हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सत्य की स्वीकारोक्ति” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – सत्य की स्वीकारोक्ति  ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

कुछ सवाल पूछता हूँ

परछाई से, प्रतिबिंब से

ग़म और आंसुओं से

उदासी से और तन्हाई से

जवाब जो आता है

प्रतिध्वनियों के चक्रवात में

उलझ जाता है

पहले के भी,

कितने ही प्रश्न

जैसे अंतरिक्ष की कक्षाओं में

भटकते परिक्रमा कर रहे हैं

शायद विधान मेरे प्रश्नों के उत्तर

अस्वीकारता है

क्योंकि शायद मैं

तयशुदा जीवन की व्यवस्था से

विद्रोह के स्वर में पूछता हूँ

दुविधा यह है कि, किसी हद तक

” यह सही है ” मैं भी क़ुबूलता हूँ…!!!!!

☆

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५१ ☆ # “तुम जो मिली…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तुम जो मिली…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५१ ☆

☆ # “तुम जो मिली…” # ☆

☆

चलते चलते एक राह मिल गई

जीने की एक चाह मिल गई

हाथ थामने एक बांह मिल गई

तुम जो मिली संसार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मैं आकाश में उड़ने लगा

चांद तारों से जुड़ने लगा

नए सपनों की तरफ मुड़ने लगा

तुम जो मिली प्यार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

मन की वाटिका में फूल खिलने लगे

तितलियों के संग तन मिलने लगे

देख देख आवारा भंवरें जलने लगे

तुम जो  मिली उपहार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नई कोपलें फूटने लगी

नई उमंगे जुटने लगी

नई तरंगे उठने लगी

तुम जो  मिली घर बार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

नदी सागर सा प्यार है

उठती लहरों सा ज्वार है

टूटती रूढ़ियों की कगार है

तुम जो  मिली एतबार मिल गया

जीने का आधार मिल गया

 

हृदय में मधुर मधुर सा स्पंदन है

पलकों में सागर सागर सा अभिनंदन है

निराकार को कोटि-कोटि वंदन है

तुम जो मिली पुरस्कार मिल गया

जीने का आधार मिल गया /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ९४ – तुम्हारे साथ ही हूँ मैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘त्यौहार…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९४ ☆ तुम्हारे साथ ही हूँ मैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं…

 

मेरा ही अक्स तुममें है,

तुम्हारे पास ही हूँ मैं,

पुष्प तुम, गंध ही हूँ मैं,

तन तुम, साँस ही हूँ मैं,

मन की आस में तुम हो,

मन की आस में हूं मैं,

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं…

 

वसुधा के जैसी तुम,

अम्बर सा ही हूँ मैं,

क्षितिज में एक हों हम,

तेरा एहसास ही हूँ मैं,

मुझे महसूस करना तुम,

तुम्हारे साथ ही हूँ मैं…

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६६ – प्रात-गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – प्रात-गीत।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६६ ☆

☆ प्रात-गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

सपने देखे सुंदर सुंदर

अब जग जाएँ रे!

भोर भई उठ जग को

मंगल गान सुनाएँ रे!

.

करतल बसते हैं विधि-हरि-हर

सुमिर प्रणाम करो रे सादर।

शारद-उमा-रमा में रमकर

नमन करो भू-नभ को, पगधर

सुख दे-पाएँ रे!

.

चित्रगुप्त प्रभु का मन-मंदिर

कर्म देव का यह तन है घर

काम करें हर प्रभु-अर्पण कर

फल जो-जितना उचित मानकर

प्रभु-यश गाएँ रे।

.

पंछी नाचें फुदक-चहककर

फूल खिल रहे नित्य महककर

हम क्यों दुर्बल व्यर्थ फिक्रकर

जीवन जैसा जिएँ हर्षकर

खुशी मनाएँ रे!

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१.२.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – श्वेत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – श्वेत ? ?

हरेक में रहता है श्वेत,

हरेक में बसता है श्वेत,

श्वेत का मूल श्वेत है,

अश्वेत का भी मूल श्वेत है,

नैतिकता में घोलकर

थोप दी गई हैं वर्जनाएँ

श्वेतांबराओं की देह पर,

नैतिकता काल के अनुरूप

परिवर्तित होती है,

सर्वदा धन, धर्म,

रसूख की सगी होती है,

समय की ग्लोबल डॉक्यूमेंट्री में

उभरता है क्लाइमेक्स..,

नैतिकता के सगों ने

खींचकर श्वेतांबराओं की देह से,

ओढ़ लिया है श्वेत,

दिगंबरायें अब

आ नहीं सकती देहरी के पार,

श्वेत का अखंड जयकार

व्योम होता है,

सिर्फ श्वेत ही है

जो सार्वभौम होता है।

?

© संजय भारद्वाज  

(29.1.2021 को नींद में उपजी कविता। लेखन रात्रि 2:27 बजे।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २२ – कविता – बदलता है… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “बदलता है…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता – # २२ ?

? बदलता है… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

न भ्रष्टाचार बदलता, न ही प्यार बदलता है

दोनों स्थितियों में, बाबू-यार बदलता है

=2=

दंगे आगजनी किडनैप रेप साजिश मर्डर

ख़बरें लगभग रोज़ वही, अख़बार बदलता है

=3=

इंतज़ार इक़रार वफ़ा की बातें करता जो

वो शायर अक़्सर अपना अशआर बदलता है

=4=

घुटता जो अन्दर-अन्दर, घर-द्वार की उलझन में

बाहर-बाहर वो काशी-हरिद्वार बदलता है

=5=

तिल-तिल गला रही उसको, रोजगार की चिंता

सपने में वो सपनों का, संसार बदलता है

=6=

मन की बात कहूँ, मतदाता मन ही मन सोचे

वो मन ही मन मनचाही सरकार बदलता है

=7=

‘राजेश’ उससे न्याय की उम्मीद मत करो

जो लीडर नित, नये-नये दरबार बदलता है

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९५ ☆ मुक्तक – ।। जिंदगी तेरा अभी कर्ज़ चुकाना बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९५ ☆

☆ मुक्तक ।। जिंदगी तेरा अभी कर्ज़ चुकाना बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

जिंदगी अभी चल कि प्रभु का कर्ज चुकाना बाकी है।

किसी पराये का भी कुछ दर्द मिटाना बाकी है।।

रिश्तों की तुरपाई करनी है आपस में मिल कर।

ईश्वर के शुकराने में भी सिर झुकाना बाकी है।।

=2=

किसी के पेट की आग अभी बुझाना बाकी है।

नई-नई पीढ़ी को भी सही राह सुझाना बाकी है।।

बहुत काम कर लिया है जीवन भर इस सफर में।

फिर भी अभी कुछ नया करके दिखाना बाकी है।।

=3=

जीवन के मोड़ों की कई गाँठे अभी सुलझाना बाकी है।

हँसते – हँसते हुए भी अभी रूठना मनाना बाकी है।।

छूट गया पीछे जो जीवन की लंबी सी इस दौड़ में।

तिनका – तिनका जोड़ कर उस को जुटाना बाकी है।।

=4=

दिल कीअधूरी बात भी अभी सबको सुनाना बाकी है।

किसी रोते हुए को भी हमें अभी हँसाना बाकी है।।

जो मिली अनमोल वरदान सी यह एक ही जिंदगी।

उस जिंदगी का बाकी फ़र्ज़ अभी निभाना बाकी है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५८ ☆ कविता – तरुणों का दायित्व… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – तरुणों का दायित्व…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५८ ☆

☆ तरुणों का दायित्व…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆ 

सँवर सजकर के बचपन ही बना करता जवानी है।

जवानी ही लिखा करती वतन की नई कहानी है ॥

 

भरे इतिहास के पन्ने, जवानी की खानी से

है गाथायें कई जो दमकती यौवन के पानी से।

 

परिस्थितियाँ बदल दी हैं जवानी ने जमाने की

अनेकों हैं मिसालें, हारते को भी जिताने की।

 

हुये कई वीर जिनकी कथा हर मन को जगाती है

कहानी जिन्दगी की जिनकी नई आशायें लाती है। 1

 

महाराणा प्रताप, रणजीत, गुरूगोविंद, शिवाजी ने

किये जो कारनामे क्या कभी मन से पढ़ा हमने ?

 

उन्हें पढ़, भाव श्रद्धा से है झुकता सिर जवानी का

नमन करते हैं सब उनको औं उनकी हर कहानी का।

 

जो बच्चे आज हैं, वे ही वतन के हैं युवा कल के

उन्हें ही देश का नेतृत्व करना दो कदम चल के।

 

समझता है उन्हें दायित्व अपना सावधानी से

वतन, परिवार, घर को वे सहारा दें जवानी से ।

 ☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पगडंडी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पगडंडी ? ?

वे खोदते रहे

जड़, ज़मीन, धरातल,

महामार्ग बनाने के लिए,

नवजात पादप रौंदे गए,

वानप्रस्थी विटप धराशायी हुए,

वह अथक चलता रहा,

पगडंडी गढ़ता रहा,

पगडंडी के दोनों ओर

आशीर्वाद बरसाते

अनुभवी वृक्ष खड़े रहे,

चहुँ ओर बिखरी हरी घास से

पगडंडी को आशीष मिले,

महामार्ग और सरपट टायर के

समीकरण विशेष हैं,

पर पग और पगडंडी

शाश्वत हैं, अशेष हैं,

विधाता !

परिवर्तन की अपरिवर्तनीयता से

अमरबेलों को बचाए रखना,

पग और पगडंडी के रिश्तों को

यूँ ही सदाफूली बनाए रखना..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८० – नवगीत – जीवन धारा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन धारा…  ।

? रचना संसार # ८० – गीत – जीवन धारा…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

रुकती है कब जीवन धारा,

अविरल बहती जाती है।

समय चक्र के साथ उम्र भी,

पल पल ढलती जाती है।।

*

चीर भँवर को जीवन नैया,

नित्य भव का पार निखरे।

टकराती तूफानों से है,

बाधाओं से क्या बिखरे।।

लक्ष्य की चाह लेकर मन में,

अविरल बढ़ती जाती है।

*

रुकती है कब जीवन धारा,

अविरल बहती जाती है।।

**

सागर कितना भी गहरा हो,

नदी नहीं पर घबराती।

प्रबल वेग से मिल जाने को,

लहर -लहर वह लहराती।

चाहत की अभिलाषा हिय में,

हर पल पलती जाती है।

*

रुकती है कब जीवन धारा,

अविरल बहती जाती है।।

**

कभी राह में पत्थर मिलते,

कभी पुष्प बिछ जाते हैं।।

मिलन विरह के दौराहे पर,

मंजिल कर्मठ पाते है।

यही सोच सुख दुख धारों में,

नदिया चलती जाती है।।

*

रुकती है कब जीवन धारा,

अविरल बहती जाती है।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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