पर ।

लगा तुंगभद्रा तट –

गाती है राग यमन

किशोरी अमोनकर ॥

 

स्वप्न पंख ओढ

थाट का लहरा ।

मींड मंद्र द्रुत का

झंडा फहरा ।

 

जिक्र हुआ तेरा

सब पूछते हैं –

घराना यह किराना

या जौनपुर ॥

 

स्मृतियों का

खयाल गायन है ।

सरगम में छुपा

शब्द सावन है ।

 

मधुर कण्ठ ले

ज्यों आलाप लगा –

वीणा में ठहर

गये मौन पर ॥

 

स्थायी अंतरा

सम्हाल कर ।

स्वर भरते गत में

हर ताल पर ।

 

जैसे  हो अटक

गया स्वाद कहीं –

प्रीतिभोज का किंचित

नोंन पर ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 21-02-2026

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆ # “होली के रंग में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “होली के रंग में…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆

☆ # “होली के रंग में…” # ☆

 

रंग-बिरंगी पिचकारी में

रंग-बिरंगे रंग है

पिचकारी के रंगों से

भीग रहे अंग अंग है

 

गली गली में हुड़दंग है

तरुणाई  तो उदंड है

रंग गुलाल लगा नाच रहे हैं

जोश इनमें प्रचंड है

 

सजनी की है कंचन काया

साजन ने है रंग लगाया

आरक्त हो गए गाल गुलाबी

निखर गई है सजनी की काया

 

दोनों रंगों में घुल गए हैं

दिन दुनिया को भूल गए हैं

डूबे हुए हैं फाग की मस्ती में

बाहों में एक दूजे के झूल गए

 

भांग खाओ या मिठाई

या पी जाओ खूब ठंडाई

भांग की मस्ती जब चढ़ती है

तो बस चढ़ती है जाती है भाई

 

खूब रंगों से खेलो होली

संग हो प्रीतम या हमजोली

अभद्र आचरण को त्याग कर

भाई बोलो प्रेम की बोली

 

रंगों से है रंगीन जवानी

रंग नहीं तो जीवन है फानी

रंग है जीवन का मर्म

रंग बिना अधूरी है कहानी

 

रंगों में डूब जाओ यारों

रंगों में सब भूल जाओ यारों

एक गुलाल का टीका लगाकर

सबको गले लगाओ यारों /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९७ – कान्हा तेरी बंशी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कान्हा तेरी बंशी।)

☆ अभिव्यक्ति # ९७ ☆ कान्हा तेरी बंशी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

कान्हा तेरी बंशी मन बिसराए,

सारे जगत में सबको भाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जब जब राधा तान सुने ये,

दौड़ के जमना तट को आए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जमना जल भी रुक रुक जाए,

बंशी बजाके रास रचाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

पशु पक्षी भी राह तकत हैं,

कब तू अपनी बंशी बजाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

बंशी तेरी,पर तू सबका,

सबका मन हर्षाए,

कान्हा तेरी बंशी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६९ – कविता – जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है अप्रतिम रचना  जोगी जी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६९ ☆

जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

सदाचार का डालिए,

चौक रंगीला द्वार।

सद्भावों की फाग गा,

मेटें सब तकरार।।

जोगी जी सा रा रा रा

बाधाओं की लकड़ियाँ,

दें होरी में बार।

पीर गुलेरी सब जलें,

बचे न एकऊ खार।।

जोगी जी सारा रा रा

राजनीति की होलिका,

करे नहीं तकरार।

नेता-अफसर कर सकें, लोकनीति से प्यार।।

जोगी जी सारा रा रा

भुज भरकर मिलिए गले,

बढ़े खूब अपनत्व।

संसद से दूरी मिटे,

बढ़े खूब बंधुत्व।।

जोगी जी सा रा रा रा

सुख पिचकारी दें भिगा,

रंग हर्ष का, डाल।

मस्तक पर शोभित रहे,

यश का लाल गुलाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

हिंदी मैदा माढ़िए,

उर्दू मोयन डाल।

देशज मेवाएँ भरें,

गुझिया बने कमाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

परंपरा बेसन बने,

नवाचार हो तेल।

खांय-खिलाएँ पपड़ियाँ,

जी भर होली खेल।।

जोगी जी सा रा रा रा

कविता पिचकारी बना,

भरें छंद का रंग।

रस-लय की ठण्डाई पी,

करें गीत गा जंग।।

जोगी जी सा रा रा रा

फाग कबीरा गाइए, भर मस्ती में झूम।

ढोल-मँजीरा बजाएँ, खूब मचाएँ धूम।।

जोगी जी सा रा रा रा

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१३.३.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दोहे फागुन के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ दोहे फागुन के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

फागुन आया देह में, जागी आज उमंग।

मन उल्लासित हो गया, फड़क उठा हर अंग।।

*

फागुन लेकर आ गया, प्रीति भरा संदेश।

जियरा को जो दे रहा, मिलने का आवेश।।

*

फागुन की अठखेलियाँ, होली का पैग़ाम।

हर कोई लिखने लगा, चिठिया प्रिय के नाम।।

*

फागुन की मदहोशियाँ, छेड़ें मीठी तान।

हल्का जाड़ा कर रहा, अनुबंधों का मान।।

*

सरसों में आकर्ष है, महुये में है काम।

पवन नेह ले कर रहा, कर्म आज अविराम।।

*

फागुन लिए तरंग है, सबकी बदली चाल।

मौसम ने ऐसा किया, कुछ तो आज कमाल।।

*

बहके-बहके लोग हैं, संयम रहा न आज।

फागुन करने लग गया, हर दिल पर तो राज।।

*

फागुन रंगारंग है, बजें आज तो चंग।

संतों के मन भी चढ़ा, साहचर्य का रंग।।

*

यौवन है हर भाव पर, टूटे सारे बंध।

है स्वच्छंद मधुमास अब, अवमानित सौगंध।।

       

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – पिता-असीम आकाश ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं डॉ  राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी की दूसरी पुण्यतिथि पर एक कविता – पिता -असीम आकाश)

☆ कविता – पिता-असीम आकाश ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

देखते हैं स्वप्न

जीवन है असीम आकाश

जहां सपनों के पंख फैले हैं

गर्मी है जहां छाँव भी है

ठंड भी है और बारिश भी है

इसी रूप में हम देखते हैं

अपने पिता को

यही जीवन का आकाश

कभी धधकता सूरज बनता है

हमें तपाकर मजबूत करता है

कभी शीतल चांदनी का एहसास है

असीम आकाश में –

कोई नहीं होती सीमा

हर उड़ान संभव है

थामे रहो विश्वास के पंख

पिता जीवन का आकाश है

उनमें धैर्य है, दृढ़ता है,

विस्तार है और स्वतंत्रता है

यही प्यारा आकाश है

जिसकी छांव में मिलता है

हमें जीवन का अर्थ-

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – पिता का प्यार… ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆

डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

 ☆ कविता ☆

☆ पिता का प्यार…☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆ 

पिता का प्यार

सृष्टि का सबसे अनमोल उपहार

पिता के लिए क्या लिखूं

शब्द कम पड़ जाते हैं

केवल भाव ही समझ आते हैं

मेरे लिए मेरे पिता एक पूरी दुनिया है

हर समस्या के लिए जादू की पुड़िया हैं

जीवन के उलझते प्रश्नों का समाधान है

मेरी आन बान और मेरी शान है कामना की कामना है

ऐसे ही आपकी यादों में खो जाऊं 

और हर जन्म में आपकी ही बेटी कहलाऊं

 

© डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

मो 9479774486

जबलपुर मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चट्टान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चट्टान ? ?

मैं

चट्टान बनकर खड़ा हूँ

प्रवाह के बीचों-बीच

वह

नदी बनकर

मेरे इर्द-गिर्द बह रही है

समीक्षा के शौकीन

प्रवाह की तरलता

और सरलता की

आदर्श कथा सुना रहे हैं

बगैर तथ्य जाने-समझे

मुझ पर संवेदनहीन,

जड़ और भोथरा

होने का आरोप लगा रहे हैं,

मैं चुप हूँ

वैसा ही, जैसे तब था,

तब…जब, वह

अपने सारे उफान,सारे तूफान

सारा आक्रोश,सारा असंतोष

मुझसे बयान करती

मेरे सीने से लगती

मुझसे लिपटती

कहती,सुनाती और रोती,

उसके भीतर जमा

सबकुछ प्रवाहित होने लगता

वह हल्की होती

शनैः-शनैः नदी बन

बहने लगती

….और मैं

भीतर ही भीतर समेटे

सारे झंझावत

निःशब्द खड़ा रह जाता,

उसे प्रवहमान करने

की प्रक्रिया में

सारा भीतर

भीतर ही भीतर सूख जाता,

ये सूखा भीतर

नित विस्तार पाता रहा

वह हर क्षण प्रवाह होती गई

मैं हर पल पाषाण होता रहा,

अब वह उछलती-कूदती नदी है

मैं हूँ निर्जीव चट्टान,

पर प्रवाह का

इतिहास लिखनेवालों का

है कहना;

हर नदी के लिए

आवश्यक है

एक चट्टान का होना! 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares