हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४३ – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं।)

✍ ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे  

जिसे चाहा उस फ़न का मैं माहिर बना

जुनूँ था कि,  क़ादिर बनू,  क़ादिर बना

चाहिता तो,  मुर्शिद भी बन सकता था 

ग़मज़दा बशर देखे तो मैं काफ़िर बना

 *

गाड़ी बंगला कोठी ये, सुकूं के सामां नही

सुकूं उसको मिला, जो कोई तारिक बना

 *

उस करिश्माई दरवेश के मैं सदके जाउं

जिस संग को छुआ उसने वो नादिर बना

 *

रब की ईबादत का सिला सबको मिला

कोई मुलाजिम बना तो कोई ताजिर बना

 *

वाइज़ की सोहबत, सबको कहां हांसिल

मुझ कमज़र्फ को मिली और मैं आरिफ़ बना

मुश्किल घडी में सब बचकर निकल गये

‘हेमंत’ वो तेरा दोस्त था जो जाँनिसार बना

क़ादिर = शक्तिमान, मुर्शिद = धर्मगुरु, ग़मज़दा बशर = दु:खी मनुष्य, काफ़िर = नास्तिक, तारिक = त्यागी, संग = पत्थर, नादिर = अमूल्य, ताजिर = सौदागर, वाइज़ = धर्मोपदेशक, आरिफ़ = ज्ञाता, जाँनिसार = प्राण रक्षक

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ?

☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

ही कोण सखी ,

सारखी माझ्या मागे मागे येते….

हलकेच करांगुली धरूनी,

मज त्या वाटेवर नेते,

*

त्या वाटेवरले काटे,

पावलांवर काढती नक्षी,

घोटाळती अवती भवती,

शब्दांचे मंजुळ पक्षी,

*

मी एकटीच असते तेव्हा,

ही असते माझ्या संगे,

मैफलीत वा एकांती

संवाद तिच्याशी रंगे

*

मी टाळाया बघते पण,

ती सोडत मजला नाही

ही अवखळ,हट्टी पोर

लावते जीवाला घोर,

*

प्रतिबिंब माझे तिच्यात,

डोळ्यातील बाहुली माझ्या,

सोडून दूर ना जाई

तिजवीण सुचेना काही…

*

अंधा-या  रातीलाही

करते जी माझी सोबत,

ती  सावलीच माझी

प्रतिभेच्या गावामधली !!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३५ – याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं आपकी रचना “याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३५ – याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

हैं यहाँ क़ातिल बहुत इंसान के

घोंटिये मत, खुद गले अरमान के
*
तिश्नगी को क्यों हवाले कर दिया

क्रूर संरक्षण में रेगिस्तान के
*
याद के जुगनू मेरे हमदर्द हैं

इनमें अंगारे नहीं अभिमान के
*
बेवफा अब बंद कर हमदर्दियाँ

बोझ ढो न पाऊंगा अहसान के
*
खैरख्वाहों की अधूरी लिस्ट है

और हैं दुश्मन अभी इस जान के
*
बन्द दिल की खिड़कियाँ करना नहीं

हैं नहीं अभ्यस्त हम सुनसान के
*
चिलमनों से यूँ न दिखलाओ शबाब

हुस्न मैं पीता नहीं हूँ छान के

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अहं से आत्मा तक… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “अहं से आत्मा तक…

? अहं से आत्मा तक…  ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

मैं करता नहीं

मात्र घटित होता हूँ

यह समझ आते ही

जीवन का भार

स्वतः ही उतरने लगता है

अहं भी आवश्यक है

वरना जीवन-यात्रा संभव नहीं

पर वही अहं

जब विराट आकार ले ले

तो अहंकार बन जाता है

और नाश का कारण बनता है

दीप यदि दीप रहे

तो उजाला देता है

आग दावानल बने

तो सब राख कर देती है

कर्म मेरे हाथ में है

फल मेरी मुट्ठी से बाहर

इस सत्य को स्वीकार लेना

आध्यात्मिक परिपक्वता की

पहली देहरी है

मैं मार्ग नहीं

मात्र पथिक हूँ

पगडंडी मेरे बिना भी रहेगी

समय मेरे बिना भी बहेगा

अपने को अपरिहार्य मानना

सबसे गहरा भ्रम है

ज्ञान बढ़े

तो सिर झुके

यदि गर्दन अकड़ जाए

तो समझ लेना —

वह ज्ञान नहीं

केवल एकत्रित सूचना है

जो जोड़ा

वह बोझ बना

जो बाँटा

वही आलोकित हुआ

मनुष्य संग्रह से नहीं

संवेदना से ऊँचा होता है

मैंने दिया

यह अहंकार है

मेरे द्वारा दिया गया

यह विनय है

इन दोनों के बीच

पूरा जीवन खड़ा है

जहाँ मैं भरा है

वहाँ मौन नहीं उतरता

जहाँ स्वयं को रिक्त किया

वहीं शांति ठहरती है

मैं छोटा हुआ

तो संसार बड़ा दिखा

कर्ता का मोह छोड़ा

तो जीवन सरल हुआ

मैं आवश्यक नहीं हूँ

मैं केवल निमित्त हूँ

यह समझ आते ही

संघर्ष गलने लगता है

और स्वीकार खिल उठता है

अहं साधन बने

तो उन्नति

अहं राजा बने

तो पतन निश्चित

जिस दिन जाना

कि मैं केंद्र नहीं

प्रवाह हूँ

उसी दिन

भीतर पहली बार

स्वतंत्रता उतरी

अंतिम सूत्र

घटने से मत डरो

झुकने से मत भागो

जितना घटेगा अहंकार

उतना बढ़ेगा मनुष्य

और जितना बढ़ेगा मनुष्य

उतना निकट आएगा

अपने ही सत्य के

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

(श्री संजय भारद्वाज जी के आलेख अहं और अहंकार से प्रेरित कविता

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि –  अहं और अहंकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संकल्प ? ?

अपनी सुविधा,

अपना गणित,

समीकरणों का

स्वानुकूल फलित,

सुविधाजीवी जब

बाएँ मुड़ रहे हों,

समझौते ठुकराने का

विवेक जगाए रखना

दाएँ मुड़ने का अपना

संकल्प बनाए रखना।

? 

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 11:03 बजे, 1 फरवरी 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०८ – जीवन में आलस्य का… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में आलस्य का। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०८ – जीवन में आलस्य का… ☆

जीवन में आलस्य का, बढ़ता जाता रोग।

व्यर्थ समय है बीतता, घटे लाभ का योग।।

*

कार्य पूर्ण होते नहीं, बढ़ता जाता भार।

जनता पिसती है सदा,पड़ती भारी मार।।

*

गलत राह पर ये चलें, करें देश बदनाम।

जब चाहे हड़ताल से, करते चक्का जाम।।

*

घर में ही बैठे रहें, करें जतन दिन रात।

अधिकारों की आड़ ले, देते रहते मात।।

*

नेतागीरी में लगे, खूब मचाते शोर।

कामकाज करते नहीं, निज स्वारथ पर जोर।।

*

सरकारी हर तंत्र में, ऐसों की भरमार।

कभी मुक्ति इनसे मिले,तब होगा उपकार।।

*

यही हाल हर घर सखे, मचता बड़ा बवाल।

मूर्तवान आलस्य ही, घर में करें धमाल।।

*

बैठ घरों में कर रहे, फेमस अपना नाम।

मोबाइल में खो रहे, रोज सुबह औ शाम।।

*

लाइक औ शेयर करें, मेसेज सुबह शाम।

व्हाटसएप व फेस बुक, चेटिंग में बदनाम।।

*

खाने में आगे रहें, मुख से छीनें भोग।

काम चोर मस्ती करें, मेहनत करते लोग।।

*

कर्तव्यों से विमुख हैं, धरे हाथ पर हाथ।

समय बीतने पर यही, सदा पीटते माथ।।

*

जीवन दर्शन अब यही, छाया है चहुँ ओर।

अगर ग्राफ बढ़ता गया, कैसी होगी भोर।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७० – कैसे हो गए हैं लोग? ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – कैसे हो गए हैं लोग?।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७० – कैसे हो गए हैं लोग? ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

आह!

कैसे हो गये हैं लोग

लग गया है

विचित्र रोग

आँखें बंद हो जाती हैं

देखते ही नया चेहरा,

किसी की सराहना

सुनते ही

आदमी हो जाता है बहरा ।

लोग ले रहे हैं

ईर्ष्या छाप दवा

दोस्ती हो गई है हवा |

पाँव पर टोपी है

टोपी पर पाँव हैं

दिल में

दया नहीं, दुआ नहीं, दाँव है।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६९ – “निष्ठुर सूर्य सारथी रथ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है  आपका एक अभिनव गीत निष्ठुर सूर्य सारथी रथ...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ निष्ठुर सूर्य सारथी रथ…॥ ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

शेष बचा है आँखों में

जो स्वप्न जरा सा था।

जिसे तोड़ कर लौट गया

वह निबिड़ कुहासा था ॥

 

निष्ठुर सूर्य सारथी रथ

की गति को मोड़ चला ।

विचलित कर सम्पूर्ण

खमंडल शंकित छोड़ चला ।

 

सारे थे गतिमान नखत जो

नभके आँगन में –

गुरुका गोचर उन सबको

एक बड़ी दिलासा था ॥

 

ऊष्म शिथिलतम लगे

तभी से मानक रश्मिरथी ।

नव आगत इस ऊष्म कथा

में यही रही गुत्थी ॥

 

इस घर की सीमाओं

में था जो बासंती चौक

खोज रहा वो नित्य बहाना

भला भलासा था॥

 

हवा बैठ खिड़की में

खोजे अपनी तरुणाई ।

अभीअभी जो बनी किशोरी

बन कर पुरवाई ।

 

पेड़ों की शाखों में नूतन

छेड़ नई सरगम

डरी डरी सी पूछ रही है

नदी कर्मनासा *।

* कर्मनाशा= बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमावर्ती एकनदी

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-01-2026

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतर-रेखा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अंतर-रेखा ? ?

वे दिखते हैं

जनवादी और

प्रगतिशील मंचों पर

‘सांस्कृतिक अस्मिता’ की

बखिया उधेड़ते हुए,

संस्कृति और इतिहास की

रक्षा के लिए सन्नद्ध खेमों में

‘वाम’ शब्द के अक्षरों और

मात्रा के चीथड़े करते हुए,

घोर साम्प्रदायिक आयोजनों और

सरकारी सेकुलरों की जमात में

समानुपाती संतुलन बनाते हुए,

हर तरह की सत्ता से

करीबी नाता जोड़

व्यवस्था को सदा गरियाते हुए,

अनुदान, प्रकाशन;

पुरस्कार की फेहरिस्त पर छाते हुए,

‘विद्रोही’ से लेकर

‘उपासक’ तक की उपाधि पाते हुए,

सुनो साथियो!

मैं चकित हूँ

अपने समय पर-

राजनीति और साहित्य की

अंतर-रेखा का अपहरण हुए

अरसा बीत गया और

हमें पता भी न चला!

मैं सचमुच चकित हूँ!!

?

© संजय भारद्वाज  

( बुधवार, दि 31.5.2017, प्रातः 11.08)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५० ☆ # “संविधान…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता संविधान…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५०  ☆

☆ # “संविधान…” # ☆

अभी गणतंत्र दिवस हमने मनाया है

संविधान पर दृढ़ विश्वास जताया है

हमारा संविधान कितना महान है

दुनिया को हमने बताया है

 

यह सामाजिक आर्थिक राजनीतिक न्याय पर टिका है

हर व्यक्ति के उत्कर्ष के लिए लिखा है

अभिव्यक्ति धर्म उपासना की स्वतंत्रता है

इसका प्रभाव सारे देश में दिखा है

 

कुछ लोग अलगाव की बात करते हैं

धूप में बैठकर  छांव की बात करते हैं

शहर में आलीशान जीवन जीते हुए

कभी-कभी गांव की बात करते हैं

 

भूख कितनी खूबसूरत है

रोजी-रोटी की सबको जरूरत है

जो खाली पेट निभाते हैं राष्ट्र धर्म

उनके दिलों में देश के लिए सच्ची मोहब्बत है

 

कुछ लोग वैचारिक गुलाम है

पथभ्रष्ट इरादों में नाकाम है

जो इसे बदलने की बात करते हैं

वह देशद्रोही है लगे हुए सुबह शाम है

 

संविधान को ना समझने वाले अल्प है

संविधान से ही होगा हमारा कायाकल्प है

संविधान ही हमारे जीवन का आधार है

संविधान को बचाना हमारा संकल्प है   /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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