हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०६ ☆ कैसे कहूं? ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – कैसे कहूं?)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०६– साहित्य निकुंज ☆

☆ कैसे कहूं? ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

भाव मन में 

बहने लगे 

अनायास

कैसे कहूं।

 

कुछ न आता समझ

व्यक्त कैसे करूं

मन की बातें

कैसे कहूं।

 

दिल पर 

छाई है उदासी

बेवजह

कैसे कहूं।

 

उनके शब्दों में

 है जान 

मिलती है प्रेरणा

कैसे कहूं।

 

बिखरे शब्द 

लगे समिटने

मिला आकर

कैसे कहूं।

 

आयेगा वो पल

 चमकेगी किस्मत

समझोगे तब

कैसे कहूं।

 

है मंजिल सामने

वहीं है खास

हो जाती हूं नि:शब्द

कैसे कहूं।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८८ ☆ कविता – माँ के चरणों में भगवान… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – माँ के चरणों में भगवान आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८८ ☆

कविता – माँ के चरणों में भगवान☆ श्री संतोष नेमा ☆

माँ की महिमा बड़ी महान

माँ के चरणों में भगवान

*

आँखों में जब नींद न आती

लोरी गाकर हमें सुलाती

थप-थपाती प्यार से सिर को

देकर मधुर सुरीली तान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

संकट में वह साहस देती

नजर उतार बलैयां लेती

मुश्किलों के आगे भी वह

खड़ी रहे जो सीना तान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

मंज़िल की माँ राह दिखाती

संस्कार अच्छे सिखलाती

परिवार की जननी बन कर

करे सदा सबका कल्यान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

कहाँ हैं अब आँख के तारे

माँ  के  थे  जो  राजदुलारे

भूल गए वो अब यौवन में

अपनी माँ का भी सम्मान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

घर में जब होता बंटवारा

माँ का दिल रोता बेचारा

अपनी ही खुशी में सारे

भूल गए माँ की मुस्कान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

जिसने सबको पाला-पोसा

उसके लिए न किसने सोचा

बे-बस माँ सिसक कर कहती

बेटे   पूर्ण    करो    अरमान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

माँ  से  बनते  रिश्ते  सारे

माँ से  ही घर में उजियारे

काम-काज दिन-रात करती

फिर भी आती नहीं थकान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

गर्म किसी का माथा होता

माँ का दिल अंदर से रोता

बिन दवा के बन जाती है

माँ दुआओं की इक दुकान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

माँ का दिल मत कभी दुखाना

वही है खुशियों का खजाना

कहता है “संतोष”सभी से

माँ की सेवा कर नादान

माँ की महिमा बड़ी महान

*

माँ   का   ऊँचा  है     स्थान

करिए माँ का सब  गुणगान

माँ के चरणों में भगवान

माँ की महिमा बड़ी महान

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ८ – कविता – अधीरता… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘अधीरता।)

☆ शशि साहित्य # ८ ☆

? कविता – अधीरता…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

बहारों के आने का मौसम है,

शाखों पर नई कोपलें आने को है…

 

छाएगा कई रंगों का दामन हर तरफ,

खुशबू, मदहोशी का तराना गुनगुनाने को है…

 

बन गया आसमान, सुरमई रंगों का पटल…

चांदनी, तारों भरा आंचल लहराने को है…

 

मन हो रहा बावरा, बेचैन भावना,

लगता है फिर नयी ख्वाहिश,

जन्म लेने को है…

 

बोझिल हो रही पलकें,

पर नींद है लापता…

खुली आंखों में, कोई सपना फिर सजने को है…

 

विरक्त हो रहा मन,

झमेलों से, झंझटों से…

ईश्वर ..कुछ नया लिखने को है…

 

लगता है परिपक्व होने लगी हूं मैं,

दुनिया पर कम, खुद पर भरोसा होने को है…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७३ ☆ मकर संक्रांति – साधना पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मकर संक्रांति – साधना पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७३ ☆ मकर संक्रांति – साधना पर्व

सजा है आसमाँ  पतंगों   से 

नेह के  गीत गुनगुनायेंगे ।

पेंच पड़ते हुए गजब देखो

डोर मिल प्रीत की बढ़ायेंगे ।।

*

दृश्य क्या खूब हुआ मौसम का

इंद्रधनुषों की ही बहारे हैं ।

जीत होवे सदा से उनकी जो

कर्म करके जहाँ सजायेंगे ।।

*

पर्व पावन है संक्रति का

दान तिल गुड़ का करते जायेंगे।

डुबकी अमृत भरी चलो लेकर

नर्मदे हर ही नित्य गायेंगे ।।

*

भोग खिचड़ी का सब लगाया जो

सूर्य आराधना समर्पित है ।

उत्तरायण हुआ है मंगल जो

गीत भजनों को हम सुनायेंगे।।

जब आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती हैं, तब लगता है मानो जीवन स्वयं हमें पुकार रहा हो—

“उड़ो, पर अपनी जड़ों को मत भूलो।”

मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि ऊँचाई पाने के लिए कटुता नहीं, कटौती चाहिए—अहंकार की, आलस्य की, नकारात्मक सोच की।

जैसे किसान नई फसल की तैयारी करता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में नए संकल्पों के बीज बोने चाहिए।

जो स्वयं को साध ले, वही सच में ऊँचा उड़ता है।

सूर्य का तेज आपके जीवन को प्रकाशित करे,

अन्न की समृद्धि आपके घर में बनी रहे,

और आपके जीवन की पतंग सदैव ऊँचाइयों को छुए।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८८ ⇒ सूरज के तेवर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज के तेवर।)

?अभी अभी # ८८८ ⇒ आलेख – सूरज के तेवर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ये महाशय सूरज,

ऊंचे घोर अंबर में रहाते हैं

जेठ की भरी दुपहरी में

तो तमतमाते हैं ,

और जब पौस माह में

आसमान में ड्यूटी देते हैं

तो ठंड में कंपकंपाते हैं ।

अजीब फितरत है इनकी

कभी आग का गोला

तो कभी बर्फ का गोला !

दिन के चौकीदार हैं ये

खुद रात को तानकर सोते हैं;

कल तो इन्होंने हद कर दी

दिन भर बादलों का

कंबल ओढ़कर पड़े रहे

और अपनी रोशनी को

भी कंबल में छुपा लिया ।।

तलवार में जंग नहीं लगती

तलवार जंग लड़ने के लिए होती है ;

सूरज भी रोशनी देने के लिए होता है,

उसे भी कहीं जाड़ा लगता है !

लेकिन समय का फेर देखिए,

दिन में भी कभी यह सूरज

मुंह छुपाता है

तो कभी बारिश के रूप में

घड़ियाली आंसू बहाता है ।।

कभी तो मन करता है

एक रूमाल से इसके आंसू

पोंछ दूं,

थोड़ी इसको भी विक्स

की भाप दे दूं

इस बेचारे का कौन है

उस बेरहम आसमान में ।

फिर खयाल आता है

जब सूरज को ग्रहण लगता है तो पुजारी भगवान का मंदिर भी नहीं खोलता !

कौन देवता बड़ा है

मंदिर वाला अथवा

आसमान वाला यही

हमारा आदित्यनाथ ।।

सर्वशक्तिमान भुवन भास्कर की

यह दशा हमसे देखी नहीं जाती ।

इस धरा के हर प्राणी की निगाह आसमान पर ही लगी रहती है । उसका तेज ही हमारा तेज है ।

काश गलत हो हमारा अनुमान !

आज नहीं ऐसा कोई बाल हनुमान,जो फिर सूरज को बर्फ का गोला समझ मुंह में धर ले ।

समस्त वसुन्धरा की ओर से हमारा सूर्य नमस्कार

स्वीकार करें ।

यह ईश्वर का कोप हो

अथवा प्रकृति का प्रकोप

प्रकृति से खिलवाड़ करने वाले हम इंसान ही हैं ।

हमारी खता माफ़ हो ।

अपनी लीला समेटें !

स्वयं प्रकाशित हों

और समस्त चराचर को भी अपनी स्वर्ण रश्मियों से आलोकित एवं आल्हादित करें ।

ॐ सूर्याय नम:

ॐ हिरण्यगर्भाय नम‌:

ॐ रवये नम:

ॐ खगाय नम:

ॐ मित्राय नमः

ॐ पूष्णे नमः

ॐ मारीचाय नम:

ॐ सावित्रे नम:

ॐ अर्काय नमः

ॐ भानवे नम:

ॐ आदित्याय नमः:

ॐ भास्कराय नमः

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८१ ☆ बाल कविता – मित्र पुस्तकें रखना ध्यान… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८१ ☆ 

☆ बाल कविता – मित्र पुस्तकें रखना ध्यान ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

कहें पुस्तकें और किताबें,

या इनको बुक भी कह लो।

ज्ञान बढ़ाएँ, मित्र बनाएँ,

संग-साथ इनके रह लो।

*

इनमें गीता, रामायण हैं,

इनमें ही हैं वेद , पुराण।

इनमें है गुरुओं की वाणी,

इनमें बाइबल और कुरान।

*

अक्षर-अक्षर पुस्तक बनती,

इनमें है विज्ञान कहानी।

इनमें धरती, लोक, गगन है,

आज-कल की बात पुरानी।

*

इन्हें सहेजे सब ही रखना,

इनसे ही स्कूली ज्ञान।

भाषाएँ सारी हम पढ़कर,

बन जाते अच्छे इंसान।

*

अलमारी, बस्ते घर इनके,

रखना बच्चो सब ही ध्यान।

जो भी पढ़ते सदा लगन से,

उनका जग करता सम्मान।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३२ – आप बड़े हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “आप बड़े हैं।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३२ – आप बड़े हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

आप निगलते सूर्य समूचा

अपने मुँह मिट्ठू बनते हैं,

हमने माना

आप बड़े हैं!

पुरखों की

उर्वरा भूमि से यश की फसल आपने पायी,

अपनी महनत से, बंजर में हमने थोड़ी फसल उगाई।

हम ज़मीन पर पाँव रखे हैं,

पर, काँधों पर

आप चढ़े हैं!

किंचित किरणों

को हम तरसे आप निगलते सूर्य समूचा,

बाँह पसारे मिला अँधेरा उजियारे ने हाल न पूछा।

आप मनाते दीपावलियाँ

लेकिन हमने

दीप गढ़े हैं!

भ्रष्ट, घिनौनी

करतूतों से तुमने अर्जित कीं उपाधियाँ,

भूख, गरीबी, लाचारी की हमें पैतृक मिलीं व्याधियाँ।

तुमने, ग्रन्थ सूदखोरी के

हमने तो बस

कर्ज़ पढ़े हैं!

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अक्षय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अक्षय ? ?

पत्थर से टकराता प्रवाह,

उकेर देता है

सदियों की गाथाएँ

पहाड़ों के वक्ष पर,

बदलते काल

और ऋतुचक्र

के संस्मरण

लिखे होते हैं

चट्टानों की छाती पर,

और तो और

जीवाश्म होते हैं

उत्क्रांति का

एनसाइक्लोपीडिया,

और तुम कहते हो,

लिखने के लिए

शब्द नहीं मिलते..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०५ – सजल – पर पापा कभी नहीं बदले ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – पर पापा कभी नहीं बदले। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०५ – सजल – पर पापा कभी नहीं बदले ☆

(पदांत- पर पापा कभी नहीं बदले, मात्रा भार- 16+16=32)

सालों गुजरे ऋतुएं बदलींपर पापा कभी नहीं बदले।

पेंट शर्ट बंडी भी पहनीं,पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

दृढ़ के पक्के सीधे सादे, बाल हुए चाँदी के तब भी।

जग ने आव-भगत को छोड़ा, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

बिछुड़ गए थे दांत सभी पर, हँसी ठहाका कभी न छूटा।

फटी जेब खाली ही रहती, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

बड़ा हुआ जब बेटा उनका, पैर समाया उनका जूता।

डाँट पिलाते रहते कड़़वी, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

हर कदमों पर हाथ थामते, ठोकर लगती कभी न गिरता।

तेज कदम से आगे चलते, पर पापा कभी नहीं बदले।।

 *

कहते बेटा भोला भाला, छल छद्मों का चढ़ा है पारा।

अब मैं भी पापा बना हुआ, पर पापा कभी नहीं बदले।।

यादों की अब लिए पोटली, जीवन पथ पर बढ़ता जाता ।

पथ-भटका तो राह दिखाई, पर पापा कभी नहीं बदले।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

26/12/25

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६७ – सुरक्षा ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – सुरक्षा।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६७ – सुरक्षा ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रिय

बंधु बांधवी

आप

भारत भूमि के

आदिवासी नहीं आदि अधिकारी हो

चाहे आपका निवास हो

झारखण्ड

या सरगुजा

या

बस्तर के अबूझमाड़ में

आपके प्राण बसते हैं

नदी, पहाड़ या झाड़ में

आपके कारण ही सुरक्षित हैं

वन सम्पदा

और संस्कार ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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