हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “इस्तेमाल… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆

✍ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आदमी को आदमी

इस्तेमाल कर रहा

तरह तरह के

रिश्ते बना कर

एक दूसरे को

ठग रहा।

 

भरोसा करने वालों का

हर रोज

भरोसा टूट रहा

भरोसा तोड़ने वाला

ऐश कर रहा।

 

सत्य की खोज

करने वाला

खोज करता रहा

झूठ अपने आप में

पलता रहा।

 

ओ दुनिया बनाने वाले

सब कुछ बना कर

तुझे क्या मिल रहा

आदमी को क्यों

इस तरह

परेशान कर रहा।

 

बता दे तू भला

अक्ल देकर क्यों

अक्ल हर रहा

आदमी को क्यों

सिखाया जाल बुनना

जो बुन कर

उसी में फँस रहा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पिता कोई पैकेज नहीं होते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “पिता कोई पैकेज नहीं होते…”।

? पिता कोई पैकेज नहीं होते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

दोपहर के तीन बज रहे थे।

पुणे का श्मशान घाट धूप से झुलस रहा था।

आसमान चुप था।

धरती चुप थी।

और हवा में तैरती चंदन की गंध मानो किसी अदृश्य विदाई का संगीत बन गई थी।

एक काली चमचमाती कार आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला।

आर्यन उतरा।

चौंतीस वर्ष।

लंदन की बहुराष्ट्रीय कंपनी में निदेशक।

विदेशी वेतन।

डॉलर में पैकेज।

कंधे पर महँगा लैपटॉप बैग।

कान में ब्लूटूथ।

कलाई पर ऐसी घड़ी, जिसकी कीमत उसके पिता की पूरे वर्ष की पेंशन से अधिक थी।

उसने घड़ी देखी।

तीन बजकर पाँच मिनट।

रात नौ बजे की फ्लाइट थी।

कल बोर्ड मीटिंग।

वह तेज़ कदमों से भीतर आया।

सब व्यवस्था हो चुकी थी।

लकड़ियाँ सजी थीं।

पंडित मंत्रों के पन्ने उलट रहे थे।

और सफेद कपड़े में लिपटा एक शांत शरीर पड़ा था।

वसंतराव।

अठहत्तर वर्ष।

पिता।

आर्यन कुछ पल ठिठका।

चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, पर वही करुण मुस्कान अब भी अटकी थी।

वही चेहरा — जो कभी देर रात तक दरवाज़े पर बैठा उसका इंतज़ार करता था।

वही हाथ — जिन्होंने गिरते समय उसे उठाया था।

एक आँसू निकला।

उसने तुरंत पोंछ दिया।

गला साफ किया।

“सब जल्दी हो जाएगा ना? मेरी फ्लाइट है। कल बहुत ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन है। प्लीज़ समय पर करा दीजिए।”

पास खड़े अनिरुद्ध ने उसकी ओर देखा।

वे अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने वाली संस्था से थे।

उनकी आँखों में प्रश्न था —

क्या पिता के लिए भी समय स्लॉट तय होता है?

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

मंत्र शुरू हुए।

घंटी बजी।

आर्यन सब करता रहा — जैसे किसी प्रोजेक्ट की प्रक्रिया पूरी कर रहा हो।

बीच-बीच में घड़ी देखता रहा।

फिर वह क्षण आया।

उसने अग्नि दी।

लपटें उठीं।

धीरे-धीरे ऊँची होने लगीं।

धुआँ ऊपर उठा —

जैसे वर्षों का परिश्रम, त्याग, भूख, चिंता और अनकहे सपने आकाश में विलीन हो रहे हों।

कुछ देर बाद आर्यन ने वॉलेट निकाला।

“कितना बिल है? अस्थि-विसर्जन भी आप करवा दीजिए। मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा। जितना भी है, अभी ट्रांसफर कर देता हूँ।”

अनिरुद्ध शांत स्वर में बोले —

“आपका बिल पहले ही जमा है।”

आर्यन ठिठका।

“किसने किया?”

“सात वर्ष पहले आपके पिता स्वयं आए थे। तब चल भी मुश्किल से पाते थे।

उन्होंने पूछा था —

‘सब व्यवस्था ठीक रहेगी न? मेरे बेटे को कोई परेशानी न हो।’

उसी दिन उन्होंने अग्रिम भुगतान कर दिया।

और यह पत्र छोड़ गए थे।”

लिफाफा उसके हाथ में था।

हाथ काँप रहे थे।

उसने पत्र खोला।

प्रिय आर्यन,

मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।

तुम्हारी दुनिया बड़ी है।

मीटिंग, लक्ष्य, प्रस्तुति, यात्राएँ।

मेरी खबर सुनकर तुम्हें सबसे पहले छुट्टी और टिकट की चिंता होगी।

और बेटा, यह स्वाभाविक है।

मैंने तुम्हें इसलिए पढ़ाया था कि तुम आगे बढ़ो।

तुम्हारी उड़ान मेरे सपनों की ऊँचाई है।

एक बूढ़े शरीर के कारण अपने काम में बाधा मत आने देना।

इसलिए मैंने सब पहले ही कर दिया है।

यदि आ सको तो अच्छा।

न आ सको तो भी कोई शिकायत नहीं।

बस एक छोटी सी बात —

जब तुम छोटे थे और सड़क पार करते थे,

मैं तुम्हारा हाथ कसकर पकड़ता था।

आज जब तुम मुझे अग्नि दो,

तो तुम्हारा हाथ ढीला न पड़े।

और हाँ —

जल्दी लौट जाना।

तुम्हारी मीटिंग छूटनी नहीं चाहिए।

तुम्हारा

बाबा

पत्र समाप्त हुआ।

आर्यन के हाथ से वॉलेट गिर पड़ा।

राख में धँस गया।

पर उससे कहीं गहरा कुछ और धँस चुका था —

उसका अभिमान।

उसकी उपलब्धियाँ।

उसकी तथाकथित सफलता।

वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।

“बाबा…!

मैं कमाता रहा…

और आप मेरे लिए मरने तक की तैयारी करते रहे…!”

उसकी आवाज़ फट गई।

“मैंने आपके लिए समय नहीं निकाला…

और आपने मेरी सुविधा के लिए अपनी मृत्यु तक नियोजित कर दी?”

लपटें तेज़ हो उठीं।

मानो उत्तर दे रही हों।

उस रात आर्यन ने फ्लाइट रद्द कर दी।

मीटिंग छूट गई।

फोन बंद कर दिया।

वह पूरी रात वहीं बैठा रहा —

जलती चिता के सामने।

पहली बार उसने घड़ी नहीं देखी।

क्योंकि समय अब उससे छूट चुका था।

उसे समझ में आया —

सुविधाएँ प्रीपेड हो सकती हैं।

बीमा पॉलिसी प्रीपेड हो सकती है।

अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी प्रीपेड हो सकती है।

पर पिता का प्रेम कभी प्रीपेड नहीं होता।

वह उधार नहीं होता।

वह अनुबंध नहीं होता।

वह पैकेज नहीं होता।

वह अनंत होता है।

निःस्वार्थ होता है।

अपरिमेय होता है।

संस्था चिता सजा सकती है।

अस्थियाँ बहा सकती है।

पर जो हाथ बचपन में थामे गए थे —

उनका मूल्य कोई नहीं चुका सकता।

और जब संतानों की संवेदना सूख जाती है,

तब वे सफल तो रह जाते हैं —

पर पुत्र नहीं रह पाते।

पिता सचमुच

कोई पैकेज नहीं होते…!

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” – ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

नौके बेइ वकील भये हैं

कइ नोट्स तामील भये हैं

*

बढ़तड़ जा रइ है आबादी

बड़े गाँव तैसील भये हैं

*

पैलउँ बड़ी दॉँतकाटी रइ

अंतर बीसों मील भये हैं

*

ओके घर में छापा पर गव

घर-दफ्तर सब सील भये हैं

*

हिलबिलान हो गये कहाँ पै

गायब सारे चील भये हैं

*

रय जंगल में ठौर-ठिकाने

भटकन बारे भील भये हैं

*

‘भगवत’ पोल खुलत जा  रइ है

मनो फिलम की रील भये हैं

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जादू ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जादू ? ?

तपता मरुस्थल,

निर्वसन धरती,

सूखा कंठ,

झुलसा चेहरा,

चिपचिपा बदन,

जलते कदम,

दूर-दूर तक

शुष्क और

बंजर वातावरण,

अकस्मात

मेरी बिटिया हँस पड़ी,

अब लबालब

पहाड़ी झरने हैं,

आकंठ तृप्ति है,

कस्तूरी-सा महकता तन है,

तलवों में जड़ी मखमल है,

उर्वरा हर रजकण है,

चहुँ ओर श्रावण है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नारी तेरी अजब कहानी”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆

☆

नारी तेरी अजब कहानी,

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

बचपन में तो उछल कूदती,

घर आँगन में दौड़ लगाती।

देहरी के बाहर जाते ही-

अविरल आँसू रोज बहाती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अगनी में जब चाहे जलती,

तेजाबों से रोज नहाती।

सदियों से तू भोग रही है,

प्रतिक्षण हिंसक नई कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अग्नि परीक्षा देते देते,

सदियाँ बीत गयी हैं तुझको।

अंगारों पर फिर भी चलती,

अपने मुख से उफ् न करती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

हर समाज है शोषण करता,

अधिकारों से वंचित रखता।

कर्तव्यों का पाठ बताकर,

तोते सा पिंजड़े में रखता।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

धर्म के आगे तू हलाल है,

मानवता भी शर्मसार है।

आजादी अभिव्यक्ति नाम पर,

अब भी बुर्कों में जकड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

कुछ बोला तो तीन शब्द में,

जब चाहे बनवास घड़ी है।

परिवर्तन की हर आँधी से

कब से कोसों दूर खड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

चीर हरण अब भी होते हैं,

भीष्म द्रोण दुबके बैठे हैं।

भोग्या बनकर भोग रही है,

आदम युग से वही कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – पहचान…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

मुझे भी आता है जोर से बोलना

मैं भी दे सकता हूँ

चुभता हुआ जवाब,

मुझे भी याद हैं गालियाँ

मैं भी तोड़ सकता हूँ

किसी के हाथ-पाँव

मैं भी सन्ना सकता हूँ पत्थर ।

मगर मैं

यह सब नहीं करता

करूँगा भी नहीं,

बात सिर्फ इतनी सी है

कि मैं

अपनी पहचान नहीं खोना चाहता।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७२ – “ऋतु का संसार…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “ऋतु का संसार...”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ऋतु का संसार...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

(पैंतीस वर्ष पहले का नवगीत)

☆

यह शीतल –

फरवरी ।

 

काँटों से घर –

आँगन झार ।

टाँक रही

ऋतु का संसार ।

 

फिर –

संगेमरमरी ॥

 

भीगी साँसों

का अहसास ।

पढ़ता हो जैसे

मधुमास –

 

आईने –

अकबरी ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16-02-2026 

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चिरंजीव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चिरंजीव ? ?

लपेटा जा रहा है

कच्चा सूत

पुराने बरगद के

चारों ओर..,

आयु बढ़ाने की

मनौती से बनी

यह रक्षापंक्ति

अपनी सदाहरी

सफलता की गाथा

सप्रमाण कहती आई है,

कच्चे धागों से बनी

सुहागिन वैक्सिन

अनंतकाल से

बरगदों को

चिरंजीव रखती आई है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चुप रहने की सजा पाई है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆

☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆

☆

हमने चुप रहने की सजा पाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

 

जब भी चाहा कि कुछ बोलें

जब भी चाहा कि मुंह खोलें

देखकर हवाओं का मंजर

चूभो  रही है जैसे खंजर

भावनाएं हो गई है बंजर

कशमकश है अंदर ही अंदर

जिव्हा में ताला लग गया है

मन में अंजाना सा डर जग गया है

आंखों के आगे धुंध छाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया

कलियों ने भंवरों का दिल तोड़ दिया

फूल भी बेरंग हो गए अब

बगीचे बेढ़ंग हो गए अब

पतझड़ श्रृंगार को लुट गया

बहार का मौसम रूठ गया

चमन पर वीरानी छाई है

यह कैसी रुत आई है

हर तरफ बस तबाही तबाही है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

भूख और प्यास की कहानी है

बड़ी बेरहम यह जिंदगानी है

भरी जवानी में हाथ कट गए

बेरोजगारी से हम पट गए

आंखों में बहता हुआ पानी है

डिग्रीयां  अब तो बस बेमानी है

उम्मीदें ना उम्मीदगी में ढल गई

इच्छाएं आकांक्षाएं देखते देखते जल गई

जिंदगी किस मुकाम पर लाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई हैं

 

क्या समय के साथ व्यवस्था बदलेगी ?

क्या कटरता की बर्फ पिघलेगी ?

हमारा दुख दर्द कोई समझ पाएगा ?

हमारे लिए कोई आवाज उठाएगा ?

क्या वाटिका में रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे ?

लोक कटुता भूलकर एक दूसरे के गले मिलेंगे ?

क्या  नई किरण खुशियों का संदेश लाएगी ?

क्या चुप्पी तोड़ जिव्हा कुछ कह पाएगी ?

नई सुबह ने हर दिल में उम्मीद की ज्योत जलाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९६ – सागर की लहरें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘सागर की लहरें…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९६ ☆ सागर की लहरें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

सागर की लहरें, लहर लहर,

कुछ उठती हैं, लहराती हैं,

कुछ धीरे से ही उठती हैं

कुछ जोर लगाकर उठती हैं,

उठती हैं, फिर गिर जाती हैं,

उठती अन्तस गहराई से,

उठती हैं, वो चतुराई से,

वो लहरों से कतराती हैं,

फिर लहरों पर गिर जाती हैं,

इनको देखो तो गिनना तुम,

कभी इनकी बातें, सुनना तुम,

बस शोर नहीं है इनका वो,

अंतर्द्वंद को सुनना तुम,

भागी आती हैं, किनारे पर,

तट पे सिमटती जाती हैं,

क्या कहा, कभी, कुछ तट ने था

कदमों में सर को पटकती हैं,

क्या कहा था तट ने न जाने,

लहरें बेचैन हुई क्यों हैं,

क्या रिश्ता है, तट से इनका,

क्यों सर को अब भी पटकती हैं,

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

Please share your Post !

Shares