(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री रामनारायण सोनी जी द्वारा रचित काव्य संग्रह – “विद्युल्लता” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 155 ☆
☆ “विद्युल्लता… ” (काव्य संग्रह)– श्री रामनारायण सोनी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति चर्चा
पुस्तक चर्चा
कृति विद्युल्लता (काव्य संग्रह )
कवि रामनारायण सोनी
चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ पुस्तक चर्चा – श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद… विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆
कविता न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है। कविता मन को एक साथ ही हुलास, उजास और सुकून देती है। नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला। संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं। सभी रचनायें भाव प्रवण हैं। काव्य सौष्ठव परिपक्व है। सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है। वे विधा में पारंगत भी हैं। उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है। सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है। कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है, उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है। वे गंभीर रचनाकर्मी हैं।
सारी कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव, साहित्यिक सौंदर्य-बोध, प्रयोगों मे किंचित नवीनता, अनुभूतियों के चित्रण, संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है। आत्म संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं। जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं। उदाहरण के लिये “नेपथ्य के उस पार” से उधृत है … खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ। जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं। ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है।
संग्रह से ही दो पंक्तियां हैं … ” वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है, आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है। ” मोहक चित्र बनाते ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं। रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं।
रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं ” तुम वरेण्य हो, हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो …. सौ पृष्ठीय किताब की अंतिम रचना में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है। सोनी जी की भाषा में ” ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल, जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल “।
यह जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण, सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे। इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं। मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन, मनन, चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का दिशा दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं।
☆ जब सारा विश्व राममय हो रहा है, तब प्रासंगिक कृति – “रघुवंशम” – श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ पुस्तक चर्चा – आचार्य कृष्णकांत चर्तुवेदी ☆
कृति चर्चा
पुस्तक. . . महा कवि कालिदास कृत महा काव्य रघुवंश का हिन्दी पद्यानुवाद
पद्यानुवादक. . प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध
प्रकाशक. . . अर्पित पब्लीकेशन कैथल
मूल्य. . १५० रु
पुस्तक उपलब्ध.. ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी, जे के रोड, भोपाल ४६२०२३
☆ पुस्तक चर्चा – महा कवि कालिदास कृत महा काव्य रघुवंश का हिन्दी पद्यानुवाद… आचार्य कृष्णकांत चर्तुवेदी ☆
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध कृत महाकवि कालिदास के रघुवंश महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद एक उल्लेखनीय रचनाधर्मी कृति है. महाकाव्य की दृष्टि से और लयात्मक प्रस्तुति की दृष्टि से रघुवंश मे १९०० से अधिक श्लोक हैं जिनका श्लोकशः छंद बद्ध हिन्दी काव्य अनुवाद कर प्रो श्रीवास्तव ने संस्कृत न जानने वाले , राम कथा में अभिरुचि रखने वाले करोड़ो हिनदी पाठको के लिये बहुमूल्य सामग्री सुलभ की है. अनूदित साहित्य सदैव भाषा की श्रीवृद्धि करता है. फिर यह अनुवाद इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो गया है कि विदग्ध जी के इस हिन्दी अनुवाद को आधार बनाकर अंगिका भअषा में रघुवंश का पद्यानुवाद भि किया गया है.
प्रो श्रीवास्तव की कृतियो में विषय प्रतिपादक के रूप मे उनके व्यक्तितत्व की अनेक धाराओ का दर्शन होता है. वे भारत की सांस्कृतिक वाणी संस्कृत के ज्ञानी , अच्छे पाठक और सहृदय भाव प्रवण अनुवादक है. मेघदूत का काव्यानुवाद वे पहले ही कर चुके है. उनके द्वारा किया गया भगवत गीता के हिन्दी काव्य अनुवाद के कई संस्करण छप चुके हैं.
मूलतः रघुवंश बहुनायक महाकाव्य है. इसे अपूर्ण महाकाव्य कहा गया है. ऐसी जगह काव्य रूक गया है जहां के अनुभव बडे तिक्त और कटु है. महाकवि ने पुराण और महाभारत की वस्तु प्रतिपादन शैली का अवलंब लेकर रघु के वंश के प्रमुख चरित्रो पर यह काव्य रचना की है. रघु दिलीप अज दशरथ और राम के चरित्रो तक उज्जवलतम दीप मालिका राम के चरित्र के दीपस्तभं के रूप मे शिखर तक पहुचंती है. वही अग्निवर्ण जैसे घृणित राजसत्ता के उपजीव्य तक पहुचंते पहुंचते अधंकारमय हो जाती है. महाकवि कालिदास ने वहा पर ही महाकाव्य क्यों समाप्त किया इस पर भी एतिहासिक सामाजिक अकाल मृत्यु आदि आधारो पर विद्वानो ने अपने तर्क दिये है जो भी हो रघुवंश अपने वर्तमान रूप मे हमारे सामने है जो संपूर्ण संस्कृत महाकाव्य परंपरा से पृथक और विलक्षण है.
जहां तक काव्य सौष्ठव और भाव संपदा का प्रश्न है रघुवंशम संस्कृत वांगमय मे सर्वोत्तम और अद्वितीय है. अनुष्टुप जैसे छोटे छंदो में भी गहरी काव्य अनुभूति करना केवल महाकवि कालिदास के ही वश की बात थी. यही कारण है कि विश्व साहित्य में मेघदूत , अभिज्ञान शांकुलतम और रघुवंश का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध ने अपने स्वाध्याय प्रेमी व्यक्तित्व के कारण महाकवि कालिदास का पूरा साहित्य पढा और मुक्तको में श्रेष्ट मेघदूत तथा महाकाव्य में श्रेष्ठ रघुवंश को अनुवाद के लिये चुना. प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव जी की सहृदयता और वर्तमान विद्रूपता विशेषतः राजसत्ता की निरकुंश व्यवहार शैली ने उन्हें रघुवंश को हिंदी में अनुवाद करने के लिये चुनने हेतु प्रेरित किया होगा.
अनुवाद करना मूल रचनाकर्म से अधिक गूढ कार्य है. मूल रचना मे आपके काव्य संसार कविदेक प्रजापतिः यथास्मै रोचते विश्वं तथेंव परिवर्ततः अर्थात अपार काव्य संसार की सृष्टि करने के लिये कवि ही एकमात्र ब्रम्हा है. नये काव्य में स्वयं कवि ब्रह्मा जी की सृष्टि से भिन्न भी अपने संसार को जैसा रूप देना चाहता है वह देने मे समर्थ है. किंतु अनुवादक की सीमायें मूलकाव्य में बंधी होती हैं. बहुत भावाकुल होने पर भी उसे अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति को रोकना पडता है. दूसरी ओर कवि की आत्मा मे पर देह प्रवेश भी करना पडता है. यह परव्यक्ति अनुभव के तादाम्य मे समाधि की तरह है. वहां तक पहुंचना फिर योग्य शैली, पद्यति , पदावली और भावाभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने मे कुशलता काव्य भाव अनुवाद से की जाने वाली महति अपेक्षाये है.
वैसे तो मेघदूत और रघुवंश के और भी अनुवाद हुये हैं, किंतु प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध की तन्मयता और अनुवाद कुशलता प्रशंसनीय है. कालिदास की कृतियो में एक गहरी दार्शनिकता भी है. जिसे उसी तरह भाव अनुदित करना दुष्कर कार्य है. अपने विशद अध्ययन से ही इसका समुचित निर्वाह करने में विदग्ध जी सफल हुये हैं. रघुवंश का प्रथम पद्य इसका उत्तम उदाहरण है. छोटे छंद अनुष्टुप में किया गया मंगलाचरण का अनुवाद करते हुये प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ने लिखा है
जग के माता पिता जो पार्वती शिव नाम
शब्द अर्थ समएक जो उनको विनत प्रणाम
इसी भांति महाकवि कालिदास द्वारा दिलीप की गौसेवा का जो सुरम्य वर्णन किया गया है उसका अनुवाद भी दृष्टव्य है.
व्रत हेतु उस अनुयायी ने आत्म, अनुयायियो को न वनसाथ लाया
अपनी सुरक्षा स्वतः कर सके हर मुनज इस तरह से गया है बनाया
जब बैठती गाय तब बैठ जाते रूकने पे रूकते और चलने पे चलते
जलपान करती तो जलपान करते यूं छाया सृदश भूप व्यवहार करते.
रघु के द्वारा अश्वमेध यज्ञ के अश्व की रक्षा के प्रसंग मे इंद्र से युद्ध करते हुये उसके महत्व को स्वंय इंद्र रेखांकित करते हुये कहते हैं. .
वज्राहत रघु के पराक्रम और साहस से
होकर प्रभावित लगे इंद्र कहने
सच है सदा सद्गुणो में ही होती है ताकत
सदा सभी को करने सदा वश मे
रघु की दिग्विजय के संदर्भ में कलिंग के संबंध मे अनुवाद की सहजता देखे
बंदी कर छोडे गये झुके कलिंग के नाथ
धर्मी रघु ने धन लिया रखी न धरती साथ
कौरव की गुरूदक्षिणा का संदर्भ देखें. . .
पर मेरे फिर फिर दुराग्रह से क्रोधित हो
मेरी गरीबी को बिन ध्यान लाये
दी चौदह विद्या को ध्यान रख
मुझसे चौदह करोड स्वर्ण मुद्रा मंगाये
अज अब इंदुमती के स्वंयवर के लिये आये है रात्रि विश्राम के बाद प्राप्त बंदिगण स्तुति कर रहे है. . .
मुरझा. चले हे पुष्प के हार कोमल औं फीकी हुई जिसकी दीप्त आभा
पिंजरे मे बैठा हुआ छीर भी यह जगाता तुम्हें कह हमारी ही भाषा
रघुवंश का छटवा संर्ग अत्यंत लोकप्रिय एवं आकर्षक है. इसकी उपमायें उत्प्रेक्षाये एवं उपमानो का अनुवाद अदभुत एवं पूर्णतः सार्थक है. इसी सर्ग के दीपशिखा के उपमान के कारण महाकवि कालिदास को दीपशिखा कालिदास कहा जाता है. इंदुमती के स्वंयवर में आये राजाओ का मनोरम वर्णन विज्ञ चारणो के द्वारा किया जा रहा है. उसके बाद इंदुमती की सखी एक एक राजाओ की वरण योग्य विशेषताये बता रही है.
तभी सुनंदा ने इंदुमती को मगध के नृप के समीप लाकर
सभी नृपो की कुलशील ज्ञाता प्रतिहारिणी ने कहा सुनाकर
महिष्मति के राजा प्रदीप का उसके पूर्वजो अनूप और सहस्त्रबाहु सहस्त्रार्जुन का परिचय देते हुये अंत मे सुनंदा ने कहा
इस दीर्घ बाहु की बन तू लक्ष्मी यदि राजमहलो की जालियो से
माहिष्मति की जलोर्मि रचना सी रेवा जो लखने की कामना है
इन छह पद्यो का अनुवाद श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ने बडे मनोयोग एवं भाव प्रबलता के साथ किया है. महाकवि कालिदास का उज्जयनी प्रेम प्रसिद्ध है. अनुवादक कवि विदग्ध भी इससे अछूते नही है.
अनुवाद दृष्टव्य है.
ये विशाल बाहु प्रशस्त छाती सुगढ बदन है अवंतिराजा
जिसे चढा शान पर सूर्य सी दीप्ति के गढता रहा है जिसको विधाता
इन पद्यो के द्वारा अनुवादक का संस्कृत भाषा का गहरा ज्ञान , काव्य का उत्तम अभ्यास और भाषातंर करने की प्रशंसनीय क्षमता का परिचय मिलता है. इसके अतिरिक्त ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो में दिये गये उनके योगदान से भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अनुभव होता है. इस परिपक्व वय मे ऐसी जिज्ञासा बौद्धिक प्रभाव और गतिशीलता दुलर्भ है. वे आज भी तरूण की भांति नगर की सांस्कृतिक एवं साहित्यीक गतिविधियों का गौरव बढा रहे है.
मै प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध को उनकी इस अनूदित कृति के लिये हृदय से बधाई देता हॅू. मुझे पूरा विश्वास है कि रघुवंश हिंदी पद्यानुवाद सुधिजनो को आल्हादित एवं उनकी ज्ञान पिपासा को संतुष्ट करेगी.
पुस्तक चर्चा – आचार्य कृष्णकांत चर्तुवेदी
पूर्व निदेशक कालिदास अकादमी उज्जैन
नर्मदा पुरम , जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी द्वारा रचित पुस्तक – “श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 154 ☆
☆ “श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद… ” – श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति चर्चा
पुस्तक चर्चा
कृति … श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद
अनुवादक …. प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ” विदग्ध ”
प्रकाशक …. ज्ञान मुद्रा पब्लीकेशन, भोपाल
पुस्तक प्राप्ति हेतु संपर्क +918720883696
पृष्ठ … 300
चर्चा… विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ पुस्तक चर्चा – श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद… विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆
श्रीमदभगवदगीता एक सार्वकालिक ग्रंथ है . इसमें जीवन के मैनेजमेंट की गूढ़ शिक्षा है . आज संस्कृत समझने वाले कम होते जा रहे हैं, पर गीता में सबकी रुचि सदैव बनी रहेगी, अतः संस्कृत न समझने वाले हिन्दी पाठको को गीता का वही काव्यगत आनन्द यथावथ मिल सके इस उद्देश्य से प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” ने मूल संस्कृत श्लोक, फिर उनके द्वारा किये गये काव्य अनुवाद तथा शलोकशः ही शब्दार्थ पहले हिंदी में फिर अंग्रेजी में को उम्दा कागज व अच्छी प्रिंटिंग के साथ यह बहुमूल्य कृति भोपाल के ज्ञान मुद्रा पब्लीकेशन ने पुनः प्रस्तुत किया है . अनेक शालेय व विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमो में गीता के अध्ययन को शामिल किया गया है, उन छात्रो के लिये यह कृति बहुउपयोगी बन पड़ी है .
भगवान कृष्ण ने द्वापर युग के समापन तथा कलियुग आगमन के पूर्व (आज से पांच हजार वर्ष पूर्व) कुरूक्षेत्र के रणांगण मे दिग्भ्रमित अर्जुन को, जब महाभारत युद्ध आरंभ होने के समस्त संकेत योद्धाओ को मिल चुके थे, गीता के माध्यम से ये अमर संदेश दिये थे व जीवन के मर्म की व्याख्या की थी .श्रीमदभगवदगीता का भाष्य वास्तव मे ‘‘महाभारत‘‘ है। गीता को स्पष्टतः समझने के लिये गीता के साथ ही महाभारत को पढना और हृदयंगम करना भी आवश्यक है। महाभारत तो भारतवर्ष का क्या ? विश्व का इतिहास है। ऐतिहासिक एवं तत्कालीन घटित घटनाओं के संदर्भ मे झांककर ही श्रीमदभगवदगीता के विविध दार्शनिक-आध्यात्मिक व धार्मिक पक्षो को व्यवस्थित ढ़ंग से समझा जा सकता है।
जहॉ भीषण युद्ध, मारकाट, रक्तपात और चीत्कार का भयानक वातावरण उपस्थित हो वहॉ गीत-संगीत-कला-भाव-अपना-पराया सब कुछ विस्मृत हो जाता है फिर ऐसी विषम परिस्थिति मे गीत या संगीत की कल्पना बडी विसंगति जान पडती है। क्या रूद में संगीत संभव है? एकदम असंभव किंतु यह संभव हुआ है- तभी तो ‘‘गीता सुगीता कर्तव्य‘‘ यह गीता के माहात्म्य में कहा गया है। अतः संस्कृत मे लिखे गये गीता के श्लोको का पठन-पाठन भारत मे जन्मे प्रत्येक भारतीय के लिये अनिवार्य है। संस्कृत भाषा का जिन्हें ज्ञान नहीं है- उन्हे भी कम से कम गीता और महाभारत ग्रंथ क्या है ? कैसे है ? इनके पढने से जीवन मे क्या लाभ है ? यही जानने और समझने के लिये भावुक हृदय कवियो साहित्यकारो और मनीषियो ने समय-समय पर साहित्यिक श्रम कर कठिन किंतु जीवनोपयोगी संस्कृत भाषा के सूत्रो (श्लोको) का पद्यानुवाद किया है, और जीवनोपयोगी ग्रंथो को युगानुकूल सरल करने का प्रयास किया है।
इसी क्रम मे साहित्य मनीषी कविश्रेष्ठ प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव जी ‘‘विदग्ध‘‘ ने जो न केवल भारतीय साहित्य-शास्त्रो धर्मग्रंथो के अध्येता हैं बल्कि एक कुशल अध्येता भी हैं स्वभाव से कोमल भावो के भावुक कवि भी है। निरंतर साहित्य अनुशीलन की प्रवृत्ति के कारण विभिन्न संस्कृत कवियो की साहित्य रचनाओ पर हिंदी पद्यानुवाद भी आपने प्रस्तुत किया है . महाकवि कालिदास कृत ‘‘मेघदूतम्‘‘ व रघुवंशम् काव्य का आपका पद्यानुवाद दृष्टव्य, पठनीय व मनन योग्य है।गीता के विभिन्न पक्षों जिन्हे योग कहा गया है जैसे विषाद योग जब विषाद स्वगत होता है तो यह जीव के संताप में वृद्धि ही करता है और उसके हृदय मे अशांति की सृष्टि का निर्माण करता है जिससे जीवन मे आकुलता, व्याकुलता और भयाकुलता उत्पन्न होती हैं परंतु जब जीव अपने विषाद को परमात्मा के समक्ष प्रकट कर विषाद को ईश्वर से जोडता है तो वह विषाद योग बनकर योग की सृष्टि श्रृखंला का निर्माण करता है और इस प्रकार ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्म योग, भक्तियोग, उपासना योग, ज्ञान कर्म सन्यास योग, विभूति योग, विश्वरूप दर्शन विराट योग, सन्यास योग, विज्ञान योग, शरणागत योग, आदि मार्गो से होता हुआ मोक्ष सन्यास योग प्रकारातंर से है, तो विषाद योग से प्रसाद योग तक यात्रासंपन्न करता है।
इसी दृष्टि से गीता का स्वाध्याय हम सबके लिये उपयोगी सिद्ध होता हैं . अनुवाद में प्रायः दोहे को छंद के रूप में प्रयोग किया गया है . कुछ अनूदित अंश बानगी के रूप में इस तरह हैं ..
इस तरह प्रो श्रीवास्तव ने श्रीमदभगवदगीता के श्लोको का पद्यानुवाद कर हिंदी भाषा के प्रति अपना अनुराग तो व्यक्त किया ही है किंतु इससे भी अधिक सर्व साधारण के लिये गीता के दुरूह श्लोको को सरल कर बोधगम्य बना दिया है .गीता के प्रति गीता प्रेमियों की अभिरूचि का विशेष ध्यान रखा है। गीता के सिद्धांतो को समझने में साधको को इससे बडी सहायता मिलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। अनुवाद बहुत सुदंर है। शब्द या भावगत कोई विसंगति नहीं है। अन्य गीता के अनुवाद या व्याख्येायें भी अनेक विद्वानो ने की हैं पर इनमें लेखक स्वयं अपनी संमति समाहित करते मिलते हैं जबकि इस अनुवाद की विशेषता यह है कि प्रो श्रीवास्तव द्वारा ग्रंथ के मूल भावो की पूर्ण रक्षा की गई है।
(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अश्विनी कुमार दुबे जी द्वारा रचित पुस्तक – “स्वप्नदर्शी” (भारत रत्न मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया जी के जीवन पर केंद्रित उपन्यास) पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 153 ☆
☆ “स्वप्नदर्शी” (भारत रत्न मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया जी के जीवन पर केंद्रित उपन्यास) – श्री अश्विनी कुमार दुबे ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆
कृति चर्चा
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – “स्वप्नदर्शी” (भारत रत्न मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया जी के जीवन पर केंद्रित उपन्यास)
लेखक – श्री अश्विनी कुमार दुबे
प्रकाशक – इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
मूल्य – २५० रु, वर्ष २०१७
पृष्ठ – २२४
चर्चा… विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ पुस्तक चर्चा – स्वप्नदर्शी … विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆
मन से अश्विनी कुमार दुबे व्यंग्यकार हैं, उपन्यासकार और कथाकार हैं। दुबे जी को म प्र साहित्य अकादमी, भारतेंदु पुरस्कार, अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार, स्पेनिन सम्मान आदि से समय समय पर सम्मानित किया गया है। यद्यपि रचनाकार का परिचय किसी पुरुस्कार या सम्मान मात्र से बिल्कुल नहीं दिया जा सकता। दरअसल सच ये होता है कि श्री अश्विनीकुमार दुबे के रचना कर्म के समदृश्य बहुविध लेखन करने वाले गंभीर रचनाकर्मी का ध्यान पुरुस्कार और सम्मानो के लिये नामांकन करने की ओर नहीं जाता, वे अपने सारस्वत लेखन अभियान को अधिक वरीयता देते हैं। आजीविका के लिये अश्विनी कुमार दुबे अभियंता के रूप में कार्यरत रहे हैं। उनका रचनात्मक कैनवास वैश्विक रहा है। भारत रत्न मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया जी के जीवन पर केंद्रित उनका उपन्यास “स्वप्नदर्शी” बहुचर्चित है। यह उपन्यास केवल व्यक्ति केंद्रित न होकर विश्वेश्वरैया जी के जीवन मूल्यों, संघर्ष और कार्य के प्रति उनकी ईमानदारी तथा निष्ठा को प्रतिष्ठित करता है। भगवान को भी जब रातों रात सुदामा पुरी का निर्माण करवाना हो तो उन्हें विश्वकर्मा जी की ओर देखना ही पड़ता है। बदलते परिवेश में भ्रष्टाचार के चलते इंजीनियर्स को रुपया बनाने की मशीन समझने की भूल घर, परिवार, समाज कर रहा है। इस आपाधापी में अपना जमीर बचाये न रख पाना इंजीनियर्स की स्वयं की गलती है। समाज व सरकार को देखना होगा कि तकनीक पर राजनीति हावी न होने पावे। मानव जीवन में विज्ञान के विकास को मूर्त रूप देने में इंजीनियर्स का योगदान रहा है और हमेशा बना रहेगा। किन्तु जब अश्विनी जी जैसे अभियंता लिखते हैं तो उनके लेखन में भी वैज्ञानिक दृष्टि का होना लेखकीय गुणवत्ता और पाठकीय उपयोगिता बढ़ाकर साहित्य को शाश्वत बना देता है।
अश्विनी जी के विश्वेश्वरैया जी पर केंद्रित उपन्यास “स्वप्नदर्शी” में पाठक देख सकते हैं कि किस तरह वैचारिक तथ्य तथ्यो को भाषा, शैली और शब्दावली का प्रयोग कर अश्विनी जी ने अपनी लेखकीय प्रतिभा का परिचय दिया है। उन्होंने विषय वस्तु को शाश्वत, पाठकोपयोगी, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। यह जीवनी केंद्रित उपन्यास वर्ष २०१७ में प्रकाशित हुआ है अर्थात पाठक को इसमें लेखन यात्रा में एक परिपक्व लेखक की अभिव्यक्ति देखने मिलती है। इसके लेखन के दौरान अश्विनी जी मधुमेह और उच्च रक्तचाप की बीमारियों से ग्रसित रहे हैं पर उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से उपन्यास की सामग्री संजोई और कल्पना के रंग भरकर उसे जीवनी परक उपन्यास के रोचक फार्मेट में पाठको के लिये प्रस्तुत किया है। मेरे पढ़ने में आया स्वप्नदर्शी विश्वेश्वरैया जी पर केंद्रित पहला ही उपन्यास है। किसी के जीवन पर लिखने हेतु रचनाकार को उसके समय परिवेश और परिस्थितियों में मानसिक रूप से उतरकर तादात्म्य स्थापित करना वांछित होता है। स्वप्नदर्शी में अश्विनी जी ने विश्वेश्वरैया जी के प्रति समुचित न्याय करने में सफलता पाई है। उपन्यास से कुछ पंक्तियां उधृत हैं, जिन से पाठक अश्विनी कुमार दुबे के लेखन में उनकी वैज्ञानिक दृष्टि की प्रतिछाया का आभास कर सकते हैं।
” तुम्हें खुली आँखों से देखना और जिज्ञासु मन से समझना है। अपनी जिज्ञासा को कभी मरने मत देना “
” सिर्फ कृषि कार्यों पर निर्भर रहकर हम अपनी गरीबी दूर नहीं कर सकते, निर्धनता से लड़ने के लिये हमें अपने उद्योग और व्यापार को बढ़ाना होगा “
” इंग्लैँड में एक प्रतिष्ठित नागरिक ने विश्वेश्वरैया जी से उपहास की दृष्टि से पूछा जब सारी दुनिया अस्त्र शस्त्र बना रही थी, तब अपका देश क्या कर रहा था ? विश्वेश्वरैया जी ने तपाक से उत्तर दिया तब हमारा देश आदमी बना रहा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी इसी दौर के भारतीय हैं जिन्होंने दुनिया को शाश्वत दिशा दी है। विश्वेश्वरैया जी के इस जबाब का उस अंग्रेज के पास कोई उत्तर नहीं था “
” चमत्कारों में मेरा भरोसा नहीं है। मैं आदमी के हौसलों का कायल हूं। मैने एक स्थान देखा है जहाँ विशाल बांध बनाया जा सकता है ” …. ये मैसूर के निकट सुप्रसिद्ध कृष्णराज सागर बांध के विश्वेश्वरैया जी द्वारा किये गये रेकनाइसेंस सर्वे का वर्णन है।
“शेष अंत में”, “जाने अनजाने दुख” और “किसी शहर में” स्वप्नदर्शी के अतिरिक्त अश्विनी कुमार दुबे के अन्य उपन्यास हैं। यह पठनीय उपन्यास है।
श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञाच्या निमित्ताने मी प्रस्तावनेसह एकूण सात भागांच्या पुस्तकांवर लिहित गेले. भागवत कथा ही कोटी सूर्याच्या तेजाएवढी आहे. मी त्यापुढे फक्त काजवा आहे. तरीही मी त्यावर लिहिण्याचे धाडस केले आहे. वाचकांनी ते गोड मानले असेल अशी अपेक्षा करते. आजच्या सातव्या दिवसाच्या पुस्तकावर लिहिताना मला खूप आनंद होतो आहे. या ज्ञानसागरातील एक बिंदू तरी मला वेचता आला, तो तुम्हासारख्या सुजाण वाचकांसमोर ठेवता आला. याचा तो आनंद आहे. यात काही संशोधन, पांडित्य प्रदर्शन अजिबातच अभिप्रेत नाही. संस्कृत भाषेचे थोडे फार ज्ञानही मला इथे उपयोगी पडले आहे.
या पुस्तकाच्या सुरुवातीस लेखकाने यानंतरच्या समाप्ती विषयी सांगितले आहे. ते असे– की सात दिवस सात पुस्तकांचे वाचन वा श्रवण करावे. रोजच शेवटी आरती करावी. त्यासाठी या भागाच्या शेवटच्या पानांवर लेखकाने संस्कृत व प्राकृत भाषेत भागवताची आरती दिली आहे. आठव्या दिवशी सामुदायिक रीत्या अठरा अध्याय गीता व विष्णुसहस्त्रनामाचे पठण करावे. महाप्रसाद करून हा सप्ताह संपवावा. असे लेखकाने स्पष्ट केले आहे.
या पुस्तकाची सुरुवात अकराव्या स्कंधाने होते. हा श्रीकृष्ण चरित्राचा उत्तरार्ध आहे. शुकाचार्य परीक्षिताला यादवांच्या विनाशाची कारणे सांगतात. प्रथम नारद व वसुदेव यांची भेट झाली. वसुदेवाला नारदांनी भागवत धर्माचे महत्त्व सांगितले आहे. भगवद् भक्तांचा श्रेष्ठ धर्म म्हणजे,
कायेन वाचा मनसेंन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वानुसृत् स्वभावात् |
करोति यद्यद् सकलं तदस्मै
नारायणेति समर्पयेत् तत् ||
असे नारदांनी सांगितले आहे. सर्व प्राणिमात्रात परमेश्वर आणि आपल्या आत्म्यात सर्व प्राणिमात्र आहेत. असे जो पाहतो तो खरा सर्वश्रेष्ठ भगवद्भक्त! असे भगवद् भक्ताचे लक्षण येथे दिले आहे.
भागवताचा हा कथा भाग म्हणजे केवळ गोष्टीरूप नाही तर येथे केवळ जीवनाचे तत्त्वज्ञानच महर्षी व्यासांनी सांगितले आहे. जीव, शरीर हेच आत्मा असे समजतो. कर्माची फळे भोगतो. हेही विशद केले आहे. मुनींनी सृष्टीच्या अंताची प्रक्रिया सांगितली आहे. शंभर वर्षे सतत अनावृष्टी होईल. नंतर सांवर्तक नावाचे मेघ शंभर वर्षे मुसळधार वर्षाव करतील. मग प्रलय होईल. पृथ्वीवरील सुखे लगेच नष्ट होणारी आहेत. भागवताच्या अभ्यासाने जीव तरुन जाऊ शकतो, इत्यादी तत्त्वज्ञान सांगितले आहे. शुकाचार्य सांगतात की ज्याच्यामुळे आपण जिवंत असतो, इंद्रिये हालचाल करतात, ती शक्ती म्हणजे परमात्मा !! चराचर सृष्टीतील भगवंताची पूजा कशी करावी हे पुढे सविस्तर सांगितले आहे.
यानंतर विष्णूंनी जे चोवीस अवतार घेतले त्यांचे थोडक्यात वर्णन आले आहे. पुढे चार युगातील पूजा पद्धती कशा कशा होत्या,त्या त्या देवतांचे वर्णन केले आहे. लाभाच्या दृष्टीने कलियुग श्रेष्ठ आहे. कारण केवळ भगवंताचे नामस्मरण, कीर्तन, श्रवण यानेच या युगात मोक्ष मिळतो. असे लेखक म्हणतात.
यानंतर ब्रह्मदेवासह सर्व देव ऋषीमुनी द्वारकेत येऊन कृष्णाला भेटतात. ब्रह्मदेव श्रीकृष्णाला परत वैकुंठाला यावे अशी प्रार्थना करतात. तेव्हा यादव कुलाचा विनाश झाल्यावर मगच मी वैकुंठाला येईन असे श्रीकृष्ण म्हणतात. उद्धव मात्र श्रीकृष्णाच्या सह वैकुंठास जाण्याची इच्छा व्यक्त करतो. तेव्हा कृष्ण उद्धवाला उपदेश करतात. हा उपदेश म्हणजे सुद्धा फक्त जीवनाचे तत्त्वज्ञानच आहे. श्रीकृष्ण त्यासाठी उद्धवाला अवधूत या विरक्त, आत्मानंदात मग्न असणाऱ्या तरुणाची कथा सांगतात. तो विरक्त का असतो? याचे उत्तर म्हणजे “अवधूत गीता” आहे. या अवधूतानेच हा सर्व उपदेश केला आहे, असा वृत्तांत सांगून श्रीकृष्णांनी उद्धवाला सुखदुःखाची अशाश्वतता कशी असते, हे सांगण्यासाठी अनेक उदाहरणे दिलेली आहेत. अनेक छोटे मोठे दाखले व गोष्टी या ठिकाणी आल्या आहेत. सत्संगतीचे महत्त्व, भक्ती व ध्यान यांचे महत्त्व, सर्व अष्टसिद्धींचे विवेचन करून भगवंत उद्धवाला — कुरुक्षेत्रावर अर्जुनाला जी विभूतीची पवित्र स्थाने सांगितली– तीच स्थाने सांगतात. सर्व प्राणिमात्रातील आत्मा मीच आहे वगैरे वगैरे.
यानंतर चार वर्ण, चार आश्रम स्वीकारताना लोकांनी कसे वागावे, याचा उपदेश कृष्ण उद्धवाला करतात. ते कसे कठीण आहे हेही इथे सांगितले आहे. पुढे वैराग्य युक्त ज्ञान,भक्तीयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग यांचे सविस्तर विवेचन श्रीकृष्ण करतात. पुढचे, शुद्ध काय, अशुद्ध काय याचे वर्णन तर आजच्या काळातही प्रत्येकाला उपयोगी पडणारे आहे.
अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा |
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर:शुचि: ||
या मंत्राने कोणत्याही कर्माच्या कर्त्याची शुद्धी होते, असे श्रीकृष्ण सांगतात.
मूलतत्त्वे किती? प्रकृती- पुरुष यात भेद की अभेद? याविषयी उद्धवाच्या शंकेचे निरसन श्रीकृष्णाने केले आहे. उद्धवाने एक प्रश्न विचारला आहे की, विद्वानांनाही दुष्ट लोकांनी केलेले अपमान सहन होत नाहीत. मग सामान्यांना ते कसे शक्य होईल? यावर श्रीकृष्णाने उद्धवाला जो उपदेश केला, तो “भिक्षु गीता” म्हणून प्रसिद्ध आहे. “मी” ही भावनाच या सर्वाला कारणीभूत ठरते. यानंतर सांख्य तत्त्वज्ञान, सत्व, रज, तम या तीन वृत्ती यांचे वर्णन आले आहे. पुढे पुरूरवा व उर्वशीची छोटी कथा आली आहे. श्रीकृष्ण उद्धवाला कर्मयोग पूजा पद्धतीची माहिती देतात. ज्ञानयोग भक्तीयोग वगैरे सविस्तर सांगून श्रीकृष्ण उद्धवाला बद्रिकाश्रमात जाण्याची आज्ञा देतात. भागवत धर्माचे चिंतन केल्याने तू जीवन्मुक्त होशील असे सांगतात.
यानंतरचा कथा भाग– द्वारकेत काही उत्पात सुरू होतात. ही यादवांच्या विनाशाची चिन्हे असतात. यावर श्रीकृष्ण सर्व यादवांसह प्रभासक्षेत्री शंखोद्धार तीर्थाला जाण्याचा पर्याय शोधतात. तिथे मद्य पिऊन सर्व यादव आपापसात लढले व यादव कुळाचा विनाश झाला. बलरामही समुद्र काठावर योगधारणा करीत बसले व सदेह पृथ्वीतल सोडून गेले. श्रीकृष्णही एका पिंपळाच्या झाडाखाली डावा पाय उजव्या मांडीवर ठेवून बसून राहिले. त्याचवेळी जरा नावाच्या शिकाऱ्याने हरीण समजून कृष्णाच्या पायावर अणकुचीदार बाण मारला. तो बाण जमिनीवर पडला. त्या भिल्लाने जवळ येऊन पाहिले तर त्याला चतुर्भुज श्रीकृष्णाचे दर्शन झाले. त्याला श्रीकृष्ण म्हणाले,” हे सारे माझ्या इच्छेनेच घडले आहे. मी आता तुला वैकुंठप्राप्ती देतो.” त्याच वेळी कृष्णाचा सारथी दारूक रथ घेऊन तिथे आला. त्याला सर्व हकीकत सांगण्यास कृष्णाने द्वारकेस धाडले. तो खिन्न मनाने द्वारकेस गेला. त्याने हस्तिनापुरासही हे वर्तमान कळविले. पुढचे वर्णन श्रीकृष्णाचे निजधामाला जाणे आणि द्वारका नगरी समुद्रात पूर्ण बुडणे याचे केलेले आहे. परमेश्वराच्या अवतार समाप्तीनंतर इथे अकरावा स्कंध समाप्त होतो.
बाराव्या स्कंधाच्या सुरुवातीला शुकाचार्य पृथ्वीवर पुढे कोणकोणत्या राजांनी राज्य केले, याची परीक्षिताला माहिती देतात. कलियुगात लोक कसे वागतील, जगतील याचे पूर्ण वर्णन, आजच्या काळात जे घडते आहे, तसेच तंतोतंत भागवतात केले आहे. पण त्यावर कलियुगातील दोषांवरचे उपायही सांगितले आहेत. प्रलय, युगे, कल्प यांचे वर्णन करताना शुकाचार्य सांगतात की, नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यंतिक व नित्य हे चार प्रलयाचे प्रकार आहेत. शुकाचार्य परीक्षित राजाला सांगतात की, आपण मरणार! ही बुद्धी तू आता सोडून दे. कारण आत्मा अमर आहे.
परीक्षित राजाचा देह भस्मसात झाल्यावर त्याचा पुत्र जनमेजय सर्पयज्ञ करतो. ही कथा आली आहे. बृहस्पती त्याला उपदेश करतात. मग तो सर्पयज्ञ थांबवतो.सूत महर्षींनी शौनकांना ही कथा सांगितली. ते शौनकांना वेदविस्तार, विभागणी याविषयी विवेचन करतात. प्रथम शब्द ॐकाराविषयीची माहिती पुढे दिली आहे.
पुराणे म्हणजे काय? ती कोणती आहेत? याचे थोडक्यात वर्णन पुढे लेखकाने केले आहे. यानंतर मार्कंडेय ऋषींची कथा सांगितली आहे. त्यांना नरनारायणांनी वर दिला. त्यात त्यांनी प्रलयही अनुभवला. त्यांना नरनारायणांनी – तुम्ही कल्पांतापर्यंत अजरामर व्हाल, त्रिकालज्ञ व्हाल, पुराणांचे आचार्य व्हाल असा वर शंकरांनी प्रदान केला. पुढे सूर्याच्या सृष्टीचक्राचे वर्णन आले आहे. सनातन धर्म म्हणजे काय? हे पुढे शौनकांनी सूतांना सांगितले आहे. शिवाय पहिल्यापासून भागवतात कोणते विषय आले आहेत? त्या सर्व कथानकांचा थोडक्यात आढावा घेतला आहे. थोडक्यात — भागवतमहिमा वर्णिलेला आहे. अठरा पुराणांची प्रत्येकी श्लोक संख्या किती? हे सांगितले आहे. अकरावा स्कंध हे भगवंताचे मन तर बारावा स्कंध हा भगवंताचा आत्मा आहे. असे लेखक म्हणतात.
यानंतर लेखकाने ब्रह्मदेव, नारद, वेदव्यास, शुकाचार्य यांना वंदन केले आहे.
सर्वात शेवटी परमात्म्याला वारंवार नमस्कार करून लेखकाने भगवंताची प्रार्थना केली आहे.
इथे बारावा स्कंध समाप्त होतो व सातव्या दिवसाचा कथा भाग संपतो.
या पुस्तकाच्या मुखपृष्ठावर परब्रम्ह परमात्म्याचे समग्र दर्शन घडविले आहे.
भवे भवे यथा भक्ति: पादयोsस्तव जायते |
तथा कुरुष्व देवेश नाथस्त्वं नो यत: प्रभो ||१||
*
नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपाप प्रशमनम् |
प्रणामो दुःख शमनस्तं नमामि हरीम् परम् ||२||
सर्वात शेवटी हे दोन श्लोक दोन वेळा म्हणून, सर्वांनी पोथीची पूजा करून, नैवेद्य आरती करावी व जयजयकार करावा असे लेखकाने सांगितले आहे. हा श्लोक म्हणजे भागवताचा उपसंहार आहे. संपूर्ण भागवत श्रवणाचा निष्कर्ष म्हणून, सर्व दुःखे दूर करून, निरंतर आनंद देणाऱ्या या भगवंत मूर्तीचे आपाद मस्तक ध्यान करून त्याच्या चरणारविंदाला नमस्कार करूया.
|| श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||
इथेच मी प्रस्तावनेसह लिहिलेले आठ भाग संपले. भागवत कथेवरील सात पुस्तकांचे वाचन, अभ्यास आणि तोडके मोडके का होईना, पण विवेचन करण्याचे बळ मला परमात्म्यानेच दिले. हे माझे महद्भाग्य आहे. यात जर काही चुकत असेल तर आपण मोठ्या मनाने क्षमा करावी.
(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है स्टार्ट-अप प्रारम्भ करने के लिए कुछ विशेष पुस्तकों पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 152 ☆
☆ स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं तो… ☆ विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆
स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं तो ये पुस्तकें प्रारंभिक जानकारी देंगी
1. स्टार्टअप प्लेबुक – इस किताब में सबसे तेज़ी के साथ बढ़ने वाले स्टार्टअप्स के फ़ाउंडर्स ने अपने राज़ साझा किए हैं, जिसे पुस्तक में संजोया है डेविड किडर ने।
2. द फ़ोर आवर वर्कवीक, तिमोती फ़ेरिस की यह किताब बताती है कि किस तरह से आप आय के स्रोत तैयार कर सकते हैं और उन्हें ऑटोमेट कर सकते हैं ताकि आप पूरी तरह से अपने पैशन को अंजाम देने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
इस किताब के लेखक तिमोती मानते हैं कि ऑन्त्रप्रन्योरशिप के ज़रिए आप अपने जीवन पर नियंत्रण हासिल कर सकते हैं और एक हफ़्ते में 40 घंटे से भी कम समय तक काम करके आप अपने जीवन का पूरा आनंद उठा सकते हैं। यह किताब आपको बताती है कि किस तरह से आप परंपरागत 9 से 5 बजे तक की नौकरी से मुक्ति पाकर, अन्य रोचक काम कर सकते हैं ।
3. जेसन फ़्रायड और डेविड हेनीमियर हैनसन की पुस्तक ‘रीवर्क’ आपको अपने बिज़नेस में सफलता पाने का बेहतर, तेज़ और आसान रास्ता सुझाती है।
स्टार्ट अप फाउंडर्स को इस किताब को पढ़कर जानना चाहिए कि किस तरह की योजनाएं, उनके लिए नुकसानदायक हो सकती हैं; क्यों हमें बाहरी निवेशकों की ज़रूरत नहीं; और क्यों आपको किसी भी क्षेत्र में काम करने से पहले उसमें मौजूद प्रतियोगियों के बारे में बहुत ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए।
4.एरिक राइज़ की द लीन स्टार्टअप किताब में एरिक राइज़ ने इनोवेशन ईको सिस्टम से जुड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य का ज़िक्र किया है कि ज़्यादातर स्टार्टअप्स असफल क्यों हो जाते हैं। किताब के लेखक का मानना है कि असफल होने वाले इन स्टार्टअप्स में से ज़्यादातर सफल हो सकते थे और किताब में उन्होंने इसके तरीक़े बताए हैं।
5. जिम कॉनिल्स की “गुड टू ग्रेटः वाय सम कंपनीज़ मेक द लीप ऐंड अदर्स डोन्ट” 2001 में इस किताब को लॉन्च किया गया था। इस किताब में अर्श से फ़र्श तक पहुंचने वाली कंपनियों की ख़ासियतों के बारे में चर्चा की गई है। किताब में बताया गया है कि आप किस तरह से, सफलता के एक स्तर पर मिलने वाली तारीफ़ों के दौरान अपने आप को शांत रखें और अपने बड़े लक्ष्य से ध्यान को भटकने न दें और अपना काम जारी रखें।
6. नाथन फ़र और पॉल ऐहल्सट्रॉम की “नेल इन देन स्केल इटः द ऑन्त्रप्रन्योर्स गाइड टू क्रिएटिंग ऐंड मैनेजिंग ब्रेक आईओएथ्रू इनोवेशन”
यह किताब संघर्ष के दौर से गुज़र रहे स्टार्टअप्स को सफलता से जुड़े कई अहम राज़ बताती है। इस किताब में लेखक ‘नेल इट देन स्केल इट’ की ख़ास विधि के बारे में बताता है, जिसमें आपको बतौर ऑन्त्रप्रन्योर सफल व्यवसाइयों के काम करने के तरीक़े और सिद्धान्त पहचानने और समझने होते हैं।
7. क्रिस गुलीबियू की “द 100 डॉलर स्टार्टअपः रीइनवेन्ट द वे यू मेक अ लिविंग, डू वॉट यू लव ऐंड क्रिएट अ न्यू फ़्यूचर “
इस किताब में क्रिस गुलीबियू ने 1500 से ज़्यादा उन लोगों के साथ अपनी बातचीत को प्रस्तुत किया है, जिन्होंने 100 डॉलर या इससे भी कम पैसों के साथ अपने बिज़नेस की शुरुआत की थी और फिर सफलता हासिल की और जिनका मानना है कि सफल होने के लिए आपके पास करोड़ों रुपए की फ़ंडिंग हो ऐसा ज़रूरी नहीं है।
8. बिज़ स्टोन की “थिंग्स अ लिटिल बर्ड टोल्ड मीः कन्फ़ेशन्स ऑफ़ द क्रिएटिव माइन्ड”
ट्विटर के को-फ़ाउंडर बिज़ स्टोन ने इस किताब में बताया कि क्रिएटिविटी की क्या ताक़त होती है और इसे कैसे भुनाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी और करियर से जुड़ीं कई रोचक समझने वाली बातों का ज़िक्र किया है।
9. ऐलिस स्रोडर की “द स्नोबॉलः वॉरेन बफ़े ऐंड द बिज़नेस ऑफ़ लाइफ़ “
यह किताब दुनिया के बहुचर्चित अरबपति उद्योपतियों में से एक वॉरेन बफ़े के काम करने और सोचने के तरीक़ों के बारे में जानकारी देती है। वॉरेन बफ़े ने लिखित रूप से या मीडिया के सामने मौखिक रूप से कभी अपने अनुभवों को बहुत अधिक साझा नहीं किया, इसलिए आप इस किताब से उनके बारे में जान सकते हैं।
10. जेसिका लिविंग्स्टन की “फ़ाउंडर्स ऐट वर्कः स्टोरीज़ ऑफ़ स्टार्टअप्स अर्ली डेज़”
यह किताब टेक कंपनियों के फ़ाउंडर्स जैसे कि स्टीव वोज़नियक (ऐपल), कैटरीना फ़ेक (फ़्लिकर), मिच कैपर (लोटस), मैक्स लेवचिन (पे पाल) और सबीर भाटिया (हॉटमेल) आदि के प्रोफ़ाइल्स का संकलन है।
इस किताब की लेखिका जेसिका लिविंग्स्टन वाय कॉम्बिनेटर में फ़ाउंडिंग पार्टनर हैं। यह किताब आपको बताएगी किस तरह से इन बुद्धिजीवियों ने अपने विनिंग आइडिया पर काम किया और इसे सफल बनाने के लिए किस तरह की रणनीति अपनाई।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा पुस्तक चर्चा ‘सुंदर सूक्तियाँ’ – पठनीय मननीय कृति – श्री हीरो वाधवानी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 162 ☆
☆ ☆ पुस्तक चर्चा – ‘सुंदर सूक्तियाँ’ – पठनीय मननीय कृति – श्री हीरो वाधवानी ☆
[कृति विवरण: कृति विवरण – सुंदर सूक्तियाँ, सूक्ति संग्रह, हीरो वाधवानी, आकार डिमाई, पृष्ठ संख्या २७५, मूल्य ₹ ५००, प्रथम संस्करण २०२३, अयन प्रकाशन दिल्ली।]
‘सुंदर सूक्तियाँ’ – पठनीय मननीय कृति
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
किसी भी भाषा में उसे बोलने वालों के जीवन अनुभवों को सार रूप में व्यक्त करने के लिए सूक्तियाँ कही जाती हैं।
सूक्तियों के दो रूप देखने में आते हैं- गद्य और पद्य। सूक्तियाँ, लोकोक्तियों से सृजीत होती हैं, मुहावरे बनकर जन-जन के अधर पर विराजमान रहती हैं और वर्तमान काल में जब शिक्षा सर्व सुलभ है, मुद्रण सहज और मितव्ययी हो गया है, सूक्तियाँ अधरों से उठकर पन्नों पर अंकित हो गई हैं।
श्री हीरो वाधवानी
सूक्तियाँ परंपरागत भी होती हैं और नई सूक्तियाँ भी रची जाती हैं। चिंतक हीरो वाधवानी अपने विचार सागर से जो विचार बिंदु विचार मणिया प्राप्त करते हैं उन्हें सूक्ति के रूप में सर्वसुलभ कराते हैं। उनकी पूर्व कृतियाँ ‘प्रेरक अर्थपूर्ण कथन और सूक्तियाँ’, ‘सकारात्मक सुविचार’, ‘सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ’, ‘मनोहर सूक्तियाँ’ पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं और अब इस क्रम में उनकी छठवीं कृति ‘सुंदर सूक्तियाँ’ पाठक पंचायत में प्रस्तुत हुई है। भाई हीरो वाधवानी सूक्ति सृजन करते हुए हिंदी साहित्य को एक लोकोपयोगी विधा से संपन्न कर रहे हैं।
सूक्ति सजन का कार्य पूर्व में वियोगी हरि जी, प्रभाकर माचवे जी तथा कुछ अन्य साहित्यकारों ने किया है।
सूक्ति का उद्देश्य सामान्य जन को कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक सारगर्भित संदेश देना होता है।
सूक्ति मानव मन की धरती पर भावनाओं के बीज बोकर कामनाओं की खरपतवार को नियंत्रित करती है, सूक्ति मानवीय आचरण को दिशा दिखाती है। सूक्ति का कार्य किसी डंडधारी की तरह प्रताड़ित करना नहीं होता अपितु किसी सद्भावी मार्गदर्शख की तरह अँगुली पकड़ कर सत्पथ पर चलाना होता है। सूक्ति था
जीवनानुभवों से प्राप्त सीख को सर्वजन सुलभ बनाती है, सूक्ति गागर में सागर है, सूक्ति बिंदु में सिंधु है, सूक्ति अंगार में छपी मशाल है।
सूक्ति का सृजन बहुत सरल प्रतीत होता है किंतु होता नहीं है। एक सूक्ति के सृजन के पूर्व गहन चिंतन की पृष्ठभूमि होती है। हीरो वाधवानी जी सूक्ति के माध्यम से कम से कम शब्दों में सार्थक संदेश देते हैं, आदर्श का मंत्र देते हैं, आचरण का सूत्र देते हैं। जिस तरह सड़क पर यातायात को नियंत्रित करने के लिए संकेतक चिन्ह लगाए जाते हैं, उसी तरह मानव जीवन के पथ पर आचरण को संतुलित और सम्यक बनाने के लिए सूक्ति का सृजन अध्ययन और अनुसरण किया जाता है।
शिशु को शैशव काल काल में ही सूक्तियाँ सुनाई जाएँ तो वह उसके मानस पर अंकित होकर उसके आचरण का भाग बन सकती हैं। आज समाज में जो अराजकता व्याप्त है, जो पारिवारिक विघटन हो रहा है, पारस्परिक विश्वासघात रहा है,़ आदर्श सिमट रहे हैं और उपभोक्तावादी संस्कृति बढ़ रही है उसका निदान सूक्ति के माध्यम से किया जा सकता है। सूक्ति की सरलता, सहजता संक्षिप्तता तथा बोधगम्यता मनोवैज्ञानिकता तथा आचरण परकता है। यह सूक्तियाँ सिर्फ किताबी नहीं है, इन्हें पढ़-समझ कर आचरण में उतारि जा सकता है।
‘सुंदर वह है जिसका व्यवहार और वाणी सुंदर है’ यह सूक्ति मनुष्य जीवन में सुंदरता को परिभाषित करती है कि सुंदरता तन की नहीं होती, वस्तुओं में नहीं होती, व्यवहार और वाणी में होती है।
‘ब्याज पर लिया गया धन कृपा और आशीर्वाद रहित होता है’ इस सूक्ति को अगर आचरण में उतार लिया जाए तो ऋण लेकर न चुका पाने वाले आत्महत्या कर रहे लोगों को जीवन मिल सकता है। विडंबना है उपभोक्तावादी संस्कृति ऋण लेने को प्रोत्साहित करती है। यह सूक्ति उसे नियंत्रित करती है।
‘ईश्वर परिश्रम करने वाली की पहले और प्रार्थना करने वाले की बाद में सुनता है’ इस सूक्ति में समस्त धर्म का मर्म छिपा हुआ है। लोक इसे स्वीकार कर लें तो अंध श्रद्धा के व्याल-जिल से मुक्त होकर श्रम देवता की उपासना करने लगेगा जिससे देश समृद्ध और संपन्न होगा।
एक और सूक्ति देखें जो आचरण के लिए महत्वपूर्ण है। ‘बाल की खाल निकालने वाला बुद्धिमान नहीं मूर्ख है’
सामान्य तौर पर बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए लोग छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति अपनाते हैं। यह उक्ति इस प्रवृत्ति का निषेध करती है।
दांपत्य जीवन को लेकर एक बहुत सुंदर सूक्ति देखिए ‘पत्नी और पति दाईं और बाईँ आँख हैं’, जिस तरह एक आँख के न रहने पर भी दूसरी आँख से देखा तो जा सकता है किंतु वह अशुभ या कुरूप हो जाती है, सम्यक दृष्टि तो तभी है जब दोनों आँखें हों। दोनों का समान महत्व हो, दोनों से समान दिखाई देता हो।
इस सूक्ति में पति-पत्नी दोनों की समानता और पारस्परिक पूरकता का भाव अंतर्निहित है।
‘ईश्वर गाना देता है, गुड़ और शक्कर नहीं’, इस सूक्ति में पुरुषार्थ और प्रयास दोनों की महत्ता अंतर्निहित है। ईश्वर उपादान तो देता है स्वास्थ्य देता है किंतु आस पूरी करने के लिए प्रयास मनुष्य को ही करना होता है।
एक और सूक्ति देखें- ‘अच्छी नींद नर्म बिस्तर की नहीं, कठोर परिश्रम की दीवानी है’, यह कटु सत्य हम दैनिक जीवन में देखते हैं जो श्रमिक दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करता है, रिक्शा चलाता है कुली बनकर सामान उठाता है वह पत्थर पर भी घोड़े बेचकर सोता है और समृद्धिमान पूँजीपति नींद न आने के कारण रेशमी मखमली गद्दे होते हुए भी नींद की गोलियों का सेवन करते हैं।
इस संग्रह के हर पृष्ठ पर अंकित हर सूक्ति जीवन में उतारने योग्य है। मुझे तो ऐसा लगता है कि यह सूक्ति संग्रह हर विद्यालय में होना चाहिए और सूक्तियाँ दीवारों पर लिखी जानी चाहिए।
भाई हीरो वाधवानी इस सार्थक सृजन हेतु साधुवाद के पात्र हैं। ऐसी लोकोपयोगी कृति अल्प मोली होनी चाहिए ताकि वे बच्चे खरीद सकें जिनके लिए यह आवश्यक है।
(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अनूप शुक्ल जी द्वारा संपादित पुस्तक – “आलोक पुराणिक-व्यंग्य का ATM” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 151 ☆
☆ “आलोक पुराणिक-व्यंग्य का ATM” – संपादन अनूप शुक्ल ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हास्य एवं व्यंग्य समय की अत्यंत लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित होता जा रहा है । आलोक पुराणिक हिंदी ब्लॉगिंग के प्रारंभ से ही सक्रिय व्यंगकार हैं । प्रायः सभी समाचार पत्रों में उनके व्यंग्य पढ़ने को मिलते हैं। देश के लगभग 32 प्रसिद्ध व्यंग्यकारों ने अपने मंतव्य आलोक पुराणिक जी के विषय में इस कृति में संकलित किए हैं। साथ ही आलोक पुराणिक की 16 लोकप्रिय व्यंग कृतिया भी किताब में संकलित है । संपादक अनूप शुक्ल जी ने विभिन्न विषयों पर आलोक पुराणिक से साक्षात्कार लेकर उसे भी प्रश्न उत्तर के रूप में किताब में संग्रहित किया है ।इस किताVब को पढ़ने से आलोक पुराणिक की रचना प्रक्रिया उन के व्यंग के सफ़र के विषय में ऐसी जानकारी मिलती है जिससे नए व्यंग्यकार प्रेरणा ले सकते हैं। किताब मनोरंजक है और पढ़ने योग्य है। ईबुक के रूप मे भी पुस्तक किंडल पर सुलभ है । समीक्षक।
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ संवेदना के स्वर – कृतिकार – डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’ ☆ समीक्षक – प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
कृति – संवेदना के स्वर
कृतिकार – डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’
पृष्ठ संख्या – 80
मूल्य – 101 रू.
प्रकाशन – पाथेय प्रकाशन, जबलपुर
☆ ‘‘संवेदना के स्वर’*’ लघुकथाओं का बेहतरीन समुच्चय है – प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे ☆
“संवेदना के स्वर” लघु कथाओं का बेहतरीन समुच्चय है। वर्तमान की सुपरिचित लेखिका, कवयित्री, लघुकथाकार डॉ. संध्या शुक्ल ’मृदुल’ की ताजातरीन कृति लघुकथा संग्रह के रूप में जो पाठकों के हाथ में आयी है, वह है ‘संवेदना के स्वर’। इस उत्कृष्ट लघुकथा संग्रह में समसामयिक चेतना, परिपक्वता, चिंतन, मौलिकता, विशिष्टता, उत्कृष्टता व एक नवीन स्वरूप को लिए हुए उनसठ लघुकथाएं समाहित हैं।
डॉ. संध्या शुक्ल ’मृदुल’
पाथेय प्रकाशन, जबलपुर से प्रकाशित यह लघुकथा संग्रह अस्सी पृष्ठीय है जिसमें वर्तमान के मूर्धन्य साहित्यकारों एवं स्वनामधन्य व्यक्तित्वों ने अपनी भूमिका, आशीर्वचन लिखा है जिनमें डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी, डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे, कांताराय, डॉ. हरिशंकर दुबे आदि प्रमुख हैं। वर्तमान में लघुकथाएं व्यापक रूप में लिखी जा रहीं हैं, पढ़ी जा रहीं हैं और सराही भी जा रहीं हैं, पर यह नहीं कहा जा सकता है कि सभी लघुकथाएं, लघुकथाएं होती हैं, स्तरीय होती हैं और सभी को पढ़ा जाता है, सभी को सराहा जाता है, पर निःसंदेह मैं यह कहूंगा कि यदि वे लघुकथाएं ‘संवेदना के स्वर’ जैसी लघुकथाएं होंगी तो उन्हें पढ़ा भी जाएगा, उन्हें सराहा भी जाएगा और उन्हें लघुकथाओं की मान्यता भी दी जाएगी।
समीक्ष्य कृति में डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’ ने विभिन्न विषयक लघुकथाएं प्रस्तुत की हैं। हर लघुकथा वास्तव में लघुकथा है। कहीं पर भी कोई लघुकथा न तो आत्मकथ्य हैे, न संस्मरण है और न वृत्तांत है। बल्कि हर लघुकथा में लघुकथा का शिल्प समाहित है, उसमें एक संदेश है और कथ्य भी है। वर्तमान में सामाजिक विडंबनाएं हैं, नैतिक मूल्य गिर रहे हैं, रिश्ते-नाते बिखर रहें हैं, व्यक्ति स्वार्थ केन्द्रित हो रहा है राजनैतिक अवमूल्यन भी है, नारी का भी अवमूल्यन हो रहा है, पुरुष का भी अवमूल्यन हो रहा है, और दाम्पत्य का भी अवमूल्यन हो रहा है। शिक्षा के नाम पर भी व्यापार चल रहा है और व्यापार-व्यवसाय में भी लूट है। व्यापक रूप में जो विकार व्याप्त हैं, विद्रूपताएं, नकारात्मकताएं व्याप्त हैं, जो दर्द और टीस व्याप्त है उसको देखकर निश्चित रूप से हर संवंदनशील व्यक्ति की संवेदनाएं आहत होती हैं, संवेदनाएं मुखर भी होती हैं और यदि वह रचनाकार, कलाकार हैे तो वह अपनी कलाकृति, अपनी रचना के माध्यम से अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देगा, भावनाओं को अभिव्यक्ति देगा क्योंकि रचना के सृजन के मूल में भावनाएं और संवेदनाएं ही होती हैं। डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’ की पूर्व की कृतियों को मैं पढ़ा हूं। उनमें भी संवेदनाएं हैं और उनकी लघुकथाओं में भी अच्छी गहरी संवेदनाएं दिखलाई देती है। वो सामाजिक विडंबनाओं को अपना दर्द और अपनी संवेदना बना करके प्रस्तुत करती हैं। इसी कसौटी व सत्य पर यह लघुकथा संग्रह भी खरा उमरता है।
देखा जाए तो वो कर्तव्य की बात भी करती हैं, अन्नदान की बात भी करती हैं, स्वच्छता का संदेश भी देती हैं, स्वतंत्रता का अहसास भी हमें कराती हैं, रोजी-रोटी की बात भी करती हैं। वे संतान के दायित्व का उल्लेख भी करती हैं, कहीं पुरानी साइकिल से भी उनका नाता जुड़ा दिखाई देता है, कहीं कन्या भोज की विडंबनाएं और यथार्थ है और वे विसंगतियों पर पिन पॉइंट करती हैं, वोे इंसानियत का जो बिगड़ता हुआ स्वरूप है, उस पर भी प्रहार करती हैं। वो सुकून सहृदयता और गुरु दक्षिणा की बात करके समाज को एक संदेश देती दिखाई देती हैं, वो मां की सीख को भी गांठ में बांधे दिखाई देती हैं। नानी का गांव की बात भी याद आती है। बुजुर्गों की छाया के माध्यम से वो भारतीय संस्कृति का बखान करती हैं। वो गोरैया की संख्या जो घटती जा रही है, खत्म ही लगभग होती जा रही है, वो चिड़ियों का चहचहाना भी याद करती हैं और ये अपेक्षा, कामना भी करती हैं, काश चिड़िया, गोरैया फिर से चहचहाए। वो अपने देश का गौरव अभिव्यक्त करती हैं। वो लघुकथा के माध्यम से भलाई की बात भी करती हैं, मानवीय मूल्यों की, चेतना की बात भी करती हैं। वो मूल में परोपकार, नैतिकता, करुणा, दया की बात भी करती हैं। उनमें श्रद्धांजली को और उसकी सच्चाई को व्यक्त करने का साहस भी है। वे बिटिया के दान की भी बात करती हैं।
वास्तव में यदि देखा जाए तो इस लघुकथा संग्रह के माध्यम से ‘मृदुल’ जी ने समाज को संदेश दिया है। उनकी लघुकथाएं केवल प्रेरक प्रसंग नहीं हैं या लघुकथाएं केवल उपदेश नहीं देती हैं, बल्कि वे एक ताने-बाने के माध्यम से एक आदर्श का बिखराव करती हैं, एक आदर्श को लोगों तक पहुंचाती हैं। कहा भी जाता है की साहित्य वो है जिसमें समाज का हित समाहित हो। संध्या जी की जो लघुकथाएं हैं उनमें समाज के लिए बहुत कुछ दिशा है, बहुत कुछ सार्थकता है और हर लघुकथा पाठक को अपने जीवन की कथा इसलिए लगेगी क्योंकि जो भी संवेदनशील पाठक होता हैे वह धरातल से जुड़ा होता है, भावनाओं से युक्त होता है और वह अपने हृदय में बहुत सारी भावनाएं, बहुत सारी कामनाएं, बहुत सारे अरमान, बहुत सारी यादें, बहुत सारा अतीत समाहित किए होता है। जैसे ही लघुकथा उसके किसी अरमान, उसकी किसी याद या उसके किसी अतीत को स्पर्श करती है वो लघुकथा उसको अपनी लगने लगती है। सशक्त रचनाकार की यह बहुत बड़ी विशेषता होती है कि वो अपने सृजन को पाठक का सृजन बना देता है। अपनी संवेदना को पाठक की संवेदना बना देता हैे, अपनी भावना को पाठक की भावना बना देता है और अपने लेखन को पाठक के जीवन का यथार्थ बना देता हैे।
निश्चित रूप से इस संग्रह की जो लघुकथाएं हैं उनको सफलता पूर्वक संध्या जी ने न केवल लिखा है, न केवल सृजा है बल्कि गढ़ा भी है। इसीलिए ये लघुकथाएं एक प्रकार से दस्तावेज हैं, समाज का दस्तावेज हैं, समाज की मूर्तता का दस्तावेज हैं, समाज की बयानी हैं। इन लघुकथाओं को हम पाठक की लघुकथाएं समझ सकते हैं, समाज की लघुकथाएं समझ सकते हैं, सार्वजनिक लघुकथाएं समझ सकते हैं। चिंतन और लेखन-सृजन तो लेखक का अपना होता है किंतु जब वो व्यापकता के साथ में लिखता है, जब वो समग्रता के साथ में लिखता है, जब वो उत्कृष्टता के साथ में लिखता है, जब वो गहनता के साथ में लिखता है, जब वो उसका केनवास बहुत विस्तृत कर देता है तो उस लेखक का सृजन, कवि का सृजन, कृतिकार का सृजन, लघुकथाकार का सृजन समाज का, पाठक का और सर्व का सृजन बन जाता है। मैं डॉ. संध्या शुक्ल जी को एक सार्थक कृति एक सार्थक सृजन के लिए बधाई देता हूं और इस कृति की उत्कृष्ट सफलता और सुयश के लिए बहुत-बहुत मंगल कामनाएं अर्पित करता हूं।
(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है सुश्री मंजू वशिष्ठ जीकी पुस्तक – “हेलो पेरेंट्स (लालन पालन)” पर चर्चा।
☆ माता पिता को छोटी बड़ी सही सलाह… विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆
बढ़ते एकल परिवार, माता पिता दोनो की नौकरी, बच्चों की परवरिश के प्रति शिक्षित पैरेंट्स में अति सतर्कता आदि वे कारण हैं जिनके चलते शायद प्रसिद्ध रेकी ग्रेँड मास्टर मंजू वशिष्ठ को इस किताब को लिखने की प्रेरणा हुई। विदेशों में तो स्कूलों में बच्चे पिस्तौल चलाने जैसे अपराध करते दिखते हैं। इंटरनेट और टी वी पर हिंसा तथा बच्चों की इस सब तक निर्बाध पहुंच ने तथा सायबर मोबाईल गेम्स ने बच्चों की परवरिश के प्रति सजगता जरूरी कर दी है। पब्जी जैसे गेम्स से बच्चे हत्या, आत्महत्या तक करते पाये जा रहे हैं। वर्तमान स्कूली शिक्षा में बेहिसाब प्रतियोगी दौड़ ने बच्चों को मानसिक दबाव में ला दिया है। इस सारे परिवेश ने प्रस्तुत पुस्तक को बहुत प्रासंगिक कर दिया है। पुस्तक में ढ़ेरों ऐसी छोटी छोटी बातें सरल भाषा में चैप्टर्स के रूप में लिखी गई हैं जिनका हमें ज्ञान तो है पर ध्यान नहीं। उदाहरण के रूप में बच्चों को समय दें माता पिता, गलती पर पनिशमेंट जरूरी पर बच्चे को पता होना चाहिये क्यों ?, स्क्रीन टाइम का निर्धारण, मोबाईल का झुनझुना बच्चों को देना बंद करें, बच्चे क्यों बोलते हें झूठ, जैसा खाओ अन्न वैसा रहेगा मन, गलती मानने में हिचक न हो, धन्यवाद कहने में कंजूसी न करें, आचरण से सिखायें, बच्चों की गलतियों पर पर्दा न डालें, किशोरावस्था की विशेष बातें आदि आदि चैप्टर्स में लेखिका ने बहुत सामान्य किन्तु उपयोगी परामर्श दिया है। किताब रीडर्स फ्रेंडली प्रिंत में सचित्र है। संस्कृत सूक्तियां, कवितायें , प्रचलित कहानियां और उदाहरणो के माध्यम से सामान्य जनो के लिये अपनी बात
बताने में रचनाकार सफल रही है। नये एकाकी माता पिता शिशु की छोटी सी बीमारी से भी घबरा जाते हैं, उनके लिये बच्चों के सामान्य रोग और उन्हें जानने के तरीके पर पूरा एक बिन्दुवार चैप्टर ही है। पैरेंट्स के झगड़ों का बच्चो पर प्रभाव होता है इससे बचाव आवश्यक है। जहाँ एकल परिवार में बच्चों की परवरिश की कठिनाईयां हैं वहीं संयुक्त परिवार में भी कई बार मनमाफिक पेरेंटिंग नहीं हो पाती उस पर भी एक चैप्टर में सविस्तार चर्चा है। कुल मिलाकर अच्ची पेरेंटिंग एक अनिवार्य निवेश होती है। यह समझना सबके लिये आवश्यक है। मेरी दृष्टि में यदि प्रत्येक दम्पति समाज को सुसंस्कृत बच्चे ही दे दें तो समाज से अपराध, महिला उत्पीड़न, स्वयमेव कम हो जाये। इस दिशा में यह पुस्तक पाठको का मार्ग दर्शन करने में सफल है। नव दम्पति को उपहार स्वरूप दिये जाने योग्य किताब है।